← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 9 की सूची
अध्याय बीस: पुरु का राजवंश
9.20पूरोर्व॑शं प्रवक्ष्यामि यत्र जातोउईसि भारत ।
यत्र राजर्षयो वंश्याब्रह्मवंश्या श्व जज्ञिरि ॥
१॥
श्री-बादरायणि: उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; पूरो: वंशम्--महाराज पूरु का वंश; प्रवक्ष्यामि-- अब वर्णन करूँगा; यत्र--जिस वंश में; जात: असि--तुम उत्पन्न हुए हो; भारत--हे महाराज भरत के वंशज; यत्र--जिस वंश में; राज-ऋषय: --सारे राजा, जोऋषि तुल्य थे; बंश्या:--एक के बाद एक; ब्रह्म-वंश्या:--अन्य ब्राह्मण वंश; च--भी; जज्ञिरि--निकले हैं
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे महाराज भरत के वंशज महाराज परीक्षित, अब मैं पूरु के वंश कावर्णन करूँगा जिसमें तुम उत्पन्न हुए हो, जिसमें अनेक राजर्षि हुए हैं, जिनसे अनेक ब्राह्मण वंशों काप्रारम्भ हुआ है।
जनमेजयो ह्यभूत्पूरो: प्रचिन्वांस्तत्सुतस्ततः ।
प्रवीरोथ मनुस्युर्वे तस्माच्चारुपदो भवत् ॥
२॥
जनमेजय:--राजा जनमेजय; हि--निस्सन्देह; अभूत्--उत्पन्न हुआ; पूरोः--पूरु से; प्रचिन्वान्--प्रचिन्वान; तत्ू--उसका; सुतः--पुत्र;ततः--उससे ( प्रचिन्वान से ); प्रवीर:--प्रवीर; अथ--तत्पश्चात्; मनुस्यु:--प्रवीर का पुत्र मनुस्यु; बै--निस्सन्देह; तस्मात्--उससे;चारुपदः--राजा चारुपद; अभवत्--हुआ।
पूरु के ही इस वंश में राजा जनमेजय उत्पन्न हुआ।
उसका पुत्र प्रचिन्वान था और उसका पुत्र थाप्रवीर।
तत्पश्चात् प्रवीर का पुत्र मनुस्यु हुआ जिसका पुत्र चारुपद था।
तस्य सुद्युरभूत्युत्रस्तस्माद्वहुगवस्ततः ।
संयातिस्तस्याहंयाती रौद्राश्वस्तत्सुतः स्मृतः ॥
३॥
तस्य--उस ( चारुपद ) का; सुद्यु:--सुद्यु; अभूत्--उत्पन्न हुआ; पुत्र:--पुत्र; तस्मात्--उससे; बहुगव:ः --बहुगव नाम का पुत्र; तत:ः--उससे; संयातिः--संयाति; तस्थ--तथा उसका पुत्र; अहंयाति: --अहंयाति; रौद्राश्च: --रौद्रा श्र; तत्-सुत:--उसका पुत्र; स्मृत:--विख्यात।
चारुपद का पुत्र सुद्यु था और सुद्यु का पुत्र बहुगव था।
बहुगव का पुत्र संयाति था, जिससेअहंयाति नामक पुत्र हुआ और फिर उससे रौद्राश्व उत्पन्न हुआ।
ऋतेयुस्तस्य कक्षेयु: स्थण्डिलेयु: कृतेयुकः ।
जलेयु: सन्नतेयुश्न धर्मसत्यत्रतेयव: ॥
४॥
दशैतेउप्सरसः पुत्रा वनेयुश्चावमः स्मृतः ।
घृताच्यामिन्द्रियाणीव मुख्यस्य जगदात्मन: ॥
५॥
ऋतेयु:--ऋतेयु; तस्य--उसका ( रौद्राश्व ) का; कक्षेयु:--कक्षेयु; स्थण्डिलेयु: --स्थण्डिलेयु; कृतेयुक: --कृतेयुक; जलेयु:--जलेयु;सन्नतेयु:--सन्नतेयु; च-- भी; धर्म--धर्मेयु; सत्य--सत्येयु; ब्रतेयवः --तथा ब्रतेयु; दश--दस; एते--ये सभी; अप्सरस:--अप्सरा सेउत्पन्न; पुत्रा:--पुत्र; वनेयु:--वनेयु; च--तथा; अवम:--सबसे छोटा; स्मृत:--विख्यात; घृताच्याम्--घृताची; इन्द्रियाणि इब--दसइन्द्रियों के समान; मुख्यस्य--प्राण का; जगत्-आत्मन:--सारे विश्व का प्राण
रौद्राश्व के दस पुत्र थे जिनके नाम ऋतेयु, कक्षेयु, स्थण्डिलेयु, कृतेयुक, जलेयु, सन्नतेयु, धर्मेयु,सत्येयु, ब्रतेयु तथा बनेयु थे।
इन दसों में बनेयु सबसे छोटा था।
ये दसों पुत्र रौद्राश्व के पूर्ण नियंत्रणमें उसी प्रकार कार्य करते थे जिस तरह विश्वात्मा से उत्पन्न दसों इन्द्रियाँ प्राण के नियंत्रण में कार्यकरती हैं।
ये सभी घृताची नामक अप्सरा से उत्पन्न हुए थे।
ऋतेयो रन्तिनावोभूत्रयस्तस्यात्मजा नृप ।
सुमतिर्शुवोप्रतिरथ: कण्वोप्रतिरथात्मज: ॥
६॥
ऋतेयो:--ऋतेयु से; रन्तिनाव: --रन्तिनाव नामक पुत्र; अभूत्-- प्रकट हुआ; त्रयः--तीन; तस्य--उसके ( रन्तिनाव के ); आत्मजा:--पुत्र; नृप--हे राजा; सुमति:--सुमति; श्रुव:ः--श्ुव; अप्रतिरथ:--अप्रतिरथ; कण्व:--कण्व; अप्रतिरथ-आत्मज: --अप्रतिरथ काबेटा।
ऋतेयु से रन्तिनाव नामक पुत्र हुआ जिसके तीन पुत्र हुए जिनके नाम थे सुमति, श्रुव तथाअप्रतिरथ।
अप्रतिरथ के एकमात्र पुत्र का नाम कण्व था।
तस्य मेधातिथिस्तस्मात्प्रस्कन्नाद्या द्विजातय: ।
पुत्रो भूत्सुमते रेभिर्दुष्मन्तस्तत्सुतो मतः ॥
७॥
तस्य--कण्व का; मेधातिथि: --मेधातिथि; तस्मात्--उससे; प्रस्कन्न-आद्या:--प्रस्कन्न आदि; द्विजातय:--सभी ब्राह्मण; पुत्र:--पुत्र;अभूत्--हुए; सुमतेः--सुमति से; रेभि:--रेभि; दुष्मन्त:--महाराज दुष्मन्त; ततू-सुत:--रेभि का पुत्र; मतः--विख्यात है।
कण्व का पुत्र मेधातिथि था जिसके सारे पुत्र ब्राह्मण थे और उनमें प्रमुख प्रस्कन्न था।
रन्तिनावका पुत्र सुमति, सुमति का पुत्र रेभि और रेभि का पुत्र था महाराज दुष्मन्त।
दुष्मन्तो मृगयां यातः कण्वाश्रमपदं गतः ।
तत्रासीनां स्वप्रभया मण्डयन्तीं रमामिव ॥
८॥
विलोक्य सद्यो मुमुहे देवमायामिव स्त्रियम् ।
बभाषे तां वरारोहां भटैः कतिपयैर्वृत: ॥
९॥
दुष्मन्त:--महाराज दुष्मन्त; मृगयाम् यात:--शिकार करने के लिए गया हुआ; कण्व-आश्रम-पदम्ू--कण्व के आश्रम में; गत:--आया; तत्र--वहाँ; आसीनामू्--बैठी हुई; स्व-प्रभया--अपने सौन्दर्य से; मण्डयन्तीम्ू--प्रकाशित करती हुई; रमाम् इब--लक्ष्मी जीकी तरह; विलोक्य--देखकर; सद्यः --तुरन््त; मुमुहे--मोहित हो गया; देव-मायाम् इब-- भगवान् की माया के सहश; स्त्रियम्--सुन्दरस्त्री को; बभाषे--सम्बोधित किया; तामू--उसको; वर-आरोहाम्--सुन्दर स्त्रियों में सर्वश्रेष्ठ; भटै:ः--सैनिकों द्वारा; कतिपयै:--कुछ;बृत:ः:--घिरा हुआ
एक बार जब राजा दुष्मन्त शिकार करने जंगल गया और अत्यधिक थक गया तो वह महाराजकण्व के आश्रम में जा पहुँचा।
वहाँ उसने एक अत्यन्त सुन्दर स्त्री देखी जो लक्ष्मी जी के समान लगरही थी और वहाँ अपने तेज से सारे आश्रम को प्रकाशित करती हुई बैठी थी।
स्वभावतः राजा उसकेसौन्दर्य से आकृष्ट हो गया अतएव वह अपने कुछ सैनिकों के साथ उसके पास गया और उससेबोला।
तदर्शनप्रमुदित: सन्निवृत्तपरिश्रम: ।
पप्रच्छ कामसन्तप्त: प्रहसजएलक्ष्णया गिरा ॥
१०॥
ततू-दर्शन-प्रमुदित: --सुन्दर स्त्री को देखकर अत्यन्त प्रफुल्लित; सन्निवृत्त-परिश्रम: --शिकार करने की थकान से निवृत्त होकर;पप्रच्छ--उससे पूछा; काम-सन्तप्तः--कामेच्छाओं से उद्विग्न होकर; प्रहसन्--हँसी करते हुए; श्लक्षणया--सुन्दर तथा सुहावने;गिरा-शब्दों से |
उस सुन्दर स्त्री को देखकर राजा अत्यधिक हर्षित हुआ और शिकार- भ्रमण से उत्पन्न उसकी सारीथकावट जाती रही।
वह निस्सन्देह कामेच्छाओं के कारण अत्यधिक आकृष्ट था अतएव उसने हँसी-हँसी में उससे इस प्रकार पूछा।
का त्वं कमलपत्राक्षि कस्यासि हृदयडुमे ।
किं स्विच्चिकीर्षितं तत्र भवत्या निर्जने वने ॥
११॥
का--कौन; त्वमू--तुम हो; कमल-पत्र-अक्षि--हे कमलनेत्री; कस्य असि--तुम किससे सम्बन्धित हो; हृदयम्-गमे--हृदय कोसुहावनी लगने वाली अतीव सुन्दरी; किम् स्वित्ू--कौन सा काम; चिकीर्षितम्--सोच रही हो; तत्र--वहाँ; भवत्या: --तुम्हारे द्वारा;निर्जने--एकान्त; वबने--वन में
हे सुन्दर कमल नयनों वाली, तुम कौन हो ?
तुम किसकी पुत्री हो?
इस एकान्त वन में तुम्हाराक्या कार्य है?
तुम यहाँ क्यों रह रही हो ?
व्यक्त राजन्यतनयां वेद्म्यहं त्वां सुमध्यमे ।
न हि चेतः पौरवाणामधर्मे रमते क्वचित् ॥
१२॥
व्यक्तमू--ऐसा लगता है; राजन्य-तनयामू--क्षत्रिय की पुत्री; वेद्चि-- अनुभव कर सकता हूँ; अहम्--मैं; त्वाम्ू--तुमको; सु-मध्यमे--हे अतीव सुन्दरी; न--नहीं; हि--निश्चय ही; चेत:--मन; पौरवाणाम्--पूरुवंशी लोगों का; अधर्मे--अधर्म में; रमते-- भोग करता है;क्वचित्--कभी भी
है अतीव सुन्दरी, मुझे ऐसा लगता है कि तुम किसी क्षत्रिय की पुत्री हो।
चूँकि मैं पूरुवंशी हूँअतएव मेरा मन कभी भी अधार्मिक रीति से किसी वस्तु का भोग करने की चेष्टा नहीं करता।
श्रीशकुन्तलोबाचविश्वामित्रात्मजैवाहं त्यक्ता मेनकया वने ।
वेदैतद्धगवान्कण्वो वीर कि करवाम ते ॥
१३॥
श्री-शकुन्तला उबाच-- श्री शकुन्तला ने कहा; विश्वामित्र-आत्मजा--विश्वामित्र की पुत्री; एब--निस्सन्देह; अहम्--मैं ( हूँ );त्यक्ता--छोड़ी गई; मेनकया--मेनका द्वारा; बने--वन में; वेद--जानता है; एतत्--इन सारी घटनाओं को; भगवान्--शक्तिशालीऋषि; कण्व:--कण्व मुनि; वीर--हे वीर; किमू--क्या; करवाम--कर सकती हूँ; ते--तुम्हारे लिए
शकुन्तला ने कहा : मैं विश्वामित्र की पुत्री हूँ।
मेरी माता मेनका ने मुझे जंगल में छोड़ दिया था।
हे बीर, अत्यन्त शक्तिशाली सन्त कण्व मुनि इसके विषय में सब कुछ जानते हैं।
अब आप कहिए किमैं आपकी किस तरह सेवा करूँ ?
आस्यतां हारविन्दाक्ष गृह्मतामर्हणं च न: ।
भुज्यतां सन्ति नीवारा उष्यतां यदि रोचते ॥
१४॥
आस्यताम्ू--कृपया यहाँ बैठें; हि--निस्सन्देह; अरविन्द-अक्ष--कमल जैसे नेत्रों वाले वीर; गृह्मताम्--स्वीकार करें; अ्हणम्--आतिथ्य; च--तथा; नः--हमारा; भुज्यतामू--कृपया भोजन करें; सन्ति--जो कुछ है; नीवारा:--नीवार चावल; उष्यताम्ू--यहाँ पररुकें; यदि--यदि; रोचते-- आपको अच्छा लगे।
हे कमल जैसे नेत्रों वाले राजा, कृपया बैठ जायें और हमारे यथासम्भव आतिथ्य को स्वीकारकरें।
हमारे पास नीवार चावल हैं जिन्हें आप ग्रहण कर सकते हैं और यदि आप चाहें तो बिना किसीहिचक के यहाँ रुक सकते हैं।
श्रीदुष्मन्त उवाचउपपन्नमिदं सुभ्रु जाताया: कुशिकान्वये ।
स्वयं हि बृणुते राज्ञां कन््यका: सहृशं वरम् ॥
१५॥
श्री-दुष्मन्तः उबाच--राजा दुष्मन्त ने कहा; उपपन्नम्--तुम्हारी स्थिति के अनुरूप; इदम्--यह; सु-भ्रु-हे सुन्दर भौहों वालीशकुन्तला; जाताया:--अपने जन्म के कारण; कुशिक-अन्वये--विश्वामित्र के कुल में; स्वयम्--स्वयं; हि--निस्सन्देह; वृणुते--चुनती हैं; राज्ञामू--राज परिवार की; कन्यकाः-- लड़कियाँ; सहृशम्--समान स्तर के ; वरम्ू--पति को |
राजा दुष्मन्त ने उत्तर दिया: हे सुन्दर भौहों वाली शकुन्तला, तुमने महर्षि विश्वामित्र के कुल मेंजन्म लिया है और तुम्हारा आतिथ्य तुम्हारे कुल के अनुरूप है।
इसके अतिरिक्त राजा की कन्याएँसामान्यतया अपना वर स्वयं चुनती हैं।
ओमित्युक्ते यथाधर्ममुपयेमे शकुन्तलाम् ।
गान्धर्वविधिना राजा देशकालविधानवित् ॥
१६॥
ओम इति उक्ते--वैदिक प्रणव का उच्चारण करके भगवान् को विवाह के साक्षी के रूप में आह्वान करते हुए; यथा-धर्मम्--धार्मिकनियमों के अनुकूल ( क्योंकि सामान्य धार्मिक विवाहों में भी नारायण साक्षी बनते है ); उपयेमे--विवाह कर लिया; शकुन्तलाम्ू--शकुन्तला से; गान्धर्व-विधिना--गान्धर्व विधि से, धार्मिक नियमानुसार; राजा--महाराज दुष्मन्त ने; देश-काल-विधान-वित्--समय,स्थान तथा लक्ष्य के अनुसार कर्तव्यों से पूर्णतया अबगत।
जब शकुन्तला महाराज दुष्मन्त के प्रस्ताव पर मौन रही तो सहमति पूर्ण हो गई।
तब विवाह केनियमों को जानने वाले राजा ने तुरन्त ही वैदिक प्रणव ( ओड्ढार ) का उच्चारण किया, जैसा किगन्धर्वो में विवाह के अवसर पर किया जाता है।
अमोघवीर्यों राजर्षिमहिष्यां वीर्यमादधे ।
श्रोभूते स्वपुरं यात: कालेनासूत सा सुतम् ॥
१७॥
अमोघ-वीर्य:--ऐसा व्यक्ति जिसका वीर्य व्यर्थ नहीं बहता अर्थात् जिसके वीर्य से सन्तान उत्पन्न होती है; राज-ऋषि: --साधु प्रकृतिवाला राजा दुष्मन्त; महिष्याम्--रानी शकुन्तला में ( विवाह के बाद वह रानी हो गई ); वीर्यम्--वीर्य; आदधे--स्थापित किया; श्रः-भूते--सबेरा होने पर; स्व-पुरम्--अपने स्थान को; यात:--चला गया; कालेन--समय पर; असूत--जन्म दिया; सा--उसने( शकुन्तला ) ने; सुतम्--पुत्र को अमोधवीर्य
राजा दुष्मन्त ने रात्रि में अपनी रानी शकुन्तला के गर्भ में वीर्य स्थापित किया औरप्रात: होते ही अपने महल को लौट गया।
तत्पश्चात् समयानुसार शकुन्तला ने एक पुत्र को जन्म दिया।
कण्वः कुमारस्य बने चक्रे समुचिता: क्रिया: ।
बद्ध्वा मृगेन्द्रं तरसा क्रीडति सम स बालकः ॥
१८॥
कण्व:--कण्व मुनि ने; कुमारस्थ--शकुन्तला से उत्पन्न बालक का; वने--जंगल में; चक्रे--सम्पन्न किया; समुचिता:--विहित;क्रिया:--संस्कार; बद्ध्वा--पकड़ कर; मृग-इन्द्रमू--शेर को; तरसा--बलपूर्वक; क्रीडति--खेलता; स्म-- था; सः--वह;बालक:--बालककण्व मुनि ने बन में नवजात शिशु के सारे संस्कार सम्पन्न किये।
बाद में यह बालक इतनाबलवान बन गया कि वह किसी सिंह को पकड़ कर उसके साथ खेलता था।
त॑ दुरत्ययविक्रान्तमादाय प्रमदोत्तमा ।
हरेरंशांशसम्भूतं भर्तुरन्तिकमागमत् ॥
१९॥
तम्--उसको; दुरत्यय-विक्रान्तमू--जिसकी शक्ति को दबाया नहीं जा सकता था; आदाय--अपने साथ लेकर; प्रमदा-उत्तमा--स्त्रियों में श्रेष्ठ शकुन्तला; हरे: --ई श्वर का; अंश-अंश-सम्भूतम्-- अंशावतार; भर्तु: अन्तिकम्--अपने पति के पास; आगमत्--गई।
सुन्दरियों में श्रेष्ठ शकुन्तला अपने पुत्र को, जो दुर्दमनीय था तथा भगवान् का अंशावतार था,अपने साथ लेकर अपने पति दुष्मन््त के पास गई।
यदा न जगृहे राजा भार्यापुत्रावनिन्दितो ।
श्रृण्वतां सर्वभूतानां खे वागाहाशरीरिणी ॥
२०॥
यदा--जब; न--नहीं; जगृहे-- स्वीकार किया; राजा--राजा ने; भार्या-पुत्रौ--अपनी असली स्त्री तथा असली पुत्र को; अनिन्दितौ--जो निर्दोष थे, अनिन्दित; श्रृण्वताम्--सुनते हुए; सर्व-भूतानाम्--सारे लोगों के; खे--आकाश में; वाक्ू--शब्द ध्वनि ने; आह--घोषणा की; अशरीरिणी--शरीरविहीन |
जब राजा ने अपनी निर्दोष पत्नी तथा पुत्र दोनों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया तोआकाश से शकुन के रूप में एक अदृश्य आवाज सुनाई दी जिसे वहाँ उपस्थित सबों ने सुना।
माता भस्त्रा पितु: पुत्रो येन जात: स एव सः ।
भरस्व पुत्र दुष्मन्त मावमंस्था: शकुन्तलाम् ॥
२१॥
माता--माता; भस्त्रा--धौंकनी की तरह; पितु:--पिता का; पुत्र:--पुत्र; येन--जिसके द्वारा; जात:--उत्पन्न; सः--पिता; एबव--निश्चित; सः--पुत्र; भरस्व--पालो; पुत्रम्-- अपने पुत्र को; दुष्मन््त--हे महाराज दुष्मन्त; मा--मत; अवमंस्था: --अपमानित करो;शकुन्तलामू--शकुन्तला को |
आकाशवाणी ने कहा: हे महाराज दुष्मन्त, पुत्र वास्तव में अपने पिता का ही होता है जब किमाता मात्र चमड़े की धौंकनी के समान धारक होती है।
वैदिक आदेशानुसार पिता पुत्र रूप में उत्पन्नहोता है।
अतएव तुम अपने पुत्र का पालन करो और शकुन्तला का अपमान न करो।
रेतोधा: पुत्रो नयति नरदेव यमक्षयात् ।
त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला ॥
२२॥
रेतः-धा:--वीर्य स्थापित करने वाला पुरुष; पुत्र:--पुत्र; नयति--बचाता है; नर-देव--हे राजा; यम-क्षयात्--यमराज के दण्ड से;त्वमू--तुम; च--तथा; अस्य--इस बालक का; धाता--स्त्रष्टा; गर्भस्य--गर्भ का; सत्यम्--सत्य; आह--कहा; शकुन्तला--तुम्हारीपत्नी शकुन्तला ने
हे राजा दुष्मन्त, वीर्य स्थापित करने वाला ही असली पिता है और उसका पुत्र उसे यमराज केचंगुल से छुड़ाता है।
आप इस बालक के असली सत्रष्टा ( जन्मदाता ) हैं।
शकुन्तला निस्सन्देह सत्यकह रही है।
पितर्युपरते सोडपि चक्रवर्ती महायशा: ।
महिमा गीयते तस्य हरेरंशभुवो भुवि ॥
२३॥
पितरि--अपने पिता के; उपरते--दिवगंत हो जाने पर; सः--वह राजपुत्र; अपि-- भी; चक्रवर्ती --सप्राट; महा-यशा: --अत्यन्तविख्यात; महिमा--यश; गीयते--गाया जाता है; तस्य--उसका; हरेः-- भगवान् का; अंश-भुव:--अंश रूप; भुवि--पृथ्वी पर।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब महाराज दुष्मन्त इस पृथ्वी से चले गये तो उनका पुत्र सातों द्वीपोंका स्वामी चक्रवर्ती राजा बना।
वह ड्स संसार में भगवान् का अंशावतार बतलाया जाता है।
अक्रं दक्षिणहस्तेस्थ पद्यकोशोस्य पादयो: ।
ईजे महाभिषेकेण सोउभिषिक्तोडधिराड्विभु: ।
पञ्जञपश्जञाशता मेध्यैर्गड्रायामनु वाजिभि: ॥
२४॥
मामतेय॑ पुरोधाय यमुनामनु च प्रभु: ।
अष्ट्सप्ततिमेध्याश्वान्बबन्ध प्रददद्वसु ॥
२५॥
भरतस्य हि दौष्मन्तेरग्नि: साचीगुणे चित: ।
सहस्त्रं बद्वशो यस्मिन्ब्राह्मणा गा विभेजिरे ॥
२६॥
चक्रमू--कृष्ण-चक्र का चिह्न; दक्षिण-हस्ते--दाहिने हाथ में; अस्य--उसके ( भरत ) के; पढ्य-कोश:--कमल गुच्छ का चिह्न;अस्य--उसके; पादयो:--पैरों के तलवों पर; ईजे-- भगवान् की पूजा की; महा-अभिषेकेण--विशाल वैदिक अनुष्ठान द्वारा; सः--वह ( भरत ); अभिषिक्त:--पदोन्नत किया गया; अधिराटू--शासक के सर्वोच्च पद पर; विभु:--स्वामी; पञ्ञ-पञ्ञाशता--पचपन;मेध्यै:--यज्ञों के लिए उपयुक्त; गड़ायाम् अनु--स््रोत से लेकर गंगा के मुहाने तक; वाजिभि:--धोड़ों से; मामतेयम्-- भृगु मुनि को;पुरोधाय--पुरोहित बनाकर; यमुनाम्--यमुना तट पर; अनु--क्रमबद्ध; च-- भी; प्रभु:--स्वामी, महाराज भरत; अष्ट-सप्तति--अठहत्तर; मेध्य-अश्वान्ू--यज्ञ के योग्य घोड़ों को; बबन्ध--बाँधा; प्रददत्--दान में दिया; वसु-- धन; भरतस्य-- भरत का; हि--निस्सन्देह; दौष्मन्ते:--महाराज दुष्मन्त के पुत्र; अग्नि:--यज्ञ की आग; साची-गुणे--सर्वोत्तम स्थान पर; चित:ः--स्थापित; सहस्त्रम्--एक हजार; बद्वशः--एक बद्ध जो १३०८४ के तुल्य है; यस्मिनू--जिन यज्ञों में; ब्राह्मणा:--सारे उपस्थित ब्राह्मण; गा: --गाएँ;विभेजिरे--अपना अपना भाग प्राप्त किया।
दुष्मन्त-पुत्र महाराज भरत के दाहिने हाथ की हथेली पर भगवान् कृष्ण के चक्र का चिन्ह थाऔर उसके पैरों के तलवों में कमल कोश का चिन्ह था।
वह महान् अनुष्ठान के द्वारा भगवान् कीपूजा करके सारे विश्व का अधिपति तथा सप्राट बन गया।
तब उसने मामतेय अर्थात् भूगु मुनि केपौरोहित्य में गंगा नदी के तट पर गंगा के अंतिम स्थान से लेकर उद्गम तक पचपन अश्वमेध यज्ञकिये।
इसी तरह यमुना नदी के तट पर प्रयागराज के संगम से लेकर उदगम स्थान तक अठहत्तरअश्वमेध यज्ञ किये।
उसने सर्वोत्तम स्थान पर यज्ञ की अग्नि स्थापित की और अपनी विपुल सम्पत्तिब्राह्मणों में वितरित कर दी।
उसने इतनी गाएँ दान में दीं कि हजारों ब्राह्मणों में से हर एक को एकबद्व ( १३०८४ ) गाएँ अपने हिस्से में मिलीं ।
त्यरस्त्रिशच्छतं ह्यश्वान्बद्ध्वा विस्मापयन्नपान् ।
दौष्मन्तिरत्यगान्मायां देवानां गुरुमाययौ ॥
२७॥
त्रयः--तीन; त्रिंशत्--तीस; शतम्--सौ; हि--निस्सन्देह; अश्वान्--घोड़ों को; बद्ध्वा--यज्ञ में बन्दी करके; विस्मापयन्--आश्चर्यचकित करते हुए; नृपान्--सारे राजाओं को; दौष्मन्तिः--महाराज दुष्मन्त का पुत्र; अत्यगात्--बाजी मार ले गया; मायाम्--भौतिक ऐश्वर्य को; देवानामू--देवताओं का; गुरुम्--गुरु; आययौ--प्राप्त किया |
महाराज दुष्मन्त के पुत्र भरत ने उन यज्ञों के लिए ३३०० घोड़े बाँधकर अन्य सारे राजाओं कोविस्मय में डाल दिया।
उसने देवताओं के ऐश्वर्य को भी मात कर दिया क्योंकि उसे परम गुरु हरिप्राप्त हो गये थे।
मृगाउ्छुक्लदतः कृष्णान्हिरण्येन परीवृतान् ।
अदात्कर्मणि मष्णारे नियुतानि चतुर्दश ॥
२८॥
मृगान्--उत्तम कोटि के हाथियों; शुक्ल-दतः--सफेद दाँत वाले; कृष्णानू--काले शरीर वाले; हिरण्येन--सोने के आभूषणों सेयुक्त; परीवृतान्ू--पूरी तरह ढके; अदात्--दान में दिया; कर्मणि--यज्ञ में; मष्णारे--मष्णार नामक यज्ञ अथवा मष्णार नामक स्थानमें; नियुतानि--लाख; चतुर्दश--चौदह
जब महाराज भरत ने मष्णार नामक यज्ञ ( या मष्णार नामक स्थान में यज्ञ ) सम्पन्न किया तोउन्होंने दान में चौदह लाख श्रेष्ठ हाथी दिये जिनके दाँत सफेद थे और शरीर काले थे जो सुनहरे आशभूषणों से ढके थे।
भरतस्य महत्कर्म न पूर्वे नापरे नूपा: ।
नैवापुर्नैव प्राप्स्यन्ति बाहुभ्यां त्रिदिवं यथा ॥
२९॥
भरतस्य--महाराज भरत का; महत्--महान; कर्म--कार्य; न--न तो; पूर्वे--इसके पहले; न--न तो; अपरे--उसके बाद; नृपा: --राजागण; न--न तो; एब--निश्चय ही; आपु: --प्राप्त किया; न--न तो; एव--निश्चय ही; प्राप्स्यन्ति--पायेंगे; बाहु भ्यामू-- अपनेबाहुबल से; त्रि-दिवम्--स्वर्ग को; यथा--जिस तरह
जिस तरह कोई व्यक्ति मात्र अपने बाहुबल से स्वर्ग नहीं पहुँच सकता ( क्योंकि अपने बाहुओं सेकोई स्वर्ग को कैसे छू सकता है?
) उसी तरह कोई व्यक्ति महाराज भरत के अद्भुत कार्यों काअनुकरण नहीं कर सकता।
कोई न तो भूतकाल में ऐसे कार्य कर सका है, न ही भविष्य में कोईऐसा कर सकेगा।
किरातहूणान्यवनान्पौण्ड्रान्कड्भान्खशाज्छकान् ॥
अब्रह्मण्यनृपां श्वाहन्म्लेच्छान्दिग्विजयेडखिलानू ॥
३०॥
किरात--काले काले लोग, जो किरात कहलाते थे ( अधिकांशत: अफ्रीकी ); हृणान्--दूर उत्तर की जातियों, हूणों; यवनान्--मांसाहारियों; पौण्ड्रानू-पौण्डू; कट्ढलानू-कंकों; खशान्--मंगोलों; शकान्ू--शकों; अब्नह्मण्य--ब्राह्मण संस्कृति के विरोधी;नृपानू--राजाओं को; च--तथा; अहन्--उसने मार डाला; म्लेच्छान्ू--ऐसे नास्तिकों को जिन्हें वैदिक सभ्यता के प्रति कोई आदरनहीं था; दिक्ू-विजये--दिशाओं को जीतते समय; अखिलानू--समस्त |
जब भरत महाराज दौरे पर थे तो उन्होंने सारे किरातों, हूणों, यवनों, पौण्ड्रों, कंकों, खशों, शकोंतथा ब्राह्मण संस्कृति के वैदिक नियमों के विरोधी राजाओं को परास्त किया या मार डाला।
जित्वा पुरासुरा देवान्ये रसौकांसि भेजिरे ।
देवस्त्रियो रसां नीता: प्राणिभिः पुनराहरत् ॥
३१॥
जित्वा--जीतकर; पुरा--प्राचीन काल में; असुरा:-- असुरगण; देवान्--देवताओं को; ये--जो; रस-ओकांसि--रसातल लोक में;भेजिरे--शरण ग्रहण की; देव-स्त्रियः--देवताओं की स्त्रियाँ तथा कन्याएँ; रसामू--अधोलोक में; नीता:ः--लाई गई; प्राणिभि: --अपने प्रिय संगियों समेत; पुन:--फिर; आहरत्--उनके पूर्व स्थानों में पहुँचा दिया।
प्राचीन काल में सारे असुरों ने देवताओं को जीतकर रसातल नामक अधोलोक में शरण ले रखीथी और वे सारे देवताओं की स्त्रियों एवं कनन््याओं को भी वहीं ले आये थे।
किन्तु भरत महाराज ने इन सभी स्त्रियों को उनके संगियों समेत असुरों के चुंगल से छुड़ाया और उन्हें देवताओं को वापसकर दिया।
सर्वान्कामान्दुदुहतुः प्रजानां तस्थ रोदसी ।
समास्त्रिणवसाहस्त्रीर्दिक्षु चक्रमवर्तयत् ॥
३२॥
सर्वान् कामानू--सारी आवश्यकताओं या इच्छित वस्तुओं को; दुदुहतुः--पूरा किया; प्रजानाम्--प्रजा की; तस्थ--उसकी; रोदसी --यह पृथ्वी तथा स्वर्गलोक; समा: --वर्ष ; त्रि-नव-साहस्त्री:--नौ हजार के तीन गुने ( २७ हजार ); दिक्षु--सारी दिशाओं में; चक्रम्--सैनिक या आदेश; अवर्तयत्--बँटवा दिया।
महाराज भरत ने २७ हजार वर्षो तक इस पृथ्वी पर तथा स्वर्गलोकों में अपनी प्रजा की सारीआवश्यकताएँ पूरी कीं।
उन्होंने सभी दिशाओं में अपने आदेश प्रसारित कर दिए और अपने सैनिकतैनात कर दिए।
स संराडलोकपालाख्यमैश्वर्यमधिराट्् श्रयम् ।
चक्र चास्खलितं प्राणान्मृषेत्युपरराम ह ॥
३३॥
सः--वह ( महाराज भरत ); संराट्--सप्राट; लोक-पाल-आख्यम्--समस्त लोकों के शासक के रूप में; ऐश्वर्यम्--ऐश्वर्य ;अधिराट्ू--पूरी तरह अधिकार में; अ्रियम्--राज्य; चक्रमू--सैनिक या आदेश; च--तथा; अस्खलितम्--बिना चूके; प्राणान्--जीवन अथवा पुत्र तथा परिवार को; मृषा--मिथ्या; इति--इस प्रकार; उपरराम-- भोग करना बन्द कर दिया; ह--भूतकाल में |
समस्त विश्व के शासक के रूप में सप्राट भरत के पास महान् राज्य एवं अजेय सैनिकों का ऐश्वर्यथा।
उनके पुत्र तथा उनका परिवार उन्हें उनका जीवन प्रतीत होता था।
किन्तु अन्ततः उन्होंने इन सबोंको आध्यात्मिक प्रगति में बाधक समझा अतएव उन्होंने इनका भोग बन्द कर दिया।
तस्यासन्नुप वैदर्भ्य: पत््यस्तिस्त्र: सुसम्मता: ।
जष्नुस्त्यागभयात्युत्रान्नानुरूपा इतीरिते ॥
३४॥
तस्य--उसकी ( भरत की ); आसन्ू-- थीं; नृप--हे राजा परीक्षित; वैदर्भ्य:--विदर्भ की कन्याएँ; पत्य:--पत्ियाँ; तिस्त्रः--तीन;सु-सम्मता: --अत्यन्त मनोहर तथा उपयुक्त; जघ्नु:--मार डाला; त्याग-भयात्-्यागे जाने के भय से; पुत्रान्--अपने पुत्रों को; नअनुरूपा:--अपने पिता की तरह न होने से; इति--इस तरह; ईरिते--विचार करते हुए।
हे राजा परीक्षित, महाराज भरत की तीन मनोहर पत्लियाँ थीं जो विदर्भ के राजा की पुत्रियाँ थीं।
जब तीनों के सन्तानें हुईं तो वे राजा के समान नहीं निकलीं, अतएवं इन पत्नियों ने यह सोचकर किराजा उन्हें कृतघ्न रानियाँ समझकर त्याग देंगे, उन्होंने अपने अपने पुत्रों को मार डाला।
तस्यैवं वितथे वंशे तदर्थ यजतः सुतम् ।
मरुत्स्तोमेन मरुतो भरद्वाजमुपाददुः ॥
३५॥
तस्य--उसके; एवम्--इस प्रकार; वितथे--परेशान होकर; वंशे--सन््तान उत्पन्न करने में; तत्-अर्थम्--पुत्र प्राप्ति के लिए; यजतः--यज्ञ सम्पन्न करते हुए; सुतम्--एक पुत्र; मरुत्-स्तोमेन--मरूत्स्तोम यज्ञ करने से; मरूत:--मरुत्गण देवता; भरद्वाजम्-- भरद्वाज को;उपाददुः--भेंट कर दिया।
सनन््तान के लिए जब राजा का प्रयास इस तरह विफल हो गया तो उसने पुत्रप्राप्ति के लिएमरुत्स्तोम नामक यज्ञ किया।
सारे मरुत्गण उससे पूर्णतया सन्तुष्ट हो गये तो उन्होंने उसे भरद्वाजनामक पुत्र उपहार में दिया।
अन्तर्वत्यां भ्रातृपत्यां मैथुनाय बृहस्पति: ।
प्रवृत्तो वारितो गर्भ शप्त्वा वीर्यमुपासृजत् ॥
३६॥
अन्तः-वल्याम्--गर्भवती; भ्रातृ-पत्याम्-- भाई की पतली से; मैथुनाय--संभोग की इच्छा से; बृहस्पति:--बृहस्पति नामक देवता;प्रवृत्त:--प्रवृत्त; वारित:--मना किया गया; गर्भभू-गर्भ के भीतर के पुत्र को; शप्त्वा--शाप देकर; वीर्यम्--वीर्य; उपासृजत्ू--स्खलित किया।
बृहस्पति देव ने अपने भाई की पत्नी ममता पर मोहित होने पर उसके गर्भवती होते हुए भी उसकेसाथ संभोग करना चाहा।
उसके गर्भ के भीतर के पुत्र ने मना किया लेकिन बृहस्पति ने उसे शाप देदिया और बलात् ममता के गर्भ में वीर्य स्थापित कर दिया।
त॑ त्यक्तुकामां ममतां भर्तुस्त्यागविशज्धिताम् ।
नामनिर्वाचनं तस्य श्लोकमेनं सुरा जगु; ॥
३७॥
तम्--नवजात शिशु को; त्यक्तु-कामाम्ू-त्यागने की इच्छा से; ममताम्--ममता को; भर्तु: त्याग-विशद्धिताम्--अवैध पुत्र उत्पन्नकरने के कारण अपने पति द्वारा छोड़े जाने से अत्यन्त भयभीत; नाम-निर्वाचनम्--नामकरण संस्कार; तस्य--उस बालक का;श्लोकम्-श्लोक; एनम्--इस; सुराः:--देवतागण ने; जगु:--घोषित किया।
ममता अत्यन्त भयभीत थी कि अवैध पुत्र उत्पन्न करने के कारण उसका पति उसे छोड़ सकता हैअतएव उसने बालक को त्याग देने का विचार किया।
लेकिन तब देवताओं ने उस बालक कानामकरण करके सारी समस्या हल कर दी।
मूढे भर द्वाजमिमं भर द्वाजं बृहस्पते ।
यातौ यदुक््त्वा पितरौ भरद्वाजस्ततस्त्वयम् ॥
३८॥
मूढे --हे मूर्ख स्त्री; भर--पालन करो; द्वाजम्-दोनों के बीच अवैध सम्बन्ध से उत्पन्न; इमम्--इस बालक को; भर--पालो;द्वाजमू--अवैध जन्म लेने के कारण; बृहस्पते--हे बृहस्पति; यातौ--छोड़कर चले गये; यत्--क्योंकि ; उक्त्वा--कहकर; पितरौ--माता पिता दोनों; भरद्वाज: --भरद्वाज नामक; ततः--तत्पश्चात्; तु--निस्सन्देह; अयम्--यह बालक |
बृहस्पति ने ममता से कहा, 'अरी मूर्ख! यद्यपि यह बालक अन्य पुरुष की पत्ती और किसीदूसरे पुरुष के वीर्य से उत्पन्न हुआ है, किन्तु तुम इसका पालन करो।
यह सुनकर ममता ने उत्तरदिया, 'ओरे बृहस्पति, तुम इसको पालो।
ऐसा कहकर बृहस्पति तथा ममता उसे छोड़कर चले गये।
इस तरह बालक का नाम भरद्वाज पड़ा।
चोद्यमाना सुरैरेवं मत्वा वितथमात्मजम् ।
व्यसृजन्मरुतोबिश्रन्दत्तो5्यं वितथेउन्वये ॥
३९॥
चोद्यमाना--प्रोत्साहित किये जानेपर ( कि बालक को पालो ); सुरैः--देवताओं द्वारा; एवम्--इस प्रकार; मत्वा--मानकर;वितथमू--निष्प्रयोजन; आत्मजम्-- अपने पुत्र को; व्यसृजत्--त्याग दिया; मरुत:--मरुत्गण ने; अबि भ्रनू--बच्चे का पालन किया;दत्त:--दिया गया; अयम्ू--यह; वितथे--निराश; अन्वये--महाराज भरत का वंश
यद्यपि देवताओं ने बालक को पालने के लिए प्रोत्साहित किया था, किन्तु ममता ने अवैध जन्मके कारण उस बालक को व्यर्थ समझ कर उसे छोड़ दिया।
फलस्वरूप, मरुत्गण देवताओं ने बालकका पालन किया और जब महाराज भरत सनन््तान के अभाव से निराश हो गए तो उन्हें यही बालकपुत्र-रूप में भेंट किया गया।
