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अध्याय पाँच: दुर्वासा मुनि की जान बख़्शी
9.5एवं भगवतादिष्टो दुर्वासाश्चक्रतापित: ।
अम्बरीषमुपावृत्य तत्पादौदुःखितोग्रहीत् ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस तरह से; भगवता आदिष्ट:--भगवान् द्वारा आदेशित होकर; दुर्वासा:--दुर्वासा; चक्र-तापित:--सुदर्शन चक्र के द्वारा अत्यन्त सताया जाकर; अम्बरीषम्--महाराज अम्बरीष के; उपावृत्य--पास पहुँचकर;तत्-पादौ--उसके चरणकमलों को; दुःखित:ः--अत्यन्त दुखी होकर; अग्रहीत्ू--पकड़ लिया |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब भगवान् विष्णु ने दुर्वासा मुनि को इस प्रकार सलाह दी तोसुदर्शन चक्र से अत्यधिक उत्पीड़ित मुनि तुरन्त ही महाराज अम्बरीष के पास पहुँचे।
उन्होंने अत्यन्तदुखित होने के कारण राजा के चरणकमलों पर गिरकर उन्हें पकड़ लिया।
तस्य सोद्यममावीक्ष्य पादस्पर्शविलज्जित: ।
अस्तावीत्तिद्धरेरस्त्रं कृपया पीडितो भूशम् ॥
२॥
तस्य--दुर्वासा का; सः--महाराज अम्बरीष ने; उद्यमम्--प्रयत्त; आवीक्ष्य--देखकर; पाद-स्पर्श-विलज्जित: --दुर्वासा द्वारा अपनेचरणकमल छुए जाने से लज्जित; अस्तावीत्--स्तुति की; तत्--उस; हरेः अस्त्रम्-- भगवान् के अस्त्र की; कृपया--कृपापूर्वक;पीडित:ः--दुखित; भूशम्-- अत्यधिक |
जब दुर्वासा मुनि ने महाराज अम्बरीष के पाँव छुए तो वे अत्यन्त लज्जित हो उठे और जब उन्होंनेयह देखा कि दुर्वासा उनकी स्तुति करने का प्रयास कर रहे हैं तो वे दयावश और भी अधिक संतप्तहो उठे ।
अतः उन्होंने तुरन्त ही भगवान् के महान् अस्त्र की स्तुति करनी प्रारम्भ कर दी।
अम्बरीष उवाचत्वमग्निर्भगवास्सूर्यस्त्व॑ सोमो ज्योतिषां पति: ।
त्वमापस्त्व॑ क्षितिव्योम वायुमत्रिन्द्रियाणि च ॥
३॥
अम्बरीष: उवाच--महाराज अम्बरीष ने कहा; त्वम्--तुम ( हो ); अग्नि:--अग्नि; भगवान्--अ त्यन्त शक्तिशाली; सूर्य :--सूर्य;त्वमू--तुम ( हो ); सोम:--चन्द्रमा; ज्योतिषाम्--सारे नक्षत्रों के; पति:--स्वामी; त्वम्--तुम ( हो )आप:--जल; त्वमू--तुम ( हो );क्षितिः--पृथ्वी; व्योम-- आकाश; वायु:--वायु ; मात्र--इन्द्रियों के विषय, तन्मात्रा; इन्द्रियाणि--तथा इन्द्रियाँ; च-- भी
महाराज अम्बरीष ने कहा : हे सुदर्शन चक्र, तुम अग्नि हो, तुम परम शक्तिमान सूर्य हो तथा तुमसारे नक्षत्रों के स्वामी चन्द्रमा हो।
तुम जल, पृथ्वी तथा आकाश हो, तुम पाँचों इन्द्रियविषय ( ध्वनि,स्पर्श, रूप, स्वाद तथा गंध ) हो और तुम्हीं इन्द्रियाँ भी हो।
सुदर्शन नमस्तु भ्यं सहस्त्राराच्युतप्रिय ।
सर्वास्त्रधातिन्विप्राय स्वस्ति भूया इडस्पते ॥
४॥
सुदर्शन--हे भगवान् की मूल ज्योति; नम:--नमस्कार; तुभ्यम्--तुमको; सहस्त्र-अर--हे हजार अरों वाले; अच्युत-प्रिय-- भगवान्अच्युत के अत्यन्त प्रिय; सर्व-अस्त्र-घातिनू--हे सभी अस्त्रों को नष्ट करने वाले; विप्राय--इस ब्राह्मण को; स्वस्ति--अत्यन्त शुभ;भूया:--हो जाओ; इडस्पते--हे संसार के स्वामी |
हे भगवान् अच्युत के परम प्रिय, तुम एक हजार अरों वाले हो।
हे संसार के स्वामी, समस्त अस्त्रोंके विनाशकर्ता, भगवान् की आदि दृष्टि, मैं तुमको सादर नमस्कार करता हूँ।
कृपा करके इस ब्राह्मणको शरण दो तथा इसका कल्याण करो।
त्वं धर्मस्त्वमृतं सत्यं त्वं यज्ञोीईखिलयज्ञभुक् ।
त्वं लोकपाल: सर्वात्मा त्वं तेज: पौरुषं परम् ॥
५॥
त्वम्--तुम; धर्म:--धर्म; त्वमू--तुम; ऋतम्-प्रेरणाप्रद कथन; सत्यमू--चरम सत्य; त्वम्-तुम; यज्ञ:--यज्ञ; अखिल--सारे विश्वका; यज्ञ-भुक्--यज्ञ से उत्पन्न फलों का भोक्ता; त्वमू--तुम; लोक-पाल:--विभिन्न लोकों के पालनकर्ता; सर्व-आत्मा--सर्वव्यापी;त्वमू--तुम; तेज:--तेज; पौरुषम्--भगवान् का; परम्ू--दिव्य |
हे सुदर्शन चक्र, तुम धर्म हो, तुम सत्य हो, तुम प्रेरणाप्रद कथन हो, तुम यज्ञ हो तथा तुम्हीं यज्ञ-'फल के भोक्ता हो।
तुम अखिल ब्रह्माण्ड के पालनकर्ता हो और तुम्हीं भगवान् के हाथों में परम दिव्यतेज हो।
तुम भगवान् की मूल दृष्टि हो; अतएव तुम सुदर्शन कहलाते हो।
सभी वस्तुएँ तुम्हारे कार्यकलापोंसे उत्पन्न की हुई हैं, अतएव तुम सर्वव्यापी हो।
नमः सुनाभाखिलधर्मसेतवेह्ाधर्मशीलासुरधूमकेतवे ।
त्रैलोक्यगोपाय विशुद्धवर्चसेमनोजवायाद्भुतकर्मणे गुणे ॥
६॥
नमः--आपको सादर नमस्कार है; सु-नाभ--हे शुभ नाभि वाले; अखिल-धर्म-सेतवे--जिसके ेरे समस्त ब्रह्माण्ड के सेतु समान हैं;हि--निस्सन्देह; अधर्म-शील--अधार्मिक; असुर--असुरों के लिए; धूम-केतवे--जो अग्नि या अशुभ पुच्छल तारे के समान हैं,उनको; त्रैलोक्य--तीनों संसारों के; गोपाय--पालक को; विशुद्ध--दिव्य; वर्चसे--जिसका तेज; मनः-जवाय--मन के समान गतिवाला; अद्भुत--विचित्र; कर्मणे--इतना सक्रिय; गृणे--मैं बोलता हूँ
हे सुदर्शन, तुम्हारी नाभि अत्यन्त शुभ है, अतएव तुम धर्म की रक्षा करने वाले हो।
तुम अधार्मिकअसुरों के लिए अशुभ पुच्छल तारे के समान हो।
निस्सन्देह, तुम्हीं तीनों लोकों के पालक हो।
तुमदिव्य तेज से पूर्ण हो, तुम मन के समान तीव्रगामी हो और अद्भुत कर्म करने वाले हो।
मैं केवलनमः शब्द कहकर तुम्हें सादर नमस्कार करता हूँ ।
त्वत्तेजसा धर्ममयेन संहतंतमः प्रकाशश्व दशो महात्मनाम् ।
दुरत्ययस्ते महिमा गिरां पतेत्वद्रूपमेतत्सदसत्परावरम् ॥
७॥
त्वतू-तेजसा--तुम्हारे तेज से; धर्म-मयेन--ध धार्मिक नियमों से पूर्ण; संहतम्--दूर हो जाता है; तम:--अंधकार; प्रकाश: च--प्रकाशभी; दहशः--सभी दिशाओं का; महा-आत्मनाम्-महान् विद्वान पुरुषों का; दुरत्ययः--दुर्लध्य; ते--तुम्हारी; महिमा--महिमा; गिराम्पते--हे वाणी के स्वामी; त्वत्ू-रूपम्--तुम्हारा स्वरूप; एतत्--यह; सत्-असतू--प्रकट तथा अप्रकट; पर-अवरम्--उच्च तथानिम्न
हे वाणी के स्वामी, धार्मिक सिद्धान्तों से पूर्ण तुम्हारे तेज से संसार का अंधकार दूर हो जाता हैऔर दिद्वान पुरुषों या महात्माओं का ज्ञान प्रकट होता है।
निस्सन्देह, कोई तुम्हारे तेज का पार नहीं पासकता क्योंकि सारी वस्तुएँ, चाहे प्रकट अथवा अप्रकट हों, स्थूल अथवा सूक्ष्म हों, उच्च अथवानिम्न हों, आपके तेज के द्वारा प्रकट होने वाले आपके विभिन्न रूप ही हैं।
यदा विसूष्टस्त्वमनझनेन वैबलं॑ प्रविष्टोडजित दैत्यदानवम् ।
बाहूदरोर्वड्घ्रिशिरो धराणिवृश्चन्नजस्त्रं प्रधने विराजसे ॥
८॥
यदा--जब; विसूष्ट:-- भेजा; त्वमू--तुमने; अनझ्नेन--दिव्य भगवान् द्वारा; बै--निस्सन्देह; बलम्ू--सैनिकों के; प्रविष्ट:--बीचघुसकर; अजित--हे अजित; दैत्य-दानवम्--दैत्यों तथा दानवों का; बाहु-- भुजाएँ; उदर--पेट; ऊरु--जाँखें; अड्ध्रि-- पाँव; शिरः-धराणि--र्दन; वृश्चन्--पृथक् करने वाले; अजस्त्रमू--निरन्तर; प्रधने--युद्धभूमि में; विराजसे--रहते हो |
हे अजित, जब तुम भगवान् द्वारा दैत्यों तथा दानवों के सैनिकों के बीच घुसने के लिए भेजे जाते हो तो तुम युद्धस्थल पर डटे रहते हो और निरन्तर उनके हाथों, पेटों, जाँघों, पाँवों तथा शिरों कोविलग करते रहते हो।
स त्वं जगत्नाण खलप्रहाणयेनिरूपितः सर्वसहो गदाभूता ।
विप्रस्य चास्मत्कुलदैवहेतवेविधेहि भद्गंं तदनुग्रहो हि नः ॥
९॥
सः--वह व्यक्ति; त्वमू--तुम; जगत्-त्राण--हे सम्पूर्ण जगत के रक्षक; खल-प्रहाणये--ईर्ष्यालु शत्रुओं को मारने में; निरूपित:--लगे हुए; सर्व-सहः--सर्वशक्तिमान; गदा-भूृता-- भगवान् द्वारा; विप्रस्थ--इस ब्राह्मण का; च-- भी; अस्मत्--हमारा; कुल-दैव-हेतवे--वंश के सौभाग्य हेतु; विधेहि--कृपा करके करें; भद्रमू--शुभ, कल्याण; तत्--वह; अनुग्रह:--कृपा; हि--निस्सन्देह;नः--हमारा।
हे विश्व के रक्षक, तुमको ईर्ष्यालु शत्रुओं को मारने के लिए भगवान् अपने सर्वशक्तिशाली अस्स्त्रके रूप में प्रयोग करते हैं।
हमारे सम्पूर्ण वंश के लाभ हेतु कृपया इस गरीब ब्राह्मण पर दयाकीजिये।
निश्चय ही, यह हम सब पर कृपा होगी।
यद्यस्ति दत्तमिष्टं वा स्वधर्मो वा स्वनुष्ठितः ।
कुल नो विप्रदैवं चेद्दूवजो भवतु विज्वर: ॥
१०॥
यदि--अगर; अस्ति-- है; दत्तम्ू-दान; इष्टमू--इृष्टदेव की पूजा करना; वा--अथवा; स्व-धर्म:--वृत्तिपरक कार्य; वा--अथवा; सु-अनुष्ठित:--भलीभाँति सम्पन्न किया गया; कुलमू--वंश; न:--हमारा; विप्र-दैवम्--ब्राह्मणों द्वारा कृपा प्राप्त; चेतू--यदि ऐसा;द्विज:--यह ब्राह्मण; भवतु--हो सके; विज्वर:--जलन से ( सुदर्शन चक्र से ) मुक्त |
यदि हमारे परिवार ने सुपात्रों को दान दिया है, यदि हमने कर्मकांड तथा यज्ञ सम्पन्न किये हैं,यदि हमने अपने-अपने वृत्तिपरक कर्तव्यों को ठीक से पूरा किया है और यदि हम विद्वान ब्राह्मणोंद्वारा मार्गदर्शन पाते रहे हैं तो मैं चाहूँगा कि उनके बदले में यह ब्राह्मण सुदर्शन चक्र के द्वारा उत्पन्नजलन से मुक्त कर दिया जाय।
यदि नो भगवान्प्रीत एक: सर्वगुणाश्रय: ।
सर्वभूतात्मभावेन द्विजो भवतु विज्वर: ॥
११॥
यदि--यदि; नः--हम पर; भगवानू-- भगवान्; प्रीत:-- प्रसन्न है; एक:--एकमात्र; सर्व-गुण-आश्रय:--समस्त दिव्य गुणों काआगार; सर्व-भूत-आत्म-भावेन--समस्त जीवों के प्रति दया भाव होने से; द्विज:--यह ब्राह्मण; भवतु--हो जाये; विज्वर:ः--सारे तापसे मुक्त
यदि समस्त दिव्य गुणों के आगार तथा समस्त जीवों के प्राण तथा आत्मा अद्वितीय परमेश्वर हमपर प्रसन्न हैं तो हम चाहेंगे कि यह ब्राह्मण दुर्वासा मुनि जलन की पीड़ा से मुक्त हो जाय।
श्रीशुक उबाचइति संस्तुवतो राज्ञो विष्णुचक्रं सुदर्शनम् ।
अशाम्यत्सर्वतो विप्रं प्रदृदद्राजयाच्ञया ॥
१२॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; संस्तुवतः--प्रार्थना किये जाने पर; राज्ञ:--राजा द्वारा; विष्णु-चक्रमू-- भगवान् विष्णु के चक्र को; सुदर्शनम्--सुदर्शन नामक; अशाम्यत्--शान्त हो गया; सर्वतः--सभी तरह से; विप्रम्ू--ब्राह्मण को; प्रदहत्--जलाता हुआ; राज--राजा की; याच्जया--याचना द्वारा।
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : जब राजा ने सुदर्शन चक्र एवं भगवान् विष्णु की स्तुति की तोस्तुतियों के कारण सुदर्शन चक्र शान्त हुआ और उसने दुर्वासा मुनि नामक ब्राह्मण को जलाना बन्दकर दिया।
स मुक्तोउस्ल्राग्नितापेन दुर्वासा: स्वस्तिमांस्ततः ।
प्रशशंस तमुर्वीशं युज्ञान: परमाशिष: ॥
१३॥
सः--वह, दुर्वासा मुनि; मुक्त:--छूटकर; अस्त्र-अग्नि-तापेन--सुदर्शन चक्र की अग्नि के ताप से; दुर्वासा:--योगी दुर्वासा ने;स्वस्तिमान्ू-पूर्णतया संतुष्ट, ताप से मुक्त; ततः--तब; प्रशशंस--प्रशंसा की; तम्--उस; उर्वी-ईशम्--राजा को; युज्जान: --करतेहुए; परम-आशिष: --सर्वोच्च आशीर्वाद |
सुदर्शन चक्र की अग्नि से मुक्त किये जाने पर परम शक्तिशाली योगी दुर्वासा मुनि प्रसन्न हुए।
तब उन्होंने महाराज अम्बरीष के गुणों की प्रशंसा की और उन्हें उत्तमोत्तम आशीष दिये।
दुर्वासा उवाचअहो अनन्तदासानां महत्त्वं दृष्टमद्य मे ।
कृतागसोपि यद्राजन्मड्लानि समीहसे ॥
१४॥
दुर्वासा: उवाच--दुर्वासा मुनि ने कहा; अहो--ओह; अनन्त-दासानाम्-- भगवान् के सेवकों की; महत्त्वम्--महानता; दृष्टम्--देखीगई; अद्य--आज; मे--मेरे द्वारा; कृत-आगस: अपि--अपराधी होते हुए भी; यत्ू--फिर भी; राजन्--हे राजा; मड्रलानि--सौभाग्यके लिए; समीहसे--तुम याचना कर रहे हो।
दुर्वासा मुनि ने कहा : हे राजा, आज मैंने भगवान् के भक्तों की महानता का अनुभव कियाक्योंकि मेरे अपराधी होने पर भी आपने मेरे सौभाग्य के लिए प्रार्थना की है।
दुष्करः को नु साधूनां दुस्त्यजो वा महात्मनाम् ।
येः सड्डरहीतो भगवान्सात्वतामृषभो हरि: ॥
१५॥
दुष्करः--कर पाना कठिन; कः--क्या; नु--निस्सन्देह; साधूनाम्--भक्तों का; दुस्त्यज:--छोड़ पाना असम्भव; वा--अथवा; महा-आत्मनाम्ू-महापुरुषों का; यैः--जिन पुरुषों के द्वारा; सड्रहीत:--( भक्ति द्वारा ) प्राप्त किया गया; भगवान्-- भगवान्; सात्वताम्--शुद्ध भक्तों का; ऋषभः--नायक; हरिः-- भगवान्
जिन लोगों ने शुद्ध भक्तों के स्वामी भगवान् को प्राप्त कर लिया है उनके लिए क्या करनाअसम्भव है और क्या त्यागना असम्भव है ?
यन्नामश्रुतिमात्रेण पुमान्भवति निर्मल: ।
तस्य तीर्थपदः कि वा दासानामवशिष्यते ॥
१६॥
यतू-नाम-- भगवान् का पवित्र नाम; श्रुति-मात्रेण--सुनने से ही; पुमान्ू--मनुष्य; भवति--हो जाता है; निर्मल:--शुद्ध; तस्थ--उसका; तीर्थ-पदः-- भगवान् जिनके चरण पवित्र स्थल हैं; किम् वा--क्या; दासानाम्-दासों के द्वारा; अवशिष्यते--करने कोबचता है।
भगवान् के दासों के लिए क्या असम्भव है?
भगवान् का पवित्र नाम सुनने मात्र से ही मनुष्यशुद्ध हो जाता है।
राजन्ननुगृहीतोहं त्वयातिकरुणात्मना ।
मदघं पृष्ठतः कृत्वा प्राणा यन्मेडभिरक्षिता: ॥
१७॥
राजनू--हे राजा; अनुगृहीत:ः--अत्यधिक दया प्राप्त; अहम्--मैं; त्ववा--आपके द्वारा; अति-करुण-आत्मना--आपके अत्यन्त'करुणामय होने से; मत्-अघम्--मेरे अपराध; पृष्ठतः--पीठ की ओर; कृत्वा--करके; प्राणा:--प्राण; यत्--जो; मे--मेरा;अभिरक्षिता:--बचाया।
हे राजन, आपने मेरे अपराधों को अनदेखा करके मेरा जीवन बचाया है।
इस तरह मैं आपकाअत्यन्त अनुगृहीत हूँ क्योंकि आप इतने दयावान हैं।
राजा तमकृताहारः प्रत्यागमनकाइक्षया ।
चरणावुपसडूह्म प्रसाद्य समभोजयत् ॥
१८॥
राजा--राजा; तम्--उसको, दुर्वासा को; अकृत-आहारः --भोजन करने से विरत; प्रत्यागमन--वापसी; काड्क्षया--चाहते हुए;चरणौ--पाँवों तक; उपसडूह्य --पहुँच कर; प्रसाद्य--सभी प्रकार से तुष्ट करके; समभोजयत्-- भोजन कराया
राजा ने दुर्वासा मुनि की वापसी की आशा से स्वयं भोजन नहीं किया था।
अतएवं जब मुनिलौटे तो राजा उनके चरण-कमलों पर गिर पड़ा और उन्हें सभी प्रकार से तुष्ट करके भरपेट भोजनकराया।
सोशित्वाह्तमानीतमातिथ्यं सार्वकामिकम् ।
तृप्तात्मा नृपतिं प्राह भुज्यतामिति सादरम् ॥
१९॥
सः--वह ( दुर्वासा ); अशित्वा-- भरपेट भोजन करके; आहतम्--बड़े सत्कार के साथ; आनीतम्--स्वागत किया; आतिथ्यम्--तरह-तरह के व्यंजन प्रदान किये; सार्व-कामिकम्--सभी प्रकार से स्वादों को पूरा करने वाले; तृप्त-आत्मा--पूरी तरह से तुष्ट;नृपतिम्--राजा से; प्राह--कहा; भुज्यताम्--हे राजा, तुम भी खाओ; इति--इस प्रकार; स-आदरम्--आदरपूर्वक ।
इस प्रकार राजा ने बड़े आदर के साथ दुर्वासा मुनि का स्वागत किया।
वे नाना प्रकार केस्वादिष्ट व्यंजन खाकर इतने सन्तुष्ट हुए कि उन्होंने बड़े ही स्नेह से राजा से भी खाने के लिए प्रार्थनाकी 'कृपया भोजन ग्रहण करें।
प्रीतोस्म्यनुगृहीतो स्मि तब भागवतस्य वै ।
दर्शनस्पर्शनालापैरातिथ्येनात्ममेधसा ॥
२०॥
प्रीतः--अत्यधिक सन्तुष्ट; अस्मि--हूँ; अनुगृहीत:ः-- अत्यन्त आभारी; अस्मि--हूँ; तब--तुम; भागवतस्य--शुद्ध भक्त का; बै--निस्सन्देह; दर्शन--तुम्हें देखकर; स्पर्शन--तथा तुम्हारे पाँवों का स्पर्श करके; आलापै:--तुमसे बातें करके; आतिथ्येन--तुम्हारेआतिथ्य से; आत्म-मेधसा--अपनी बुद्धि से
दुर्वासा मुनि ने कहा : हे राजा, मैं आपसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ।
पहले मैंने आपको एक सामान्यव्यक्ति ससझकर आपका आतिथ्य स्वीकार किया था, किन्तु बाद में अपनी बुद्धि से मैं समझ सकाकि आप भगवान् के अत्यन्त महान् भक्त हैं।
इसलिए मात्र आपके दर्शन और आपके चरणस्पर्श सेतथा आपसे बातें करके मैं सन्तुष्ट हो गया हूँ और आपका अत्यन्त कृतज्ञ हो गया हूँ।
कर्मावदातमेतत्ते गायन्ति स्वःस्त्रियो मुहुः ।
कीर्ति परमपुण्यां च कीर्तयिष्यति भूरियम् ॥
२१॥
कर्म--कार्य; अवदातम्--कल्मषरहित; एतत्--यह सारा; ते--तुम्हारा; गायन्ति--गायेंगे; स्व:-स्त्रिय:--स्वर्ग की स्त्रियाँ; मुहुः--सदा; कीर्तिमू--कीर्ति, यश; परम-पुण्याम्--अत्यन्त पवित्र तथा महिमामय; च--भी; कीर्तयिष्यति--निरन्तर गान करेगा; भू: --सारासंसार; इयम्--यह।
स्वर्गलोक की सारी भाग्यशाली स््रियाँ प्रतिक्षण आपके निर्मल चरित्र का गान करेंगी और इससंसार के लोग भी आपकी महिमा का निरन्तर उच्चारण करेंगे।
श्रीशुक उबाचएवं सड्डीर्त्य राजानं दुर्वासा: परितोषित: ।
ययौ विहायसामन्न्य ब्रह्लोकमहैतुकम् ॥
२२॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; सड्लीतत्य--महिमागान करके ; राजानमू--राजा को; दुर्वासा:--महान् योगी दुर्वासा मुनि; परितोषित:--सभी प्रकार से संतुष्ट होकर; ययौ--वहाँ से चला गया; विहायसा--अन््तरिक्ष मार्ग से;आमन्त्य--अनुमति लेकर; ब्रह्मलोकम्--इस ब्रह्माण्ड के सर्वोच्च लोक को; अहैतुकम्--शुष्क चिन्तन से विहीन।
श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : इस प्रकार सब तरह से सन्तुष्ट होकर महान् योगी दुर्वासा ने अनुमति ली और वे राजा का निरन्तर यशोगान करते हुए वहाँ से चले गये।
वे आकाश मार्ग सेब्रह्मलोक गये जो शुष्क ज्ञानियों से रहित है।
संवत्सरोत्यगात्तावद्यावता नागतो गत: ।
मुनिस्तदर्शनाकाड्झ्ो राजाब्भक्षो बभूव ह ॥
२३॥
संवत्सर: --पूरा एक वर्ष; अत्यगात्--बीत गया; तावत्--तब तक; यावता--जब तक; न--नहीं; आगत: --वापस आया; गत: --गया हुआ, दुर्वासा मुनि; मुनि:ः--मुनि; तत्-दर्शन-आकाइक्ष: --उसे फिर से देखने की इच्छा करते हुए; राजा--राजा; अपू-भक्ष:--केवल जल ग्रहण करके; बभूव--रहा; ह--निस्सन्देह |
दुर्वासा मुनि महाराज अम्बरीष के स्थान से चले गये थे और जब तक वे वापस नहीं लौटे--पूरेएक वर्ष तक--तब तक राजा केवल जल पीकर उपवास करते रहे।
गतेथ दुर्वाससि सोम्बरीषोद्विजोपयोगातिपवित्रमाहरत् ।
ऋषेविमोक्ष॑ व्यसन च वीक्ष्यमेने स्ववीर्य च परानुभावम् ॥
२४॥
गते--वापस आने पर; अथ--तब ; दुर्वाससि--महान् योगी दुर्वासा के; सः--वह राजा; अम्बरीष:--महाराज अम्बरीष; द्विज-उपयोग--शुद्ध ब्राह्मण के लिए सर्वोपयुक्त; अति-पवित्रम्--अत्यन्त शुद्ध भोजन; आहरत्-- खाया और खाने को दिया; ऋषे: --ऋषिका; विमोक्षम्--मुक्ति, छूटना; व्यसनम्--सुदर्शन चक्र द्वारा भस्म किये जाने के महान् संकट से; च--तथा; वीक्ष्य--देखकर;मेने--विचार किया; स्व-वीर्यम्--अपने पौरुष के विषय में; च-- भी; पर-अनुभावम्-- भगवान् की शुद्ध भक्ति के कारण
एक वर्ष बाद जब दुर्वासा मुनि लौटे तो राजा अम्बरीष ने उन्हें सभी प्रकार के व्यंजन भरपेट खिलाये और तब स्वयं भी भोजन किया।
जब राजा ने देखा कि दुर्वासा दग्ध होने के महान् संकट सेमुक्त हो चुके हैं तो वे यह समझ सके कि भगवान् की कृपा से वे स्वयं भी शक्तिमान हैं, किन्तु उन्होंनेइसका श्रेय अपने को नहीं दिया क्योंकि यह सब भगवान् ने किया था।
एवं विधानेकगुण: स राजापरात्मनि ब्रह्मणि वासुदेवे ।
क्रियाकलापै: समुवाह भक्तिययाविरिज्च्यान्निरयां क्षकार ॥
२५॥
एवम्--इस तरह; विधा-अनेक-गुण: --अनेकानेक गुणों से युक्त; सः--वह महाराज अम्बरीष; राजा--राजा; पर-आत्मनि--परमात्मामें; ब्रह्मणि--ब्रह्म में; वासुदेवे--वासुदेव कृष्ण में; क्रिया-कलापैः--कार्यो से; समुवाह--सम्पन्न किया; भक्तिम्ू-- भक्ति; यया--ऐसे कार्यो से; आविरिज्च्यान्--सर्वोच्चलोक से लेकर; निरयान्ू--नरकलोकों तक; चकार--सर्वत्र संकट का अनुभव किया।
इस प्रकार अपनी भक्ति के कारण नाना प्रकार के दिव्य गुणों से युक्त महाराज अम्बरीष ब्रह्म,परमात्मा तथा भगवान् से भलीभाँति अवगत हो गये और सम्यक् रीति से भक्ति करने लगे।
अपनीभक्ति के कारण उन्हें इस भौतिक जगत का सर्वोच्चलोक भी नरक तुल्य लगने लगा।
श्रीशुक उबाचअधाम्बरीषस्तनयेषु राज्यंसमानशीलेषु विसृज्य धीर: ।
बनं विवेशात्मनि वासुदेवेमनो दधद्ध्वस्तगुणप्रवाह: ॥
२६॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अथ--इस प्रकार; अम्बरीष:--राजा अम्बरीष; तनयेषु--अपने पुत्रों को; राज्यम्--राज्य; समान-शीलेषु--अपने पिता की ही भाँति योग्य; विसृज्य--बाँट करके; धीर:--अत्यन्त विद्वान पुरुष, महाराज अम्बरीष;वनम्--वन में; विवेश--प्रविष्ट हुए; आत्मनि-- भगवान्; वासुदेवे--वासुदेव नाम से प्रसिद्ध कृष्ण में; मन:--मन को; दधत्--केन्द्रीभूत करते हुए; ध्वस्त--नष्ट; गुण-प्रवाह:--प्रकृति के गुणों की लहरें।
श्रील शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : तत्पश्चात् भक्तिमय जीवन की उन्नत दशा के कारणअम्बरीष भौतिक वस्तुओं की किसी तरह से इच्छा न रखते हुए सक्रिय गृहस्थ जीवन से उपरत होगये।
उन्होंने अपनी सम्पत्ति अपने ही समान योग्य पुत्रों में बाँट दी और स्वयं वानप्रस्थ आश्रमस्वीकार करके भगवान् वासुदेव में अपना मन पूर्णतः: एकाग्र करने के लिए जंगल चले गये।
इत्येतत्पुण्यमाख्यानमम्बरीषस्य भूपते ।
सट्डीतत॑यन्ननुध्यायन्भक्तो भगवतो भवेत् ॥
२७॥
इति--इस प्रकार; एतत्--यह; पुण्यम् आख्यानम्--इतिहास का सर्वाधिक पुण्यकर्म; अम्बरीषस्य--महाराज अम्बरीष का; भूपते--हेराजा ( परीक्षित ); सड्डीर्तयन्ू--दुहराने या कीर्तन करने से; अनुध्यायन्-- ध्यान धरने से; भक्त:--भक्त; भगवत:--भगवान् का;भवेत्--बन सकता है।
जो भी इस कथा को बार-बार पढ़ता है या महाराज अम्बरीष के कार्यकलापों से सम्बन्धित इसकथा का चिन्तन करता है वह अवश्य ही भगवान् का शुद्ध भक्त बन जाता है।
अम्बरीषस्य चरितं ये श्रण्वन्ति महात्मनः ।
मुक्ति प्रयान्ति ते सर्वे भक्त्या विष्णो: प्रसादतः ॥
२८ ॥
अम्बरीषस्थ--महाराज अम्बरीष का; चरितमू-- चरित्र; ये--जो लोग; श्रृण्वन्ति--सुनते हैं; महा-आत्मन:--महात्मा या भक्त का;मुक्तिमू-- मुक्ति; प्रयान्ति-- अवश्य पाते हैं; ते--ऐसे लोग; सर्वे--सभी; भक्त्या--भक्ति से; विष्णो:--भगवान् विष्णु की;प्रसादतः--कृपा से |
भगवत्कृपा से जो लोग महान् भक्त महाराज अम्बरीष के कार्यकलापों के विषय में सुनते हैं, वेअवश्य ही मुक्त हो जाते हैं या तुरन्त भक्त बन जाते हैं।
