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21. कृष्ण द्वारा वैदिक पथ की व्याख्या

श्रीभगवानुवाचय एतान्मत्पथो हित्वा भक्तिज्ञानक्रियात्मकान्‌ ।क्षुद्रान्कामां श्वलै: प्राणैर्जुषन्त: संसरन्ति ते ॥

१॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; ये--जो; एतान्‌ू--इन; मत्‌-पथ: --मुझे प्राप्त करने का साधन; हित्वा--त्याग कर;भक्ति--भक्ति; ज्ञान--वैश्लेषिक दर्शन; क्रिया--नियमित कर्म; आत्मकानू--से युक्त; क्षुद्रानू--नगण्य; कामान्‌--इन्द्रियतृप्ति;चलै:--चंचल; प्राणैः--इन्द्रियों से; जुषन्त:--अनुशीलन करते हुए; संसरन्ति--संसार को भोगते हैं; ते--वे

भगवान्‌ ने कहा : जो मुझे प्राप्त करने वाली उन विधियों को, जो भक्ति, वैश्लेषिक दर्शन( ज्ञान ) तथा नियत कर्मों की नियमित सम्पन्नता ( कर्म-योग ) से युक्त हैं, त्याग देता है औरभौतिक इन्द्रियों से विचलित होकर श्षुद्र इन्द्रियतृष्ति में लग जाता है, वह निश्चय ही बारम्बारसंसार-चक्र में फँसता जाता है।

स्वे स्वेडईधिकारे या निष्ठा स गुण: परिकीर्तितः ।विपर्ययस्तु दोष: स्थादुभयोरेष निश्चय: ॥

२॥

स्वे स्वे--अपने अपने; अधिकारे--पद में; या--ऐसी; निष्ठा--स्थिरता; सः--वह; गुण: --पुण्य; परिकीर्तित:--घोषित;विपर्यय:ः --विपरीत; तु--निस्सन्देह; दोष:--पाप; स्थात्‌ू--है; उभयो:--दोनोंमें; एघ:--यह; निश्चय:--निश्चित मत

अपने पद पर स्थिरता वास्तविक शुद्धि कहलाती है और अपने पद से विचलन अशुद्धि है।इस तरह दोनों को निश्चित किया जाता है।

शुद्धयशुद्धी विधीयेते समानेष्वषि वस्तुषु ।द्रव्यस्य विचिकित्सार्थ गुणदोषौ शुभाशुभौ ।धर्मार्थ व्यवहारार्थ यात्रार्थमिति चानघ ॥

३॥

शुद्धि--शुद्धि; अशुद्धी --तथा अशुदर्द्धि; विधीयेते--स्थापित की जाती हैं; समानेषु--समान श्रेणी वालों में; अपि--निस्सन्देह;वस्तुषु--वस्तुओं में; द्रव्यस्य--विशेष वस्तु का; विचिकित्सा--मूल्यांकन; अर्थम्‌-के हेतु; गुण-दोषौ--अच्छे तथा बुरे गुण;शुभ-अशुभौ--शुभ तथा अशुभ; धर्म-अर्थम्‌--धार्मिक कार्यो के लिए; व्यवहार-अर्थम्‌--सामान्य व्यवहार के हेतु; यात्रा-अर्थम्‌--अपनी शारीरिक दीर्घजीविता ( अतिजीवन ) हेतु; इति--इस प्रकार; च-- भी; अनघ--हे निष्पाप

हे निष्पाप उद्धव, यह समझने के लिए कि जीवन में क्या उचित है, मनुष्य को किसी एकपदार्थ का मूल्यांकन उसकी विशेष कोटि के भीतर ही करना चाहिए। इस तरह धर्म काविश्लेषण करते समय मनुष्य को शुद्धि तथा अशुद्धि पर विचार करना चाहिए। इसी प्रकारअपने सामान्य व्यवहार में मनुष्य को अच्छे तथा बुरे में अन्तर करना चाहिए और अपनी शारीरिकदीर्घजीविता ( अतिजीवन ) के लिए उसे पहचानना चाहिए कि क्या शुभ है और क्या अशुभ है।

दर्शितोयं मयाचारो धर्ममुद्ठहतां धुरम्‌ ॥

४॥

दर्शितः--दिखलाया गया; अयम्‌--यह; मया--मेरे द्वारा; आचार:--जीवन-शैली; धर्मम्‌-धार्मिक सिद्धान्त; उद्दहतामू--वहनकरने वालों के लिए; धुरम्‌-- भार।

मैंने जीवन की यह शैली उन लोगों के लिए प्रकट की है, जो संसारी धार्मिक सिद्धान्तों काभार वहन कर रहे हैं।

भूम्यम्ब्वग्न्यनिलाकाशा भूतानां पञ्ञधातव: ।आब्रह्मस्थावरादीनां शारीरा आत्मसंयुता: ॥

५॥

भूमि--पृथ्वी; अम्बु--जल; अग्नि-- अग्नि; अनिल--वायु; आकाशा: -- आकाश; भूतानाम्‌--सारे बद्धजीवों का; पञ्ञ--पाँच; धातव:ः--मूलभूत तत्त्व; आ-ब्रह्म--ब्रह्मा से लेकर; स्थावर-आदीनाम्‌--जड़ प्राणियों तक; शारीरा:--शरीरों के निर्माणहेतु प्रयुक्त; आत्म--परमात्मा; संयुता:--समान रूप से सम्बन्धित |

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश--ये पाँच मूलभूत तत्त्व हैं जिनसे ब्रह्म से लेकरजड़ प्राणियों तक समस्त बद्धजीवों के शरीर बने हैं। ये सारे तत्त्व एक भगवान्‌ से उद्भूत होतेहैं।

वेदेन नामरूपाणि विषमाणि समेष्वपि ।धातुषूद्धव कल्प्यन्त एतेषां स्वार्थसिद्धये ॥

६॥

बेदेन--वैदिक वाड्मय द्वारा; नाम--नाम; रूपाणि--तथा रूप; विषमाणि--भिन्न; समेषु--जो समान हैं; अपि--निस्सन्देह;धातुषु--पाँच तत्त्वों ( से बने शरीरों ) में; उद्धव--हे उद्धव; कल्प्यन्ते--बने हुए हैं; एतेषाम्‌--इनमें से, जीव; स्व-अर्थ--निजीलाभ की; सिद्धये--प्राप्ति के लिए

हे उद्धव, यद्यपि सारे शरीर इन्हीं पाँच तत्त्वों से बने हैं और इसीलिए समान हैं, किन्तु वैदिकग्रंथ ऐसे शरीरों की कल्पना भिन्न भिन्न नामों तथा रूपों में करते हैं जिससे जीव अपने जीवन-लक्ष्य प्राप्त कर सकें ।

text:देशकालादिभावानां वस्तूनां मम सत्तम । गुणदोषौ विधीयेते नियमार्थ हि कर्मणाम्‌ ॥

७॥

देश--स्थान; काल--समय; आदि--इत्यादि; भावानाम्‌- भावों का; वस्तूनाम्‌--वस्तुओं का; मम--मेरा; सत्‌-तम--हे परम सन्त उद्धव; गुण-दोषौ--पुण्य तथा पाप; विधीयेते--स्थापित किये जाते हैं; नियम-अर्थम्‌--प्रतबिन्ध के लिए; हि--निश्चय ही; कर्मणाम्‌-सकाम कर्मों के |

हे सन्त उद्धव, मैंने भौतिकतावादी कर्मों पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए यह सुनिश्चित कर दिया है कि देश, काल तथा सारी भौतिक वस्तुओं में से कौन उचित है और कौन अनुचित है। अकृष्णसारो देशानामब्रह्मण्योसुचिर्भवेत्‌ ।कृष्णसारोप्यसौवीरकीकटासंस्कृतेरिणम्‌ ॥

८ ॥

अकृष्ण-सार:--धब्बारहित बारहसिंगा; देशानाम्‌--स्थानों में; अब्रह्मण्य:--जहाँ ब्राह्मणों के प्रति भक्ति-भाव नहीं है;अशुचि:--दूषित; भवेत्‌-- है; कृष्ण-सार:ः --काले धब्बों वाले बारहसिंगे; अपि-- भी; असौवीर--साधु स्वभाव वाले व्यक्तियोंसे रहित; कीकट--गया प्रदेश ( जहाँ निम्न जाति के लोग रहते हैं ); असंस्कृत--जहाँ के लोग संस्कार या स्वच्छता नहीं बरतते;ईरणम्‌--जहाँ की भूमि बंजर है।

स्थानों में से वे स्थान दूषित माने जाते हैं, जो धब्बेदार बारहसिंगों से रहित हैं, जो ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति से रहित है, जहाँ धब्बेदार बारहसिंगे होते हैं, किन्तु जो सम्माननीय व्यक्तियों सेरहित होते हैं तथा कीकट जैसे प्रदेश एवं वे स्थान जहाँ स्वच्छता तथा संस्कारों की अवहेलनाकी जाती है, जहाँ मांस-भक्षकों का प्राधान्य होता है या जहाँ पृथ्वी बंजर होती है।

कर्मण्यो गुणवान्कालो द्रव्यत: स्वत एव वा ।यतो निवर्तते कर्म स दोषोकर्मक: स्मृतः ॥

९॥

कर्मण्य:--नियत कार्य करने के लिए अनुकूल; गुणवान्‌--शुद्ध; काल:--समय; द्रव्यतः--शुभ वस्तुओं की प्राप्ति से;स्वतः--अपने आप; एव--निस्सन्देह; वा--अथवा; यत:--जिस ( काल ) के कारण; निवर्तते--अवरुद्ध होता है; कर्म--कर्तव्य; सः--वह ( काल ); दोष: --अशुद्ध; अकर्मक:--उचित ढंग से कर्म करने के लिए अनुपयुक्त; स्मृत:--माना जाता है।

कोई विशेष काल तब शुद्ध माना जाता है जब वह अपने स्वभाव से अथवा उपयुक्त साज-सामग्री प्राप्त होने से मनुष्य के नियत कर्तव्य को करने के लिए उपयुक्त हो। वह काल जो किसीके कर्तव्य में बाधक हो अशुद्ध माना जाता है।

द्रव्यस्य शुद्धवशुद्धी च द्र॒व्येण वचनेन च ।संस्कारेणाथ कालेन महत्वाल्पतयाथ वा ॥

१०॥

द्रव्यस्थ--एक वस्तु की; शुद्धि--शुद्धि, शुद्धता; अशुद्धी --या अशुद्धि; च--तथा; द्रव्येण -- अन्य वस्तु से; वचनेन--वाणीसे; च--तथा; संस्कारेण--संस्कार द्वारा; अथ--या; कालेन--काल द्वारा; महत्व-अल्पतया--महानता या लघुता द्वारा; अथबा--अथवा, या कि |

किसी वस्तु की शुद्धि या अशुद्धि की स्थापना दूसरी वस्तु के सम्प्रयोग से, शब्दों से,अनुष्ठानों ( संस्कारों ) से, काल के प्रभाव से अथवा आपेक्षिक महत्त्व से की जाती है।

शक्त्याशकत्याथ वा बुद्धया समृन्द्या च यदात्मने ॥

अं कुर्वन्ति हि यथा देशावस्थानुसारत: ॥

११॥

शक्त्या--सापेक्ष शक्ति से; अशक्त्या--क्लीवता, नपुंसकता; अथ वा--या; बुद्धया--बुद्धि से; समृद्धया--ऐ शश्वर्य से; च--तथा; यत्‌--जो; आत्मने-- अपने से; अघम्‌--पापकर्म; कुर्वन्ति--करते हैं; हि--निस्सन्देह; यथा--वास्तव में; देश--स्थान;अवस्था--अथवा अपनी दशा के; अनुसारतः --अनुसार |

किसी व्यक्ति की शक्ति अथवा दुर्बलता, बुद्धि, सम्पत्ति, स्थान तथा भौतिक स्थिति केअनुसार उस व्यक्ति पर अशुद्ध वस्तुएँ पाप लगा सकती हैं अथवा नहीं भी लगा सकतीं।

धान्यदार्वस्थितन्तूनां रसतैजसचर्मणाम्‌ ।कालवाय्वग्निमृत्तोयै: पार्थिवानां युतायुतैः ॥

१२॥

धान्य--अन्न; दारु--लकड़ी ( सामान्य तथा पवित्र पात्रों के रूप में ); अस्थि--हड्डी ( यथा हाथी-दाँत ); तन्तूनामू--तथा धागेकी; रस--द्रव ( तेल, घी इत्यादि ); तैजस--तेजवान वस्तुएँ ( यथा स्वर्ण ); चर्मणाम्‌--तथा चमड़े की; काल--समय; वायु --हवा; अग्नि--आग; मृत्‌-मिट्टी; तोयैः--तथा जल से; पार्थिवानाम्‌--( तथा ) मिट्टी की बनी वस्तुओं ( यथा चक्र, पात्र, ईंटे );युत--से युक्त; अयुतैः--या पृथक्‌-पृथक्‌ |

अन्न, लकड़ी के पात्र, अस्थि से बने पदार्थ, धागे, द्रव, अग्नि से प्राप्त वस्तुएँ, चमड़े तथामिट्टी से बनी वस्तुएँ--ये सब काल, वायु, अग्नि, पृथ्वी तथा जल के द्वारा अलग अलग सेअथवा उनके मिल जाने से शुद्ध हो जाती हैं।

अमेध्यलिप्तं यद्येन गन्धलेपं व्यपोहति ।भजते प्रकृतिं तस्य तच्छौचं तावदिष्यते ॥

१३॥

अमेध्य--अशुद्ध वस्तु से; लिप्तम्‌-छू कर; यत्‌--जो वस्तु; येन--जिससे; गन्ध--दुर्गन्‍्ध; लेपमू--तथा अशुद्ध लेप;व्यपोहति--त्याग देती है; भजते--दूषित वस्तु पुनः धारण कर लेती है; प्रकृतिमू--अपना पूर्व स्वभाव; तस्य--उस वस्तु का;तत्‌--वह प्रयोग; शौचम्‌--शुद्धी करण; तावत्‌--उस हद तक; इष्यते--माना जाता है

कोई शुद्ध करने वाला पदार्थ तब उपयुक्त माना जाता है जब उसके लगाने से किसी दूषितवस्तु की दुर्गध या गन्दी परत हट जाय और वह अपने पूर्व स्वभाव को प्राप्त कर ले।

स्नानदानतपोवस्थावीर्यसंस्कारकर्मभि: ।मत्स्मृत्या चात्मन: शौचं शुद्ध: कर्माचरेद्दूवज: ॥

१४॥

स्नान--नहाना; दान--दान देना; तपः--तपस्या; अवस्था--तथा अपनी उम्र के कारण; वीर्य--सामर्थ्य; संस्कार-- संस्कारद्वारा; कर्मभि: --तथा नियत कार्यो से; मतू-स्मृत्या--मेरा स्मरण करके; च-- भी; आत्मन:--आत्मा की; शौचम्‌--शुद्धि;शुद्धः--शुद्ध; कर्म--कर्म; आचरेत्‌--करे; द्विज:--द्विजन्मा मनुष्य |

स्नान, दान, तप, आयु, निजी बल ( सामर्थ्य ), संस्कार, नियत कर्म तथा इन सबसे ऊपरमेरे स्मरण द्वारा आत्म-शुद्धि की जा सकती है। ब्राह्मण तथा अन्य द्विजातियों को अपना अपनाविहित कर्म करने के पूर्व ठीक से शुद्ध हो लेना चाहिए।

मन्त्रस्थ च परिज्ञानं कर्मशुद्धिर्मदर्पणम्‌ ।धर्म: सम्पद्यते षड्िभरधर्मस्तु विपर्यय: ॥

१५॥

मन्त्रस्थ--मंत्र ( की शुद्धि ) का; च--तथा; परिज्ञानम्‌-सही ज्ञान; कर्म--कर्म की; शुद्धिः:--शुर्द्धि; मत्‌-अर्पणम्‌--मुझेअर्पित करना; धर्म:--धार्मिकता; सम्पद्यते--प्राप्त की जाती है; पड़िभः--छः के ( स्थान, काल, वस्तु, कर्ता, मंत्र तथा कर्म कीशुद्धि ) द्वारा; अधर्म: --अधर्म; तु--लेकिन; विपर्यय:--अन्यथा |

मंत्र तब शुद्ध होता है जब उसका सही सही उच्चारण किया जाय तथा कोई कर्म तब शुद्धबनता है, जब वह मुझे अर्पित किया जाय। इस तरह स्थान, काल, वस्तु, कर्ता, मंत्र तथा कर्मकी शुद्धि से मनुष्य धार्मिक बनता है और इन छहों की उपेक्षा करने से, वह अधार्मिक मानाजाता है।

क्वचिद्‌गुणोपि दोष: स्यादहोषोपि विधिना गुण: ।गुणदोषार्थनियमस्तद्धिदामेव बाधते ॥

१६॥

क्वचित्‌--कभी; गुण:--पुण्य; अपि-- भी; दोष:--पाप; स्थात्‌ू--बन जाता है; दोष:--पाप; अपि--भी; विधिना--वैदिकआदेश के बल पर; गुण:--पुण्य; गुण-दोष--पुण्य तथा पाप में; अर्थ--के मामले में; नियम:--विधान; तत्‌--उनके;भिदाम्‌--अन्तर; एव--वास्तव में; बाधते--नष्ट करता है।

कभी पुण्य पाप बनता है और कभी वैदिक आदेशों के बल पर पाप पुण्य बन जाता है। ऐसेविशिष्ट नियमों से पुण्य और पाप का स्पष्ट अन्तर मिट जाता है।

समानकर्माचरणं पतितानां न पातकम्‌ ।औत्पत्तिको गुण: सड़ो न शयानः पतत्यध: ॥

१७॥

समान--बराबर; कर्म--कर्म का; आचरणम्‌--सम्पन्न किया जाना; पतितानाम्‌--पतितों का; न--नहीं; पातकम्‌ू--पतन काकारण; औत्पत्तिक:--स्वभाव द्वारा निर्देशित; गुण:--सद्गुण बन जाता है; सड्र:--भौतिक सात्निध्य; न--नहीं; शयान:--लेटा हुआ; पतति--गिरता है; अध:--और नीचे

जिन कर्मों से एक उच्चासीन व्यक्ति नीचे गिरता है, उन्हीं के द्वारा वे व्यक्ति नीचे नहीं गिरतेजो पहले से गिरे हुए ( पतित ) हैं। निस्सन्देह, जमीन पर लेटा रहने वाला व्यक्ति और नीचे कैसेगिर सकता है? वह भौतिक संगति, जो मनुष्य के अपने स्वभाव द्वारा आदिष्ट होती है, सदगुणमानी जाती है।

यतो यतो निवर्तेत विमुच्येत ततस्ततः ।एघ धर्मो नृणां क्षेमः शोकमोहभयापह: ॥

१८॥

यतः यतः--जिस जिस से; निवर्तेत--दूर रहता है; विमुच्येत--छूट जाता है; ततः ततः--उस उस से; एब:--यह; धर्म:--धर्म-प्रणाली; नृणाम्‌--मनुष्यों का; क्षेम: --कल्याण का मार्ग; शोक--दुख; मोह--मोह; भय--तथा भय; अपहः--मिटा देता है

किसी पापपूर्ण या भौतिकतावादी कर्म से अपने को दूर रख कर, मनुष्य उसके बन्धन सेमुक्त हो जाता है। ऐसा त्याग मनुष्यों के धार्मिक तथा कल्याणप्रद जीवन की आधारभूमि है और यह सारे शोक, मोह तथा भय को भगा देता है।

विषयेषु गुणाध्यासात्पुंस: सड्गस्ततो भवेत्‌ ।सद्जात्तत्र भवेत्काम: कामादेव कलिनृणाम्‌ ॥

१९॥

विषयेषु--इन्द्रियतृप्ति की वस्तुओं में; गुण-अध्यासात्‌--उन्हें अच्छा मानने के कारण; पुंसः--मनुष्य की; सड्र:--आसक्ति;ततः--इस कल्पना से; भवेत्‌--हो जाता है; सड्भरातू--भौतिक संगति से; तत्र--इस प्रकार; भवेत्‌--उत्पन्न होता है; काम:--काम; कामात्‌--काम से; एव-- भी; कलि:ः--कलह; नृणाम्‌--मनुष्यों में |

जो व्यक्ति भौतिक इन्द्रिय-विषयों को अभीष्ट मान लेता है, वह निश्चित रूप से उनमें आसक्तहो जाता है। ऐसी आसक्ति से काम उत्पन्न होता है और यही काम लोगों में कलह उत्पन्न कराताहै।

कलेदर्विषह: क्रोधस्तमस्तमनुवर्तते ।तमसा ग्रस्यते पुंसश्चेतना व्यापिनी द्रुतम्‌ ॥

२०॥

कलेः--कल ह से; दुर्विषह:--असहा; क्रोध: --क्रो ध; तम:--अज्ञान; तम्‌ू--उस क्रोध को; अनुवर्तते--पीछा करता है;तमसा--अज्ञान से; ग्रस्यते--पकड़ा जाता है; पुंस:--मनुष्य की; चेतना--चेतना; व्यापिनी--विस्तृत; द्रुतम्‌--तेजी से |

कलह से असह्ाय क्रोध उत्पन्न होता है और उससे अज्ञान का अंधकार उत्पन्न होता है। यहअज्ञान तुरन्त ही मनुष्य की विस्तृत चेतना पर हावी हो जाता है।

तया विरहितः साधो जन्तु: शून्याय कल्पते ।ततोडस्य स्वार्थविश्रृशो मूर्च्छितस्थ मृतस्थय च ॥

२१॥

तया--उस बुद्धि से; विरहित:ः--रहित, विहीन; साधो--हे साधु उद्धव; जन्तु:--प्राणी; शून्याय--शून्य; कल्पते--बन जाता है;ततः--फलस्वरूप; अस्य--उसका; स्व-अर्थ--जीवन-लक्ष्य से; विभ्रंश:--पतन; मूर्च्छितस्थ--जड़वत्‌ उस व्यक्ति का;मृतस्य--मृत; च--तथा।

हे साधु उद्धव, असली बुद्धि से विहीन व्यक्ति को हर वस्तु से रहित माना जाता है। वहजीवन के वास्तविक लक्ष्य से हट कर उसी तरह मन्द ( जड़ ) पड़ जाता है, जिस तरह कि मृतमनुष्य।

विषयाभिनिवेशेन नात्मानं वेद नापरम्‌ ।वृक्ष जीविकया जीवन्व्यर्थ भस्त्रेव यः श्वसन्‌ ॥

२२॥

विषय--इन्द्रियतृप्ति में; अभिनिवेशेन--अति लिप्त होने से; न--नहीं; आत्मानम्‌--अपने को; वेद--जानता है; न--न तो;अपरम्‌--दूसरे को; वृक्ष--पेड़ की; जीवकया--जीवन-शैली द्वारा; जीवन्‌ू--जीते हुए; व्यर्थम्‌--व्यर्थ; भस्त्रा इब--धौंकनी केसमान; यः--जो; श्वसन्‌--साँस लेता है |

इन्द्रियतृप्ति में लीन रहने के कारण मनुष्य अपने आपको या दूसरों को पहचान नहीं पाता।वह वृक्ष की भाँति अज्ञान में व्यर्थ ही जीवित रह कर, धौंकनी की तरह श्वास मात्र लेता रहता है।

फलश्रुतिरियं नृणां न श्रेयो रोचनं परम्‌ ।श्रेयोविवश्षया प्रोक्ते यथा भेषज्यरोचनम्‌ ॥

२३॥

फल- श्रुतिः--पुरस्कार का वचन देने वाले शास्त्र-कथन; इयम्‌--ये; नृणाम्‌--मनुष्यों के लिए; न--नहीं हैं; श्रेय: --सर्वोच्चकल्याण; रोचनम्‌--प्रलोभन; परम्‌--मात्र; श्रेय: --चरम कल्याण; विवक्षया--कहने के विचारसे; प्रोक्तम्‌ू--कहा हुआ;यथा--जिस तरह; भेषज्य--औषधि लेने के लिए; रोचनम्‌--प्रलोभन, फुसलावा।

फल प्रदान करने का वादा करने वाले श्रुति के वचन मनुष्यों को परम कल्याण दिये जानेकी संस्तुति नहीं करते अपितु वे लाभप्रद धार्मिक कर्म करने के लिए प्रलोभन मात्र हैं, जिस तरहकि बच्चे को लाभप्रद औषधि पीने के लिए फुसलाने हेतु मिश्री देने का वादा किया जाता है।

उत्पत्त्यैव हि कामेषु प्राणेषु स्वजनेषु च ।आसक्तमनसो मर्त्या आत्मनोनर्थहेतुषु ॥

२४॥

उत्पत्त्या एब--मात्र जन्म से; हि--निस्सन्देह; कामेषु--स्वार्थपूर्ण इच्छाओं की वस्तुओं में; प्राणेषु--( आयु, इन्द्रिय-कर्म, शक्तितथा संभोग-शक्ति ) जैसे महत्त्वपूर्ण कार्यों में; स्व-जनेषु-- अपने परिवार के सदस्यों में; च--तथा; आसक्त-मनसः--मन केभीतर आसक्त होकर; मर्त्या:--मर्त्य मनुष्य लोग; आत्मन:--अपनी ही आत्मा के; अनर्थ--उद्देश्य को नष्ट करने वाले; हेतुषु--कारणों में

संसार में जन्म लेने से ही सारे मनुष्य अपने मन में इन्द्रियतृप्ति, दीर्घायु, इन्द्रिय-कर्म, बल,संभोग-शक्ति तथा मित्रों एवं परिवार के प्रति आसक्त हो जाते हैं। इस तरह उनके मन ऐसी बातमें लीन रहते हैं जिनसे उनके वास्तविक स्वार्थ को धक्का लगता है।

नतानविदुष: स्वार्थ भ्राम्यतो वृजिनाध्वनि ।कथं युज्ज्यात्पुनस्तेषु तांस्तमो विशतो बुध: ॥

२५॥

नतान्‌--विनीत; अविदुष:--अज्ञानी; स्व-अर्थम्‌--अपने हित के; भ्राम्यत:--घूमते हुए; वृजिन--संकट के; अध्वनि--मार्गपर; कथम्‌-किस कार्य के लिए; युज्ज्यात्‌--लगा सकेंगे; पुन:ः--आगे भी; तेषु--उनमें ( इन्द्रियतृप्ति के गुण में ); तानू--उनको; तम:ः--अंधकार; विशत:ः--घुसते हुए; बुध:--बुद्धिमान ( बौद्धिक सत्ता )।

अपने स्वार्थ से अनजान लोग भौतिक संसार के मार्ग में विचरण कर रहे हैं और धीरे धीरेअंधकार की ओर अग्रसर हो रहे हैं। भला वेद उन्हें और अधिक इन्द्रियतृप्ति के प्रति क्‍योंप्रोत्साहित करने लगे यदि वे मूर्खलन विनीत भाव से वैदिक आदेशों पर ध्यान दें।

एवं व्यवसितं केचिदविज्ञाय कुबुद्धयः ।फलश्रुतिं कुसुमितां न वेदज्ञा वदन्ति हि ॥

२६॥

एवम्‌--इस तरह से; व्यवसितम्‌--वास्तविक निष्कर्ष; केचित्‌--कुछ लोग; अविज्ञाय--न जानते हुए; कु-बुद्धबः--विकृतबुद्धि वाले; फल-श्रुतिमू-- भौतिक फल का वादा करने वाले शास्त्रों के कथन; कुसुमिताम्‌--फूलों जैसे, अलंकारिक; न--नहीं; वेद-ज्ञा:--वेदों के ज्ञाता; वदन्ति--कहते हैं; हि--निस्सन्देह

विकृत बुद्धि वाले लोग वैदिक ज्ञान के इस वास्तविक उद्देश्य को नहीं समझ पाते, प्रत्युत वेफलों का वादा करने वाले वेदों के अलंकारमय कथनों को परम वैदिक सत्य कह कर प्रचारकरते हैं। किन्तु जो वेदों के वास्तविक ज्ञाता हैं, वे कभी भी इस तरह नहीं बोलते।

'कामिनः कृपणा लुब्धा: पुष्पेषु फलबुद्धय: ।अग्निमुग्धा धूमतान्ता: स्व लोक॑ न विदन्ति ते ॥

२७॥

कामिन:--कामी पुरुष; कृपणा:--कंजूस; लुब्धा:--लालची; पुष्पेषु--फूल; फल-बुद्धवः--परम फल सोच कर; अग्नि--आग; मुग्धा:--मोहित; धूम-तान्ता:--धुएँ से दम घुटना; स्वम्‌--अपनी; लोकम्‌--पहचान; न विदन्ति--पहचानते हैं; ते--वे |

काम, क्रोध तथा लोभ से पूरित मनुष्यगण मात्र फूलों को ही जीवन का वास्तविक फलमान बैठते हैं। अग्नि की चमक से मोहग्रस्त होकर तथा इसके धुएँ से घुट कर, वे अपनी असलीपहचान नहीं जान पाते।

न ते मामड़ जानन्ति हृदिस्थं य इदं यतः ।उक्थशस्त्रा ह्सुतृपो यथा नीहारचक्षुष: ॥

२८ ॥

न--नहीं; ते--वे; माम्‌--मुझको; अड्ग--हे उद्धव; जानन्ति--जानते हैं; हृदि-स्थम्‌--हदय के भीतर स्थित; यः--जो; इृदम्‌--यह ब्रह्माण्ड; यत:ः--जहाँ से आता है; उक्थ-शस्त्रा:--जो वैदिक अनुष्ठानों को प्रशंसनीय मानते हैं, या जिनके लिए उनकेअनुष्ठान कृत्य उन हथियारों के तुल्य हैं, जो यज्ञ-पशुओं को मारता है; हि--निस्सन्देह; असु-तृपः--मात्र इन्द्रियतृप्ति में रूचिरखने वाले; यथा--जिस तरह; नीहार-- कुहरा में; चक्षुष:--आँखों वाले |

हे उद्धव, वैदिक अनुष्ठानों का आदर करने से प्राप्त इन्द्रियतृप्ति के प्रति समर्पित लोग, यह नहीं समझ सकते कि मैं हर एक के हृदय में स्थित हूँ और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मुझसे अभिन्न नहीं हैऔर मुझी से उद्भूत है। निस्सन्देह, वे उन व्यक्तियों के समान हैं जिनकी आँखें कुहरे से ढकीरहती हैं।

ते मे मतमविज्ञाय परोक्षं विषयात्मकाः ।हिंसायां यदि रागः स्याद्यज्ञ एव न चोदना ॥

२९॥

हिंसाविहारा ह्यालब्धे: पशुभि: स्वसुखेच्छया ।यजन्ते देवता यज्ञ: पितृभूतपतीन्खला: ॥

३०॥

ते--वे; मे--मेरा; मतम्‌--निष्कर्ष, निर्णय; अविज्ञाय--बिना समझे; परोक्षम्‌ू--गुहा; विषय-आत्मका: --इन्द्रियतृप्ति में लीन;हिंसायाम्‌--हिंसा के प्रति; यदि--यदि; राग:--अनुरक्ति; स्थात्‌ू--हो; यज्ञे--यज्ञ विषयक संस्तुतियों में; एब--निश्चय ही; न--नहीं; चोदना-- प्रोत्साहन; हिंसा-विहारा:--हिंसा में रूचि लेने वाले; हि--निस्सन्देह; आलब्धे:--वध किये गये; पशुभि:--पशुओं के द्वारा; स्‍्व-सुख--अपने सुख के लिए; इच्छया--इच्छा से; यजन्ते--पूजा करते हैं; देवता:--देवतागण; यज्जै:--याज्ञिक अनुष्ठानों से; पितृ-पितर, पूर्वज; भूत-पतीन्‌--तथा भूत-प्रेतों के प्रधान; खला:--क्रूर पुरुष

जो लोग इन्द्रियतृप्ति के वशीभूत हैंवे मेरे द्वारा बतलाये गये वैदिक ज्ञान के गुह्य मत कोनहीं समझ सकते। वे हिंसा में आनन्द का अनुभव करते हुए अपनी ही इन्द्रियतृप्ति के लिए यज्ञमें निरपराध पशुओं का निष्ठुरता से वध करते हैं और इस तरह वे देवताओं, पितरों तथा भूत-प्रेतों के नायकों की पूजा करते हैं। किन्तु वैदिक यज्ञ-विधि में हिंसा की ऐसी उत्कट इच्छा को कभीप्रोत्साहन नहीं दिया जाता।

स्वप्नोपमममुं लोकमसन्तं श्रवणप्रियम्‌ ।आशिषो हृदि सड्डूल्प्य त्यजन्त्यर्थान्यथा वणिक्‌ ॥

३१॥

स्वप्न--स्वण; उपमम्‌--समान; अमुम्‌--वह; लोकम्‌--( मृत्यु के पश्चात्‌ ) संसार; असन्तम्‌--असत्य; श्रवण-प्रियम्‌--सुनने मेंमोहक; आशिष: --जीवन में सांसारिक उपलब्धियाँ; हदि--हृदय में; सड्डूल्प्य--कल्पना करके; त्यजन्ति--त्याग देते हैं;अर्थान्‌ू--उनकी सम्पत्ति; यथा--सह्ृश; वणिक्‌--व्यापारीजन

जिस तरह कोई मूर्ख व्यापारी व्यर्थ की व्यापारिक कल्पना में अपनी असली सम्पत्ति गँवादेता है, उसी तरह मूर्ख व्यक्ति जीवन की वास्तविक मूल्यवान वस्तुओं को त्याग कर स्वर्ग जानेके पीछे पड़े रहते हैं, जो सुनने में मोहक तो है किन्तु स्वप्न सहश असत्य है। ऐसे मोहग्रस्त लोगअपने हृदयों में यह कल्पना करते हैं कि वे सारे भौतिक वर प्राप्त कर सकेंगे।

रजःसत्त्वतमोनिष्ठा रज:सत्त्वतमोजुष: ।उपासत इन्द्रमुख्यान्देवादीन्न यथेव माम्‌ ॥

३२॥

रज:--रजोगुण; सत्त्व--सतोगुण; तम:--अथवा तमोगुण में; निष्ठा: --स्थित; रज:--रजोगुण; सत्त्व--सत्य; तम:--याअविद्या; जुष:--जो प्रकट करते हैं; उपासते--पूजा करते हैं; इन्द्र-मुख्यान्‌--इन्द्र इत्यादि; देव-आदीन्‌--देवताओं इत्यादि को;न--नहीं; यथा एव--सही ढंग से; माम्‌ू--मुझको

रजो, सतो तथा तमोगुण में स्थित लोग इन्द्र इत्यादि विशेष देवताओं तथा अन्य अर्चाविग्रहोंकी पूजा करते हैं, जो उन्हीं रजो, सतो या तमोगुण को प्रकट करते हैं, किन्तु वे मेरी समुचितपूजा करने में असफल रहते हैं।

इष्टेह देवता यज्जैर्गत्वा रंस्थामहे दिवि ।तस्यान्त इह भूयास्म महाशाला महाकुला: ॥

३३॥

एवं पुष्पितया वाचा व्याक्षिप्तमनसां नृणाम्‌ ।मानिनां चातिलुब्धानां मद्वार्तापि न रोचते ॥

३४॥

इष्टा--यज्ञ करके; इह--इस जगत में; देवता:--देवतागण; यज्जै:--हमारे यज्ञों से; गत्वा--जाकर; रंस्थामहे--हम भोग करेंगे;दिवि--स्वर्ग में; तस्थ--उस भोग का; अन्ते--अन्त में; इह--इस पृथ्वी पर; भूयास्म:--हम हो जायेंगे; महा-शाला: --महान्‌गृहस्थ; महा-कुलाः--राजसी परिवार के लोग; एवम्‌--इस प्रकार; पुष्पितया--फूलों जैसे; वाचा--शब्दों से; व्याक्षिप्त-मनसामू--मोहग्रस्त मनों वाले; नृणाम्‌--लोग; मानिनाम्‌--अत्यन्त घमंडी; च--तथा; अति-लुब्धानाम्‌--अत्यन्त लोभी; मदू-वार्ता--मुझसे सम्बन्धित कथाएँ; अपि-- भी; न रोचते-- आकर्षण नहीं होता।

देवताओं के उपासक सोचते हैं, 'हम इस जीवन में देवताओं की पूजा करेंगे और अपनेयज्ञों के बल पर हम स्वर्ग जाकर वहाँ भोग करेंगे। भोग समाप्त होने पर हम इस जगत में लौटआयेंगे और राज-परिवारों में वैभवशाली गृहस्थों के रूप में जन्म लेंगे।ऐसे लोग अत्यधिकघमंडी तथा लालची होने से, वेदों के अलंकारयुक्त शब्दों से मोहित हो जाते हैं। वे मुझ भगवान्‌की कथाओं के प्रति आकृष्ट नहीं होते।

वेदा ब्रह्मात्मविषयास्त्रिकाण्डविषया इमे ।परोक्षवादा ऋषयः परोक्ष॑ं मम॒ च प्रियम्‌ ॥

३५॥

वेदाः--वेद; ब्रह्म-आत्म--स्वयं को शुद्ध आत्मा समझते हुए; विषया: --विषयों वाले; त्रि-काण्ड-विषया: --तीन विभाग वाले( कर्म, देवपूजा तथा परब्रह्म का साक्षात्कार ); इमे--ये; परोक्ष-वादाः--गोपनीय ढंग से बोलने वाले; ऋषय:--वैदिक विद्वान;परोक्षम्‌--अ प्रत्यक्ष विवेचना; मम--मेरा; च--भी ; प्रियम्‌--प्रिय |तीन काण्ड वाले वेद अंततः यह बतलाते हैं कि जीव ही शुद्ध आत्मा है। किन्तु वैदिकऋषि-मुनि तथा मंत्र गुप्त रूप से बतलाते हैं और मैं भी ऐसे गुह्य वर्णनों से प्रसन्न होता हूँ।

शब्दब्रह्म सुदुर्बोध॑ प्राणेन्द्रयमनोमयम्‌ ।अनन्तपारं गम्भीर दुर्विगाह्मं समुद्रबत्‌ ॥

३६॥

शब्द-ब्रह्म--वेदों की दिव्य ध्वनि; सु-दुर्बोधम्‌--समझ पाने में अत्यन्त कठिन; प्राण--प्राण-वायु; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; मनः--तथा मन; मयम्‌--विभिन्न स्तरों पर प्राकट्यू; अनन्त-पारम्‌-- अन्तहीन; गम्भीरम्‌--गहरा; दुर्विगाह्ममू-- थाह पाना कठिन,अथाह; समुद्र-वत्‌--समुद्र के समान

वेदों की दिव्य ध्वनि को समझ पाना अत्यन्त कठिन है और वह प्राण, इन्द्रियों तथा मन केभीतर विभिन्न स्तरों में प्रकट होती है। यह वैदिक ध्वनि समुद्र के समान असीम, अगाध तथाअथाह है।

मयोपबुंहितं भूम्ना ब्रह्मणानन्तशक्तिना ।भूतेषु घोषरूपेण बिसेषू्ेंव लक्ष्यते ॥

३७॥

मया--मेरे द्वारा; उपबृंहितम्‌--स्थापित; भूम्ना--असीम; ब्रह्मणा--परिवर्तनरहित ब्रह्म द्वारा; अनन्त-शक्तिना--अनन्त शक्तिवाले; भूतेषु--जीवों में; घोष-रूपेण--सूक्ष्म ध्वनि के रूप में, ऊंकार; बिसेषु--सूक्ष्म कमलनाल में; ऊर्णगा--एक तनन्‍्तु; इब--सहश; लक्ष्यते--प्रकट होता है

मैं सारे जीवों के भीतर असीम, अपरिवर्तनीय तथा सर्वशक्तिमान भगवान्‌ के रूप में निवासकरते हुए, सारे जीवों के भीतर ऊंकार के रूप में वैदिक ध्वनि स्थापित करता हूँ। वह उसी तरहसूक्ष्म अनुभव की जाती है, जिस तरह कि कमलनाल का एक तन्‍्तु।

यथोर्णनाभिईदयादूर्णामुद्दमते मुखात्‌ ।आकाशाद्धोषवान्प्राणो मनसा स्पर्शरूपिणा ॥

३८॥

छन्दोमयोमृतमयः सहस्त्रपदवीं प्रभु: ।ओंकारादव्यज्िितस्पर्शस्वरोष्मान्तस्थभूषिताम्‌ ॥

३९॥

विचित्रभाषाविततां छन्दोभिश्चतुरुत्तरै: ।अनन्तपारां बृहतीं सृजत्याक्षिपते स्वयम्‌ ॥

४०॥

यथा--जिस तरह; ऊर्ण-नाभि:--मकड़ा; हृदयात्‌-- अपने हृदय से; ऊर्णाम्‌ू--अपने जाले को; उद्दमते--निकालता है;मुखात्‌--अपने मुँह से होकर; आकाशात्‌-- आकाश से; घोष-वान्‌-- ध्वनि प्रकट करते हुए; प्राण: --मूल प्राण-वायु के रूप में भगवान्‌; मनसा--मन के द्वारा; स्पर्श-रूपिणा--स्पर्श अक्षरों के रूप में प्रकट होने वाला; छन्‍्दः-मय:--समस्त छन्‍्दों से युक्त;अमृत-मय:--दिव्य आनन्द से पूरित; सहस्त्र-पदवीम्‌--हजारों दिशाओं में फूट कर निकलने वाला; प्रभुः--भगवान्‌;ओकारात्‌-- »कार सूक्ष्म ध्वनि से; व्यज्ञित--विस्तृत; स्पर्श--व्यंजन से; स्वर--स्वरों; उष्म--उष्म; अन्त-स्थ--तथा उपस्वर;भूषिताम्‌--अलंकृत; विचित्र--नाना प्रकार की; भाषा--मौखिक अभिव्यक्ति द्वारा; वितताम्‌--विस्तृत; छन्दोभि: --छन्दों से;चतुः-उत्तर:--पिछले से चार वर्ण अधिक; अनन्त-पाराम्‌--अन्तहीन; बृहतीम्‌--वैदिक वाड्मय का विस्तार; सृजति--उत्पन्नकरता है; आक्षिपते--तथा समेट लेता है; स्वयम्‌--खुद, स्वयं।

जिस प्रकार मकड़ी अपने हृदय से अपना जाला निकाल कर मुख-मार्ग से बाहर उगलती है,उसी तरह भगवान्‌ गूँजती हुई आदि प्राण-वायु के रूप में अपने को प्रकट करते हैं। इस प्राण-वायु में सारे पवित्र वैदिक छन्‍्द तथा दिव्य आनन्द भरे रहते हैं। इस तरह प्रभु अपने हृदय केआकाश से अपने मन के द्वारा महान्‌ तथा असीम वैदिक ध्वनि को उत्पन्न करते हैं, जो स्पर्शजैसी नाना प्रकार की ध्वनियों को जन्म देती है। यह वैदिक ध्वनि हजारों दिशाओं में फूटती हैऔर »कार वर्ण से विस्तृत विभिन्न अक्षरों से अलंकृत होती है--यथा व्यंजन, स्वर, उष्म तथाअन्तस्थ। तत्पश्चात्‌ अनेक मौखिक भेदों से वेद का विस्तार होता है और विभिन्न छन्‍्दों मेंअभिव्यक्ति होती है जिनमें प्रत्येक छंद पिछले वाले से चार वर्ण अधिक होता है। अन्त मेंभगवान्‌ वैदिक ध्वनि के अपने स्वरूप को अपने ही भीतर समेट लेते हैं।

गायत्र्युष्णिगनुष्ठप्व बृहती पड़ि रेव च ।त्रिष्ठब्जगत्यतिच्छन्दो ह्ात्य्द्यतिजगद्वधिराटू ॥

४१॥

गायत्री उष्णिक्‌ अनुष्ठप्‌ च--गायत्री, उष्णिक तथा अनुष्ठुप्‌ नामक; बृहती पड्लि :--बृहती तथा पंक्ति; एव च--भी; त्रिष्टप्‌ जगतीअतिच्छन्द:--्रिष्टप्‌ू, जगती तथा अतिच्छन्द; हि--निस्सन्देह; अत्यष्टि-अतिजगतू-विराट्‌ू--अत्यष्टि, अतिजगती तथाअतिविराट।

वैदिक छन्द हैं--गायत्री, उष्णिकू, अनुष्ठप्‌, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टपू, जगती, अतिच्छन्द,अत्यष्टि, अतिजगती तथा अतिविराट।

कि विधत्ते किमाचष्टे किमनूद्य विकल्पयेत्‌ ।इत्यस्या हृदयं लोके नान्‍्यो मद्देद कश्चन ॥

४२॥

किमू--क्या; विधत्ते--( कर्म-काण्ड में ) आदेश है; किम्‌--क्या; आचष्टे--( देवता-काण्ड में ) सूचित होता है; किमू--क्या;अनूद्य--विभिन्न प्रकार से वर्णन करके ; विकल्पयेत्‌--विकल्प की संभावना बताता है ( ज्ञान-काण्ड में ); इति--इस प्रकार;अस्या:--वैदिक वाड्मय का; हृदयम्‌--हृदय, अथवा गुप्त उद्देश्य; लोके--इस जगत में; न--नहीं; अन्य:--दूसरा; मत्‌--मेरीअपेक्षा; वेद--जानता है; कश्चन--कोई |

सारे जगत में मेरे अतिरिक्त अन्य कोई वैदिक ज्ञान के गुह्य उद्देश्य को नहीं समझता। अतःलोग यह नहीं जानते कि कर्म-काण्ड के अनुष्ठानिक आदेशों में वेद किस बात की संस्तुति कररहे हैं अथवा उपासना-काण्ड में प्राप्य पूजा के सूत्रों से कौन-सी वस्तु सूचित होती है अथवावेदों के ज्ञान-काण्ड में विभिन्न संकल्पनाओं के माध्यम से किसकी विशद व्याख्या की गई है।

मां विधत्तेडभिधत्ते मां विकल्प्यापोहामते त्वहम्‌ ।एतावान्सर्ववेदार्थ: शब्द आस्थाय मां भिदाम्‌ ।मायामात्रमनृद्यान्ते प्रतिषिध्य प्रसीदति ॥

४३॥

माम्‌--मुझको; विधत्ते--यज्ञ में आदेश देता है; अभिधत्ते--पूजा की वस्तु के रूप में नामकरण करता है; माम्‌--मुझको;विकल्प्य--विकल्प के रूप में प्रस्तुत करके ; अपोह्मते--खंडन किया जाता हूँ; तु-- भी; अहम्‌--मैं; एतावान्‌--इस तरह;सर्व-वेद--सारे वेदों का; अर्थ:--अर्थ; शब्द:-- ध्वनि; आस्थाय--स्थापित करके; माम्‌--मुझको; भिदाम्‌-- भौतिक द्वैत;माया-मात्रमू--मात्र माया के रूप में; अनूद्य--विस्तार से वर्णन करके; अन्ते--अन्त में; प्रतिषिध्य--निषेध करके; प्रसीदति--तुष्ट हो जाता है

मैं वेदों द्वारा आदिष्ट अनुष्ठानिक यज्ञ हूँ और मैं ही उपास्य देव हूँ। मैं ही विभिन्न दार्शनिकसिद्धान्तों द्वारा प्रस्तुत किया जाता हूँ और दार्शनिक विश्लेषण द्वारा निषेध किया जाने वाला भीमैं ही हूँ। इस तरह दिव्य ध्वनि मुझे समस्त वैदिक ज्ञान के अनिवार्य अर्थ के रूप में स्थापितकरती है। सारे वेद समस्त भौतिक द्वैत का विस्तारपूर्वक विश्लेषण करते हुए उसे मेरी ही मोहकशक्ति मान कर, अन्त में इस द्वैत का पूर्णतया निषेध करते हैं और अपने आप को तुष्ट करते हैं।

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