12. त्याग और ज्ञान से परे
श्रीभगवानुवाचन रोधयति मां योगो न साड्ख्यं धर्म एबच ।न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्त न दक्षिणा ॥
१॥
ब्रतानि यज्ञएछन्दांसि तीर्थानि नियमा यमा: ।यथावरुन्धे सत्सड्र: सर्वसड्रापहो हि माम् ॥
२॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; न रोधयति--नियंत्रित नहीं करता; माम्--मुझको; योग: --अष्टांग योग पद्धति; न--नतो; साइड्ख्यमू-- भौतिक तत्त्वों का वैश्लेषिक अध्ययन; धर्म:--अहिंसा जैसी सामान्य करुणा; एव--निस्सन्देह; च-- भी; न--न तो; स्वाध्याय:--वेदों का उच्चारण; तपः--तपस्या; त्याग: --सन्यास-आश्रम; न--न तो; इष्टा-पूर्तम्--यज्ञ करना तथा कुएँखुदवाना या वृक्ष लगाना जैसे आम जनता के कल्याण-कार्य; न--न तो; दक्षिणा--दान; ब्रतानि--ब्रत रखना तथा एकादशीका उपवास; यज्ञ:--देवताओं की पूजा; छन्दांसि--गुट्म मंत्रों का उच्चारण; तीर्थानि--तीर्थस्थानों का भ्रमण; नियमा:--आध्यात्मिक जीवन के लिए मुख्य आदेशों का पालन करना; यमा:--तथा गौण-विधान भी; यथा--जिस तरह; अवरुन्धे--अपने वश में करता है; सत्-सड्रः--मेरे भक्तों की संगति; सर्व--समस्त; सड़-- भौतिक संगति; अपह:--हटाने वाला; हि--निश्चय ही; माम्--मुझको |
भगवान् ने कहा : हे उद्धव, मेरे शुद्ध भक्तों की संगति करने से इन्द्रियतृप्ति के सारे पदार्थोंके प्रति आसक्ति को नष्ट किया जा सकता है। शुद्धि करने वाली ऐसी संगति मुझे मेरे भक्त केवश में कर देती है। कोई चाहे अष्टांग योग करे, प्रकृति के तत्त्वों का दार्शनिक विश्लेष्ण करनेमें लगा रहे, चाहे अहिंसा तथा शुद्धता के अन्य सिद्धान्तों का अभ्यास करे, वेदोच्चार करे,तपस्या करे, संन्यास ग्रहण करे, कुँआ खुदवाने, वृक्ष लगवाने तथा जनता के अन्य कल्याण-कार्यों को सम्पन्न करे, चाहे दान दे, कठिन ब्रत करे, देवताओं की पूजा करे, गुट्य मंत्रों काउच्चारण करे, तीर्थस्थानों में जाय या छोटे-बड़े अनुशासनात्मक आदेशों को स्वीकार करे,किन्तु इन सब कार्यों को सम्पन्न करके भी कोई मुझे अपने वश में नहीं कर सकता। सत्सड्रेन हि दैतेया यातुधाना मृगा: खगाः ।गन्धर्वाप्सरसो नागा: सिद्धाश्चारणगुह्मका: ॥
३॥
विद्याधरा मनुष्येषु वैश्या: शूद्रा: स्त्रियोउन्त्यजा: ।रजस्तमःप्रकृतयस्तस्मिस्तस्मिन्युगे युगे ॥
४॥
बहवो मत्यदं प्राप्तास्त्वाप्टकायाधवादय: ।वृषपर्वा बलिर्बाणो मयश्वाथ विभीषण: ॥
५॥
सुग्रीवो हनुमानृक्षो गजो गृश्लो वणिक्पथ: ।व्याध: कुब्जा ब्रजे गोप्यो यज्ञपत्यस्तथापरे ॥
६॥
सत्-सड्बलेन--मेरे भक्तों की संगति से; हि--निश्चय ही; दैतेया:--दिति के पुत्र; यातुधाना:--असुरगण; मृगा:--पशु; खगा: --पक्षी; गन्धर्व--गन्धर्वगण; अप्सरस:--स्वर्गलोक की वेश्याएँ; नागा:--सर्प; सिद्धाः--सिद्धलोक के वासी; चारण--चारण;गुहाका: --गुह्म क; विद्याधरा:--विद्याधर लोक के वासी; मनुष्येषु--मनुष्यों में से; वैश्या:--व्यापारी लोग; शूद्रा:-- श्रमिक;स्त्रियः--स्त्रियाँ; अन्त्य-जा:--असभ्य लोग; रज:-तमः-प्रकृतयः--रजो तथा तमोगुणों से बँधे हुए; तस्मिन् तस्मिनू--उसी उसीप्रत्येक में; युगे युगे--युग में; बहबः--अनेक जीव; मत्--मेरे; पदम्-- धाम को; प्राप्ता:--प्राप्त हुए; त्वाष्ट--वृत्रासुर;'कायाधव--प्रह्माद महाराज; आदयः--इत्यादि; वृषपर्वा--वृषपर्वा नामक; बलि: --बलि महाराज; बाण:--बाणासुर; मय: --मय दानव; च-- भी; अथ--इस प्रकार; विभीषण:--रावण का भाई विभीषण; सुग्रीव: --वानरराज सुग्रीव; हनुमान्--महान्भक्त हनुमान; ऋक्ष:--जाम्बवान; गज:--गजेन्द्र नामक भक्त हाथी; गृश्र:--जटायु गृद्ध;वणिक्पथ:--तुलाधार नामक बनिया;व्याध:--धर्म व्याध; कुब्जना--कुब्जा नामक वेश्या, जिसकी रक्षा कृष्ण ने की; ब्रजे--वृन्दावन में; गोप्य: --गोपियाँ; यज्ञ-पत्य:--यज्ञकर्ता ब्राह्मणों की पत्नियाँ; तथा--उसी प्रकार; अपरे-- अन्य |
प्रत्येक युग में रजो तथा तमोगुण में फँसे अनेक जीवों ने मेरे भक्तों की संगति प्राप्त की । इसप्रकार दैत्य, राक्षस, पक्षी, पशु, गन्धर्व, अप्सरा, नाग, सिद्ध, चारण, गुह्मक तथा विद्याधर जैसेजीवों के साथ साथ वैश्य, शूद्र, स्त्रियाँ तथा अन्य निम्न श्रेणी के मनुष्य मेरे धाम को प्राप्त करसके। वृत्रासुर, प्रह्दाद महाराज तथा उन जैसे अन्यों ने मेरे भक्तों की संगति के द्वारा मेरे धाम कोप्राप्त किया। इसी तरह वृषपर्वा, बलि महाराज, बाणासुर, मय, विभीषण, सुग्रीव, हनुमान,जाम्बवान, गजेन्द्र, जटायु, तुलाधार, धर्मव्याध, कुब्जा, वृन्दावन की गोपियाँ तथा यज्ञ कर रहेब्राह्मणों की पत्नियाँ भी मेरा धाम प्राप्त कर सकीं।
ते नाधीतश्रुतिगणा नोपासितमहत्तमा: ।अब्रतातप्ततपसः मत्सड्ान्मामुपागता: ॥
७॥
ते--वे; न--नहीं; अधीत--अध्ययन करके; श्रुति-गणा:--वैदिक वाड्मय; न--नहीं; उपासित--पूजा किया हुआ; महत्-तमः--महान् सन्त; अब्रत--ब्रत के बिना; अतप्त--बिना किये; तपसः--तपस्या; मत्-सड्भात्-मेरे तथा मेरे भक्तों की संगतिसे; माम्--मुझको; उपागता:--उन्होंने प्राप्त किया |
मैंने जिन व्यक्तियों का उल्लेख किया है, उन्होंने न तो वैदिक वाड्मथ का गहन अध्ययनकिया था, न महान् सन््तों की पूजा की थी, न कठिन ब्रत या तपस्या ही की थी। मात्र मेरे तथामेरे भक्तों की संगति से, उन्होंने मुझे प्राप्त किया।
केवलेन हि भावेन गोप्यो गावो नगा मृगा: ।येउन्ये मूढधियो नागा: सिद्धा मामीयुरक्षसा ॥
८॥
केवलेन--शुद्ध; हि--निस्सन्देह; भावेन--प्रेम से; गोप्य:--गोपियाँ; गाव:--वृन्दावन की गाएँ; नगा:--वृन्दावन के जड़ प्राणीयथा यमलार्जुन वृक्ष; मृगा:--अन्य पशु; ये--जो; अन्ये-- अन्य; मूढ-धिय:--जड़ बुद्धि वाले; नागा:--वृन्दावन के सर्प, यथाकालिय; सिद्धा:--जीवन की सिद्धि पाकर; माम्--मेरे पास; ईयु:--आये; अद्धसा--अत्यन्त सरलता से |
गोपियों समेत वृन्दावन के वासी, गौवें, अचर जीव यथा यमलार्जुन वृक्ष, पशु, जड़ बुद्धिवाले जीव यथा झाड़ियाँ तथा जंगल और सर्प यथा कालिय--इन सबों ने मुझसे शुद्ध प्रेम करनेके ही कारण जीवन की सिद्धि प्राप्त्की और इस तरह आसानी से मुझे प्राप्त किया।
यं न योगेन साड्ख्येन दानव्रततपोध्वरै: ।व्याख्यास्वाध्यायसन्न्यासै: प्राप्नुयाद्यलवानपि ॥
९॥
यम्--जिनको; न--नहीं; योगेन--योग द्वारा; साड्ख्येन--दार्शनिक चिन्तन द्वारा; दान--दान; ब्रत--ब्रत; तप:--तपस्या;अध्वर:--अथवा वैदिक कर्मकाण्ड द्वारा; व्याख्या--अन्यों से वैदिक ज्ञान की विवेचना द्वारा; स्वाध्याय--वेदों का निजीअध्ययन; सन्न्यासै:--अथवा संन्यास ग्रहण करके ; प्राप्नुयात्--प्राप्त कर सकता है; यत्न-वान्ू--महान् प्रयास से; अपि-- भी |
योग, चिन्तन, दान, व्रत, तपस्या, कर्मकाण्ड, अन्यों को वैदिक मंत्रों की शिक्षा, वेदों कानिजी अध्ययन या संन्यास में बड़े-बड़े प्रयास करते हुए लगे रहने पर भी मनुष्य, मुझे प्राप्त नहींकर सकता।
रामेण सार्ध मथुरां प्रणीतेश्वाफल्किना मय्यनुरक्तचित्ता: ।विगाढभावेन न मे वियोगतीब्राधयोन्यं दहशु:ः सुखाय ॥
१०॥
रामेण--बलराम के; सार्धम्--साथ; मथुराम्--मथुरा नगरी के; प्रणीते--लाये गये; श्राफल्किना--अक्रूर द्वारा; मयि--मुझमें;अनुरक्त--निरन्तर लिप्त; चित्ता:--चेतना वाले; विगाढ--प्रगाढ़; भावेन--प्रेम से; न--नहीं; मे--मेरी अपेक्षा; वियोग--विछोह का; तीव्र--गहन; आधय:--मानसिक कष्ट, चिन्ता आदि का अनुभव करने वाले; अन्यम्--अन्यों को; ददशुः--देखा;सुखाय--उन्हें सुखी बनाने के लिए
गोपियाँ इत्यादि वृन्दावनवासी गहन प्रेम से सदैव मुझमें अनुरक्त थे। अतएव जब मेरे चाचाअक्रूर मेरे भ्राता बलराम सहित मुझे मथुरा नगरी में ले आये, तो वृन्दावनवासियों को मेरे विछोहके कारण अत्यन्त मानसिक कष्ट हुआ और उन्हें सुख का कोई अन्य साधन प्राप्त नहीं हो पाया।
तास्ता: क्षपाः प्रेष्ठठमेन नीतामयैव वृन्दावनगोचरेण ।क्षणार्धवत्ता: पुनरड़ तासांहीना मया कल्पसमा बभूव॒ु: ॥
११॥
ता: ताः--वे सभी; क्षपा:--रातें; प्रेष्ट-तमेन-- अत्यन्त प्रिय के साथ; नीता:--बिताई गईं; मया--मेरे द्वारा; एब--निस्सन्देह;वृन्दावन--वृन्दावन में; गो-चरेण--जिसे जाना जा सकता है; क्षण--एक पल; अर्ध-वत्--आधे के समान; ताः--वे रातें;पुनः--फिर; अड़--हे उद्धव; तासाम्ू--गोपियों के लिए; हीना:--रहित; मया--मुझसे; कल्प--ब्रह्मा का दिन(४,३२,००,००,००० ); समा:--तुल्य; बभूवु:--हो गया।हे उद्धव, वे सारी रातें, जो वृन्दावन भूमि में गोपियों ने अपने अत्यन्त प्रियतम मेरे साथबिताईं, वे एक क्षण से भी कम में बीतती प्रतीत हुईं। किन्तु मेरी संगति के बिना बीती वे रातेंगोपियों को ब्रह्मा के एक दिन के तुल्य लम्बी खिंचती सी प्रतित हुईं।
ता नाविदन्मय्यनुषडूबद्धधियः स्वमात्मानमदस्तथेदम् ।यथा समाधौ मुनयोब्धितोयेनद्यः प्रविष्टा इव नामरूपे ॥
१२॥
ताः--वे ( गोपियाँ ); न--नहीं; अविदन्--अवगत; मयि--मुझमें; अनुषड्र--घनिष्ठ सम्पर्क द्वारा; बद्ध--बँधी; धिय:--चेतनावाली; स्वम्--निजी; आत्मानम्--शरीर या आत्मा; अदः--दूर की वस्तु; तथा--इस तरह विचार करते हुए; इृदम्-- अत्यन्तनिकट यह; यथा--जिस तरह; समाधौ--योग समाधि में; मुन॒यः--मुनिगण; अब्धि--सागर के; तोये--जल में; नद्यः--नदियाँ;प्रविष्टा:-- प्रवेश करके; इब--सहृ॒श; नाम--नाम; रूपे--तथा रूप।
हे उद्धव, जिस तरह योग समाधि में मुनिगण आत्म-साक्षात्कार में लीन रहते हैं और उन्हेंभौतिक नामों तथा रूपों का भान नहीं रहता और जिस तरह नदियाँ समुद्र में मिल जाती हैं, उसीतरह वृन्दावन की गोपियाँ अपने मन में मुझसे इतनी अनुरक्त थीं कि उन्हें अपने शरीर की अथवाइस जगत की या अपने भावी जीवनों की सुध-बुध नहीं रह गई थी। उनकी सम्पूर्ण चेतना मुझमेंबँधी हुई थी।
मत्कामा रमणं जारमस्वरूपविदोबला: ।ब्रह्म मां परम॑ प्रापु: सड्राच्छतसहस्त्रश: ॥
१३॥
मत्--मुझ; कामा:--चाहने वाले; रमणम्--मोहक प्रेमी को; जारम्--दूसरे की पत्नी का प्रेमी; अस्वरूप-विदः --मेरेवास्तविक पद को न जानते हुए; अबला:--स्त्रियाँ; ब्रह्म--ब्रह्म; मामू--मुझको; परमम्--परम; प्रापु:--प्राप्त किया; सड्जात्ू--संगति से; शत-सहस्त्रश:--सैकड़ों हजारों में |
वे सैकड़ों हजारों गोपियाँ मुझे ही अपना सर्वाधिक मनोहर प्रेमी जान कर तथा इस तरह मुझेअत्यधिक चाहते हुए मेरे वास्तविक पद से अपरिचित थीं। फिर भी मुझसे घनिष्ठ संगति करकेगोपियों ने मुझ परम सत्य को प्राप्त किया।
तस्मात्त्वमुद्धवोत्सूज्य चोदनां प्रतिचोदनाम् ।प्रवृत्ति च निवृत्ति च श्रोतव्यं श्रुतमेव च ॥
१४॥
मामेकमेव शरणमात्मानं सर्वदेहिनाम् ।याहि सर्वात्मभावेन मया स्या ह्कुतोभय: ॥
१५॥
तस्मात्--इसलिए; त्वम्--तुम; उद्धव--हे उद्धव; उत्सृज्य--त्याग कर; चोदनाम्--वेदों के आदेशों को; प्रतिचोदनाम्--वेदांगोंके आदेशों को; प्रवृत्तिमु--आदेश; च--तथा; निवृत्तिम्ू--निषेध; च--तथा; श्रोतव्यम्--सुनने योग्य; श्रुतम्--सुना हुआ;एव--निस्सन्देह; च-- भी; माम्--मुझको; एकम्--अकेला; एव--वास्तव में; शरणम्--शरण; आत्मानम्--हृदय मेंपरमात्मा; सर्व-देहिनामू--समस्त बद्धजीवों का; याहि--जाओ; सर्व-आत्म-भावेन--एकान्तिक भक्ति से; मया--मेरी कृपा से;स्था:--होओ; हि--निश्चय ही; अकुत:ः-भय: --भय से रहित
अतएव हे उद्धव, तुम सारे वैदिक मंत्रों तथा वेदांगों की विधियों एवं उनके सकारात्मक तथानिषेधात्मक आदेशों का परित्याग करो। जो कुछ सुना जा चुका है तथा जो सुना जाना है, उसकीपरवाह न करो। केवल मेरी ही शरण ग्रहण करो, क्योंकि मैं ही समस्त बद्धात्माओं के हृदय केभीतर स्थित भगवान् हूँ। पूरे मन से मेरी शरण ग्रहण करो और मेरी कृपा से तुम समस्त भय सेमुक्त हो जाओ।
श्रीउद्धव उवाचसंशय: श्रुण्वतो वा तव योगेश्वरेश्वर ।न निवर्तत आत्मस्थो येन भ्राम्यति मे मन: ॥
१६॥
श्री-उद्धवः उबाच-- श्री उद्धव ने कहा; संशय: --सन्देह; श्रेण्वत:--सुनने वाले का; वाचम्ू--शब्द; तब--तुम्हारे; योग-ईश्वर--योगशक्ति के स्वामियों के; ई श्वर-- स्वामी; न निवर्तते--बाहर नहीं जायेगा; आत्म--हृदय में; स्थ:--स्थित; येन--जिससे; भ्राम्यति--मोहग्रस्त रहता है; मे--मेरा; मनः--मन |
श्री उद्धव ने कहा : हे योगेश्वरों के ईश्वर, मैंने आपके वचन सुने हैं, किन्तु मेरे मन का सन्देहजा नहीं रहा है, अतः मेरा मन मोहग्रस्त है।
श्रीभगवानुवाचस एष जीवो विवरप्रसूतिःप्राणेन घोषेण गुहां प्रविष्ट: ।मनोमयं सूक्ष्ममुपेत्य रूप॑मात्रा स्वरो वर्ण इति स्थविष्ठ: ॥
१७॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; सः एष:--साक्षात् वे; जीव:--सभी को जीवन देने वाले, भगवान्; विवर--हृदय केभीतर; प्रसूति:--प्रकट; प्राणेन--प्राण के साथ; घोषेण-- ध्वनि की सूक्ष्म अभिव्यक्ति द्वारा; गुहामू--हृदय में; प्रविष्ट:--प्रविष्टहुए; मनः-मयम्--मन से अनुभव किये जाने वाले अथवा शिव जैसे महान् देवताओं के भी मन को वश में करते हुए; सूक्ष्मम्--सूक्ष्म; उपेत्य--स्थित होकर; रूपम्ू--स्वरूप; मात्रा--विभिन्न मात्राएँ; स्वर: --विभिन्न स्वर; वर्ण:--अक्षर की विभिन्न ध्वनियाँ;इति--इस प्रकार; स्थविष्ठ:--स्थूल रूप।
भगवान् ने कहा : हे उद्धव, भगवान् हर एक को जीवन प्रदान करते हैं और प्राण-वायु तथाआदि ध्वनि ( नाद ) के सहित हृदय के भीतर स्थित हैं। भगवान् को उनके सूक्ष्म रूप में हृदय केभीतर मन के द्वारा देखा जा सकता है, क्योंकि भगवान् हर एक के मन को वश में रखते हैं,चाहे वह शिवजी जैसा महान् देवता ही क्यों न हो। भगवान् वेदों की ध्वनियों के रूप में जो हस्वतथा दीर्घ स्वरों तथा विभिन्न स्वरविन्यास वाले व्यंजनों से बनी होती हैं स्थूल रूप धारण करतेहैं।
यथानल: खेउनिलबन्धुरुष्माबलेन दारुण्यधिमथ्यमान: ॥
अणु: प्रजातो हविषा समेधतेतथेव मे व्यक्तिरियं हि वाणी ॥
१८॥
यथा--जिस तरह; अनल:--अग्नि; खे--काठ के भीतर रिक्त स्थान में; अनिल--वायु; बन्धु;--जिसकी सहायता; उष्मा--गर्मी; बलेन--हढ़ता से; दारुणि--काठ के भीतर; अधिमथ्यमान:--रगड़ से जलाई जाने पर; अणु:--अत्यन्त सूक्ष्म; प्रजात:--उत्पन्न होती है; हविषा--घी के साथ; समेधते--बढ़ती है; तथा--उसी तरह; एव--निस्सन्देह; मे--मेरा; व्यक्ति: -- अभिव्यक्ति;इयम्--यह; हि--निश्चय ही; वाणी--वैदिक ध्वनि।
जब काठ के टुकडों को जोर से आपस में रगड़ा जाता है, तो वायु के सम्पर्क से उष्मा उत्पन्नहोती है और अग्नि की चिनगारी प्रकट होती है। एक बार अग्नि जल जाने पर उसमें घी डालनेपर अग्नि प्रज्वलित हो उठती है। इसी प्रकार मैं वेदों की ध्वनि के कम्पन में प्रकट होता हूँ।
एवं गदि: कर्म गतिर्विसर्गोघ्राणो रसो हृक्स्पर्श: श्रुतिश्च ।सट्डूल्पविज्ञानमधाभिमानःसूत्र रज:सत्त्वतमोविकार: ॥
१९॥
एवम्--इस प्रकार; गदिः--वाणी; कर्म--हाथों का कर्म; गति:ः--पाँवों का कार्य; विसर्ग:--जननेन्द्रिय तथा गुदा के कार्य;प्राण:--गन्ध; रसः--स्वाद; हक्--दृष्टि; स्पर्श:--स्पर्श; श्रुतिः--सुनना; च-- भी; सट्लडूल्प--मन का कार्य; विज्ञानम्ू-बुद्धितथा चेतन का कार्य; अथ--साथ ही; अभिमान:--मिथ्या अहंकार का कार्य; सूत्रमू--प्रधान का कार्य; रज:--रजोगुण;सत्त्त--सतोगुण; तमः--तथा तमोगुण; विकार:--रूपान्तर।
कर्मेन्द्रियों के कार्य यथा वाकू, हाथ, पैर, उपस्थ एवं नाक, जीभ, आँख, त्वचा तथा कानज्ञानेन्द्रियों के कार्य के साथ ही मन, बुद्धि, चेतना तथा अहंकार जैसी सूक्ष्म इन्द्रियों के कार्य एवंसूक्ष्म प्रधान के कार्य तथा तीनों गुणों की अन्योन्य क्रिया--इन सबों को मेरा भौतिक व्यक्त रूपसमझना चाहिए।
अयं हि जीवस्त्रिवृदब्जयोनिर्अव्यक्त एको वयसा स आद्य: ।विश्लिप्टशक्तिबहुधेव भातिबीजानि योनि प्रतिपद्य यद्वत्ू ॥
२०॥
अयमू--यह; हि--निश्चय ही; जीव:ः--परम व्यक्ति जो अन्यों को जीवन देता है; त्रि-वृतू--तीन गुणों वाला; अब्ज--ब्रह्माण्डरूपी कमल के फूल का; योनि:--स्त्रोत; अव्यक्त:--अप्रकट; एक:--अकेला; वयसा--कालक्रम से; सः--वह; आद्य:--नित्य; विश्लिप्ट--विभक्त; शक्ति: --शक्तियाँ; बहुधा-- अनेक विभागों में; इब--सहृश; भाति-- प्रकट होता है; बीजानि--बीज; योनिम्ू--खेत में; प्रतिपद्य--गिर कर; यत्-वत्--जिस तरह।
जब खेत में कई बीज डाले जाते हैं, तो एक ही स्रोत मिट्टी से असंख्य वृसश्ष, झाड़ियाँ,वनस्पतियाँ निकल आती हैं। इसी तरह सबों के जीवनदाता तथा नित्य भगवान् आदि रूप मेंविराट जगत के क्षेत्र के बाहर स्थित रहते हैं। किन्तु कालक्रम से तीनों गुणों के आश्रय तथाब्रह्माण्ड रूप कमल-फूल के स्रोत भगवान् अपनी भौतिक शक्तियों को विभाजित करते हैं औरअसंख्य रूपों में प्रकट प्रतीत होते हैं, यद्यपि वे एक हैं।
अस्मिन्िदं प्रोतमशेषमोतं'पटो यथा तन्तुवितानसंस्थ: ।य एघ संसारतरु: पुराण:कर्मात्मकः पुष्पफले प्रसूते ॥
२१॥
यस्मिनू--जिसमें; इृदम्--यह ब्रह्माण्ड; प्रोतम्ू--चौड़ाई में बुना हुआ, बाना; अशेषम्--सम्पूर्ण;, ओतम्--तथा लम्बाई में,ताना; पट:--वस्त्र; यथा--जिस तरह; तन्तु--धागों का; वितान--विस्तार; संस्थ:--स्थित; यः--जो; एष:--यह; संसार--भौतिक जगत रूपी; तरूु:--वृक्ष; पुराण:--सनातन से विद्यमान; कर्म--सकाम कर्मों की ओर; आत्मक: --सहज भाव सेउन्मुख; पुष्प--पहला परिणाम, फूल; फले--तथा फल; प्रसूते--उत्पन्न होने पर।
जिस प्रकार बुना हुआ वस्त्र ताने-बाने पर आधारित रहता है, उसी तरह सम्पूर्ण ब्रह्माण्डलम्बाई तथा चौड़ाई में भगवान् की शक्ति पर फैला हुआ है और उन्हीं के भीतर स्थित है।बद्धजीव पुरातन काल से भौतिक शरीर स्वीकार करता आया है और ये शरीर विशाल वृक्षों कीभाँति हैं, जो अपना पालन कर रहे हैं। जिस प्रकार एक वृक्ष पहले फूलता है और तब फलता है,उसी तरह भौतिक शरीर रूपी वृक्ष विविध फल देता है।
द्वे अस्य बीजे शतमूलस्त्रिनाल:पञ्ञस्कन्धः पञ्जरसप्रसूति: ।दशैकशाखो द्विसुपर्णनीडस्त्रिवल्कलो द्विफलोर्क प्रविष्ट: ॥
२२॥
अदन्ति चैक॑ फलमस्य गृश्नाग्रामेचरा एकमरण्यवासा: ।हंसा य एकं बहुरूपमिज्यै-मायामयं वेद स वेद वेदम् ॥
२३॥
द्वे--दो; अस्य--इस वृक्ष के; बीजे--बीज; शत--सैकड़ों; मूल:--जड़ों के; त्रि--तीन; नाल:--डंठल; पञ्ञ-- पाँच;स्कन्ध:--ऊपरी तना; पञ्ञ-- पाँच; रस--रस; प्रसूतिः--उत्पन्न करते हुए; दश--दस; एक--तथा एक; शाखः--शाखाएँ;द्वि--दो; सुपर्ण--पक्षियों के; नीड:--घोंसला; त्रि--तीन; वल्कल: --छाल; द्वि--दो; फल:--फल; अर्कम्--सूर्य; प्रविष्ट: --तक फैला हुआ; अदन्ति--खाते हैं; च-- भी; एकम्ू--एक; फलम्--फल; अस्य--इस वृक्ष का; गृक्षाः--भौतिक भोग केलिए कामुक; ग्रामे--गृहस्थ-जीवन में; चरा:--सजीव; एकम्--दूसरा; अरण्य--जंगल में; वासा:--वास करने वाले;हंसा:--हंस जैसे व्यक्ति, साधु-पुरुष; यः--जो; एकम्--एक, परमात्मा; बहु-रूपमू--अनेक रूपों में प्रकट होकर; इज्यैः--पूज्य गुरुओं की सहायता से; माया-मयम्-- भगवान् की शक्ति से उत्पन्न; वेद--जानता है; सः--ऐसा व्यक्ति; वेद--जानता है;बेदम्--वैदिक वाड्मय के असली अर्थ को।
इस संसार रूपी वृक्ष के दो बीज, सैकड़ों जड़ें, तीन निचले तने तथा पाँच ऊपरी तने हैं। यहपाँच प्रकार के रस उत्पन्न करता है। इसमें ग्यारह शाखाएँ हैं और दो पक्षियों ने एक घोंसला बनारखा है। यह वृक्ष तीन प्रकार की छालों से ढका है। यह दो फल उत्पन्न करता है और सूर्य तक फैला हुआ है। जो लोग कामुक हैं और गृहस्थ-जीवन में लगे हैं, वे वृक्ष के एक फल का भोगकरते हैं और दूसरे फल का भोग संन्यास आश्रम के हंस सहृश व्यक्ति करते हैं। जो व्यक्तिप्रामाणिक गुरु की सहायता से इस वृक्ष का एक परब्रह्म की शक्ति की अभिव्यक्ति के रूप मेंअनेक रूपों में प्रकट हुआ समझ लेता है, वही वैदिक वाड्मय के असली अर्थ को जानता है।
एवं गुरूपासनयैक भक््त्याविद्याकुठारेण शितेन धीरः ।विवृश्च्य जीवाशयमप्रमत्त:सम्पद्य चात्मानमथ त्यजास्त्रम्ू ॥
२४॥
एवम्--इस प्रकार ( मेरे द्वारा प्रदत्त ज्ञान से ) गुरु-गुरु की » उपासनया--उपासना या पूजा से एक- शुद्ध; भक्त्या-- भक्तिसे; विद्या--ज्ञान की; कुठारेण--कुल्हाड़ी से; शितेन--तेज; धीर:--ज्ञान के द्वारा स्थिर रहने वाला; विवृश्च्य--काट कर;जीव--जीव का; आशयम्--सूक्ष्म शरीर ( तीन गुणों से उत्पन्न उपाधियों से पूर्ण ); अप्रमत्त:--आध्यात्मिक जीवन में अत्यन्त सतर्क; सम्पद्य--प्राप्त करके; च--तथा; आत्मानम्--परमात्मा को; अथ--तब; त्यज--त्याग दो; अस्त्रमू--सिद्धि प्राप्त करनेके साधन को |
तुम्हें चाहिए कि तुम धीर बुद्धि से गुरु की सावधानी पूर्वक पूजा द्वारा शुद्ध भक्ति उत्पन्न करोतथा दिव्य ज्ञान रूपी तेज कुल्हाड़ी से आत्मा के सूक्ष्म भौतिक आवरण को काट दो। भगवान्का साक्षात्कार होने पर तुम उस तार्किक बुद्धि रूपी कुल्हाड़े को त्याग दो।
