← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 9 की सूची
अध्याय एक: राजा सुद्युम्न एक महिला बन गए
9.1श्रीराजोबवाचमन्वन्तराणि सर्वाणि त्वयोक्तानि श्रुतानि मे।
वीर्याण्यनन्तवीर्यस्य हरेस्तत्र कृतानिच ॥
१॥
श्री-राजा उबाच--राजा परीक्षित ने कहा; मन्वन्तराणि--विभिन्न मनुओं के कालों के बारे में; सर्वाणि--समस्त; त्वया--तुम्हारे द्वारा;उक्तानि--वर्णन किये गये; श्रुतानि--सुने गये; मे--मेरे द्वारा; वीर्याणि-- अद्भुत कार्यकलाप; अनन्त-वीर्यस्थ--असीम बल वालेभगवान्; हरेः --हरि के; तत्र--उन मन्वन्तरों में; कृतानि--सम्पन्न; च-- भी |
राजा परीक्षित ने कहा: हे प्रभु शुकदेव गोस्वामी, आप विभिन्न मनुओं के सारे कालों काविस्तार से वर्णन कर चुके हैं और उन कालों में असीम शक्तिशाली भगवान् के अद्भुत कार्यकलापोंका भी वर्णन कर चुके हैं।
मैं भाग्यशाली हूँ कि मैंने आपसे ये सारी बातें सुनीं।
योउसौ सत्यब्रतो नाम राजर्षिद्रविडेश्वर: ।
ज्ञानं योइतीतकल्पान्ते लेभे पुरुषसेवया ॥
२॥
स बै विवस्वत:ः पुत्रो मनुरासीदिति श्रुतम् ।
त्वत्तस्तस्य सुताः प्रोक्ता इक्ष्वाकुप्रमुखा नृपा: ॥
३॥
यः असौ--जो विख्यात था; सत्यब्रतः--सत्यव्रत; नाम--नामक; राज-ऋषि: --साधु राजा; द्रविड-ईश्वर: --द्रविड देश का शासक;ज्ञानममू--ज्ञान; यः--जो; अतीत-कल्प-अन्ते-- अन्तिम मनु के काल के अन्त में या गत कल्प के अन्त में; लेभे--प्राप्त किया; पुरुष-सेवया--भगवान् की सेवा करके; सः--उसने; बै--निस्सन्देह; विवस्वत: --विवस्वान का; पुत्र:--पुत्र; मनु: आसीत्-- वैवस्वत मनुहुआ; इति--इस प्रकार; श्रुतम्-मैंने सुना है; त्वत्त:--तुमसे; तस्य--उसके; सुताः --पुत्र; प्रोक्ता:--बताये जा चुके हैं; इक्ष्बाकु-प्रमुखा:--इक्ष्वाकु इत्यादि; नृपा:--अनेक राजा
द्रविड़ देश के साधु राजा सत्यव्रत को भगवत्कृपा से गत कल्प के अन्त में आध्यात्मिक ज्ञानप्राप्त हुआ और वह अगले मन्वन्तर में विवस्वान का पुत्र वैवस्वत मनु बना।
मुझे इसका ज्ञान आपसेप्राप्त हुआ है।
मैं यह भी जानता हूँ कि इश्ष्वाकु इत्यादि राजा उसके पुत्र थे जैसा कि आप पहले बताचुके हैं।
तेषां वंशं पृथग्ब्रह्मन्वंशानुचरितानि च ।
कीर्तयस्व महाभाग नित्य॑ शुश्रूषतां हि नः ॥
४॥
तेषाम्--उन सारे राजाओं के; वंशमू--वंश को; पृथक्ू--अलग-अलग; ब्रह्मनू-हे महान् ब्राह्मण ( शुकदेव गोस्वामी ); बंश-अनुचरितानि च--तथा उनके वंश एवं गुण; कीर्तवस्व--कृपया कहिये; महा-भाग--हे परम भाग्यशाली; नित्यम्--नित्य;शुश्रूषताम्ू--आपकी सेवा में लगे हुओं का; हि--निस्सन्देह; नः--हम सबका |
है परम भाग्यशाली शुकदेव गोस्वामी, हे महान् ब्राह्मण, कृपा करके हम सबको उन सारेराजाओं के वंशों तथा गुणों का पृथक्-पृथक् वर्णन कीजिये क्योंकि हम आपसे ऐसे विषयों कोसुनने के लिए सदैव उत्सुक रहते हैं।
ये भूता ये भविष्याश्र भवन्त्यद्यतनाश्च ये ।
तेषां नः पुण्यकीर्तीनां सर्वेषां बद विक्रमान् ॥
५॥
ये--जो; भूताः -- पहले प्रकट हुए हैं; ये--जो; भविष्या:-- भविष्य में उत्पन्न होंगे; च-- भी; भवन्ति--विद्यमान हैं; अद्यतना:--इससमय; च--भी; ये--जो; तेषामू--उन सब का; न:ः--हमको; पुण्य-कीर्तीनाम्ू--जो पवित्र तथा प्रसिद्ध थे; सर्वेषामू--सबका;वबद--कृपा करके बतायें; विक्रमान्ू--पराक्रम के बारे में
कृपा करके हमें वैवस्वत मनु के वंश में उत्पन्न उन समस्त विख्यात राजाओं के पराक्रम के विषयमें बतलायें जो पहले हो चुके हैं, जो भविष्य में होंगे तथा जो इस समय विद्यमान हैं।
श्रीसूत उवाचएवं परीक्षिता राज्ञा सदसि ब्रह्मवादिनाम् ।
पृष्ठ: प्रोवाच भगवाउ्छुकः परमधर्मवित् ॥
६॥
श्री-सूतः उबाच-- श्री सूत गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; परीक्षिता--महाराज परीक्षित द्वारा; राज्ञा--राजा द्वारा; सदसि--सभा में; ब्रह्य-वादिनाम्ू--वैदिक ज्ञान में पटु सभी सन्त पुरुषों की; पृष्ट:--पूछे जाकर; प्रोवाच--उत्तर दिया; भगवान्-- अत्यन्तशक्तिमान; शुकः --शुक गोस्वामी; परम-धर्म-वित्--धर्म के महान् पंडित।
सूत गोस्वामी ने कहा : जब वैदिक ज्ञान के पंडितों की सभा में परम धर्मज्ञ शुकदेव गोस्वामी सेमहाराज परीक्षित ने इस प्रकार प्रार्थना की तो वे इस प्रकार बोले।
श्रीशुक उवाचश्रूयतां मानवो वंश: प्राचुर्येण परन्तप ।
न शक्यते विस्तरतो वक्तुं वर्षशतिरपि ॥
७॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; श्रूयताम्--मुझसे सुनें; मानव: बंश:--मनु का वंश; प्राचुर्येण--विस्तार से;परन्तप--शत्रुओं का दमन करने वाले राजा; न--नहीं; शक्यते--समर्थ है; विस्तरत:--विस्तार से; वक्तुमू--कह पाना; वर्ष-शतैःअपि--सौ वर्षो में भी |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे शत्रुओं का दमन करने वाले राजा, अब तुम मुझसे मनु के वंश केविषय में विस्तार से सुनो।
मैं यथासम्भव तुम्हें बतलाऊँगा यद्यपि सौ वर्षों में भी उसके विषय में पूरीतरह नहीं बतलाया जा सकता।
परावरेषां भूतानामात्मा यः पुरुष: पर: ।
स एवासीदिदं विश्व कल्पान्तेउन्यन्न किज्लन ॥
८॥
पर-अवरेषाम्--जीवन के उच्च या निम्न स्तर के सारे जीवों का; भूतानाम्ू-- भौतिक शरीर धारण करने वालों का ( बद्धजीवों का );आत्मा--परमात्मा; यः--जो है; पुरुष:--परम पुरुष; पर:--दिव्य; सः--वह; एव--निस्सन्देह; आसीतू-- था; इृदम्--यह; विश्वम्--ब्रह्माण्ड; कल्प-अन्ते--कल्प के अन्त में; अन्यत्--अन्यत्र; न--नहीं; किज्ञन--कुछ भी |
जीवन की उच्च तथा निम्न अवस्थाओं में पाये जाने वाले जीवों के परमात्मा दिव्य परम पुरुषकल्प के अन्त में विद्यमान थे जब न तो यह ब्रह्माण्ड था, न अन्य कुछ था।
केवल वे ही विद्यमान थे।
तस्य नाभे: समभवत्पदाकोषो हिरण्मयः ।
तस्मिज्जज्ञे महाराज स्वयम्भूश्नतुरानन: ॥
९॥
तस्य--उसकी ( भगवान् की ); नाभे: --नाभि से; समभवत्--उत्पन्न हुआ; पद्य-कोष:--कमल; हिरण्मय:--सुनहला या हिरण्मयनामक; तस्मिनू--उस सुनहले कमल पर; जज्ञे-- प्रकट हुआ; महाराज--हे राजा; स्वयम्भू: --माता के बिना उत्पन्न होने वाला, याअपने आप प्रकट होने वाला; चतु:-आनन:ः--चार मुखों वाला
हे राजा परीक्षित, भगवान् की नाभि से एक सुनहला कमल उत्पन्न हुआ जिस पर चार मुखों वालेब्रह्माजी ने जन्म लिया।
मरीचिर्मनसस्तस्य जज्ञे तस्यापि कश्यप: ।
दाक्षायण्यां ततोउदित्यां विवस्वानभवत्सुतः ॥
१०॥
मरीचि:--मरीचि नामक महान् सन्त ने; मनसः तस्य--ब्रह्माजी के मन से; जज्ञे--जन्म लिया; तस्य अपि--मरीचि से; कश्यप: --कश्यप ने ( जन्म लिया ); दाक्षायण्याम्--महाराज दक्ष की कन्या के गर्भ से; ततः--तत्पश्चात्; अदित्यामू--अदिति के गर्भ से;विवस्वान्--विवस्वान; अभवत्--हुआ; सुतः-पुत्र |
ब्रह्माजी के मन से मरीचि ने जन्म लिया और मरीचि के वीर्य तथा दक्ष महाराज की कन्या केगर्भ से कश्यप प्रकट हुए।
कश्यप द्वारा अदिति के गर्भ से विवस्वान ने जन्म लिया।
ततो मनु: श्राद्धदेव: संज्ञायामास भारत ।
श्रद्धायां जनयामास द॒श पुत्रान्स आत्मवान् ॥
११॥
इश्ष्वाकुनूगशर्यातिदिष्टधृष्टकरूषकान् ।
नरिष्यन्तं पृषश्च॑ च नभगं च कविं विभु: ॥
१२॥
ततः--विवस्वान से; मनु: श्राद्धदेव:--श्राद्धदेव नामक मनु ने; संज्ञायामू--विवस्वान की पतली संज्ञा के गर्भ से; आस--उत्पन्न हुआ;भारत-हहे भारत वंश में श्रेष्ठ; श्रद्धायाम्- श्राद्धदेव की पत्नी श्रद्धा के गर्भ से; जनयाम् आस--जन्म दिया; दश--दस; पुत्रान्--पुत्रोंको; सः--श्राद्धदेव ने; आत्मवान्--इन्द्रियों को जीतकर; इक्ष्वाकु-नृग-शर्याति-दिष्ट- धृष्ट-करूषकानू--इक्ष्वाकु, नृग, शर्याति, दिष्ट,धृष्ट तथा करूषक को; नरिष्यन्तम्ू--नरिष्यन्त; पृषश्रम् च--तथा पृषथ्च; नभगम् च--तथा नभग; कविम्--कवि को; विभु:--महान।
हे भारतवंश के श्रेष्ठ राजा, संज्ञा के गर्भ से विवस्वान को श्राद्धदेव मनु प्राप्त हुए।
श्राद्धदेव मनुने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया था।
उन्हें अपनी पती श्रद्धा के गर्भ से दस पुत्र प्राप्त हुए।
इन पुत्रोंके नाम थे--इक्ष्वाकु, नृग, शर्याति, दिष्ट, धृष्ट, करूषक, नरिष्यन्त, पृषश्चन, नभग तथा कवि।
अप्रजस्य मनोः पूर्व वसिष्ठो भगवान्किल ।
मित्रावरुणयोरिष्टिं प्रजार्थमकरोद्विभु; ॥
१३॥
अप्रजस्थ--निःसन्तान; मनो:--मनु के; पूर्वमू--पहले; वसिष्ठ:--मुनि वसिष्ठ; भगवान्--शक्तिशाली; किल--निस्सन्देह; मित्रा-वरुणयो:--मित्र तथा वरुण नामक देवताओं का; इष्टिमू--यज्ञ; प्रजा-अर्थम्--पुत्र प्राप्ति के लिए; अकरोत्--सम्पन्न किया;विभुः--महापुरुष ने।
आरम्भ में मनु के एक भी पुत्र नहीं था।
अतएव उसे पुत्रप्राप्ति के लिए आध्यात्मिक ज्ञान मेंअत्यन्त शक्तिशाली मुनि वसिष्ठ ने मित्र तथा वरुण देवताओं को प्रसन्न करने के लिए एक यज्ञ सम्पन्नकिया।
तत्र श्रद्धा मनो: पत्नी होतारं समयाचत ।
दुहित्रर्थमुपागम्य प्रणिपत्य पयोत्रता ॥
१४॥
तत्र--उस यज्ञ में; श्रद्धा-- श्रद्धा ने; मनो:--मनु की; पत्नी--पत्नी; होतारम्--यज्ञ करने वाले पुरोहित से; समयाचत--ठीक से भीखमाँगी; दुहितृ-अर्थम्--एक पुत्री के लिए; उपागम्य--पास आकर; प्रणिपत्य--प्रणाम करके; पयः-ब्रता--पयोव्रत करने वाली,केवल दूध पीने का ब्रत रखने वाली |
उस यज्ञ के दौरान मनु की पत्नी श्रद्धा, जो केवल दूध पीकर जीवित रहने का व्रत कर रही थी,यज्ञ कराने वाले पुरोहित के निकट आई, उसे प्रणाम किया और उससे एक पुत्री की याचना की।
प्रेषितो ध्वर्युणा होता व्यचरत्तत्समाहित: ।
गृहीते हविषि वाचा वषट्कारं गृणन्द्रिज: ॥
१५॥
प्रेषित: --यज्ञ करने को कहे जाने पर; अध्वर्युणा--ऋत्विक द्वारा; होता--आहुति डालने वाले पुरोहित ने; व्यचरत्--सम्पन्न किया;तत्--वह ( यज्ञ ); समाहितः--ध्यानपूर्वक; गृहीते हविषि--पहली आहुति के लिए घी लेने पर; वाचा--मंत्रोच्चार द्वारा; वषट्-कारम्--वषट् शब्द से प्रारम्भ होने वाले मंत्र को; गृणन्--उच्चारण करते हुए; द्विज:--ब्राह्मण ने
प्रधान पुरोहित द्वारा यह कहे जाने पर 'अब आहुति डालो ' आहुति डालने वाले (होता ) नेआहुति डालने के लिए घी लिया।
तब उसे मनु की पत्नी की याचना स्मरण हो आई और उसने'वषट् ' शब्दोच्चार करते हुए यज्ञ सम्पन्न किया।
होतुस्तद्व्यभिचारेण कन्येला नाम साभवत् ।
तां विलोक्य मनु: प्राह नातितुष्टमना गुरुम् ॥
१६॥
होतुः--पुरोहित के; तत्--यज्ञ के; व्यभिचारेण--उल्लंघनपूर्ण कर्म से; कन्या--पुत्री; इला--इला; नाम--नामक; सा--वह कन्या;अभवत्-त्पन्न हुई; तामू--उसको; विलोक्य--देखकर; मनु:--मनु; प्राह--बोला; न--नहीं; अतितुष्टमना:--अत्यधिक तुष्ट;गुरुम--अपने गुरु से।
मनु ने वह यज्ञ पुत्रप्राप्ति के लिए प्रारम्भ किया था, किन्तु मनु की पत्नी के अनुरोध पर पुरोहितके विपथ होने से इला नाम की एक कन्या उत्पन्न हुई।
इस पुत्री को देखकर मनु बिल्कुल प्रसन्न नहींहुए।
अतएव वे अपने गुरु वसिष्ठ से इस प्रकार बोले।
भगवन्किमिदं जात॑ कर्म वो ब्रह्मवादिनाम् ।
विपर्ययमहो कष्ट मैवं स्याह्रह्मविक्रिया ॥
१७॥
भगवनू-हे प्रभु; किम् इदम्--यह क्या है; जातम्--उत्पन्न हुआ; कर्म--सकाम कर्म; वः--हम सभी; ब्रह्म-वादिनाम्--वैदिक मंत्रोंके उच्चारण में पटु आप लोगों का; विपर्ययम्--विचलन; अहो--ओह; कष्टम्-कष्टप्रद; मा एवम् स्थातू--इस तरह नहीं होना चाहिएथा; ब्रह्म-विक्रिया--वेद मंत्रों का यह विपरीत प्रभाव |
हे प्रभु, आप लोग वैदिक मंत्रों के उच्चारण में पटु हैं।
तो फिर वांछित फल से विपरीत फल क्योंनिकला ?
यही पश्चात्ताप का विषय है।
वैदिक मंत्रों का ऐसा उल्टा प्रभाव नहीं होना चाहिए था।
यूयं ब्रह्मविदो युक्तास्तपसा दग्धकिल्बिषा: ।
कुतः सड्डूल्पवैषम्यमनृतं विबुधेष्विव ॥
१८॥
यूयम्--तुम सभी; ब्रह्म -विद:--परम सत्य से भलीभाँति परिचित; युक्ता:--संयमित; तपसा--तपस्या के द्वारा; दग्ध-किल्बिषा:--जिनके सारे भौतिक कल्मष जल चुके हैं; कुत:ः--तब कैसे; सड्जूल्प-वैषम्यम्--संकल्प में त्रुटि; अनृतम्--झूठा वादा, झूठा कथन;विबुधेषु--देवताओं के समाज में; इब--अथवा |
तुम सभी संयमित, संतुलित तथा परम सत्य से परिच्चित हो।
तुम सबने अपनी तपस्याओं के द्वारासारे भौतिक कल्मष से अपने को पूरी तरह स्वच्छ कर लिया है।
तुम सबके वचन देवताओं के बचनोंकी तरह कभी मिथ्या नहीं होते।
तो फिर यह कैसे सम्भव हुआ कि तुम सबका संकल्प विफल होगया ?
निशम्य तद्बचचस्तस्य भगवान्प्रपितामहः ।
होतुर्व्यतिक्रमं ज्ञात्वा बभाषे रविनन्दनम् ॥
१९॥
निशम्य--सुनकर; तत् वच:--वे शब्द; तस्य--उसके ( मनु के ); भगवान्--अत्यन्त शक्तिशाली; प्रपितामह:--बाबा के बाबा वसिष्ठ;होतुः व्यतिक्रमम्--होता की त्रुटि; ज्ञात्वा--जानकर; बभाषे--बोला; रवि-नन्दनम्--सूर्यपुत्र वैवस्वत मनु से
मनु के इन बचनों को सुनकर अत्यन्त शक्तिशाली प्रपितामह वसिष्ठ होता की त्रुटि को समझगये।
अतः वे सूर्यपुत्र से इस प्रकार बोले।
एतत्सड्ूल्पवैषम्यं होतुस्ते व्यभिचारत: ।
तथापि साधयिष्ये ते सुप्रजास्त्वं स्वतेजसा ॥
२०॥
एतत्--यह; सड्जडूल्प-वैषम्यम्--लक्ष्य में त्रुटि; होतु:--होता की; ते--तुम्हारे; व्यभिचारत:--निर्दिष्ट प्रयोजन से हटने के कारण; तथाअपि--फिर भी; साधयिष्ये --मैं सम्पन्न करूँगा; ते--तुम्हारा; सु-प्रजास्त्वम्--अत्यन्त सुन्दर पुत्र; स्व-तेजसा--अपने निजी पराक्रमसे
लक्ष्य में यह त्रुटि तुम्हारे पुरोहित द्वारा मूल उद्देश्य में विचलन के कारण हुई है।
फिर भी मैं अपनेपराक्रम से तुम्हें एक अच्छा पुत्र प्रदान करूँगा।
एवं व्यवसितो राजन्भगवान्स महायशा: ।
अस्तौषीदादिपुरुषमिलाया: पुंस्त्वकाम्यया ॥
२१॥
एवम्--इस प्रकार; व्यवसित:--निश्चित करते हुए; राजन्--हे राजा परीक्षित; भगवान्--अत्यन्त शक्तिमान; सः--वसिष्ठ; महा-यशा:--अ त्यन्त प्रसिद्ध; अस्तौषीत्--प्रार्थना की; आदि-पुरुषम्--परम पुरुष भगवान् विष्णु से; इलाया: --इला का; पुंस्त्व-काम्यया--पुरुष में परिणत करने के लिए॥
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा परीक्षित, अत्यन्त प्रसिद्ध एवं शक्तिशाली वसिष्ठ ने यहनिर्णय लेने के बाद परम पुरुष भगवान् विष्णु से इला को पुरुष में परिणत करने के लिए प्रार्थनाकी।
तस्मै कामवर्र तुष्टो भगवान्हरिरी श्वर: ।
ददाविलाभवत्तेन सुद्युम्न: पुरुषर्षभ: ॥
२२॥
तस्मै--उसको ( वसिष्ठ को ); काम-वरम्--इच्छित वरदान; तुष्ट:--प्रसन्न होकर; भगवान्--भगवान्; हरि: ईश्वर: --परम नियन्ताभगवान् ने; ददौ--दिया; इला--इला नामक कन्या; अभवत्--हो गईं; तेन--इस वरदान से; सुद्युम्न:--सुद्युम्न नामक; पुरुष-ऋषभ:--सुन्दर पुरुष
परम नियन्ता भगवान् ने वसिष्ठ से प्रसन्न होकर उन्हें इच्छित वरदान दिया।
इस तरह इला सुद्युम्ननामक एक सुन्दर पुरुष में परिणत हो गई।
स एकदा महाराज विचरन्मृगयां वने ।
वृतः कतिपयामात्यैरश्रमारुहम सैन्धवम् ॥
२३॥
प्रगृह्य रुचिरं चाप॑ं शरांश्व परमाद्भधुतान् ।
दंशितोनुमृगं वीरो जगाम दिशमुत्तराम् ॥
२४॥
सः--सुद्युम्म; एकदा--एक बार; महाराज--हे राजा परीक्षित; विचरन्-- भ्रमण करते हुए; मृगयाम्--शिकार करने के लिए; वने--जंगल में; वृत:--साथ होकर; कतिपय--कुछ; अमात्यै:--मंत्रियों या पार्षदों के द्वारा; अश्वम्--घोड़े पर; आरुह्म-- चढ़कर;सैन्धवम््--सिन्धु प्रदेश में उत्पन्न; प्रगृह्म--हाथ में पकड़कर; रुचिरम्--सुन्दर; चापम्-- धनुष; शरान् च--तथा बाण; परम-अद्भुतान्ू--अत्यन्त अद्भुत, असामान्य; दंशित:--कवच धारण किये; अनुमृगम्--पशुओं के पीछे; बीर:--वबीर; जगाम--गया;दिशम् उत्तराम्--उत्तर दिशा की ओर।
हे राजा परीक्षित, एक बार वीर सुद्युम्न अपने कुछ मंत्रियों के साथ सिन्धुप्रदेश से लाये गये घोड़ेपर चढ़कर शिकार करने के लिए जंगल में गया।
वह कवच पहने था और धनुष-बाण से सुशोभितथा।
वह अत्यन्त सुन्दर था।
वह पशुओं का पीछा करते तथा उनको मारते हुए जंगल के उत्तरी भाग मेंपहुँच गया।
सुकुमारवनं मेरोरधस्तात्प्रविवेश ह ।
यत्रास्ते भगवाउ्छववों रममाण: सहोमया ॥
२५॥
सुकुमार-वनम्--सुकुमार नामक बन में; मेरो: अधस्तात्--मेरु पर्वत की तलहटी में; प्रविवेश ह--प्रविष्ट हुआ; यत्र--जहाँ; आस्ते--था; भगवान्--अत्यन्त शक्तिशाली ( देवता ); शर्बव:--शिवजी; रममाण:--रमण में तल्लीन; सह उमया--अपनी पली उमा के साथ |
वहाँ उत्तर में मेरु पर्वत की तलहटी में सुकुमार नामक एक वन है जहाँ शिवजी सदैव उमा केसाथ विहार करते हैं।
सुद्युम्न उसी वन में प्रविष्ट हुआ।
तस्मिन्प्रविष्ट एवासौ सुद्युम्न: परवीरहा ।
अपश्यत्त्त्रियमात्मानमश्व॑ च वडवां नृप ॥
२६॥
तस्मिन्--उस वन में; प्रविष्ट:--प्रविष्ट होने पर; एब--निस्सन्देह; असौ--वह; सुद्युम्न:--राजकुमार सुझ्युम्न; पर-वीर-हा--अपनेशत्रुओं को दमन करने वाले; अपश्यत्--देखा; स्त्रियम्ू--स्त्री; आत्मानमू--अपनेआपको; अश्वम् च--तथा अपने घोड़े को;वडवाम्--धोड़ी में; नृप--हे राजा परीक्षित |
हे राजा परीक्षित, ज्यों ही अपने शत्रुओं को दमन करने में निपुण सुद्युम्न उस जंगल में प्रविष्ट हुआत्यों ही उसने देखा कि वह एक स्त्री में और उसका घोड़ा एक घोड़ी में परिणत हो गया है।
तथा तदनुगा: सर्वे आत्मलिड्भरविपर्ययम् ।
इृष्ठा विमनसो भूवन्वीक्षमाणा: परस्परम् ॥
२७॥
तथा--उसी तरह; तत्-अनुगा: --सुद्युम्न के साथी; सर्वे --सारे; आत्म-लिड्ड-विपर्ययम्--विपरीत लिंग में रूपान्तर; दृष्टा--देखकर;विमनसः--खिन्न; अभूवन्--वे हो गये; वीक्षमाणा:--देखते हुए; परस्परम्--एक दूसरे को |
जब उसके साथियों ने भी अपने स्वरूपों एवं अपने लिंग को विपर्यस्त देखा तो वे सभी अत्यन्तखिन्न हो उठे और एक दूसरे की ओर देखने लगे।
श्रीराजोबवाचकथमेवं गुणो देश: केन वा भगवन्कृतः ।
प्रश्नमेनं समाचक्ष्व पर कौतूहलं हि न: ॥
२८ ॥
श्री-राजा उवाच--महाराज परीक्षित ने कहा; कथम्--कैसे; एवम्--यह; गुण:--गुण; देश:--देश; केन--क्यों; वा--अथवा;भगवनू--हे शक्तिशाली; कृतः--किया गया; प्रश्नम्--प्रश्न; एनम्--यह; समाचक्ष्व--बतलाइये; परम्--अत्यधिक; कौतूहलम्--उत्सुकता; हि--निस्सन्देह; नः--हमारी |
महाराज परीक्षित ने कहा : हे परम शक्तिशाली ब्राह्मण, यह स्थान इतना शक्तिवान क्यों था औरइसे किसने इतना शक्तिशाली बनाया था?
कृपा करके इस प्रश्न का उत्तर दीजिये क्योंकि मैं इसकेविषय में जानने के लिए अत्यधिक उत्सुक हूँ।
श्रीशुक उवाचएकदा गिरिशं द्रष्टमृषयस्तत्र सुत्रता: ।
दिशो वितिमिराभासा: कुर्वन्तः समुपागमन् ॥
२९॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एकदा--एक बार; गिरिशम्--शिवजी को; द्रष्टम--देखने के लिए; ऋषय:--ऋषिगण; तत्र--उस जंगल में; सु-ब्रता:--आध्यात्मिक शक्ति में अत्यन्त बढ़े-चढ़े; दिश:--सारी दिशाएँ; वितिमिर-आभासा:--सारेअंधकार के साफ हो जाने पर; कुर्वन्त:--करते हुए; समुपागमन्--आये
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : एक बार आध्यात्मिक अनुष्ठानों का कठोरता से पालन करने वालेबड़े-बड़े साधु पुरुष उस जंगल में शिवजी का दर्शन करने आये।
उन सबके तेज से सारी दिशाओं का सारा अंधकार दूर हो गया।
तान्विलोक्याम्बिका देवी विवासा ब्रीडिता भूशम् ।
भर्तुर्ड्डात्समुत्थाय नीवीमा श्रथ पर्यधात् ॥
३०॥
तानू--उन साधुपुरुषों को; विलोक्य--देखकर; अम्बिका--माता दुर्गा; देवी --देवी; विवासा--नग्न होने के कारण; ब्रीडिता--लज्जित; भृूशम्--अत्यधिक; भर्तु:--अपने पति की; अ्भात्-गोद से; समुत्थाय--उठकर; नीवीम्--वक्षस्थल; आशु अथ--तुरन्तही; पर्यधात्--वस्त्र से ढक लिया।
जब देवी अम्बिका ने इन साधु पुरुषों को देखा तो वे अत्यधिक लज्जित हुईं क्योंकि उस समय वेनग्न थीं।
वे तुरन्त अपने पति की गोद से उठ गईं और अपने वक्षस्थल को ढकने का प्रयास करनेलगीं।
ऋषयोऊपि तयोर्वीक्ष्य प्रसड़ं रममाणयो: ।
निवृत्ताः प्रययुस्तस्मान्नरनारायणा श्रमम् ॥
३१॥
ऋषय: --सारे साधु पुरुष; अपि-- भी; तयो: --उन दोनों की; वीक्ष्य--देखकर; प्रसड्रम्--रति क़रीड़ा में; रममाणयो:--लगे हुए;निवृत्ता:--आगे जाने से हिचके; प्रययु:--तुरन्त विदा हो गये; तस्मात्--उस स्थान से; नर-नारायण-आश्रमम्--नर नारायण केआश्रम को
शिवजी तथा पार्वती को काम-क्रौड़ा में संलग्न देखकर सारे साधु पुरुष तुरन्त ही आगे जाने सेरुक गये और उन्होंने नर-नारायण के आश्रम के लिए प्रस्थान किया।
'तदिदं भगवानाह प्रियाया: प्रियकाम्यया ।
स्थानं यः प्रविशेदेतत्स वै योषिद्धवेदिति ॥
३२॥
तत्--क्योंकि; इदम्--यह; भगवान्--शिवजी ने; आह--कहा; प्रियाया: --अपनी प्रिय पत्नी के; प्रिय-काम्यया--आनन्द के लिए;स्थानम्--स्थान; यः--जो कोई; प्रविशेत्--प्रवेश करेगा; एतत्--यहाँ; सः--वह व्यक्ति; बै--निस्सन्देह; योषित्--स्त्री; भवेत्--होजायेगा; इति--इस प्रकार
तत्पश्चात् अपनी पत्नी को प्रसन्न करने के लिए शिवजी ने कहा, 'इस स्थान में प्रवेश करते हीपुरुष तुरन्त स्त्री बन जायेगा।
'तत ऊर्ध्व॑ वन॑ तद्दे पुरुषा वर्जयन्ति हि ।
सा चानुचरसंयुक्ता विचचार बनाइ्ननम् ॥
३३॥
ततः ऊर्ध्वम्--उस समय के बाद से; वनमू--जंगल में; तत्--उस; बै--विशेष रूप से; पुरुषा:--पुरुष-गण; वर्जयन्ति--नहीं प्रवेशकरते; हि--निस्सन्देह; सा--स्त्री रूप में सुद्युम्म; च--भी; अनुचर-संयुक्ता-- अपने साथियों के साथ; विचचचार--घूमने गया; बनात्बनम्--एक जंगल से दूसरे में |
उस काल से कोई भी पुरुष उस जंगल में नहीं घुसा।
किन्तु अब स्त्री रूप में परिणत होकर राजासुद्युम्न अपने साथियों समेत एक जंगल से दूसरे जंगल में घूमने लगा।
अथ तामाश्रमाभ्याशे चरन्तीं प्रमदोत्तमाम् ।
स्त्रीभि: परिवृतां वीक्ष्य चकमे भगवान्बुध: ॥
३४॥
अथ--इस तरह; ताम्--उसको; आश्रम-अभ्याशे-- अपने आश्रम के निकट; चरन्तीम्--विचरण करती; प्रमदा-उत्तमाम्ू--कामोत्तेजना को जागृत करने वाली श्रेष्ठ सुन्दरी; स्त्रीभि:--अन्य स्त्रियों द्वारा; परिवृतामू--घिरी हुई; वीक्ष्य--देखकर; चकमे--कामेच्छा की; भगवान्--अत्यन्त शक्तिशाली; बुध: --चन्द्रमा का पुत्र बुध तथा बुधलोक का प्रधान देवता।
सुद्युम्न परम सुन्दर स्त्री में परिणत कर दिया गया था जो कामेच्छा को जगाने वाली थी और अन्यस्त्रियों से घिरी हुई थी।
चन्द्रमा के पुत्र बुध ने इस सुन्दरी को अपने आश्रम के निकट विचरण करतेदेखकर उसके साथ संभोग करने की इच्छा प्रकट की।
सापि तं चकमे सुभ्रू: सोमराजसुतं पतिम् ।
स तस्यां जनयामास पुरूरवसमात्मजम् ॥
३५॥
सा--सुझ्युम्न जो स्त्री के रूप में था; अपि-- भी; तमू--उसके साथ ( बुध के साथ ); चकमे--संभोग करना चाहा; सु- भ्रू: -- परमसुन्दरी; सोमराज-सुतम्--चन्द्रमा के राजकुमार के साथ; पतिम्--अपने पति रूप में; सः--वह ( बुध ); तस्याम्--उसके गर्भ से;जनयाम् आस--उत्पन्न किया; पुरूरवसम्--पुरूरवा नामक; आत्म-जमू--पुत्र को
उस सुन्दर स्त्री ने भी चन्द्रमा के राजकुमार बुध को अपना पति बनाना चाहा।
इस तरह बुध नेउसके गर्भ से पुरूरवा नामक एक पुत्र उत्पन्न किया।
एवं स्त्रीत्वमनुप्राप्त: सुद्युम्नो मानवो नृप: ।
सस्मार स कुलाचार्य वसिष्ठमिति शुश्रुम ॥
३६॥
एवम्--इस तरह; स्त्रीत्वम्--स्त्रीत्व; अनुप्राप्त:--प्राप्त करके; सुद्युम्न: --सुद्युम्न नामक पुरुष ने; मानव:--मनु पुत्र; नृप:--राजा ने;सस्मार--स्मरण किया; सः--उसने; कुल-आचार्यम्-कुलगुरु को; वसिष्ठम्--अत्यन्त शक्तिशाली वसिष्ठ; इति शुश्रुम--ऐसा मैंने( विश्वस्त सूत्रों से ) सुना है।
मैंने विश्वस्त सूत्रों से सुना है कि मनु-पुत्र सुद्युम्न ने इस प्रकार स्त्रीत्व प्राप्त करके अपने कुलगुरूवसिष्ठ का स्मरण किया।
स तस्य तां दां दृष्ठा कृपया भूशपीडितः ।
सुद्युम्नस्याशयमन्पुंस्त्वमुपाधावत शद्भूरम् ॥
३७॥
सः--वह; तस्य--सुद्युम्न की; तामू--उस; दशाम्--दशा को; हृष्ठा--देखकर; कृपया--कृपा करके; भूश-पीडितः--अत्यधिकदुखी; सुद्युम्नस्य--सुद्युम्न की; आशयन्ू --इच्छा; पुंस्त्वम्ू--पुरुषत्व; उपाधावत--पूजा करने लगा; शट्जूरम्ू--शिवजी को |
सुद्युम्म की इस शोचनीय स्थिति को देखकर वसिष्ठ अत्यधिक दुखी हुए।
उन्होंने सुद्युम्न कोउसका पुरुषत्व वापस दिलाने की इच्छा से शिवजी की पूजा करनी फिर प्रारम्भ कर दी।
तुष्टस्तस्मै स भगवानृषये प्रियमावहन् ।
स्वां च वाचमृतां कुर्वन्निदमाह विशाम्पते ॥
३८॥
मासं पुमान्स भविता मासं स्त्री तव गोत्रज: ।
इत्थं व्यवस्थया काम सुद्युम्नोउवतु मेदिनीम् ॥
३९॥
तुष्ट:--प्रसन्न होकर; तस्मै--वसिष्ठ को; सः--उसने ( शिवजी ने ); भगवान्--अत्यन्त शक्तिशाली; ऋषये --ऋषि को; प्रियम्आवहनू--उसे प्रसन्न करने के लिए; स्वाम् च--अपने; वाचम्--शब्द को; ऋताम्--सत्य; कुर्वन्ू--करने के लिए; इदम्--यह;आह--कहा; विशाम्पते--हे राजा परीक्षित; मासम्ू--एक महीना; पुमान्--पुरुष; सः--सुद्युम्म; भविता--बन जायेगा; मासम्--दूसरे महीने में; स्त्री--स्त्री; तब--तुम्हारी; गोत्र-ज:--तुम्हारी परम्परा में उत्पन्न शिष्य; इत्थम्--इस तरह; व्यवस्थया--समझौते से;कामम्--इच्छानुसार; सुद्युम्न:--राजा सुद्युम्म; अवतु--शासन कर सकता है; मेदिनीमू--जगत पर |
हे राजा परीक्षित, शिवजी वसिष्ठ पर प्रसन्न हो गए।
अतएव शिवजी ने उन्हें तुष्ट करने तथा पार्वतीको दिये गये अपने वचन रखने के उद्देश्य से उस सन्त पुरुष से कहा, 'आपका शिष्य सुद्युम्न एकमास तक नर रहेगा और दूसरे मास स्त्री रहेगा।
इस तरह वह इच्छानुसार जगत पर शासन करसकेगा।
आचार्यानुग्रहात्कामं लब्ध्वा पुंस्त्व॑ व्यवस्थया ।
पालयामास जगतीं नाभ्यनन्दन्स्म तं प्रजा: ॥
४०॥
आचार्य-अनुग्रहात्-गुरु की कृपा से; कामम्--इच्छित; लब्ध्वा--प्राप्त करके; पुंस्त्वमू--पुरुषत्व; व्यवस्थया--शिवजी के इसनिर्णय से; पालयाम् आस--उसने शासन चलाया; जगतीम्--सारे जगत पर; न अभ्यनन्दन् स्म--संतुष्ट नहीं थे; तम्--उस राजा से;प्रजा:--नागरिक |
इस प्रकार गुरु की कृपा पाकर शिवजी के बचनों के अनुसार सुद्युम्न को प्रति दूसरे मास मेंउसका इच्छित पुरुषत्व फिर से प्राप्त हो जाता था और इस तरह उसने राज्य पर शासन चलाया यद्यपिनागरिक इससे समन्तुष्ट नहीं थे।
तस्योत्कलो गयो राजन्विमलश्च त्रयः सुता: ।
दक्षिणापथराजानो बभूवुर्धर्मवत्सला: ॥
४१॥
तस्य--सुद्युम्न के; उत्तल: --उत्कल नामक; गय:--गय नामक; राजनू--हे राजा परीक्षित; विमल: च--तथा विमल नामक; त्रय:--तीन; सुता:--पुत्र; दक्षिणा-पथ--संसार के दक्षिणी भाग के; राजान:--राजागण; बभूवु:--वे बन गये; धर्म-वत्सला: --अत्यन्तधार्मिक
हे राजा, सुद्युम्न के तीन अत्यन्त पवित्र पुत्र हुए जिनके नाम थे उत्कल, गय तथा विमल, जोदक्षिणापथ के राजा बने।
ततः परिणते काले प्रतिष्ठानपतिः प्रभु: ।
पुरूरवस उत्सूज्य गां पुत्राय गतो वनम् ॥
४२॥
ततः--तत्पश्चात्; परिणते काले--समय आने पर; प्रतिष्ठान-पति:--राज्य का स्वामी; प्रभुः--अत्यन्त शक्तिशाली; पुरूरवसे --पुरूरवाको; उत्सृज्य--प्रदान करके; गामू--जगत को; पुत्राय--अपने पुत्र को; गत:--चला गया; वनम्--वन को
तत्पश्चात् समय आने पर जब जगत का राजा सुझ्युम्न काफी वृद्ध हो गया तो उसने अपना सारासाम्राज्य अपने पुत्र पुरूरवा को दे दिया और स्वयं जंगल में चला गया।
