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छठा अध्याय: सौभरि मुनि का पतन
9.6श्रीशुक उबाचविरूप: केतुमाउछम्भुरम्बरीषसुतास्त्रयः ।
विरूपात्पृषदश्रो भूत्तत्पुत्रस्तु रथीतर: ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; विरूप:--विरूप नामक; केतुमान्ू-- केतुमान नामक; शम्भु:--शम्भु नामक;अम्बरीष--अम्बरीष महाराज के; सुताः त्रयः--तीन पुत्र; विरूपात्ू--विरूप से; पृषदश्च:--पृषदश्चव नामक; अभूत्--था; तत्-पुत्र:--उसका पुत्र; तु--तथा; रथीतरः --रथीतर नामक |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे महाराज परीक्षित, अम्बरीष के तीन पुत्र हुए--विरूप, केतुमानतथा शम्भु।
विरूप के पृषदश्च नामक पुत्र हुआ और पृषदश्च के रथीतर नामक पुत्र हुआ।
रथीतरस्याप्रजस्य भार्यायां तन्तवेडर्थित: ।
अड्डिरा जनयामास ब्रह्मवर्चस्विन: सुतान् ॥
२॥
रथीतरस्य--रथीतर की; अप्रजस्य--निःसन्तान; भार्यायाम्--अपनी पत्नी के; तन्तवे--सन्तान वृद्धि के लिए; अर्थित:--प्रार्थना कियेजाने पर; अड्जिरा:--अंगिरा ऋषि; जनयाम् आस--उत्पन्न किया; ब्रह्म-वर्चस्विन: --ब्राह्मण गुणों से युक्त; सुतान्ू--पुत्रों को
रथीतर निःसन््तान था अतएवं उसने अंगिरा ऋषि से पुत्र उत्पन्न करने के लिए प्रार्थना की।
इसप्रार्थना के फलस्वरूप अंगिरा ने रथीतर की पत्नी के गर्भ से पुत्र उत्पन्न कराये।
ये सारे पुत्र ब्राह्मणतेज से सम्पन्न थे।
एते क्षेत्रप्रसूता वै पुनस्त्वाड्रिरसा: स्मृता: ।
रथीतराणां प्रवरा: क्षेत्रोपेता द्विजातय: ॥
३॥
एते--अंगिरा द्वारा उत्पन्न पुत्र; क्षेत्र-प्रसूताः--रथीतर की सन््तान बने और उसके कुल के कहलाये ( क्योंकि वे उसकी पत्नी के गर्भ सेहुए थे ); वै--निस्सन्देह; पुन:--फिर; तु--लेकिन; आ्विरसा: --अंगिरा के वंश के; स्मृता:--कहलाये; रथीतराणाम्--रथीतर केसारे पुत्रों का; प्रवरा:-- प्रमुख; क्षेत्र-उपेता: --श्षेत्र से उत्पन्न होने के कारण; द्वि-जातय:--ब्राह्मण कहलाये ( ब्राह्मण तथा क्षत्रिय कामिश्रण होकर )
रथीतर की पत्नी से जन्म लेने के कारण ये सारे पुत्र रथीतर के वंशज कहलाये, किन्तु अंगिरा केवीर्य से उत्पन्न होने के कारण वे अंगिरा के वंशज भी कहलाये।
रथीतर की समन््तानों में से ये पुत्रसबसे अधिक प्रसिद्ध थे क्योंकि अपने जन्म के कारण ये ब्राह्मण समझे जाते थे।
क्षुवतस्तु मनोर्जज्ञे इक्ष्वाकुर्ध्राणत: सुतः ।
तस्य पुत्रशतज्येष्ठा विकुक्षिनिमिदण्डका: ॥
४॥
क्षुवत:--छींकते समय; तु--लेकिन; मनो:--मनु के; जज्ञे--उत्पन्न हुआ; इक्ष्वाकु:--इक्ष्वाकु नामक; घ्राणत:--नथुनों से; सुत:--पुत्र; तस्य--इश्ष्वाकु के; पुत्र-शत--एक सौ पुत्र; ज्येष्ठा:--प्रमुख; विकुक्षि--विकुक्षि नामक; निमि--निमि नामक; दण्डका:--दण्डका नामक,मनु का पुत्र इक्ष्वाकु था।
जब मनु छींक रहे थे तो इक्ष्वाकु उनके नथुनों से उत्पन्न हुआ था।
राजाइक्ष्वाकु के एक सौ पुत्र थे जिनमें से विकुक्षि, निमि तथा दण्डका प्रमुख थे।
तषा पुरस्तादरमनज्ञायावत नूपषा नूष ।
पदञ्जविंशतिः पश्चाच्च त्रयो मध्येडपरेउन्यतः ॥
५॥
तेषाम्--इन पुत्रों में से; पुरस्तात्-पूर्व दिशा में; अभवनू--वे बने; आर्यावर्ते--आर्यावर्त में, जो हिमालय तथा विन्ध्याचल पर्वतों केबीच का स्थान था; नृपा:--राजा; नृप--हे राजा ( परीक्षित ); पञ्ञ-विंशति:--पच्चीस; पश्चात्--पश्चिम दिशा में; च--भी; त्रय: --उनमें से तीन; मध्ये--मध्य में ( पूर्व और पश्चिम के बीच ); अपरे--अन्य; अन्यत:--अन्य स्थानों में
सौ पुत्रों में से पच्चीस पुत्र हिमालय तथा विन्ध्याचल पर्वतों के मध्यवर्ती स्थान आर्यावर्त केपश्चिमी भाग के राजा बने, पच्चीस पुत्र पूर्वी आर्यावर्त के राजा बने और तीन प्रमुख पुत्र मध्यवर्तीप्रदेश के राजा बने ।
शेष पुत्र अन्य विविध स्थानों के राजा बने।
सएकदाष्टकाश्राद्धे इक्ष्वाकु: सुतमादिशत् ।
मांसमानीयतां मेध्यं विकुक्षे गच्छ मा चिरम् ॥
६॥
सः--वह राजा ( महाराज इशष्ष्वाकु ); एकदा--एक बार; अष्टका- भ्राद्धे-- जनवरी, फरवरी तथा मार्च के महीनों मे जब पितरों कीश्राद्ध की जाती है; इक्ष्बाकु:--राजा इक्ष्वाकु ने; सुतम्--अपने पुत्र को; आदिशत्--आज्ञा दी; मांसम्ू--मांस; आनीयतामू-लेआओ; मेध्यम्-शुद्ध ( शिकार करके ); विकुक्षे--हे विकुक्षि; गच्छ--तुरन््त जाओ; मा चिरमू--बिना देर लगाये।
जनवरी, फरवरी तथा मार्च के महीनों में पितरों को दिये जाने वाली भेंटें अष्टका श्राद्ध कहलातीहै।
श्राद्ध महीने के कृष्णपक्ष में सम्पन्न किया जाता है।
जब महाराज इक्ष्वाकु श्राद्ध मनाते हुए भेंटें देरहे थे तो उन्होंने अपने पुत्र विकुक्षि को आदेश दिया कि वह तुरन्त जंगल में जाकर कुछ शुद्ध मांसले आये।
तथेति स वन गत्वा मृगान्त्वा क्रियाहणान् ।
श्रान्तो बुभुक्षितो वीर: शशं चाददपस्मृति: ॥
७॥
तथा--आदेशानुसार; इति--इस प्रकार; सः--विकुक्षि; वनमू-- जंगल में; गत्वा--जाकर; मृगान्ू--पशुओं को; हत्वा--मारकर;क्रिया-अर्हणानू-- श्राद्ध में यज्ञ करने के उपयुक्त; श्रान्त:--थका हुआ; बुभुक्षित:--तथा भूखा; वीर: --वीर पुरुष; शशम्--खरहेको; च-- भी; आदत्--खाया; अपस्मृतिः--यह भूल गया (कि यह मांस श्राद्ध में भेंट के लिए है )
तत्पश्चात् इक्ष्वाकु पुत्र विकुक्षि जंगल में गया और उसने श्राद्ध में भेंट देने के लिए अनेक पशुमारे।
किन्तु जब वह थक गया और भूखा हुआ तो भूल से उसने मारे हुए एक खरगोश को खालिया।
शेष निवेदयामास पित्रे तेन च तदगुरु: ।
चोदितः प्रोक्षणायाह दुष्टमेतदकर्मकम् ॥
८॥
शेषम्--उच्छिष्ट; निवेदयाम् आस--उसने प्रदान किया; पित्रे--अपने पिता को; तेन--उसके द्वारा; च--भी; तत्-गुरु:--उनके गुरुने; चोदित:--आग्रह किये जाने पर; प्रोक्षणाय--शुद्ध करने के लिए; आह--कहा; दुष्टम्-प्रदूषित; एतत्--यह मांस; अकर्मकम्--श्राद्ध में अर्पित करने के अयोग्य।
विकुक्षि ने शेष मांस राजा इक्ष्वाकु को लाकर दे दिया जिन्होंने उसे शुद्ध करने के लिए वसिष्ठको दे दिया।
लेकिन वसिष्ठ यह तुरन्त समझ गये कि उस मांस का कुछ भाग विकुक्षि ने पहले हीग्रहण कर लिया है; अतएव उन्होंने कहा कि यह मांस श्राद्ध में प्रयुक्त होने केलिए अनुपयुक्त है।
ज्ञात्वा पुत्रस्य तत्कर्म गुरुणाभिहितं नूप: ।
देशान्रिःसारयामास सुतं त्यक्तविधि रुषा ॥
९॥
ज्ञात्वा--जान लेने पर; पुत्रस्थ--अपने पुत्र की; तत्--वह; कर्म--करनी; गुरुणा--गुरु ( वसिष्ठ ) द्वारा; अभिहितम्--सूचित कियागया; नृप:--राजा ( इश्ष्वाकु ) ने; देशात्--देश से; निःसारयाम् आस--निकाल दिया; सुतम्--पुत्र को; त्यक्त-विधिम्-क्योंकिउसने विधान का उल्लंघन किया था; रुषा--क्रोध में आकर।
जब राजा इक्ष्वाकु वसिष्ठ द्वारा बताये जाने पर समझ गये कि उनके पुत्र विकुक्षि ने क्या किया हैतो वे अत्यन्त क्रुद्ध हुए।
इस प्रकार उन्होंने विकुक्षि को देश छोड़ने की आज्ञा दे दी क्योंकि उसने विधि-विधान का उल्लंघन किया था।
सतु विप्रेण संवादं ज्ञापफेन समाचरन् ।
त्यक्त्वा कलेवरं योगी स तेनावाप यत्परम् ॥
१०॥
सः--महाराज इक्ष्वाकु; तु--निस्सन्देह; विप्रेण--ब्राह्मण ( वसिष्ठ ) के साथ; संवादम्--वार्तालाप; ज्ञापफेन--सूचना देने वाले केसाथ; समाचरन्--तदनुसार करते हुए; त्यक्त्वा--त्यागकर; कलेवरम्--शरीर को; योगी--संनन््यास लेकर भक्तियोगी बनकर; सः--राजा; तेन--ऐसे उपदेश से; अवाप--प्राप्त किया; यत्--वह पद जो; परम्--सर्व श्रेष्ठ |
महान् एवं विद्वान ब्राह्मण वसिष्ठ के साथ परम सत्य विषयक वार्तालाप के बाद उनके द्वाराउपदेश दिये जाने पर महाराज इक्ष्वाकु विरक्त हो गये।
उन्होंने योगी के नियमों का पालन करते हुएभौतिक शरीर त्यागने के बाद परम सिद्धि प्राप्त की।
पितर्युपरतेभ्येत्य विकुक्षि: पृथिवीमिमाम् ।
शासदीजे हरिं यज्ञ: शशाद इति विश्रुतः ॥
११॥
पितरि--अपने पिता के; उपरते--राज्य छोड़ने पर; अभ्येत्य--वापस आकर; विकुक्षि:--विकुक्षि ने; पृथिवीम्--पृथ्वीलोक को;इमामू--इस; शासत्--शासन करते हुए; ईजे--पूजा की; हरिमू-- भगवान् की; यज्जैः--यज्ञों के द्वारा; शश-अदः--शशाद ( खरगोशखाने वाला ); इति--इस प्रकार; विश्रुत:--विख्यात हुआ |
अपने पिता के चले जाने पर विकुक्षि अपने देश लौट आया और पृथ्वीलोक पर शासन करते हुएतथा भगवान् को प्रसन्न करने के लिए विविध यज्ञ करते हुए वह राजा बना।
बाद में विकुक्षि शशादनाम से विख्यात हुआ।
पुरक्ञयस्तस्य सुत इन्द्रवाह इतीरितः ।
ककुत्स्थ इति चाप्युक्त: श्रृणु नामानि कर्मभि: ॥
१२॥
पुरमू-जय:--पुरञ्ञय ( पुर का विजेता ); तस्थ--उसका ( विकुक्षि का ); सुतः--पुत्र; इन्द्र-वाह:--इन्द्रवाह ( इन्द्र जिसका वाहन है );इति--इस प्रकार; ईरितः--विख्यात; ककुत्स्थ:--ककुत्स्थ ( बैल के डिल्ले पर स्थित ); इति--इस प्रकार; च-- भी; अपि--निस्सन्देह; उक्त: --इस तरह ज्ञात; श्रुणु--सुनो; नामानि--सारे नाम; कर्मभि: --अपने-अपने कर्म के अनुसार |
शशाद का पुत्र पुरक्षय हुआ जो इन्द्रवाह के रूप में और कभी-कभी ककुत्स्थ के नाम सेविख्यात है।
अब मुझसे यह सुनो कि उसने विभिन्न कार्यो के लिए भिन्न-भिन्न नाम किस तरह प्राप्तकिये।
कृतान्त आसीत्समरो देवानां सह दानवैः ।
पार्णिग्राहो वृतो वीरो देवैर्देत्यपराजितै: ॥
१३॥
कृत-अन्तः--विनाशकारी युद्ध; आसीत्-- था; समरः--युद्ध; देवानामू--देवताओं के; सह--के साथ; दानवै: --असुरों;पार्णिग्राह:--अच्छा सहायक; वृत:--स्वीकार किया; वीर:--वीर; देवैः--देवताओं के द्वारा; दैत्य--दैत्यों के द्वारा; पराजितै:--जोहराये जा चुके थे।
पूर्वकाल में देवताओं तथा असुरों के मध्य एक घमासान युद्ध हुआ।
पराजित होकर देवताओं नेपुरक्षय को अपना सहायक बनाया और तब वे असुरों को पराजित कर सके ।
अतएव यह वीर पुरक्षयकहलाता है अर्थात् जिसने असुरों के निवासों को जीत लिया है।
वचनादेवदेवस्य विष्णोर्विश्वात्मन: प्रभो: ।
वाहनत्वे वृतस्तस्य बभूवेन्द्रो महावृष; ॥
१४॥
बचनात्-- आदेश या बचनों से; देव-देवस्थ--समस्त देवताओं के स्वामी; विष्णो:-- भगवान् विष्णु का; विश्व-आत्मन:--सम्पूर्णसृष्टि के परमात्मा; प्रभो:-- भगवान् या नियन्ता का; वाहनत्वे--वाहन बनने के कारण; वृतः--लगा हुआ; तस्य--पुरञ्ञय की सेवा में;बभूव--बन गया; इन्द्र:--इन्द्र; महा-वृष:--बड़ा सा बैल |
पुरक्ञय ने सारे असुरों को इस शर्त पर मारना स्वीकार किया कि इन्द्र उसका वाहन बनेगा।
किन्तुगर्ववश इन्द्र ने यह प्रस्ताव पहले अस्वीकार कर दिया, किन्तु बाद में भगवान् विष्णु के आदेश सेउसने इसे स्वीकार कर लिया और पुरजञ्ञय की सवारी के लिए वह बड़ा सा बैल बन गया।
स सन्नद्धो धनुर्दिव्यमादाय विशिखाडजिछतान् ।
स्तूयमानस्तमारुहा युयुत्सु: ककुदि स्थित: ॥
१५॥
तेजसाप्यायितो विष्णो: पुरुषस्य महात्मन: ।
प्रतीच्यां दिशि दैत्यानां न्यरूणत्त्रिदशै: पुरम् ॥
१६॥
सः-पुरक्षय; सन्नद्धः--पूरी तरह युक्त होकर; धनु: दिव्यम्-- श्रेष्ठ या दिव्य धनुष; आदाय--लेकर; विशिखानू--तीरों को;शितान्--अत्यन्त पैने; स्तूयमान:--अत्यधिक प्रशंसित होकर; तम्--उस ( बैल पर ); आरुह्म--चढ़कर; युयुत्सु:--लड़ने के लिएतैयार होकर; ककुदि--बैल के डिल्ले पर; स्थित:--स्थित; तेजसा--बल से; आप्यायित:--कृपाप्राप्त; विष्णो: --विष्णु के;पुरुषस्य--परम पुरुष; महा-आत्मन:--परमात्मा; प्रतीच्यामू--पश्चिमी; दिशि--दिशा में; दैत्यानामू--असुरों का; न्यरूणत्--कब्जे मेंकर लिया; त्रिदशै:--देवताओं को साथ लेकर; पुरमू--आवास को |
कवच से भलीभाँति सुरक्षित होकर और युद्ध करने की इच्छा से पुरञ्ञय ने अपना दिव्य धनुषतथा अत्यन्त तीक्ष्ण बाण धारण किया और देवताओं द्वारा अत्यधिक प्रशंसित होकर वह बैल ( इन्द्र ) की पीठ पर सवार हुआ तथा उसके डिल्ले पर बैठ गया।
इसलिए वह ककुत्स्थ कहलाता है।
परमात्मातथा परम पुरुष भगवान् विष्णु से शक्ति प्राप्त करके पुरक्षय उस बड़े बैल पर सवार हो गया, इसलिएवह इन्द्रवाह कहलाता है।
देवताओं को साथ लेकर उसने पश्चिम में असुरों के निवासस्थानों परआक्रमण कर दिया।
तैस्तस्य चाभूत्प्रधनं तुमुलं लोमहर्षणम् ।
यमाय भल्लैरनयहैत्यानभिययुर्मुधे ॥
१७॥
तैः--असुरों के साथ; तस्य--उसकी; च--भी; अभूत्--हुई; प्रधनम्--लड़ाई; तुमुलम्--घनघोर; लोम-हर्षणम्--जिसे सुनकररोमांच हो जाता है; यमाय--यमराज के घर के लिए; भल्लै:--तीरों से; अनयत्-- भेज दिया; दैत्यान्--असुरों को; अभिययु:--जोउसकी ओर आये; मृधे--उस युद्ध में |
असुरों तथा पुरञझ्ञय के मध्य घनघोर लड़ाई छिड़ गई।
निस्सन्देह, यह इतनी भयानक थी किसुनने वाले के रोंगटे खड़े हो जाते।
जितने सारे असुर पुरक्षय के समक्ष आने का साहस करते वे सभीउसके तीरों से तुरन्त यमराज के घर भेज दिये जाते।
तस्येषुपाताभिमुखं युगान्ताग्निमिवोल्बणम् ।
विसृज्य दुद्र॒वुर्देत्या हन्यमाना: स्वमालयम् ॥
१८ ॥
तस्य--उसके ( पुरक्ञय के ); इषु-पात--तीर फेंकने; अभिमुखम्--के समक्ष; युग-अन्त--युग के अन्त में; अग्निम्ू--ज्वाला; इब--सहश; उल्बणम्-- भयानक; विसृज्य-- आक्रमण करना छोड़कर; दुद्गुवु:-- भग गये; दैत्या:--सारे असुर; हन्यमाना: --मारे जाकर( पुरञ्ञय द्वारा ); स्वमू--अपने; आलयम्--घर को |
इन्द्रवाह के अग्नि उगलते तीरों से अपने को बचाने के लिए वे असुर, जो अपनी सेना के मारेजाने के बाद बचे थे, तेजी से अपने-अपने घरों को भाग खड़े हुए क्योंकि यह अग्नि युग के अन्त मेंउठने वाली प्रलयाग्नि के समान थी।
जित्वा परं धन सर्व सस्त्रीकं वज़्पाणये ।
प्रत्ययच्छत्स राजर्षिरिति नामभिराहत: ॥
१९॥
जित्वा--जीतकर; परम्--दुश्मनों को; धनम्--धन को; सर्वम्ू--हर वस्तु; स-स्त्रीकम्-उनकी पत्नियों समेत; बज्ञ-पाणये--इन्द्र कोजो वज् धारण करता है; प्रत्यवच्छत्--लौटाकर दे दिया; सः--वह; राज-ऋषि:--सन््त राजा ( पुरञ्ञय ); इति--इस प्रकार;नामभि:--नामों से; आहतः--पुकारा जाता था।
शत्रु को जीतने के बाद सन्त राजा पुरञ्जय ने वज्रधारी इन्द्र को सब कुछ लौटा दिया जिसमें शत्रुका धन तथा पत्ियाँ सम्मिलित थीं।
इसी हेतु वह पुरञ्ञय नाम से विख्यात है।
इस तरह पुरझ्य अपनेविविध कार्यकलापों के कारण विभिन्न नामों से जाना जाता है।
पुरञ्ञयस्य पुत्रो भूदनेनास्तत्सुत: पृथु: ।
विश्वगन्धिस्ततश्चन्द्रो युवनाश्रस्तु तत्सुतः: ॥
२०॥
पुरञ्ञयस्थ--पुरक्ञय का; पुत्र:--पुत्र; अभूत्ू--हुआ; अनेना:--अनेना नामक; ततू-सुतः--उसका पुत्र; पृथु:--पृथु; विश्वगन्धि: --विश्वगन्धि नामक; ततः--उसका पुत्र; चन्द्र:--चन्द्र; युवनाश्च:--युवनाश्च नामधारी; तु--निस्सन्देह; ततू-सुत:--उसका पुत्रपुरञ्जय का पुत्र अनेना कहलाया।
अनेना का पुत्र पृथु था और पृथु का पुत्र विश्वगन्धि।
विश्वगन्धिका पुत्र चन्द्र हुआ और चन्द्र का पुत्र युवनाश्र था।
श्रावस्तस्तत्सुतो येन श्रावस्ती निर्ममे पुरी ।
बृहदश्वस्तु श्रावस्तिस्ततः कुबलयाश्रकः ॥
२१॥
श्रावस्त:--श्रावस्त नामक; ततू-सुत:--युवनाश्च का पुत्र; येन--जिसके द्वारा; श्रावस्ती-- श्रावस्ती नामक; निर्ममे--निर्मित कराईगई; पुरी--नगरी; बृहदश्च:--बृहदश्च; तु--किन्तु; श्रावस्ति:ः-- श्रावस्त से उत्पन्न; ततः--उससे; कुवलया श्रक:--कुवलयाश्वनामधारी।
युवनाश्च का पुत्र श्रावस्त था जिसने श्रावस्ती नामक पुरी का निर्माण कराया।
श्रावस्त का पुत्रबृहदश्च था और उसका पुत्र कुवलयाश्व था।
इस तरह यह वंश बढ़ता रहा।
यः प्रियार्थमुतड्डस्य धुन्धुनामासुरं बली ।
सुतानामेकविंशत्या सहस्त्रैरहनद्वुतः ॥
२२॥
यः--जो; प्रिय-अर्थम्--संतोष के लिए; उतड्डूस्थ--उतंक नामक ऋषि का; धुन्धु-नाम--थधुन्धु नाम के; असुरम्--असुर को; बली--अत्यन्त शक्तिशाली ( कुवलयाश्व ); सुतानाम्--पुत्रों को; एक-विंशत्या--इक्कीस; सहस्त्रै:--हजार; अहनत्--मार डाला; वृत:--घिराहुआ।
उतंक ऋषि को संतुष्ट करने के लिए परम शक्तिशाली कुवलयाश्व ने धुन्धु नामक असुर का वधकिया।
उसने अपने इक्कीस हजार पुत्रों की सहायता से ऐसा किया।
धुन्धुमार इ्ति ख्यातस्तत्सुतास्ते च जज्वलु: ।
धुन्धोर्मुखाग्निना सर्वे त्रय एवावशेषिता: ॥
२३॥
हढाश्वः कपिलाश्रश्व भद्गाश्व इति भारत ।
हढाश्वपुत्रो हर्यश्वो निकुम्भस्तत्सुतः स्मृतः ॥
२४॥
धुन्धु-मार: -- धुन्धु को मारने वाला; इति--इस प्रकार; ख्यातः--प्रसिद्ध; तत्-सुता:--उसके पुत्रों ने; ते--उन सभी; च-- भी;जज्वलु:--जला दिया; धुन्धो: --धुन्धु के; मुख-अग्निना--मुख से निकलती अग्नि से; सर्वे--वे सभी; त्रय:--तीन; एब--केवल;अवशेषिता:--जीवित बचे; हृढाश्र:--हढ़ाश्र; कपिलाश्च:--कपिलाश्च; च--तथा; भद्गाश्च:--भद्गा श्र; इति--इस प्रकार; भारत--हेमहाराज परीक्षित; हढाश्च-पुत्र:--दढ़ाश्व का पुत्र; हर्यश्च:--हर्य श्र; निकुम्भ:--निकुम्भ; तत्-सुतः--उसका पुत्र; स्मृत:--विख्यात |
हे महाराज परीक्षित, इस कारण से कुवलयाश्व धुन्धुमार कहलाता है।
किन्तु उसके तीन पुत्रों कोछोड़कर शेष सभी धुन्धु के मुख से निकलने वाली अग्नि से जलकर राख हो गये।
बचे हुए पुत्रों केनाम हैं--हृढ़ाश्न, कपिलाश्व तथा भद्राश्व।
हढ़ाश्व के हर्यश्व नामक पुत्र हुआ जिसका पुत्र निकुम्भ नामसे विख्यात है।
बहुलाश्वो निकुम्भस्य कृशाश्रोथास्य सेनजित् ।
युवनाश्रो भवत्तस्य सोउनपत्यो वनं गत: ॥
२५॥
बहुलाश्च:--बहुलाश्व का; निकुम्भस्य--निकुम्भ का; कृशाश्र:--कृशा श्र; अथ--तत्पश्चात्: अस्य--कृशाश्र का; सेनजित्--सेनजित;युवना श्र: --युवनाश्र; अभवत्--उत्पन्न हुआ; तस्य--सेनजित के; सः--वह; अनपत्य:--निःसन्तान; वनम् गत:--वान प्रस्थी बनकरजंगल चला गया।
निकुम्भ का पुत्र बहुलाश्व था, बहुलाश्व का पुत्र कृुशाश्व और कृशाश्व का पुत्र सेनजित हुआ।
सेनजित का पुत्र युवनाश्व था।
युवनाश्व के कोई सनन््तान नहीं थी इसलिए वह गृहस्थ जीवन त्यागकरजंगल चला गया।
भार्याशतेन निर्विण्ण ऋषयोस्य कृपालव: ।
इष्टिं सम वर्तयां चक्रुरैन्द्री ते सुसमाहिता: ॥
२६॥
भार्या-शतेन--एक सौ पत्नियों के साथ; निर्विणण: --अत्यन्त खिन्न; ऋषय:--ऋषिगण; अस्य--उस पर; कृपालव: --अत्यन्तकृपालु; इष्टिमू--एक अनुष्ठान; स्म--भूतकाल में; वर्तयाम् चक्कु:--सम्पन्न करने लगा; ऐन्द्रीमू--इन्द्रयज्ञ; ते--वे सभी; सु-समाहिता:--अत्यन्त सावधान |
यद्यपि युवनाश्र अपनी एक सौ पत्नियों सहित जंगल में चला गया, किन्तु वे सभी अत्यन्त खिन्नथीं।
तथापि जंगल के ऋषि राजा पर अत्यन्त दयालु थे, अतएव वे मनोयोगपूर्वक इन्द्रयज्ञ करने लगे जिससे राजा के पुत्र उत्पन्न हो सके ।
राजा तद्यज्ञसदनं प्रविष्टो निशि तर्षितः ।
इृष्ठा शयानान्विप्रांस्तान्पपौ मन्त्रजलं स्वयम् ॥
२७॥
राजा--राजा ( युवनाश्व ); तत्-यज्ञ-सदनम्--यज्ञशाला में; प्रविष्ट: --प्रवेश किया; निशि--रात में; तर्षित:--प्यासे होने के कारण;इृष्टा--देखकर; शयानान्--लेटे हुए; विप्रानू--ब्राह्मणों को; तानू--उन सभी; पपौ--पी लिया; मन्त्र-जलम्--मंत्र द्वारा पवित्र कियाहुआ जल; स्वयम्--खुद |
एक रात्रि को प्यासे होने के कारण राजा यज्ञशाला में घुस गया और जब उसने देखा कि सारेब्राह्मण लेटे हुए हैं तो उसने अपनी पत्नी के पीने के लिए रखे हुए मंत्र से पवित्र किये गये जल कोस्वयं पी लिया।
उत्थितास्ते निशम्याथ व्युदक॑ कलशं प्रभो ।
पप्रच्छु: कस्य करमेंदं पीत॑ पुंसवनं जलम् ॥
२८॥
उत्थिता:--जगने पर; ते--वे सभी; निशम्य--देखकर; अथ--तत्पश्चात्; व्युदकम्-रिक्त, खाली; कलशम्--जलपात्र को; प्रभो--हेराजा परीक्षित; पप्रच्छु:--पूछा; कस्य--किसका; कर्म--करतूत; इृदम्--यह; पीतम्--पिया हुआ; पुंसवनम्--सन्तान उत्पन्न करनेबाला; जलम्ू--जल
जब सारे ब्राह्मण जगे और उन्होंने देखा कि जलपात्र खाली है तो उन्होंने पूछा कि संतान उत्पन्नकरने वाले जल को किसने पिया है ?
राज्ञा पीतं विदित्वा वै ईश्वरप्रहितेन ते ।
ईश्वराय नमश्नक्कुरहो दैवबलं बलम् ॥
२९॥
राज्ञा-राजा द्वारा; पीतम्--पिया गया; विदित्वा--यह जानकर; बै--निस्सन्देह; ईश्वर-प्रहितेन--विधाता द्वारा प्रेरित; ते--उन सबों ने;ईश्वराय--ई श्वर को; नमः चक्रु:--नमस्कार किया; अहो--ओह; दैव-बलम्--दैवी शक्ति; बलमू--वास्तविक बल है।
जब ब्राह्मणों को यह ज्ञात हुआ कि ईश्वर द्वारा प्रेरित होकर राजा ने जल पी लिया है तो उन्होंनेविस्मित होकर कहा, 'ओह! विधाता की शक्ति ही असली शक्ति है।
ईश्वर की शक्ति का कोई भीनिराकरण नहीं कर सकता।
इस तरह उन्होंने भगवान् को सादर नमस्कार किया।
ततः काल उपावृत्ते कुक्षि निर्भिद्य दक्षिणम् ।
युवनाश्वस्य 'तनयश्चक्रवर्ती जजान ह ॥
३०॥
ततः--तत्पश्चात्; काले--समय; उपावृत्ते--पूरा हो जाने पर; कुक्षिम्--उदर का निचला भाग; निर्भिद्य-- भेदकर; दक्षिणम्--दाहिनीओर का; युवनाश्रस्थ--राजा युवनाश्व का; तनय: --पुत्र; चक्रवर्ती--राजा के सारे उत्तम लक्षणों से युक्त; जजान--उत्पन्न किया; ह--भूतकाल में ।
तत्पश्चात् कालक्रम से राजा युवनाश्व के उदर के दाहिनी ओर के निचले भाग से चक्रवर्ती राजाके उत्तम लक्षणों से युक्त एक पुत्र उत्पन्न हुआ।
क॑ धास्यति कुमारोयं स्तन्ये रोरूयते भूशम् ।
मां धाता वत्स मा रोदीरितीन्द्रो देशिनीमदात् ॥
३१॥
कम्-किसके द्वारा; धास्यति--स्तन का दूध पिलाकर पाला जायेगा; कुमार:--बालक; अयम्--यह; स्तन्ये--स्तन का दूध पीने केलिए; रोरूयते--रो रहा है; भूशम्--अत्यधिक; माम् धाता--मुझको पियो; वत्स--प्यारे बेटे; मा रोदी:--मत रोओ; इति--इसप्रकार; इन्द्र: --इन्द्र ने; देशिनीम्--तर्जनी अँगुली; अदात्ू--चूसने के लिए दे दी।
वह बालक स्तन के दूध के लिए इतना अधिक रोया कि सारे ब्राह्मण चिन्तित हो उठे।
उन्होंनेकहा 'इस बालक को कौन पालेगा?
' तब उस यज्ञ में पूजित इन्द्र आये और उन्होंने बालक कोसान्त्वना दी 'मत रोओ।
' फिर इन्द्र ने उस बालक के मुँह में अपनी तर्जनी अँगुली डालकर कहा'तुम मुझे पी सकते हो।
'न ममार पिता तस्य विप्रदेवप्रसादत: ।
युवनाश्रोथ तत्रैव तपसा सिद्धिमन्वगात् ॥
३२॥
न--नहीं; ममार--मरा; पिता--पिता; तस्थ--बालक का; विप्र-देव-प्रसादतः--ब्राह्मणों की कृपा तथा आशीर्वाद से; युवनाश्र:--राजा युवनाश्च; अथ--तत्पश्चात्; तत्र एब--वहीं; तपसा--तपस्या द्वारा; सिद्धिमू--सिदर्द्धि; अन्वगात्-प्राप्त की |
चूँकि उस बालक के पिता युवनाश्व को ब्राह्मणों का आशीर्वाद प्राप्त था अतः वह मृत्यु काशिकार नहीं हुआ।
इस घटना के बाद उसने कठिन तपस्या की और उसी स्थान पर सिद्धि प्राप्त की।
त्रसहस्युरितीन्द्रोड़ विदधे नाम यस्य वै ।
यस्मात्त्रसन्ति ह्ुद्धिग्ना दस्यतो रावणादय: ॥
३३॥
यौवनाश्रोथ मान्धाता चक्रवर्त्यवनीं प्रभु: ।
सप्तद्वीपवतीमेक: शशासाच्युततेजसा ॥
३४॥
त्रसतू-दस्यु:--त्रसहस्यु नाम का ( जो चोरों उचक्कों को धमकाये ); इति--इस प्रकार; इन्द्र:--इन्द्र; अड़--हे राजा; विदधे--दिया;नाम--नाम; यस्य--जिसका; वै--निस्सन्देह; यस्मात्ू--जिससे ; त्रसन्ति-- डरे हुए; हि--निश्चय ही; उद्विग्ना:--चिन्ता का कारण;दस्यव:--चोर-उचक्के; रावण-आदय: --रावण इत्यादि राक्षस; यौवनाश्च:--युवनाश्व का पुत्र; अथ--इस प्रकार; मान्धाता--मान्धातानाम से विख्यात; चक्रवर्ती --सारे विश्व का सम्राट; अवनीम्--पृथ्वी पर; प्रभु:--स्वामी; सप्त-द्वीप-वतीम्--सात द्वीपों वाली;एकः--एकमात्र; शशास--शासन किया; अच्युत-तेजसा-- भगवान् की कृपा से अत्यन्त शक्तिशाली होने से |
युवनाश्च-पुत्र मान्धाता, रावण तथा चिन्ता उत्पन्न करने वाले अन्य चोर उचक्कों के लिए भय काकारण बना था।
हे राजा परीक्षित, चूँकि वे सब उससे भयभीत रहते थे, अतएव युवनाश्च का पुत्रत्रसहस्यु कहलाता था।
यह नाम इन्द्र द्वारा रखा गया था।
भगवान् की कृपा से युवनाश्च-पुत्र इतनाशक्तिशाली था कि जब वह सप्राट बना तो उसने सात द्वीपों से युक्त सारे विश्व पर शासन किया।
वह अद्वितीय शासक था।
ईजे च यज्ञ क्रतुभिरात्मविद्धूरिदक्षिणै: ।
सर्वदेवमयं देव॑ सर्वात्मकमतीन्द्रियम् ॥
३५॥
द्रव्यं मन्त्रो विधिर्यज्ञो यजमानस्तथर्त्विज: ।
धर्मो देशश्व॒ कालश्च सर्वमेतद्यदात्मकम् ॥
३६॥
ईजे--उसने पूजा की; च-- भी; यज्ञम्--यज्ञों के स्वामी की; क्रतुभि:--कर्मकाण्डों द्वारा; आत्म-वित्ू--आत्म-साक्षात्कार के द्वारापूर्णतया अभिज्ञ; भूरि-दक्षिणै:--ब्राह्मणों को प्रचुर दक्षिणा देकर; सर्व-देव-मयम्--सारे देवताओं से युक्त; देवम्-- भगवान् को;सर्व-आत्मकम्--सबों के परमात्मा; अति-इन्द्रियमू--दिव्य रूप से स्थित; द्रव्यम्-- अवयव; मन्त्र: --वैदिक स्तोत्रों का उच्चारण;विधि:--विधान; यज्ञ:--पूजन; यजमान:--यज्ञ करने वाला; तथा--सहित; ऋत्विज:--पुरोहित; धर्म:--धार्मिक नियम; देश: --देश; च--तथा; काल:--समय; च-- भी; सर्वम्--हर वस्तु; एतत्--ये सब; यत्--जो है; आत्मकम्--आत्म-साक्षात्कार के लिए
उपयुक्त,भगवान् महान् यज्ञों के कल्याणकारी पक्षो से--यथा यज्ञ की सामग्री, वैदिक स्तोत्रों का उच्चारण, विधि-विधान, यज्ञकर्ता, पुरोहित, यज्ञ-फल, यज्ञ-शाला, यज्ञ के समय, इत्यादि से भिन्ननहीं हैं।
मान्धाता ने आत्म-साक्षात्कार के नियमों को जानते हुए दिव्य पद पर स्थित परमात्मा स्वरूपउन भगवान् विष्णु की पूजा की जो समस्त देवताओं से युक्त हैं।
उसने ब्राह्मणों को भी प्रचुर दानदिया और इस तरह उसने भगवान् की पूजा करने के लिए यज्ञ किया।
यावत्सूर्य उदेति सम यावच्च प्रतितिष्ठति ।
तत्सर्व यौवनाश्रस्य मान्धातु: क्षेत्रमुच्यते ॥
३७॥
यावत्--जब तक; सूर्य: --सूर्य; उदेति--उदय होता है; स्म-- भूतकाल में; यावत्--जब तक; च-- भी; प्रतितिष्ठति--रहता है; तत्--उपर्युक्त वस्तुएँ; सर्वमू--सभी; यौवना श्वस्थ--युवनाश्र के पुत्र; मान्धातु:--मान्धाता के; क्षेत्रमू--स्थान; उच्चते--कहलाता है।
क्षितिज में जहाँ से सूर्य उदय होकर चमकता है और जहाँ सूर्य अस्त होता है वे सारे स्थानयुवनाश्च के पुत्र विख्यात मान्धाता के अधिकार में माने जाते हैं।
शशबिन्दोर्दुहितरि बिन्दुमत्यामधान्रूप: ।
पुरुकुत्समम्बरीषं मुचुकुन्दं च योगिनम् ।
तेषां स्वसारः पञ्ञाशत्सौभरिं वब्रिरि पतिमू ॥
३८ ॥
शशबिन्दो:--शशबिन्दु राजा की; दुहितरि--पुत्री; बिन्दुमत्याम्ू--बिन्दुमती से; अधात्--उत्पन्न किया; नृप:--राजा ( मान्धाता ) ने;पुरुकुत्सम्-पुरुकुत्स को; अम्बरीषमू--अम्बरीष को; मुचुकुन्दम्-मुचुकुन्द को; च--तथा; योगिनम्--योगी; तेषाम्--उनमें से;स्वसार:ः--बहनों ने; पञ्ञाशत्--पचास; सौभरिम्--सौ भरि ऋषि को; वक्रिरि--स्वीकार किया; पतिम्--पति रूप में |
शशबिबन्दु की पुत्री बिन्दुमती के गर्भ से मान्धाता को तीन पुत्र उत्पन्न हुए।
इनके नाम थे पुरुकुत्स,अम्बरीष तथा महान् योगी मुचुकुन्द।
इन तीनों भाइयों के पचास बहिनें थीं जिन्होंने सौभरि ऋषि कोअपना पति चुना।
यमुनान्तर्जले मग्नस्तप्यमान: पर तपः ।
निर्व॒तिं मीनराजस्य दृष्ठा मैथुनधर्मिण: ॥
३९॥
जातस्पूहो नृपं विप्र: कन्यामेकामयाचत ।
सोप्याह गृह्मतां ब्रह्मन्कामं कन्या स्वयंवरे ॥
४०॥
यमुना-अन्त:-जले--यमुना नदी के गहरे जल में; मग्न:--पूरी तरह डूबकर; तप्यमान:--तपस्या करते हुए; परमू--असामान्य; तप:--तपस्या; निर्वृतिमू--आनन्द, सुख; मीन-राजस्य--बड़ी मछली का; दृष्टा--देखकर; मैथुन-धर्मिण:--मैथुनरत; जात-स्पृहः --मन चलायमान हो उठा; नृपम्--राजा ( मान्धाता ) के पास; विप्र:--ब्राह्मण ( सौभरि ऋषि ); कन्याम् एकाम्--इकलौती कन्या;अयाचत--माँगा; सः--उस, राजा ने; अपि-- भी; आह--कहा; गृह्मताम्ू--आप ले सकते हैं; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; कामम्ू--चाहतीहै; कन्या-- पुत्री; स्वयंवरे--स्वयं चुनाव में, स्वयंवर में |
सौभरि ऋषि यमुना नदी के गहरे जल में तपस्या में तल्लीन थे कि उन्होंने मछलियों के एक जोड़ेको संभोगरत देखा।
इस तरह उन्होंने विषयी जीवन का सुख अनुभव किया जिससे प्रेरित होकर वेराजा मान्धाता के पास गये और उनसे उनकी एक कन्या की याचना की।
इस याचना के उत्तर मेंराजा ने कहा, 'हे ब्राह्मण, मेरी कोई भी पुत्री अपनी इच्छा से किसी को भी पति चुन सकती है।
'स विच्ि्त्याप्रियं स्त्रीणां जरठोहमसन्मतः ।
वलीपलित एजत्क इल्यहं प्रत्युदाहतः ॥
४१॥
साथधयिष्ये तथात्मानं सुरस्त्रीणामभीष्सितम् ।
किं पुनर्मनुजेन्द्राणामिति व्यवसितः प्रभु; ॥
४२॥
सः--उस, सौभरि मुनि ने; विचिन्य--अपने आप सोचकर; अप्रियम्--अच्छा न लगने वाला; स्त्रीणाम्--स्त्रियों के द्वारा; जरठ:--वृद्ध होने के कारण अशक्त; अहम्--मैं; असत्-मतः--उनके द्वारा अनिच्छित; वबली--झुर्री पड़ा; पलित:--सफेद बालों वाला;एजत्ू-कः--सदा सिर हिलता हुआ; इति--इस प्रकार; अहम्--मैं; प्रत्युदाहतः--त्यक्त; साधयिष्ये--मैं इस तरह करूँगा; तथा--जिस तरह; आत्मानम्--मेरा शरीर; सुर-स्त्रीणाम्--स्वर्ग की स्त्रियों की; अभीप्सितम्--इच्छित; किमू--क्या कहूँ; पुन:--फिर भी;मनुज-इन्द्राणामू--संसार के राजाओं की कन्याओं का; इति--इस तरह; व्यवसित:--निश्चित; प्रभुः--शक्तिशाली योगी सौभरि ने |
सौभरि मुनि ने सोचा: मैं वृद्धावस्था के कारण अब निर्बल हो गया हूँ।
मेरे बाल सफेद हो चुकेहैं, मेरी चमड़ी झूल रही है और मेरा सिर सदा हिलता रहता है।
इसके अतिरिक्त मैं योगी हूँ।
अतएव येस्त्रियाँ मुझे पसन्द नहीं करतीं।
चूँकि राजा ने मुझे तिरस्कृत कर दिया है अतएव मैं अपने शरीर कोऐसा बनाऊँगा कि मैं संसारी राजाओं की कन्याओं का ही नहीं अपितु सुर-सुन्दरियों के लिए भीअभीष्ट बन जाऊँ।
मुनि: प्रवेशित: क्षत्रा कन्यान्तःपुरमृद्धिमत् ।
वृतः स राजकन्याभिरेक॑ पञ्ञाशता वर: ॥
४३॥
मुनि:--सौभरि मुनि; प्रवेशित:--भीतर ले जाये गये; क्षत्रा--महल के दूत द्वारा; कन्या-अन्तःपुरम्--राजकुमारियों के रिहायशीमकान में; ऋद्धि-मत्--सभी प्रकार से अत्यन्त ऐश्वर्यमय; वृत:--स्वीकार किया; सः--उसने; राज-कन्याभि:--सारी राजकुमारियोंद्वारा; एकम्--अकेला वह; पञ्ञाशता--पचासों द्वारा; वर: --पति |
तत्पश्चात् जब सौभरि मुनि तरुण और रूपवान हो गये तब राजप्रासाद का दूत उन्हें राजकुमारियोंके अन्तःपुर में ले गया जो अत्यन्त ऐश्वर्यमय था।
तत्पश्चात् उन पचासों राजकुमारियों ने उस अकेलेव्यक्ति को अपना पति बना लिया।
तासां कलिरभूद्धूयांस्तदर्थ पोह्म सौहदम् ।
ममानुरूपो नायं व इति तद्गतचेतसाम् ॥
४४॥
तासाम्--सारी राजकुमारियों में; कलि:--कलह तथा बैर; अभूत्--हो गया; भूयान्--अत्यधिक; तत्-अर्थ--सौभरि मुनि को लेकर;अपोह्य--त्यागकर; सौहदम्-- अच्छे सम्बन्ध; मम--मेरे; अनुरूप: --उपयुक्त व्यक्ति; न--नहीं; अयम्--यह; वः--तुम्हारा; इति--इस प्रकार; तत्-गत-चेतसाम्--उससे आकृष्ट होकर।
तत्पश्चात् राजकुमारियाँ सौभरि मुनि द्वारा आकृष्ट होकर अपना बहिन का नाता भूल गईं औरपरस्पर यह कहकर झगड़ने लगीं 'यह व्यक्ति मेरे योग्य है, तुम्हारे योग्य नहीं।
इस तरह से उन सबोंमें काफी विरोध उत्पन्न हो गया।
स बह्नचस्ताभिरपारणीयतपःश्रियानर्ध्यपरिच्छदेषु ।
गृहेषु नानोपवनामलाम्भ:सरःसु सौगन्धिककाननेषु ॥
४५॥
महाईशय्यासनवस्त्रभूषणस्नानानुलेपाभ्यवहारमाल्यकै: ।
स्वलड्ड तस्त्रीपुरुषेषु नित्यदारेमेडनुगायद्द््वज भूड़वन्दिषु ॥
४६॥
सः--वह, सौभरि ऋषि; बहु-ऋच: --वैदिक मंत्रों का उपयोग करने में पटु; ताभि:ः--अपनी पत्नियों के साथ; अपारणीय-- असीम;तपः--तपस्या का फल; श्रिया--ऐश्वर्य से; अनर्ध्य--भोग की सामग्री; परिच्छदेषु--विभिन्न वस्त्रों से सज्जित; गृहेषु--घर में; नाना--तरह-तरह के; उपवन--पार्क; अमल--स्वच्छ; अम्भ:--जल; सरःसु--झीलों में; सौगन्धिक --अत्यन्त सुगन्धित; काननेषु--बगीचोंमें; महा-अर्ह--अत्यन्त कीमती; शय्या--बिस्तर; आसन--बैठने के स्थान; वस्त्र--वस्त्र; भूषण--गहने; स्नान--स्नानागार;अनुलेप--चंदन; अभ्यवहार--व्यंजन; माल्यकै:--तथा मालाओं से; सु-अलड्डू त--भलीभाँति सज्जित; स्त्री--स्त्रियाँ; पुरुषेषु--पुरुषों सहित; नित्यदा--निरन्तर; रेमे-- भोग किया; अनुगायत्--गायन के साथ; द्विज--पक्षी; भूड़-- भौरे; वन्दिषु--तथा बन्दीजन,पेशेवर गवैये।
चूँकि सौभरि मुनि मंत्रोचारण करने में पूर्णरूपेन पटु थे अतएव उनकी कठिन तपस्या सेऐश्वर्यशाली घर, वस्त्र, गहने, सुसज्जित दास तथा दासियाँ स्वच्छ जलवाली झीलें, उद्यानों से युक्तविविध बगीचे उत्पन्न हो गये।
उद्यानों में विविध प्रकार के सुगन्धित फूल, चहकते पक्षी तथा गुनगुनातेभौरे थे और मुनि पेशेवर गायकों से घिरे थे।
सौभरि मुनि के घर में मूल्यवान बिस्तर, आसन, गहने,स्नानागार और तरह-तरह के चन्दनलेप, फूलमालाएँ तथा स्वादिष्ट व्यंजन थे।
इस प्रकार ऐश्वर्यशालीसाज-सामान से घिरे हुए सौभरि मुनि अपनी अनेक पत्नियों के साथ गृहकार्यों में व्यस्त हो गये।
यद्गाईस्थ्यं तु संवीक्ष्य सप्तद्वीपवतीपति: ।
विस्मितः स्तम्भमजहात्सार्वभौमश्रियान्वितम् ॥
४७॥
यत्--जो; गा्ईस्थ्यम्--गृहस्थ जीवन को; तु--लेकिन; संवीक्ष्य--देखकर; सप्त-द्वीप-वती-पतिः--सात द्वीप वाले समस्त जगत काराजा मान्धाता; विस्मित:--आश्चर्यचकित; स्तम्भम्--गौरवशाली पद के कारण घमंड; अजहात्--त्याग दिया; सार्व-भौम--सारेजगत का सम्राट; अया-अन्वितमू--सभी प्रकार के ऐश्वर्यों से युक्त |
सप्तद्वीपमय जगत के राजा मान्धाता ने जब सौभरि मुनि के घरेलू ऐश्वर्य को देखा तो वेआश्चर्यचकित रह गये।
उन्होंने जगत के सम्राट के रूप में अपनी झूठी प्रतिष्ठा छोड़ दी।
एवं गृहेष्वभिरतो विषयान्विविधे: सुखैः ।
सेवमानो न चातुष्यदाज्यस्तोकैरिवानल: ॥
४८ ॥
एवम्--इस प्रकार; गृहेषु--घरेलू कार्यों में; अभिरत:--सदैव व्यस्त; विषयान्ू-- भौतिक साज-सामग्री; विविधै: --नाना प्रकार के;सुखै:--सुख से; सेवमान:--सेवित होकर; न--नहीं; च--भी; अतुष्यत्--सन्तुष्ट हुआ; आज्य-स्तोकै :--घी की बूँदों से; इब--सहश; अनलः--अग्नि।
इस प्रकार सौभरि मुनि इस भौतिक जगत में इन्द्रियतृप्ति करते रहे, किन्तु वे तनिक भी सन्तुष्टनहीं थे जिस प्रकार निरन्तर घी की बूँदें पाते रहने से अग्नि कभी जलना बन्द नहीं करती।
सर 'कदाचिदुपासीन आत्मापह्नवमात्मन: ।
ददर्श बह्नचाचार्यो मीनसड्रसमुत्थितम् ॥
४९॥
सः--वह, सौभरि मुनि; कदाचित्--एक दिन; उपासीन:--बैठा हुआ; आत्म-अपहृवम्--तपस्या के पद से च्युत होकर; आत्मन:--स्वयं; दरदर्श--देखा; बहु-ऋच-आचार्य: --मंत्रों के उच्चारण में पटु सौभरि मुनि; मीन-सड़--मछली का मैथुन; समुत्थितम्ू--इसघटना से उत्पन्नतत्पश्चात् मंत्रोच्चार करने में पटु सौभरि मुनि एक दिन जब एकान्त स्थान में बैठे थे, तो उन्होंनेअपने पतन के कारण के विषय में सोचा।
कारण यही था कि उन्होंने एक मछली के मैथुन से अपनेआपको सम्बद्ध कर दिया था।
अहो इमं पश्यत मे विनाशं'तपस्विनः सच्चरितत्रतस्य ।
अन्तर्जले वारिचरप्रसडझत्प्रच्यावितं ब्रह्म चिरं धृतं यत् ॥
५०॥
अहो--ओह; इमम्--यह; पश्यत--जरा देखो तो; मे--मेरा; विनाशम्--पतन; तपस्विन:--तपस्वी; सत्-चरित--अच्छे चरित्र वाला;ब्रतस्थ--ब्रत धारण करने वाले का; अन्त:-जले--जल के भीतर; वारि-चर-प्रसड्रातू--जलचरों के मैथुन कार्य से; प्रच्यावितम्--गिरा हुआ; ब्रह्म--ब्रह्म-साक्षात्कार या तपस्या के कार्यों से; चिरम--दीर्घकाल तक; धृतम्ू--किये गये; यत्--जो |
ओह! गम्भीर जल के भीतर तपस्या करने पर भी तथा साधु पुरुषों द्वारा अभ्यास किये जाने वालेसारे विधि-विधानों का पालन करते हुए भी मैंने मात्र मछली के मैथुन-सात्नरिध्य के कारण अपनीदीर्घकालीन तपस्या का फल हाथों से जाने दिया।
हर एक को इस पतन को देखकर इससे सीखलेनी चाहिए।
सड़ूं त्यजेत मिथुनब्रतीनां मुमुक्षु: सर्वात्मना न विसृजेद्ठहिरिन्द्रियाणि ।
एककश्चरत्रहसि चित्तमनन्त ईशेयुद्जीत तद्ब्रतिषु साधुषु चेत्प्रसड़: ॥
५१॥
सड्डम्ू--संगति; त्यजेत--छोड़ देना चाहिए; मिथुन-ब्रतीनाम्ू--वैध या अवैध मैथुन कार्यो में लगे रहने वाले व्यक्तियों का; मुमुक्षु:--मोक्ष चाहने वाले व्यक्ति; सर्व-आत्मना--सभी प्रकार से; न--नहीं; विसृजेत्ू--काम में लगाये; बहि:-इन्द्रियाणि--बाहरी इन्द्रियों को;एकः--अकेले; चरन्--घूमते हुए; रहसि--एकान्त स्थान में; चित्तमू--मन; अनन्ते ईशे--असीम भगवान् के चरणकमलों पर स्थिर;युद्भीत--लगाये; तत्-ब्रतिषु--एक ही कोटि के लोगों के साथ ( जो भवबन्धन से मोक्ष के कामी हों ); साधुषु--ऐसे पुरुषों की;चेत्--यदि; प्रसड्भ:--संगति।
भवबन्धन से मोक्ष की कामना करने वाले पुरुष को वासनामय जीवन में रुचि रखने वालेव्यक्तियों की संगति छोड़ देनी चाहिए और अपनी इन्द्रियों को किसी बाह्मकर्म में ( देखने, सुनने,बोलने, चलने इत्यादि ) नहीं लगाना चाहिए।
उसे सदैव एकान्त स्थान में ठहरना चाहिए और मन कोअनन्त भगवान् के चरणकमलों पर पूर्णतः स्थिर करना चाहिए।
यदि कोई संगति करनी भी हो तोउसे उसी प्रकार के कार्य में लगे पुरुषों की संगति करनी चाहिए।
एकस्तपस्व्यहमथाम्भसि मत्स्यसड्भरात्पञ्ञाशदासमुत पञ्ञसहस्त्रसर्ग: ।
नान्तं ब्रजाम्युभयकृत्यमनोरथानांमायागुणैईतमतिर्विषये३र्थभाव: ॥
५२॥
एकः--एकमात्र; तपस्वी--मुनि; अहमू--मैंने; अथ--इस प्रकार; अम्भसि--गहरे जल में; मत्स्य-सड्ञात्--मछली की संगति में रहनेसे; पञ्चाशत्ू--पचास; आसमू--पत्ियाँ प्राप्त कीं; उत--हर एक से सौ-सौ पुत्र उत्पन्न करना दूर रहा; पञ्ञ-सहस्त्र-सर्ग:--पाँच हजारसन््ताने; न अन्तम्--कोई अन्त नहीं; ब्रजामि--ढूँढ सकता हूँ; उभय-कृत्य--इस जन्म तथा अगले जन्म के कार्य; मनोरथानाम्ू--मनोरथ; माया-गुणैः-- प्रकृति के गुणों द्वारा प्रभावित; हृत--खोया हुआ; मति: विषये-- भौतिक वस्तुओं के लिए विशेष आकर्षण;अर्थ-भाव:--स्वार्थ की बातें
शुरू में मैं अकेला था और योग की तपस्या करता रहता था, किन्तु बाद में मैथुनरत मछली कीसंगति के कारण मुझमें विवाह करने की इच्छा जगी।
तब मैं पचास पत्नियों का पति बन गया औरहर एक ने एक एक सौ पुत्र उत्पन्न किये।
इस तरह मेरे परिवार में पाँच हजार सदस्य हो गये।
प्रकृतिके गुणों से प्रभावित होकर मेरा पतन हुआ और मैंने सोचा कि भौतिक जीवन में मैं सुखी रहूँगा।
इसतरह इस जीवन तथा अगले जीवन में भोग के लिए मेरी इच्छाओं का कोई अन्त नहीं है।
एवं वसन्गृहे कालं विरक्तो न्यासमास्थित: ।
वन॑ जगामानुययुस्तत्पत्य: पतिदेवता: ॥
५३॥
एवम्--इस तरह; वसन्--रहते हुए; गृहे--घर पर; कालम्--समय बिताकर; विरक्त:--विरक्त हो गया; न्यासम्--वानप्रस्थ आश्रममें; आस्थित:--स्थित हो गया; वनम्--जंगल में; जगाम--वह चला गया; अनुययु: --उसके पीछे-पीछे; तत्-पल्य: --उसकी सारीपत्नियाँ; पति-देवता:--क्योंकि पति ही उनका एकमात्र आराध्य था।
इस तरह उसने कुछ काल तक घरेलू कार्यो में अपना जीवन बिताया लेकिन बाद में वह भौतिकभोग से विरक्त हो गया।
उसने भौतिक संगति का परित्याग करने के लिए वानप्रस्थ आश्रम ग्रहणकिया और फिर वह जंगल में चला गया।
पतिपरायणा पत्नियों ने उसका अनुसरण किया क्योंकिअपने पति के अतिरिक्त उनका कोई आश्रय न था।
तत्र तप्त्वा तपस्तीक्ष्णमात्मदर्शनमात्मवान् ।
सहैवाग्निभिरात्मानं युयोज परमात्मनि ॥
५४॥
तत्र--जंगल में; तप्त्वा--तपस्या करते हुए; तप:--तपस्या के नियम; तीक्ष्णम्--अत्यन्त कठोर; आत्म-दर्शनम्--आत्म-साक्षात्कार मेंसहायक; आत्मवान्--आत्म से अभिज्ञ; सह--साथ में; एब--निश्चय ही; अग्निभि:--अग्नियों के; आत्मानम्--स्वयं को; युयोज--लगाया; परम-आत्मनि--परमात्मा में |
जब आत्मवान सौभरि मुनि जंगल में चले गये तो उन्होंने कठोर तपस्याएँ की।
इस तरह अन्ततःमृत्यु के समय उन्होंने अग्नि में स्वयं को भगवान् की सेवा में लगा दिया।
ताः स्वपत्युर्महाराज निरीक्ष्याध्यात्मिकीं गतिम् ।
अन्वीयुस्तत्प्रभावेण अग्नि शान्तमिवार्चिष: ॥
५५॥
ताः--सौभरि की सारी पत्रियाँ; स्व-पत्यु:--अपने पति के साथ; महाराज--हे राजा परीक्षित; निरीक्ष्य--देखकर; अध्यात्मिकीम्--आध्यात्मिक; गतिम्-- प्रगति; अन्वीयु:--अनुसरण किया; तत्-प्रभावेण--यद्यपि वे अयोग्य थीं किन्तु अपने पति के प्रभाव से, वे भीआध्यात्मिक लोक को चली गईं; अग्निमू--अग्नि; शान्तम्--पूर्णतया एकाकार; इब--सहृश; अर्चिष:--लपढें |
है महाराज परीक्षित, अपने पति को आध्यात्मिक जगत की ओर प्रगति करते देखकर सौभरिमुनि की पत्नियाँ भी मुनि की आध्यात्मिक शक्ति से बैकुण्ठलोक में प्रवेश करने में समर्थ हुईं जिसतरह अग्नि बुझाने पर अग्नि की ज्वालाएँ शमित हो जाती हैं।
