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अध्याय बारह: भगवान रामचन्द्र के पुत्र कुश का वंश

9.12श्रीशुक उबाचकुशस्य चातिथिस्तस्मान्निषधस्तत्सुतो नभः ।

पुण्डरीकोथ तत्पुत्र: क्षेमधन्वाभवत्तत: ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; कुशस्य-- भगवान्‌ रामचन्द्र के पुत्र कुश का; च--भी; अतिथि: --अतिथि; तस्मात्‌--उससे; निषध: --निषध; तत्‌-सुत:--उसका पुत्र; नभ:--नभ; पुण्डरीक:--पुण्डरीक; अथ--तत्पश्चात्‌; तत्‌ू-पुत्र:--उसका पुत्र;क्षेमधन्वा-- क्षेमधन्वा; अभवत्‌--हुआ; ततः--तत्पश्चात्‌

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : रामचन्द्र का पुत्र कुश हुआ, कुश का पुत्र अतिथि था, अतिथि कापुत्र निषध और निषध का पुत्र नभ था।

नभ का पुत्र पुण्डरीक हुआ जिसके पुत्र का नाम क्षेमधन्वा था।

देवानीकस्ततोनीहः पारियात्रोथ तत्सुत: ।

ततो बलस्थलस्तस्माद्दज्ञनाभोर्कसम्भव: ॥

२॥

देवानीक:--देवानीक; ततः--क्षेमधन्वा से; अनीह:--देवानीक के पुत्र का नाम अनीह था; पारियात्र:--पारियात्र; अथ--तत्पश्चात्‌;ततू-सुत:--अनीह का पुत्र; ततः--पारियात्र से; बलस्थल: --बलस्थल; तस्मात्‌--बलस्थल से; वज़नाभ: --वज्नाभ; अर्क-सम्भव:--सूर्यदेव से उत्पन्न

क्षेमधन्वा का पुत्र देवानीक था और देवानीक का पुत्र अनीह हुआ जिसके पुत्र का नाम पारियात्रथा।

पारियात्र का पुत्र बलस्थल था, जिसका पुत्र वज्ञनाभ हुआ जो सूर्यदेव के तेज से उत्पन्न बतलायाजाता है।

सगणस्तत्सुतस्तस्माद्विधृतिश्चाभवत्सुतः ।

ततो हिरण्यनाभो भूद्योगाचार्यस्तु जैमिने: ॥

३॥

शिष्यः कौशल्य आध्यात्मं याज्ञवल्क्यो ध्यगाद्यतः ।

योगं महोदयमृषिईदयग्रन्थिभेदकम्‌ ॥

४॥

सगण:--सगण; तत्‌-- उसका; सुतः --पुत्र; तस्मात्‌--उससे; विधृति:--विधृति; च-- भी; अभवत्‌--उत्पन्न हुआ; सुतः--उसकापुत्र; ततः--उससे; हिरण्यनाभ:--हिरण्यना भ; अभूत्‌--हुआ; योग-आचार्य:--योग दर्शन का संस्थापक; तु--लेकिन; जैमिने: --जैमिनि को अपना गुरु मानने से; शिष्य:--शिष्य; कौशल्य:--कौशल्य; आध्यात्मम्‌-- आध्यात्मिक; याज्ञवल्क्य:--याज्ञवल्क्य ने;अध्यगात्‌-- अध्ययन किया; यत:--उससे ( हिरण्यनाभ से ); योगम्‌--योग की क्रियाएँ; महा-उदयम्‌--अत्यन्त महान; ऋषि:--याज्ञवल्क्थ ऋषि; हृदय-ग्रन्थि-भेदकम्‌--योग, जो भौतिक अनुरक्ति की हृदय की गाँठ को खोल सकती हैं।

वज़नाभ का पुत्र सगण हुआ और उसका पुत्र विधृति हुआ।

विधूति का पुत्र हिरण्यनाभ था जोजैमिनि का शिष्य और फिर योग का महान्‌ आचार्य बना।

इन्हीं हिरण्यनाभ से ऋषि याज्ञवल्क्य नेअध्यात्म योग नामक योग की अत्युच्च प्रणाली सीखी जो हृदय की भौतिक आसक्ति की गाँठ कोखोलने में समर्थ है।

पुष्पो हिरण्यनाभस्य श्लुवसन्धिस्ततोभवत्‌ ।

सुदर्शनोथाग्निवर्ण: शीघ्रस्तस्य मरु: सुत: ॥

५॥

पुष्प:--पुष्प; हिरण्यनाभस्य--हिरण्यनाभ का पुत्र; ध्रुवसन्धि:-- धुवसन्धि; ततः--उससे; अभवत्‌--उत्पन्न हुआ; सुदर्शन:--सुदर्शन;अथ--त्पश्चात्‌; अग्निवर्ण: --सुदर्शन का पुत्र अग्निवर्ण; शीघ्र: --शीघ्र; तस्थ-- उसका; मरूु:--मरू; सुतः--पुत्र |

हिरण्यनाभ के पुत्र का नाम पुष्य था जिससे श्रुवसन्धि नामक पुत्र हुआ।

श्रुवसन्धि का पुत्रसुदर्शन और उसका पुत्र अग्निवर्ण था।

अग्निवर्ण के पुत्र का नाम शीघ्र था और उसके पुत्र का नाममरु था।

सोसावास्ते योगसिद्धः कलापग्राममास्थितः ।

कलेरन्ते सूर्यवंशं नष्ट भावयिता पुनः ॥

६॥

सः--वह; असौ--मरु नामक व्यक्ति; आस्ते--अब भी है; योग-सिद्धः--योगशक्ति में सिद्ध्िप्राप्तः कलाप-ग्राममू--कलाप नामकगाँव में; आस्थित:--रह रहा है; कले:--इस कलियुग के; अन्ते--अन्त में; सूर्य-वंशम्‌--सूर्यदेव के वंशज; नष्टम्‌--नष्ट होने पर;भावयिता--पुत्र उत्पन्न करके शुरू करेगा; पुनः--फिर से |

योगशक्ति में सिद्धि प्राप्त करके मरू अब भी कलाप ग्राम नामक गाँव में रह रहा है।

वहकलियुग की समाप्ति पर पुत्र उत्पन्न करेगा जिससे विनष्ट सूर्यवंश पुनरुजजीवित होगा।

तस्मात्प्रसुश्रुतस्तस्य सन्धिस्तस्याप्यमर्षण: ।

महस्वांस्तत्सुतस्तस्माद्विश्रबाहुरजायत ॥

७॥

तस्मातू--मरु से; प्रसुश्रुतः--उसका पुत्र प्रसु श्रु।

तस्थय--उसका; सन्धि:--सन्धि नामक पुत्र; तस्य--उसका; अपि--भी;अमर्षण:--अमर्षण नामक पुत्र; महस्वान्‌--महस्वान; तत्‌--उसका; सुतः--पुत्र; तस्मात्‌ू--उससे ( महस्वान से ); विश्वबाहुः --विश्वबाहु; अजायत--उत्पन्न हुआ।

मरु से प्रसुश्रुत नामक पुत्र उत्पन्न हुआ जिससे सन्धि, फिर सन्धि से अमर्षण और अमर्षण सेमहस्वान नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।

महस्वान से विश्वबाहु का जन्म हुआ।

ततः प्रसेनजित्तस्मात्तक्षको भविता पुनः ।

ततो बृहद्बलो यस्तु पित्रा ते समरे हतः ॥

८॥

ततः--विश्वबाहु से; प्रसेनजित्‌--प्रसेनजित; तस्मात्‌--उससे; तक्षक:--तक्षक; भविता--जन्म लिया; पुन:ः--फिर; ततः--उससे;बृहद्वल: --बृहद्बल; यः--जो; तु--लेकिन; पित्रा--पिता के द्वारा; ते--तुम्हारे; समरे--युद्ध में; हतः--मारा गया।

विश्वबाहु से प्रसेनजित नामक पुत्र उत्पन्न हुआ जिससे तक्षक और तक्षक से बृहद्डल हुआ जोतुम्हारे पिता द्वारा युद्ध में मारा गया।

एते हीक्ष्वाकुभूपाला अतीता: श्रुण्वनागतान्‌ ।

बृहद्वलस्य भविता पुत्रो नाम्ना बृहद्रण: ॥

९॥

एते--ये सभी; हि--निस्सन्देह; इक््वाकु-भूपाला:--इक्ष्वाकु वंश के राजा; अतीताः--हो चुके हैं; श्रुणु--सुनो; अनागतान्‌--जोभविष्य में होंगे; बृहद्वलस्य--बृहद्बल का; भविता--होगा; पुत्र:--पुत्र; नाम्ना--नामक; बृहद्रण: --बूृहद्रण |

ये सारे राजा इक्ष्वाकु वंश में हो चुके हैं।

अब उन राजाओं के नाम सुनो जो भविष्य में होंगे।

बृहद्वल से बृहद्रण का जन्म होगा।

ऊरुक्रियः सुतस्तस्य वत्सवृद्धों भविष्यति ।

प्रतिव्योमस्ततो भानुर्दिवाको वाहिनीपति: ॥

१०॥

ऊरुक्रिय:--ऊरुक्रिय; सुत:--पुत्र; तस्थ--उसका; वत्सवृद्धः--वत्सवृद्ध; भविष्यति--होगा; प्रतिव्योम: --प्रतिव्योम; ततः--उससे;भानु:--भानु; दिवाक:-- भानु से दिवाक; वाहिनी-पतिः--सेनापतिबृहद्रण का पुत्र ऊरुक्रिय होगा जिसके वत्सवृद्ध नामक पुत्र उत्पन्न होगा।

वत्सवृद्ध के पुत्र कानाम प्रतिव्योम और उसके पुत्र का नाम भानु होगा जिससे महान्‌ सेनापति दिवाक नाम का पुत्र जन्मलेगा।

सहदेवस्ततो वीरो बृहदश्चोथ भानुमान्‌ ।

प्रतीकाश्वो भानुमतः सुप्रतीकोथ तत्सुत: ॥

११॥

सहदेव:--सहदेव; ततः--दिवाक से; वीर:--वीर पुरुष; बृहदश्च:--बृहदश्च; अथ--उससे; भानुमान्‌-- भानुमान ; प्रतीका श्र: --प्रतीका श्र; भानुमत:-- भानुमान से; सुप्रतीक:--सुप्रतीक; अथ--तत्पश्चात्‌; तत्‌-सुतः--प्रतीका श्व का पुत्र |

तत्पश्चात्‌ दिवाक का पुत्र सहदेव होगा और उसका पुत्र महान्‌ वीर बृहदाश्व होगा।

बृहदाश्व सेभानुमान होगा जिससे प्रतीकाश्च नाम का पुत्र होगा।

प्रतीकाश्च का पुत्र सुप्रतीक होगा।

भविता मरुदेवोथ सुनक्षत्रोथ पुष्कर: ।

तस्यान्तरिक्षस्तत्पुत्र: सुतपास्तदमित्रजित्‌ ॥

१२॥

भविता--उत्पन्न होगा; मरुदेव: --मरुदेव; अथ--तत्पश्चात्‌; सुनक्षत्र:--सुनक्षत्र; अथ--तत्पश्चात्‌; पुष्कर: -- पुष्कर; तस्य--पुष्करका; अन्तरिक्ष: --अन्तरिक्ष; ततू-पुत्र:--उसका पुत्र; सुतपा:--सुतपा; तत्‌--उससे; अमित्रजित्‌ू--अमित्रजित |

तत्पश्चात्‌ सुप्रतीक से मरुदेव, मरुदेव से सुनक्षत्र, सुनक्षत्र से पुष्कर और पुष्कर से अन्तरिक्ष होगाजिसका पुत्र सुतपा होगा।

सुतपा का पुत्र अमित्रजित होगा।

बृहद्वराजस्तु तस्यापि बर्हिस्तस्मात्कृतझ्जय: ।

रणअ्जयस्तस्य सुतः सञ्जयो भविता ततः ॥

१३॥

बृहद्राज:--बृहद्राज; तु--लेकिन; तस्य अपि--अमित्रजित का; बर्हि:--बर्हि; तस्मात्‌--ब्हि से; कृतञ्लय: --कृतञ्ञय; रणझ्जय:--रणज्जय; तस्य--कृतञ्जय का; सुत:--पुत्र; सञ्लयः--सझ्जय; भविता--होगा; तत:--रणझ्जय से |

अमित्रजित से बृहद्राज होगा, बृहद्राज से बरह्हिं, बहहिं से कृतझ्लय, कृतज्ञय से रणज्लय और रणझ्जयसे सझ्जय नामक पुत्र उत्पन्न होगा।

तस्माच्छाक्योथ शुद्धोदो लाडूलस्तत्सुतः स्मृतः ।

ततः प्रसेनजित्तस्मात्क्षुद्रको भविता ततः ॥

१४॥

तस्मातू--सझ्ञय से; शाक्य:--शाक्य; अथ-तत्पश्चात्‌; शुद्धोद:ः--शुद्धोद; लाड़ल:--लांगल; तत्‌-सुतः--शुद्धोद का पुत्र; स्मृत:--सुप्रसिद्ध; ततः--उससे; प्रसेनजित्‌--प्रसेनजित; तस्मात्‌--उससे; क्षुद्रक: --शक्षुद्रक; भविता--जन्म लेगा; ततः--तत्पश्चात्‌सञ्जय से शाक्यशाक्य से शुद्धोद, शुद्धोद से लांगल और लांगल से प्रसेनजित तथा प्रसेनजितसे क्षुद्रक उत्पन्न होगा।

रणको भविता तस्मात्सुरथस्तनयस्ततः ।

सुमित्रो नाम निष्ठान्त एते बाईद्वलान्वया: ॥

१५॥

रणक:--रणक; भविता--होगा; तस्मात्‌--क्षुद्रक से; सुरथ: --सुरथ; तनय:--पुत्र; तत:--तत्पश्चात्‌; सुमित्र: --सुमित्र; नाम--नामक; निष्ठ-अन्त:ः--वंश के अन्त में; एते--उपर्युक्त सारे राजा; बाईद्वल-अन्वया:--राजा बृहद्वल के वंश में ॥

क्षुद्रक का पुत्र रणक, रणक का सुरथ, सुरथ का पुत्र सुमित्र होगा और इस तरह वंश का अन्तहो जायेगा।

यह बृहद्वल के वंश का वर्णन है।

इश्ष्वाकृूणामयं वंश: सुमित्रान्तो भविष्यति ।

यतस्तं प्राप्य राजानं संस्थां प्राप्स्यति वै कलौ ॥

१६॥

इक्ष्वाकूणाम्‌--राजा इश्व्वाकु के वंश का; अयम्‌--यह; वंश:--वंशज; सुमित्र-अन्त:--सुमित्र इस वंश के अन्तिम राजा के रूप में;भविष्यति--होगा, कलियुग में ही; यत:--क्योंकि; तम्‌--उसको; प्राप्प--पाकर; राजानम्‌--उस वंश के राजा के रूप में; संस्थाम्‌--अन्त; प्राप्स्थति--प्राप्त होगा; बै--निस्सन्देह; कलौ--कलियुग के अन्त में |

इक्ष्वाकु वंश का अन्तिम राजा सुमित्र होगा; उसके बाद सूर्यदेव के वंश में और कोई पुत्र न होगाऔर इस वंश का अन्त हो जायेगा।

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