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9. प्रत्येक सामग्री से अलगाव

श्रीत्राह्मण उबाचपरिग्रहो हि दुःखाय यद्यत्प्रियतमं नृणाम्‌ ।अनन्त सुखमाप्नोति तद्ठिद्वान्यस्वकिज्लन: ॥

१॥

श्री-ब्राह्मण: उबाच--साधु-ब्राह्मण ने कहा; परिग्रह:--लगाव; हि--निश्चय ही; दुःखाय--दुख देने वाली; यत्‌ यत्‌--जो जो;प्रिय-तमम्‌--सर्वाधिक प्रिय है; नृणाम्‌--मनुष्यों के; अनन्तम्‌--असीम; सुखम्‌--सुख; आप्नोति--प्राप्त करता है; तत्‌--वह;विद्वानू--जानते हुए; यः--जो कोई; तु--निस्सन्देह; अकिज्नः--ऐसे लगाव से मुक्त है,

जोसाधु-बराह्मण ने कहा : भौतिक जगत में हर व्यक्ति कुछ वस्तुओं को अत्यन्त प्रिय मानता हैऔर ऐसी वस्तुओं के प्रति लगाव के कारण अन्ततः वह दीन-हीन बन जाता है। जो व्यक्ति इसेसमझता है, वह भौतिक सम्पत्ति के स्वामित्व तथा लगाव को त्याग देता है और इस तरह असीमआनन्द प्राप्त करता है।

सामिषं कुररं जध्नुर्बलिनोन्ये निरामिषा: ।तदामिषं परित्यज्य स सुखं समविन्दत ॥

२॥

स-आमिषम्‌--मांस लिये हुए; कुररम्‌--बड़ा बाज; जघ्नु:-- आक्रमण किया; बलिन:--अत्यन्त बलवान; अन्ये-- अन्य;निरामिषा:--मांस से रहित; तदा--उस समय; आमिषम्‌--मांस; परित्यज्य--छोड़कर; सः--उसने; सुखम्‌--सुख;समविन्दत--प्राप्त किया।

एक बार बड़े बाजों की एक टोली ने कोई शिकार न पा सकने के कारण एक अन्य दुर्बलबाज पर आक्रमण कर दिया जो थोड़ा-सा मांस पकड़े हुए था। उस समय अपने जीवन कोसंकट में देखकर बाज ने मांस को छोड़ दिया। तब उसे वास्तविक सुख मिल सका।

न मे मानापमानौ स्तो न चिन्ता गेहपुत्रिणाम्‌ ।आत्मक्रीड आत्मरतिर्विचरामीह बालवतू ॥

३॥

न--नहीं; मे--मुझमें; मान-- आदर; अपमानौ--अनादर; स्तः-- है; न--नहीं है; चिन्ता--चिन्ता; गेह--घरवालों के;पुत्रिणामू--तथा बच्चों के; आत्म--अपने से; क्रीड:--खिलवाड़ करते हुए; आत्म--अपने में ही; रतिः--भोग करते हुए;विचरामि--विचरण करता हूँ; इह--इस जगत में; बाल-वत्‌--बच्चे की तरह।

पारिवारिक जीवन में माता-पिता सदैव अपने घर, अपने बच्चों तथा अपनी प्रतिष्ठा के विषयमें चिन्तित रहते हैं। किन्तु मुझे इन बातों से कुछ भी लेना-देना नहीं रहता। मैं न तो किसी परिवारके लिए चिन्ता करता हूँ, न ही मैं मान-अपमान की परवाह करता हूँ। मैं आत्म जीवन का हीआनन्द उठाता हूँ और मुझे आध्यात्मिक पद पर प्रेम मिलता है। इस तरह मैं पृथ्वी पर बालक कीभाँति विचरण करता रहता हूँ।

द्वावेब चिन्तया मुक्तौ परमानन्द आप्लुतौ ।यो विमुग्धो जडो बालो यो गुणेभ्य: परं गतः ॥

४॥

द्वौ--दो; एव--निश्चय ही; चिन्तया--चिन्ता से; मुक्तौ--मुक्त; परम-आनन्दे-- परम सुख में; आप्लुतौ--निमग्न; यः--जो;विमुग्ध:--अज्ञानी है; जड:ः--कार्यकलाप के अभाव में मन्द हुआ; बाल:--बालकों जैसा; य:--जो; गुणे भ्य: -- प्रकृति केगुणों के प्रति; परम्‌-- भगवान्‌, जो दिव्य है; गतः--प्राप्त किया हुआ।

इस जगत में दो प्रकार के लोग समस्त चिन्ताओं से मुक्त होते हैं और परम आनन्द में निमग्नरहते हैं--एक तो वे, जो मन्द बुद्धि हैं तथा बालकों के समान अज्ञानी हैं तथा दूसरे वे जो तीनोंगुणों से अतीत परमेश्वर के पास पहुँच चुके हैं।

क्वचित्कुमारी त्वात्मानं वृणानान्गृहमागतान्‌ ।स्वयं तानहयामास क्‍्वापि यातेषु बन्धुषु ॥

५॥

क्वचित्‌--एक बार; कुमारी--तरुणी; तु--निस्सन्देह; आत्मानमू--अपने आपको; वृणानान्‌--पत्नी के रूप में चाहती हुई;गृहम्‌-घर में; आगतान्‌--आये हुए; स्वयमू--अपने आप; तान्‌--उन पुरुषों को; अहयाम्‌ आस--सत्कार किया; क्व अपि--अन्य स्थान को; यातेषु--चले गये हुए; बन्धुषु--अपने सारे सम्बन्धियों के |

एक बार, विवाह योग्य एक तरुणी अपने घर में अकेली थी, क्योंकि उसके माता-पितातथा सम्बन्धी उस दिन किसी अन्य स्थान को चले गये थे। उस समय कुछ व्यक्ति उससे विवाहकरने की विशेष इच्छा से उसके घर आये। उसने उन सबों का सत्कार किया।

तेषामभ्यवहारार्थ शालीत्रहसि पार्थिव ।अवध्नन्त्या: प्रकोष्ठस्था श्रक्रु ई शज्जः स्वनं महत्‌ ॥

६॥

तेषाम्‌--अतिथियों का; अभ्यवहार-अर्थम्‌--उन्हें खिलाने के वास्ते; शालीन्‌-- धान; रहसि--अकेली होने से; पार्थिव--हेराजा; अवघ्नन्त्या:--कूट रही; प्रकोष्ठट--अपनी कलाइयों में; स्था:--स्थित; चक्कु:--बनाया; शझ्ज:--शंख से बनी चूड़ियाँ;स्वनम्‌--आवाज; महत्‌-- अत्यधिक

वह लड़की एकान्त स्थान में चली गई और अप्रत्याशित अतिथियों के लिए भोजन बनानेकी तैयारी करने लगी। जब वह धान कूट रही थी, तो उसकी कलाइयों की शंख की चूड़ियाँएक-दूसरे से टकराकर जोर से खड़खड़ा रही थीं।

सा तज्जुगुप्सितं मत्वा महती वृईडिता ततः ।बभज्जैकैकश:ः शद्जान्द्दौ द्वौ पाण्योरशेषयत्‌ ॥

७॥

सा--वह; तत्‌--उस आवाज को; जुगुप्सितम्‌ू--लज्जास्पद; मत्वा--सोचकर; महती--अत्यन्त बुद्धिमती; ब्रीडिता--शर्मी ली;ततः--उसकी बाँहों से; बभञ्ज--उसने तोड़ दिया; एक-एकश:--एक-एक करके; शद्भान्‌ू--शंख की चूड़ियाँ; द्वौ द्वौ--प्रत्येक में दो-दो; पाण्यो:--अपने दोनों हाथों में; अशेषयत्‌--छोड़ दिया।

उस लड़की को भय था कि ये लोग उसके परिवार को गरीब समझेंगे, क्योंकि उनकी पुत्रीधान कूटने के तुच्छ कार्य में लगी हुई है। अत्यन्त चतुर होने के कारण शर्मीली लड़की ने अपनीबाँहों में पहनी हुई शंख की चूड़ियों में से प्रत्येक कलाई में केवल दो दो चूड़ियाँ छोड़कर शेषसभी चूड़ियाँ तोड़ दीं।

उभयोरप्यभूद्धोषो हावघ्नन्त्या: स्वशड्डुयो: ।तत्राप्येके निरभिददेकस्मान्नाभवद्ध्वनि: ॥

८॥

उभयो:--( प्रत्येक हाथ में ) दो से; अपि--फिर भी; अभूत्‌--हो रहा था; घोष:--शब्द, आवाज; हि--निस्सन्देह;अवघ्नन्त्या:--धान कूट रही; स्व-शद्डुयो:--शंख की दो-दो चूड़ियों में से; तत्र--वहाँ; अपि--निस्सन्देह; एकम्‌--केवलएक; निरभिदत्‌-- उसने अलग कर दिया; एकस्मात्‌--उस एक आभूषण से; न--नहीं; अभवत्‌--हुआ; ध्वनि:--शब्द |

तत्पश्चात्‌, ज्योंही वह लड़की धान कूटने लगी प्रत्येक कलाई की दो-दो चूड़ियाँ टकराकरआवाज करने लगीं। अतएव उसने हर कलाई में से एक-एक चूड़ी उतार ली और जब हर कलाईमें एक-एक चूड़ी रह गई, तो फिर आवाज नहीं हुई।

अन्वशिक्षमिमं तस्या उपदेशमरिन्दम ।लोकाननुचरत्नेतान्लोकतत्त्वविवित्सया ॥

९॥

अन्वशिक्षम्‌--मैंने अपनी आँखों से देखा है; इमम्‌--इस; तस्या:--उस लड़की के ; उपदेशम्‌--शिक्षा; अरिम्‌ू-दम--हे शत्रु कादमन करने वाले; लोकानू्‌--संसारों में; अनुचरन्‌--घूमते हुए; एतान्‌ू--इन; लोक--संसार का; तत्त्व--सत्य; विवित्सया--जानने की इच्छा से |

हे शत्रुओं का दमन करने वाले, मैं इस जगत के स्वभाव के बारे में निरन्तर सीखते हुएपृथ्वी-भर में विच्ररण करता हूँ। इस तरह मैंने उस लड़की से स्वयं शिक्षा ग्रहण की।

वासे बहूनां कलहो भवेद्वार्ता द्ययोरपि ।एक एव व्सेत्तस्मात्कुमार्या इब कड्भजूण: ॥

१०॥

वासे--घर में; बहूनामू-- अनेक लोगों के; कलहः--झगड़ा; भवेत्‌--होगा; वार्ता--बातचीत; द्वयो: --दो लोगों के; अपि--भी; एक:--अकेला; एव--निश्चय ही; वसेत्‌--रहना चाहिए; तस्मातू--इसलिए; कुमार्या:--कुमारी ( लड़की ) के; इब--सहश; कड्जूण:--चूड़ी

जब एक स्थान पर अनेक लोग साथ साथ रहते हैं, तो निश्चित रूप से झगड़ा होगा। यहाँतक कि यदि केवल दो लोग ही एक साथ रहें, तो भी जोर-जोर से बातचीत होगी और आपस मेंमतभेद रहेगा। अतएवं झगड़े से बचने के लिए मनुष्य को अकेला रहना चाहिए, जैसा कि हमलड़की की चूड़ी के दृष्टान्त से शिक्षा पाते हैं।

मन एकत्र संयुज्ज्याज्जितश्लासो जितासन: ।वैराग्याभ्यासयोगेन प्चियमाणमतन्द्रितः ॥

११॥

मनः--मन; एकत्र--एक स्थान में; संयुज्ज्यात्‌--स्थिर करे; जित--जीता हुआ; श्रास:ः--साँस; जित--जीता हुआ; आसन:--योगासन; वैराग्य--वैराग्य द्वारा; अभ्यास-योगेन--योगाभ्यास से; प्रियमाणम्‌ू--स्थिर किया हुआ मन; अतन्द्रित:--अत्यन्तसावधानीपूर्वक

योगासनों में दक्षता प्राप्त कर लेने तथा श्वास-क्रिया पर नियंत्रण पा लेने पर मनुष्य कोचाहिए कि वैराग्य तथा नियमित योगाभ्यास द्वारा मन को स्थिर करे। इस तरह मनुष्य कोयोगाभ्यास के एक लक्ष्य पर ही सावधानी से अपने मन को स्थिर करना चाहिए।

यस्मिन्मनो लब्धपदं यदेत-च्छनै: शनेर्मुज्ञति कर्मरेणून्‌ ।सत्त्वेन वृद्धेन रजस्तमश्नविधूय निर्वाणमुपैत्यनिन्धनम्‌ ॥

१२॥

यस्मिनू--जिसमें ( भगवान्‌ में )मनः--मन; लब्ध--प्राप्त किया हुआ; पदम्‌--स्थायी पद; यत्‌ एतत्‌--वही मन; शनैःशनै:--धीरे-धीरे, एक-एक पग करके; मुझ्ञति--त्याग देता है; कर्म--सकाम कर्मों के; रेणूनू--कल्मष को; सत्त्वेन--सतोगुण द्वारा; वृद्धेन--प्रबल हुए; रज:--रजोगुण; तम:--तमोगुण; च-- भी; विधूय--त्यागकर; निर्वाणम्‌--दिव्य स्थिति,जिसमें मनुष्य अपने ध्यातव्य से संयुक्त हो जाता है; उपैति--प्राप्त करता है; अनिन्धनम्‌--बिना ईंधन के |

जब मन भगवान्‌ पर स्थिर हो जाता है, तो उसे वश में किया जा सकता है। स्थायी दशा कोप्राप्त करके मन भौतिक कार्यों को करने की दूषित इच्छाओं से मुक्त हो जाता है। इस तरहसतोगुण के प्रबल होने पर मनुष्य रजो तथा तमोगुण का पूरी तरह परित्याग कर सकता है औरधीरे धीरे सतोगुण से भी परे जा सकता है। जब मन प्रकृति के गुण-रूपी ईंधन से मुक्त हो जाताहै, तो संसार-रूपी अग्नि बुझ जाती है। तब उसका सीधा सम्बन्ध दिव्य स्तर पर अपने ध्यान केलक्ष्य, परमेश्वर, से जुड़ जाता है।

तदैवमात्मन्यवरुद्धचित्तोन वेद किद्ञिद्हिरन्तरं वा ।यथेषुकारो नृपतिं व्रजन्त-मिषौ गतात्मा न ददर्श पाश्वे ॥

१३॥

तदा--उस समय; एवम्‌--इस प्रकार; आत्मनि-- भगवान्‌ में; अवरुद्ध--स्थिर; चित्त:--मन; न--नहीं; वेद--जानता है;किश्ञित्‌ू--कुछ भी; बहिः--बाहरी; अन्तरम्‌--आन्तरिक; वा--अथवा; यथा--जिस तरह; इषु--बाणों का; कार: --बनानेवाला; नू-पतिम्‌--राजा को; ब्रजन्तम्‌--जाते हुए; इषौ--बाण में; गत-आत्मा--लीन होकर; न ददर्श--नहीं देखा; पार्श्े --अपनी बगल में।

इस प्रकार जब मनुष्य की चेतना परम सत्य भगवान्‌ पर पूरी तरह स्थिर हो जाती है, तो उसेद्वैत अथवा आन्तरिक और बाह्ा सच्चाई नहीं दिखती। यहाँ पर एक बाण बनाने वाले का दृष्टान्तदिया गया है, जो एक सीधा बाण बनाने में इतना लीन था कि उसने अपने बगल से गुजर रहेराजा तक को नहीं देखा।

एकचार्यनिकेत: स्यादप्रमत्तो गुहाशयः ।अलक्ष्यमाण आचारैर्मुनिरिकोडल्पभाषण: ॥

१४॥

एक--अकेला; चारी--विचरणशील; अनिकेत:--बिना स्थिर निवास के; स्थात्‌ू--होए; अप्रमत्त:--अत्यन्त सतर्क होने से;गुहा-आशयः --एकान्त रहते हुए; अलक्ष्यमाण: --बिना पहचाना जाकर; आचारैः--अपने कार्यों से; मुनिः--मुनि; एक: --संगी रहित; अल्प--बहुत कम; भाषण:--बोलते हुए

सनन्‍्त-पुरुष को अकेले रहना चाहिए और किसी स्थिर आवास के बिना, निरन्तर विचरणकरते रहना चाहिए। सतर्क होकर, उसे एकान्तवास करना चाहिए और इस तरह से कार्य करनाचाहिए कि वह अन्यों द्वारा पहचाना या देखा न जा सके। उसे संगियों के बिना इधर-उधर जानाचाहिए और जरूरत से ज्यादा बोलना नहीं चाहिए।

गृहारम्भो हि दुःखाय विफलश्चाश्रुवात्मनः ।सर्प: परकृतं वेश्म प्रविश्य सुखमेधते ॥

१५॥

गृह--घर का; आरम्भ:--निर्माण; हि--निश्चय ही; दुःखाय--दुखदायी; विफल: --व्यर्थ; च-- भी; अश्वुव--अस्थायी;आत्मन:--जीव का; सर्प:--साँप; परकृतम्‌--अन्‍्यों द्वारा बनाया गया; वेश्म--घर; प्रविश्य--घुस कर; सुखम्‌--सुखपूर्वक;एधते--दिन काटता है।

जब नश्वर शरीर में वास करने वाला मनुष्य सुखी घर बनाने का प्रयास करता है, तो उसकापरिणाम व्यर्थ तथा दुखमय होता है। किन्तु साँप अन्यों द्वारा बनाये गये घर में घुस जाता है औरसुखपूर्वक रहता है।

एको नारायणो देव: पूर्वसूष्टे स्वमायया ।संहत्य कालकलया कल्पान्त इदमी श्वर: ।एक एवाद्वितीयोभूदात्माधारोईखिलाभ्रय: ॥

१६॥

एकः--एकमात्र; नारायण:-- भगवान्‌; देव: --ई श्वर; पूर्व--पहले; सूष्टम्‌--उत्पन्न किया गया; स्व-मायया--अपनी ही शक्तिसे; संहत्य--अपने में समेट कर; काल--समय के; कलया--अंश से; कल्प-अन्ते--संहार के समय; इृदम्‌--यह ब्रह्माण्ड;ईश्वर: --परम नियन्ता; एक:--एकमात्र; एव--निस्सन्देह; अद्वितीय:--अनुपम; अभूत्‌--बन गया; आत्म-आधार: --हर वस्तुके आगार तथा आश्रय स्वरूप; अखिल--समस्त शक्तियों के; आश्रयः--आगार।

ब्रह्माण्ड के स्वामी नारायण सभी जीवों के आराध्य ईश्वर हैं। वे किसी बाह्य सहायता केबिना ही अपनी शक्ति से इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि करते हैं और संहार के समय वे ब्रह्माण्ड कोअपने कालरूपी स्वांश से नष्ट करते हैं और बद्धजीवों समेत समस्त ब्रह्माण्डों को अपने में समेटलेते हैं। इस तरह उनका असीम आत्मा ही समस्त शक्तियों का आगार तथा आश्रय है। सूक्ष्मप्रधान, जो समस्त विराट जगत का आधार है, भगवान्‌ के ही भीतर सिमट जाता है और इस तरहउनसे भिन्न नहीं होता। संहार के फलस्वरूप वे अकेले ही रह जाते हैं।

कालेनात्मानुभावेन साम्यं नीतासु शक्तिषु ।सत्त्वादिष्वादिपुरुष: प्रधानपुरुषे श्र: ॥

१७॥

परावराणां परम आस्ते कैवल्यसंज्ञितः ।केवलानुभवानन्दसन्दोहो निरुपाधिकः ॥

१८॥

कालेन--काल द्वारा; आत्म-अनुभावेन-- भगवान्‌ की निजी शक्ति द्वारा; साम्यम्‌--सन्तुलन को; नीतासु--लाया जाकर;शक्तिषु-- भौतिक शक्ति में; सत्त्त-आदिषु--सतो इत्यादि गुण; आदि-पुरुष:--शाश्वत भगवान्‌; प्रधान-पुरुष-ईश्वर:-- प्रधानतथा जीवों के परम नियन्ता; पर--मुक्तजीवों या देवताओं के; अवराणाम्‌ू--सामान्य बद्धजीवों के; परम:--परम आराध्य;आस्ते--विद्यमान है; कैवल्य--मुक्त जीवन; संज्ञित:--संज्ञा वाला, के नाम वाला; केवल--निर्मल; अनुभव--अन्तर्ज्ञत काअनुभव; आनन्द--आनन्‍्द; सन्दोह:--समग्रता; निरुपाधिक:--उपाधिधारी सम्बन्धों से रहित |

जब भगवान्‌ काल के रूप में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं और सतोगुण जैसी अपनीभौतिक शक्तियों को प्रधान ( निरपेक्ष साम्य अवस्था ) तक ले जाते हैं, तो वे उस निरपेक्ष अवस्था( प्रधान ) तथा जीवों के भी परम नियन्ता बने रहते हैं। वे समस्त जीवों के भी आराध्य हैं, जिनमेंमुक्त आत्मा, देवता तथा सामान्य बद्धजीव सम्मिलित हैं। भगवान्‌ शाश्वत रूप से किसी भीउपाधि से मुक्त रहते हैं और वे आध्यात्मिक आनन्द की समग्रता से युक्त हैं, जिसका अनुभवभगवान्‌ के आध्यात्मिक स्वरूप का दर्शन करने पर होता है। इस तरह भगवान्‌ 'मुक्ति' का पूरापूरा अर्थ प्रकट करते हैं।

केवलात्मानुभावेन स्वमायां त्रिगुणात्मिकाम्‌ ।सड्क्षो भयन्सृजत्यादौ तया सूत्रमरिन्दम ॥

१९॥

केवल--शुद्ध; आत्म--स्वयं की; अनुभावेन--शक्ति से; स्व-मायाम्‌--अपनी ही शक्ति को; त्रि--तीन; गुण--गुण;आत्मिकाम्‌--से निर्मित; सड्क्षोभयन्‌-- क्षुब्ध करते हुए; सृजति--प्रकट करता है; आदौ--सृष्टि के समय; तया--उस शक्ति से;सूत्रमू--महत-तत्त्व को, जो कर्म की शक्ति से पहचाना जाता है; अरिन्दम--हे शत्रुओं का दमन करने वाले |

हे शत्रुओं के दमनकर्ता, सृष्टि के समय भगवान्‌ अपनी दिव्य शक्ति का विस्तार काल रूप मेंकरते हैं और वे तीन गुणों से बनी हुई अपनी भौतिक शक्ति, अर्थात्‌ माया को क्षुब्ध करके महततत्त्व को उत्पन्न करते हैं।

तामाहुस्त्रिगुणव्यक्ति सृजन्तीं विश्वतोमुखम्‌ ।यस्मिन्प्रोतमिदं विश्व येन संसरते पुमान्‌ ॥

२०॥

ताम्‌-महत्‌-तत्त्व को; आहु:--कहते हैं; त्रि-गुण-- प्रकृति के तीन गुण; व्यक्तिमू--कारण रूप में प्रकट; सृजन्तीम्‌--उत्पन्नकरते हुए; विश्वतः-मुखम्‌--विराट जगत की अनेक कोटियाँ; यस्मिन्‌--जिस महत्‌ तत्त्व के भीतर; प्रोतम्‌--गुँथा हुआ;इदम्‌--यह; विश्वम्‌--ब्रह्माण्ड; येन--जिससे; संसरते-- भौतिक संसार में आना पड़ता है; पुमान्‌--जीवित प्राणी

महान्‌ मुनियों के अनुसार, जो प्रकृति के तीन गुणों का आधार है और जो विविध रंगीब्रह्माण्ड प्रकट करता है, वह सूत्र या महत्‌ तत्त्व कहलाता है। निस्सन्देह, यह ब्रह्माण्ड उसी महत्‌तत्त्व के भीतर टिका हुआ रहता है और इसकी शक्ति के कारण जीव को भौतिक जगत में आनापड़ता है।

यथोर्णनाभिईदयादूर्णा सन्तत्य वक्त्रतः ।तया विह॒त्य भूयस्तां ग्रसत्येवं महेश्वरः ॥

२१॥

यथा--जिस तरह; ऊर्न-नाभि:--मकड़ी; हृदयात्‌-- अपने भीतर से; ऊर्णाम्‌--धागे को; सन्तत्य--फैलाकर; वकक्‍्त्रतः--अपनेमुख से; तया--उस धागे से; विहत्य-- भोग करने के बाद; भूयः--फिर; ताम्‌ू--उस धागे को; ग्रसति--निगल जाती है;एवम्‌--उसी तरह; महा-ई श्वर: -- परमे श्वर |

जिस तरह मकड़ी अपने ही भीतर से ( मुख में से ) धागा निकाल कर फैलाती है, कुछ कालतक उससे खेलती है और अन्त में निगल जाती है, उसी तरह भगवान्‌ अपनी निजी शक्ति कोअपने भीतर से ही विस्तार देते हैं। इस तरह भगवान्‌ विराट जगत रूपी जाल को प्रदर्शित करतेहैं, अपने प्रयोजन के अनुसार उसे काम में लाते हैं और अन्त में उसे पूरी तरह से अपने भीतरसमेट लेते हैं।

यत्र यत्र मनो देही धारयेत्सकलं धिया ।स्नेहाददवेषाद्धयाद्वापि याति तत्तत्स्वरूपताम्‌ ॥

२२॥

यत्र यत्र--जहाँ जहाँ; मनः--मन को; देही--बद्धजीव; धारयेत्‌--स्थिर करता है; सकलम्‌--पूर्ण एकाग्रता के साथ; धिया--बुद्धि से; स्नेहातू--स्नेहवश; द्वेघातू-द्वेष के कारण; भयात्‌-- भयवश; वा अपि--अथवा; याति--जाता है; तत्‌-तत्‌--उसउस; स्वरूपताम्‌ू--विशेष अवस्था को |

यदि देहधारी जीव प्रेम, द्वेष या भयवश अपने मन को बुद्धि तथा पूर्ण एकाग्रता के साथकिसी विशेष शारीरिक स्वरूप में स्थिर कर दे, तो वह उस स्वरूप को अवश्य प्राप्त करेगा,जिसका वह ध्यान करता है।

कीट: पेशस्कृतं ध्यायन्कुड्यां तेन प्रवेशित: ।याति तत्सात्मतां राजन्पूर्वरूपमसन्त्यजन्‌ ॥

२३॥

कीट:--कीड़ा; पेशस्कृतम्‌--बर्र, भूंगी; ध्यायन्‌-- ध्यान करती; कुड्याम्‌--अपने छत्ते में; तेन--बर्र द्वारा; प्रवेशित:--घुसनेके लिए बाध्य की गई; याति--जाती है; तत्‌--बर का; स-आत्मताम्‌--वही स्थिति; राजन्‌ू--हे राजा; पूर्व-रूपम्‌--पूर्व शरीर;असन्त्यजन्‌ू-त्याग न करते हुए।

हे राजनू, एक बार एक बर ने एक कमजोर कीड़े को अपने छत्ते में जबरन घुसेड़ दिया औरउसे वहीं बन्दी बनाये रखा। उस कीड़े ने भय के कारण अपने बन्दी बनाने वाले का निरन्तरध्यान किया और उसने अपना शरीर त्यागे बिना ही धीरे धीरे बर जैसी स्थिति प्राप्त कर ली। इसतरह मनुष्य अपने निरन्तर ध्यान के अनुसार स्वरूप प्राप्त करता है।

एवं गुरु भ्य एतेभ्य एषा मे शिक्षिता मतिः ।स्वात्मोपशिक्षितां बुद्धि श्रुणु मे बदतः प्रभो ॥

२४॥

एवम्‌--इस प्रकार; गुरु भ्य: --गुरुओं से; एतेभ्य:--इन; एषघा--यह; मे--मेरे द्वारा; शिक्षिता--सीखा हुआ; मति:--ज्ञान; स्व-आत्म--अपने ही शरीर से; उपशिक्षिताम्‌ू--सीखा हुआ; बुद्धिम्‌--ज्ञान; श्रुणु--सुनो; मे--मुझसे; वदत:--कहा जाता;प्रभो--हे राजा।

हे राजन, मैंने इन आध्यात्मिक गुरुओं से महानू्‌ ज्ञान प्राप्त कर लिया है। अब मैंने अपनेशरीर से जो कुछ सीखा है, उसे बतलाता हूँ, उसे तुम ध्यान से सुनो।

देहो गुरुर्मम विरक्तिविवेकहेतु-बिशभ्रित्स्म सत्त्वनिधनं सततार्त्युदर्कम्‌ ।तत्त्वान्यनेन विमृशामि यथा तथापिपारक्यमित्यवसितो विचराम्यसड्रड ॥

२५॥

देह:--शरीर; गुरुः--गुरु; मम--मेरा; विरक्ति--वैराग्य का; विवेक--तथा विवेक का; हेतुः--कारण; बिभ्रत्‌ू--पालन करतेहुए; स्म--निश्चय ही; सत्त्व--अस्तित्व; निधनमू--विनाश; सतत--सदैव; आर्ति--कष्ट; उदर्कम्‌-- भावी परिणाम; तत्त्वानि--इस जगत की सच्चाइयाँ; अनेन--इस शरीर से; विमृशामि--मैं विचार करता हूँ; यथा--यद्यपि; तथा अपि--फिर भी;पारक्यम्‌--अन्यों से सम्बन्धित; इति--इस प्रकार; अवसित:--आश्वस्त होकर; विचरामि--विचरण करता हूँ; असड्भरः-विथोउत्‌अत्तछमेन्त्‌ः

भौतिक शरीर भी मेरा गुरु है, क्योंकि यह मुझे वैराग्य की शिक्षा देता है। सृष्टि तथा संहार सेप्रभावित होने के कारण, इसका कष्टमय अन्त होता रहता है। यद्यपि ज्ञान प्राप्त करने के लिएअपने शरीर का उपयोग करते हुए मैं सदैव स्मरण रखता हूँ कि यह अन्ततः अन्यों द्वारा विनष्टकर दिया जायेगा, अतः मैं विरक्त रहकर इस जगत में इधर-उधर विचरण करता हूँ।

जायात्मजार्थपशुभृत्यगृहाप्तवर्गान्‌पुष्नाति यत्प्रियचिकीर्षया वितन्वन्‌ ।स्वान्ते सकृच्छुमवरुद्धधन: स देहःसृध्ठास्य बीजमवसीदति वृज्षधर्म: ॥

२६॥

जाया--पतली; आत्म-ज--सन्तानें; अर्थ--धन; पशु--पालतू पशु; भृत्य--नौकर; गृह--घर; आप्त--सम्बन्धीजन तथा मित्र;वर्गानू--ये सारी कोटियाँ; पुष्णाति--पुष्ट करता है; यत्‌--शरीर; प्रिय-चिकीर्षया--प्रसन्न करने की इच्छा से; वितन्वनू--फैलाते हुए; स्व-अन्ते--मृत्यु के समय; स-कृच्छुम्‌--अत्यधिक संघर्ष से; अवरुद्ध--एकत्रित; धन:--धन; सः--वह; देह: --शरीर; सृष्ठा--सृजन करके; अस्य--जीव का; बीजमू--बीज; अवसीदति--नीचे गिरकर मरता है; वृक्ष--पेड़; धर्म:--केस्वभाव का अनुकरण करते हुए।

शरीर से आसक्ति रखने वाला व्यक्ति अपनी पत्नी, बच्चों, संपत्ति, पालतू पशुओं, नौकरों,घरों, संबंधियों, मित्रों इत्यादि की स्थिति को बढ़ाने और सुरक्षित रखने के लिए अत्यधिक संघर्षके साथ धन एकत्र करता है। वह अपने ही शरीर की तुष्टि के लिए यह सब करता है। जिसप्रकार एक वृक्ष नष्ट होने के पूर्व भावी वृक्ष का बीज उत्पन्न करता है, उसी तरह मरने वाला शरीरअपने संचित कर्म के रूप में अपने अगले शरीर का बीज प्रकट करता है। इस तरह भौतिकजगत के नैरन्तर्य से आश्वस्त होकर भौतिक शरीर समाप्त हो जाता है।

जिह्नैकतोमुमपकर्षति कर्ि तर्षाशिश्नो<न्यतस्त्वगुदरं श्रवण कुतश्चित्‌ ।घ्राणोउन्यतश्नपलहक्क्व च कर्मशक्ति-बह्व्य: सपत्य इव गेहपतिं लुनन्ति ॥

२७॥

जिह्ाा--जीभ; एकत: --एक ओर; अमुम्‌ू--शरीर या शरीर के साथ अपनी पहचान करने वाला बद्धजीव; अपकर्षति--दूरखींच ले जाता है; कहिं--कभी कभी; तर्षा--प्यास; शिश्न:--जननेन्द्रिय; अन्यतः--दूसरी ओर; त्वक्‌--स्पर्शेन्द्रिय; उदरम्‌--उदर; श्रवणम्‌--कान; कुतश्चित्‌ू--या अन्यत्र कहीं से; प्राण: --प्राणेन्द्रिय; अन्यत:ः--दूसरी ओर से; चपल-हक्‌--चंचलआँखें; क्‍्व च--अन्यत्र कहीं; कर्म-शक्ति:--शरीर के अन्य सक्रिय अंग; बह्व्यः--अनेक; स-पल्य:--सौतें; इव--सहश;गेह-पतिम्‌--घर के मुखिया को; लुनन्ति--अनेक दिशाओं में खींचती हैं ।

जिस व्यक्ति की कई पत्रलियाँ होती हैं, वह उनके द्वारा निरन्तर सताया जाता है। वह उनके'पालन-पोषण के लिए जिम्मेदार होता है। इस तरह सारी पत्नियाँ उसे निरन्तर भिन्न-भिन्न दिशाओंमें खींचती रहती हैं, और हर पत्नी अपने स्वार्थ के लिए संघर्ष करती है। इसी तरह भौतिकइन्द्रियाँ बद्धजीव को एकसाथ विभिन्न दिशाओं में खींचती रहती हैं और सताती रहती हैं। एकओर जीभ स्वादिष्ट भोजन की व्यवस्था करने के लिए खींचती है, तो प्यास उसे उपयुक्त पेयप्रदान करने के लिए घसीटती रहती है। उसी समय यौन-अंग उनकी तुष्टि के लिए शोर मचाते हैं और स्पर्शेन्द्रिय कोमल वासनामय पदार्थ की माँग रखती हैं। उदर उसे तब तक तंग करता रहताहै, जब तक वह भर नहीं जाता। कान मनोहर ध्वनि सुनना चाहते हैं, प्राणेन्द्रिय सुहावनीसुगँधियों के लिए लालायित रहती हैं और चंचल आँखें मनोहर दृश्य के लिए शोर मचाती हैं। इसतरह सारी इन्द्रियाँ तथा शरीर के अंग तुष्टि की इच्छा से जीव को अनेक दिशाओं में खींचते रहतेहैं।

सृष्ठा पुराणि विविधान्यजयात्मशक्त्यावृक्षान्सरीसृपपशून्खगदन्दशूकान्‌ ।तैस्तैरतुष्टहदय: पुरुष विधायब्रह्मावलोकधिषणं मुदमाप देव: ॥

२८ ॥

सृष्ठा--सृजन करके; पुराणि--बद्धजीवों को आवास देने वाले भौतिक शरीर; विविधानि--अनेक प्रकार के; अजया--मायाके माध्यम से; आत्म-शक्त्या--अपनी शक्ति से; वृक्षानू--वृक्षों को; सरीसृप--रेंगने वाले जीवों को; पशून्‌--पशुओं को;खग--पक्षियों को; दन्द-शूकान्‌--साँपों को; तैः तैः--शरीर की विभिन्न किस्मों ( योनियों ) द्वारा; अतुष्ट-- असन्तुष्ट; हृदयः --उसका हृदय; पुरुषम्‌--मनुष्य को; विधाय--उत्पन्न करके; ब्रह्य--परम सत्य; अवलोक--दर्शन; धिषणम्‌--के उपयुक्त बुद्धि;मुदम्‌--सुख को; आपा--प्राप्त किया; देव:-- भगवान्‌ |

भगवान्‌ ने अपनी ही शक्ति, माया शक्ति का विस्तार करके बद्धजीवों को बसाने के लिएअसंख्य जीव-योनियाँ उत्पन्न कीं। किन्तु वृक्षों, सरीसृपों, पशुओं, पक्षियों, सर्पों इत्यादि केस्वरूपों को उत्पन्न करके भगवान्‌ अपने हृदय में तुष्ट नहीं थे। तब उन्होंने मनुष्य को उत्पन्न किया,जो बद्ध आत्मा को पर्याप्त बुद्धि प्रदान करने वाला होता है, जिससे वह परम सत्य को देखसके। इस तरह भगवान्‌ सन्तुष्ट हो गये।

लब्ध्वा सुदुर्ल भमिदं बहुसम्भवान्तेमानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः ।तूर्ण यतेत न पतेदनुमृत्यु याव-रिःश्रेयसाय विषय: खलु सर्वतः स्थात्‌ ॥

२९॥

लब्ध्वा-प्राप्त करके; सु-दुर्लभम्‌--जिसको पाना अत्यन्त कठिन है; इदम्‌ू--यह; बहु--अनेक; सम्भव--जन्म; अन्ते--बादमें; मानुष्यम्‌-मनुष्य-जीवन; अर्थ-दम्‌--महान्‌ महत्त्व प्रदान करने वाला; अनित्यम्‌--क्षणभंगुर; अपि--यद्यपि; इहह--इसभौतिक जगत में; धीर: --गम्भीर बुद्धि वाला; तूर्णम्‌--तुरन्त; यतेत--प्रयत्त करे; न--नहीं; पतेत्‌--गिर चुका है; अनु-मृत्यु--सदैव मरणशील; यावत्‌--जब तक; निःश्रेयसाय--चरम मोक्ष ( मुक्ति ) के लिए; विषय:ः--इन्द्रियतृप्ति; खलु--सदैव;सर्वतः--सभी दशाओं में; स्थातू--सम्भव है।

अनेकानेक जन्मों और मृत्यु के पश्चात्‌ यह दुर्लभ मानव-जीवन मिलता है, जो अनित्य होनेपर भी मनुष्य को सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करने का अवसर प्रदान करता है। इसलिए धीर मनुष्य कोतब तक चरम जीवन सिद्ध्धि के लिए शीघ्र प्रयल कर देना चाहिए, जब तक उसका मरणशीलशरीर क्षय होकर मर नहीं जाता। इन्द्रियतृषप्ति तो सबसे गर्हित योनि में भी प्राप्य है, किन्तुकृष्णभावनामृत मनुष्य को ही प्राप्त हो सकता है।

एवं सञ्जातवैराग्यो विज्ञानालोक आत्मनि ।विचरामि महीमेतां मुक्तसड्री उनहड्डू तः ॥

३०॥

एवम्‌--इस प्रकार; सझ्ञात--पूर्णतया उत्पन्न; वैराग्य:--वैराग्य; विज्ञान-- अनुभूत ज्ञान; आलोक: --दृष्टि से युक्त; आत्मनि--भगवान्‌ में; विचरामि--विचरण करता हूँ; महीम्--पृथ्वी पर; एताम्‌--इस; मुक्त--स्वच्छन्द; सड़ः--आसक्ति से;अनहड्डू त:--मिथ्या अहंकार के बिना।

अपने गुरुओं से शिक्षा पाकर मैं भगवान्‌ की अनुभूति में स्थित रहता हूँ और पूर्ण वैराग्यतथा आध्यात्मिक ज्ञान से प्रकाशित, मैं आसक्ति या मिथ्या अहंकार से रहित होकर पृथ्वी परस्वच्छन्द विचरण करता हूँ।

न होकस्मादगुरोज्ञानं सुस्थिरं स्यात्सुपुष्कलम्‌ ।ब्रह्मेतदद्वितीयं वै गीयते बहुधर्षिभि: ॥

३१॥

न--नहीं; हि--निश्चय ही; एकस्मात्‌--एक; गुरो: --गुरु से; ज्ञानम्‌--ज्ञान; सु-स्थिरम्‌ू--अत्यधिक स्थिर; स्थात्‌ू--हो सकताहै; सु-पुष्कलम्‌--अत्यन्त पूर्ण; ब्रह्म--परम सत्य; एतत्‌--यह; अद्वितीयम्‌--अद्वितीय; बै--निश्चय ही; गीयते--यशोगानकिया गया; बहुधा--अनेक प्रकार से; ऋषिभि:--ऋषियों द्वारा |

यद्यपि परम सत्य अद्वितीय हैं, किन्तु ऋषियों ने अनेक प्रकार से उनका वर्णन किया है।इसलिए हो सकता है कि मनुष्य एक गुरु से अत्यन्त स्थिर या पूर्ण ज्ञान प्राप्त न कर पाये।

श्रीभगवानुवाचइत्युक्त्वा स यदुं विप्रस्तमामन्त्रय गभीरधी: ।वन्दितः स्वर्चितो राज्ञा ययौ प्रीतो यथागतम्‌ ॥

३२॥

श्री-भगवान्‌ उबाच-- भगवान्‌ ने कहा; इति--इस प्रकार; उक्त्वा--कहकर; सः--उसने; यदुम्‌--राजा यदु से; विप्र:--ब्राह्मण; तम्‌--राजा को; आमन्त्रय--विदा करके; गभीर--अत्यन्त गहरी; धी: --बुद्धि; वन्दित:--नमस्कार किया जाकर; सु-अर्चितः--ठीक से पूजित होकर; राज्ञा--राजा द्वारा; ययौ--चला गया; प्रीत:--प्रसन्न मन से; यथा--जिस तरह; आगतम्‌--आया था।

भगवान्‌ ने कहा : राजा यदु से इस प्रकार कहने के बाद विद्वान ब्राह्मण ने राजा के नमस्कारतथा पूजा को स्वीकार किया और भीतर से प्रसन्न हुआ। तब वह विदा लेकर उसी तरह चलागया, जैसे आया था।

अवधूतवच: श्र॒त्वा पूर्वेषां न: स पूर्वज: ।सर्वसड्भविनिर्मुक्त: समचित्तो बभूव ह ॥

३३॥

अवधूत--अवधूत ब्राह्मण के; वच:--शब्द; श्रुत्वा--सुनकर; पूर्वेषाम्‌-पूर्वजों के; न:--हमारे; सः--वह; पूर्वज:--स्वयंपूर्वज; सर्व--समस्त; सड्न्‍ग--आसक्ति से; विनिर्मुक्त:--मुक्त होने पर; सम-चित्त:--आध्यात्मिक पद पर चेतना होने से सर्वत्रसमान; बभूव--हो गया; ह--निश्चय ही |

हे उद्धव, उस अवधूत के शब्दों को सुनकर साधु राजा यदु, जो कि हमारे पूर्वजों का पुरखाहै, समस्त भौतिक आसक्ति से मुक्त हो गया और उसका मन आध्यात्मिक पद पर समान भाव सेस्थिर ( समदर्शी ) हो गया।

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