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अध्याय ग्यारह: भगवान रामचन्द्र विश्व पर शासन करते हैं
9.11श्रीशुक उबाचभगवानात्मनात्मानं राम उत्तमकल्पकैः ।
सर्वदेवमयंदेवमीजेथाचार्यवान्मखै: ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; भगवान्-- भगवान्; आत्मना--अपने आप; आत्मानम्-- स्वयं को; राम:--रामचन्द्र; उत्तम-कल्पकै: --अत्यन्त श्रेष्ठ साज-सामान से; सर्व-देव-मयम्--सारे देवताओं के आत्मा स्वरूप; देवम्-- भगवान् ने स्वयंकी; ईजे--पूजा की; अथ--इस प्रकार; आचार्यवान्--आचार्यो के मार्गदर्शन में; मखै:ः--यज्ञों को सम्पन्न करके |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : तत्पश्चात् भगवान् रामचन्द्र ने एक आचार्य स्वीकार करके श्रेष्ठ साजसमान सहित बड़ी धूमधाम से यज्ञ सम्पन्न किये।
इस तरह उन्होंने स्वयं ही अपनी पूजा की क्योंकि वेसभी देवताओं के परमेश्वर हैं।
होत्रेडददाहिएं प्राची ब्रह्मणे दक्षिणां प्रभु: ।
अध्वर्यवे प्रतीचीं वा उत्तरां सामगाय सः ॥
२॥
होत्रे--आहुति डालने वाले, होता पुरोहित को; अददात्--दे डाला; दिशम्--दिशा; प्राचीम्--समस्त पूर्व दिशा; ब्रह्मणे --ब्रह्मापुरोहित को, जो यज्ञशाला में होने वाले कृत्यों का निरीक्षण करता है; दक्षिणाम्ू--दक्षिण दिशा; प्रभुः-- भगवान् रामचन्द्र ने;अध्वर्यवे--अध्वर्यु पुरोहित को; प्रतीचीम्--पश्चिम दिशा; वा--भी; उत्तराम्--उत्तर दिशा; साम-गाय--उदगाता पुरोहित को जोसामवेद का गान करता है; सः--उन्होंने ( रामचन्द्र ने )।
भगवान् रामचन्द्र ने होता पुरोहित को सम्पूर्ण पूर्व दिशा, ब्रह्मा पुरोहित को सम्पूर्ण दक्षिण दिशा,अध्वर्यु पुरोहित को पश्चिम दिशा और सामवेद के गायक उद्गाता पुरोहित को उत्तर दिशा दे दी।
इसप्रकार उन्होंने अपना सारा साम्राज्य दे डाला।
आचार्याय ददौ शेषां यावती भूस्तदन्तरा ।
मन्यमान इदं कृत्स्नं ब्राह्मणोहईति निःस्पृह: ॥
३॥
आचार्याय--आचार्य या गुरु को; ददौ--दे डाला; शेषाम्--शेष बची हुई; यावती--जो भी; भू:--पृथ्वी; तत्-अन्तरा--चारोंदिशाओं के बीच में स्थित; मन्यमान:--सोचते हुए; इृदम्--यह सब; कृत्स्नम्--पूर्णतया; ब्राह्मण: --ब्राह्मणजन; अर्हति--पाने केयोग्य हैं; निःस्पृहः--इच्छा न रखने वाले।
तत्पश्चात् यह सोचकर कि ब्राह्मण लोग निष्काम होते हैं अतएव उन्हें ही सारे जगत का स्वामीहोना चाहिए, भगवान् रामचन्द्र ने पूर्व, पश्चिम, उत्तर तथा दक्षिण के बीच की भूमि आचार्य को देदी।
इत्ययं तदलड्डारवासोभ्यामवशेषित: ।
तथा राज्ञ्यपि वैदेही सौमड्ल्यावशेषिता ॥
४॥
इति--इस तरह से ( ब्राह्मणों को सर्वस्व देने के बाद ); अयम्--भगवान् रामचन्द्र; तत्--उनके; अलझ्ढार-वासोभ्याम्--अपने निजीआशभूषणों तथा वबस्त्रों सहित; अवशेषित:--शेष; तथा-- और; राज्ञी--रानी ( सीतादेवी ); अपि-- भी; बैदेही--राजा विदेह की पुत्री;सौमड्ल्या--केवल नथुनी से युक्त; अवशेषिता--शेष रही ।
ब्राह्मणों को सर्वस्व दान देने के बाद भगवान् रामचन्द्र के पास केवल उनके निजी वस्त्र तथाआभूषण बचे रहे और इसी तरह रानी सीतादेवी के पास उनकी नथुनी के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं रहा।
ते तु ब्राह्मणदेवस्य वात्सल्यं वीक्ष्य संस्तुतम् ।
प्रीता: क्लिन्नधियस्तस्मै प्रत्यप्येदं बभाषिरे ॥
५॥
ते--वे होता, ब्रह्म तथा अन्य पुरोहित; तु--लेकिन; ब्राह्मण-देवस्य--ब्राह्मणों को अत्यन्त प्रेम करने वाले भगवान् रामचन्द्र का;वात्सल्यम्-पितृतुल्य स्नेह; वीक्ष्य--देखकर; संस्तुतम्--स्तुति की; प्रीता:--प्रसन्न होकर; क्लिन्न-धिय:--द्रवित हृदय वाले; तस्मै--उनको ( रामचन्द्रजी को ); प्रत्यर्प््पय--लौटाते हुए; इृदम्--यह प्राप्त हुई सारी भूमि; बभाषिरे--बोले।
यज्ञकार्य में संलग्न सारे ब्राह्मण भगवान् रामचन्द्र से अत्यधिक प्रसन्न हुए क्योंकि वे ब्राह्मणों केप्रति अत्यन्त वत्सल एवं अनुकूल थे।
अतः उन्होंने द्रवित होकर दान में प्राप्त सारी सम्पत्ति उन्हें लौटादी और इस प्रकार बोले।
अप्रत्तं नस्त्वया कि नु भगवन्भुवनेश्वर ।
यन्नोउन्तईदयं विश्य तमो हंसि स्वरोचिषा ॥
६॥
अप्रत्तमू--न दी हुईं; न:--हमको; त्वया--आपके द्वारा; किमू-- क्या; नु--निस्सन्देह; भगवन्--हे भगवान्; भुवन-ईश्वर--हे सम्पूर्णजगत के स्वामी; यत्--क्योंकि; न:ः--हमारा; अन्तः-हृदयम्--हृदय के भीतर; विश्य--प्रवेश कर; तम:--अज्ञान का अंधकार;हंसि--तुम नष्ट करते हो; स्व-रोचिषा--अपने तेज से |
हे प्रभु, आप सारे विश्व के स्वामी हैं।
आपने हमें क्या नहीं दिया है ?
आपने हमारे हृदयों में प्रवेशकरके अपने तेज से हमारे अज्ञान के अंधकार को दूर किया है।
यही सबसे बड़ा उपहार है।
हमेंभौतिक दान की आवश्यकता नहीं है।
नमो ब्रह्मण्यदेवाय रामायाकुण्ठमेधसे ।
उत्तमएलोकधुर्याय न्यस्तदण्डार्पिताड्घ्रये ॥
७॥
नमः--हम सादर नमस्कार करते हैं; ब्रह्मण्य-देवाय-- भगवान् को, जो ब्राह्मणों को अपना पूज्यदेव मानते हैं; रामाय-- भगवान्रामचन्द्र को; अकुण्ठ-मेधसे--जिनकी स्मृति तथा ज्ञान कभी चिन्ता से ग्रस्त नहीं होते; उत्तमश्लोक-दधुर्याय--सुप्रसिद्ध व्यक्तियों मेंसर्वश्रेष्ठ; न्यस्त-दण्ड-अर्पित-अड्घ्रये--जिनके चरणकमलों की पूजा दण्ड के क्षेत्र से परे मुनियों द्वारा की जाती है।
हे प्रभु, आप भगवान् हैं और आपने ब्राह्मणों को अपना आराध्य देव स्वीकार किया है।
आपकाज्ञान तथा स्मृति कभी चिन्ताग्रस्त नहीं होते।
आप इस संसार के सभी विख्यात पुरुषों में प्रमुख हैं औरआपके चरणों की पूजा अठण्डनीय मुनियों द्वारा की जाती है।
हे भगवान् रामचन्द्र, हम आपको सादरनमस्कार करते हैं।
कदाचिल्लोकजिज्ञासुर्गूढो रात््यामलक्षितः ।
चरन्वाचोश्रुणोद्रामो भार्यामुद्ििश्य कस्यचित् ॥
८ ॥
कदाचित्--एक बार; लोक-जिज्ञासु:--जनता के विषय में जानने की इच्छा से; गूढ:--वेश बदल कर; रात्र्यामू--रात में ;अलक्षित:--किसी अन्य द्वारा पहचाने गये बिना; चरन्--घूमते हुए; वाच:--बोली; अश्रृणोत्--सुनी; राम:--रामचन्द्रजी ने;भार्यामू--अपनी पत्नी को; उद्दिश्य--इंगित करते हुए; कस्यचित्--किसी का ।
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : एक बार जब भगवान् रामचन्द्र रात्रि में किसी को बताये बिनावेश बदलकर छिपकर अपने विषय में लोगों का अभिमत जानने के लिए घूम रहे थे तो उन्होंने एकव्यक्ति को अपनी पत्नी सीतादेवी के विषय में अनुचित बातें कहते सुना।
नाहं बिभर्मि त्वां दुष्टामसतीं परवेश्मगाम् ।
स्त्रेणो हि बिभूयात्सीतां रामो नाहं भजे पुन: ॥
९॥
न--न तो; अहम्--मैं; बिभर्मि-- भार वहन कर सकता हूँ; त्वामू--तुम्हारा; दुष्टामू--दूषित होने के कारण; असतीम्--कुलटा; पर-वेश्म-गाम्ू--दूसरे पुरुष के घर में जाकर और परपति-गमन करके; स्त्रैण:--पतीभक्त, मेहरा; हि--निस्सन्देह; बिभूयात्--स्वीकारकर सकता है; सीताम्--सीता को; राम: --रामचन्द्र जैसा; न--न; अहम्--मैं; भजे--स्वीकार करूँगा; पुनः--दुबारा( वह व्यक्ति अपनी कुलटा पत्नी से कह रहा था ) तुम दूसरे व्यक्ति के घर जाती हो; अतएव तुमकुलटा तथा दूषित हो।
अब मैं और अधिक तुम्हारा भार नहीं वहन कर सकता।
भले ही रामचन्द्र जैसा स्त्रीभक्त पति सीता जैसी पत्नी को स्वीकार कर ले मैं उनकी तरह स्त्रीभक्त नहीं हूँ; अतएव मैंतुम्हें फिर से नहीं रख सकता।
इति लोकाद्वहुमुखादुराराध्यादसंविद: ।
पत्या भीतेन सा त्यक्ता प्राप्ता प्राचेतसा भ्रमम् ॥
१०॥
इति--इस प्रकार; लोकातू--व्यक्तियों से; बहु-मुखात्--जो अनेक प्रकार से व्यर्थ की बातें कर सकते हैं; दुराराध्यात्--जिन्हें रोकपाना अत्यन्त कठिन है; असंविदः --पूर्णज्ञान से विहीन; पत्या--पति द्वारा; भीतेन-- भयभीत; सा--सीता; त्यक्ता--त्यागी हुई;प्राप्ता--गई; प्राचेतस-आश्रमम्--( वाल्मीकि मुनि ) के आश्रम में
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : अल्पज्ञ तथा घृणित चरित्र वाले व्यक्ति अंटशंट बकते रहते हैं।
ऐसेधूर्तों के भय से भगवान् रामचन्द्रजी ने अपनी पत्नी सीतादेवी का परित्याग किया यद्यपि वे गर्भिणीथीं।
इस तरह सीतादेवी वाल्मीकि मुनि के आश्रम में गई।
अन्तर्वल्यागते काले यमौ सा सुषुवे सुतौ ।
कुशो लव इति ख्यातौ तयोश्चक्रे क्रिया मुनि: ॥
११॥
अन्तर्वत्ली--गर्भिणी स्त्री; आगते--आई; काले--समय से; यमौ--जुड़वाँ; सा--सीतादेवी ने; सुषुबे--जन्म दिया; सुतौ--दो पुत्रोंको; कुश:--कुश; लव:--लव; इति--इस प्रकार; ख्यातौ--विख्यात; तयो:--उन दोनों का; चक्रे --सम्पन्न किया; क्रिया:--जातकर्म संस्कार; मुनिः--वाल्मीकि ऋषि ने।
समय आने पर गर्भवती सीतादेवी ने जुड़वाँ पुत्रों को जन्म दिया जो बाद में लब तथा कुश नामसे विख्यात हुए।
उनका जातकर्म संस्कार वाल्मीकि मुनि द्वारा सम्पन्न हुआ।
अड्भदश्नित्रकेतुश्च लक्ष्मणस्यात्मजौ स्मृतौ ।
तक्षः पुष्कल इत्यास्तां भरतस्य महीपते ॥
१२॥
अड्डृदः--अंगद; चित्रकेतु:--चित्रकेतु; च-- भी ; लक्ष्मणस्य--लक्ष्मणजी के; आत्मजौ--दो पुत्र; स्मृती--कहलाये; तक्ष:--तक्ष;पुष्कलः--पुष्कल; इति--इस प्रकार; आस्ताम्-- थे; भरतस्थ-- भरतजी के; महीपते--हे राजा परीक्षित |
हे महाराज परीक्षित, लक्ष्मणजी के दो पुत्र हुए जिनके नाम अंगद और चित्रकेतु थे और भरतजीके भी दो पुत्र हुए जिनके नाम तक्ष तथा पुष्कल थे।
सुबाहुः श्रुतसेनश्व शत्रुघ्नस्य बभूवतुः ।
गन्धर्वान्कोटिशो जघ्ने भरतो विजये दिशाम् ।
तदीयं धनमानीय सर्व राज्ञे न््यवेदयत् ॥
१३॥
शत्रुघ्नश्च मधो: पुत्रं लवणं नाम राक्षसम् ।
हत्वा मधुवने चक्रे मथुरां नाम वै पुरीम् ॥
१४॥
सुबाहु: --सुबाहु; श्रुतसेन:-- श्रुतसेन; च-- भी; शत्रुघ्नस्य--शत्रुघ्न के; बभूवतु:--उत्पन्न हुए; गन्धर्वान्--गन्धर्वो से सम्बन्धित पुरुष,जो अधिकतर कपटी होते हैं; कोटिश:--करोड़ों की संख्या में; जघ्ने--मार डाला; भरत:-- भरतजी ने; विजये--विजय करते हुए;दिशाम्--सारी दिशाएँ; तदीयम्--गन्धर्वों का; धनम्ू--धन; आनीय--लाकर; सर्वम्--हर वस्तु; राज्ञे--राजा ( रामचन्द्र ) को;न्यवेदयत्-- भेंट किया; शत्रुघ्न: --शत्रुघ्न; च--तथा; मधो: --मधु के; पुत्रमू-पुत्र; लवणम्ू--लवण; नाम--नामक; राक्षसम्--मानवभक्षी को; हत्वा--मारकर; मधुवने--मधुवन नामक जंगल में; चक्रे--बनवाया; मथुराम्ू--मथुरा को; नाम--नामक; बै--निस्सन्देह; पुरीमू--बड़ा नगर
शत्रुघ्न के सुबाहु तथा श्रुतसेन नामक दो पुत्र हुए।
जब भरतजी सभी दिशाओं को जीतने गये तोउन्हें करोड़ों गन्धर्वों का वध करना पड़ा जो सामान्यतया कपटी होते हैं।
उन्होंने उनकी सारी सम्पत्तिछीन ली और उसे लाकर भगवान् रामचन्द्र को अर्पित कर दिया।
शत्रुघ्न ने भी लवण नामक एकराक्षत का वध किया जो मधु राक्षस का पुत्र था।
इस तरह उन्होंने मधुवन नामक महान् जंगल मेंमथुरा नामक पुरी की स्थापना की।
मुनौ निशक्षिप्य तनयौ सीता भर्त्रां विवासिता ।
ध्यायन्ती रामचरणौ विवरं प्रविवेश ह ॥
१५॥
मुनौ--वाल्मीकि मुनि को; निशक्षिप्प--सौंप कर; तनयौ--लव तथा कुश दोनों पुत्र; सीता--सीतादेवी; भर्त्रा--अपने पति द्वारा;विवासिता--वनवास दी गई; ध्यायन्ती-- ध्यान करती; राम-चरणौ--भगवान् राम के चरणकमल; विवरम्--पृथ्वी के भीतर;प्रविवेश-- प्रवेश कर गई; ह--निस्सन्देह
अपने पति द्वारा परित्यक्ता सीतादेवी ने अपने दोनों पुत्रों को वाल्मीकि मुनि की देखरेख में छोड़दिया।
तत्पश्चात् भगवान् रामचन्द्र के चरणकमलों का ध्यान करती हुईं बे पृथ्वी में प्रविष्ट हो गईं।
तच्छुत्वा भगवातन्रामो रुन्धन्नपि धिया शुचः ।
स्मरंस्तस्या गुणांस्तांस्तान्नाशक्नोद्रोद्भुमी श्र: ॥
१६॥
तत्--यह ( सीता का पृथ्वी में समाने का संदेश ); श्रुत्वा--सुनकर; भगवान्-- भगवान्; राम: --रामचन्द्र; रुन्धन्ू-त्यागने का प्रयत्नकरते; अपि--यद्यपि; धिया--बुद्धि से; शुचः--शोक; स्मरन्-- स्मरण करते हुए; तस्या:--उसके; गुणान्--गुण; तान् तानू--विभिन्न परिस्थितियों में; न--नहीं; अशक्नोत्--समर्थ था; रोछ्दुमू--रोकने के लिए; ईश्वर: --परम नियन्ता होकर भी।
सीतादेवी के पृथ्वी में प्रविष्ट होने का समाचार सुनकर भगवान् निश्चित रूप से दुखी हुए।
यद्यपिवे भगवान् हैं, किन्तु सीतादेवी के महान् गुणों का स्मरण करके वे दिव्य प्रेमवश अपने शोक कोरोक न सके।
स्त्रीपुंप्रसड़ एताहक्सर्वत्र त्रासमावह: ।
अपीश्वराणां किमुत ग्राम्यस्थ गृहचेतस: ॥
१७॥
स्त्री-पुम्-प्रसड़:--पति तथा पत्नी के मध्य अथवा पुरुष तथा स्त्री के मध्य आकर्षण; एताहक्--इस प्रकार का; सर्वत्र--सभी जगह;त्रासम्ू-आवहः -- भय का कारण; अपि-- भी; ईश्वराणाम्--नियन्ताओं का; किम् उत--क्या कहा जाय; ग्राम्यस्य--इस भौतिकजगत के सामान्य मनुष्यों का; गृह-चेतस: -- भौतिकतावादी गृहस्थ जीवन के प्रति आसक्त |
स्त्री तथा पुरुष अथवा नर और मादा के मध्य आकर्षण हर जगह और हर समय पाया जाता हैजिससे हर व्यक्ति सदा भयभीत रहता है।
यहाँ तक कि ब्रह्मा तथा शिवजी जैसे नियन्ताओं में भी ऐसीभावनाएँ पाई जाती हैं और उनके लिए भी ये भय के कारण हैं।
तो फिर उन लोगों के विषय में क्याकहा जाय जो इस भौतिक जगत में गृहस्थ-जीवन के प्रति आसक्त हैं?
तत ऊर्ध्व ब्रह्मचर्य धार्यत्नजुहोत्प्रभु: ।
अयोदशाब्दसाहस्त्रमग्निहोत्रमखण्डितम् ॥
१८॥
ततः--तत्पश्चात्; ऊर्ध्वम्--सीता द्वारा पृथ्वी में प्रविष्ट होन के बाद; ब्रह्मचर्यम्--पूर्ण ब्रह्मचर्य; धारयन्-- धारण करते हुए; अजुहोत्--यज्ञ किये; प्रभुः--भगवान् रामचन्द्र ने; त्रयोदश-अब्द-साहस्त्रम्ू-- तेरह हजार वर्षो तक; अग्निहोत्रम्--अग्निहोत्र यज्ञ; अखण्डितम्--अनवरत।
सीता द्वारा पृथ्वी में प्रवेश करने के बाद भगवान् रामचचन्द्र ने पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन किया औरतेरह हजार वर्षों तक वे अनवरत अग्निहोत्र यज्ञ करते रहे।
स्मरतां हृदि विन्यस्य विद्धं दण्डककण्टकैः ।
स्वपादपलल्लवं राम आत्मज्योतिरगात्तत: ॥
१९॥
स्मरतामू--जो उनका सदैव स्मरण करते हैं उन लोगों के; हदि--हृदय में; विन्यस्य--रखकर; विद्धम्--चुभा हुआ; दण्डक-'कण्टकै:--दण्डकारण्य में लगे काँटों द्वारा ( जब रामचन्द्रजी वहाँ रह रहे थे ); स्व-पाद-पल्लवम्--अपने चरणकमलों की पंखड़ियाँ;राम:--भगवान् रामचन्द्र ने; आत्म-ज्योति:--ब्रह्मज्योति नामक उनकी शारीरिक कान्ति की किरणें; अगात्-- प्रवेश किया; तत:--ब्रह्मज्योति के परे या अपने बैकुण्ठलोक में ॥
यज्ञ पूरा कर लेने के बाद दण्डकारण्य में रहते हुए भगवान् रामचन्द्र के जिन चरणकमलों मेंकभी-कभी काँटे चुभ जाते थे उन चरण-कमलों को उन्होंने उन लोगों के हृदयों में रख दिया जोउनका निरन्तर चिन्तन करते हैं।
तत्पश्चात् वे ब्रह्मज्योति से परे अपने धाम वैकुण्ठलोक में प्रविष्ट हुए।
नेदं यशो रघुपते: सुरयाच्जयात्त-लीलातनोरधिकसाम्यविमुक्तधाम्न: ।
रक्षोवधो जलधिबन्धनमस्त्रपूगैः कि तस्य शत्रुहनने कपयः सहाया: ॥
२०॥
न--नहीं; इृदम्--ये सब; यश: --यश; रघु-पते: -- भगवान् रामचन्द्र का; सुर-याच्ञया--देवताओं की स्तुतियों के द्वारा; आत्त-लीला-तनोः--जिनका आध्यात्मिक शरीर सदैव विभिन्न लीलाओं में लगा रहता है; अधिक-साम्य-विमुक्त-धाम्न:--कोई न तो उनकेतुल्य है, न उनसे बढ़कर है; रक्ष:-वध:--राक्षस ( रावण ) वध; जलधि-बन्धनम्--समुद्र पर पुल बाँधना; अस्त्र-पूगैः-- धनुष बाण केद्वारा; किमू--क्या; तस्य--उसका; शत्रु-हनने--शत्रुओं का वध करने में; कपय: --सारे बन्दर; सहाया:--सहायक |
विभिन्न लीलाओं में सदैव संलग्न दिव्य देहधारी भगवान् रामचन्द्र का वास्तविक यश इसमें नहींहै कि उन्होंने देवताओं के आग्रह पर बाणों की वर्षा करके रावण का वध किया और समुद्र पर सेतुका निर्माण किया।
न तो कोई भगवान् रामचन्द्र के तुल्य है न उनसे बढ़कर; अतएव उन्हें रावण परविजय प्राप्त करने में वानरों से कोई सहायता लेने की आवश्यकता नहीं थी।
यस्यामलं नृपसद:सु यशोधुनापिगायन्त्यधघ्नमृषयो दिगिभेन्द्रपट्टम् ।
त॑ नाकपालवसुपालकिरीटजुष्ट-पादाम्बुजं रघुपतिं शरणं प्रपद्ये ॥
२१॥
यस्य--जिसका ( रामचन्द्र का ); अमलम्--निष्कलंक, भौतिक गुणों से रहित; नृप-सदःसु--महाराज युधिष्ठिर जैसे सम्राटों की सभामें; यश:ः--ख्याति; अधुना अपि---आज भी; गायन्ति--गायन करते हैं; अघ-घ्नम्--सारे पापों को दूर करने वाला; ऋषय:--मार्कण्डेय जैसे ऋषिगण; दिक्-इभ-इन्द्र-पट्ठमू--दिग्विजय करने वाले हाथी के ऊपर पड़ा अलंकृत झूल; तम्--उस; नाक-पाल--स्वर्ग के देवताओं के; बसु-पाल--पृथ्वी के राजाओं के; किरीट--मुकुटों द्वारा; जुष्ट-- पूजा किये जाते हैं; पाद-अम्बुजम्--जिनकेचरणकमल; रघु-पतिम्ू-- भगवान् रामचन्द्र की; शरणम्--शरण में; प्रपद्ये --जाता हूँ।
भगवान् रामचन्द्र का निर्मल नाम तथा यश सारे पापों के फलों को नष्ट करने वाला है।
सारीदिशाओं में वह उसी तरह विख्यात है जिस तरह समस्त दिशाओं पर विजय पाने वाले हाथी कालटकता अलंकृत झूल हो।
मार्कण्डेय ऋषि जैसे महान् साधु पुरुष अब भी महाराज युधिष्टठिर जैसेसप्राटों की सभाओं में उनके गुणों का गान करते हैं।
इसी तरह सारे ऋषि तथा देवता, जिनमें शिवजीतथा ब्रह्माजी भी सम्मिलित हैं, अपने-अपने मुकुटों को झुकाकर भगवान् की पूजा करते हैं।
उनभगवान् के चरणकमलों को मैं नमस्कार करता हूँ।
स ये: स्पृष्टोउभिदृष्टो वा संविष्टोडनुगतोपि वा ।
कोसलास्ते ययु: स्थान यत्र गच्छन्ति योगिन: ॥
२२॥
सः--वे, भगवान् रामचन्द्र; यैः--जिन पुरुषों के द्वारा; स्पृष्ट:--स्पर्श किया गया; अभिदष्ट:--देखा गया; वा--या तो; संविष्ट:--साथभोजन और शयन करते हुए; अनुगतः--नौकरों की भाँति पीछे-पीछे चलते हुए; अपि वा-- भी; कोसला:--कोसलवासी; ते--वे;ययु:--चले गये; स्थानम्--स्थान को; यत्र--जहाँ; गच्छन्ति--जाते हैं; योगिन:--सारे भक्तियोगी।
भगवान् रामचन्द्र अपने धाम को लौट आये जहाँ भक्तियोगी जाते हैं।
यही वह स्थान है जहाँअयोध्या के सारे निवासी भगवान् को उनकी प्रकट लीलाओं में नमस्कार करके, उनके चरणकमलोंका स्पर्श करके, उन्हें पितृुतुल्य राजा मानकर, उनकी बराबरी में बैठकर या लेटकर या मात्र उनकेसाथ रहकर, उनकी सेवा करने के बाद वापस गये।
पुरुषो रामचरितं श्रवणैरुपधारयन् ।
आनृशंस्यपरो राजन्कर्मबन्थर्विमुच्यते ॥
२३॥
पुरुष:--कोई व्यक्ति; राम-चरितम्-- भगवान् रामचन्द्र के कार्यकलापों से सम्बन्धित कथा को; श्रवणैः --कानों से; उपधारयन्--श्रवण करके; आनृशंस्य-पर:--ईर्ष्या से पूरी तरह मुक्त हो जाता है; राजन्ू--हे राजा परीक्षित; कर्म-बन्धैः --कर्म के बन्धन से;विमुच्यते--मुक्त हो जाता है।
हे राजा परीक्षित, जो भी व्यक्ति भगवान् रामचन्द्र के गुणों से सम्बन्धित कथाओं को कानों सेसुनता है वह अन्ततोगत्वा ईर्ष्या के रोग से मुक्त हो जायेगा और फलस्वरूप कर्मबन्धन से छूटजायेगा।
श्रीराजोबाचकथ्थं स भगवात्रामो भ्रातृन्वा स्वयमात्मन: ।
तस्मिन्वा तेडन्ववर्तन्त प्रजा: पौराश्च ईश्वेर ॥
२४॥
श्री-राजा उवाच--महाराज परीक्षित ने पूछा; कथम्--कैसे; सः--उन; भगवान्-- भगवान्; राम:--रामचन्द्र ने; भ्रातृूनू-- भाइयों( लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न ) के प्रति; वा--अथवा; स्वयम्--स्वयं; आत्मन: --अपना विस्तार; तस्मिन्ू--भगवान् के प्रति; वा--अथवा; ते--उन ( निवासी तथा भाइयों ने ); अन्ववर्तन्त--बर्ताव किया; प्रजा:--सारे निवासियों; पौरा:--नागरिकों ने; च--तथा;ईश्वरे-- भगवान् के प्रति।
महाराज परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा: भगवान् ने स्वयं किस तरह का बर्ताव किया औरअपने विस्तार ( अंश ) स्वरूप अपने भाइयों के साथ कैसा बर्ताव किया ?
और उनके भाइयों ने तथाअयोध्यावासियों ने उनके साथ कैसा बर्ताव किया ?
श्रीबादरायणिरुवाच अथादिशहिग्विजये क्रातृस्त्रिभुवनेश्वर: ।
आत्मानं दर्शयन्स्वानां पुरीमैक्षत सानुग: ॥
२५॥
श्री-बादरायणि: उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अथ--तत्पश्चात् ( भरत के आग्रह पर भगवान् के सिंहासनारूढ़ होने पर );आदिशत्--आज्ञा दी; दिक्ू-विजये--सारे संसार को जीतने के लिए; भ्रातृूनू--अपने छोटे भाइयों को; त्रि-भुवन-ई श्वर:--ब्रह्माण्ड केस्वामी ने; आत्मानम्--स्वयं; दर्शयन्--दर्शन देते हुए; स्वानाम्ू--अपने परिजनों तथा नागरिकों को; पुरीम्--नगरी को; ऐक्षत--निरीक्षण किया; स-अनुग:--अपने सहायकों के साथ |
शुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया: अपने छोटे भाई भरत के आग्रह पर राजसिंहासन स्वीकार करनेके बाद भगवान् रामचन्द्र ने अपने छोटे भाइयों को आदेश दिया कि वे बाहर जाकर सारे विश्व कोजीतें जबकि वे स्वयं राजधानी में रहकर सारे नागरिकों तथा प्रासाद के वासियों को दर्शन देते रहेतथा अपने अन्य सहायकों के साथ राजकाज की निगरानी करते रहे।
आसिक्तमार्गा गन्धोदैः करिणां मदशीकरैः ।
स्वामिनं प्राप्तमालोक्य मत्तां वा सुतरामिव ॥
२६॥
आसिक्त-मार्गामू--सड़कें सींची गई थीं; गन्ध-उदैः--सुगन्धित जल से; करिणाम्--हाथियों के; मद-शीकरैः--सुगन्धित तरल कीबूँदों से; स्वामिनम्--स्वामी को; प्राप्तम्--उपस्थित; आलोक्य--साक्षात् देखकर; मत्ताम्ू--अत्यन्त ऐश्वर्यशाली; वा--अथवा;सुतराम्ू--अत्यधिक; इब--मानो |
भगवान् रामचन्द्र के शासन काल में अयोध्या की सड़कें सुगन्धित जल से तथा हाथियों द्वाराअपनी सूँडों से फेंके गये सुगन्धित तरल की बूँदों से सींची जाती थीं।
जब नागरिकों ने देखा किभगवान् स्वयं ही इतने वैभव के साथ शहर के मामलों की देखरेख कर रहे हैं तो उन्होंने इस वैभवकी भूरि-भूरि प्रशंसा की।
प्रासादगोपुरसभाचैत्यदेवगृहादिषु ।
विन्यस्तहेमकलशै: पताकाभिश्च मण्डिताम् ॥
२७॥
प्रासाद--महल; गोपुर--महल के द्वार; सभा--सभाभवन; चैत्य--चबूतरे; देव-गृह--मन्दिर जहाँ अर्चाविग्रहों की पूजा की जाती है;आदिषु--त्यादि में; विन्यस्त--रखे; हेम-कलशै: --सुनहरे जल पात्रों सहित; पताकाभि:--झंडियों से; च-- भी; मण्डिताम्--अलंकृत।
सारे महल, महलों के द्वार, सभाभवन, चबूतरे, मन्दिर तथा अन्य ऐसे स्थान सुनहरे जलपात्रों( कलशों ) से सजाये और विभिन्न प्रकार की झंडियों से अलंकृत किये जाते थे।
पूगैः सवृन्तै रम्भाभि: पट्टिकाभि: सुवाससाम् ।
आदर्शरंशुकै: स्त्रग्भिः कृतकौतुकतोरणाम् ॥
२८ ॥
पूगैः--सुपारी के पेड़ों से; स-वृन्तैः--फूलों तथा फलों के गुच्छों से; रम्भाभि:--केले के वृशक्षों से; पट्टिकाभि:--पताकाओं से; सु-वाससाम्--रंगीन वस्त्र से सुसज्जित; आदर्श: --शीशों से; अंशुकै: --वस्त्नों से; स््रग्भिः--मालाओं से; कृत-कौतुक--शुभ बनाये गये;तोरणाम्--स्वागत द्वारों से युक्त
जहाँ कहीं भगवान् रामचन्द्र जाते, वहीं केले के वृक्षों तथा फल-फूलों से युक्त सुपारी के वृशक्षोंसे स्वागत-द्वार बनाये जाते थे।
इन द्वारों को रंगबिरंगे वस्त्र से बनी पताकाओं, बन्दनवारों, दर्पणोंतथा मालाओं से सजाया जाता था।
तमुपेयुस्तत्र तत्र पौरा अहणपाणय: ।
आशिषो युयुजुर्देव पाहीमां प्राक्त्वयोद्धृताम्ू ॥
२९॥
तमू--उनके; उपेयु:--पास गये; तत्र तत्र--जहाँ भी वे गये; पौरा:--पड़ोस के निवासी; अहण-पाणय:--भगवान् के पूजन कीसामग्री लिये; आशिष:--भगवान् से प्राप्त आशीर्वाद; युयुजु:--नीचे आया; देव--हे प्रभु; पाहि--पालन कीजिए; इमाम्--इस भूमिको; प्राकु--पहले की तरह; त्वया--आपके द्वारा; उद्धृताम्--रक्षा की गईं ( वराह अवतार लेकर समुद्र के नीचे से निकाला )
भगवान् रामचन्द्र जहाँ कहीं भी जाते, लोग पूजा की सामग्री लेकर उनके पास पहुँचते और उनकेआशीर्वाद की याचना करते।
वे कहते, ' हे प्रभु, जिस प्रकार आपने अपने सूकर अवतार में समुद्र केनीचे से पृथ्वी का उद्धार किया, उसी तरह अब आप उसका पालन करें।
हम आपसे यही आशीषमाँगते हैं।
'तत:ः प्रजा वीक्ष्य पतिं चिरागतंदिदक्षयोत्सृष्टगृहा: स्त्रियो नरा: ।
आरुह्वय हर्म्याण्यरविन्दलोचन-मतृप्तनेत्रा: कुसुमैरवाकिरन् ॥
३०॥
ततः--तत्पश्चात्; प्रजा:--प्रजा; वीक्ष्य--देखकर; पतिम्--राजा को; चिर-आगतम्--दीर्घकाल के बाद आया हुआ; दिदृक्षया--देखने की इच्छा से; उत्सृष्ट-गृहा:--अपने-अपने घरों को त्यागकर; स्त्रिय:--स्त्रियाँ; नरा:--पुरुषणण; आरुह्मय -- चढ़कर; हर्म्धाणि--विशाल महलों की छत पर; अरविन्द-लोचनम्--कमल की पँखुड़ी जैसे नेत्रों वाले भगवान् रामचन्द्र को; अतृप्त-नेत्रा: --अतृप्त नेत्रोंसे; कुसुमैः --फूलों से; अवाकिरन्-- भगवान् पर वर्षा की
तत्पश्चात्, दीर्घकाल से भगवान् का दर्शन न किये रहने से, नर तथा नारी उन्हें देखने के लिएअत्यधिक उत्सुक होकर अपने-अपने घरों को त्यागकर महलों की छतों पर चढ़ गये।
कमलनयनभगवान् रामचन्द्र के मुखमण्डल का दर्शन करके न अघाने के कारण वे उन पर फूलों की वर्षा करने लगे।
अथ प्रविष्ट: स्वगृहं जुष्टं स्वैः पूर्वराजभि: ।
अनन्ताखिलकोषाह्यमनर्ध्योरुपरिच्छदम् ॥
३१॥
विद्रुमोदुम्बरद्वारवैंदूर्यस्तम्भपड्ि भि: ।
स्थलैर्मारकतैः स्वच्छैर््राजत्स्फटिकभित्तिभि: ॥
३२॥
चित्रस््रग्भि: पट्टिकाभिवासोमणिगणांशुकै: ।
मुक्ताफलैश्विदुल्लासै: कान्तकामोपपत्तिभि: ॥
३३॥
धूपदीपै: सुरभिभिर्मण्डितं पुष्पमण्डने: ।
स्त्रीपुम्भि: सुरसड्भाशर्जु्ट भूषणभूषणै: ॥
३४॥
अथ-त्पश्चात्; प्रविष्ट:--उन्होंने प्रवेश किया; स्व-गृहम्--अपने महल में; जुष्टमू-- भरा हुआ; स्वै:--अपने परिजनों से; पूर्व-राजभि:--राजकुल में पूर्ववर्ती सदस्यों से; अनन्त--असीम; अखिल--सर्वत्र; कोष--खजाना; आढ्यम्--सम्पन्न; अनर्घ्य--अमूल्य;उरू--उच्चा; परिच्छदम्--साज-सामान; विद्युम--मूँगे का; उदुम्बर-द्वारैः--दरवाजे के दोनों पाश्वों सहित; बैदूर्य-स्तम्भ--वैदूर्यमणि केबने ख भों से; पड्धि भि:ः--पंक्तिबद्ध; स्थलैः --फर्शों से; मारकतैः:--मरकत मणि से बने; स्वच्छै:--स्वच्छ, पालिश किये; भ्राजत्--चमचमाते; स्फटिक--संगमरमर; भित्तिभि:--नीवों से; चित्र-स््रग्भिः--नाना प्रकार की फूल मालाओं से; पट्टिकाभि:--झंडियों से;वास:--वस्त्र; मणि-गण-अंशुकै: --विविध तेजयुक्त तथा मूल्यवान मणियों से; मुक्ता-फलै:ः --मोतियों से; चित्-उल्लासै: --मन केआनन्द को बढ़ाने वाले; कान्त-काम--इच्छा को पूरी करने वाले; उपपत्तिभि:--ऐसे साज-सामान से; धूप-दीपैः--धूप तथा दीप से;सुरभिभि:--अत्यन्त सुगन्धित; मण्डितम्--सुसज्जित; पुष्प-मण्डनै:--फूलों के गुच्छों से; स्त्री-पुम्भि:--स्त्रियों तथा पुरुषों से; सुर-सड्डाशैः--देवताओं की तरह लगने वाले; जुष्टम्--से पूर्ण; भूषण-भूषणै:ः --जिनके शरीर आभूषणों को सुन्दर बना रहे थे।
तत्पश्चात् भगवान् रामचन्द्र अपने पूर्वजों के महल में गये।
इस महल के भीतर विविध खजानेतथा मूल्यवान अल्मारियाँ थीं।
प्रवेश द्वार के दोनों ओर की बैठकें मूँगे से बनी थीं, आँगन वैदूर्यमाणिके ख भों से घिरा था, फर्श अत्यधिक पालिश की हुई मरकतमणि से बनी थी और नींव संगमरमरकी बनी थी।
सारा महल झंडियों तथा मालाओं से सजाया गया था एवं मूल्यवान, चमचमाते मणियोंसे अलंकृत किया गया था।
महल पूरी तरह मोतियों से सजाया गया था और धूप-दीप से घिरा था।
महल के भीतर के स्त्री-पुरुष देवताओं के समान थे और वे विविध आभूषणों से अलंकृत थे।
येआभूषण उनके शरीरों में पहने जाने के कारण सुन्दर लग रहे थे।
तस्मिन्स भगवात्रामः स्निग्धया प्रिययेष्टया ।
रैमे स्वारामधीराणामृषभ: सीतया किल ॥
३५॥
तस्मिनू--उस महल में; सः--वह; भगवान्-- भगवान्; राम: --रामचन्द्र; स्तिग्धधा-- सदैव उसके व्यवहार से प्रसन्न होकर; प्रिययाइष्टया--अपनी सर्व-प्रिय पत्ती समेत; रेमे-- भोग किया; स्व-आराम--निजी आनन्द; धीराणाम्--महान् विद्वजनों का; ऋषभ: --प्रमुख; सीतया--सीता सहित; किल--निस्सन्देह |
श्रेष्ठ विद्वान पंडितों में अग्रणी भगवान् रामचन्द्र ने उस महल में अपनी हादिनी शक्ति सीतादेवी केसाथ निवास किया और पूर्ण शान्ति का भोग किया।
बुभुजे च यथाकालं कामान्धर्ममपीडयन् ।
वर्षपूगान्ब॒हून्रूणामभिध्याताडप्रिपल्लव: ॥
३६॥
बुभुजे-- भोग किया; च-- भी; यथा-कालम्--जब तक चाहा; कामान्--सारे भोग; धर्मम्--धर्म; अपीडयन्--उल्लंघन किये बिना;वर्ष-पूगान्--वर्षों की अवधि; बहूनू--अनेक; नृणाम्--लोगों का; अभिध्यात--ध्यान किये जाने पर; अद्ध[प्रि-पललव:--उनकेचरणकमल।
धर्म के सिद्धान्तों का उल्लंघन किये बिना उन रामचन्द्र ने जिनके चरण-कमलों की पूजाभक्तगण ध्यान में करते हैं, जब तक चाहा, दिव्य आनन्द की सारी सामग्री का भोग किया।
