← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 9 की सूची
अध्याय नौ: अशुमान का राजवंश
9.9श्रीशुक उबाचअंशुमांश्व॒ तपस्तेपे गड्झानयनकाम्यया ।
काल महान्तंनाशक्नोत्ततः कालेन संस्थित: ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अंशुमान्--अंशुमान राजा ने; च--भी; तपः तेपे--तपस्या की; गड्ढा--गंगा नदी;आनयन-काम्यया--अपने पूर्वजों का उद्धार करने के लिए गंगा को इस भौतिक जगत में लाने की इच्छा से; कालमू--काल;महान्तम्--दीर्घकाल तक; न--नहीं; अशक्नोत्--सफल हुआ; तत:--तत्पश्चात्; कालेन--समय आने पर; संस्थित:--मर गया।
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : राजा अंशुमान ने अपने पितामह की तरह दीर्घकाल तकतपस्या की तो भी वह गंगा नदी को इस भौतिक जगत में न ला सका और उसके बाद कालक्रम मेंउसका देहान्त हो गया।
दिलीपस्तत्सुतस्तद्वदशक्त: कालमेयिवान् ।
भगीरथस्तस्य सुतस्तेपे स सुमहत्तप: ॥
२॥
दिलीप:--दिलीप; ततू-सुतः--अंशुमान का पुत्र; तत्-बत्--अपने पिता की भाँति; अशक्त:--गंगा को इस जगत में ला सकने मेंअसमर्थ; कालम् एयिवान्--काल का शिकार हुआ और मर गया; भगीरथ: तस्य सुत:ः--उसके पुत्र भगीरथ ने; तेपे--तपस्या की;सः--वह; सु-महत्--बहुत बड़ी; तप:ः--तपस्या।
अंशुमान की भाँति उसका पुत्र दिलीप भी गंगा को इस भौतिक जगत में ला पाने में असमर्थ रहाऔर कालक्रम में उसकी भी मृत्यु हो गई।
तत्पश्चात् दिलीप के पुत्र भगीरथ ने गंगा को इस भौतिकजगत में लाने के लिए अत्यन्त कठिन तपस्या की।
दर्शयामास तं देवी प्रसन्ना वरदास्मि ते ।
इत्युक्त: स्वमभिप्रायं शशंसावनतो नूप: ॥
३॥
दर्शबाम् आस--प्रकट हुई; तम्--उसको, भगीरथ को; देवी--माता गंगा; प्रसन्ना--अत्यन्त प्रसन्न होकर; वरदा अस्मि--मैं वर दूँगी;ते--तुमको; इति उक्त:--इस प्रकार सम्बोधित करके ; स्वम्--अपनी; अभिप्रायम्--इच्छा; शशंस--बतलायी; अवनत:--आदरपूर्वक झुककर प्रणाम करके; नृप:--राजा ( भगीरथ ) ने |
तत्पश्चात् माता गंगा राजा भगीरथ के समक्ष प्रकट होकर बोलीं, 'मैं तुम्हारी तपस्या से अत्यधिकप्रसन्न हूँ और तुम्हें मुँहमाँगा वर देने को तैयार हूँ।
गंगादेवी द्वारा इस प्रकार सम्बोधित हुए राजा नेउनके समक्ष अपना सिर झुकाया और अपना मन्तव्य बतलाया।
कोपि धारयिता वेगं॑ पतन्त्या मे महीतले ।
अन्यथा भूतलं भित्त्वा नृप यास्ये रसातलम् ॥
४॥
'कः--वह कौन व्यक्ति है; अपि--निस्सन्देह; धारयिता-- धारण कर सकता है; वेगम्--तरंगों के वेग को; पतन्त्या:--नीचे गिरती हुई;मे--मेरे; मही-तले--पृथ्वी पर; अन्यथा--अन्यथा; भू-तलम्--पृथ्वी की सतह; भित्त्वा-- भेदकर; नृप--हे राजा; यास्ये--नीचेचली जाऊँगी; रसातलम्--पाताल
माता गंगा ने उत्तर दिया: जब मैं आकाश से पृथ्वीलोक के धरातल पर गिरूँगी तो मेरा जलअत्यन्त वेगवान होगा।
इस वेग को कौन धारण कर सकेगा ?
यदि कोई मुझे धारण नहीं कर सकेगातो मैं पृथ्वी की सतह को भेदकर रसातल में अर्थात् ब्रह्माण्ड के पाताल क्षेत्र में चली जाऊँगी।
कि चाहं न भुव॑ यास्ये नरा मय्यामृजन्त्यघम् ।
मृजामि तदघं क्वाहं राजंस्तत्र विचिन्त्यताम् ॥
५॥
किम् च-- भी; अहम्--मैं; न--नहीं; भुवम्--पृथ्वीलोक को; यास्ये--जाऊँगी; नरा:--लोग; मयि-- मुझमें, मेंरे जल में;आमृजन्ति--धोते हैं; अधम्--पापकर्मों के फल; मृजामि--धो सकूँ; तत्ू--वह; अघम्--पाकर्मो के फलों का संग्रह; क्ब--किसको;अहमू--ैं; राजनू--हे राजा; तत्र--इस बात पर; विचिन्त्यताम्ू-- ध्यान से विचार करके निर्णय करो |
हे राजा, मैं पृथ्वीलोक पर नहीं उतरना चाहती क्योंकि सभी लोग अपने पापकर्मों के फलों कोधोने के लिए मुझमें स्नान करेंगे।
जब ये सारे पापकर्मो के फल मुझमें एकत्र हो जायेंगे तो मैं उनसेकिस तरह मुक्त हो सकूँगी ?
तुम इस पर ध्यानपूर्वक विचार करो।
श्रीभगीरथ उवाचसाधवो न्यासिन: शान्ता ब्रहिष्ठा लोकपावना: ।
हरन्त्यघं तेडड्रसज्भात्तेष्वास्ते हाघभिद्धरि: ॥
६॥
श्री-भगीरथ: उवाच-- भगीरथ ने कहा; साधव:--सन्तपुरुष; न्यासिन:--संन्यासीजन; शान्ता:--शान्त, भौतिक झंझटों से मुक्त;ब्रह्मिष्टा:--वैदिक शास्त्रों के अनुष्ठानों का पालन करने में पठु; लोक-पावना:--पतित अवस्था से लोगों का उद्धार करने में संलग्न;हरन्ति--दूर करेंगे; अधम्--पाप के फल; ते--तुम्हारा ( गंगा का ); अड़-सड्भात्--गंगाजल में नहाने से; तेषु--अपने में; आस्ते--है;हि--निस्सन्देह; अध-भित्--सारे पापों को हरने वाले; हरिः--भगवान्
भगीरथ ने कहा : जो भक्ति के कारण सन्त प्रकृति के हैं और भौतिक इच्छाओं से मुक्त संन््यासीबन चुके हैं, तथा जो वेदवर्णित अनुष्ठानों का पालन करने में पटु हैं और शुद्ध भक्त हैं वे सर्वदामहिमामंडित हैं और शुद्धाचरण वाले हैं तथा सभी पतितात्माओं का उद्धार करने में समर्थ हैं।
जबऐसे शुद्ध भक्त आपके जल में स्नान करेंगे तो अन्य लोगों के संचित पापों के फलों का निश्चय हीनिराकरण हो सकेगा क्योंकि ऐसे भक्तगण उन भगवान् को अपने हृदयों में सदा धारण करते हैं जोसारे पापों को दूर कर सकते हैं।
धारयिष्यति ते वेगं रुद्रस्त्वात्मा शरीरिणाम् ।
यस्मिन्नोतमिदं प्रोत॑ विश्व शाटीव तन्तुषु ॥
७॥
धारयिष्यति-- धारण करेगा; ते--तुम्हारे; वेगम्--तरंगों के वेग को; रुद्र: --शिवजी; तु--निस्सन्देह; आत्मा--परमात्मा;शरीरिणाम्--समस्त शरीरधारियों का; यस्मिन्ू--जिसमें; ओतम्--देशान्तर, ताना; इृदम्--यह सारा ब्रह्माण्ड; प्रोतम्--अंक्षाश बाना;विश्वम्--सारा विश्व; शाटी--वस्त्र; इब--सहश; तन्तुषु--डोरों में |
जिस प्रकार वस्त्र के सारे डोरे लम्बाई तथा चौई में गुँथे रहते हैं, उसी तरह यह समग्र विश्व अपनेअक्षांश-देशान्तरों सहित भगवान् की विभिन्न शक्तियों में स्थित है।
शिवजी भी भगवान् के अवतार हैंअतएव वे देहधारी जीव में परमात्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं।
वे अपने सिर पर आपकी वेगवान तरंगोंको धारण कर सकते हैं।
इत्युक्त्वा स नृपो देव॑ तपसातोषयच्छिवम् ।
कालेनाल्पीयसा राजंस्तस्येशश्चाश्वतुष्यत ॥
८॥
इति उक्त्वा--यह कहकर; सः--उस; नृप:--राजा ( भगीरथ ) ने; देवम्--शिव को; तपसा--तपस्या द्वारा; अतोषयत्--प्रसन्न किया;शिवम्--सर्वकल्याणकारी शिव को; कालेन--समय आने पर; अल्पीयसा--अल्पकालीन; राजनू्--हे राजा; तस्थ--उस ( भगीरथ )का; ईशः--शिवजी; च--निस्सन्देह; आशु--तुरन्त; अतुष्यत-तुष्ट हो गये |
ऐसा कहने के बाद भगीरथ ने तपस्या करके शिवजी को प्रसन्न किया।
हे राजा परीक्षित, शिवजीशीघ्र ही भगीरथ से तुष्ट हो गये।
तथेति राज्ञाभिहितं सर्वलोकहितः शिव: ।
दधारावहितो गड़ां पादपूतजलां हरे: ॥
९॥
तथा--एवमस्तु; इति--इस प्रकार; राज्ञा अभिहितम्--राजा द्वारा कहे जाने पर; सर्व-लोक-हित:ः--भगवान् जो सबों का कल्याणकरने वाले हैं; शिव:--भगवान् शिव ने; दधार--धारण किया; अवहित:ः--ध्यानपूर्वक; गड्भराम्ू--गंगा को; पाद-पूत-जलाम् हरे: --भगवान्
विष्णु के अँगूठे से निकलने के कारण, जिसका जल दिव्य रूप से शुद्ध है।
जब राजा भगीरथ शिवजी के पास गये और उनसे गंगा की वेगवान लहरों को धारण करने केलिए प्रार्थना की तो शिवजी ने एवमस्तु कहते हुए प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
तब उन्होंने अत्यन्तध्यानपूर्वक गंगा को अपने सिर पर धारण कर लिया क्योंकि भगवान् विष्णु के अँगूठे से निकलने केकारण गंगा का जल शुद्ध करने वाला है।
भगीरथः स राजर्षिनिन्ये भुवनपावनीम् ।
यत्र स्वपितृणां देहा भस्मीभूता: सम शेरते ॥
१०॥
भगीरथ:--भगीरथ; सः--वह; राज-ऋषि:--सन््त राजा; निन््ये--ले गया या लाया; भुवन-पावनीम्--सारे ब्रह्माण्ड का उद्धार करनेवाली गंगा को; यत्र--जिस स्थान पर; स्व-पितृणाम्--अपने पितरों के; देहा:--शरीर; भस्मीभूता:--जलकर राख हुए; सम शेरते--पड़े हुए थे
महान् एवं साधु राजा भगीरथ समस्त पतितात्माओं का उद्धार करने वाली गंगाजी को पृथ्वी परउस स्थान में ले गये जहाँ उनके पितरों के शरीर भस्म होकर पड़े हुए थे।
रथेन वायुवेगेन प्रयान्तमनुधावती ।
देशान्पुनन्ती निर्दग्धानासिश्ञत्सगरात्मजान्ू ॥
११॥
रथेन--रथ पर; वायु-वेगेन--हवा की गति से चलते हुए; प्रयान्तम्--आगे-आगे चलते महाराज भगीरथ; अनुधावती --पीछे-पीछेदौड़ती; देशान्ू--सारे देशों को; पुनन्ती--पवित्र बनाती; निर्दग्धानू--जलकर राख हुए; आसिशज्जत्ू--ऊपर जल छिड़का; सगर-आत्मजान्--सगर के पुत्रों को
भगीरथ एक तेज रथ पर सवार हुए और गंगा माता के आगे-आगे चले जो अनेक देशों को शुद्धकरती हुई उनके पीछे पीछे चलती हुईं उस स्थान पर पहुँचीं जहाँ सगर के पुत्र भगीरथ के पितृगण की भस्म पड़ी थी।
इस पर गंगा का जल छिड़का गया।
यज्जलस्पर्शमात्रेण ब्रह्मदण्डहता अपि ।
सगरात्मजा दिवं जग्मु: केवलं देहभस्मभि: ॥
१२॥
यत्-जल--जिसका पानी; स्पर्श-मात्रेण--केवल स्पर्श करने से; ब्रह्म-दण्ड-हता:--जो लोग ब्रह्म ( आत्म ) का अपमान करने केकारण दण्डित हुए; अपि--यद्यपि; सगर-आत्मजा: --सगर के पुत्र; दिवम्--स्वर्गलोक को; जग्मु:--गये; केवलम्--मात्र; देह-भस्मभि: --अपने भस्म हुए शरीरों की बची राख से।
चूँकि सगर महाराज के पुत्रों ने महापुरुष का अपमान किया था अतएव उनके शरीर का ताप बढ़गया था और वे जलकर भस्म हो गये थे।
किन्तु मात्र गंगाजल के छिड़कने से वे सभी स्वर्गलोक जानेके पात्र बन गये।
अतएवं जो लोग गंगा की पूजा करने के लिए गंगाजल का प्रयोग करते हैं उनकेविषय में क्या कहा जाए?
है?
भस्मीभूताड़ुसड्लेन स्वर्याता: सगरात्मजा: ।
कि पुनः श्रद्धया देवीं सेवन्ते ये धृतब्रता: ॥
१३॥
भस्मी भूत-अड़-- जलकर राख हुए शरीरों से; सड़्ेन--गंगाजल के स्पर्श से; स्व: याता:--स्वर्गलोक चले गये; सगर-आत्मजा:--सगर के पुत्र; किमू--क्या कहा जाय; पुनः--फिर; अ्रद्धया--श्रद्धा तथा भक्ति से; देवीम्--माता गंगा की; सेवन्ते--पूजा करते हैं;ये--जो व्यक्ति; धृत-ब्रता:--संकल्प लेकर |
भस्म शरीरों की राखों का गंगाजल के साथ सम्पर्क होने से सगर महाराज के पुत्र स्वर्गलोक चलेगये।
अतएव उन लोगों के विषय में क्या कहा जाय जो संकल्प लेकर श्रद्धापूर्वक गंगा मइया की पूजा करते हैं?
ऐसे भक्तों को मिलने वाले लाभ की मात्र कल्पना की जा सकती है।
न होतत्परमाश्चर्य स्वर्धुन्या यदिहोदितम् ।
अनन्तचरणाम्भोजप्रसूताया भवच्छिद: ॥
१४॥
न--नहीं; हि--निस्सन्देह; एतत्--यह; परम्ू--चरम; आश्चर्यम्--आश्चर्यजनक वस्तु; स्वर्धुन्या:--गंगाजल का; यत्--जो; इह--यहाँ पर; उदितम्ू--कहा गया है; अनन्त-- भगवान् का; चरण-अम्भोज---चरणकमलों से; प्रसूताया:--निकलने वाले का; भव-छिदः--भवबन्धन से छुड़ाने में समर्थ
चूँकि गंगामाता भगवान् अनन्तदेव के चरणकमल के अँगूठे से निकलती हैं, अतएव वे मनुष्यको भवबन्धन से मुक्त करने में सक्षम हैं।
इसलिए यहाँ पर उनके विषय में जो कुछ बतलाया जा रहाहै वह तनिक भी आश्चर्यजनक नहीं है।
सन्निवेश्य मनो यस्मिज्छुद्धया मुनयोउमला: ।
तैगुण्यं दुस्त्यजं हित्वा सद्यो यातास्तदात्मताम् ॥
१५॥
सन्निवेश्य--पूरा ध्यान देकर; मन: --मन; यस्मिन्ू--जिसमें; श्रद्धया-- श्रद्धा तथा भक्ति से; मुन॒यः--मुनिगण; अमला:--पापों केकल्मष से मुक्त हुए; त्रैगुण्यम्--प्रकृति के तीनों गुण; दुस्त्यजम्--जिनको छोड़ पाना अत्यन्त कठिन है; हित्वा--फिर भी त्याग करके;सद्यः--शीघ्र; याता: --प्राप्त किया; तत्-आत्मताम्-- भगवान् का आध्यात्मिक गुण, भगवत्स्वरूप |
मुनिगण भौतिक कामवासनाओं से सर्वथा मुक्त होकर, अपना ध्यान पूरी तरह भगवान् की सेवामें लगाते हैं।
ऐसे व्यक्ति बिना किसी कठिनाई के भवबन्धन से छूट जाते हैं और वे भगवान् काआध्यात्मिक गुण प्राप्त करके दिव्यपद को प्राप्त होते हैं।
भगवान् की यही महिमा है।
श्रुतो भगीरथाज्जज्ञे तस्थ नाभोपरोभवत् ।
सिन्धुद्वीपस्ततस्तस्मादयुतायुस्ततो भवत् ॥
१६॥
ऋतूपर्णों नलसखो यो श्वविद्यामयातन्नलातू ।
दत्त्वाक्षहददयं चास्मै सर्वकामस्तु तत्सुतम् ॥
१७॥
श्रुतः-- श्रुत नामक पुत्र; भगीरथात्--भगीरथ से; जज्ञे--उत्पन्न हुआ; तस्य-- श्रुत का; नाभ:--नाभ नामक; अपर: --अन्य,पूर्णवर्णित नाम से भिन्न; अभवत्--उत्पन्न हुआ; सिन्धुद्वीप: --सिन्धुद्वीप नाम से; ततः--नाभ से; तस्मात्--सिन्धुद्वीप से; अयुतायु: --अयुतायु नामक पुत्र; तत:--तत्पश्चात्; अभवत्--पैदा हुआ; ऋतूपर्ण:--ऋतूपर्ण नामक पुत्र; नल-सख:--नल का मित्र; य:--जो;अश्व-विद्याम्--धघोड़ों को वश में करने की कला; अयात्--अर्जित की; नलात्--नल से; दत्त्वा--बदले में देकर; अक्ष-हृदयम्--झूतक्रीड़ा का रहस्य; च--तथा; अस्मै--नल को; सर्वकाम:--सर्वकाम नामक; तु--निस्सन्देह; तत्-सुतमू--उसका ( ऋतूपर्ण )पुत्र |
भगीरथ का पुत्र श्रुत था और श्रुत का पुत्र नाभ था।
( यह नाभ पूर्ववर्णित नाभ से भिन्न है )।
नाभ का पुत्र सिंधुद्दीप हुआ, जिसका पुत्र अयुतायु था और अयुतायु का पुत्र ऋतूपर्ण हुआ जो नलराजा का मित्र बन गया।
ऋतूपर्ण ने नल राजा को द्यूतक्रीड़ा सिखलाई और बदले में उसने नल राजासे घोड़ों को वश में करना तथा उनकी देखरेख करना सीखा।
ऋतूपर्ण का पुत्र सर्वकाम था।
ततः सुदासस्तत्पुत्रो दमयन्तीपतिरनूपः ।
आहुर्मित्रसहं यं वै कल्माषाड्प्रिमुत क्वचित् ।
वसिष्ठशापाद्रक्षो भूदनपत्य: स्वकर्मणा ॥
१८॥
ततः--सर्वकाम से; सुदास:--सुदास उत्पन्न हुआ; तत्ू-पुत्र:--सुदास का पुत्र; दमयन्ती-पति:--दमयन्ती का पति; नृप:--राजा बना;आहु:ः--कहा जाता है; मित्रसहम्--मित्रसह; यम् वै-- भी; कल्माषाड्प्रिमू--कल्माषपाद से; उत--ज्ञात; क्वचित्--कभी; वसिष्ठ-शापात्--वसिष्ठ के शाप से; रक्ष:--मनुष्यभक्षक; अभूत्--बना; अनपत्य: --सन्तानहीन; स्व-कर्मणा--अपने पापपूर्ण कर्म से |
सर्वकाम के एक सुदास नामक पुत्र हुआ जिसका पुत्र सौदास कहलाया जो दमयन्ती का पतिथा।
कभी-कभी सौदास मित्रसह या कल्माषपाद के नाम से जाना जाता है।
अपने ही दुष्कर्मो के कारण मित्रसह निःसन््तान था और उसे वसिष्ठ द्वारा राक्षस बनने का शाप मिला।
श्रीराजोबाचकि निमित्तो गुरो: शाप: सौदासस्य महात्मन: ।
एतद्वेदितुमिच्छाम: कथ्यतां न रहो यदि ॥
१९॥
श्री-राजा उवाच--राजा परीक्षित ने कहा; किम् निमित्त:--किस कारण से; गुरो:--गुरु का; शाप:--शाप; सौदासस्य--सौदास का;महा-आत्मन:--महान् आत्मा का; एतत्--यह; वेदितुम्ू--जानने के लिए; इच्छाम:--इच्छा करता हूँ; कथ्यताम्--कृपया मुझसे कहें;न--नहीं; रहः--गोपनीय; यदि--यदि |
राजा परीक्षित ने कहा : हे शुकदेव गोस्वामी, सौदास के गुरु वसिष्ठ ने इस महापुरुष को शापक्यों दिया?
मैं इसे जानना चाहता हूँ।
यदि यह गोपनीय विषय न हो तो कृपया कह सुनायें।
श्रीशुक उबाचसौदासो मृगयां किद्िच्चरत्रक्षो जघान ह ।
मुमोच भ्रातरं सोथ गत: प्रतिचिकीर्षया ॥
२०॥
सद्धिन्तयन्नघं राज्ञ: सूदरूपधरो गृहे ।
गुरवे भोक्तुकामाय पक्त्वा निन्ये नरामिषम् ॥
२१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; सौदास:--राजा सौदास ने; मृगयाम्--शिकार के लिए; किश्ञित्--किसी समय;चरन्--घूमते हुए; रक्ष:--राक्षस, मानव भक्षी; जघान--मारा; ह-- था; मुमोच--छोड़ दिया; भ्रातरम्--उस राक्षस के भाई को;सः--उसने; अथ--तत्पश्चात्; गत: --गया; प्रतिचिकीर्षया--बदला लेने के लिए; सजञ्जिन्तयन्--उसने सोचा; अधम्--कुछ नुकसानकरने के लिए; राज्ञ:--राजा का; सूद-रूप-धर:--रसोइये का वेश धारण किया; गृहे--घर में; गुरवे--राजा के गुरु को; भोक्तु-कामाय--भोजन करने के लिए आया हुआ; पक्त्वा--भोजन बनाने के बाद; निन््ये--दिया; नर-आमिषम्--मनुष्य का मांस
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : एक बार सौदास जंगल में मृगया के लिए गया जहाँ उसने एकराक्षस को मार डाला, किन्तु राक्षस के भाई को क्षमा करके छोड़ दिया।
किन्तु उस भाई ने बदलालेने का निश्चय किया।
राजा को क्षति पहुँचाने के विचार से वह राजा के घर में रसोइया बन गया।
एक दिन जब राजा के गुरु वसिष्ठ मुनि को भोजन करने के लिए आमंत्रित किया गया तो इस राक्षसरसोइये ने उन्हें मनुष्य का मांस परोस दिया।
परिवेक्ष्यमाणं भगवान्विलोक्याभक्ष्यमञ्जसा ।
राजानमश् पत्क्द्धो रक्षो होव॑ भविष्यसि ॥
२२॥
परिवेक्ष्यमाणम्-- भोज्य पदार्थों का परीक्षण करते हुए; भगवान्--अत्यन्त शक्तिशाली; विलोक्य--देखकर; अभक्ष्यम्ू--खाने केलिए अनुपयुक्त; अज्ञसा--अपनी योग शक्ति से सरलतापूर्वक; राजानम्--राजा को; अशपत्--शाप दे दिया; क्रुद्ध:--अत्यन्तक्रोधित होकर; रक्ष:--मनुष्यभक्षी राक्षस; हि--निस्सन्देह; एवम्--इस प्रकार; भविष्यसि--हो जाओगे
वसिष्ठ मुनि, परोसे भोजन की परीक्षा करते हुए, अपने योगबल से समझ गये कि यह मनुष्य कामांस है अतएव अभक्ष्य है।
फलतः वे अत्यन्त क्रुद्ध हुए और उन्होंने तुरन्त ही सौदास को मनुष्यभक्षी( राक्षस ) बनने का शाप दे डाला।
रक्षःकृतं तद्विदित्वा चक्रे द्वादशवार्षिकम् ।
सोप्यपोझ्जलिमादाय गुरुं शप्तुं समुद्यतः ॥
२३॥
वारितो मदयन्त्यापो रुशतीः पादयोर्जहौ ।
दिश:ः खमवनीं सर्व पश्यज्जीवमयं नृप: ॥
२४॥
रक्ष:-कृतम्--राक्षस द्वारा ही किया हुआ; तत्--वह मांस का परोसा जाना; विदित्वा--जानकर; चक्रे --वसिष्ठ ने सम्पन्न किया;द्वादश-वार्षिकम्-प्रायश्चित्त के लिए बारह वर्ष की तपस्या; सः--वह सौदास; अपि-- भी; अप:-अज्जलिम्--अंजुली भर पानी;आदाय--लाकर; गुरुम्--अपने गुरु वसिष्ठ को; शप्तुम्ू-शाप देने के लिए; समुद्यतः--तैयार; वारित:--मना किये जाने पर;मदयन्त्या--अपनी पत्नी मदयन्ती द्वारा; अप:--जल; रुशतीः --मंत्रोच्चार से सशक्त; पादयो: जहौ--अपने पाँवों पर फेंका; दिशः --सारी दिशाएँ; खम्--आकाश में; अवनीम्--पृथ्वी पर; सर्वम्--सर्वत्र; पश्यनू--देखते हुए; जीव-मयम्--जीवों से पूर्ण; नृप:--राजाने
जब वसिष्ठ समझ गये कि यह मांस राजा द्वारा नहीं, अपितु राक्षस द्वारा ही परोसा गया है तोउन्होंने निर्दोष राजा को शाप देने के प्रायश्चित स्वरूप अपने को शुद्ध करने के लिए बारह वर्ष तकतपस्या की।
तब राजा सौदास ने अंजुली में पानी लेकर वसिष्ठ को शाप देने के लिए शापमंत्र काउच्चारण करना चाहा, किन्तु उसकी पत्नी मदयन्ती ने उसे ऐसा करने से रोका।
तब राजा ने देखा किदसों दिशाओं, आकाश तथा पृथ्वी पर सर्वत्र जीव ही जीव थे।
राक्षसं भावमापतन्नः पादे कल्माषतां गतः ।
व्यवायकाले ददृशे वनौकोदम्पती द्विजौ ॥
२५॥
राक्षसमू-मनुष्यभक्षक; भावमू--प्रवृत्ति; आपन्न: --प्राप्त करके; पादे--पाँव पर; कल्माषताम्--काला धब्बा; गत:--प्राप्त किया;व्यवाय-काले--मैथुन के समय; दहशे--देखा; वन-ओकः:--वनवासी; दम्-पती--पति-पत्नी; द्विजौ--ब्राह्मण |
इस तरह सौदास ने मानवभक्षी प्रवृत्ति अर्जित कर ली और उसके पाँव में एक काला धब्बा होगया जिससे वह कल्माषपाद कहलाया।
एक बार कल्माषपाद ने एक ब्राह्मण दम्पति को जंगल मेंसंभोगरत देखा।
क्षुधार्तो जगृहे विप्र॑ तत्पत्याहाकृतार्थवत् ।
न भवात्राक्षसः साक्षादिक्ष्वाकूणां महारथ: ॥
२६॥
मदयन्त्या: पतिर्वीर नाधर्म कर्तुमहसि ।
देहि मेपत्यकामाया अकृतार्थ पतिं द्विजम् ॥
२७॥
श्षुधा-आर्त:-- भूख से पीड़ित; जगृहे--पकड़ लिया; विप्रम्ू--ब्राह्मण को; तत्-पत्नी--उसकी पत्नी ने; आह--कहा; अकृत-अर्थ-वत्--असंतुष्ट गरीब तथा भूखा; न--नहीं; भवान्--आप; राक्षस:--राक्षस; साक्षात्- प्रत्यक्ष; इक्ष्वाकूणाम्--महाराज इक्ष्वाकु केवबंशजों में; महा-रथ:--महान् योद्धा; मदयन्त्या:--मदयन्ती का; पति:--पति; वीर--हे वीर; न--नहीं; अधर्मम्--अधर्म; कर्तुम्--करने के लिए; अ्हसि--तुम योग्य हो; देहि--उद्धार करिये; मे--मेरा; अपत्य-कामाया: --पुत्र प्राप्ति की इच्छा से; अकृत-अर्थम्--जिसकी इच्छा पूरी न हो; पतिम्--पति को; द्विजम्-ब्राह्मण
राक्षस-वृत्ति से प्रभावित होने तथा अत्यन्त भूखा रहने के कारण राजा सौदास ने ब्राह्मण कोपकड़ लिया।
तब ब्राह्मण की बेचारी पत्नी ने राजा से कहा : हे वीर, तुम असली राक्षस नहीं हो,प्रत्युत तुम महाराज इक्ष्वाकु के वंशज हो।
निस्सन्देह, तुम महान् योद्धा और मदयन्ती के पति हो।
तुम्हेंइस तरह पाप-कर्म नहीं करना चाहिए।
मुझे पुत्र प्राप्त करने की इच्छा है अतएव मेरे पति को छोड़दो, अभी उसने मुझे गर्भित नहीं किया है।
देहोयं मानुषो राजन्पुरुषस्याखिलार्थद: ।
तस्मादस्य वधो वीर सर्वार्थवध उच्यते ॥
२८ ॥
देह:--शरीर; अयम्--यह; मानुष: --मनुष्य का; राजन्--हे राजा; पुरुषस्थ--जीव का; अखिल--समष्टि; अर्थ-दः--लाभकारी;तस्मात्ू--इसलिए; अस्य--मेरे पति के शरीर की; वध:--हत्या; वीर--हे वीर; सर्व-अर्थ-बध:--सारे लाभप्रद अवसरों की हत्या;उच्यते--कहा जाता है।
हे राजा, हे वीर, यह मानव शरीर सबों के लाभ के निमित्त है।
यदि तुम इस शरीर का असमयवध कर दोगे तो तुम मानव जीवन के सारे लाभों की हत्या कर डालोगे।
एष हि ब्राह्मणो विद्वांस्तप:शीलगुणान्वित: ।
आरिराधयिषुर्रह्य महापुरुषसंज्ञितम् ।
सर्वभूतात्मभावेन भूतेष्वन्तर्हितं गुणै: ॥
२९॥
एष:--यह; हि--निस्सन्देह; ब्राह्मण: --योग्य ब्राह्मण; विद्वानू--वैदिक ज्ञान में पारंगत; तपः--तपस्या; शील--सदाचरण; गुण-अन्वितः--सारे सदगुणों से युक्त; आरिराधयिषु: --पूजा में लगने की इच्छा करता हुआ; ब्रह्म--परब्रह्म ; महा-पुरुष--महापुरुष कृष्ण;संज्ञितम्ू-के नाम से विख्यात; सर्व-भूत--सारे जीवों का; आत्म-भावेन--परमात्मा रूप; भूतेषु--हर जीव में; अन्तर्हितमू--हृदय केभीतर; गुणैः--गुणों के द्वारा |
यह ब्राह्मण विद्वान अत्यन्त योग्य, तपस्या में रत तथा समस्त जीवों के हृदय में वास करने वालेपरमात्मा परब्रह्म की पूजा करने के लिए परम उत्सुक है।
सोड<यं ब्रह्मर्षिवर्यस्ते राजर्षिप्रवराद्धिभो ।
कथर्मईति धर्मज्ञ वधं पितुरिवात्मज: ॥
३०॥
सः--वह ब्राह्मण; अयम्--यह; ब्रह्म-ऋषि-वर्य:--न केवल ब्राह्मण अपितु ऋषियों में श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि; ते--तथा तुमसे; राज-ऋषि-प्रवरात्--जो सारे राजर्षियों में सर्वश्रेष्ठ है; विभो--हे राज्य के स्वामी; कथम्--कैसे; अर्हति--योग्य है; धर्म-ज्ञ--हे धर्म के ज्ञाता;वधम्--वध; पितु:--पिता द्वारा; इब--सहृश; आत्मज:--पुत्र |
हे प्रभु, तुम धार्मिक सिद्धान्तों से पूर्णतया अवगत हो।
जिस तरह पुत्र कभी भी अपने पिता द्वारावध्य नहीं है, उसी तरह इस ब्राह्मण की राजा द्वारा रक्षा होनी चाहिए न कि वध।
तुम जैसे राजर् द्वाराइसका वध किस तरह उचित है ?
'तस्य साधोरपापस्य भ्रूणस्य ब्रह्मवादिन: ।
कथ॑ं वधं यथा बश्रोर्मन्यते सन््मतो भवान् ॥
३१॥
तस्य--उसका; साधो:--साधुपुरुष का; अपापस्थ--निष्पापी; भ्रूणस्थ-- भ्रूण का; ब्रह्म-वादिन: --वैदिक ज्ञान में पारंगत; कथम्--कैसे; वधम्--वध; यथा--जिस तरह; बश्नो:--गाय का; मन्यते--तुम सोचते हो; सत्-मतः--मान्य; भवान्ू--आप।
तुम विख्यात हो और दिद्वानों में पूजित हो।
तुम किस तरह इस ब्राह्मण का वध करने का साहसकर रहे हो जो साधु, निष्पाप तथा वैदिक ज्ञान में पटु है?
उसका वध करना गर्भ के भीतर भ्रूण नष्टकरने या गोवध के तुल्य होगा।
यद्ययं क्रियते भक्ष्यस्तर्हि मां खाद पूर्वतः ।
न जीविष्ये विना येन क्षणं च मृतकं यथा ॥
३२॥
यदि--यदि; अयम्--यह ब्राह्मण; क्रियते--स्वीकार किया जाता है; भक्ष्य:--खाद्य; तहि--तब तो; मामू--मुझको; खाद--खा लो;पूर्वतः --उसके पूर्व; न--नहीं; जीविष्ये--मैं जीवित रहूँगी; विना--बिना; येन--जिसके ( पति ); क्षणम् च--एक पल भी;मृतकम्--शव; यथा--सहृश |
मैं अपने पति के बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकती।
यदि तुम मेरे पति को खा जानाचाहते हो, तो अच्छा होगा कि पहले तुम मुझे खा लो क्योंकि मैं अपने पति के बिना मृतक तुल्य हूँ।
एवं करुणभाषिण्या विलपन्त्या अनाथवत् ।
व्याप्र: पशुमिवाखादत्सौदास: शापमोहितः ॥
३३॥
एवम्--इस प्रकार; करुण-भाषिण्या:--करुणभाव से बोलती वह ब्राह्मण की पतली; विलपन्त्या:--घोर विलाप करती; अनाथ-वत्--उस स्त्री के समान जिसका कोई रक्षक न हो; व्याप्र:--बाघ; पशुम्ू-- पशु; इब--सद्ृश; अखादत्--खा लिया; सौदास:--राजा सौदास ने; शाप--शाप से; मोहित:--शापित होने से
वसिष्ठ के शापवश राजा सौदास उस ब्राह्मण को निगल गया, जिस तरह कोई बाघ अपने शिकारको निगल जाता है।
यद्यपि ब्राह्मणपती ने अत्यन्त कातरभाव से विनय की, किन्तु उसके विलाप सेभी सौदास नहीं पसीजा।
ब्राह्मणी वीक्ष्य दिधिषुं पुरुषादेन भक्षितम् ।
शोच्न्त्यात्मानमुर्वीशमशपत्कुपिता सती ॥
३४॥
ब्राह्मणी--ब्राह्मण पत्नी; वीक्ष्य--देखकर; दिधिषुम्--गर्भाधान के लिए उद्यत पति को; पुरुष-अदेन--मनुष्यभक्षक ( राक्षस ) द्वारा;भक्षितमू--खाया जाकर; शोचन्ती -- अत्यधिक विलाप करती; आत्मानम्--अपने लिए; उर्वीशम्--राजा को; अशपत्--शाप देदिया; कुपिता--वृद्धा; सती--सती ने
जब ब्राह्मण की सती पत्नी ने देखा कि उसका पति, जो गर्भाधान के लिए उद्यत ही था, उसमनुष्यभक्षक द्वारा खा लिया गया तो वह शोक तथा विलाप से अत्यधिक सन्तप्त हो उठी।
इस तरहउसने क्रोध में आकर राजा को शाप दे दिया।
यस्मान्मे भक्षित: पाप कामार्ताया: पतिस्त्वया ।
तवापि मृत्युराधानादकृतप्रज्ञ दशित: ॥
३५॥
अस्मात्--चूँकि; मे--मेरा; भक्षित:--खाया गया; पाप--हे पापी; काम-आर्ताया:--कामेच्छा से विरहित स्त्री का; पति:ः--पति;त्वया--तुम्हारे द्वारा; तब--तुम्हारी; अपि-- भी ; मृत्यु:--मृत्यु; आधानात्ू--गर्भाधान करते समय; अकृत-प्रज्ञ--ओरे मूर्ख धूर्त;दर्शितः--तुमको शाप दिया जाता है।
ओरे मूर्ख पापी, चूँकि तूने मेरे पति को तब निगला जब मैं कामेच्छा से पीड़ित और गर्भाधान केलिए लालायित थी अतएव मैं तुझे भी तभी मरते देखना चाहती हूँ जब तू अपनी पत्ली में गर्भाधानकरने को उद्यत हो।
दूसरे शब्दों में, जब भी तू अपनी पत्नी से संभोग करना चाहेगा तू मर जाएगा।
एवं मित्रसहं शप्त्वा पतिलोकपरायणा ।
तदस्थीनि समिद्धेग्नौ प्रास्य भर्तुर्गतिं गता ॥
३६॥
एवम्--इस प्रकार; मित्रसहम्--राजा सौदास को; शप्त्वा--शाप देकर; पति-लोक-परायणा--अपने पति के साथ जाने को उद्यत;ततू-अस्थीनि--अपने पति की हड्डियों को; समिद्धे अग्नौ--जलती अग्नि में; प्रास्य--रखकर; भर्तु:ः--अपने पति के; गतिम्--गन्तव्यको; गता--वह भी चली गई।
इस प्रकार ब्राह्मणपत्नी ने राजा सौदास को, जो मित्रसह के नाम से विख्यात है, शाप दे डाला।
तत्पश्चात् अपने पति के साथ जाने के लिए सन्नद्ध उसने पति की अस्थियों में आग लगा दी, स्वयं वहउसमें कूद पड़ी और पति के साथ-साथ उसी गन्तव्य को प्राप्त हुई।
विशापो द्वादशाब्दान्ते मैथुनाय समुद्यतः ।
विज्ञाप्य ब्राह्मणीशापं महिष्या स निवारित: ॥
३७॥
विशाप:--शाप से छूटा; द्वादश-अब्द-अन्ते--बारह वर्ष बाद; मैथुनाय-- अपनी पत्नी के साथ मैथुन करने के लिए; समुद्यतः--जबसौदास तैयार था; विज्ञाप्प--याद दिलाते हुए; ब्राह्मणी-शापम्--ब्राह्मणी द्वारा दिया गया शाप; महिष्या--रानी द्वारा; सः--वह( राजा ); निवारित:--रोक लिया गया।
बारह वर्ष बाद जब राजा सौदास वसिष्ठ द्वारा दिये गये शाप से मुक्त हुआ तो उसने अपनी पत्नीके साथ सम्भोग करना चाहा।
किन्तु रानी ने उसे ब्राह्मणी द्वारा दिये गये शाप का स्मरण कराया।
इसतरह उसे सम्भोग करने से रोक दिया।
अत ऊर्ध्व॑ स॒ तत्याज स्त्रीसुखं कर्मणाप्रजा: ।
वसिष्ठस्तदनुज्ञातो मदयन्त्यां प्रजामधात् ॥
३८॥
अतः--इस प्रकार से; ऊर्ध्वमू--निकट भविष्य में; सः--उस राजा ने; तत्याज--छोड़ दिया; स्त्री-सुखम्--मैथुन-सुख; कर्मणा--भाग्य द्वारा; अप्रजा: --निस्सन्तान रहता रहा; वसिष्ठ:--ऋषि वसिष्ठ ने; तत्-अनुज्ञात:--राजा की अनुमति से पुत्र उत्पन्न करने के लिए;मदयन्त्यामू--राजा सौदास की पली मदयन्ती के गर्भ में; प्रजामू--शिशु; अधात्--उत्पन्न किया।
इस प्रकार आदिष्ट होने पर राजा ने भावी संभोग-सुख त्याग दिया और भाग्यवश निस्सन्तानरहता रहा।
बाद में राजा की अनुमति से ऋषि वसिष्ठ ने मदयन्ती के गर्भ से एक शिशु उत्पन्न किया।
सा वै सप्त समा गर्भमबिभ्रन्न व्यजायत ।
जघ्नेएमनोदर तस्या: सोश्मकस्तेन कथ्यते ॥
३९॥
सा--वह रानी मदयन्ती; वै--निस्सन्देह; सप्त--सात; समा:--वर्ष; गर्भम्ू--गर्भ को; अबिभ्रत्ू-- धारण किये रही; न--नहीं;व्यजायत--जन्म दिया; जघ्ने-- प्रहार किया; अश्मना--पत्थर से; उदरम्--उदर पर; तस्या:--उसके; सः--पुत्र; अश्मक:--अश्मक;तेन--इसके कारण; कथ्यते--कहलाया।
मदयन्ती सात वर्षो तक बालक को गर्भ में धारण किये रही और उसने बच्चे को जन्म नहीं दिया।
अतएबव वसषिष्ठ ने एक पत्थर से उसके पेट पर प्रहार किया जिससे बालक उत्पन्न हुआ।
फलस्वरूपबच्चे का नाम अश्मक ( पत्थर से उत्पन्न ) पड़ा।
अश्मकाद्वालिको जज्ञे यः स्त्रीभिः परिरक्षित: ।
नारीकवच इत्युक्तो निःक्षत्रे मूलकोभवत् ॥
४०॥
अश्मकात्---अश्मक से; बालिक:--बालिक नामक पुत्र; जज्ञे--उत्पन्न हुआ; यः--जो; स्त्रीभि:--स्त्रियों द्वारा; परिरक्षित:--रक्षाकिया गया; नारी-कवचः --स्त्रियों की ढाल पहने; इति उक्त:--इस तरह से विख्यात; निःक्षत्रे-- क्षत्रियविहीन होने पर ( क्योंकिपरशुराम ने क्षत्रियों को मार डाला था ); मूलक:--श्षत्रियों का जनक, मूलक; अभवत्--बन गया |
अश्मक से बालिक उत्पन्न हुआ।
चूँकि स्त्रियों से घिरा रहने के कारण बालिक परशुराम के क्रोधसे बच गया था अतएव वह नारीकवच कहलाया।
जब परशुराम ने सरे क्षत्रियों का विनाश कर दियातो बालिक अन्य क्षत्रियों का जनक बना।
इसीलिए वह मूलक अर्थात् क्षत्रिय वंश का मूलकहलाया।
ततो दशरथस्तस्मात्पुत्र ऐडविडिस्ततः ।
राजा विश्वसहो यस्य खट्वाडुश्चक्रवर्त्यभूत् ॥
४१॥
ततः--बालिक से; दशरथ: --दशरथ; तस्मात्--उससे; पुत्र: --पुत्र; ऐडविडि: --ऐडविडि; ततः--उससे; राजा विश्वसह:--सुप्रसिद्धराजा विश्वसह उत्पन्न हुआ; यस्य--जिसके; खट्वाड़:--खट्वांग नामक राजा; चक्रवर्ती--सम्राट; अभूत्--बना |
बालिक का पुत्र दशरथ हुआ, दशरथ का पुत्र ऐडविडि तथा ऐडविडि का पुत्र राजा विश्वसहहुआ।
विश्वसह का पुत्र सुप्रसिद्ध महाराज खट्वांग था।
यो देवैरथिंतो दैत्यानवधीद्युधि दुर्जय: ।
मुहूर्तमायुर्ज्ात्वैत्य स्वपुरं सन्दधे मन: ॥
४२॥
यः--राजा खट्वांग ने; देवैः--देवताओं द्वारा; अर्थित:-- प्रार्थना किए जाने पर; दैत्यानू--असुरों को; अवधीत्--मार डाला; युधि--युद्ध में; दुर्जय:--अत्यन्त भीषण; मुहूर्तम्--एक पल के लिए; आयु:--उप्र; ज्ञात्वा--जानकर; एत्य--पहुँचा; स्व-पुरम्--अपने घरमें; सन्दधे--स्थिर कर लिया; मन:--मन को ।
राजा खट्वांग किसी भी युद्ध में दुर्जेय था।
असुरों के विरुद्ध युद्ध करने के लिए देवताओं द्वाराप्रार्थना करने पर उसने विजय प्राप्त की और एक ही मनुष्य जन्म में देवताओं ने प्रसन्न होकर उसे वरदेना चाहा।
जब राजा ने उनसे अपनी आयु के विषय में पूछा तो उसे बतलाया गया कि केवल एकमुहूर्त शेष है।
अतएव उसने तुरन्त अपने घर जाकर भगवान् के चरणकमलों में अपना मन लगाया।
न मे ब्रह्मकुलात्प्राणा: कुलदैवान्न चात्मजा: ।
न श्रियो न मही राज्यं न दाराश्चातिवललभा: ॥
४३॥
न--नहीं; मे--मेरा; ब्रह्म-कुलात्--ब्राह्मण वृन्द की अपेक्षा; प्राणा:--प्राण; कुल-दैवात्--मेरे कुल द्वारा पूज्य पुरुषों की अपेक्षा;न--नहीं; च-- भी; आत्मजा:--पुत्र तथा पुत्रियाँ; न--न तो; थ्रिय:--ऐश्वर्य; न--न तो; मही--पृथ्वी; राज्यम्ू--राज्य; न--न तो;दाराः:--पत्नी; च-- भी; अति-वल्लभा:--अतत्यन्त प्रिय |
महाराज खट्वांग ने सोचा: ब्राह्मण संस्कृति तथा मेरे कुलपूज्य ब्राह्मणों की अपेक्षा मेरा जीवनभी मुझे अधिक प्रिय नहीं है।
तो फिर मेरे राज्य, भूमि, पत्नी, सन््तान तथा ऐश्वर्य के विषय में क्याकहा जा सकता है?
मुझे ब्राह्मणों से अधिक प्रिय कुछ भी नहीं है।
न बाल्येपि मतिर्महामधर्मे रमते क्वचित् ।
नापश्यमुत्तमएलोकादन्यत्किञ्ञन वस्त्वहम् ॥
४४॥
न--नहीं; बाल्ये--बचपन में; अपि--निस्सन्देह; मतिः--आकर्षण; महाम्ू--मुझको; अधर्मे --अधर्म में; रमते--भोगता है;क्वचित्--कभी भी; न--न तो; अपश्यम्--देखा; उत्तमएलोकात्-- भगवान् की अपेक्षा; अन्यत्ू--कोई अन्य वस्तु; किज्ञन--कोई;वस्तु--वस्तु; अहम्-मैंने |
अपने बचपन में भी मैं नगण्य वस्तुओं या अधार्मिक सिद्धान्तों के प्रति कभी आकृष्ट नहीं हुआ।
मुझे भगवान् से बढ़कर तथ्यपूर्ण अन्य कोई वस्तु नहीं मिल पाई।
देवै: कामवरो दत्तो महां त्रिभुवनेश्वरै: ।
न वृणे तमहं काम भूतभावनभावन: ॥
४५॥
देवैः:--देवताओं के द्वारा; काम-वरः--इच्छित वर; दत्त:--दिया; महाम्--मुझको; त्रि-भुवन-ई श्रै:-- तीनों जगतों के रक्षक,देवताओं द्वारा ( जो इस लोक में चाहें तो कुछ भी कर सकते हैं ); न वृणे--स्वीकार नहीं किया; तम्--उस; अहम्--मैंने; कामम्--इस जगत के भीतर की प्रत्येक इच्छित वस्तु को; भूतभावन-भावन: -- भगवान् में पूर्णतया निमग्न हुआ ( अतएव किसी भी पदार्थ मेंरुचि न रखने वाला )
तीनों लोकों के निदेशक देवतागण मुझे इच्छित वर देना चाहते थे, किन्तु मुझे उनके वर नहींचाहिए थे क्योंकि मेरी रुचि भगवान् में है जिन्होंने इस संसार की सारी वस्तुओं को बनाया है।
मेरीरुचि भौतिक वरों की अपेक्षा भगवान् में कहीं अधिक है।
ये विक्षिप्तेन्द्रियधियो देवास्ते स्वहृदि स्थितम् ।
न विन्दन्ति प्रियं शश्वदात्मानं किमुतापरे ॥
४६॥
ये--जो महापुरुष; विक्षिप्त-इन्द्रिय-धिय:--जिनकी इन्द्रियाँ, मन तथा बुद्धि सदैव भौतिक अवस्थाओं के कारण विश्लुब्ध रहती हैं;देवा:--देवताओं की तरह; ते--ऐसे व्यक्ति; स्व-ह॒दि--अपने हृदय में; स्थितम्--स्थित; न--नहीं; विन्दन्ति--जानते हैं; प्रियम्--अत्यन्त प्रिय; शश्वत्--निरन्तर; आत्मानम्-- भगवान् को; किम् उत--क्या कहा जाये; अपरे--अन्यों के विषय में ।
यद्यपि देवताओं को स्वर्गलोक में स्थित होने का लाभ मिलता है, किन्तु उनके मन, इन्द्रियाँ तथाबुद्धि भौतिक अवस्थाओं से विश्लुब्ध रहती हैं।
अतएवं ऐसे महापुरुष भी हृदय में निरन्तर स्थितभगवान् का साक्षात्कार नहीं कर पाते।
तो फिर अन्यों के विषय में, यथा मनुष्यों के विषय में, क्याकहा जाय जिन्हें बहुत ही कम लाभ प्राप्त हैं ?
अथेशमायारचितेषु सड़ंगुणेषु गन्धर्वपुरोपमेषु ।
रूढं प्रकृत्यात्मनि विश्वकर्तु-भविन हित्वा तमहं प्रपये ॥
४७॥
अथ--अतएव; ईश-माया-- भगवान् की माया के द्वारा; रचितेषु --रचे गये; सड़म्--अनुरक्ति; गुणेषु-- प्रकृति के गुणों में; गन्धर्ब-पुर-उपमेषु--जिनकी उपमा गन्धर्वपुर के भ्रम से दी जाती है, यह ऐसे नगर या मकान हैंजो जंगल या पर्वत पर दिखते हैं; रूढम्--अत्यन्त शक्तिशाली; प्रकृत्या--प्रकृति के द्वारा; आत्मनि--परमात्मा में; विश्व-कर्तु:--सारे ब्रह्माण्ड के स्त्रष्टा की; भावेन--भक्ति से;हित्वा--त्यागकर; तम्--उसकी ( भगवान् की ); अहम्--मैं; प्रपद्ले--शरण में जाता हूँ ॥
अतएव मुझे अब भगवान् की बहिरंगा शक्ति अर्थात् माया द्वारा सृजित वस्तुओं से आसक्ति कोत्याग देना चाहिए।
मुझे भगवान् के ध्यान में संलग्न होना चाहिए और इस तरह उनकी शरण में जानाचाहिए।
यह भौतिक सृष्टि भगवान् की माया से सृजित होने के कारण पर्वत पर या जंगल में स्थितकाल्पनिक नगर के सहृश है।
हर बद्धजीव को भौतिक वस्तुओं से प्राकृतिक आकर्षण एवं आसक्ति होती है, किन्तु मनुष्य को चाहिए कि इन्हें त्यागकर भगवान् की शरण में जाये।
इति व्यवसितो बुद्धया नारायणगृहीतया ।
हित्वान्यभावमज्ञानं तत: स्वं भावमास्थित: ॥
४८ ॥
इति--इस प्रकार; व्यवसित:--हढ़ निश्चय करके; बुद्धय्ा--बुद्धि से; नारायण-गृहीतया--नारायण की कृपा से पूर्णतया वशीभूत;हित्वा--त्यागकर; अन्य-भावम्--कृष्णभावनामृत के अतिरिक्त अन्य चेतना; अज्ञानम्--जो निरतंर अज्ञान तथा अंधकार ही है;ततः--तत्पश्चात्; स्वमू--अपनी मूल स्थिति, जो कृष्ण के नित्यदास के रूप में है; भावम्--भक्ति में; आस्थित:--स्थित |
इस तरह भगवान् की सेवा करने में अपनी उन्नत बुद्धि से महाराज खट्वांग ने अज्ञानमय शरीर सेमिथ्या सम्बन्ध का परित्याग कर दिया।
अपनी नित्य सेवक की मूल स्थिति में रहकर उन्होंने भगवान्की सेवा करने में अपने को संलग्न कर लिया।
यत्तड्रह्म पर सूक्ष्ममशून्यं शून्यकल्पितम् ।
भगवान्वासुदेवेति यं गृणन्ति हि सात्वता: ॥
४९॥
यत्--जो; तत्--वैसा; ब्रह्म परमू--परब्रह्म, भगवान् कृष्ण; सूक्ष्ममू-- आध्यात्मिक, सारी भौतिक धारणाओं से परे; अशून्यम्--निर्विशेष या शून्य नहीं; शून्य-कल्पितम्--कम बुद्धिमान व्यक्तियों द्वारा शून्य करके कल्पित; भगवान्-- भगवान्; वासुदेव--कृष्ण;इति--इस प्रकार; यम्--जिसको; गृणन्ति--गायन करते हैं; हि--निस्सन्देह; सात्वता:--शुद्ध भक्तगण |
वे बुद्धिहीन मनुष्य जो भगवान् के निर्विशेष या शून्य न होने पर भी, उन्हें ऐसा मानते हैंउनकेलिए भगवान् वासुदेव कृष्ण को समझ पाना अत्यन्त कठिन है।
अतएव शुद्ध भक्त ही भगवान् कोसमझते तथा उनका गान करते हैं।
