← उद्धव गीता की सूची

17. कृष्ण द्वारा वर्णाश्रम व्यवस्था का वर्णन

श्रीउद्धव उबाचयस्त्वयाभिहित: पूर्व धर्मस्त्वद्धक्तिलक्षण: ।वर्णाशमाचारवतां सर्वेषां ट्विषदामपि ॥

१॥

यथानुष्ठीयमानेन त्वयि भक्ति्नृणां भवेत्‌ ।स्वधर्मेणारविन्दाक्ष तन्‍्ममाख्यातुमहसि ॥

२॥

श्री-उद्धवः उबाच-- श्री उद्धव ने कहा; यः--जो; त्वया--तुम्हारे द्वारा; अभिहितः--कहा गया; पूर्वम्‌--पहले; धर्म:--धार्मिकसिद्धान्त; त्वत्‌ू-भक्ति-लक्षण:--अपनी भक्ति के लक्षणों से युक्त; वर्ण-आश्रम--वर्णा श्रम प्रणाली का; आचारवताम्‌--श्रद्धालु अनुयायियों के; सर्वेषामू--समस्त; द्वि-पदाम्‌--सामान्य मनुष्यों के ( जो वर्णाश्रम प्रणाली नहीं अपनाते ); अपि--भी;यथा--के अनुसार; अनुष्ठीयमानेन--सम्पन्न किये जाने की विधि; त्वयि--तुममें; भक्ति: --प्रेमा भक्ति; नृणाम्‌--मनुष्यों में;भवेत्‌--हो सके; स्व-धर्मेण-- अपने वृत्तिपरक कार्य से; अरविन्द-अक्ष--हे कमलनयन; तत्‌--वह; मम--मुझसे;आख्यातुम्‌--बतलाना; अर्हसि--तुम्हें चाहिए

श्री उद्धव ने कहा : हे प्रभु, इसके पूर्व आपने वर्णाश्रम प्रणाली के अनुयायियों द्वारा तथासामान्य अनियमित मनुष्यों द्वारा भी अनुकरण किये जाने वाले भक्ति के सिद्धान्तों का वर्णनकिया है। हे कमलनयन, अब कृपा करके मुझे बतलाइये कि इन नियत कर्तव्यों को समपन्नकरके सारे मनुष्य किस तरह आपकी प्रेमाभक्ति प्राप्त कर सकते हैं ? पुरा किल महाबाहो धर्म परमकं प्रभो ।यत्तेन हंसरूपेण ब्रह्मणे भ्यात्थ माधव ॥

३॥

स इदानीं सुमहता कालेनामित्रकर्शन ।न प्रायो भविता मर्त्यलोके प्रागनुशासितः ॥

४॥

पुरा--प्राचीन काल में; किल--निस्सन्देह; महा-बाहो--हे बलशाली भुजाओं वाले; धर्मम्‌-धार्मिक नियमों को; परमकम्‌--महानतम सुख प्रदान करने वाला; प्रभो--हे प्रभु; यत्‌--जो; तेन--उससे; हंस-रूपेण--हंस के रूप में; ब्रह्मणे -- ब्रह्मा को;अभ्यात्थ--आपने कहा; माधव--हे माधव; सः--वही ( धर्म का ज्ञान ); इदानीम्‌--इस समय; सु-महता--अत्यन्त लम्बे;कालेन--समय के बाद; अमित्र-कर्शन--शत्रु के दमनकर्ता; न--नहीं; प्राय:--सामान्यतया; भविता--होगा; मर्त्य-लोके --मानव समाज में; प्राकू--पहले; अनुशासित:--उपदेश दिया गया।

हे प्रभु, हे बलिप्ठ भुजाओं वाले, आपने इसके पूर्व अपने हंस रूप में ब्रह्माजी से उन धार्मिकसिद्धान्तों का कथन किया है, जो अभ्यासकर्ता को परम सुख प्रदान करने वाले हैं। हे माधव,तब से अब काफी काल बीत चुका है और हे शत्रुओं के दमनकर्ता, आपने जो उपदेश पहलेदिया था उसका महत्त्व शीघ्र ही समाप्त हो जाएगा।

वक्ता कर्ताविता नान्यो धर्मस्याच्युत ते भुवि ।सभायामपि वैरिज्च्यां यत्र मूर्तिधरा: कला: ॥

५॥

कत्रवित्रा प्रवक्‍त्रा च भवता मधुसूदन ।त्यक्ते महीतले देव विनष्ठटं कः प्रवक्ष्यति ॥

६॥

वक्ता--बोलने वाला; कर्ता--सृजन करने वाला; अविता--रक्षक; न--नहीं; अन्य:--कोई दूसरा; धर्मस्य--सर्वोच्च धार्मिकनियमों का; अच्युत--हे अच्युत; ते--आपकी अपेक्षा; भुवि--पृथ्वी पर; सभायाम्‌--सभा में; अपि-- भी; वैरिउ्च्याम्‌--ब्रह्माकी; यत्र--जहाँ पर; मूर्ति-धरा:--साकार रूप में; कला:ः--वेद; कर्त्रा--कर्ता या स्तरष्टा द्वारा; अवित्रा--रक्षक द्वारा; प्रवक्‍त्रा--बोलने वाले के द्वारा, वक्ता द्वारा; च-- भी; भवता--आपके द्वारा; मधुसूदन--हे मधुसूदन; त्यक्ते--छोड़ देने पर; मही-तले--पृथ्वी पर; देव--मेरे स्वामी; विनष्टम्‌--वे विनष्ट हुए धर्म के नियम; क:--कौन; प्रवक्ष्यति--कहेगा ।

हे अच्युत, इस पृथ्वी पर या ब्रह्म की सभा तक में, परम धार्मिक नियमों का आपके सिवाकोई ऐसा वक्ता, स्त्रष्टा तथा रक्षक नहीं है जहाँ साक्षात्‌ वेद निवास करते हैं। इस तरह हेमधुसूदन, जब आध्यात्मिक ज्ञान के स्त्रष्टा, रक्षक तथा प्रवक्ता आप ही पृथ्वी का परित्याग करदेंगे, तो इस विनष्ट ज्ञान को फिर से कौन बतलायेगा ? तत्त्वं नः सर्वधर्मज्ञ धर्मस्त्वद्धक्तिलक्षण: ।यथा यस्य विधीयेत तथा वर्णय मे प्रभो ॥

७॥

तत्‌--इसलिए; त्वम्‌--तुम; न:ः--हम ( मनुष्यों ) के बीच; सर्व-धर्म-ज्ञ--हे धर्म के नियमों के परम ज्ञाता; धर्म: --आध्यात्मिकपथ; त्वतू-भक्ति--आपकी भक्ति से; लक्षण:--लक्षणों वाले; यथा--जिस तरह से; यस्य--जिसका; विधीयेत--सम्पन्न कियाजा सके; तथा--उस तरह से; वर्णय--कृपया वर्णन करें; मे--मुझसे; प्रभो--हे प्रभु

अतएव हे प्रभु, समस्त धार्मिक नियमों का ज्ञाता होने के कारण आप मुझसे उन मनुष्यों कावर्णन करें जो आपके भक्ति-मार्ग को सम्पन्न कर सकें और यह भी बतायें कि ऐसी भक्ति कैसेकी जाती है? श्रीशुक उबाचइत्थं स्वभृत्यमुख्येन पृष्ठ: स भगवान्हरि: ।प्रीतः क्षेमाय मर्त्यानां धर्मानाह सनातनान्‌ ॥

८॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इत्थम्‌--इस प्रकार; स्व-भृत्य-मुख्येन-- अपने श्रेष्ठ भक्तों द्वारा; पृष्ट: पूछेजाने पर; सः--वह; भगवानू-- भगवान्‌; हरि: -- श्रीकृष्ण; प्रीत:--प्रसन्न हुए; क्षेमाय--कल्याण के लिए; मर्त्यानामू--समस्तबद्धजीवों के; धर्मानू-- धार्मिक नियमों को; आह--कहा; सनातनानू--नित्य |

श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब भक्त प्रवर, श्री उद्धव, ने इस तरह भगवान्‌ से प्रश्नकिया, तो यह सुन कर भगवान्‌ श्रीकृष्ण प्रसन्न हुए और उन्होंने समस्त बद्धजीवों के कल्याणहेतु उन धार्मिक नियमों को बतलाया जो शाश्वत हैं।

श्रीभगवानुवाचधर्म्य एब तव प्रशनो ने:श्रेयसकरो नृणाम्‌ ।वर्णाश्रमाचारवतां तमुद्धव निबोध मे ॥

९॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; धर्म्य:--धर्म के प्रति आज्ञाकारी; एष:--यह; तव--तुम्हारा; प्रश्न:--प्रश्न; नै: श्रेयस-करः--शुद्ध भक्ति का कारण; नृणाम्‌ू--सामान्य मनुष्यों के लिए; वर्ण-आश्रम--वर्णा श्रम प्रणाली का; आचार-वताम्‌--पालन करने वालों के लिए; तम्‌--उन सर्वाच्च धार्मिक नियमों को; उद्धव--हे उद्धव; निबोध--सीखो; मे--मुझसे |

भगवान्‌ ने कहा : हे उद्धव, तुम्हारा प्रश्न धार्मिक नियमों के अनुकूल है, अतः यह सामान्यमनुष्यों को तथा वर्णाश्रम प्रणाली का पालन करने वाले दोनों ही को जीवन में सर्वोच्च सिद्धि,अर्थात्‌ शुद्ध भक्ति को जन्म देता है। अब तुम मुझसे उन परम धार्मिक नियमों को सीखो।

आदौ कृतयुगे वर्णो नृणां हंस इति स्मृतः ।कृतकृत्या: प्रजा जात्या तस्मात्कृतयुगं विदु: ॥

१०॥

आदौ--( कल्प के ) प्रारम्भ में; कृत-युगे--सत्ययुग में; वर्ण: --सामाजिक श्रेणी; नृणाम्‌--मनुष्यों की; हंसः--हंस नामक;इति--इस प्रकार; स्मृतः--विख्यात; कृत-कृत्या:--परमे श्वर की पूर्ण शरणागति द्वारा कर्तव्यों केपालन में दक्ष; प्रजा:--जनता;जात्या--जन्म से; तस्मात्‌--इसलिए; कृत-युगम्‌--कृतयुग में अथवा ऐसे युग में जिसमें सारे कर्तव्य पूरे होते हैं; विदुः--विद्वानलोग जानते थे।

प्रारम्भ में सत्ययुग में केवल एक सामाजिक श्रेणी थी जिसे हंस कहते थे जिससे सारे मनुष्यसम्बद्ध होते थे। उस युग में सारे लोग जन्म से शुद्ध भगवद्भक्त होते थे, इसलिए विद्वान लोगइस प्रथम युग को कृत-युग कहते हैं अर्थात्‌ ऐसा युग जिसमें सारे धार्मिक कार्य अच्छी तरह पूरेहोते हैं।

वेद: प्रणव एवाग्रे धर्मोहं वृषरूपधृक्‌ ।उपासते तपोनिष्ठा हंसं मां मुक्तकिल्बिषा: ॥

११॥

बेदः--वेद; प्रणव:-- ओऊम नामक पवित्र अक्षर; एब--निस्सन्देह; अग्रे--सत्ययुग में; धर्म: --मानसिक कार्यों का लक्ष्य;अहम्‌-ैं; वृष-रूप-धृक्‌ -- धर्म रूप बैल का रूप धारण करके; उपासते--वे पूजा करते हैं; तपः-निष्ठा:--तप में रत;हंसम्‌-- भगवान्‌ हंस; माम्‌--मुझको; मुक्त--रहित; किल्बिषा:--सारे पापों से ।

सत्ययुग में अविभाज्य वेद ओउम्‌ अक्षर ( ऊंकार ) द्वारा व्यक्त किया जाता है और मैं हीएकमात्र मानसिक कार्यों का लक्ष्य ( धर्म ) हूँ। मैं चार पैरों वाले धर्म रूपी बैल के रूप में प्रकटहोता हूँ जिससे सत्ययुग के निवासी, तपस्यानिष्ठ तथा पापरहित होकर, भगवान्‌ हंस के रूप मेंमेरी पूजा करते हैं।

त्रेतामुखे महाभाग प्राणान्मे हृदयात्त्रयी ।विद्या प्रादुरभूत्तस्या अहमासं त्रिवृन्मख: ॥

१२॥

त्रेता-मुखे--त्रेता युग के प्रारम्भ में; महा-भाग--हे परम भाग्यशाली; प्राणात्‌--प्राण के स्थान से; मे--मेरे; हृदयात्‌--हृदय से;त्रयी--तीन; विद्या--वैदिक ज्ञान; प्रादुरभूतू--प्रकट हुआ; तस्या:--उस ज्ञान से; अहम्‌--मैं; आसम्‌--प्रकट हुआ; त्रि-वृत्‌--तीन विभागों में; मख:--यज्ञ |

हे परम भाग्यशाली, त्रेता युग के प्रारम्भ में, प्राण के स्थान से, जो कि मेरा हृदय है, वैदिकज्ञान तीन विभागों में प्रकट हुआ--ये हैं--ऋग, साम तथा यजु:। तत्पश्चात्‌ उस ज्ञान से मैं तीनयज्ञों के रूप में प्रकट हुआ।

विप्रक्षत्रियविट्शूद्रा मुखबाहूरूपादजा: ।वैराजात्पुरुषाजञाता य आत्माचारलक्षणा: ॥

१३॥

विप्र--ब्राह्मण; क्षत्रिय--क्षत्रिय; विटू--वैश्य; शूद्रा:--शूद्र, मजदूर; मुख--मुँह; बाहु-- भुजाओं; ऊरू--जाँघों; पाद--तथापाँवों से; जा:--उत्पन्न; वैराजातू--विराट रूप से; पुरुषात्‌-- भगवान्‌ से; जाता:--उत्पन्न; ये--जो; आत्म--निजी; आचार--कार्यकलाप द्वारा; लक्षणा: --पहचाने जाते हैं।

त्रेता युग में भगवान्‌ के विराट रूप से चार जातियाँ प्रकट हुईं। ब्राह्मण भगवान्‌ के मुँह से,क्षत्रिय भगवान्‌ की बाँहों से, वैश्य भगवान्‌ के जंघों से तथा शूद्र उस विराट रूप के पाँवों से प्रकट हुए। प्रत्येक विभाग को उसके विशिष्ट कर्तव्यों तथा आचार-व्यवहारसे पहचाना गया।

गृहा भ्रमो जघनतो ब्रह्मचर्य हृदो मम ।वक्ष:स्थलादइ्नेवास: सन्न्यास: शिरसि स्थित: ॥

१४॥

गृह-आश्रम: --विवाहित जीवन; जघनतः:--जाँघों से; ब्रह्मचर्यम्‌--विद्यार्थी जीवन; हृदः--हृदय से; मम--मेरे; वक्षः-स्थलात्‌--वक्षस्थल से; बने--जंगल में; वास:--निवास करते हुए; सन्न्यास:--संन्यास आश्रम; शिरसि--सिर पर; स्थित:--स्थित।

विवाहित जीवन मेरे विश्व रूप के जघन प्रदेश से प्रकट हुआ और ब्रह्मचारी विद्यार्थी मेरेहृदय से निकले। जंगल में निवास करने वाला विरक्त जीवन मेरे वक्षस्थल से प्रकट हुआ तथासंन्यास मेरे विश्व रूप के सिर के भीतर स्थित था।

वर्णानामाश्रमाणां च जन्मभूम्यनुसारिणी: ।आसम्प्रकृतयो नूनां नीचैर्नीचोत्तमोत्तमा: ॥

१५॥

वर्णानाम्‌--वृत्तिपरक विभागों में; आश्रमाणाम्‌--सामाजिक विभागों में; च-- भी; जन्म--जन्म; भूमि--स्थान के;अनुसारिणी:--के अनुसार; आसनू--प्रकट हुए; प्रकृतयः--प्रकृतियाँ; नृणाम्‌--मनुष्यों में; नीचैः --निम्न पृष्ठभूमि द्वारा;नीच--नीच प्रकृति; उत्तम- श्रेष्ठ पृष्ठभूमि द्वारा; उत्तमाः--उत्तम प्रकृतियाँ |

प्रत्येक व्यक्ति के जन्म के समय की निम्न तथा उच्च प्रकृतियों के अनुसार मानव समाज केविविध वृत्तिपरक ( वर्ण ) तथा सामाजिक ( आश्रम ) विभाग प्रकट हुए।

शमो दमस्तपः शौचं सन्‍तोष: क्षान्तिराजवम्‌ ।मद्धक्तिश्च दया सत्यं ब्रह्मप्रकृतयस्त्विमा: ॥

१६॥

शमः--शान्ति; दम: --इन्द्रिय-संयम; तप:--तपस्या; शौचम्‌--शुद्द्धि; सन्‍्तोष: --पूर्ण सन्तुष्टि; क्षान्तिः-- क्षमाशीलता;आर्जवम्‌--सादगी, सीधापन; मत्‌-भक्ति:--मेरी भक्ति; च-- भी; दया--दया; सत्यम्‌--सत्य; ब्रह्म--ब्राह्मणों के; प्रकृतय:--स्वाभाविक गुण; तु--निस्सन्देह; इमाः--ये

शान्ति, आत्मसंयम, तपस्या, शुद्धि, सन्‍्तोष, सहनशीलता, सहज स्पष्टवादिता, मेरी भक्ति,दया तथा सत्य--ये ब्राह्मणों के स्वाभाविक गुण हैं।

तेजो बलं॑ धृति: शौर्य तितिक्षौदार्यमुद्यम: ।स्थेर्य ब्रह्मन्यमैश्वर्य क्षत्रप्रकृतयस्त्विमा: ॥

१७॥

तेज:--तेज; बलमू--शारीरिक बल; धृति:--संकल्प; शौर्यम्‌--शूरवीरता; तितिक्षा--सहिष्णुता; औदार्यम्‌--उदारता;उद्यम: --प्रयतल; स्थैर्यमू--स्थिरता; ब्रह्मण्यम्‌--ब्राह्मणों की सेवा के लिए सदैव तत्पर; ऐश्वर्यम्‌--नायकत्व; क्षत्र--श्षत्रियों के;प्रकृतयः--स्वाभाविक गुण; तु--निस्सन्देह; इमा:--ये |

तेजस्विता, शारीरिक बल, संकल्प, बहादुरी, सहनशीलता, उदारता, महान्‌ प्रयास, स्थिरता,ब्राह्मणों के प्रति भक्ति तथा नायकत्व--ये क्षत्रियों के स्वाभाविक गुण हैं।

आस्तिक्यं दाननिष्ठा च अदम्भो ब्रह्मसेवनम्‌ ।अठुष्टिरथोपचर्यवैंश्यप्रकृतयस्त्विमा: ॥

१८॥

आस्तिक्यम्‌--वैदिक सभ्यता में विश्वास; दान-निष्ठा--दानशीलता; च-- भी; अदम्भ:--दिखावटीपन का अभाव; ब्रह्म-सेवनम्‌-ब्राह्मणों की सेवा; अतुष्टि:--असंतुष्ट रहने का भाव; अर्थ--धन का; उपचयै: --संग्रह द्वारा; वैश्य--वैश्य के;प्रकृतयः--स्वाभाविक गुण; तु--निस्सन्देह; इमा:--ये |

वैदिक सभ्यता में विश्वास, दानशीलता, दिखावे से दूर रहना, ब्राह्मणों की सेवा करना तथाअधिकाधिक धन संचय की निरन्तर आकांक्षा--ये वैश्यों के प्राकृतिक गुण हैं।

शुश्रूषणं द्विजगवां देवानां चाप्यमायया ।तत्र लब्धेन सनन्‍्तोषः शूद्रप्रकृतयस्त्विमा: ॥

१९॥

शुश्रूषणम्‌--सेवा; द्विज--ब्राह्मणों की; गवाम्‌--गौवों की; देवानामू--देवताओं तथा गुरु जैसे पूज्य पुरुषों की; च-- भी;अपि--निस्सन्देह; अमायया--निष्कपट; तत्र--उस सेवा में; लब्धेन--प्राप्त हुए के द्वारा; सन्‍्तोष:--पूर्ण तुष्टि; शूद्र-शूद्रों के;प्रकृतयः--स्वाभाविक गुण; तु--निस्सन्देह; इमा:--ये |

ब्राह्मणों, गौवों, देवताओं तथा अन्य पूज्य पुरुषों की निष्कपट सेवा तथा ऐसी सेवा करने सेजो भी आमदनी हो जाय उससे पूर्ण तुष्टि--ये शूद्रों के स्वाभाविक गुण हैं।

अशौचमनृतं स्तेयं नास्तिक्यं शुष्कविग्रह: ।कामः क्रोधश्व तर्षश्च स भावोन्त्यावसायिनाम्‌ ॥

२०॥

अशौचम्‌--गंदा रहना; अनृतम्‌--बेईमानी; स्तेयम्‌--चोरी; नास्तिक्यमू--नास्तिकता; शुष्क-विग्रह: --व्यर्थ का लड़ाई-झगड़ा;कामः--विषय-भोग, वासना; क्रोध:--क्रो ध; च-- भी; तर्ष:--लालसा; च-- भी; सः--यह; भाव: --स्वभाव, प्रकृति;अन्तय--निम्नतम पद में; अवसायिनामू--रहने वालों के |

अस्वच्छता, बेईमानी, चोरी करना, नास्तिकता, व्यर्थ झगड़ना, काम, क्रोध एवं तृष्णा--ये उनके स्वभाव हैं, जो वर्णाश्रम प्रणाली के बाहर निम्नतम पद पर हैं।

अहिंसा सत्यमस्तेयमकामक्रोधलोभता ।भूतप्रियहितेहा च धर्मोउयं सार्ववर्णिक: ॥

२१॥

अहिंसा--अहिंसा; सत्यम्‌--सत्य; अस्तेयम्‌ू--ईमानदारी; अ-काम-क्रोध-लोभता--काम, क्रोध तथा लोभ से रहित होना;भूत--सारे जीवों के; प्रिय--सुख; हित--तथा कल्याण; ईहा--कामना; च--भी; धर्म:--कर्तव्य; अयमू--यह; सार्व-वर्णिक: --समाज के सारे सदस्यों के लिए॥

अहिंसा, सत्य, ईमानदारी, अन्यों के लिए सुख तथा कल्याण की इच्छा एवं काम, क्रोधतथा लोभ से मुक्ति--ये समाज के सभी सदस्यों के कर्तव्य हैं।

द्वितीयं प्राप्यानुपूर्व्याज्जन्मोपनयन द्विज: ।वसन्गुरुकुले दान्तो ब्रह्माधीयीत चाहूत: ॥

२२॥

द्वितीयम्‌--दूसरा; प्राप्प--पाकर; आनुपूर्व्यात्‌--क्रमिक संस्कार-विधि से; जन्म--जन्म; उपनयनम्‌-- गायत्री दीक्षा; द्विज:--समाज का द्विजन्मा सदस्य; वसन्‌ू--वास करते हुए; गुरु-कुले--गुरु के आश्रम में; दान्तः--आत्म-नियंत्रित; ब्रहा--वैदिकवाड्मय; अधीयीत--अध्ययन करे; च--तथा समझे भी; आहूत:--तथा गुरु द्वारा बुलाये जाने पर।

समाज का द्विजन्मा सदस्य संस्कारों के द्वारा गायत्री दीक्षा होने पर दूसरा जन्म प्राप्त करताहै। गुरु द्वारा बुलाये जाने पर उसे गुरु के आश्रम में रहना चाहिए और आत्मनियंत्रित मन सेसावधानी से वैदिक साहित्य का अध्ययन करना चाहिए।

मेखलाजिनदण्डाक्षब्रह्मसूत्रकमण्डलून्‌ ।जटिलोधौतदद्वासो रक्तपीठ: कुशान्द्धत्‌ ॥

२३॥

मेखला--पेटी; अजिन--मृगचर्म; दण्ड--डंडा; अक्ष--गुरियों की माला; ब्रह्म-सूत्र--ब्राह्मण का जनेऊ; कमण्डलूनू--तथा'कमण्डल या जलपात्र; जटिल:--जटा; अधौत--बिना पालिश किया या सफेद किया या इस्त्री किया; दत्‌ू-वास:--दाँत तथावस्त्र; अरक्त-पीठ:--विलासमय या विषयी आसन स्वीकार किये बिना; कुशान्‌ू--कुश तृण; दधत्‌--हाथ में लिए हुएब

्रह्मचारी को नियमित रूप से मूँज की पेटी तथा मृगचर्म के वस्त्र धारण करने चाहिए। उसेजटा रखनी चाहिए और दंड तथा कमंडल धारण करना चाहिए। उसे अक्ष के मनके तथा जनेऊधारण करना चाहिए। अपने हाथ में शुद्ध कुश लिए हुए, उसे कभी भी कोई विलासपूर्ण याउत्तेजक आसन ग्रहण नहीं करना चाहिए। उसे व्यर्थ दाँत नहीं चमकाना चाहिए न ही अपने वस्त्रोंसे रंग उड़ाना या उन पर लोहा ( इस्त्री ) करना चाहिए।

स्नानभोजनहोमेषु जपोच्चारे च वाग्यतः ।न च्छिन्द्यान्नखरोमाणि कक्षोपस्थगतान्यपि ॥

२४॥

स्नान--स्नान करते; भोजन-- भोजन करते; होमेषु--तथा यज्ञ करते; जप--मन में मंत्रों का जाप करते; उच्चारे--मल-मूत्रविसर्जन करते समय; च-- भी; वाक्‌ू-यत:--मौन रह कर; न--नहीं; छिन्द्यात्‌--काटे; नख--नाखुन; रोमाणि-- अथवा बाल;कक्ष--बगल ( काँख ) के; उपस्थ--गुप्तांग; गतानि--के सहित; अपि--भी |

ब्रह्मचारी को चाहिए कि स्नान करते, खाते, यज्ञ करते, जप करते या मल-मूत्र विसर्जनकरते समय, सदैव मौन रहे। वह अपने नाखुन तथा काँख एवं गुप्तांग सहित किसी अंग के बाल नहीं काटे।

रेतो नावकिरेज्ञातु ब्रह्मत्रतधर: स्वयम्‌ ।अवकीरेेंवगाह्माप्सु यतासुस्त्रिपदां जपेतू ॥

२५॥

रेत:--वीर्य; न--नहीं; अवकिरेत्‌--पतन करे; जातु--कभी; ब्रह्म-ब्रत-धर: --ब्रह्मचर्यत्रत धारण करने वाला, ब्रह्मचारी;स्वयम्‌--स्वयं; अवकीर्णे--पतन हो जाने पर; अवगाह्म--स्नान करके; अप्सु--जल में; यत-असु: --प्राणायाम्‌ द्वारा श्वास रोककर; त्रि-पदाम्‌-गायत्री मंत्र का; जपेत्‌--जप करे

ब्रह्मचर्य त्रत का पालन करते हुए वह कभी वीर्यपात न करे। यदि संयोगवश वीर्य स्वतःनिकल जाय, तो ब्रह्मचारी तुरन्त जल में स्नान करे, प्राणायाम द्वारा अपना श्वास रोके और गायत्रीमंत्र का जप करे।

अग्न्यर्काचार्यगोविप्रगुरुवृद्धसुराब्शुचि: ।समाहित उपासीत सन्ध्ये द्वे यतवाग्जपन्‌ ॥

२६॥

अग्नि--अग्निदेव; अर्क--सूर्य; आचार्य--आचार्य; गो--गाय ; विप्र--ब्राह्मण; गुरु--गुरु; वृद्ध--सम्माननीय गुरुजन;सुरानू--देवताओं को; शुच्रिः:--पवित्र; समाहित:--स्थिर चेतना से; उपासीत--पूजा करे; सन्ध्ये--संध्या-समय; द्वे--दो; यत-वाक्‌--मौन रखते हुए; जपन्‌--मौन होकर जपने या उचित मंत्र का उच्चारण |

ब्रह्मचारी को शुद्ध होकर तथा स्थिर चेतना से अग्नि, सूर्य, आचार्य, गायों, ब्राह्मणों, गुरु,गुरुजनों तथा देवताओं की पूजा करनी चाहिए। उसे सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय मौन होकरउपयुक्त मंत्रों का गुनगुनाते हुए उच्चारण करके ऐसी पूजा करनी चाहिए।

आचार्य मां विजानीयान्नवमन्येत कर्हिचित्‌ ।न मर्व्यबुद्धयासूयेत सर्वदेवमयो गुरु: ॥

२७॥

आचार्यम्‌-गुरु; मामू--मुझको; विजानीयात्‌--जाने; न अवमन्येत--कभी अनादर न करे; कर्हिचित्‌ू--किसी समय; न--कभी नहीं; मर्त्य-बुद्धया--सामान्य पुरुष होने के विचार से; असूयेत--ईर्ष्या-द्वेष रखे; सर्व-देब--सभी देवताओं के ; मय: --प्रतिनिधि; गुरु:--गुरु |

मनुष्य को चाहिए कि आचार्य को मेरा ही स्वरूप जाने और किसी भी प्रकार से उसकाअनादर नहीं करे। उसे सामान्य पुरुष समझते हुए उससे ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखे क्योंकि वह समस्त देवताओं का प्रतिनिधि है।

सायं प्रातरुपानीय भैक्ष्यं तस्मै निवेदयेत्‌ ।यच्चान्यदप्यनुज्ञातमुपयुञ्जीत संयतः ॥

२८॥

सायम्‌--शाम को; प्रात:--सुबह के समय; उपानीय--लाकर; भैक्ष्यम्‌--भिक्षा; तस्मै--उस ( आचार्य ) को; निवेदयेत्‌--लाकर दे; यत्‌--जो कुछ; च--भी; अन्यत्‌--अन्य वस्तुएँ; अपि--निस्सन्देह; अनुज्ञातमू-- अनुमति मिले; उपयुञ्जीत--स्वीकारकरे; संयत:--पूर्ण रूप से संयमित।

वह प्रातः तथा सायंकाल भोजन तथा अन्य वस्तुएँ एकत्र करके गुरु को प्रदान करे। तबआत्मसंयमपूर्वक वह अपने लिए उतना ही स्वीकार करे जो आचार्य उसके लिए निर्दिष्ट कर दे।

शुभ्रूषमाण आचार्य सदोपासीत नीचवत्‌ ।यानशब्यासनस्थानैर्नातिदूरे कृताझ्ललिः ॥

२९॥

शुश्रूषमाण: --सेवा में लगा हुआ; आचार्यम्‌ू--गुरु को; सदा--सदैव; उपासीत--पूजे; नीच-वत्‌--विनीत सेवक की तरह;यान--जब गुरु चले तो पीछे पीछे चलते हुए; शय्या--गुरु के साथ विश्राम करते हुए; आसन--सेवा करने के लिए गुरु केनिकट बैठ कर; स्थानै:--खड़े रह कर तथा गुरु की आज्ञा की प्रतीक्षा करते हुए; न--नहीं; अति--अधिक; दूरे--दूरी पर;कृत-अज्जलि:--हाथ जोड़े |

गुरु की सेवा करते समय शिष्य विनीत सेवक के समान रहता रहे और जब गुरु चलें, तोवह सेवक की तरह उनके पीछे पीछे चले। जब गुरु सोने लगें, तो सेवक भी पास ही लेट जायऔर जब गुरु जगें, तो सेवक उनके निकट बैठ कर उनके चरणकमल चापने तथा अन्य सेवा-कार्य करने में लग जाय। जब गुरु अपने आसन पर बैठे हों, तो सेवक उनके पास हाथ जोड़कर, गुरु-आदेश की प्रतीक्षा करे। वह इस तरह से गुरु की सदैव पूजा करे।

एवंवृत्तो गुरुकुले वसेद्धोगविवर्जित: ।विद्या समाप्यते यावद्विभ्रदूव्तमखण्डितम्‌ ॥

३०॥

एवम्‌--इस प्रकार; वृत्त:--लगा हुआ; गुरु-कुले--गुरु के आश्रम में; वसेत्‌--रहे; भोग--इन्द्रियतृप्ति; विवर्जित:--से मुक्त;विद्या--वैदिक शिक्षा; समाप्यते--पूरी होती है; यावत्‌--जब तक; बिभ्रत्‌ू-- धारण करते हुए; ब्रतम्‌--( ब्रह्मचर्य ) व्रत;अखण्डितमू--अखण्ड।

जब तक विद्यार्थी अपनी वैदिक शिक्षा पूरी न कर ले, उसे गुरु के आश्रम में कार्यरत रहनाचाहिए, उसे इन्द्रियतृप्ति से पूर्णतया मुक्त रहना चाहिए और उसे अपना ब्रह्माचर्य ब्रत नहीं तोड़नाचाहिए।

यद्यसौ छन्दसां लोकमारोश्ष्यन्त्रह्मविष्टपम्‌ ।गुरवे विन्यसेह्देहं स्वाध्यायार्थ बृहद्व्रत: ॥

३१॥

यदि--यदि; असौ--वह विद्यार्थी; छन्दसाम्‌ लोकमू--महलेंक में; आरोक्ष्यनू--चढ़ने की इच्छा करते हुए; ब्रह्म-विष्टपम्‌--ब्रह्मलोक; गुरवे--गुरु को; विन्यसेत्‌--अर्पित करे; देहम्‌--अपना शरीर; स्व-अध्याय-- श्रेष्ठ वैदिक अध्ययन के; अर्थम्‌ू-हेतु;बृहत्‌-ब्रत:--आजीवन ब्रह्मचर्य का शक्तिशाली ब्रत रखते हुए

यदि ब्रह्मचारी महलोंक या ब्रह्मलोक जाना चाहता है, तो उसे चाहिए कि गुरु को अपने सारेकर्म अर्पित कर दे और आजीवन ब्रह्मचर्य के शक्तिशाली ब्रत का पालन करते हुए अपने कोश्रेष्ठ वैदिक अध्ययन में समर्पित कर दे।

अग्नौ गुरावात्मनि च सर्वभूतेषु मां परम्‌ ।अपृथग्धीरुपसीत ब्रह्मवर्चस्व्यकल्मष: ॥

३२॥

अग्नौ--अग्न में; गुरौ--गुरु में; आत्मनि--अपने में; च--भी; सर्व-भूतेषु-- सारे जीवों में; माम्‌--मुझको; परम्‌ू--परम;अपृथक्‌-धी: --द्वैत से रहित; उपासीत-- पूजा करे; ब्रह्म-वर्चस्वी --वैदिक प्रकाश से युक्त; अकल्मष:--निष्पाप |

इस तरह गुरु की सेवा करने से वैदिक ज्ञान में प्रबुद्ध, समस्त पापों तथा द्वैत से मुक्त हुआव्यक्ति, परमात्मा रूप में मेरी पूजा करे क्योंकि मैं अग्नि, गुरु, मनुष्य की आत्मा तथा समस्तजीवों के भीतर प्रकट होता हूँ।

स्त्रीणां निरीक्षणस्पर्शसंलापक्ष्वेलनादिकम्‌ ।प्राणिनो मिथुनीभूतानगृहस्थोग्रतस्त्यजेतू ॥

३३॥

स्त्रीणाम-स्त्रियों के सम्बन्ध में; निरीक्षण--देखने; स्पर्श--छूने; संलाप--बात करने; क_्वेलनल--हँसी-मजाक करने;आदिकम्‌ू--इत्यादि; प्राणिन: --जीव; मिथुनी-भूतानू--संभोगरत; अगृह-स्थ:--संन्यासी, वानप्रस्थ या ब्रह्मचारी; अग्रतः --सर्वप्रथम; त्यजेत्‌ू--छोड़ दे

जो विवाहित नहीं हैं अर्थात्‌ सन्‍्यासी, वानप्रस्थ तथा ब्रह्मचारी, उन्हें स्त्रियों को कभी भीदेख कर, छू कर, बात करके, हँसी-मजाक करके या खेल-खेल में उनकी संगति नहीं करनीचाहिए। न ही वे किसी ऐसे जीव का साथ करें जो संभोगरत हों।

शौचमाचमनं स्नान सन्ध्योपास्तिर्ममार्चनम्‌ ।तीर्थसेवा जपोस्पृश्याभक्ष्यासम्भाष्यवर्जमम्‌ ॥

३४॥

सर्वाश्रमप्रयुक्तोयं नियम: कुलनन्दन ।मद्भावः सर्वभूतेषु मनोवाक्कायसंयम: ॥

३५॥

शौचम्‌--स्वच्छता; आचमनम्‌--जल से हाथ शुद्ध करना; स्नानम्‌--स्नान; सन्ध्या--सूर्योदय, दोपहर तथा शाम को;उपास्तिः--धार्मिक सेवा; मम--मेरी; अर्चनम्‌--पूजा; तीर्थ-सेवा--तीर्थस्थानों की यात्रा; जप:-- भगवन्नाम का उच्चारण;अस्पृश्य--अछूत; अभक्ष्य--अखाद्य; असम्भाष्य--या जिसकी चर्चा करने लायक न हो; वर्जनम्‌--निषेध; सर्व--सभी;आश्रम--आश्रम; प्रयुक्त:--आदिष्ट; अयम्‌--यह; नियम:--नियम; कुल-नन्दन--हे उद्धव; मत्‌-भाव:--मेरे अस्तित्व काबोध; सर्व-भूतेषु--सारे जीवों में; मन:--मन; वाक्‌ू--शब्द; काय--शरीर का; संयम:--नियमन, संयम ।

हे उद्धव, सामान्य स्वच्छता, हाथों का धोना, स्नान करना, सूर्योदय, दोपहर तथा शाम कोधार्मिक सेवा का कार्य करना, मेरी पूजा करना, तीर्थस्थान जाना, जप करना, अछूत, अखाद्यया चर्चा के अयोग्य वस्तुओं से दूर रहना तथा समस्त जीवों में परमात्मा रूप में मेरे अस्तित्व कास्मरण करना--इन सिद्धान्तों को समाज के सारे सदस्यों को मन, वचन तथा कर्म के संयम द्वारापालन करना चाहिए।

एवं बृहदव्रतधरो ब्राह्मणोग्निरिव ज्वलन्‌ ।मद्धक्तस्तीव्रतपसा दग्धकर्माशयोडमल: ॥

३६॥

एवम्‌--इस प्रकार; बृहत्‌-ब्रत--ब्रह्मचर्य का महान्‌ व्रत; धर:--धारण करते हुए; ब्राह्मण:--ब्राह्मण; अग्नि:-- अग्नि; इब--सहश; ज्वलन्‌--तेजयुक्त; मत्‌-भक्त:--मेरा भक्त; तीब्र-तपसा--गम्भीर तपस्या द्वारा; दग्ध--जला हुआ; कर्म--सकाम कर्मकी; आशय: --प्रवृत्ति; अमल:ः--भौतिक इच्छा के कल्मष से रहित ।

ब्रह्मचर्य का महान्‌ व्रत धारण करने वाला ब्राह्मण अग्नि के समान तेजस्वी हो जाता है औरवह गहन तपस्या द्वारा भौतिक कर्म करने की लालसा को भस्म कर देता है। इस तरह भौतिकइच्छा के कल्मष से रहित होकर, वह मेरा भक्त बन जाता है।

अथानन्तरमावेक्ष्यन्यथाजिज्ञासितागम: ।गुरवे दक्षिणां दत्त्वा स्नायादगुर्वनुमोदित: ॥

३७॥

अथ--इस प्रकार; अनन्तरम्‌--इसके पश्चात्‌; आवेश्ष्यनू--गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने की इच्छा से; यथा--समुचित;जिज्ञासित--अध्ययन करके; आगम:--वैदिक साहित्य; गुरवे--गुरु को; दक्षिणाम्‌--पारिश्रमिक; दत्त्वा--देकर; स्नायात्‌--ब्रह्मचारी को स्नान करके, कंघा करना तथा सुन्दर वस्त्र पहनना चाहिए; गुरु--गुरु द्वारा; अनुमोदित:--अनुमति दिये जाने पर।

जो ब्रह्मचारी अपनी वैदिक शिक्षा पूरी करके गृहस्थ जीवन में प्रवेश करना चाहता है, उसेचाहिए कि वह गुरु को समुचित पारिश्रमिक ( गुरु-दक्षिणा ) दे, स्नान करे, बाल कटाये औरउचित वस्त्र इत्यादि धारण करे। तब अपने गुरु की अनुमति से वह अपने घर को जाय।

गृहं वन वोपविशेत्प्रव्नजेद्दा द्विजोत्तम: ।आश्रमादाश्रमं गच्छेन्नान्यथामत्परश्चरेत्‌ ॥

३८ ॥

गृहम्‌ू--घर; वनम्‌--जंगल; वा--या तो; उपविशेत्‌-- प्रवेश करे; प्रत्नजेत्‌--त्याग दे; वा--अथवा; द्विज-उत्तम:--ब्राह्मण;आश्रमात्‌--जीवन के अधिकारप्राप्त एक पद से; आश्रमम्‌--दूसरे अधिकारप्राप्त पद तक; गच्छेतू--जाए; न--नहीं;अन्यथा--नहीं तो; अमत्‌-परः--जो मेरा शरणागत नहीं है; चरेत्‌--कार्य करे

अपनी भौतिक इच्छाओं को पूरा करने के लिए इच्छुक ब्रह्मचारी को अपने परिवार के साथघर पर रहना चाहिए और जो गृहस्थ अपनी चेतना को शुद्ध बनाना चाहे उसे जंगल में प्रवेशकरना चाहिए जबकि शुद्ध ब्राह्मण को संन्यास ग्रहण कर लेना चाहिए। जो मेरे शरणागत नहीं हैउसे एक आश्रम से दूसरे में क्रमश: जाना चाहिए और इससे विरुद्ध कार्य नहीं करना चाहिए।

गृहार्थी सही भार्यामुद्रदेदजुगुप्सिताम्‌ ।यवीयसीं तु वयसा यं सवर्णामनु क्रमात्‌ ॥

३९॥

गृह--घर-गृहस्थी; अर्थी--इच्छुक; सहशीम्‌--समान गुणों से युक्त; भार्यामू-- पत्नी से; उद्देतू-ब्याहे; अजुगुप्सिताम्‌--आक्षेप से परे; यवीयसीम्‌--वय में छोटी; तु--निस्सन्देह; वयसा--उप्र में; यामू--दूसरी पत्नी; स-वर्णामू--समान जाति कीपहली पत्नी; अनु--बाद में; क्रमातू-क्रम से |

जो व्यक्ति गृहस्थ जीवन स्थापित करना चाहता है उसे चाहिए कि अपनी ही जाति की ऐसीस्त्री से विवाह करे जो निष्कलंक तथा उम्र में छोटी हो। यदि कोई व्यक्ति अनेक पत्नियाँ रखनाचाहता है, तो उसे प्रथम विवाह के बाद उनसे भी ब्याह करना चाहिए और हर पत्नी एक-दूसरे सेनिम्न जाति की होनी चाहिए।

इज्याध्ययनदानानि सर्वेषां च द्विजन्मनाम्‌ ।प्रतिग्रहोध्यापनं च ब्राह्मणस्यैव याजनम्‌ ॥

४०॥

इज्या--यज्ञ; अध्ययन--वैदिक अध्ययन; दानानि--दान; सर्वेषाम्‌ू--सभी; च-- भी; द्वि-जन्मनाम्‌--द्विजों के; प्रतिग्रह:ः--दानलेना; अध्यापनम्‌--वैदिक ज्ञान की शिक्षा देना; च--भी; ब्राह्मणस्य--ब्राह्मण के; एब--एकमात्र; याजनम्‌--अन्यों के लिएयज्ञ करना।

सभी द्विजों अर्थात्‌ ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा वैश्यों को यज्ञ करना चाहिए, वैदिक साहित्य काअध्ययन करना चाहिए और दान देना चाहिए किन्तु ब्राह्मण ही दान ले सकते हैं, वे ही वैदिकज्ञान की शिक्षा दे सकते हैं और अन्यों के लिए यज्ञ कर सकते हैं।

प्रतिग्रह मन्यमानस्तपस्तेजोयशोनुदम्‌ ।अन्याभ्यामेव जीवेत शिलैर्वां दोषहक्‌ तयो: ॥

४१॥

प्रतिग्रहम्‌--दान लेना; मन्यमान:--मानते हुए; तप:ः--तपस्या; तेज:--आध्यात्मिक प्रभाव; यशः--तथा यश का; नुदम्‌--विनाश; अन्याभ्याम्‌-- अन्य दो ( यज्ञ तथा वेद-विद्या ) के द्वारा; एव--निस्सन्देह; जीवेत--ब्राह्मण को जीवित रहना चाहिए;शिलैः--खेत से गिरा हुआ अन्न बीन करके; वा--अथवा; दोष--कमी; हक्‌ू--देख कर; तयो:--दोनों में से |

जो ब्राह्मण यह माने कि अन्यों के दान लेने से उसकी तपस्या, आध्यात्मिक प्रतिष्ठा तथा यशनष्ट हो जायेंगे, उसे चाहिए कि अन्य दो ब्राह्मण वृत्तियों से--वेद-ज्ञान की शिक्षा देकर तथा यज्ञसम्पन्न करके अपना भरण करे। यदि वह ब्राह्मण यह माने कि ये दोनों वृत्तियाँ भी उसकेआध्यात्मिक पद को क्षति पहुँचाती हैं, तो उसे चाहिए कि खेतों में गिरा अन्न ( शीला ) बीने औरअन्यों पर निर्भर न रहते हुए जीवन-निर्वाह करे।

ब्राह्मणस्य हि देहोयं क्षुद्रकामाय नेष्यते ।कृच्छाय तपसे चेह प्रेत्यानन्तसुखाय च ॥

४२॥

ब्राह्मणस्य--ब्राह्मण का; हि--निश्चय ही; देह:--शरीर; अयम्‌--यह; क्षुद्र--नगण्य; कामाय--इन्द्रियतृप्ति के लिए; न--नहीं;इष्यते--होता है; कृच्छाय--कठिन; तपसे--तपस्या के लिए; च-- भी; इह--इस संसार में; प्रेत्य--मर कर; अनन्त--असीम;सुखाय--सुख के लिए; च--भी ।

ब्राह्मण का शरीर क्षुद्र इन्द्रिय भोग के निमित्त नहीं होता, प्रत्युत वह कठिन तपस्या स्वीकारकरके मृत्यु के उपरान्त असीम सुख भोगेगा।

शिलोज्छवृत्त्या परितुष्टचित्तोधर्म महान्तं विरजं जुषाण: ।मय्यर्पितात्मा गृह एव तिष्ठन्‌नातिप्रसक्त: समुपैति शान्तिमू ॥

४३॥

शिल-उब्छ--अन्न बीनने की; वृत्त्या--वृत्ति द्वारा; परितुष्ट--पूर्णतया सन्तुष्ट; चित्त:--चेतना वाला; धर्मम्‌-धार्मिक सिद्धान्तोंको; महान्तम्‌--उदात्त तथा अतिथि-सत्कार करने वाला; विरजम्‌--भौतिक इच्छाओं से रहित; जुषाण:--अनुशीलन करते हुए;मयि--मुझमें; अर्पित--अर्पित; आत्मा--मन वाला; गृहे--घर में; एब--ही; तिष्ठन्‌--रहते हुए; न--नहीं; अति--अत्यधिक;प्रसक्त:--आसक्त, लिप्त; समुपैति--प्राप्त करता है; शान्तिमू--मोक्ष |

ब्राह्मण गृहस्थ को खेतों तथा मंडियों में गिरे अन्न के दाने बीन कर अपने मन में सन्तुष्ट रहनाचाहिए। उसे अपने को निजी इच्छा से मुक्त रखते हुए मुझमें लीन रह कर उदात्त धार्मिकसिद्धान्तों का अभ्यास करना चाहिए। इस तरह गृहस्थ के रूप में ब्राह्मण बिना आसक्ति के घर में ही रह सकता है और मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

समुद्धरन्ति ये विप्रं सीदन्तं मत्परायणम्‌ ।तानुद्धरिष्ये न चिरादापदभ्यो नौरिवार्णवात्‌ ॥

४४॥

समुद्धरन्ति--ऊपर उठाते हैं; ये--जो; विप्रमू--ब्राह्मण या भक्त को; सीदन्तम्‌--( गरीबी ) से कष्ट पा रहे; मत्‌-परायणम्‌--मेरेशरणागत; तान्‌--उठाने वालों को; उद्धरिष्ये--मैं ऊपर उठाऊँगा; न चिरातू--निकट भविष्य में; आपद्भ्य:--सारे कष्टों से;नौः--नाव; इब--सहृश; अर्णवात्‌--समुद्र से

जिस प्रकार जहाज समुद्र में गिरे हुए लोगों को बचा लेता है, उसी तरह मैं उन व्यक्तियों कोसारी विपत्तियों से तुरन्त बचा लेता हूँ जो दरिद्रता से पीड़ित ब्राह्मणों तथा भक्तों को उबार लेतेहैं।

सर्वा: समुद्धरेद्राजा पितेव व्यसनात्प्रजा: ।आत्मानमात्मना धीरो यथा गजपतिर्गजान्‌ ॥

४५॥

सर्वा:--सभी; समुद्धरेत्‌--ऊपर उठाना चाहिए; राजा--राजा; पिता--पिता; इब--सहृश; व्यसनात्‌--विपत्तियों से; प्रजा: --जनता; आत्मानम्‌--अपने आपको; आत्मन-- अपने आप; धीर:--निर्भीक; यथा--जिस तरह; गज-पतिः--गजराज; गजान्‌--अन्य हाथियों को।

जिस तरह हाथियों का राजा अपने झुंड के अन्य सारे हाथियों की रक्षा करता है और अपनीभी रक्षा करता है, उसी तरह निर्भीक राजा को पिता के समान अपनी सारी प्रजा को कठिनाई सेबचाना चाहिए और अपनी भी रक्षा करनी चाहिए।

एवंविधो नरपतिर्विमानेनार्कवर्चसा ।विधूयेहाशुभं कृत्स्नमिन्द्रेण सह मोदते ॥

४६॥

एवमू-विध: --इस प्रकार ( अपनी तथा प्रजा की रक्षा करते हुए ); नर-पति:--राजा; विमानेन--वायुयान से; अर्क-वर्चसा--सूर्य के समान तेजोमय; विधूय--हटाकर; इह--पृथ्वी पर; अशुभम्‌--पापों को; कृत्स्नमू--समस्त; इन्द्रेण --इन्द्र के; सह--साथ; मोदते-- भोग करता है।

जो राजा अपने राज्य से सारे पापों को हटाकर अपनी तथा सारी प्रजा की रक्षा करता है, वहनिश्चय ही इन्द्र के साथ सूर्य जैसे तेजवान विमान में सुख भोगता है।

सीदन्विप्रो वणिग्वृत्त्या पण्यैरेवापदं तरेत्‌ ।खड़्गेन वापदाक्रान्तो न श्ववृत््या कथञज्लनन ॥

४७॥

सीदन्‌--कष्ट उठाता; विप्र:--ब्राह्मण; वणिक्‌ू--बनिए की; वृत्त्या--वृत्ति द्वारा; पण्यैः --व्यापार के द्वारा; एब--निस्सन्देह;आपदम्‌ू--विपत्ति; तरेत्‌ू--पार करे; खड्गेन--तलवार से; वा--अथवा; आपदा--विपत्ति से; आक्रान्त:--पीड़ित; न--नहीं ;श्व--कुत्ते की; वृत्त्या--वृत्ति से; कथज्लन--जैसे भी हो

यदि कोई ब्राह्मण अपने नियमित कर्तव्यों द्वारा अपना निर्वाह नहीं कर पाता और कष्ट उठाताहै, तो वह व्यापारी की वृत्ति अपनाकर वस्तुएँ क्रय-विक्रय करके अपनी दीन अवस्था को सुधारसकता है। यदि वह व्यापारी के रूप में भी नितान्त दरिद्र बना रहता है, तो वह हाथ में तलवारलेकर क्षत्रिय-वृत्ति अपना सकता है। किन्तु किसी भी दशा में वह किसी सामान्य स्वामी कोस्वीकार करके कुत्ते जैसा नहीं बन सकता ( श्वान-वृत्ति )।

वैश्यवृत्त्या तु राजन्यो जीवेन्मूगययापदि ।चरेद्वा विप्ररूपेण न श्रवृत्त्या कथज्ञन ॥

४८ ॥

वैश्य--व्यापारी वर्ग की; वृत्त्या--वृत्ति द्वारा; तु--निस्सन्देह; राजन्य:--राजा; जीवेत्‌-- अपना जीवन-निर्वाह करे; मृगयया--शिकार करके; आपदि--आपात्‌ काल या विपत्ति में; चरेत्‌--कार्य करें; वा--अथवा; विप्र-रूपेण--ब्राह्मण के रूप में; न--कभी नहीं; श्र--कुत्ते की; वृत्त्या--वृत्ति द्वारा; कथज्ञन--किसी भी दशा में |

राजा या राजकुल का सदस्य, जो अपनी सामान्य वृत्ति द्वारा अपना निर्वाह नहीं कर सकता,वह वैश्य की तरह कर्म कर सकता है, शिकार करके जीवन चला सकता है अथवा ब्राह्मण कीतरह अन्यों को वैदिक ज्ञान की शिक्षा देकर काम कर सकता है। किन्तु किसी भी दशा में उसेशूद्र-वृत्ति नहीं अपनानी चाहिए।

शूद्रवृत्ति भजेद्वैश्य: शूद्र: कारुकटक्रियाम्‌ ।कृच्छान्मुक्तो न गह्मॉण वृत्ति लिप्सेत कर्मणा ॥

४९॥

शूद्र--शूद्रों की; वृत्तिमू--वृत्ति; भजेत्‌ू--स्वीकार करे; वैश्य:--वैश्य; शूद्र: --शूद्र; कारु--मजदूर का; कट--टोकरी तथाचटाई; क्रियाम्‌ू--बनाना; कृच्छात्‌--कठिन स्थिति से; मुक्त:--मुक्त हुआ; न--नहीं; गह्मॉण--निकृष्ट द्वारा; वृत्तिमू--जीविका;लिप्सेत-- कामना करे; कर्मणा--कार्य द्वारा

जो वैश्य अपना जीवन-निर्वाह न कर सकता हो, वह शूद्र-वृत्ति अपना सकता है और जोशूद्र उपयुक्त स्वामी न पा सके वह डलिया तथा चटाई बनाने जैसे सामान्य कार्यो में लग सकताहै। किन्तु समाज के वे सारे सदस्य जिन्होंने आपात्काल में निकृष्ट वृत्तियाँ अपनाई हों, उन्हेंविपत्ति बीत जाने पर इन कार्यो को तुरन्त त्याग देना चाहिए।

वेदाध्यायस्वधास्वाहाबल्यन्नाद्यर्यथोदयम्‌ ।देवर्षिपितृ भूतानि मद्गूपाण्यन्वहं यजेतू ॥

५०॥

वेद-अध्याय--वैदिक ज्ञान का अध्ययन; स्वधा--स्वधा मंत्र अर्पित करके; स्वाहा--स्वाहा मंत्र द्वारा; बलि-- भोजन देकर;अन्न-आद्यिः:--अन्न, जल इत्यादि देकर; यथा--के अनुसार; उदयम्‌--सम्पन्नता; देव--देवता; ऋषि--ऋषि; पितृ-- पूर्वजों;भूतानि--तथा सारे जीवों के; मत्‌-रूपाणि--मेंरे शक्ति के स्वरूपों; अनु-अहम्‌- प्रतिदिन; यजेत्‌--पूजा करे

गृहस्थ आश्रम वाले को नित्य वैदिक अध्ययन द्वारा ऋषियों की, स्वधा मंत्र द्वारा पूर्वजों की,स्वाहा मंत्र का उच्चारण करके देवताओं की, अपने हिस्से का भोजन देकर सारे जीवों की तथाअन्न एवं जल अर्पित करके मनुष्यों की पूजा करनी चाहिए। इस तरह देवताओं, ऋषियों, पूर्वजों,जीवों तथा मनुष्यों को मेरी शक्ति की अभिव्यक्तियाँ मानते हुए हर मनुष्य को नित्य ये पाँच यज्ञसम्पन्न करने चाहिए।

यहच्छयोपपन्नेन शुक्लेनोपार्जितेन वा ।धनेनापीडयन्भृत्यान््यायेनैवाहरेत्क्रतूनू ॥

५१॥

यहरच्छया--बिना प्रयास के; उपपन्नेन--अर्जित किया गया; शुक्लेन--अपनी ईमानदारीपूर्ण वृत्ति से; उपार्जितेन--प्राप्त कियाहुआ; वा--अथवा; धनेन-- धन से; अपीडयन्‌-- असुविधा उत्पन्न न करते हुए; भृत्यान्‌ू-- आश्लितों को; न्यायेन--उचित प्रकारसे; एब--निस्सन्देह; आहरेत्‌--सम्पन्न करे; क्रतूनू--यज्ञों तथा अन्य धार्मिक उत्सवों को।

गृहस्थ को चाहिए कि स्वेच्छा से प्राप्त धन से या ईमानदारी से सम्पन्न किये जाने वाले कार्यसे जो धन प्राप्त हो, उससे अपने आश्रितों का ठीक से पालन-पोषण करे। उसे अपने साधनों केअनुसार यज्ञ तथा अन्य धार्मिक उत्सव सम्पन्न करने चाहिए।

कुट॒म्बेषु न सज्जेत न प्रमाद्येत्कुटुम्ब्यपि ।विपश्षिन्नश्वरं पश्येददृष्टमपि हृष्टवत्‌ ॥

५२॥

कुट॒ुम्बेषु--पारिवारिक जनों से; न--नहीं; सज्जेत--लिप्त हो; न--नहीं; प्रमाद्मेत्‌--अहंकारी बने; कुटुम्बी--अनेक आश्रितपारिवारिक जनों वाला; अपि--यद्यपि; विपश्चित्‌ू-चतुर व्यक्ति; नश्वरम्‌-- क्षणभंगुर; पश्येत्‌ू--देखे; अद्ृष्टम्‌ू-- भावी पुरस्कारयथा स्वर्ग में वास; अपि--निस्सन्देह; दृष्ट-वत्‌--पहले से अनुभव किया गया जैसा।

अनेक आश्रित पारिवारिक जनों की देखरेख करने वाले गृहस्थ को न तो उनसे अत्यधिकलिप्त होना चाहिए, न ही अपने को स्वामी मान कर मानसिक रूप से असन्तुलित रहना चाहिए।बुद्धिमान गृहस्थ को समझना चाहिए कि सारा सम्भव सुख, जिसका वह पहले ही अनुभव करचुका होता है, क्षणभंगुर है।तात्पर्य : गृहस्थ व्यक्ति अपनी पत्नी की रक्षा करते, अपने बच्चों को आदेश देते, नौकरों, नाती-पोतों, घरेलू पशुओं इत्यादि का पालन-पोषण करते स्वामी की भाँति आचरण करता है। न ग्रगाद्येत्‌कुटुम्ब्यपि शब्द यह सूचित करते हैं कि यद्यपि मनुष्य अपने परिवार, नौकरों तथा मित्रों से घिरा हुआ पुत्रदाराप्तबन्धूनां सड्रम: पान्थसड्रम: ।अनुदेहं वियन्त्येते स्वप्नो निद्रानुगो यथा ॥

५३॥

पुत्र--बच्चे; दार--पली; आप्त--सम्बन्धीजन; बन्धूनाम्‌--तथा मित्रों के; सड्रम:--संगति, साथ साथ रहना; पान्थ--यात्रियोंकी; सड्भम: --संगति; अनु-देहम्‌--शरीर के प्रत्येक परिवर्तन सहित; वियन्ति--पृथक्‌ कर दि जाते हैं; एते--ये सारे;स्वण:--स्वण; निद्रा--नींद; अनुग:--घटित होने वाले; यथा--जिस तरह

बच्चों, पत्नी, सम्बन्धियों तथा मित्रों की संगति यात्रियों के लघु मिलाप जैसी है। शरीर केप्रत्येक परिवर्तन के साथ मनुष्य ऐसे संगियों से उसी तरह विलग हो जाता है, जिस तरह स्वप्नसमाप्त होते ही स्वप्न में मिली हुई सारी वस्तुएँ खो जाती हैं।

इत्थं परिमृशन्मुक्तो गृहेष्वतिथिवद्वसन्‌ ।न गृहैरनुबध्येत निर्ममो निरहड्डू त: ॥

५४॥

इत्थम्‌--इस प्रकार; परिमृशन्‌--गम्भीरतापूर्वक विचार करते हुए; मुक्त:--मुक्तात्मा; गृहेषु--घर पर; अतिथि-वत्‌--मेहमान कीतरह; वसन्‌--रहते हुए; न--नहीं; गृहैः--घर की परिस्थिति से; अनुबध्येत-- अपने को बँधाये; निर्मम: --स्वामित्व की भावनासे रहित; निरहड्डू तः--मिथ्या अभिमान से रहित।

वास्तविक स्थिति पर गम्भीरतापूर्वक विचार करते हुए मुक्तात्मा को चाहिए कि घर में एकमेहमान की तरह किसी स्वामित्व की भावना या मिथ्या अहंकार के बिना रहे। इस तरह वह घरेलूमामलों में नहीं फँसेगा।

कर्मभिर्गृहमेधीयैरिष्टा मामेव भक्तिमान्‌ ।तिष्ठेद्दनं बोषविशेत्प्रजावान्वा परिव्रजेतू ॥

५५॥

कर्मभि:--कर्मो द्वारा; गृह-मेधीयै:--पारिवारिक जीवन के लिए उपयुक्त; इष्टा--पूजा करके; माम्‌--मेरी; एब--निस्सन्देह;भक्ति-मान्‌ू--भक्त होते हुए; तिष्ठेत्‌--घर पर रहता रहे; वनम्‌--जंगल में; वा--अथवा; उपविशेत्‌ -- प्रवेश करे; प्रजा-वान्‌--जिम्मेदार सन्तान के होते हुए; वा--अथवा; परिब्रजेत्‌--संन्यास ग्रहण करे।

जो गृहस्थ भक्त अपने पारिवारिक कर्तव्यों को पूरा करते हुए मेरी पूजा करता है, वह चाहेतो घर पर ही रह सकता है अथवा किसी पवित्र स्थान में जा सकता है या यदि उसके कोईजिम्मेदार पुत्र हो, तो वह संन्यास ग्रहण कर सकता है।

स्त्वासक्तमतिगेहे पुत्रवित्तेषणातुर: ।स्त्रेण: कृपणधीर्मूढो ममाहमिति बध्यते ॥

५६॥

यः--जो; तु--किन्तु; आसक्त--लिप्त; मतिः--चेतना वाला; गेहे--अपने घर पर; पुत्र--सन्तान; वित्त--तथा धन के लिए;एषण--तीक्र इच्छा से; आतुर:ः--विचलित; स्त्रैण:--स्त्री-भोग के लिए कामुक; कृपण--कंजूस; धी:--बुद्धि वाला; मूढ:--मूर्ख; मम--हर वस्तु मेरी है; अहम्‌--मैं ही सबकुछ हूँ; इति--ऐसा सोच कर; बध्यते--बँध जाता है।

किन्तु जिस गृहस्थ का मन अपने घर में आसक्त है और जो इस कारण अपने धन तथासंतान को भोगने की तीव्र इच्छाओं से विचलित है, जो स्त्रियों के लिये काम-भावना से पीड़ितहै, जो कृपण मनोवृत्ति रखता है और जो मूर्खतावश यह सोचता है कि, ' प्रत्येक वस्तु मेरी हैऔर मैं ही सबकुछ हूँ' निस्सन्देह, वह व्यक्ति माया-जाल में फँसा हुआ है।

अहो मे पितरौ वृद्धौँ भार्या बालात्मजात्मजा: ।अनाथा मामृते दीना: कथं जीवन्ति दुःखिता: ॥

५७॥

अहो--ओह; मे--मेरे; पितरौ--माता-पिता; वृद्धौ--बूढ़े; भार्या--पत्नी; बाल-आत्म-जा--गोद में बालक लिए; आत्मा-जा;--तथा मेरे अन्य बच्चे; अनाथा:--जिनका कोई रक्षक नहीं हो; माम्‌--मेरे; ऋते--रहित; दीना:--दुखी; कथम्‌--इसजगत में किस तरह; जीवन्ति--जीवित रह सकते हैं; दुः:खिता:--दुख सहते हुए।

'हाय! मेरे वृद्ध माता-पिता तथा गोद में बालक वाली मेरी पत्नी तथा मेरे अन्य बच्चे! मेरेबिना उनकी रक्षा करने वाला कोई नहीं है और उन्हें असहा कष्ट उठाना पड़ेगा। मेरे गरीबसम्बन्धी मेरे बिना कैसे रह सकेंगे ? 'एवं गृहाशयाक्षिप्तहदयो मूढधीरयम्‌ ।अतृप्तस्ताननुध्यायन्मृतोन्ध॑ विशते तमः ॥

५८ ॥

एवम्‌--इस प्रकार; गृह--घरेलू परिस्थिति में; आशय--तीब्र इच्छा से; आक्षिप्त--अभिभूत; हृदय: --हृदय; मूढ--मूर्ख ;धी:--बुद्धि वाला; अयम्‌--यह व्यक्ति; अतृप्त: --असंतुष्ट; तानू--उनको ( परिवार वालों को ); अनुध्यायन्‌--निरन्तर सोचतेहुए; मृतः--मर जाता है; अन्धम्‌--अंधता, अज्ञान; विशते--प्रवेश करता है; तम:ः--अंधकार।

इस तरह अपनी मूर्खतापूर्ण मनोवृत्ति के कारण वह गृहस्थ, जिसका हृदय पारिवारिकआसक्ति से अभिभूत रहता है, कभी भी तुष्ट नहीं होता। फलस्वरूप अपने परिवार वालों कानिरन्तर ध्यान करते हुए वह मर जाता है और अज्ञान के अंधकार में प्रवेश करता है।

TO

← पिछला अध्याय · अगला अध्याय →

← उद्धव गीता की सूची