16. प्रभु का ऐश्वर्य
श्रीउद्धव उवाचत्वं ब्रह्म परमं साक्षादनाद्यन्तमपावृतम् ।सर्वेषामपि भावानां त्राणस्थित्यप्ययोद्धवः ॥
१॥
श्री-उद्धवः उबाच-- श्री उद्धव ने कहा; त्वम्--तुम हो; ब्रह्म--महानतम; परमम्--परम; साक्षात्--स्वयं; अनादि-- आदिरहित;अन्तम्ू--अन्तरहित; अपावृतम्--किसी वस्तु से सीमित नहीं; सर्वेषामू--समस्त; अपि--निस्सन्देह; भावानाम्--उपस्थितवस्तुओं में; त्राण--रक्षक; स्थिति--जीवनदाता; अप्यय--संहार; उद्धव: --तथा सृष्टि |
श्री उद्धव ने कहा : हे प्रभु, आप अनादि तथा अनन्त, साक्षात् परब्रह्म तथा अन्य किसी वस्तुसे सीमित नहीं हैं। आप सभी वस्तुओं के रक्षक तथा जीवनदाता, उनके संहार तथा सृष्टि हैं।
उच्चावचेषु भूतेषु दुर्जेयमकृतात्मभि: ।उपासते त्वां भगवन्याथातथ्येन ब्राह्मणा: ॥
२॥
उच्च-- श्रेष्ठ; अवचेषु--तथा निम्न; भूतेषु--सृजित वस्तुओं तथा जीवों में; दुर्जेयम्--समझ पाना कठिन; अकृत-आत्मभि:--अपतवित्रों द्वारा; उपासते--वे पूजा करते हैं; त्वामू--तुम्हारी; भगवन्--हे प्रभु; यथा-तथ्येन--वास्तव में; ब्राह्मणा: --वैदिकमतानुयायी।
हे प्रभु, यद्यपि अपवित्र लोगों के लिए यह समझ पाना कठिन है कि आप समस्त उच्च तथानिम्न सृष्टियों में स्थित हैं, किन्तु वे ब्राह्मण जो वैदिक मत को भलीभाँति जानते हैं आपकीवास्तविक रूप में पूजा करते हैं।
येषु येषु च भूतेषु भक्त्या त्वां परमर्षय: ।उपासीनाः प्रपद्यन्ते संसिद्धि्रि तद्वदस्व मे ॥
३॥
येषु येषु--जिन जिन; च--तथा; भूतेषु--स्वरूपों में; भक्त्या--भक्तिपूर्वक; त्वामू--तुमको; परम-ऋषय:--महर्षिगण;उपासीना:--पूजा करने वाले; प्रपद्यन्ते--प्राप्त करते हैं; संसिद्द्धिमू--सिद्द्धि; तत्--वह; वदस्व--कृपया कहें; मे--मुझसे |
कृपया मुझसे उन सिद्धियों को बतलायें जिन्हें महर्षिगण आपकी भक्तिपूर्वक पूजा द्वाराप्राप्त करते हैं। कृपया यह भी बतलायें कि वे आपके किन विविध रूपों की पूजा करते हैं।
गूढश्वरसि भूतात्मा भूतानां भूतभावन ।न त्वां पश्यन्ति भूतानि पश्यन्तं मोहितानि ते ॥
४॥
गूढः --गुप्त; चरसि--लगे रहते हैं; भूत-आत्मा--परमात्मा; भूतानामू--जीवों के; भूत-भावन--हे जीवों के पालनकर्ता; न--नहीं; त्वाम्ू--तुमको; पश्यन्ति--देखते हैं; भूतानि--जीव; पश्यन्तम्--देखते हुए; मोहितानि--मोह ग्रस्त; ते--तुम्हारे द्वारा ।
हे सर्वपालक प्रभु, यद्यपि आप सभी जीवों के परमात्मा हैं किन्तु आप गुप्त रहते हैं। इसतरह आपके द्वारा मोहग्रस्त बनाये जाकर सारे जीव आपको देख नहीं पाते यद्यपि आप उन्हेंदेखते रहते हैं।
या: काश्च भूमौ दिवि वै रसायांविभूतयो दिक्षु महाविभूते ।ता मह्ममाख्याह्मनुभावितास्तेनमामि ते तीर्थपदाड्प्रिपद्यम् ॥
५॥
या: काः--जो भी; च--भी; भूमौ--पृथ्वी पर; दिवि--स्वर्ग में; बै--निस्सन्देह; रसायाम्--नरक में; विभूतय:--शक्तियाँ;दिक्षु--सारी दिशाओं में; महा-विभूते--हे परमशक्तिमान; ताः--वे; महाम्--मुझसे; आख्याहि--कृपया बतलायें;अनुभाविता:-- प्रकट, व्यक्त; ते--तुम्हारे द्वारा; नमामि--मैं सादर नमस्कार करता हूँ; ते--तुम्हारे; तीर्थ-पद--समस्ततीर्थस्थलों के निवास; अड्घ्रि-पद्मम्--चरणकमलों पर।
हे परमशक्तिमान प्रभु, कृपा करके मुझे अपनी वे असंख्य शक्तियाँ बतलायें जिन्हें आपपृथ्वी में, स्वर्ग में, नरक में तथा समस्त दिशाओं में प्रकट करते हैं। मैं आपके उन चरणकमलोंको सादर नमस्कार करता हूँ जो समस्त तीर्थस्थलों के आश्रय हैं।
श्रीभगवानुवाचएवमेतदहं पृष्ट: प्रश्न प्रश्नविदां वर ।युयुत्सुना विनशने सपतरर्जुनेन वे ॥
६॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; एवम्--इस प्रकार; एतत्--यह; अहम्--मैं; पृष्ट:--पूछा गया; प्रश्नम्-- प्रश्न; प्रश्न-विदाम्-प्रश्न करने में पटु लोगों के; वर--तुम जो कि श्रेष्ठ हो; युयुत्सुना--युद्ध करने की इच्छा रखने वालों के द्वारा;विनशने--कुरुक्षेत्र के युद्ध में; सपत्नैः --अपने प्रतिद्वन्दियों या शत्रुओं समेत; अर्जुनेन--अर्जुन द्वारा; वै--निस्सन्देह
भगवान् ने कहा : हे प्रश्नकर्ताओं में श्रेष्ठ, अर्जुन ने अपने प्रतिद्वन्द्रियों से युद्ध करने कीइच्छा से कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में मुझसे यही प्रश्न पूछा था जिसे तुम पूछने जा रहे हो।
ज्ञात्वा ज्ञातिवधं गह्म॑म॒धर्म राज्यहेतुकम् ।ततो निवृत्तो हन्ताहं हतोयमिति लौकिकः ॥
७॥
ज्ञात्वा--जान कर; ज्ञाति--अपने सम्बन्धियों से; वधम्--वध; गहाम्--गर्हित, निन्दनीय; अधर्मम्ू--अधर्म; राज्य--राज्य प्राप्तकरने के लिए; हेतुकम्-- प्रेरणा; तत:ः--ऐसे कर्म से; निवृत्त:ः--अवकाशप्राप्त; हरता--मारने वाला; अहम्--मैं हूँ; हतः--माराहुआ; अयम्--सम्बन्धियों का यह दल; इति--इस प्रकार; लौकिक:--संसारी |
कुरुक्षेत्र युद्धस्थल में अर्जुन ने सोचा कि अपने सम्बन्धियों का वध करना अत्यन्त गहित एवंअधार्मिक कार्य है, जो राज्य प्राप्त करने की उसकी इच्छा से प्रेरित है। अतएव यह सोच कर किमैं अपने सम्बन्धियों का मारने वाला होऊँगा और वे विनष्ट हो जायेंगे, वह युद्ध से विरत होनाचाहता था। इस तरह वह संसारी चेतना से दुखी था।
स तदा पुरुषव्याप्रो युक्त्या मे प्रतिबोधितः ।अभ्यभाषत मामेवं यथा त्वं रणमूर्धनि ॥
८॥
सः--वह; तदा--उस समय; पुरुष-व्याप्र: --पुरुषों में बाघ; युक्त्या--तर्क द्वारा; मे--मेरे द्वारा; प्रतिबोधित:--सही ज्ञान दियागया; अभ्यभाषत-- प्रश्न किया; माम्--मुझसे; एवम्--इस प्रकार; यथा--जिस तरह; त्वमू--तुम; रण--युद्ध के; मूर्धनि--मोर्चे में |
उस समय मैंने पुरुषों में व्याप्र अर्जुन को तर्क द्वारा समझाया और युद्ध के मोर्चे में ही अर्जुनने मुझसे उसी तरह के प्रश्न किये थे जिस तरह तुम अब कर रहे हो।
अहमात्मोद्धवामीषां भूतानां सुहृदी श्वरः ।अहं सर्वाणि भूतानि तेषां स्थित्युद्धवाप्यय: ॥
९॥
अहमू--ैं; आत्मा--परमात्मा हूँ; उद्धव--हे उद्धव; अमीषाम्--इन; भूतानाम्--जीवों के; सु-हत्--शुभचिन्तक; ईश्वर:--परमनियन्ता; अहम्--मैं; सर्वाणि भूतानि--सभी जीव; तेषाम्--उनकी; स्थिति--पालन; उद्धव--सृष्टि; अप्यय:ः--तथा संहार
हे उद्धव, मैं समस्त जीवों का परमात्मा हूँ, अतएव मैं स्वाभाविक रूप से उनका हितेच्छु तथापरम नियन्ता हूँ। सारे जीवों का स्त्रष्टा, पालक तथा संहर्ता होने से मैं उनसे भिन्न नहीं हूँ।
अहं गतिर्गतिमतां काल: कलयतामहम् ।गुनाणां चाप्यहं साम्यं गुणिन्यौत्पत्तिको गुण: ॥
१०॥
अहमू--मैं; गति:--चरम गन्तव्य; गति-मताम्--उन्नति चाहने वालों के; काल:--काल, समय; कलयताम्--नियंत्रण रखनेवालों के; अहम्--मैं; गुनाणाम्-- प्रकृति के गुणों के; च-- भी; अपि--ही; अहम्--मैं; साम्यम्-- भौतिक सन्तुलन;गुणिनि--पवित्रों में; औत्पत्तिक:--स्वाभाविक; गुण:--गुण |
मैं उन्नति चाहने वालों का चरम गन्तव्य हूँ और जो नियंत्रण रखना चाहते हैं उनमें मैं कालहूँ। मैं भौतिक गुणों की साम्यावस्था हूँ और पतवित्रों में मैं स्वाभाविक गुण हूँ।
गुणिनामप्यहं सूत्रं महतां च महानहम् ।सूक्ष्माणामप्यहं जीवो दुर्जयानामहं मन: ॥
११॥
गुणिनाम्-गुणयुक्त वस्तुओं में; अपि--निस्सन्देह; अहम्--मैं; सूत्रमू--मुख्य सूत्र तत्त्व; महताम्-महान् वस्तुओं में; च--भी;महान्--समग्र भौतिक अभिव्यक्ति; अहमू--ैं; सूक्ष्मणाम्--सूक्ष्म वस्तुओं में; अपि--निस्सन्देह; अहम्--मैं; जीव:--जीव;दुर्जयानाम्-दुर्जेय वस्तुओं में; अहम्--मैं; मनः--मन।
गुणयुक्त वस्तुओं में मैं प्रकृति की मुख्य अभिव्यक्ति हूँ और महान् वस्तुओं में मैं समग्र सृष्टिहूँ। सूक्ष्म वस्तुओं में मैं आत्मा हूँ और दुर्जेय वस्तुओं में मैं मन हूँ।
हिरण्यगर्भो वेदानां मन्त्राणां प्रणवस्त्रिवृत् ।अक्षराणामकारोस्मि पदानि च्छन्दुसामहम् ॥
१२॥
हिरण्य-गर्भ:--भगवान् ब्रह्मा; वेदानाम्--वेदों में; मन्त्राणाम्--मंत्रों के; प्रणव: --»कार; त्रि-वृतू--तीन अक्षरों वाला;अक्षराणाम्--अक्षरों के; अ-कार:--अ अर्थात् प्रथम अक्षर; अस्मि--हूँ; पदानि--तीन पंक्ति का गायत्री मंत्र; छन््दसाम्--छन््दोंमें; अहम्ू-मैं।
वेदों में में आदि शिक्षक ब्रह्मा और समस्त मंत्रों में में तीन अक्षरों ( मात्राओं ) वाला ३४कारहूँ। अक्षरों में मैं प्रथम अक्षर अ ( अकार ) और पवित्र छन््दों में गायत्री मंत्र हूँ।
इन्द्रोडहं सर्वदेवानां वसूनामस्मि हव्यवाट् ।आदित्यानामहं विष्णू रुद्राणां नीललोहित: ॥
१३॥
इन्द्र:--इन्द्र; अहम्-मैं; सर्व-देवानाम्ू--सभी देवताओं में; वसूनाम्--वसुओं में; अस्मि--मैं; हव्य-वाट्ू--आहुतियों कावाहक, अग्नि देव; आदित्यानामू--अदिति-पुत्रों में; अहम्ू--मैं; विष्णु;--विष्णु; रुद्राणामू--रुद्रों में; नील-लोहितः --शिवजी।
मैं देवताओं में इन्द्र तथा बसुओं में अग्नि हूँ। मैं अदिति-पुत्रों में विष्णु तथा रुद्रों में भगवान्शिव हूँ।
ब्रह्मर्षणां भृगुरहं राजर्षीणामहं मनु: ।देवर्षीणां नारदोहं हविर्धान्यस्मि धेनुषु ॥
१४॥
बहा-ऋषीणाम्--सन्त ब्राह्मणों में; भूगु:ः-- भूगु मुनि; अहम्--मैं; राज-ऋषीणाम्-- सन्त राजाओं में; अहम्--मैं; मनु;--मनु;देव-ऋषीणाम्--सनन््त देवताओं में; नारद: --नारद मुनि; अहम्--मैं; हविर्धानी--कामधेनु; अस्मि--हूँ; धेनुषु--गौवों में ।
मैं ब्रह्मर्षियों में भूगु मुनि तथा राजर्षियों में मनु हूँ। देवर्षियों में मैं नारद मुनि तथा गौवों मेंकामशथेनु हूँ।
सिद्धेश्वराणां कपिल: सुपर्णोहं पतत्रिणाम् ।प्रजापतीनां दक्षोहं पितृणामहमर्यमा ॥
१५॥
सिद्ध-ईश्वराणाम्--सिद्धजनों में; कपिल:--कपिल भगवान्; सुपर्ण:--गरुड़; अहम्--मैं; पतत्रिणाम्-पक्षियों में;प्रजापतीनाम्--मनुष्यों के जनकों में; दक्षः--दक्ष; अहम्--मैं; पितृणाम्--पितरों में; अहम्ू--मैं; अर्यमा-- अर्यमा |
मैं सिद्धों में भगवान् कपिल तथा पक्षियों में गरुड़ हूँ। प्रजापतियों में मैं दक्ष तथा पितरों में अर्यमा हूँ।
मां विद्धयुद्धव दैत्यानां प्रह्मदमसुरेश्चरम् ।सोम॑ नक्षत्रौषधीनां धनेशं यक्षरक्षसाम् ॥
१६॥
माम्--मुझको; विद्द्धि--जानो; उद्धव--हे उद्धव; दैत्यानामू--दिति-पुत्रों या असुरों में; प्रहादम्--प्रह्माद महाराज; असुर-ईश्वरम--असुरों के ईश्वर; सोमम्--चन्द्रमा; नक्षत्र-ओषधीनाम्--नक्षत्रों तथा औषधियों में; धन-ईशम्--धन के स्वामी, कुबेर;यक्ष-रक्षसाम्--यक्षों तथा राक्षसों में |
हे उद्धव, तुम मुझे दिति के असुर पुत्रों में असुरों का साधु-स्वामी प्रह्मद महाराज जानो। मैंनक्षत्रों तथा औषधियों में उनका स्वामी चन्द्र हूँ और यक्षों तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुवेरहूँ।
ऐरावतं गजेन्द्राणां यादसां वरुण प्रभुम् ।तपतां झ्युमतां सूर्य मनुष्याणां च भूषतिम् ॥
१७॥
ऐरावतम्--ऐरावत नामक हाथी; गज-इन्द्राणाम्ू--राजसी हाथियों में; यादसाम्ू--जलचरों में; वरुणम्--वरुण; प्रभुम्--समुद्रोंका स्वामी; तपताम्--उष्मा उत्पन्न करने वाली वस्तुओं में; द्यु-मताम्-- प्रकाश करने वाली वस्तुओं में; सूर्यम्--सूर्य हूँ;मनुष्याणाम्-मनुष्यों में; च-- भी; भू-पतिम्--राजा |
मैं राजसी हाथियों में ऐशबत और जलचरों में समुद्रों का अधिपति वरुण हूँ। समस्त उष्मातथा प्रकाश प्रदान करने वाली वस्तुओं में मैं सूर्य और मनुष्यों में राजा हूँ।
उच्चै:श्रवास्तुरड्ञाणां धातूनामस्मि काझ्जननम् ।यमः संयमतां चाहम्सर्पाणामस्मि वासुकि: ॥
१८॥
उच्चै: श्रवा: --उच्चै श्रवा नामक घोड़ा; तुरड्ञणाम्--घोड़ों में; धातूनाम्ू-- धातुओं में; अस्मि--हूँ; काञ्ननम्--सोना; यम: --यमराज; संयमताम्--दंड देने वालों तथा दमन करने वालों में; च-- भी; अहम्--मैं; सर्पाणाम्ू--सर्पो में; अस्मि--हूँ;वासुकि:--वासुकि
घोड़ों में मैं उच्चै भ्रवा तथा धातुओं में स्वर्ण हूँ। दंड देने वालों तथा दमन करने वालों में मैंयमराज हूँ और सर्पों में वासुकि हूँ।
नागेन्द्राणामनन्तोहं मृगेन्द्र: श्रृड्धिदंष्टिणाम् ।आश्रमाणामहं तुर्यो वर्णानां प्रथमोइनघ ॥
१९॥
नाग-इन्द्राणामू--अनेक फनों वाले श्रेष्ठ सर्पों में; अनन्तः--अनन्तदेव; अहम्--मैं; मृग-इन्द्र: --सिंह; श्रृ्धि-दंष्टिणाम्--पैनेसींग तथा दाँत वाले पशुओं में; आश्रमाणामू--चारों आश्रमों में; अहम्--मैं; तुर्य:--चौथा, संन्यास; वर्णानामू--चार वृत्तिपरकवर्णो में; प्रथम:--प्रथम, ब्राह्मण; अनघ--हे निष्पाप।
हे निष्पाप उद्धव, श्रेष्ठ सर्पो में मैं अनन्तदेव हूँ और पैने सींग तथा दाँत वाले पशुओं में मैंसिंह हूँ। आश्रमों में मैं चौथा आश्रम अर्थात् संन्यास आश्रम हूँ और चारों वर्णों में प्रथम वर्णअर्थात् ब्राह्मण हूँ।
तीर्थानां स्त्रोतसां गड़ा समुद्र: सरसामहम् ।आयुधानां धनुरहं त्रिपुरध्नो धनुष्मताम् ॥
२०॥
तिर्थानाम्-तीर्थस्थानों में; स्नोतसाम्-सोतों या प्रवहमान वस्तुओं में; गड्भा--पवित्र गंगा; समुद्र: --समुद्र; सरसाम्--स्थिरजलाशयों में; अहम्--मैं; आयुधानाम्--हथियारों में; धनु;:--धनुष; अहम्--मैं; त्रि-पुर-घ्त:--शिवजी; धनु:-मताम्--धनुर्धारियों में
पवित्र तथा प्रवहमान वस्तुओं में मैं पवित्र गंगा हूँ और स्थिर जलाशयों में समुद्र हूँ। हथियारोंमें मैं धनुष और हथियार चलाने वालों में मैं त्रिपुरारि शिव हूँ।
धिष्ण्यानामस्म्यहं मेरुर्गहनानां हिमालय: ।वनस्पतीनामश्चवत्थ ओषधीनामहं यव: ॥
२१॥
धिष्ण्यानामू--आवास; अस्मि--हूँ; अहम्--मैं; मेर:--सुमेरु पर्वत; गहनानाम्--दुर्गम स्थानों में; हिमालय:--हिमालय;वनस्पतीनाम्--वृक्षों में; अश्वत्थ:--बरगद का वृक्ष; ओषधीनाम्ू--पौधों में; अहम्--मैं; यवः--जौ निवासस्थानों में मैं सुमेरु पर्वत हूँ और दुर्गम स्थानों में हिमालय हूँ।
वृक्षों में मैं पवित्र वट-वृक्ष तथा धान्यों में मैं जौ ( यव ) हूँ।
पुरोधसां वसिष्ठो हं ब्रह्मिष्ठानां बृहस्पति: ।स्कन्दोउहं सर्वसेनान्यामग्रण्यां भगवानज: ॥
२२॥
पुरोधसाम्--पुरोहितों में; वसिष्ठ: --वसिष्ठ मुनि; अहम्--मैं हूँ; ब्रह्रिष्ठानामू--वैदिक निष्कर्ष को मानने वालों में; बृहस्पति: --देवताओं के गुरु; स्कन्दः--कार्तिकेय; अहम्--मैं हूँ; सर्व-सेनान्यामू--समस्त सेनानियों में; अग्रण्याम्--पवित्र जीवन मेंअग्रणियों में; भगवान्ू--महापुरुष; अज: --ब्रह्मा |
पुरोहितों में मैं वसिष्ठ मुनि और वैदिक संस्कृति के अग्रगण्यों में बृहस्पति हूँ। मैं महान्सेनानियों में स्कन््द और उच्च जीवन बिताने वालों में महापुरुष ब्रह्मा हूँ।
यज्ञानां ब्रह्मयज्ञोहं ब्रतानामविहिंसनम् ।वाय्वग्न्यर्काम्बुवागात्मा शुचीनामप्यहं शुचि: ॥
२३॥
यज्ञानामू--यज्ञों में; ब्रह्म-यज्ञ:--वेदाध्ययन; अहम्--मैं हूँ; ब्रतानाम्-ब्रतों में; अविहिंसनम्--अहिंसा; वायु--वायु, हवा;अग्नि--आग; अर्क--सूर्य; अम्बु--जल; वाक्--तथा वाणी; आत्मा--साक्षात्; शुच्चीनाम्ू--पवित्र करने वालों में; अपि--निस्सन्देह; अहम्-मैं हूँ; शुचिः--शुद्ध
यज्ञों में मैं वेदाध्यपन और ब्रतों में अहिंसा हूँ। पवित्र करने वाली सभी वस्तुओं में मैं वायु,अग्नि, सूर्य, जल तथा वाणी हूँ।
योगानामात्मसंरोधो मन्त्रोस्मि विजिगीषताम् ।आन्वीक्षिकी कौशलानां विकल्प: ख्यातिवादिनाम् ॥
२४॥
योगानाम्ू--योगाभ्यास की आठ अवस्थाओं ( अष्टांग ) में; आत्म-संरोध: --अन्तिम अवस्था, समाधि जिसमें आत्मा मोह से मुक्तहो जाता है; मन्त्रः--कुशल सलाहकार; अस्मि--मैं हूँ; विजिगीषताम्ू--विजय चाहने वालों में; आन्वीक्षिकी-- आध्यात्मिकविज्ञान जिसके बल पर पदार्थ तथा आत्मा में अन्तर किया जा सकता है; कौशलानाम्--दक्ष विवेक की समस्त विधियों में;विकल्प: --अनुभूति वैविध्य; ख्याति-वादिनामू--निर्विशेषवादियों में |
मैं योग की आठ उत्तरोत्तर अवस्थाओं में से अन्तिम अवस्था--समाधि--हूँ जिसमें आत्मामोह से पूर्णतया पृथक् हो जाता है। विजय की आकांक्षा रखने वालों में मैं कुशल राजनीतिकसलाहकार हूँ और दक्ष विवेकी विधियों में मैं आत्मज्ञान हूँ जिसके द्वारा पदार्थ से आत्मा कोविभेदित किया जाता है। मैं समस्त निर्विशेषवादियों ( ज्ञानियों ) में अनु भूति-वैविध्य हूँ।
स्त्रीणां तु शतरूपाहं पुंसां स्वायम्भुवो मनु: ।नारायणो मुनीनां च कुमारो ब्रह्मचारिणाम् ॥
२५॥
स््रीणाम्-स्त्रियों में; तु--निस्सन्देह; शतरूपा--शतरूपा; अहम्--मैं हूँ; पुंसामू--पुरुषों में; स्वायम्भुव: मनु:--महान् प्रजापतिस्वायंभुव मनु; नारायण: --नारायण मुनि; मुनीनाम्--मुनियों में; च-- भी; कुमार: --सनत्कुमार; ब्रह्मचारिणाम्--ब्रह्मचारियोंमें,मैं
स्त्रियों में शतरूपा और पुरुषों में उसका पति स्वायम्भुव मनु हूँ। मुनियों में मैं नारायण हूँऔर ब्रह्मचारियों में सनत्कुमार हूँ।
धर्माणामस्मि सन्न्यास: क्षेमाणामबहिर्मति: ।गुह्यानां सुनृतं मौन मिथुनानामजस्त्वहम् ॥
२६॥
धर्माणाम्-धार्मिक सिद्धान्तों में; अस्मि--हूँ; सन््यास:--सन्यास, वैराग्य; क्षेमाणाम्--समस्त प्रकार की सुरक्षा में; अबहिः-मतिः--अन्तर की ( आत्मा की ) सतर्कता; गुह्मानाम्--सारे रहस्यों में; सुनृतम्--मधुर वाणी; मौनम्--मौन, चुप्पी;मिथुनानाम्ू-मिथुनरत युग्म; अज:--आदि प्रजापति, ब्रह्मा; तु--निस्सन्देह; अहम्--मैं हूँ
धार्मिक सिद्धान्तों में मैं संन्यास हूँ और समस्त प्रकार की सुरक्षा में अन्तस्थ नित्य आत्मा कीचेतना हूँ। रहस्यों में मैं मधुर वाणी तथा मौन हूँ तथा सम्भोगरत युम्मों में ब्रह्मा हूँ।
संवत्सरोस्म्यनिमिषामृतूनां मधुमाधवौ ।मासानां मार्गशीर्षोहं नक्षत्राणां तथाभिजित् ॥
२७॥
संवत्सर:--वर्ष; अस्मि--हूँ; अनिमिषाम्--काल के सतर्क चक्रों में; ऋतूनामू--ऋतुओं में; मधु-माधवौ--वसन्त; मासानाम्--महीनों में; मार्गशीर्ष :--मार्गशीर्ष, माघ ( नवम्बर-दिसम्बर ); अहम्--मैं हूँ; नक्षत्राणाम्--नक्षत्रों में; तथा--उसी प्रकार;अभिजित्--- अभिजित नामकसतर्क
कालचक्रों में मैं वर्ष हूँ और ऋतुओं में वसन््त हूँ। महीनों में मैं मार्गशीर्ष तथा नक्षत्रों मेंशुभ अभिजित हूँ।
अहं युगानां च कृतं धीराणां देवलोडसितः ।द्वैपायनोस्मि व्यासानां कवीनां काव्य आत्मवान् ॥
२८॥
अहमू--ैं; युगानाम्--युगों में; च-- भी; कृतम्--सत्ययुग; धीराणाम्--स्थिर मुनियों में; देवल:--देवल; असित:-- असित;द्वैषायन:--कृष्ण द्वैषायन; अस्मि--हूँ; व्यासानाम्--वेदों के संग्रहकर्ताओं में; कवीनाम्--विद्वानों में; काव्य:--शुक्राचार्य ;आत्म-वान्--आध्यात्मिक विज्ञान में दक्ष |
युगों में मैं सत्ययुग और स्थिर मुनियों में देवल तथा असित हूँ। वेदों का विभाजन करनेवालों में मैं कृष्ण द्वैषायन वेदव्यास हूँ और विद्वानों में मैं आध्यात्मिक विज्ञान का ज्ञाताशुक्राचार्य हूँ।
वासुदेवो भगवतां त्वं तु भागवतेष्वहम् ।किम्पुरुषानां हनुमान्विद्याश्राणां सुदर्शन: ॥
२९॥
वासुदेव:-- भगवान्; भगवताम्-- भगवान् नाम के अधिकारियों में; त्वम्ू--तुम; तु--निस्सन्देह; भागवतेषु--मेरे भक्तों में;अहमू-ैं हूँ; किम्पुरुषाणाम्--किम्पुरुषों में; हनुमान्ू--हनुमान; विद्याध्राणाम्--विद्याधरों में; सुदर्शन:--सुदर्शन |
भगवान् नाम के अधिकारियों में मैं वासुदेव हूँ तथा हे उद्धव, तुम निस्सन्देह भक्तों में मेराप्रतिनिधित्व करते हो। मैं किम्पुरुषों में हनुमान हूँ और विद्याधरों में सुदर्शन हूँ।
रत्नानां पद्दरागोउस्मि पद्यकोशः सुपेशसाम् ।कुशोस्मि दर्भजातीनां गव्यमाज्यं हविःष्वहम् ॥
३०॥
रलानाम्--रत्ों में; पढ्-राग:--लाल; अस्मि--हूँ; पद्य-कोश:ः --कमल की कली; सु-पेशसाम्--सुन्दर वस्तुओं में; कुश:--पवित्र कुश नामक तृण; अस्मि--हूँ; दर्भ-जातीनाम्ू--सभी प्रकार के तृणों में; गव्यम्--गायसे प्राप्त पदार्थ; आज्यम्--घी कीआहुति; हविःषु--हवियों में; अहम्--मैं हूँ।
रत्नों में मैं लाल हूँ और सुन्दर वस्तुओं में कमल की कली हूँ। सभी प्रकार के तृणों में मैंपवित्र कुश हूँ और आहुतियों में घी तथा गाय से प्राप्त होने वाली अन्य सामग्री हूँ।
व्यवसायिनामहं लक्ष्मी: कितवानां छलग्रह: ।तितिक्षास्मि तितिक्षूणां सत्त्वं सत््त्वतवामहम् ॥
३१॥
व्यवसायिनाम्-व्यापारियों में; अहम्--मैं हूँ; लक्ष्मी:-- लक्ष्मी; कितवानाम्ू--कपट करने वालों में; छल-ग्रह:--जुए का खेल;तितिक्षा--क्षमाशीलता; अस्मि--हूँ; तितिक्षूणाम्--सहिष्णुओं में; सत्त्वम्--अच्छाई; सत्त्व-वताम्--सतोगुणियों में; अहम्ू--मैंहूँ
व्यापारियों में मैं लक्ष्मी हूँ और कपट करने वालों में मैं जुआ ( द्यूत क्रीड़ा ) हूँ। सहिष्णुओं मेंमैं क्षमाशीलता और सतोगुणियों में सदगुण हूँ।
ओज: सहो बलवतां कर्माह विद्धि सात्वताम् ।सात्वतां नवमूर्तीनामादिमूर्तिरहें पर ॥
३२॥
ओज:--ऐन्द्रिय बल; सह:--तथा मानसिक बल; बलवताम्--बलवानों में; कर्म--भक्तिमय कर्म; अहम्--मैं; विद्धि--जानो;सात्वताम्-भक्तों में; सात्वताम्- भक्तों में; नव-मूर्तीनाम्ू--मेंरे नौ रूपों में पूजा करने वाला; आदि-मूर्तिः:--आदि रूप,वासुदेव; अहम्--मैं हूँ; परा--परम |
बलवानों में मैं शारीरिक तथा मानसिक बल हूँ और अपने भक्तों का भक्तिमय कर्म हूँ। मेरेभक्तगण मेरी पूजा नौ विभिन्न रूपों में करते हैं जिनमें से मैं आदि तथा प्रमुख वासुदेव हूँ।
विश्वावसु: पूर्वचित्तिर्गन्धर्वाप्सससामहम् ।भूधराणामहं स्थेर्य गन्धमात्रमहं भुवः ॥
३३॥
विश्वावसु:--विश्वावसु; पूर्वचित्ति:--पूर्वचित्ति; गन्धर्व-अप्सरसाम्--गन्धर्वों तथा अप्सराओं में; अहम्--मैं हूँ; भूधराणाम्--पर्वतों में; अहम्-- मैं हूँ; स्थैर्यम्--स्थिरता; गन्ध-मात्रम्--गन्ध की अनुभूति; अहम्--मैं हूँ; भुव:ः--पृथ्वी की
मैं गन्धर्वों में विश्वावसु तथा स्वर्गिक अप्सराओं में पूर्वचित्ति हूँ। मैं पर्वतों की स्थिरता तथापृथ्वी की सुगन्ध हूँ।
अपां रसश्न परमस्तेजिष्ठानां विभावसु: ।प्रभा सूर्येन्दुताराणां शब्दोहं नभसः पर: ॥
३४॥
अपाम्--जल का; रसः--स्वाद; च-- भी; परम: --सर्व श्रेष्ठ; तेजिष्ठानाम्ू-- अत्यन्त तेजवान वस्तुओं में; विभावसु:--सूर्य ;प्रभा--तेज; सूर्य--सूर्य का; इन्दु--चन्द्रमा; ताराणाम्ू--तथा तारों में; शब्दः -- ध्वनि; अहम्--मैं हूँ; नभस:ः--आकाश का;'परः--दिव्य |
मैं जल का मधुर स्वाद हूँ और चमकीली वस्तुओं में सूर्य हूँ। मैं सूर्य, चन्द्रमा तथा तारों काप्रकाश हूँ और आकाश में ध्वनित होने वाला दिव्य शब्द हूँ।
ब्रह्मण्यानां बलिरहं वीराणामहमर्जुन: ।भूतानां स्थितिरुत्पत्तिरहं वै प्रतिसड्क्रम: ॥
३५॥
ब्रह्मण्यानाम्ू--ब्राह्मण संस्कृति के उपासकों में; बलि:--विरोचन का पुत्र, बलि महाराज; अहमू--मैं हूँ; वीराणाम्--वीरों में;अहमू-मैं हूँ; अर्जुन: --अर्जुन; भूतानाम्ू--समस्त जीवों का; स्थितिः:--पालन-पोषण; उत्पत्ति:--उत्पत्ति; अहम्--मैं हूँ; बै--निस्सन्देह; प्रतिसड्क्रम: --संहार
ब्राह्मण संस्कृति के उपासकों में मैं विरोच्न-पुत्र बलि महाराज हूँ और वीरों में अर्जुन हूँ।निस्सन्देह, मैं समस्त जीवों की उत्पत्ति, स्थिति तथा संहार हूँ।
गत्युक्त्युत्सगोपादानमानन्दस्पर्शलक्षनम् ।आस्वादश्रुत्यवध्राणमहं सर्वेन्द्रियेन्द्रियम् ॥
३६॥
गति--पाँवों की हरकत ( चलना, दौना आदि ); उक्ति--वाणी; उत्सर्ग--वीर्यस्खलन; उपादानम्--हाथों से ग्रहण करना;आनन्द--जननांगों का भौतिक सुख; स्पर्श--स्पर्श; लक्षणम्--दृष्टि; आस्वाद--स्वाद; श्रुति--सुनना; अवप्राणम्--महक,सुगन्ध; अहम्--मैं हूँ; सर्व-इन्द्रिय--सारी इन्द्रियों के; इन्द्रियमू--उनके विषयों को अनुभव करने की शक्तिमैं पाँच कर्मेन्द्रयों--पाँव, वाणी, गुदा, हाथ तथा जननांग--के साथ ही पाँच ज्ञानेन्द्रियों--स्पर्श, दृष्टि, स्वाद, श्रवण तथा गन्ध--का कार्यकलाप हूँ।
मैं शक्ति भी हूँ जिससे प्रत्येक इन्द्रियअपने अपने इन्द्रिय-विषय का अनुभव करती है।
पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतिरहं महान् ।विकार: पुरुषोव्यक्त रज: सत्त्वं तमः परम् ।अहमेतत्प्रसड्ख्यानं ज्ञानं तत्त्वविनिश्चयः ॥
३७॥
पृथिवी--पृथ्वी का सूक्ष्म रूप, गंध; वायु:--वायु का सूक्ष्म रूप, स्पर्श आकाश:--आकाश का सूक्ष्म रूप, ध्वनि; आप:--जल का सूक्ष्म रूप, स्वाद; ज्योतिः--अग्नि का सूक्ष्म रूप, स्वरूप; अहम्--मिथ्या अहंकार; महान्--महत् तत्त्व; विकार:--सोलह तत्त्व ( पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मन ); पुरुष:--जीव; अव्यक्तम्--भौतिक प्रकृति; रज:--रजोगुण; सत्त्वम्--सतोगुण; तम:--तमोगुण; परम्--परमे श्वर; अहम्--मैं हूँ; एतत्--यह;प्रसड्ख्यानम्--उपर्युक्त; ज्ञाममू--उपर्युक्त तत्त्वों के लक्षणों का ज्ञान; तत्त्व-विनिश्चयः--हृढ़ संकल् पजो कि ज्ञान का फल है
मैं स्वरूप, स्वाद, गंध, स्पर्श तथा ध्वनि; मिथ्या अहंकार, महत् तत्त्व; पृथ्वी, जल, अग्नि,वायु तथा आकाश; जीव, भौतिक प्रकृति; सतो, रजो तथा तमोगुण; एवं दिव्य भगवान् हूँ। येसारी वस्तुएँ, इन सबों के लक्षण तथा इस ज्ञान से उत्पन्न हढ़ निश्चय भी मैं ही हूँ।
मयेश्वरेण जीवेन गुणेन गुणिना विना ।सर्वात्मनापि सर्वेण न भावो विद्यते क्वचित् ॥
३८ ॥
मया--मुझ; ईश्वरण --परमे श्वर से; जीवेन--जीव से; गुणेन--प्रकृति के गुणों से; गुणिना--महत् तत्त्व से; विना--रहित; सर्व-आत्मना--विद्यमान सबों की आत्मा; अपि--निस्सन्देह; सर्वेण--प्रत्येक वस्तु; न--नहीं; भाव:--उपस्थिति; विद्यते--है;क्वचित्--जो भीपरमेश्वर के रूप में
मैं जीव, प्रकृति के गुणों तथा महत्ू-तत्त्व का आधार हूँ। इस प्रकार मैंसर्वस्व हूँ और कोई भी वस्तु मेरे बिना विद्यमान नहीं रह सकती।
सड्ख्यानं परमाणूनां कालेन क्रियते मया ।न तथा मे विभूतीनां सृजतोण्डानि कोटिश: ॥
३९॥
सड्ख्यानम्--गणना, गिनती; परम-अणूनाम्--अत्यन्त छोटे कणों की; कालेन--कुछ समय बाद; क्रियते--कर ली जाय;मया--मेरे द्वारा; न--नहीं; तथा--उसी प्रकार से; मे--मेरे; विभूतीनाम्--ऐश्वर्यों के; सृजतः--मेरे द्वारा निर्मित; अण्डानि--ब्रह्माण्ड; कोटिश:--करोड़ों
भले ही मैं कुछ समय में ब्रह्माण्ड के समस्त अणुओं की गणना कर सकूँ, किन्तु असंख्यब्रह्माण्डों में प्रदर्शित अपने समस्त ऐ श्वर्यों की गणना मैं भी नहीं कर पाऊँगा।
तेज: श्री: कीर्तिरैश्वर्य हीस्त्याग: सौभगं भग: ।वीर्य तितिक्षा विज्ञानं यत्र यत्र स मेईशकः ॥
४०॥
तेज:--तेज; श्री:--सुन्दर, महत्त्वपूर्ण वस्तुएँ; कीर्ति:--यश; ऐश्वर्यम्--ऐश्वर्य; हीः--दीनता; त्याग:--वैराग्य; सौभगमू--मनतथा इन्द्रियों को प्रसन्न करने वाला; भग:--सौभाग्य; वीर्यम्--शक्ति; तितिक्षा--सहिष्णुता; विज्ञानम्--आध्यात्मिक ज्ञान; यत्रयत्र--जहाँ भी; सः--यह; मे--मेरा; अंशक:ः --अंश, विस्तार।
जो भी शक्ति, सौन्दर्य, यश, ऐश्वर्य, दीनता, त्याग, मानसिक आनन्द, सौभाग्य, शक्ति,सहिष्णुता या आध्यात्मिक ज्ञान हो सकता है, वह सब मेरे ऐश्वर्य का अंश है।
एतास्ते कीर्तिता: सर्वा: सड्क्षेपेण विभूतय: ।मनोविकारा एवैते यथा वाचाभिधीयते ॥
४१॥
एता:--ये; ते--तुमसे; कीर्तिता:--वर्णन किये गये; सर्वा:--सभी; सद्क्षेपेण --संक्षेप में; विभूतय:--आध्यात्मिक ऐश्वर्य;मनः--मन के; विकारा:--विकार; एव--निस्सन्देह; एते--ये; यथा--तदनुसार; वाचा--शब्दों से; अभिधीयते--प्रत्येक कावर्णन किया जाता है।
मैंने तुमसे संक्षेप में अपने सारे आध्यात्मिक ऐ श्वर्यों तथा अपनी सृष्टि के उन अद्वितीय भौतिकगुणों का भी वर्णन किया, जो मन से अनुभव किये जाते हैं और परिस्थितियों के अनुसारविभिन्न तरीकों से परिभाषित होते हैं।
वबाचं यच्छ मनो यच्छ प्राणान्यच्छेद्रियाणि च ।आत्मानमात्मना यच्छ न भूयः कल्पसेध्वने ॥
४२॥
वाचम्--वाणी को; यच्छ---संयम में रखो; मन: --मन को; यच्छ--संयम में रखो; प्राणान्ू--अपने श्वास को; यच्छ--संयम मेंरखो; इन्द्रियाणि--इन्द्रियों को; च--भी; आत्मानम्--बुद्धि को; आत्मना--विमल बुद्धि से; यच्छ--संयम में रखो; न--कभीनहीं; भूय: --फिर; कल्पसे--तुम नीचे गिरोगे; अध्वने--संसार के मार्ग पर |
अतएव अपनी वाणी पर संयम रखो, मन को दमित करो, प्राण-वायु पर विजय पाओ,इन्द्रियों को नियमित करो तथा विमल बुद्धि के द्वारा अपनी विवेकपूर्ण प्रतिभा को अपने वश मेंकरो। इस तरह तुम पुनः भौतिक जगत के पथ पर कभी च्युत नहीं होगे।
यो वै वाड्मनसी संयगसंयच्छन्धिया यतिः ।तस्य ब्रतं तपो दान स्त्रवत्यामघटाम्बुवत् ॥
४३॥
यः--जो; वै--निश्चय ही; वाकू-मनसी--वाणी तथा मन; संयक्--पूरी तरह; असंयच्छनू--नियंत्रण में न रखते हुए; धिया--बुद्धि से; यतिः--अध्यात्मवादी; तस्थ--उसका; ब्रतम्--ब्रत; तप:--तपस्या; दानम्--दान; स्त्रवति--बह जाता है; आम--कच्चे; घट--पात्र में; अम्बु-वत्--जल के समान।
जो योगी अपनी श्रेष्ठ बुद्धि द्वारा अपनी वाणी तथा मन पर पूरा नियंत्रण नहीं रखता, उसकेआध्यात्मिक ब्रत, तपस्या तथा दान उसी तरह बह जाते हैं जिस तरह कच्चे मिट्टी के घड़े से पानीबह जाता है।
तस्माद्ब्वो मनः प्राणान्नियच्छेन्मत्पपायण: ।मद्धक्तियुक्तया बुद्धया ततः परिसमाप्यते ॥
४४॥
तस्मात्ू--इसलिए; वच:--शब्द; मन:--मन; प्राणान्ू--तथा प्राणों को; नियच्छेत्--नियंत्रण में रखे; मत्-परायण: --मेरे प्रतिश्रद्धावान्; मत्--मुझ पर; भक्ति--भक्ति से; युक्तया--युक्त; बुद्ध --ऐसी बुद्धि से; ततः--इस प्रकार; परिसमाप्यते--जीवन-लक्ष्य पूरा करता है
मेरे शरणागत होकर मनुष्य को वाणी, मन तथा प्राण पर नियंत्रण रखना चाहिए और तबभक्तिमयी बुद्धि के द्वारा वह अपने जीवन-लक्ष्य को पूरा कर सकेगा।
