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अध्याय उन्नीस: राजा ययाति को मुक्ति प्राप्त हुई

9.19श्रीशुक उबाचस इत्थमाचरन्कामान्स्त्रैणो पहवमात्मन: ।

बुद्ध्वा प्रियायै निर्विण्णो गाथामेतामगायत ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; सः--महाराज ययाति; इत्थम्‌--इस तरह से; आचरन्‌-- आचरण करते हुए;कामान्‌--कामेच्छाओं को; स्त्रैण:--स्त्री से अत्यधिक लिप्त; अपहृवम्‌--प्रतिक्रिया; आत्मन:--अपने कल्याण के लिए; बुद्ध्वा--बुद्धि से समझते हुए; प्रियायै-- अपनी प्रिया देवयानी को; निर्विण्ण:--वितृष्णा से भरकर; गाथाम्‌ू-- कहानी; एतामू--यह;अगायत--सुनायी |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे महाराज परीक्षित, ययाति स्त्री पर अत्यधिक अनुरक्त था।

किन्तुकालक्रम से जब वह विषय-भोग तथा इसके बुरे प्रभावों से ऊब गया तो उसने यह जीवन-शैलीत्याग दी और अपनी प्रिय पत्नी को निम्नलिखित कहानी सुनाई।

श्रुणु भार्गव्यमूं गाथां मद्विधाचरितां भुवि ।

धीरा यस्यानुशोचन्ति बने ग्रामनिवासिन: ॥

२॥

श्रुणु--सुनो; भार्गवि--हे शुक्राचार्य की पुत्री; अमूमू--इस; गाथाम्‌--कहानी को; मत्‌-विधा--मेरे आचरण से मिलते-जुलते;आचरितामू--आचरण के; भुवि--इस संसार में; धीरा:--धीर व्यक्ति; यस्थय--जिसका; अनुशोचन्ति--पछताते हैं; वने--जंगल में;ग्राम-निवासिन:-- भौतिक भोग के प्रति अत्यधिक अनुरक्त |

हे मेरी प्रिय पत्नी एवं शुक्राचार्य की बेटी, इस संसार में बिल्कुल मेरी ही तरह का कोई था।

तुममेरे द्वारा कही जा रही उसके जीवन की कथा सुनो।

ऐसे गृहस्थ के जीवन के विषय में सुनकर वेलोग सदैव पछताते हैं जिन्होंने गृहस्थ जीवन से वैराग्य ले लिया है।

बस्त एको वने कश्िद्विचिन्वन्प्रियमात्मन: ।

ददर्श कूपे पतितां स्वकर्मवशगामजाम्‌ ॥

३॥

बस्त:--बकरा; एक:--एक; वने--वन में; कश्चित्‌ू--किसी; विचिन्वन्‌ू-- भोजन की तलाश करता; प्रियम्‌--प्रिय; आत्मन: --अपनेलिए; ददर्श--संयोगवश देखा; कूपे--कुएँ के भीतर; पतिताम्‌--गिरी हुई; स्व-कर्म-वश-गाम्‌--अपने कर्मों के फल के प्रभाव से;अजामू--बकरी को

एक बकरा अपनी इन्द्रियों को तुष्ट करने के लिए चरते हुए किसी जंगल में घूमते-घूमते अचानकएक कुएँ के पास आया जिसके भीतर उसने एक बकरी को निस्सहाय खड़ी देखा जो अपने सकामकर्मो के प्रभाव से कुएँ में गिर गई थी।

तस्या उद्धरणोपायं बस्त: कामी विचिन्तयन्‌ ।

व्यधत्त तीर्थमुद्धृत्य विषाणाग्रेण रोधसी ॥

४॥

तस्या:--बकरी का; उद्धरण-उपायम्‌--( कुएँ से ) उद्धार का उपाय; बस्त:--बकरे ने; कामी--विषयी ; विचिन्तयन्‌ू--योजना बनातेहुए; व्यधत्त--सम्पन्न किया; तीर्थम्‌ू--बाहर निकालने का उपाय; उद्धृत्य--पृथ्वी खोदकर; विषाण-अग्रेण--पैने सींगों से; रोधसी--कुएँ के किनारे

बकरी को कुएँ से बाहर निकालने की योजना बनाकर, विषयी बकरे ने अपने तीखे सींगों सेकुएँ के किनारे की मिट्टी खोद डाली जिससे वह बकरी कुएँ से बाहर सरलता से निकल सकी।

सोत्तीर्य कृपात्सुओणी तमेव चकमे किल ।

तया वृतं समुद्रीक्ष्य बह्व्योडजा: कान्तकामिनी: ।

पीवानं एमश्रुलं प्रेष्ठ मीढ्‌वांसं याभकोविदम्‌ ॥

५॥

स एको<जवृष्स्तासां बद्लीनां रतिवर्धन: ।

रेमे कामग्रहग्रस्त आत्मानं नावबुध्यत ॥

६॥

सा--वह बकरी; उत्तीर्य--बाहर निकलकर; कूपात्‌-कुएँ से; सु-श्रोणी --अच्छे पुड्ठों वाली; तम्‌ू--बकरे को; एब--निस्सन्देह;चकमे--पति रूप में पाना चाहा; किल--निस्सन्देह; तया--उसके द्वारा; वृतम्‌--स्वीकृत; समुद्री क्ष्य--देखकर; बह्व्यः--अन्य अनेक; अजा:--बकरियाँ; कान्त-कामिनी: --बकरे को अपना पति बनाने की इच्छुक; पीवानम्‌--अत्यन्त बलिष्ठ; श्मश्रुलम्‌-- अच्छीमूछों तथा दाढ़ी वाले; प्रेष्ठम्‌--उच्चकोटि का; मीढ्वांसम्‌--वीर्यस्खलित करने में पठु; याभ-कोविदम्‌--मैथुन-क्रिया में पटु; सः--वह बकरा; एक:--अकेला; अज-वृष:--बकरियों का नायक; तासामू--सारी बकरियों का; बह्लीनाम्‌-- अनेक; रति-वर्धन:--कामेच्छा को बढ़ाने में समर्थ; रेमे-- भोग किया; काम-ग्रह-ग्रस्त:--कामेच्छा के भूत से सताया हुआ; आत्मानम्‌--अपने आपको;न--नहीं; अवबुध्यत--समझ सका।

जब सुन्दर पुट्ठों वाली बकरी कुएँ से बाहर आ गई और उसने अत्यन्त सुन्दर बकरे को देखा तोउसने उसे अपना पति बनाना चाहा।

जब उसने ऐसा कर लिया तो अन्य अनेक बकरियों ने भी उसबकरे को अपना पति बनाना चाहा क्योंकि उसका शारीरिक गठन अत्यन्त सुन्दर था, उसकी मूँछतथा दाढ़ी सुन्दर थी और वह वीर्यस्खलन करने तथा संभोग कला में पटु था।

अतएव, जिस तरह भूतसे सताया गया मनुष्य पागलपन दिखलाता है उसी तरह वह श्रेष्ठ बकरा अनेक बकरियों से आकृष्टहोकर तथा अश्लील कार्यो में लिप्त रहने के कारण आत्म-साक्षात्कार के अपने असली कार्य कोभूल गया।

तमेव प्रेष्ठठमया रममाणमजान्यया ।

विलोक्य कूपसंविग्ना नामृष्यद्वस्तकर्म ततू ॥

७॥

तम्‌--बकरे को; एव--निस्सन्देह; प्रेष्ठठमया--प्यारी, प्रियतमा द्वारा; रममाणम्‌--रमण की जाती हुईं; अजा--बकरी; अन्यया--दूसरी बकरी से; विलोक्य--देखकर; कूप-संविग्ना-- कुएँ में गिरी बकरी; न--नहीं; अमृष्यत्‌--सहन कर सकी; बस्त-कर्म--बकरेके कार्य को; तत्‌--वह ( मैथुन ही बकरे का व्यापार माना गया है )

जब उस बकरी ने, जो कुए में गिरी थी, देखा कि उसका प्रियतम बकरा किसी दूसरी बकरी सेसंभोग कर रहा है तो वह बकरे के इस कार्य को सहन नहीं कर पाई।

त॑ दु्दं सुहद्दूपं कामिनं क्षणसौहदम्‌ ।

इन्द्रियाराममुत्सूज्य स्वामिनं दु:खिता ययौ ॥

८ ॥

तम्‌--उस ( बकरे ) को; दु्हददम्‌--अत्यन्त क्रूर हृदय; सुहत्‌-रूपम्‌--मित्र बनने वाले; कामिनम्‌--अत्यन्त कामी; क्षण-सौहदम्‌--क्षणभर की मित्रता; इन्द्रिय-आरामम्‌--केवल इन्द्रियतृप्ति या विलासिता में रूचि रखने वाला; उत्सृज्य--छोड़कर; स्वामिनम्‌ू--अपने इसपति को या अपने पूर्व पालक को; दुःखिता--अत्यन्त दुखी; ययौ--वह चली गई।

अन्य बकरी के साथ अपने पति के इस आचरण से दुखी उस बकरी ने सोचा कि यह बकराउसका वास्तविक मित्र नहीं अपितु कठोरहदय वाला तथा कुछ क्षण के लिए ही मित्र है।

अतएवअपने पति के कामी होने के कारण उस बकरी ने उसका साथ छोड़ दिया और अपने पहले वालेस्वामी के पास लौट गई।

सोपि चानुगतः स्त्रेण: कृपणस्तां प्रसादितुम्‌ ।

कुर्वन्निडविडाकारं नाशक्नोत्पथि सन्धितुम्‌ ॥

९॥

सः--वह बकरा; अपि-- भी; च-- भी; अनुगतः --बकरी का पीछा करता; स्त्रैण: --स्त्री-प्रेमी; कृपण:--अत्यन्त गरीब; तामू--उसको; प्रसादितुम्‌-प्रसन्न करने के लिए; कुर्वन्‌--करते हुए; इडविडा-कारम्‌--बकरी की भाषा में बोलते हुए; न--नहीं;अशक्नोत्‌--समर्थ था; पथ्चि--मार्ग में; सन्धितुम्‌-प्रसन्न करने के लिए।

वह बकरा अत्यन्त दुखी होकर अपनी पत्नी का चाटुकार होने के कारण मार्ग में उसके पीछे-पीछे हो लिया और उसने उसकी भरसक चाटुकारी करनी चाही, किन्तु वह उसे मना नहीं पाया।

तस्य तत्र द्विज: कश्चिदजास्वाम्यच्छिनद्रुषा ।

लम्बन्तं वृषणं भूय: सन्दधेर्थाय योगवित्‌ ॥

१०॥

तस्य--बकरे का; तत्र--तत्पश्चात्‌; द्विज:--ब्राह्मण; कश्चित्‌--कोई; अजा-स्वामी--दूसरी बकरी के मालिक ने; अच्छिनत्‌--बधियाकर दिया; रुषा--क्रोध में आकर; लम्बन्तम्‌--लम्बे; वृषणम्‌--फोते, अण्डकोष को; भूय:--फिर; सन्दधे--जोड़ दिया; अर्थाय--अपने हित में; योग-वित्‌--योगशक्ति में पटु |

बकरी उस ब्राह्मण के घर गई जो एक दूसरी बकरी का मालिक था और उस ब्राह्मण ने गुस्से मेंआकर बकरे के लम्बे लटकते अण्डकोष काट लिये।

किन्तु बकरे द्वारा प्रार्थना किये जाने पर उसब्राह्मण ने योगशक्ति से उन्हें फिर से जोड़ दिया।

सम्बद्धवृषण: सोपि ह्ाजया कूपलब्धया ।

कालं बहुतिथं भद्दे कामर्नाद्यापि तुष्यति ॥

११॥

सम्बद्ध-वृषण:--जिसके अण्डकोषों को जोड़ दिया गया हो; सः--वह; अपि-- भी; हि--निस्सन्देह; अजया--बकरी के साथ;कूप-लब्धया--कुएँ से मिली; कालमू--समय के लिए; बहु-तिथम्‌--दीर्घकालीन; भद्वे--हे प्रिय पत्नी; कामैः--कामेच्छाओं सहित;न--नहीं; अद्य अपि-- आज तक; तुष्यति--संतुष्ट होता है।

हे प्रिये, जब बकरे के अण्डकोष जुड़ गये तो उसने कुएँ से मिली बकरी के साथ सम्भोग कियाऔर यद्यपि वह अनेकानेक वर्षो तक भोग करता रहा, किन्तु आज भी वह पूरी तरह सन्तुष्ट नहीं होपाया है।

तथाहं कृपणः सुश्रु भवत्या: प्रेमयन्त्रित: ।

आत्मानं नाभिजानामि मोहितस्तव मायया ॥

१२॥

तथा--बकरे की तरह; अहम्‌--मैं; कृपण:--कंजूस, जिसे जीवन के महत्त्व का कोई ज्ञान नहीं है; सु-भध्रु--हे सुन्दर भौहों वाली;भवत्या: --तुम्हारे साथ; प्रेम-यन्त्रितः--मानों प्रेम में बँधा हूँ जो कि वास्तव में विषयवासना है; आत्मानम्‌--आत्मसाक्षात्कार ( जो मैं हूँऔर जो मेरा धर्म है ); न अभिजानामि-- अभी तक समझ नहीं पाया; मोहित:--मोहित होकर; तव--तुम्हारे; मायया--आकर्षकभौतिक स्वरूप के द्वारा।

हे सुन्दर भौहों वाली प्रिये, मैं उसी बकरे के सहृश हूँ क्योंकि मैं इतना मन्दबुद्धि हूँ कि मैं तुम्हारेसौन्दर्य से मोहित होकर आत्म-साक्षात्कार के असली कार्य को भूल गया हूँ।

यत्पृथिव्यां ब्रीहियवं हिरण्यं पशव:ः स्त्रिय: ।

न दुह्मान्ति मनःप्रीतिं पुंसः कामहतस्य ते ॥

१३॥

यतू--जो भी; पृथिव्याम्‌--इस संसार के भीतर; ब्रीहि--अन्न, धान; यवम्‌--जौ; हिरण्यम्‌--सोना; पशव: --पशु; स्त्रियः -स्त्रियाँ,पत्नियाँ; न दु्मन्ति--नहीं देती हैं; मनः-प्रीतिमू--मन की तुष्टि; पुंसः--पुरुष को; काम-हतस्थ--विषयवासनाओं के शिकार होने केकारण; ते--वे |

कामी पुरुष का मन कभी तुष्ट नहीं होता भले ही उसे इस संसार की हर वस्तु प्रचुर मात्रा मेंउपलब्ध क्‍यों न हो, जैसेकि धान, जौ, अन्य अनाज, सोना, पशु तथा स्त्रियाँ इत्यादि ।

उसे किसी वस्तुसे संतोष नहीं होता।

न जातु काम: कामानामुपभोगेन शांयति ।

हविषा कृष्णवर्त्मेंव भूय एवाभिवर्धते ॥

१४॥

न--नहीं; जातु--किसी भी समय; काम:ः--कामेच्छा; कामानाम्‌--कामी पुरुषों की; उपभोगेन--कामेच्छाओं के भोग द्वारा;शांयति--शान्त की जा सकती है; हविषा--धी द्वारा; कृष्ण-वर्त्मा--अग्नि; इब--सहश; भूयः--बार बार; एव--निस्सन्देह;अभिवर्धते-- अधिकाधिक बढ़ती है |

जिस तरह अग्नि में घी डालने से अग्नि शान्त नहीं होती अपितु अधिकाधिक बढ़ती जाती है उसीप्रकार निरन्तर भोग द्वारा कामेच्छाओं को रोकने का प्रयास कभी भी सफल नहीं हो सकता।

( तथ्यतो यह है कि मनुष्य को स्वेच्छा से भौतिक इच्छाएँ समाप्त करनी चाहिए )।

यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेष्वमड्लम्‌ ।

समटष्टेस्तदा पुंस: सर्वा: सुखमया दिश: ॥

१५॥

यदा--जब; न--नहीं; कुरुते--करता है; भावम्‌--अनुरक्ति या द्वेष से भिन्न मनोवृत्ति; सर्व-भूतेषु--सारे जीवों पर; अमड्रलम्‌--अशुभ; सम-दृष्टे: --समदृष्टि होने से; तदा--उस समय, तब; पुंसः--पुरुष का; सर्वा:--सारी; सुख-मया:--सुखी अवस्था में;दिश:-दिशाएँ |

जब मनुष्य द्वेष-रहित होता है और किसी का बुरा नहीं चाहता तो वह समदर्शी होता है।

ऐसेव्यक्ति के लिए सारी दिशाएँ सुखमय प्रतीत होती हैं।

या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्जीर्यतो या न जीर्यते ।

तां तृष्णां दुःखनिवहां शर्मकामो द्वुतं त्यजेतू ॥

१६॥

या--जो; दुस्त्यजा--जिसको छोड़ पाना अत्यन्त कठिन है; दुर्मतिभि:ः-- भौतिक भोगों में अत्यधिक आसक्त व्यक्तियों द्वारा; जीर्यत:--वृद्धावस्था के कारण अत्यन्त अशक्तों द्वारा भी; या--जो; न--नहीं; जीर्यते--नष्ट होती है; तामू--ऐसी; तृष्णाम्‌--इच्छा को; दुःख-निवहाम्‌--सारे दुखों का मूल कारण; शर्म-काम:--अपने सुख का इच्छुक व्यक्ति; द्रतम्‌-शीघ्र ही; त्यजेत्‌ू-छोड़ दे ।

जो लोग भौतिक भोग में अत्यधिक लिप्त रहते हैं उनके लिए इन्द्रियतृप्ति को त्याग पाना अत्यन्तकठिन है।

यहाँ तक कि वृद्धावस्था के कारण अशक्त व्यक्ति भी इन्द्रियतृष्ति की ऐसी इच्छाओं कोनहीं त्याग पाता।

अतएव जो सचमुच सुख चाहता है उसे ऐसी अतृप्त इच्छाओं को त्याग देना चाहिएक्योंकि ये सारे कष्टों की जड़ हैं।

मात्रा स्वस्त्रा दुहित्रा वा नाविविक्तासनो भवेत्‌ ।

बलवानिन्‍न्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥

१७॥

मात्रा--माता के साथ; स्वस्त्रा--बहन के साथ; दुहित्रा--पुत्री के साथ; वा--अथवा; न--नहीं; अविविक्त-आसन:--एक ही आसनपर सटकर बैठे; भवेत्‌--हो; बलवानू्‌-- अत्यन्त प्रबल; इन्द्रिय-ग्राम:--इन्द्रियसमूह; विद्वांसम्‌-- अत्यन्त विद्वान व्यक्ति को; अपि--भी; कर्षति--उत्तेजित करता है।

मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी माता, बहन या पुत्री के साथ एक ही आसन पर न बैठे क्योंकिइन्द्रियाँ इतनी प्रबल होती हैं कि बड़े से बड़ा विद्वान भी यौन द्वारा आकृष्ट हो सकता है।

पूर्ण वर्षसहस्त्रं मे विषयान्सेवतो सकृत्‌ ।

तथापि चानुसवनं तृष्णा तेषूपजायते ॥

१८॥

पूर्णम्‌--पूरे; वर्ष-सहस्त्रमू--एक हजार वर्ष; मे--मेरा; विषयान्‌--इन्द्रियतृप्ति; सेवतः--भोग करते हुए; असकृत्‌--निरन्तर; तथाअपि--फिर भी; च--निस्सन्देह; अनुसवनम्‌-- अधिकाधिक; तृष्णा--कामेच्छाएँ; तेषु--इन्द्रियतृप्ति में; उपजायते--बढ़ती जाती है।

मैंने इन्द्रियतृप्ति के भोगने में पूरे एक हजार वर्ष बिता दिये हैं फिर भी ऐसे आनन्द को भोगने कीमेरी इच्छा नित्य बढती जाती है।

तस्मादेतामहं त्यक्त्वा ब्रह्मण्यध्याय मानसम्‌ ।

निद्वन्दों निरहड्डारश्वरिष्यामि मृगै: सह ॥

१९॥

तस्मातू--इसलिए; एताम्‌ू--ऐसी प्रबल इच्छाओं को; अहम्‌--मैं; त्यक्त्वा--त्याग कर; ब्रह्मणि--परब्रह्म में; अध्याय--स्थिर करके;मानसम्‌--मन को; निर्द्वन्द:--द्वन्द रहित; निरहड्डार:--मिथ्या अहंकार से रहित; चरिष्यामि--जंगल में विचरण करूँगा; मृगै: सह--जंगली पशुओं के साथ।

अतएव अब मैं इन सारी इच्छाओं को त्याग दूँगा और भगवान्‌ का ध्यान करूँगा।

मनोरथों केइन्द्दों से तथा मिथ्या अहंकार से रहित होकर मैं जंगल में पशुओं के साथ विचरण करूँगा।

इहृष्टं श्रुतमसद्दुद्ध्वा नानुध्यायेन्न सन्दिशेत्‌ ।

संसृतिं चात्मनाशं च तत्र विद्वान्स आत्महकू ॥

२०॥

इृष्टमू--हमारे द्वारा वर्तमान जीवन में अनुभूत भौतिक भोग; श्रुतम्‌-- भौतिक भोग जो सकाम कर्मियों को भावी सुख के लिए मिलनाहै ( वर्तमान या अगले जीवन में या स्वर्गलोक आदि में ); असत्‌--जो क्षणिक तथा निकृष्ट है; बुद्ध्वा--जानकर; न--नहीं;अनुध्यायेत्‌ू--सोचना चाहिए; न--न तो; सन्दिशेत्‌--वास्तव में भोग करना चाहिए; संसृतिमू-- भौतिक जीवन का दीर्घ होना; च--तथा; आत्म-नाशम्‌--अपनी स्वाभाविक स्थिति का विस्मरण; च--भी; तत्र--ऐसे विषय में; विद्वान्‌ू--पूर्णतया अवगत; सः--ऐसाव्यक्ति; आत्म-हक्‌--स्वरूपसिद्ध |

जो यह जानता है कि भौतिक सुख चाहे अच्छा हो या बुरा, इस जीवन में हो या अगले जीवन में,इस लोक में हो या स्वर्गलोक में हो, क्षणिक तथा व्यर्थ है और यह जानता है कि बुद्धिमान पुरुष कोऐसी वस्तुओं को भोगने या सोचने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए।

वह मनुष्य आत्मज्ञानी है।

ऐसा स्वरूपसिद्ध व्यक्ति भलीभाँति जानता है कि भौतिक सुख बारम्बार जन्म एवं अपनी स्वाभाविकस्थिति के विस्मरण का एकमात्र कारण है।

इत्युक्त्वा नाहुषो जायां तदीयं पूरवे वयः ।

दत्त्वा स्वजरसं तस्मादाददे विगतस्पृह:ः ॥

२१॥

इति उक्‍्त्वा--ऐसा कहकर; नाहुष:--नहुष पुत्र महाराज ययाति; जायाम्‌--अपनी पत्नी देवयानी से; तदीयम्‌-- उसका; पूरवे--अपनेपुत्र पूर को; वयः--जवानी; दत्त्वा--देकर; स्व-जरसम्‌--अपने बुढ़ापे को; तस्मात्‌--उससे; आददे--वापस ले लिया; विगत-स्पृहः--सारी वासनाओं से मुक्त होकर, निस्पृह |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : अपनी पत्नी देवयानी से इस प्रकार कहकर समस्त इच्छाओं से मुक्तहुए राजा ययाति ने अपने सबसे छोटे पुत्र पूर॒ को बुलाया और उसे उसकी जवानी लौटाकर अपनाबुढ़ापा वापस ले लिया।

दिशि दक्षिणपूर्वस्यां ब्रुह्युं दक्षिणतो यदुम्‌ ।

प्रतीच्यां तुर्वसुं चक्र उदीच्यामनुमी श्वरम्‌ ॥

२२॥

दिशि--दिशा में; दक्षिण-पूर्वस्थाम्‌--दक्षिण पूर्व; द्रुह्मुमू-- अपने बेटे द्रह्मु को; दक्षिणतः--संसार की दक्षिण दिशा में; यदुम्‌--यदुको; प्रतीच्यामू-पश्चिम दिशा में; तुर्वसुम्‌--अपने पुत्र तुर्वसु को; चक्रे --बना दिया; उदीच्याम्‌--उत्तर दिशा में; अनुम्‌--अपने पुत्रअनु को; ईश्वरम्‌--राजा |

राजा ययाति ने अपने पुत्र द्ह्मु को दक्षिण पूर्व की दिशा, अपने पुत्र यदु को दक्षिण की दिशा,अपने पुत्र तुर्वसु को पश्चिमी दिशा और अपने चौथे पुत्र अनु को उत्तरी दिशा दे दी।

इस तरह उन्होंनेराज्य का बँटवारा कर दिया।

भूमण्डलस्य सर्वस्य पूरुमहत्तमं विशाम्‌ ।

अभिषिच्याग्रजांस्तस्य वशे स्थाप्य वनं ययौ ॥

२३॥

भू-मण्डलस्य--सारे पृथ्वीलोक का; सर्वस्य--सारी सम्पत्ति का; पूरुम्‌--अपने सब से छोटे पुत्र पूरू को; अर्हत्‌-तमम्‌--सर्वाधिकपूज्य व्यक्ति, राजा; विशाम्‌-- प्रजा का; अभिषिच्य--अभिषेक करके; अग्रजान्‌--यदु से लेकर अपने बड़े भाइयों को; तस्थ--पूरूके; वशे--नियंत्रण में; स्थाप्प--रखकर; वनम्‌--वन; ययौ--चला गया

ययाति ने अपने सबसे छोटे पुत्र पूरु को सारे विश्व का सप्राट तथा सारी सम्पत्ति का स्वामी बनादिया और पूरु से बड़े अपने अन्य सारे पुत्रों को पूर॒ के अधीन कर दिया।

आसेवितं वर्षपूगान्घड्वर्ग विषयेषु सः ।

क्षणेन मुमुच्चे नीडं जातपक्ष इव द्विज: ॥

२४॥

आसेवितम्‌--सदैव संलग्न रहकर; वर्ष-पूगान्‌ू--अनेकानेक वर्षों तक; षट्‌-वर्गम्‌--मन समेत छहों इन्द्रियों को; विषयेषु--इन्द्रियभोगमें; सः--राजा ययाति ने; क्षणेन--एक ही क्षण के भीतर; मुमुचे--छोड़ दिया; नीडम्‌--नीड़, घोसला; जात-पक्ष:--पंख उग आयेहैं; इब--सहश; द्विज:--पक्षी |

है राजा परीक्षित, ययाति ने अनेकानेक वर्षों तक विषयवासनाओं का भोग किया, क्‍योंकि वेइसके आदी थे, किन्तु उन्होंने एक क्षण के भीतर अपना सर्वस्व त्याग दिया जिस तरह पंख उगते हीपक्षी अपने घोंसले से उड़ जाता है।

स तत्र निर्मुक्तसमस्तसड़आत्मानुभूत्या विधुतत्रिलिड्र: ।

परेमले ब्रह्मणि वासुदेवेलेभे गतिं भागवतीं प्रतीत: ॥

२५॥

सः--महाराज ययाति; तत्र--ऐसा करके; निर्मुक्त--तुरन्त मुक्त हो गया; समस्त-सड़ः--सारा कल्मष; आत्म-अनुभूत्या--अपनीस्वाभाविक स्थिति को समझने मात्र से; विधुत--स्वच्छ; त्रि-लिड्र:--प्रकृति के तीन गुणों ( सतोगुण, रजोगुण तथा तमोगुण ) सेउत्पन्न कल्मष; परे--ब्रह्म में; अमले--मलरहित; ब्रह्म णि--परमे श्वर में; वासुदेवे-- भगवान्‌ वासुदेव परम सत्य में; लेभे--प्राप्त किया;गतिमू--लक्ष्य; भागवतीम्‌-- भगवान्‌ के पार्षद रूप में; प्रतीत: --सुप्रसिद्ध |

चूँकि राजा ययाति ने भगवान्‌ वासुदेव के चरणकमलों में पूरी तरह अपने को समर्पित कर दियाथा अतएव वे प्रकृति के गुणों के सारे कल्मष से मुक्त हो गये।

अपने आत्मसाक्षात्कार के कारण वेअपने मन को परब्रह्म वासुदेव में स्थिर कर सके और इस तरह अन्ततः उन्हें भगवान्‌ के पार्षद का पदप्राप्त हुआ।

श्र॒ुत्वा गाथां देवयानी मेने प्रस्तोभमात्मन: ।

स्त्रीपुंसो: स्नेहवैक्लव्यात्परिहासमिवेरितम्‌ ॥

२६॥

श्रुत्वा--सुनकर; गाथामू--कथा; देवयानी--महाराज ययाति की पत्नी देवयानी; मेने--समझ गई; प्रस्तोभम्‌ आत्मन:--अपने आत्म-साक्षात्कार के लिए उपदेश दिये जाने पर; स्त्री-पुंसोः--पति तथा पत्नी के बीच; स्नेह-वैक्लव्यात्‌--प्रेम तथा स्नेह के विनिमय से;'परिहासम्‌ू--मजाक या कहानी; इब--सहश; ईरितम्‌--कही गई ( ययाति द्वारा ) |

जब देवयानी ने महाराज ययाति द्वारा कही गई बकरे-बकरी की कथा सुनी तो वह समझ गयीकि हास-परिहास के रूप में पति-पत्ली के मध्य मनोरंजनार्थ कही गई यह कथा उसमें उसकीस्वाभाविक स्थिति को जागृत करने के निमित्त थी।

सा सन्निवासं सुहृदां प्रषायामिव गच्छताम्‌ ।

विज्ञायेश्वरतन्त्राणां मायाविरचितं प्रभो; ॥

२७॥

सर्वत्र सड्रमुत्सृज्य स्वप्नौपम्येन भार्गवी ।

कृष्णे मन: समावेश्य व्यधुनोल्लिड्रमात्मन: ॥

२८ ॥

सा--देवयानी; सन्निवासम्‌--साथ में रहते हुए; सुहृदाम्‌-मित्रों तथा सम्बन्धियों के ; प्रपायाम्‌-प्याऊ में; इब--सहश; गच्छताम्‌--एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करने वालों का; विज्ञाय--जानकर; ई श्वर-तन्त्राणाम्‌-- प्रकृति के कठोर नियमों के अन्तर्गत;माया-विरचितम्‌--माया द्वारा लागू नियमों को; प्रभो:--भगवान्‌ के; सर्वत्र--इस जगत में सब जगह; सड्रम्‌--साथ; उत्सूज्य--छोड़कर; स्वप्न-औपम्येन-- स्वप्न के सहृश; भार्गवी--शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी; कृष्णे--कृष्ण में; मन:ः--पूर्ण ध्यान;समावेश्य--स्थिर करके; व्यधुनोत्‌-त्याग दिया; लिड्डमू--स्थूल तथा सूक्ष्म शरीरों को; आत्मन:--आत्मा के |

तत्पश्चात्‌ शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी समझ गई कि पति, मित्रों तथा सम्बन्धियों का सांसारिकसाथ प्याऊ में यात्रियों की संगति के समान है।

भगवान्‌ की माया से समाज के सम्बन्ध, मित्रता तथाप्रेम ठीक स्वप्न की ही भाँति उत्पन्न होते हैं।

कृष्ण के अनुग्रह से देवयानी ने भौतिक जगत की अपनीकाल्पनिक स्थिति छोड़ दी।

उसने अपने मन को पूरी तरह कृष्ण में स्थिर कर दिया और स्थूल तथासूक्ष्म शरीरों से मोक्ष प्राप्त कर लिया।

नमस्तुभ्यं भगवते वासुदेवाय वेधसे ।

सर्वभूताधिवासाय शान्ताय बृहते नम: ॥

२९॥

नमः--नमस्कार करती हूँ; तुभ्यमू--तुमको; भगवते-- भगवान्‌; वासुदेवाय--वासुदेव को; वेधसे --स्त्रष्टा; सर्व-भूत-अधिवासाय--सर्वव्यापी ( प्रत्येक जीव के हृदय में तथा प्रत्येक अणु में भी ); शान्ताय--शान्त, मानो पूर्णतया निष्क्रिय हो; बृहते--सबों मेंविशालतम; नम:--नमस्कार करती हूँ।

हे भगवान्‌ वासुदेव, हे पूर्ण पुरुषोत्तम परमेश्वर, आप समस्त विराट जगत के स्त्रष्टा हैं।

आप सबोंके हृदय में परमात्मा रूप में निवास करते हैं और सूक्ष्मतम से सूक्ष्मतर होते हुए भी बृहत्तम से बृहत्तरहैं तथा सर्वव्यापक हैं।

आप परम शान्त लगते हैं मानो आपको कुछ करना-धरना न हो लेकिन ऐसाआपके सर्वव्यापक स्वभाव एवं सर्व ऐश्वर्य से पूर्ण होने के कारण है।

अतएवं मैं आपको सादरनमस्कार करती हूँ।

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