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अध्याय दो: मनु के पुत्रों के राजवंश
9.2श्रीशुक उबाचएवं गतेथ सुझ्युम्ने मनुर्वैवस्वतः सुते।
पुत्रकामस्तपस्तेपे यमुनायां शतं समा: ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; गते--वानप्रस्थ आश्रम स्वीकार करने के लिए; अथ--तत्पश्चात्; सुद्युम्ने--जब सुद्युम्न; मनु: वैवस्वत:--वैवस्वत मनु जो श्राद्धदेव कहलाते थे; सुते-- अपना पुत्र; पुत्र-काम: --पुत्र पाने कीइच्छा से; तप: तेपे--कठिन तपस्या की; यमुनायाम्--यमुना नदी के तट पर; शतम् समा:--एक सौ वर्षो तक
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इसके पश्चात् जब वैवस्वत मनु ( श्राद्धदेव ) का पुत्र सुद्युम्न वानप्रस्थआश्रम ग्रहण करने के लिए जंगल में चला गया तो मनु ने और अधिक सन्तान प्राप्त करने की इच्छासे यमुना नदी के तट पर सौ वर्षों तक कठिन तपस्या की।
ततोयजन्मनुर्देवमपत्यार्थ हरिं प्रभुम् ।
इश्ष्वाकुपूर्वजान्पुत्रान्ले भे स्वसहशान्दश ॥
२॥
ततः--तत्पश्चात्; अयजत्--पूजा की; मनुः:--वैवस्वत मनु ने; देवम्-- भगवान् की; अपत्य-अर्थम्--सन्तान प्राप्त करने के लिए;हरिम्--हरि की; प्रभुम्-प्रभु; इक्ष्वाकु-पूर्व-जानू--जिनमें सबसे बड़ा इश्ष्वाकु था; पुत्रान्-पुत्रों को; लेभे--पाया; स्व-सहशान्--अपनी ही तरह के; दश--दस |
तब पुत्र-कामना से श्राद्धदेव ने देवों के देव भगवान् हरि की पूजा की।
इस तरह उसे अपने हीसदृश दस पुत्र प्राप्त हुए।
इनमें से इक्ष्वाकु सबसे बड़ा था।
पृषश्चस्तु मनो: पुत्रो गोपालो गुरुणा कृतः ।
पालयामास गा यत्तो रात्र्यां वीरासनब्रतः ॥
३॥
पृषश्चः तु--उनमें से पृष्च; मनो:--मनु का; पुत्र:--पुत्र; गो-पाल:--गायों को पालने वाला; गुरुणा--अपने गुरु के आदेश से;कृत:ः--लगाया गया; पालयाम् आस--रक्षा की; गा: --गायों को; यत्त:--इस प्रकार लगाया गया; रात्र्याम्ू--रात में; वीरासन-ब्रतःवीरासन का ब्रत लेकर
तलवार लिए खड़ा इन पुत्रों में से पृषश्ष अपने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए गायों की रखवाली में लग गया।
गायों की रक्षा के लिए वह सारी रात हाथ में तलवार लिए खड़ा रहता।
एकदा प्राविशद्गोष्ठ॑ शार्दूलो निशि वर्षति ।
शयाना गाव उत्थाय भीतास्ता बश्रमुर्त्रजे ॥
४॥
एकदा--एक बार; प्राविशत्--घुस गया; गोष्ठम्--गोशाला में; शार्दूल: --बाघ; निशि--रात्रि में; वर्षति--वर्षा होते समय;शयाना:--लेटी हुईं; गाव:--गाएँ; उत्थाय--उठकर; भीता:--डरी हुई; ताः--वे सब; बश्नमु:--इधर-उधर फैल गईं; ब्रजे--गोशालाके चारों ओर की भूमि में ।
एक बार रात्रि में, जब वर्षा हो रही थी, एक बाघ गोशाला में घुस आया।
उसे देखकर भूमि मेंलेटी हुई सारी गाएँ डर के मारे खड़ी हो गईं और गोशाला में तितर-बितर हो गईं।
एकां जग्राह बलवान्सा चुक्रोश भयातुरा ।
तस्यास्तु क्रन्दितं श्रुत्वा पृषश्चोडनुससार ह ॥
५॥
खड्गमादाय तरसा प्रलीनोडुगणे निशि ।
अजानन्नच्छिनोद्व भ्रो: शिरः शार्दूलशड्डया ॥
६॥
एकाम्--एक गाय को; जग्राह--पकड़ लिया; बलवान्--बलशाली बाघ ने; सा--वह गाय; चुक्रोश --चिल्लाने लगी; भय-आतुरा-- भयभीत; तस्या: -- उसकी; तु--लेकिन; क्रन्दितम्--चीत्कार; श्रुत्वा--सुनकर; पृषश्च: --पृषथ्च ने; अनुससार ह--पीछाकिया; खड्गम्--तलवार; आदाय--लेकर; तरसा--तेजी से; प्रलीन-उडु-गणे--जब तारे बादलों से ढक गये; निशि--रात में;अजाननू--अनजाने; अच्छिनोत्--काट लिया; बश्नो:--गाय का; शिर:--सिर; शार्दूल-शड्भया--बाघ का सिर समझकर।
जब अत्यन्त बलवान बाघ ने एक गाय को पकड़ लिया तो वह भयभीत होकर चिललाने लगी।
पृषश्च ने यह चीत्कार सुनी और वह तुरन्त इस आवाज का पीछा करने लगा।
उसने अपनी तलवारनिकाल ली लेकिन चूँकि तारे बादलों से ढके थे अतएवं उसने गाय को बाघ समझकर धोखे मेंअत्यन्त बलपूर्वक गाय का सिर काट लिया।
व्याप्रोडपि वृक्णश्रवणो निर्त्रिशाग्राहतस्ततः ।
निश्चक्राम भूशं भीतो रक्त पथ्ि समुत्सूजन् ॥
७॥
व्याप्र:--बाघ; अपि-- भी; वृक्ण- श्रवण: --कान कटा हुआ; निर्त्रिश-अग्र-आहतः--तलवार की नोंक से कट जाने के कारण;ततः--तत्पश्चात्; निश्चक्राम--( उस स्थान से ) भाग निकला; भृशम्--अत्यधिक; भीत:-- भयभीत होकर; रक्तम्--रक्त; पथि--रास्तेमें; समुत्सूजन्--गिराता हुआ।
चूँकि तलवार की नोक से बाघ का कान कट गया था अतएव वह अत्यधिक भयभीत था औरवह उस स्थान से रास्ते भर कान से खून बहाता हुआ भाग खड़ा हुआ।
मन्यमानो हत॑ व्याप्र॑ पृषश्च: परवीरहा ।
अद्वाक्षीत्स्वहतां बश्रुं व्यूष्टायां निशि दुःखितः ॥
८॥
मन्यमान:--यह सोचते हुए कि; हतम्--मार डाला गया; व्याप्रमू--बाघ को; पृषश्च:--मनु पुत्र पृषश्च; पर-बीर-हा--यद्यपि शत्रु कोदण्ड देने में समर्थ था; अद्राक्षीत्--देखा; स्व-हताम्--अपने द्वारा मारी गयी; बश्चुम्ू--गाय को; व्युष्टायाम् निशि--रात्रि बीत जाने पर( प्रातःकाल ); दुःखित:--अत्यन्त दुखी हुआ
अपने शत्रु का दमन करने में समर्थ पृषश्न ने प्रातःकाल जब देखा कि उसने गाय का वध करदिया है, यद्यपि रात में उसने सोचा था कि उसने बाघ को मारा है, तो वह अत्यन्त दुखी हुआ।
त॑ शशाप कुलाचार्य: कृतागसमकामतः ।
न क्षत्रबन्धु: शूद्रस्त्व॑ कर्मणा भवितामुना ॥
९॥
तम्--उसको ( पृषश्च को ); शशाप--शाप दे दिया; कुल-आचार्य: --कुलगुरु वसिष्ठ ने; कृत-आगसम्--गोवध का महापाप करने केकारण; अकामतः--न चाहते हुए; न--नहीं; क्षत्र-बन्धु:--क्षत्रिय कुट॒म्बी; शूद्र: त्वमू--तुमने शूद्रजैसा आचरण किया है; कर्मणा--अतएव अपने कर्मफल से; भविता--तुम शूद्र हो जाओगे; अमुना--गोवध करने से |
यद्यपि पृषश्च ने अनजाने में यह पाप किया था, किन्तु उसके कुलपुरोहित वसिष्ठ ने उसे यह शापदिया, 'तुम अपने अगले जम्म में क्षत्रिय नहीं बन सकोगे, प्रत्युत गोवध करने के कारण तुम्हें शूद्रबनकर जन्म लेना पड़ेगा।
एवं शप्तस्तु गुरुणा प्रत्यगृह्मात्कृताझ्ञलि: ।
अधारयद्ब्रतं वीर ऊध्वरेता मुनिप्रियम्ू ॥
१०॥
एवम्--इस प्रकार; शप्त:--शापित होकर; तु--लेकिन; गुरुणा -- अपने गुरु द्वारा; प्रत्यगृह्ात्--उसने स्वीकार कर लिया; कृत-अज्जलि:ः--हाथ जोड़कर; अधारयत्--ग्रहण किया; ब्रतम्--ब्रह्मचर्य व्रत; वीर: --उस वीर ने; ऊर्ध्ब-रेता:--अपनी इन्द्रियों को वश मेंकरके; मुनि-प्रियम्--मुनियों द्वारा स्वीकृत |
जब उस वीर पृषश्च को उसके गुरु ने इस प्रकार शाप दे दिया तो उसने हाथ जोड़कर वह शापअंगीकार कर लिया।
तत्पश्चात् अपनी इन्द्रियों को वश में करते हुए उसने सभी मुनियों द्वारा सम्मतब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण किया।
वबासुदेवे भगवति सर्वात्मनि परेडमले ।
एकान्तित्वं गतो भक्त्या सर्वभूतसुहृत्मम: ॥
११॥
विमुक्तसड: शान्तात्मा संयताक्षो परिग्रह: ।
यहच्छयोपपन्नेन कल्पयन्वृत्तिमात्मनः ॥
१२॥
आत्मन्यात्मानमाधाय ज्ञानतृप्त: समाहितः ॥
विचचार महीमेतां जडान्धबधिराकृति: ॥
१३॥
वासुदेवे--वासुदेव में; भगवति-- भगवान्; सर्व-आत्मनि--परमात्मा में; परे--ब्रह्म में; अमले--कल्मषरहित परम पुरुष में;एकान्तित्वम्ू--अविचल भाव से भक्ति करते हुए; गतः--उस पद पर स्थित होकर; भक्त्या--शुद्ध भक्ति के कारण; सर्ब-भूत-सुहृत्समः--भक्त, मित्र तथा समदर्शी होने के कारण; विमुक्त-सड्भ:--भौतिक कल्मष से रहित; शान्त-आत्मा--शान्तिपूर्ण प्रवृत्ति;संयत--आत्मसंयमित; अक्ष:--जिसकी दृष्टि; अपरिग्रह:--किसी से दान ग्रहण कियेबिना; यत्-ऋच्छया-- भगवान् की कृपा से;उपपन्नेन--शारीरिक आवश्यकताओं के लिए जो भी उपलब्ध था उससे; कल्पयन्--व्यवस्थित करके; वृत्तिमू--शरीर कीआवश्यकताएँ; आत्मन:--आत्मा के लाभ हेतु; आत्मनि--मन में; आत्मानम्--परमात्मा को; आधाय--सदैव रखते हुए; ज्ञान-तृप्त:--आध्यात्मिक ज्ञान से तुष्ट; समाहित:--सदैव समाधिमग्न; विचचार--सर्वत्र भ्रमण करने लगा; महीम्--पृथ्वी में; एताम्ू--इस;जड--मूक; अन्ध--अन्धा; बधिर--बहरा; आकृति:--के समान।
तत्पश्चात् पृषश्च ने सारे उत्तरदायित्वों से अवकाश ले लिया और शान्तचित्त होकर अपनी समग्रइन्द्रियों को वश में किया।
भौतिक परिस्थितियों से अप्रभावित, भगवान् की कृपा से शरीर तथाआत्मा को बनाए रखने के लिए जो भी मिल जाय उसी से संतुष्ट एवं सब पर समभाव रखते हुए, वहकल्मषहीन परमात्मा भगवान् वासुदेव पर ही अपना सारा ध्यान देने लगा।
इस प्रकार शुद्ध ज्ञान से पूर्णतः सन्तुष्ट एवं अपने मन को भगवान् में ही लगाकर उसने भगवान् की शुद्धभक्ति प्राप्त की औरसारे विश्व में विचरण करने लगा।
उसे भौतिक कार्यकलापों से कोई लगाव न रहा मानो वह बहरा,गूँगा तथा अन्धा हो।
एवं वृत्तो वनं गत्वा इृष्ठा दावाग्निमुत्थितम् ।
तेनोपयुक्तकरणो ब्रह्म प्राप परं मुनि: ॥
१४॥
एवम् वृत्त:--ऐसे आश्रम में स्थित होकर; वनम्--वन में; गत्वा--जाकर; दृष्टा--देखकर; दाव-अग्निमू--जंगल की आग को;उत्थितम्--वहाँ विद्यमान; तेन--उस ( अग्नि ) के द्वारा; उपयुक्त-करण:--जलाकर सभी इन्द्रियों को लगाते हुए; ब्रह्म-- अध्यात्म;प्राप--प्राप्त किया; परमू--चरम लक्ष्य; मुनिः--मुनि की भाँति।
इस मनोवृत्ति से पृषश्च महान् सन्त बन गया और जब वह जंगल में प्रविष्ट हुआ और उसनेप्रज्वलित जंगल की आग देखी तो उसने उस अग्नि में अपने शरीर को भस्म कर डाला।
इस तरह उसेदिव्य आध्यात्मिक जगत की प्राप्ति हुई।
'कविः कनीयान्विषयेषु निःस्पृहोविसृज्य राज्यं सह बन्धुभिर्वनम् ।
निवेश्य चित्ते पुरुषं स्वरोचिषंविवेश कैशोरवया: परं गतः ॥
१५॥
कविः--दूसरा पुत्र कवि; कनीयान्--जो सबसे छोटा था; विषयेषु-- भौतिक भोगों में; निःस्पृह:ः--आसक्तिरहित; विसृज्य--छोड़कर;राज्यमू--अपने पिता की सम्पत्ति ( राज्य ) को; सह बन्धुभि:--अपने मित्रों सहित; वनम्--जंगल में; निवेश्य--सदैव रखकर;चित्ते--हृदय में; पुरुषम्--परम पुरुष को; स्व-रोचिषम्--आत्म-तेजस्वी; विवेश--प्रविष्ट हो गया; कैशोर-वया:--किशोरावस्था में;'परम्--दिव्य जगत; गतः--प्रविष्ट हुआ।
मनु के सबसे छोटे पुत्र कवि ने भौतिक भोगों को अस्वीकार करते हुए युवावस्था में पहुँचने केपूर्व ही राजपाट त्याग दिया।
वह अपने हृदय में आत्म-तेजस्वी भगवान् का सदैव चिन्तन करते हुएअपने मित्रों सहित जंगल में चला गया।
इस प्रकार उसने सिद्धि्रि प्राप्त की ।
करूषान्मानवादासन्कारूषा: क्षत्रजातय: ।
उत्तरापथगोप्तारो ब्रह्मण्या धर्मवत्सला: ॥
१६॥
'करूषात्--करूष से; मानवात्--मनु के पुत्र; आसन्--था; कारूषा:--कारूष कहलाने वाले; क्षत्र-जातय: --क्षत्रियों का समूह;उत्तरा--उत्तरी; पथ--दिशा की ओर; गोप्तार:--राजा; ब्रह्मण्या:--ब्राह्मण संस्कृति के विख्यात रक्षक; धर्म-वत्सला:ः --अत्यन्तधार्मिक
मनु के अन्य पुत्र करूष से कारूष वंश चला जो एक क्षत्रिय कुल था।
कारूष क्षत्रिय उत्तरीदिशा के राजा थे।
वे ब्राह्मण संस्कृति के विख्यात रक्षक थे और सभी अत्यन्त धार्मिक थे।
धृष्ठाद्धाईटम भूद्षत्रं ब्रह्मभूयं गतं क्षितौ ।
नृगस्य वंश: सुमतिर्भूतज्योतिस्ततो बसु; ॥
१७॥
धृष्ठात्ू-मनु के दूसरे पुत्र धृष्ट से; धा्टमू-- धा्ट नामक जाति; अभूत्--उत्पन्न हुई; क्षत्रमू--क्षत्रिय समूह से सम्बन्धित; ब्रह्म -भूयम्--ब्राह्मणों का पद; गतम्--प्राप्त किया था; क्षितौ--पृथ्वी पर; नृगस्थ--मनु के अन्य पुत्र नृग का; बंश:--वंश; सुमति:--सुमति का;भूतज्योति:-- भूतज्योति का; ततः--तत्पश्चात्; बसु:--वसु नाम से |
मनु पुत्र धृष्ट से धा्ट नामक क्षत्रिय जाति निकली जिसके सदस्यों ने इस जगत में ब्राह्मणों कापद प्राप्त किया।
तत्पश्चात् मनु के पुत्र नृग से सुमति और सुमति से भूतज्योति और भूतज्योति से बसुउत्पन्न हुए।
बसो: प्रतीकस्तत्पुत्र ओघवानोघवत्पिता ।
कन्या चौघवती नाम सुदर्शन उवाह ताम् ॥
१८॥
बसो:--वसु का; प्रतीक: --प्रतीक नामक; तत्-पुत्र:--उसका पुत्र; ओघवान्ू--ओघवान; ओघवतू-पिता--जो ओघवान का पिताथा; कन्या--उसकी कन्या; च--भी; ओघवती--ओघवती; नाम--नामक; सुदर्शन:--सुदर्शन ने; उबाह--व्याह किया; तामू--उसकन्या ( ओघवती ) से |
बसु का पुत्र प्रतीक था और प्रतीक का पुत्र ओघवान हुआ।
ओघवान का पुत्र भी ओघवानकहलाया और उसकी पुत्री का नाम ओघवती था।
इसका व्याह सुदर्शन के साथ हुआ।
चित्रसेनो नरिष्यन्ताइक्षस्तस्य सुतोभवत् ।
तस्य मीढ्वांस्ततः पूर्ण इन्द्रसेनस्तु तत्सुतः ॥
१९॥
चित्रसेन:--चित्रसेन; नरिष्यन्तातू--मनु के अन्य पुत्र नरिष्यन्त से; ऋक्ष:--ऋशक्ष; तस्य--चित्रसेन का; सुतः--पुत्र; अभवत् --हुआ;तस्य--ऋक्ष का; मीढ्वान्--मीढ्वान; तत:--उससे ( मीढ्वान से ); पूर्ण: --पूर्ण ; इन्द्रसेन:--इन्द्रसेन; तु--लेकिन; तत्-सुतः --उसका ( पूर्ण का ) पुत्रनरिष्यन्त का पुत्र चित्रसेन हुआ और उसका पुत्र ऋक्ष हुआ।
ऋश्ष से मीढ्वान, मीढूवान से पूर्णऔर पूर्ण से इन्द्रसेन हुआ।
वीतिहोत्रस्त्विन्द्रसेनात्तस्य सत्यश्रवा अभूत् ।
उरुश्रवा: सुतस्तस्य देवदत्तस्ततोभवत् ॥
२०॥
वबीतिहोत्र:--वीतिहोत्र; तु--लेकिन; इन्द्रसेनात्ू--इन्द्रसेन से; तस्य--वबीतिहोत्र का; सत्यश्रवा: --सत्यश्रवा; अभूत्ू--हुआ;उरुश्रवा:--उरु श्रवा; सुत:--पुत्र; तस्थ--उसका ( सत्यश्रवा का ); देवदत्त:--देवदत्त; ततः--उरु श्रवा से; अभवत्--हुआ।
इन्द्रसेन से वीतिहोत्र, बीतिहोत्र से सत्यश्रवा, फिर उससे उरुश्रवा और उरूु श्रवा से देवदत्त हुआ।
ततोउग्निवेश्यो भगवानग्नि: स्वयमभूत्सुत: ।
कानीन इति विख्यातो जातूकर्ण्यो महानृषि: ॥
२१॥
ततः--देवदत्त से; अग्निवेश्य: -- अग्निवेश्य; भगवान्--अत्यन्त शक्तिशाली; अग्नि:--अग्निदेव; स्वयम्--साक्षात्; अभूत्--हुआ;सुतः--पुत्र; कानीन:--कानीन; इति--इस प्रकार; विख्यात:--सुप्रसिद्ध था; जातूकर्ण्य:--जातूकर्ण्य; महान् ऋषि:--परम सन्तपुरुष
देवदत्त का पुत्र अग्निवेश्य हुआ जो साक्षात् अग्निदेव था।
यह पुत्र विख्यात सन््त था और कानीनतथा जातूकर्ण्य के नाम से विख्यात हुआ।
ततो ब्रह्मकुलं जातमाग्निवेश्यायनं नृप ।
नरिष्यन्तान्वय: प्रोक्तो दिष्टवंशमतः श्रूणु ॥
२२॥
ततः--अग्निवेश्य से; ब्रह्म-कुलम्-ब्राह्मणों का कुल; जातम्--उत्पन्न हुआ; आग्निवेश्यायनम्--आग्निवेश्यायन; नृप--हे राजापरीक्षित; नरिष्यन्त--नरिष्यन्त का; अन्वयः--वंशज; प्रोक्त:--कहा जा चुका है; दिष्ट-वंशम्--दिष्ट का वंश; अतः--इसके आगे;श्रुणु--सुनो |
हे राजा, अग्निवेश्य से आग्निवेश्यायन नामक ब्राह्मण कुल उत्पन्न हुआ।
चूँकि मैं नरिष्यन्त केवंशजों का वर्णन कर चुका हूँ अतएवं अब दिष्ट के वंशजों का वर्णन करूँगा।
कृपया मुझसे सुनें।
नाभागो दिष्टपुत्रो उन्यः कर्मणा वैश्यतां गतः ।
भलन्दन: सुतस्तस्य वत्सप्रीतिर्भलन्दनात् ॥
२३॥
बत्सप्रीतेः सुतः प्रांशुस्तत्सुतं प्रमतिं विदु: ।
खनित्र: प्रमतेस्तस्माच्चाक्षुषोथ विविंशति: ॥
२४॥
नाभाग:--नाभाग; दिष्ट-पुत्र:ः--दिष्ट का पुत्र; अन्य:--दूसरा; कर्मणा--वृत्ति से; वैश्यताम्--वैश्य-आश्रम; गत:--प्राप्त किया;भलन्दन:--भलन्दन; सुतः--पुत्र; तस्थ--उसका ( नाभाग का ); वत्सप्रीति:--वत्सप्रीति; भलन्दनात्-- भलन्दन से; वत्सप्रीते: --वत्सप्रीति से; सुत:--पुत्र; प्रांशु:--प्रांशु; तत्ू-सुतम्--उसका ( प्रांशु का ) पुत्र; प्रमतिम्--प्रमति; विदुः--जानो; खनित्र:--खनित्र;प्रमतेः--प्रमतिसे; तस्मात्--खनित्र से; चाक्षुष:--चाक्षुष; अथ--इस प्रकार ( चाक्षुष से ); विविंशति: --विविंशति |
दिष्ट का पुत्र नाभाग हुआ।
यह नाभाग जो आगे वर्णित होने वाले नाभाग से भिन्न था, वृत्ति सेवैश्य बन गया।
नाभाग का पुत्र भलन्दन हुआ, भलन्दन का पुत्र वत्सप्रीति हुआ और उसका पुत्र प्रांशुथा।
प्रांशु का पुत्र प्रमति था, प्रमति का पुत्र खनित्र और खनित्र का पुत्र चाक्षुष था जिसका पुत्रविविंशति हुआ।
विविंशते: सुतो रम्भ: खनीनेत्रोउस्य धार्मिक: ।
'करन्धमो महाराज तस्यासीदात्मजो नृप ॥
२५॥
विविंशते: --विविंशति से; सुतः--पुत्र; रम्भ: --रम्भ; खनीनेत्र:--खनीनेत्र; अस्य--रम्भ का; धार्मिक:--अत्यन्त धार्मिक;करन्धम:--करन्धम; महाराज--हे राजा; तस्य--उसके ( खनीनेत्र से ); आसीत्-- था; आत्मज:--पुत्र; नृप--हे राजा |
विविंशति के पुत्र का नाम रम्भ था जिसका पुत्र अत्यन्त महान् एवं धार्मिक राजा खनीनेत्र हुआ।
हे राजा, खनीनेत्र का पुत्र राजा करन्धम हुआ।
तस्यावीक्षित्सुतो यस्य मरुत्तश्नक्रवर्त्य भूत ।
संवर्तोउयाजयद्यं वै महायोग्यड्रिरः:सुतः ॥
२६॥
तस्य--उसके ( करन्धम के ); अवीक्षित्--अवीक्षित; सुत:--पुत्र; यस्य--जिसका ( अवीक्षित का ); मरुत्त:--मरुत्त नामक ( पुत्र );अक्रवर्ती--राजा; अभूत्--हुआ; संवर्त:--संवर्त; अयाजयत्--यज्ञ कराने के लिए रखा; यम्--जिसको ( मरुत्त को ); वै--निस्सन्देह; महा-योगी--महान् योगी; अड्विरः-सुतः--अंगिरा का पुत्र |
करन्धम से अवीक्षित नामक पुत्र हुआ जिसका पुत्र मरुत्त था जो सप्राट था।
महान् योगीअंगिरा-पुत्र संवर्त ने यज्ञ सम्पन्न कराने के लिए मरुत्त को लगाया।
मरुत्तस्य यथा यज्ञो न तथान्योउस्ति कश्चन ।
सर्व हिरण्मयं त्वासीद्यत्किज्ञिच्यास्य शोभनम् ॥
२७॥
मरुत्तस्य--मरुत्त का; यथा--जिस प्रकार; यज्ञ:--यज्ञ; न--नहीं; तथा--उस प्रकार; अन्य:--कोई दूसरा; अस्ति-- है; कश्चन--कोई भी; सर्वम्--सभी वस्तुएँ; हिरण्-मयम्--सोने की बनी; तु--निस्सन्देह; आसीत्--था; यत् किल्ञितू--जो भी उसके पास था;च--तथा; अस्य--मरुत्त का; शोभनम्--अत्यन्त सुन्दर।
राजा मरुत्त के यज्ञ का साज-सामान अत्यन्त सुन्दर था क्योंकि सारी वस्तुएँ सोने की बनी थीं।
निस्सन्देह, उसके यज्ञ की तुलना किसी भी और यज्ञ से नहीं की जा सकती।
अमाद्यदिन्द्र: सोमेन दक्षिणाभिद्विजातय: ।
मरुतः परिवेष्टारो विश्वेदेवा: सभासद: ॥
२८॥
अमाद्यत्-मदान्ध हो गया; इन्द्र: --इन्द्र; सोमेन--सोमरस का पान करके; दक्षिणाभि:--पर्याप्त दक्षिणा प्राप्त करके; द्विजातय: --ब्राह्मण वर्ग; मरूत:--मरुतों ने; परिवेष्टार: -- भोज्य पदार्थ परोसा; विश्वेदेवा:--विश्वेदेवा; सभा-सदः--सभा के सदस्य ।
उस यज्ञ में सोमरस की बहुत अधिक मात्रा पीने से राजा इन्द्र मदान्ध हो गया।
ब्राह्मणों को प्रचुरदक्षिणा मिली जिससे वे सन्तुष्ट थे।
उस यज्ञ में मरुतों के विविध देवताओं ने खाना परोसा औरविश्वेदेव सभा के सदस्य थे।
मरुत्तस्य दमः पुत्रस्तस्यासीद्राज्यवर्धन: ।
सुधृतिस्तत्सुतो जज्ञे सौधृतेयो नर: सुतः ॥
२९॥
मरुत्तस्य--मरुत्त का; दम:--दम; पुत्र:--पुत्र; तस्य--दम का; आसीत्-- था; राज्य-वर्धन:--राज्यवर्धन अर्थात् राज्य को बढ़ानेबाला; सुधृतिः --सुधृति; तत्-सुतः--उसका पुत्र; जज्ञे--उत्पन्न हुआ; सौधूृतेय: --सुधृति से; नरः--नर नामक; सुतः--पुत्र |
मरुत्त का पुत्र दम हुआ, दम का पुत्र राज्यवर्धन था और उसका पुत्र सुधृति और सुधूति का पुत्रनर था।
तत्सुतः केवलस्तस्माददुन्धुमान्वेगवांस्ततः ।
बुधस्तस्या भवद्यस्य तृणबिन्दुर्महीपति: ॥
३०॥
तत्ू-सुत:--उसका (नर का ) पुत्र; केवल:--केवल था; तस्मात्--उससे; धुन्धुमान्-- धुन्धुमान नामक पुत्र उत्पन्न हुआ; वेगवान्--वबेगवान्; ततः--उससे; बुध: --बुध; तस्य--उसके ; अभवत्-- था; यस्य--जिसका ( बुध का ); तृणबिन्दु:--तृणबिन्दु; महीपति:--राजानर का पुत्र केवल हुआ और उसका पुत्र धुन्धुमान था, जिसका पुत्र वेगवान हुआ।
वेगवान कापुत्र बुध था और बुध का पुत्र तृणबिन्दु था जो इस पृथ्वी का राजा बना।
त॑ भेजेउलम्बुषा देवी भजनीयगुणालयम् ।
वराप्सरा यतः पुत्रा: कन्या चेलविलाभवत् ॥
३१॥
तम्--उसको ( तृणबिन्दु को ); भेजे--पति रूप में स्वीकार किया; अलम्बुषा--अलम्बुषा; देवी--देवी; भजनीय--स्वीकार करनेयोग्य; गुण-आलयम्--सद्गुणों का आगार; बर-अप्सरा:--अप्सराओं में सर्वश्रेष्ठ; यतः--जिससे ( तृणबिन्दु से ); पुत्राः--कुछ पुत्र;'कन्या--एक पुत्री; च--तथा; इलविला--इलविला नामक; अभवत्--उत्पन्न हुई
अप्सराओं में सर्वश्रेष्ठ अत्यन्त गुणी कन्या अलम्बुषा ने अपने ही समान योग्य तृणबिन्दु को पति-रूप में स्वीकार किया।
उसके कुछ पुत्र तथा इलविला नाम की एक कन्या उत्पन्न हुई।
यस्यामुत्पादयामास विश्रवा धनदं सुतम् ।
प्रादाय विद्यां परमामृषियोंगे श्वर: पितु: ॥
३२॥
यस्याम्--जिसमें ( इलविला ) में; उत्पादयाम् आस--जन्म दिया; विश्रवा:--विश्रवा; धन-दम्--कुवेर अर्थात् धन देने वाला;सुतम्--पुत्र को; प्रादाय--प्राप्त करके ; विद्यामू--विद्या को; परमाम्ू--परम; ऋषि: --महान् संत पुरुष; योग-ई श्ररः:--योग केस्वामी; पितु:ः--अपने पिता से |
महान् सन्त योगेश्वर विश्रवा ने अपने पिता से परम विद्या प्राप्त करके इलविला के गर्भ से परमविख्यात पुत्र धन देने वाले कुबेर को उत्पन्न किया।
विशाल: शून्यबन्धुश्न धूम्रकेतुश्च तत्सुता: ।
विशालो वंशकृद्राजा वैशालीं निर्ममे पुरीम्ू ॥
३३॥
विशाल:--विशाल; शून्यबन्धु:--शून्यबन्धु; च-- भी; धूम्रकेतु:--धधूप्रकेतु; च-- भी; तत्-सुता:--तृणबिन्दु के पुत्र; विशाल:--तीनोंमें राजा विशाल ने; वंश-कृत्--वंश बनाया; राजा--राजा; वैशालीम्--वैशाली नामक; निर्ममे--निर्माण किया; पुरीमू--महल।
तृणबिन्दु के तीन पुत्र थे--विशाल, शून्यबन्धु तथा धूम्रकेतु।
इन तीनों में विशाल ने एक वंशचलाया और वैशाली नामक एक महल की रचना कराई।
हेमचन्द्र: सुतस्तस्य धूप्राक्षस्तस्य चात्मज: ।
तत्पुत्रात्संयमादासीत्कृशा श्र: सहदेवज: ॥
३४॥
हेमचन्द्र: --हेमचन्द्र नामक; सुत: --पुत्र; तस्य--उसका ( विशाल का ); धूमप्राक्ष:--धूप्राक्ष; तस्य--उसका ( हेमचन्द्र का ); च--भी;आत्मज:--पुत्र; तत्-पुत्रात्--उसके पुत्र ( धूप्राक्ष ) से; संयमात्--संयम से; आसीत्-- था; कृशाश्र:--कृशा श्र; सह--सहित;देवज:--देवज |
विशाल का पुत्र हेमचन्द्र कहलाया और उसका पुत्र धूप्राक्ष हुआ जिसका पुत्र संयम था औरउसके पुत्रों के नाम देवज तथा कुशाश्र थे।
कृशाश्रात्सोमदत्तो भूद्यो श्रमे धेरिडस्पतिम् ।
इष्ठा पुरुषमापाछयां गतिं योगेश्वराभ्रितामू ॥
३५॥
सौमदत्तिस्तु सुमतिस्तत्पुत्रो जनममेजय:ः ।
एते वैशालभूपालास्तृणबिन्दोर्यशोधरा: ॥
३६॥
कृशाश्वात्-कृशाश्व से; सोमदत्त:--सोमदत्त नामक पुत्र; अभूत्--था; यः--जो ( सोमदत्त ); अश्वमेधे:--अश्वमेध यज्ञ करके;इडस्पतिम्-भगवान् विष्णु को; इष्टा--पूजकर; पुरुषम्--विष्णु को; आप--प्राप्त किया; अछयाम्--सर्व श्रेष्ठ; गतिमू--गन्तव्य,गति; योगेश्वर-आश्रिताम्-महान् योगियों द्वारा प्राप्त स्थान; सौमदत्ति:--सोमदत्त का पुत्र; तु--लेकिन; सुमति:--सुमति; ततू-पुत्रः--उसका ( सुमति का ) पुत्र; जनमेजय:--जनमेजय; एते--इन सबों ने; वैशाल-भूपाला: --वैशाल वंश के राजा; तृणबिन्दो:यशः-धरा:--तृणबिन्दु के यश को बनाये रखा
कृशाश्व का पुत्र सोमदत्त हुआ जिसने अश्वमेध यज्ञ किए और इस प्रकार भगवान् विष्णु को प्रसन्न किया।
भगवान् की पूजा करने से उसे ऐसा उच्चपद प्राप्त हुआ जो बड़े-बड़े योगियों क मिलता है।
सोमदत्त का पुत्र सुमति था जिसका पुत्र जनमेजय हुआ।
विशाल वंश में प्रकट होकर इसारे राजाओं ने राजा तृणबिन्दु के विख्यात पद को बनाये रखा।
