← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 9 की सूची
अध्याय पंद्रह: परशुराम, भगवान के योद्धा अवतार
9.15श्रीबादरायणिरुवाचऐलस्य चोर्वशीगर्भात्षडासन्नात्मजा नूप ।
आयु: श्रुतायु: सत्यायू रयोथ विजयो जयः ॥
१॥
श्री-बादरायणि: उबाच-- श्रील शुकेदव गोस्वामी ने कहा; ऐलस्थ--पुरुरवा के; च--भी; उर्वशी-गर्भात्ू--उर्वशी के गर्भ से; घट्ू--छ:; आसनू--थे; आत्मजा:--पुत्र; नृप--हे राजा परीक्षित; आयु:--आयु; श्रुतायु:-- श्रुतायु; सत्यायु:--सत्यायु; रथ: --रय; अथ--तथा; विजय:--विजय; जय: --जय |
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे राजा परीक्षित, पुरुरवा ने उर्वशी के गर्भ से छः पुत्र उत्पन्नकिये।
उनके नाम थे--आयु, श्रुतायु, सत्यायु, रय, विजय तथा जय।
श्रुतायोर्वसुमान्पुत्र: सत्यायोश्व श्रुतश्ञय: ।
रयस्य सुत एकश्च जयस्य तनयोउमितः ॥
२॥
भीमस्तु विजयस्याथ काझ्जनो होत्रकस्ततः ।
तस्य जह्ठुः सुतो गड्ढां गण्डूषीकृत्य योडपिबत् ॥
३॥
श्रुतायो: -- श्रुतायु का; वसुमान्--वसुमान; पुत्र:--पुत्र; सत्यायो: --सत्यायु का; च-- भी; श्रुतश्लय: -- श्रुतक्षय; रबस्य--रय का;सुतः--पुत्र; एक:--एक नामक; च--तथा; जयस्य--जय का; तनय:--पुत्र; अमित:--अमित; भीम:-- भीम; तु--निस्सन्देह;विजयस्य--विजय का; अथ--तत्पश्चात्; काझ्नन: --काझ्जन, भीम का पुत्र; होत्रक:--होत्रक; तत:--तब; तस्य--होत्रक का;जहुः--जह; सुत:--पुत्र; गड्ञामू--गंगा के सारे जल को; गण्डूषी-कृत्य--एक ही घूँट में; य:--जिसने; अपिबत्--पी लिया।
श्रुतायु का पुत्र बसुमान हुआ, सत्यायु का पुत्र श्रुतक्लय हुआ, रय के पुत्र का नाम एक था, जयका पुत्र अमित था और विजय का पुत्र भीम हुआ।
भीम का पुत्र काञ्जन, काञ्जन का पुत्र होत्रक औरहोत्रक का पुत्र जह्वु था जिसने एक ही घूँट में गंगा का सारा पानी पी लिया था।
जह्लेस्तु पुरुस्तस्याथ बलाकश्चात्मजोजक: ।
ततः कुशः कुशस्यापि कुशाम्बुस्तनयो वसुः ।
कुशनाभश्च चत्वारो गाधिरासीत्कुशाम्बुज: ॥
४॥
जह्नोः:--जह्ठ का; तु--निस्सन्देह; पुरुः--पुरु नामक; तस्थ--उसका; अथ--तत्पश्चात्; बलाक:--बलाक; च--तथा; आत्मज: --बलाक का पुत्र; अजक:--अजक; ततः--त्पश्चात्; कुश:--कुश; कुशस्थ--कुश का; अपि--तब; कुशाम्बु:-- कुशाम्बु;तनय:--तनय; वसु:--वसु; कुशनाभ: -- कुशनाभ; च--तथा; चत्वार:--चार पुत्र; गाधि: --गाधि; आसीत्-- था; कुशाम्बुज: --कुशाम्बुज का पुत्र।
जह्ठ का पुत्र पुरु था, पुरु का बलाक, बलाक का अजक और अजक का पुत्र कुश हुआ।
कुशके चार पुत्र हुए जिनके नाम थे कुशाम्बुज, तनय, वसु तथा कुशनाभ।
कुशाम्बु का पुत्र गाधि था।
तस्य सत्यवतीं कन्यामृचीको याचत द्विज: ।
वर विसहशं मत्वा गाधिर्भार्गवमब्रवीत् ॥
५॥
एकतः एयामकर्णानां हयानां चन्द्रवर्चसाम् ।
सहस्त्रं दीयतां शुल्क॑ कन्याया: कुशिका वयम् ॥
६॥
तस्य--उस ( गाधि ) की; सत्यवतीम्ू--सत्यवती; कन्याम्--पुत्री को; ऋचीक:--महामुनि ऋचीक ने; अयाचत--विवाह के लिएमाँगा; द्विज:ः--ब्राह्मण; वरम्--पति रूप में; विसहशम्-- अनुपयुक्त; मत्वा--मानकर; गाधि:--राजा गाधि; भार्गवम्--ऋचीक से;अब्रवीत्ू--बोला; एकत:--एक; श्याम-कर्णानामू--जिसका कान काला हो; हयानाम्--घोड़ों का; चन्द्र-वर्चसाम्--चाँदनी साउज्चल; सहस्त्रमू--एक हजार; दीयताम्-दें; शुल्कम्--दहेज के रूप में; कन्याया:--मेरी कन्या को; कुशिका:--कुश के परिवारमें; वयम्--हम हैं ॥
गाधि के एक पुत्री थी जिसका नाम सत्यवती था जिससे विवाह करने के लिए ऋचीक नामक ब्रह्मर्षि ने राजा से विनती की।
किन्तु राजा गाधि ने इस ब्रह्मर्षि को अपनी पुत्री के लिए अयोग्य पतिसमझ कर उससे कहा, 'महोदय, मैं कुशवंशी हूँ।
चूँकि हम लोग राजसी क्षत्रिय हैं अतएव आपकोमेरी पुत्री के लिए कुछ दहेज देना होगा।
अतः आप कम से कम एक हजार ऐसे घोड़े लायें जोचाँदनी की तरह उज्वल हों और जिनके एक कान, दायाँ या बायाँ, काला हो।
'इत्युक्तस्तन्मतं ज्ञात्वा गतः स वरुणान्तिकम् ॥
आनीय दत्त्वा तानश्वानुपयेमे वराननाम् ॥
७॥
इति--इस तरह; उक्त:--कहे जाने पर; ततू-मतम्--उसका विचार; ज्ञात्वा--जानकर; गत:--चला गया; सः--वह; वरुण-अन्तिकम्--वरुण लोक को; आनीय--लाकर; दत्त्वा--तथा देकर; तान्ू--उन; अश्वान्--घोड़ों को; उपयेमे--विवाह कर लिया;वर-आननामू्--राजा गाधि की सुमुखी पुत्री का
जब राजा गाधि ने यह माँग पेश की तो महर्षि ऋचीक को राजा के मन की बात समझ में आगई।
अतएव वह वरुणदेव के पास गया और वहाँ से गाधि द्वारा माँगे गये एक हजार घोड़े ले आया।
इन घोड़ों को भेंट करके मुनि ने राजा की सुन्दर पुत्री के साथ विवाह कर लिया।
स ऋषि: प्रार्थित: पत्या श्वश्वा चापत्यकाम्यया ।
अ्रपयित्वो भयैर्मन्त्रैश्वरु स्नातुं गतो मुनि: ॥
८ ॥
सः--वह ( ऋचीक ); ऋषि:--ऋषि; प्रार्थित: --प्रार्थना किये जाने पर; पत्या-- अपनी पत्नी द्वारा; श्रश्वा-- अपनी सास द्वारा; च--भी; अपत्य-काम्यया--पुत्र की इच्छा से; श्रपयित्वा--पकाकर; उभयैः--दोनों; मन्त्रै:--विशेष मंत्रोच्चार से; चरुम्--यज्ञ में आहुतिदेने के लिए खीर; स्नातुम्--स्नान करने के लिए; गतः--चला गया; मुनि:--मुनि |
तत्पश्चात् ऋचीक मुनि की पत्नी तथा सास दोनों ने पुत्र की इच्छा से मुनि से प्रार्थना की कि वहचरु ( आहुति ) तैयार करे।
तब मुनि ने अपनी पत्नी के लिए ब्राह्मण मंत्र से एक चरू और क्षत्रिय मंत्रसे अपनी सास के लिए एक अन्य चरु तैयार किया।
फिर वह स्नान करने चला गया।
तावत्सत्यवती मात्रा स्वचरुं याचिता सती ।
श्रेष्ठ मत्वा तयायच्छन्मात्रे मातुरदत्स्वयम् ॥
९॥
तावत्--इसी बीच; सत्यवती--ऋचीक पत्नी सत्यवती; मात्रा--अपनी माता से; स्व-चरुम्--अपने लिए तैयार की गई चरु;याचिता--माँगे जाने पर; सती--हो ने से; श्रेष्ठम्--उत्तम; मत्वा--सोचकर; तया--उसके द्वारा; अयच्छत्-- प्रदान किया गया; मात्रे--माता का; मातुः--माता का; अदत्ू--खाया; स्वयम्--स्वयं, खुद |
इसी बीच सत्यवती की माता ने सोचा कि उसकी पुत्री के लिए तैयार की गई चरूु अवश्य हीश्रेष्ठ होगी अतएवं उसने अपनी पुत्री से वह चरु माँग ली।
सत्यवती ने वह चरु अपनी माता को दे दीऔर स्वयं अपनी माता की चरु खा ली।
तद्विदित्वा मुनि: प्राह पत्नीं कष्टमकारषी: ।
घोरो दण्डधरः पुत्रो भ्राता ते ब्रह्मवित्तम: ॥
१०॥
तत्--यह तथ्य; विदित्वा--जानकर; मुनि:--मुनि ने; प्राह--कहा; पत्नीम्--अपनी पत्नी से; कष्टम्-- अत्यन्त दुखद; अकारषी:--तुमने कर डाला; घोर: -- भयानक; दण्ड-धरः--महापुरुष जो अन्यों को दण्ड दे सकता है; पुत्र:--ऐसा पुत्र; भ्राता-- भाई; ते--तुम्हारा; ब्रह्म-वित्तम: --अध्यात्म विद्या में पंडित
जब ऋषि ऋचीक स्नान करके घर लौटे और उन्हें यह पता लगा कि उनकी अनुपस्थिति में क्याघटना घटी है तो उन्होंने अपनी पत्नी सत्यवती से कहा, 'तुमने बहुत बड़ी भूल की है।
तुम्हारा पुत्रघोर क्षत्रिय होगा, जो हर एक को दण्ड दे सकेगा और तुम्हारा भाई अध्यात्म विद्या का पण्डितहोगा।
प्रसादित: सत्यवत्या मैवं भूरिति भार्गव: ।
अथ तर्हि भवेत्पौत्रो जमदग्निस्ततोभवत् ॥
११॥
प्रसादित: --शान्त किया गया; सत्यवत्या--सत्यवती द्वारा; मा--नहीं; एवम्--इस प्रकार; भू: --हो; इति--इस प्रकार; भार्गव:--ऋषि; अथ--यदि तुम्हारा पुत्र ऐसा न हुआ; तहिं--तो; भवेत्--होगा; पौत्र:--पोता; जमदग्नि:--जमदग्नि; ततः --त त्पश्चात्;अभवत्--उत्पन्न हुआ।
किन्तु सत्यवती ने मधुर बचनों से ऋचीक मुनि को शान्त किया और प्रार्थना की कि उसका पुत्रक्षत्रिय की तरह भयंकर न हो।
ऋचीक मुनि ने उत्तर दिया, 'तो तुम्हारा पौत्र क्षत्रिय गुणवालाहोगा।
इस प्रकार सत्यवती के पुत्र रूप में जमदग्नि का जन्म हुआ।
सा चाभूत्सुमहत्पुण्या कौशिकी लोकपावनी ।
रेणोः सुतां रेणुकां वै जमदग्निसुवाह याम् ॥
१२॥
तस्यां वै भार्गवऋषे: सुता वसुमदादयः ।
यवीयाजञ्जज्ञ एतेषां राम इत्यभिविश्रुतः ॥
१३॥
सा--वह ( सत्यवती ); च--भी; अभूत्--हो गईं; सुमहत्-पुण्या--अत्यन्त महान् एवं पवित्र; कौशिकी--कौशिकी नामक नदी;लोक-पावनी--समस्त संसार को पवित्र करने वाली; रेणो: --रेणु की; सुताम्--कन्या; रेणुकाम्--रेणुका को; बै--निस्सन्देह;जमदग्नि:--सत्यवती-पुत्र जमदग्नि ने; उवाह--विवाह कर लिया; याम्ू--जिससे; तस्याम्--रेणुका के गर्भ से; वै--निस्सन्देह;भार्गव-ऋषे: --जमदग्नि मुनि के वीर्य से; सुता:--कई पुत्र; बसुमत्-आदय: --वसुमान इत्यादि; यवीयान्ू--सबसे छोटा; जन्ने --उत्पन्नहुआ; एतेषाम्--उनमें से; राम: --परशुराम; इति--इस प्रकार; अभिविश्रुतः--विश्वविख्यात |
बाद में सत्यवती समस्त संसार को पवित्र करने वाली कौशिकी नामक पुण्य नदी बन गई और उसके पुत्र जमदग्नि ने रेणु की पुत्री रेणुका से विवाह किया।
जमदग्नि के वीर्य से रेणुका की कुक्षिसे वसुमान इत्यादि कई पुत्र हुए जिनमें से राम या परशुराम सबसे छोटा था।
यमाहुर्वासुदेवांशं हैहयानां कुलान्तकम् ।
त्रिःसप्तकृत्वो य इमां चक्रे निःक्षत्रियां महीम् ॥
१४॥
यम्--जिसको; आहुः--सारे विद्वान कहते हैं; वासुदेव-अंशम्-- भगवान् वासुदेव का अवतार; हैहयानाम्-हैहयों के; कुल-अन्तकम्--कुल का विनाशकर्ता; त्रि:-सप्त-कृत्व:--इक्कीस बार; यः--जिसने ( परशुराम ); इमाम्--इस; चक्रे --बनाया;निःक्षत्रियाम्--क्षत्रियविहीन; महीम्--पृथ्वी को |
विद्वान लोग इस परशुराम को भगवान् वासुदेव का विख्यात अवतार मानते हैं जिसने कार्तवीर्यके वंश का विनाश किया।
परशुराम ने पृथ्वी के सभी क्षत्रियों का इक्कीस बार वध किया।
हप्तं क्षत्रं भुवो भारमब्रह्मण्यमनीनशत् ।
रजस्तमोवृतमहन्फल्गुन्यपि कृतेडहसि ॥
१५॥
हप्तम्-- अत्यन्त गर्वित; क्षत्रमू--श्षत्रियों को; भुवः--पृथ्वी के; भारम्-- भार को; अब्नह्मण्यम्--पापी, ब्राह्मणों के बनाये धार्मिकनियमों की परवाह न करने वाले; अनीनशत्--निकाल दिया या विनष्ट कर दिया; रज:-तम:--रजो तथा तमो गुणों से; वृतमू--ढकेहुए; अहन्ू--मार डाला; फल्गुनि--बहुत बड़े नहीं; अपि--यद्यपि; कृते--किया गया; अंहसि--अपराध |
जब राजवंश रजो तथा तमो गुणों के कारण अत्यधिक गर्वित होकर अधार्मिक बन गया औरब्राह्मणों द्वारा बनाये गये नियमों की परवाह न करने लगा तो परशुराम ने उन सबको मार डाला।
यद्यपि उनके अपराध बहुत बड़े न थे, किन्तु धरती का भार कम करने के लिए उन्होंने उन्हें मारडाला।
श्रीराजोबवाचकि तदंहो भगवतो राजन्यैरजितात्मभि: ।
कृतं येन कुल नष्ट क्षत्रियाणामभीक्ष्णश: ॥
१६॥
श्री-राजा उवाच--महाराज परीक्षित ने पूछा; किम्ू--क्या; तत् अंह:--वह अपराध; भगवतः --भगवान् के प्रति; राजन्यै:--राजपरिवार द्वारा; अजित-आत्मभि:--जो अपनी इन्द्रियों को वश में न कर सकने के कारण पतित हो गये; कृतम्--किया गया; येन--जिससे; कुलमू--कुल; नष्टम्--नष्ट हो गया; क्षत्रियाणाम्--राजवंश का; अभीक्षणश:--पुनः पुनः |
राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा: अपनी इन्द्रियों को वश में न रख सकने वालेराजाओं का वह कौन सा अपराध था जिसके कारण भगवान् के अवतार परशुराम ने क्षत्रियवंश काबारम्बार विनाश किया ?
श्रीबादरायणिरुवाचहैहयानामधिपतिरर्जुन: क्षत्रियर्षभ: ।
दत्तं नारायणांशांशमाराध्य परिकर्मभि: ॥
१७॥
बाहून्दशशतं लेभे दुर्धर्षत्वमरातिषु ।
अव्याहतेन्द्रियौज: श्रीतेजोवीर्ययशोबलम् ॥
१८ ॥
योगेश्वरत्वमैश्वर्य गुणा यत्राणिमादयः ।
चचाराव्याहतगतिलेकिषु पवनो यथा ॥
१९॥
श्री-बादरायणि: उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया; हैहयानाम् अधिपति:--हैहयों का राजा; अर्जुन: --कार्तवीर्यार्जुन;क्षत्रिय-ऋषभ: --क्षत्रियों में सर्वश्रेष्ठ; दत्तम्--दत्तात्रेय को; नारायण-अंश-अंशम्--नारायण के अंशांश को; आराध्य--पूजा करके;परिकर्मभि: --विधि-विधान के अनुसार पूजा द्वारा; बाहूनू--बाँहें; दश-शतम्--एक हजार ( दस सौ ); लेभे--प्राप्त कीं;दुर्धर्षत्वम्--कठिनाई से जीते जाने का गुण; अरातिषु--शत्रुओं के मध्य; अव्याहत--अपराजेय; इन्द्रिय-ओज:--इन्द्रियों की शक्ति;श्री--सौन्दर्य; तेज:--प्रताप प्रभाव; वीर्य--शक्ति; यशः--यश; बलमू्--शारीरिक बल; योग-ईश्वरत्वम्--योगशक्ति के द्वारा अर्जितईश्वरत्व; ऐश्वर्यम्--ऐश्वर्य; गुणा:--गुण; यत्र--जहाँ; अणिमा-आदय:--आठ सिद्ध्रियाँ ( अणिमा, लधिमा इत्यादि ) ); चचार--गया; अव्याहत-गति:ः--जिसकी प्रगति न थकने वाली थी; लोकेषु--सारे विश्व में; पवन: --वायु; यथा--के समान।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : क्षत्रियश्रेष्ठ हैहयराज कार्तवीर्यार्जुन ने भगवान् नारायण के स्वांशदत्तात्रेय की पूजा करके एक हजार भुजाएँ प्राप्त कीं।
वह शत्रुओं द्वारा अपराजेय बन गया और उसेअव्याहत इन्द्रिय शक्ति, सौन्दर्य, प्रभाव, बल, यश तथा अणिमा, लघिमा जैसी आठ योग सिद्धियाँप्राप्त करने की योग शक्ति मिल गई।
इस तरह पूर्ण ऐश्वर्यशशाली बनकर वह सारे संसार में वायु कीतरह बेजोड़ बनकर घूमने लगा।
स्त्रीरत्नैरावृतः क्रीडत्रेवाम्भसि मदोत्कट: ।
वैजयन्तीं स्त्रजं बिभ्रद्ररोध सरितं भुजै: ॥
२०॥
स्त्री-रत्नैः--सुन्दर स्त्रियों द्वारा; आवृतः--घिरा हुआ; क्रीडन्-- भोगरत; रेवा-अम्भसि--रेवा या नर्मदा नदी के जल में; मद-उत्कट:--ऐश्वर्य से अत्यन्त गर्वित होकर; बैजयन्तीम् सत्रजमू--विजय की माला से; बिभ्रत्ू--सुशोभित; रुरोध-- प्रवाह को रोक दिया;सरितम्--नदी के; भुजैः--अपनी भुजाओं से |
एक बार नर्मदा नदी के जल में क्रीड़ा करते हुए सुन्दरी स्त्रियों से घिरे एवं विजय की मालाधारण किये हुए गर्वोन्नत कार्तवीर्यार्जुन ने अपनी बाँहों से जल के प्रवाह को रोक दिया।
विप्लावितं स्वशिबिरं प्रतिसत्रोत:सरिज्जलै: ।
नामृष्यत्तस्य तद्वीर्य वीरमानी दशानन: ॥
२१॥
विप्लावितम्--जलमग्न करके; स्व-शिबिरम्--अपने ही खेमे को; प्रतिस्त्रोत:--विपरीत दिशा में बहने वाले; सरित्-जलैः--नदी केजल से; न--नहीं; अमृष्यत्--सहन कर सका; तस्य--कार्तवीर्यार्जुन का; तत् वीर्यमू--वह प्रभाव; वीरमानी --अपने को वीर माननेवाला; दश-आनन:ः--दस शिरों वाला रावण
चूँकि कार्तवीर्यार्जुन ने जलप्रवाह की दिशा पलट दी थी अतः नर्मदा नदी के तट पर महिष्मतीनगर के निकट रावण का लगा खेमा जलमग्न हो गया।
यह दससिरों वाले रावण के लिए असहाय होउठा क्योंकि वह अपने को महान् वीर मानता था और वह कार्तवीर्यार्जुन के बल को सहन नहीं करसका।
गृहीतो लीलया स्त्रीणां समक्ष कृतकिल्बिष: ।
माहिष्मत्यां सन्निरुद्धो मुक्तो येन कपिर्यथा ॥
२२॥
गृहीत:--बलपूर्वक बन्दी बनाया गया; लीलया--आसानी से; स्त्रीणाम्--स्त्रियों की; समक्षम्--उपस्थिति में; कृत-किल्बिष: --अपराधी होने के कारण; माहिष्मत्याम्ू--माहिष्मती नामक नगर में; सन्निरुद्ध:--बन्दी बनाया गया; मुक्त:--छोड़ा गया; येन--जिसके( कार्तवीर्यार्जुन के ) द्वारा; कपि: यथा--जिस प्रकार बन्दर छोड़ दिया जाय।
जब रावण ने स्त्रियों के समक्ष कार्तवीर्यार्जुन का अपमान करना चाहा और उसे नाराज कर दियातो उसने रावण को खेल-खेल में उसी प्रकार बन्दी बनाकर माहिष्मती नगर के कारागार में डालदिया जिस प्रकार कोई बन्दर को पकड़ ले।
बाद में उसने परवाह किए बिना उसे मुक्त कर दिया।
स एकदा तु मृगयां विचरन्विजने वने ।
यहच्छया श्रमपदं जमदग्नेरुपाविशत् ॥
२३॥
सः--वह, कार्तवीर्यार्जुन; एकदा--एक बार; तु--लेकिन; मृगयाम्--शिकार करते हुए; विचरन्--घूमते हुए; विजने--एकान्त;वबने--वन में; यहच्छया--किसी कार्यक्रम के बिना; आश्रम-पदम्--रिहायशी स्थान में; जमदग्ने:--जमदग्नि मुनि के; उपाविशत्--घुस गया।
एक बार जब कार्तवीर्यार्जुन बिना किसी कार्यक्रम के एकान्त जंगल में घूमकर शिकार कर रहाथा तो वह जमदग्नि के निवास के निकट पहुँचा।
तस्मै स नरदेवाय मुनिर्हणमाहरत् ।
ससैन्यामात्यवाहाय हविष्मत्या तपोधन: ॥
२४॥
तस्मै--उस; सः--उस ( जमदग्नि ); नरदेवाय--राजा कार्तवीर्यार्जुन को; मुनि:--मुनि ने; अहणम्--पूजा की सामग्री; आहरतू--प्रदान की; स-सैन्च--सेना समेत उसको; अमात्य--उसके मंत्रियों को; वाहाय--तथा रथों, हाथियों, घोड़ों या पालकी वाहकों को;हविष्मत्या--कामधेनु रखने के कारण; तपः-धन:ः--मुनि, जिसकी तपस्या ही उसका धन था, अथवा जो तपस्या में लगा था|
जंगल में कठिन तपस्या में रत ऋषि जमदग्नि ने सैनिकों, मंत्रियों तथा पालकी वाहकों समेत राजा का अच्छी तरह स्वागत किया।
उन्होंने इन अतिथियों को पूजा करने की सारी सामग्री जुटाईक्योंकि उनके पास कामधेनु गाय थी जो हर वस्तु प्रदान करने में सक्षम थी।
सबै रल॑ तु तहूष्ठा आत्मैश्वर्यातिशायनम् ।
तन्नाद्रियताग्निहोत््यां साभिलाष: सहैहय: ॥
२५॥
सः--वह ( कार्तवीर्यार्जुन ); वै--निस्सन्देह; रलम्--सम्पत्ति के स्त्रोत को; तु--निस्सन्देह; तत्--जमदग्नि की कामधेनु; हृध्ठा--देखकर; आत्म-ऐश्वर्य--निजी ऐश्वर्य; अति-शायनम्--अतिशय; तत्--वह; न--नहीं; आद्रियत--अत्यधिक प्रशंसा की;अग्निहोत्रयामू--उस गाय में जो अग्निहोत्र यज्ञ करने के लिए अत्यन्त लाभदायक थी; स-अभिलाष:--इच्छुक; स-हैहयः--हैहयवंशी,अपने व्यक्तियों सहित।
कार्तवीर्यार्जुन ने सोचा कि जमदग्नि उसकी तुलना में अधिक शक्तिशाली एवं सम्पन्न है क्योंकिउसके पास कामधेनु रूपी रल है अतएवं उसने तथा उसके हैहयजनों ने जमदग्नि के सत्कार कीअधिक प्रशंसा नहीं की।
उल्टे, वे उस कामधेनु को लेना चाहते थे जो अग्निहोत्र यज्ञ के लिएलाभदायक थी।
हविर्धानीमृषेर्दर्पान्नरान्हर्तुमचोदयत् ।
ते च माहिष्मतीं निन्युः सवत्सां क्रन्दतीं बलात् ॥
२६॥
हृविः-धानीम्ू--कामधेनु को; ऋषे: --ऋषि जमदग्नि की; दर्पात्ू-- भौतिक शक्ति से गर्वित होने से; नरान्ू--अपने सारे आदमियों( सैनिकों ) को; हर्तुम्--चुरा या ले जाने के लिए; अचोदयत्--प्रोत्साहित किया; ते--वे; च-- भी; माहिष्मतीम्-कार्तवीर्यार्जुन कीराजधानी में; निन्यु:ः--ले आये; स-वत्साम्ू--उसके बछड़े समेत; क्रन्दतीम्-रोती हुई को; बलात्ू--बलपूर्वक, जबरन |
भौतिक शक्ति से गर्वित कार्तवीर्यार्जुन ने अपने व्यक्तियों को जमदग्नि की कामधेनु चुरा लेने केलिए प्रेरित किया।
फलतः वे व्यक्ति रोती-विलपती कामधेनु को उसके बछड़े समेत बलपूर्वक कार्तवीर्यार्जुन की राजधानी माहिष्मती ले आये।
अथ राजनि निर्याते राम आश्रम आगत: ।
श्र॒त्वा तत्तस्य दौरात्म्यं चुक्रोधाहिरिवाहत: ॥
२७॥
अथ--त्पश्चात्; राजनि--राजा के; निर्याते--चले जाने पर; राम:--जमदग्नि का सबसे छोटा पुत्र परशुराम; आश्रमे--आ श्रम में;आगतः--वापस आया श्रुत्वा--सुनकर; तत्--जो; तस्य--कार्त वीर्यार्जुन का; दौरात्म्यम्-दुष्कर्म; चुक्रोध--अत्यन्त क्रुद्ध हुआ;अहिः--साँप; इब--सहृश; आहतः--कुचले जाने पर या चोट खाने पर
जब कामधेनु सहित कार्तवीर्यार्जुन चला गया तो जमदग्नि का सबसे छोटा पुत्र परशुराम आश्रममें लौटा।
जब उसने कार्तवीर्यार्जुन के दुष्कर्म के विषय में सुना तो वह कुचले हुए साँप की तरह क्रुद्धहो उठा।
घोरमादाय परशुं सतूणं वर्म कार्मुकम् ।
अन्वधावत दुर्मर्षो मृगेन्द्र इव यूथपम् ॥
२८॥
घोरम्--अत्यन्त भयानक; आदाय--हाथ में लेकर; परशुम्--फरसा; स-तृणम्--तूणीर सहित; वर्म--ढाल; कार्मुकम्-- धनुष;अन्वधावत--पीछा किया; दुर्मर्ष: --अत्यधिक क्रोध में भरे परशुराम ने; मृगेन्द्रः--सिंह; इब--सहृश; यूथपम्--हाथी पर ( आक्रमणकरने के लिए )
अपना भयानक फरसा, ढाल, धनुष तथा तरकस लेकर अत्यधिक क्रुद्ध परशुराम नेकार्तवीर्यार्जुन का पीछा किया जिस तरह सिंह हाथी का पीछा करता है।
तमापतन्तं भूगुवर्यमोजसाधनुर्धरं बाणपरश्रधायुधम् ।
ऐणेयचर्माम्बरमर्क धामभि-युत॑ जटाभिर्ददृशे पुरीं विशन् ॥
२९॥
तम्--उस; आपतन्तम्-पीछा करते; भृगु-वर्यम्--भूगुवंशी भगवान् परशुराम को; ओजसा--अत्यन्त दारुण; धनुः-धरम्-- धनुषधारण किये; बाण--बाण; परश्रध--फरसा; आयुधम्--इन सारे हथियारों को; ऐणेय-चर्म--श्याम हिरन की खाल; अम्बरम्--अपने शरीर को ढके; अर्क-धामभि: --सूर्य प्रकाश की भाँति प्रकट होकर; युतम् जटाभि:--जटाओं से युक्त; ददशे -- उसने देखा;पुरीम्--राजधानी में; विशन्--प्रवेश करते हुए।
अभी राजा कार्तवीर्यार्जुन अपनी राजधानी माहिष्मती पुरी में प्रवेश कर ही रहा था कि उसनेभूगुवंशियों में श्रेष्ठ भगवान् परशुराम को फरसा, ढाल, धनुष तथा बाण लिए अपना पीछा करतेदेखा।
परशुरामजी ने काले हिरन की खाल पहन रखी थी और उनका जटाजूट सूर्य के तेज जैसाप्रतीत हो रहा था।
अचोदयद्धस्तिरथा श्रपत्तिभि-गंदासिबाणए्टिशतघध्निशक्तिभि: ।
अक्षौहिणी: सप्तदशातिभीषणा-सता राम एको भगवानसूदयत् ॥
३०॥
अचोदयत्--लड़ने के लिए भेजा; हस्ति--हाथी; रथ--रथ; अश्व--घोड़े; पत्तिभि:--पैदल सेना समेत; गदा--गदा; असि--तलवार;बाण--बाण; ऋष्टि--ऋष्टि नामक औजार; शतध्नि--शतध्नि नामक हथियार; शक्तिभि:--तथा शक्ति नामक हथियार से;अक्षौहिणी:--अक्षौहिणी; सप्त-दश--सत्रह; अति-भीषणा: --अत्यन्त भयानक; ताः:--उन सबों को; राम:--परशुराम ने; एक:--अकेले; भगवान्-- भगवान्; असूदयत्--मार डाला
परशुराम को देखते ही कार्तवीर्यार्जुन डर गया और उसने तुरन्त ही उनसे युद्ध करने के लिए अनेक हाथी, रथ, घोड़े तथा पैदल सैनिक भेजे जो गदा, तलवार, बाण, ऋष्टि, शतघध्नि, शक्तिइत्यादि विविध हथियारों से युक्त थे।
उसने परशुराम को रोकने के लिए पूरे सत्रह अक्षौहिणी सैनिकभेजे, किन्तु भगवान् परशुराम ने अकेले ही सबों का सफाया कर दिया।
यतो यतोसौ प्रहरत्परश्रधोमनोनिलौजा: परचक्रसूदन: ।
ततस्ततश्छिन्नभुजोरुकन्धरानिपेतुरुर्व्या हतसूतवाहना: ॥
३१॥
यतः--जहाँ; यतः--जहाँ; असौ-- भगवान् परशुराम; प्रहरत्-- प्रहार करते हुए; परश्रध:--परशु नामक हथियार चलाने में निपुण;मनः--मन की तरह; अनिल--वायु की तरह; ओजा:--शक्तिशाली; पर-चक्र--शत्रु की सैन्य शक्ति का; सूदन:--वध करने वाला;ततः--वहाँ; ततः--वहाँ; छिन्न--कटकर तितर-बितर; भुज--बाहें; ऊरू--पाँव; कन्धरा:--धड़; निपेतु:--गिर पड़े; उर्व्याम्--पृथ्वीपर; हत--मारे हुए; सूत--सारथी; वाहना:--घोड़े तथा हाथी की सवारियाँ।
शत्रु की सेना को मारने में कुशल भगवान् परशुराम ने मन तथा वायु की गति से काम करते हुएअपने फरसे से शत्रुओं के टुकड़े कर दिये।
वे जहाँ-जहाँ गये सारे शत्रु खेत होते रहे, उनके पाँव, हाथतथा धड़ अलग-अलग हो गये, उनके सारथी मार डाले गये और उनके वाहन, हाथी तथा घोड़े सभीविनष्ट कर दिये गये।
इृष्ठा स्वसैन्यं रुधिरौघकर्दमेरणाजिरे रामकुठारसायकै: ।
विवृक्णवर्मध्वजचापविग्रहं निपातितं हैहय आपतद्गुषा ॥
३२॥
इहृष्ठा--देखकर; स्व-सैन्यम्-- अपने सैनिकों को; रुधिर-ओघ-कर्दमे--रक्त बहने से गँदले हुए; रण-अजिरे--युद्धभूमि में; राम-कुठार-- भगवान् परशुराम के फरसे से; सायकै:--बाणों से; विवृकण--तितर-बितर; वर्म--ढाल; ध्वज-- ध्वजा; चाप-- धनुष;विग्रहम्ू--शरीर; निपातितम्--गिरे हुए; हैहबः--कार्तवीर्यार्जुन; आपतत्--तेजी से वहाँ आया; रुषा--क्रोध से |
अपने फरसे तथा बाणों को व्यवस्थित करके परशुराम ने कार्तवीर्यार्जुन के सिपाहियों की ढालों,उनके झंडों, धनुषों तथा उनके शरीरों के टुकड़े-टुकड़े कर डाले जो युद्धभूमि में गिर गये औरजिनके रक्त से भूमि पंकिल हो गई।
अपनी पराजय होते देखकर अत्यन्त क्रुद्ध होकर कार्तवीर्यार्जुनयुद्धभूमि की ओर लपका।
अथार्जुन: पञ्नशतेषु बाहुभिर्धनु:घु बाणान्युगपत्स सन्दधे ।
रामाय रामोस्त्रभृतां समग्रणी-स्तान्येकधन्वेषुभिराच्छिनत्समम् ॥
३३॥
अथ--तत्पश्वात्; अर्जुन:--कार्त वीर्यार्जुन; पञ्ञ-शतेषु-- पाँच सौ; बाहुभि:--अपनी बाहुओं से; धनु:षु-- धनुषों पर; बाणानू--बाणोंको; युगपत्--एकसाथ; सः--उसने; सन्दधे--स्थिर किया; रामाय--परशुराम को मारने के लिए; राम:--परशुराम ने; अस्त्र-भृताम्--अस्त्र प्रयोग करने वाले सारे सैनिकों में से; समग्रणी:--सर्व प्रमुख; तानि--कार्तवीर्यार्जुन के सारे बाण; एक-धन्वा--एकधनुषधारी; इषुभि:--बाणों से; आच्छिनत्--टुकड़े कर डाले; समम्--के साथ।
तब कार्तवीर्यार्जुन ने परशुराम को मारने के लिए एक हजार भुजाओं में एकसाथ पाँच सौ धनुषोंपर बाण चढ़ा लिए।
किन्तु श्रेष्ठ लड़ाकू भगवान् परशुराम ने एक ही धनुष से इतने बाण छोड़े किकार्तवीर्यार्जुन के हाथों के सारे धनुष तथा बाण तुरन्त कटकर टुकड़े-टुकड़े हो गये।
पुनः स्वहस्तैरचलान्मृधेड्प्रिपा-नुत्क्षिप्प वेगादभिधावतो युधि ।
भुजान्कुठारेण कठोरनेमिनाचिच्छेद राम: प्रसभं त्वहेरिव ॥
३४॥
पुनः--फिर; स्व-हस्तैः-- अपने हाथों से; अचलानू--पर्वतों को; मृथे--युद्धभूमि में; अद्धध्रिपान्-- वृक्षों को; उत्क्षिप्प--उखाड़ कर;वेगात्--वेग से; अभिधावत:--तेजी से दौते हुए; युधि--युद्धभूमि में; भुजानू--सारी भुजाएँ; कुठारेण--अपने फरसे से; कठोर-नेमिना--अत्यन्त तीक्षण; चिच्छेद--काट डाला; राम: --परशुराम ने; प्रसभम्--अत्यन्त वेग से; तु--लेकिन; अहे: इब--सर्प के फनोंकी भाँति
जब कार्तवीर्यार्जुन के बाण छिन्न-भिन्न हो गये तो उसने अपने हाथों से अनेक वृक्ष तथा पर्वतउखाड़ लिये और वह फिर से परशुरामजी को मारने के लिए उनकी ओर तेजी से दौ।
किन्तु परशुरामने अपने फरसे से अत्यन्त वेग से कार्तवीर्यार्जुन की भुजाएँ काट लीं जिस तरह कोई सर्प के फनों कोकाट ले।
कृत्तबाहोः शिरस्तस्य गिरे: श्रृद्रमिवाहरत् ।
हते पितरि तत्पुत्रा अयुतं दुद्गुवर्भभात् ॥
३५॥
अग्निहोत्रीमुपावर्त्य सवत्सां परवीरहा ।
समुपेत्या श्रमं पित्रे परिक्लिष्टां समर्पयत् ॥
३६॥
कृत्त-बाहो:--बाँह कटे कार्तवीर्यार्जुन का; शिर:--शिर; तस्य--उसका; गिरे:--पर्वत की; श्रूड़मू--चोटी; इब--सहृश; आहरत्--( परशुराम ने ) उसके शरीर से काट लिया; हते पितरि--अपने पिता के मारे जाने पर; ततू-पुत्रा:--उसके पुत्र; अयुतम्--दस हजार;दुद्वुबु:-- भाग गये; भयात्-- डर के मारे; अग्निहोत्रीम्--कामधेनु को; उपावर्त्य--पास लाकर; स-वत्साम्--बछडे सहित; पर-वीर-हा--शत्रुओं के वीरों को मारने वाले परशुराम; समुपेत्य--लौटकर; आश्रमम्ू--अपने पिता के आवास में; पित्रे--पिता को;परिक्लिष्टाम्--अत्यधिक कष्ट पाई हुई; समर्पयत्--लाकर दे दिया
तत्पश्चात् परशुराम ने बाँह-कटे कार्तवीर्यार्जुन के सिर को पर्वतश्ग के समान काट लिया।
जबकार्तवीर्यार्जुन के दस हजार पुत्रों ने अपने पिता को मारा गया देखा तो वे सब डर के मारे भाग गये।
तब शत्रु का वध करके परशुराम ने कामधेनु को छुड़ाया, जिसे काफी कष्ट मिल चुका था और वेउसे बछड़े समेत अपने घर ले आये तथा उसे अपने पिता जमदग्नि को दे दिया।
स्वकर्म तत्कृतं राम: पित्रे भ्रातृभ्य एवच ।
वर्णयामास तच्छुत्वा जमदग्निभाषत ॥
३७॥
स्व-कर्म--अपना कार्य; तत्ू--वे सारे कर्म; कृतम्--जो किये जा चुके थे; राम:--परशुराम ने; पित्रे--अपने पिता से; भ्रातृभ्य:--अपने भाइयों से; एव च--तथा; वर्णयाम् आस--वर्णन किया; तत्--वह; श्रुत्वा--सुनकर; जमदग्नि:--परशुराम के पिता ने;अभाषत--इस प्रकार कहा
परशुराम ने कार्तवीर्यार्जुन के वध सम्बन्धी अपने कार्यकलापों का वर्णन अपने पिता तथाभाइयों से किया।
इन कार्यों को सुनकर जमदग्नि अपने पुत्र से इस प्रकार बोले।
राम राम महाबाहो भवान्पापमकारषीत् ।
अवधीन्नरदेवं यत्सर्वदेवमयं वृथा ॥
३८॥
राम राम-हे प्रिय पुत्र परशुराम; महाबाहो--हे महान् वीर; भवान्--तुमने; पापम्--पापपूर्ण कृत्य; अकारषीतू--किया है;अवधीतू--मार डाला है; नरदेवम्--राजा को; यत्--जो; सर्व-देव-मयम्--सारे देवताओं के मूर्तरूप; वृथा--व्यर्थ ही |
हे वीर, हे पुत्र परशुराम, तुमने व्यर्थ ही राजा को मार डाला है क्योंकि वह सारे देवताओं कामूर्तरूप माना जाता है।
इस प्रकार तुमने पाप किया है।
वबयं हि ब्राह्मणास्तात क्षमयाहणतां गता: ।
यया लोकगुरुदेंव: पारमेछ्यमगात्पदम् ॥
३९॥
वयम्--हम; हि--निस्सन्देह; ब्राह्मणा:--योग्य ब्राह्मण हैं; तात--हे पुत्र; क्षमया--क्षमा के गुण से; अहणताम्ू--पूजनीय होने का'पद; गताः--हमने प्राप्त किया है; यया--इस योग्यता से; लोक-गुरु:--इस ब्रह्माण्ड के गुरु; देव:--ब्रह्मा ने; पारमेष्ठयम्--इस संसारके भीतर परम पुरुष; अगातू--प्राप्त किया; पदम्--पद को
हे पुत्र, हम सभी ब्राह्मण हैं और अपनी क्षमाशीलता के कारण जनसामान्य के लिए पूज्य बने हुएहैं।
इस गुण के कारण ही इस ब्रह्माण्ड के परम गुरु ब्रह्माजी को उनका पद प्राप्त हुआ है।
क्षमया रोचते लक्ष्मीब्राह्मी सौरी यथा प्रभा ।
क्षमिणामाशु भगवांस्तुष्यते हरिरीश्वर: ॥
४०॥
क्षमया--केवल क्षमा के कारण; रोचते--रोचक बनता है; लक्ष्मी:--लक्ष्मी जी; ब्राह्मी--ब्राह्मणों के गुणों से; सौरी--सूर्यदेव;यथा--जिस तरह; प्रभा--प्रकाश; क्षमिणाम्--क्षमाशील ब्राह्मणों से; आशु--शीघ्र ही; भगवान्-- भगवान्; तुष्यते--प्रसन्न हो जातेहैं; हरिः--हरि; ईश्वर: --परम नियन्ता |
ब्राह्मणों का कर्तव्य है कि वे क्षमाशीलता के गुण का संवर्धन करें क्योंकि यह सूर्य के समानतेजवान है।
भगवान् हरि क्षमाशील व्यक्तियों से प्रसन्न होते हैं।
राज्ञो मूर्धाभिषिक्तस्य वधो ब्रह्मवधादगुरु: ।
तीर्थसंसेवया चांहो जह्मड्राच्युतचेतन: ॥
४१॥
राज्ञ:--राजा का; मूर्थ-अभिषिक्तस्थ--जो सम्राट के नाम से विख्यात है; वध:--वध, हत्या; ब्रह्म-बधात्--ब्राह्मण की हत्या कीअपेक्षा; गुरु:--अत्यन्त कठोर; तीर्थ-संसेवया--तीर्थस्थानों की पूजा करके; च-- भी; अंह:--पापकर्म; जहि--धो डालो; अड्ग--हेप्रिय पुत्र; अच्युत-चेतन:--पूर्णतया कृष्णभावनाभावित होकर।
हे प्रिय पुत्र, एक सप्राट का वध ब्राह्मण की हत्या से भी अधिक पापमय है।
किन्तु अब यदि तुमकृष्णभावनाभावित होकर तीर्थस्थानों की पूजा करो तो इस महापाप का प्रायश्चित हो सकता है।
