← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 8 की सूची
अध्याय सात: भगवान शिव ने जहर पीकर ब्रह्मांड को बचाया
8.7श्रीशुक उवाचते नागराजमामन्त्रय फलभागेन वासुकिम् |
'परिवीय गिरौतस्मिन्नेत्रमब्ि मुदान्विता: |
आरेभिरे सुरा यत्ता अमृतार्थे कुरूद्दद ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; ते--वे सब ( देव तथा दैत्य ); नाग-राजम्ू--नागों के राजा को; आमन्य--बुलाकर या प्रार्थना करके; फल-भागेन--अमृत का हिस्सा दिलाने का वचन देकर; वासुकिम्--वासुकि सर्प को; परिवीय--घेरकर; गिरौ--मन्दर पर्वत पर; तस्मिनू--उसको; नेत्रमू--मथने की रस्सी; अब्धिम्-- क्षीरसागर को; मुदा अन्बिता:--सभीअत्यन्त प्रसन्न थे; आरेभिरि--कर्म करने लगा; सुरा:--देवतागण; यत्ता:--अत्यन्त प्रयास से; अमृत-अर्थ--अमृत प्राप्त करने केलिए; कुरु-उद्दद-कुरुओं में श्रेष्ठ
हे राजा परीक्षित, शुकदेव गोस्वामी ने कहा: हे कुरुश्रेष्ठ महाराज परीक्षित! देवों तथा असुरों ने सर्पराजवासुकि को बुलवाया और उसे वचन दिया कि वे उसे अमृत में भाग देंगे |
उन्होंने वासुकि कोमन्दर पर्वत के चारों ओर मथने की रस्सी की भाँति लपेट दिया और क्षीरसागर के मन्थन द्वाराअमृत उत्पन्न करने का बड़ी प्रसन्नतापूर्वक प्रयत्त किया |
हरिः पुरस्ताजगूहे पूर्व देवास्ततो भवन् ॥
२॥
हरिः-- भगवान् अजित ने; पुरस्तात्--सामने से; जगृहे--ले लिया; पूर्वम्--सर्वप्रथम; देवा:--देवतागण; ततः--तत्पश्चात्;अभवनू--वासुकि का अगला हिस्सा पकड़ लिया |
भगवान् अजित ने सर्प के अगले हिस्से को पकड़ लिया और तब सारे देवताओं ने उनकेपीछे होकर उसे पकड़ लिया |
तन्नैच्छन्दैत्यपतयो महापुरुषचेष्टितम् |
न गृह्लीमो बयं पुच्छमहेरड़ममड्रनलम् |
स्वाध्यायश्रुतसम्पन्ना: प्रख्याता जन्मकर्मभि: ॥
३॥
तत्--वह व्यवस्था; न ऐच्छन्--न चाहते हुए; दैत्य-पतयः--दैत्यों के नेता; महा-पुरुष-- भगवान् का; चेष्टितम्--प्रयास; न--नहीं; गृह्लीम:--ले लेंगे; वयम्--हम सभी ( दैत्यगण ); पुच्छम्-पूँछ; अहेः--सर्प की; अड्रमू--शरीर का भाग; अमड्रलम्--अशुभ, निकृष्ट; स्वाध्याय--वैदिक अध्ययन से; श्रुत--तथा वैदिक ज्ञान से; सम्पन्ना:--पूर्ण तथा सज्जित; प्रख्याता:--प्रमुख;जन्म-कर्मभि: --जन्म तथा कार्यकलापों से |
दैत्यों के नेताओं ने पूँछ पकड़ना मूर्खतापूर्ण समझा क्योंकि यह सर्प का अशुभ अंग है |
इस के स्थान पर वे अगला हिस्सा पकड़ना चाहते थे जिसे भगवान् तथा देवताओं ने पकड़ रखा थाक्योंकि वह भाग शुभ तथा महिमा-युक्त था |
इस प्रकार असुरों ने इस दलील के साथ कि वेसभी वैदिक ज्ञान में अत्यधिक बढ़े-चढ़े हैं और अपने जन्म तथा कार्यकलापों के लिए विख्यातहैं, आपत्ति उठाई कि वे सर्प के अगले हिस्से को पकड़ना चाहते हैं |
इति तृष्णीं स्थितान्दैत्यान्विलोक्य पुरुषोत्तम: |
स्मयमानो विसूृज्याग्रं पुच्छं जग्राह सामर: ॥
४॥
इति--इस प्रकार; तृष्णीम्--चुपचाप; स्थितान्ू--ठहरा; दैत्यान्ू--दैत्यों को; विलोक्य--देखकर; पुरुष-उत्तम:--भगवान् ने;स्मयमान:--मुस्काते हुए; विसृज्य--त्याग कर; अग्रम्ू--साँप के अगले भाग को; पुच्छमू--पिछला भाग; जग्राह--पकड़लिया; स-अमरः--देवताओं के साथ-साथ |
इस प्रकार असुरगण देवताओं की इच्छा का विरोध करते हुए मौन रहे |
भगवान् असुरों केमनोभावों को ताड़ गये अतएव वे मुस्काने लगे |
उन्होंने विचार-विमर्श किये बिना तुरन्त ही साँपकी पूँछ पकड़ कर उनका प्रस्ताव मान लिया और सारे देवता उनके साथ हो लिये |
कृतस्थानविभागास्त एवं कश्यपनन्दना: |
ममन्थु: परमं यत्ता अमृतार्थ पयोनिधिम् ॥
५॥
कृत--ठीक करने; स्थान-विभागा:--जहाँ-जहाँ उन्हें पकड़ना था उन स्थानों का विभाजन; ते--वे; एवम्--इस प्रकार;'कश्यप-नन्दना:--कश्यप के पुत्र ( देवता तथा असुर दोनों ही ); ममन्थु:--मथा; परमम्-- अत्यधिक; यत्ता:--यत्न से; अमृत-अर्थम्--अमृत प्राप्ति के लिए; पयः-निधिम्-- क्षीरसागर को |
साँप को किस स्थान पर पकड़ना है, यह तय करने के पश्चात् कश्यप के पुत्र देवता तथाअसुर दोनों ने क्षीरसागर के मन्थन से अमृत पाने की लालसा से अपना-अपना कार्य प्रारम्भ करदिया |
मध्यमानेर्णवे सोउद्विरनाधारो हपोविशत् |
प्रियमाणोपि बलिभिगगौरवात्पाण्डुनन्दन ॥
६॥
मध्यमाने--मन्थन के बीच में; अर्णवे-- क्षीरसागर में; सः--वह; अद्विः--पहाड़; अनाधार:--बिना किसी आधार के; हि--निस्सन्देह; अप:--जल में; अविशत्--डूब गया; प्वियमाण:-- पकड़ा हुआ; अपि--यद्यपि; बलिभि: --अत्यन्त बलशाली सुरोंतथा असुरों द्वारा; गौरवात्-- भारी होने के कारण; पाण्डु-नन्दन--हे पाण्डुपुत्र ( महाराज परीक्षित )॥
हे पाण्डुवंशी! जब क्षीरसागर में मन्दर पर्वत को इस तरह मथानी के रूप में प्रयुक्त किया जारहा था, तो उसका कोई आधार न था अतएव असुरों तथा देवताओं के बलिष्ट हाथों द्वारा पकड़ारहने पर भी वह जल में डूब गया |
ते सुनिर्विण्णममनसः परिम्लानमुखभ्रियः |
आसमन््स्वपौरुषे नष्टे देवेनातिबलीयसा ॥
७॥
ते--वे सब ( देवता तथा असुर ); सुनिर्विण्णग-मनसः --निराश मन से; परिम्लान--मुरझाई; मुख-भ्रिय:--मुखमण्डल कीसुन्दरता; आसन्--हो गई; स्व-पौरुषे-- अपने-अपने पौरुष के; नष्टे--नष्ट होने पर; दैवेन--दैवी विधान से; अति-बलीयसा--अत्यन्त बलवान
चूँकि पर्वत देवी शक्ति से डूबा था अतएवं देवता तथा असुरगण निराश थे और उनके चेहरेकुम्हला गये प्रतीत होते थे |
विलोक्य विघ्नेशविधि तदेश्वरोदुरन्तवीर्योउवितथाभिसन्धि: |
कृत्वा वपु: कच्छपमद्भुतं महत्प्रविश्य तोयं गिरिमुज्जहार ॥
८॥
विलोक्य--देखकर; विध्न--व्यवधान ( पर्वत का डूबना ); ईश-विधिम्--दैवी व्यवस्था से; तदा--तब; ईश्वर: -- भगवान्;दुरन्त-वीर्य:--अकल्पनीय शक्तिमान; अवितथ--अच्युत; अभिसन्धि: --जिसका संकल्प; कृत्वा--विस्तार करके; वपु:--शरीर; कच्छपम्--कछुवा; अद्भुतम्--विचित्र; महत्--विशाल; प्रविश्य--घुसकर; तोयम्ू--जल में; गिरिम्--पर्वत ( मन्दर )को; उजहार---उठा लिया
भगवदिच्छा से जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई थी उसे देखकर असीम शक्तिशाली एवं अच्युतसंकल्प वाले भगवान् ने कछुए का अद्भुत रूप धारण किया और जल में प्रविष्ट होकर विशालमन्दर पर्वत को उठा लिया |
तमुत्थितं वीक्ष्य कुलाचलं पुनःसमुझ्यता निर्मधितुं सुरासुरा: |
दधार पृष्ठेन स लक्षयोजनप्रस्तारिणा द्वीप इवापरो महान् ॥
९॥
तम्--उस पर्वत को; उत्थितम्--उठा हुआ; वीक्ष्य--देखकर; कुलाचलम्--मन्दर नामक; पुन:--फिर; समुद्यता: -- प्रोत्साहितहो गये; निर्मथितुम्-- क्षीरसागर का मन्थन करने के लिए; सुर-असुरा:--देवता तथा दानव; दधार--ले गये; पृष्ठेन--पीठ पर;सः--भगवान्; लक्ष-योजन--एक लाख योजन ( आठ लाख मील ); प्रस्तारिणा--फैला हुआ; द्वीप:--टापू, द्वीप; इब--सहश; अपरः--अन्य; महानू--विशाल
जब देवताओं तथा असुरों ने देखा कि मन्दर पर्वत उठाया गया है, तो वे प्रफुल्लित हो गए और पुनः मन्थन करने के लिए प्रोत्साहित हुए |
यह पर्वत विशाल कछुवे की पीठ पर टिका था,जो एक विशाल द्वीप की भाँति आठ लाख मील तक फैला हुआ था |
सुरासुरेन्द्रै्भुजवीर्यवेपितंपरिभ्रमन्तं गिरिमड़ पृष्ठतः |
बिक्षत्तदावर्तनममादिकच्छपोमेनेडड्रकण्डूयनमप्रमेयः ॥
१०॥
सुर-असुर-इन्द्रै:--देवताओं तथा असुरों के नायकों द्वारा; भुज-वीर्य--अपनी भुजाओं के बल पर; वेपितम्--गति करते हुए;परिभ्रमन्तम्--घूमता हुआ; गिरिम्-पर्वत को; अड़--हे महाराज परीक्षित; पृष्ठतः--अपनी पीठ पर; बिभ्रतू--स्थित; तत्--उस; आवर्तनम्-घूमते हुए; आदि-कच्छप:--आदि कछुवे की तरह; मेने--विचार किया; अड्भ-कण्डूयनम्--शरीर कोखुजलाने के समान सुहावना; अप्रमेय:--असीमित
हे राजा! जब देवताओं तथा असुरों ने अपने बाहुबल से अद्भुत कछुवे की पीठ पर स्थितमन्दर पर्वत को घुमा दिया तो कछुवे ने पर्वत के इस घूमने को अपना शरीर खुजलाने का साधनमान लिया |
इससे उसे अत्यन्त सूखप्रद अनुभूति हुई |
तथासुरानाविशदासुरेणरूपेण तेषां बलवीर्यमीरयन् |
उद्दीपयन्देवगणां श्र विष्णु-देवेन नागेन्द्रमबोधरूप: ॥
११॥
तथा--तत्पश्चात; असुरान्ू--असुरों को; आविशत्-प्रविष्ट हो गये; आसुरेण --रजोगुण के द्वारा; रूपेण--ऐसे रूप में;तेषाम्--उनका; बल-वीर्यम्ू--बल तथा शक्ति; ईरयन्--बढ़ती हुई; उद्दीपयन्-- प्रोत्साहित करते; देव-गणान्ू--देवताओं को;च--भी; विष्णु: -- भगवान् विष्णु; दैवेन--सत्व रूप के द्वारा; नाग-इन्द्रमू--सर्पो के राजा वासुकि को; अबोध-रूप:--तमोगुण के द्वारा |
तत्पश्चात् भगवान् विष्णु, उन सबको प्रोत्साहित करने एवं विभिन्न प्रकार से शक्ति देने केलिए, असुरों में रजोगुण के रूप में, देवताओं में सतोगुण के रूप में तथा वासुकि में तमोगुण केरूप में प्रविष्ट हो गये |
उपर्यगेन्द्रं गिरिराडिवान्यआक्रम्य हस्तेन सहस्त्रबाहु: |
तस्थौ दिवि ब्रह्मभवेन्द्रमुख्यै-रभिष्ठृवद्धि: सुमनोउभिवृष्ट: ॥
१२॥
उपरि--चोटी पर; अगेन्द्रमू--विशाल पर्वत; गिरि-राट्--पर्वतों का राजा; इब--सहश; अन्य:--दूसरा; आक्रम्य--पकड़ कर;हस्तेन--एक हाथ से; सहस्त्र-बाहु:--एक हजार हाथों वाला; तस्थौ--स्थित; दिवि--आकाश में; ब्रह्म--ब्रह्मा जी; भव--शिवजी; इन्द्र--स्वर्ग का राजा इन्द्र; मुख्यैः--प्रमुखों द्वारा; अभिष्ट्वद्धिः-- भगवान् की स्तुति की; सुमन: --फूल; अभिवृष्ट: --बरसा कर |
तब मन्दर पर्वत की चोटी पर भगवान् ने अपने आपको हजारों भुजाओं सहित प्रकट कियाजो अन्य विशाल पर्वत की तरह लग रहे थे और एक हाथ से मन्दर पर्वत को पकड़े रखा |
तबब्रह्मा, शिव, इन्द्र तथा अन्य देवताओं ने उच्च लोकों में भगवान् की स्तुति की और उन पर फूलोंकी वर्षा की |
उपर्यधश्चात्मनि गोत्रनेत्रयो:परेण ते प्राविशता समेधिता: |
ममन्थुरब्धि तरसा मदोत्कटामहाद्विणा क्षोभितनक्रचक्रम् ॥
१३॥
उपरि--ऊपर; अध: च--तथा नीचे; आत्मनि--देवों तथा असुरों में; गोत्र-नेत्रयो: --पर्वत तथा वासुकि को, जो रस्सी की तरहप्रयुक्त हो रहा था; परेण-- भगवान् द्वारा; ते--वे; प्राविशता--उनके भीतर प्रवेश कर गये; समेधिता: --अत्यन्त विश्लुब्ध;ममन्थु:--मथा; अब्धिम्--क्षीरसागर को; तरसा--अत्यन्त बलपूर्वक; मद-उत्कटा: --मदान्ध होकर; महा-अद्विणा--मन्दरपर्वत से; क्षोभित--क्षुब्ध; नक्र-चक्रम्ू--जल के सारे मगर |
देवता तथा असुर अमृत के लिए मानो मतवाले होकर कार्य कर रहे थे क्योंकि भगवान् नेउन्हें प्रोत्साहित कर रखा था; वे पर्वत के ऊपर और नीचे सभी जगह थे और वे देवताओं, असुरों,वासुकि तथा पर्वत में भी प्रविष्ट हो गए थे |
देवताओं तथा असुरों के बल से, क्षीरसागर इतनीशक्ति के साथ विलोड़ित हो रहा था कि जल के सारे मगरमच्छ अत्यधिक विचलित हो उठे |
तोभी समुद्र का मन्थन इस तरह चलता रहा |
अहीन्द्रसाहस्रकठोरहड्मुख-श्वासाग्निधूमाहतवर्चसो सुरा: |
पौलोमकालेयबलील्वलादयोदवाग्निदग्धाः सरला इवबाभवन् ॥
१४॥
अहीन्द्र--सर्पों के राजा का; साहसत्र--हजारों; कठोर--अत्यन्त कठोर; हक्ू--दिशाएँ; मुख--मुख से; श्रास--साँस; अग्नि--बाहर निकलती हुई अग्नि; धूम-- धुँआ; आहत--प्रभावित होकर; वर्चसः--किरणों से; असुराः--असुरगण; पौलोम--पौलोम;कालेय--कालेय; बलि--बलि; इल्बल--इल्बल; आदय: --आदि; दव-अग्नि--जंगल की अग्नि से; दग्धा:--जले हुए;सरला:--सरल वृक्ष; इब--सद्ृश; अभवनू्--हो गये |
वासुकि के हजारों नेत्र तथा मुख थे |
उसके मुख से धुँआ तथा अग्नि की लपटें निकल रहीथीं जिससे पौलोम, कालेय, बलि, इल्बल आदि असुरगण पीड़ित हो रहे थे |
इस तरह सारे असुरजो जंगल की आग से जले हुए सरल वृक्ष की भाँति प्रतीत हो रहे थे धीरे-धीरे शक्तिहीन हो गए |
देवांश्व तच्छासशिखाहतप्रभान्धूम्राम्बरस्त्रग्वरक झ्लुकाननान् |
समभ्यवर्षन्भगवद्बशा घनाबबुः समुद्रोर्म्युपगूढवायव: ॥
१५॥
देवान्ू--सारे देवता; च-- भी; तत्ू--वासुकि के; श्रास--साँस लेने से; शिखा--लपटों से; हत--प्रभावित होकर; प्रभान्--उनकी शारीरिक कान्ति; धूप्र-- धुँआदार; अम्बर--वस्त्र; स्रकू-वर-- श्रेष्ठ माला; कञ्जलुक-- आभूषण; आननानू--तथा चेहरे;समभ्यवर्षन्--अच्छी तरह वर्षा की गई; भगवत्-वशा:-- भगवान् के अधीन; घना:--बादल के; वबुः--उड़ने लगे; समुद्र--क्षीरसागर के; ऊर्मि--लहरों से; उपगूढ--जल के कणों से युक्त; वायव:--मन्द समीर
चूँकि वासुकि की दहकती साँस से देवता भी प्रभावित हुए थे अतएवं उनकी शारीरिककान्ति घट गई और उनके वस्त्र, मालाए, आयुध तथा उनके मुखमण्डल धुएँ से काले पड़ गये |
किन्तु भगवत्कृपा से समुद्र के ऊपर बादल प्रकट हो गए और वे मूसलाधार वर्षा करने लगे |
समुद्री लहरों से जल के कण लेकर मन्द समीर बहने लगे जिससे देवताओं को राहत मिल सके |
मथ्यमानात्तथा सिन्धोर्देवासुरवरूथपै: |
यदा सुधा न जायेत निर्ममन्थाजित: स्वयम् ॥
१६॥
मथ्यमानात्--मथे जाने से; तथा--इस प्रकार से; सिन्धो: -- क्षीरसागर से; देवब--देवताओं का; असुर--तथा असुरों का; वरूथ-पै:-- श्रेष्ठठम के द्वारा; यदा--जब; सुधा--अमृत; न जायेत--बाहर नहीं आया; निर्ममन््थ--मन्थन किया; अजित:-- भगवान्ने; स्वयम्--स्वयं
जब श्रेष्ठठटम देवताओं तथा असुरों के द्वारा इतना उद्यम करने पर भी क्षीरसागर से अमृत नहींनिकला तो स्वयं भगवान् अजित ने समुद्र को मथना प्रारम्भ किया |
मेघश्याम: कनकपरिधि: कर्णविद्योतविद्युन्मूर्शि भ्राजद्विलुलितकच: स्त्रग्धरो रक्तनेत्र: |
जैत्रैदोर्भि्जगदभयदैर्दन्दशूकं॑ गृहीत्वामथ्नन्मथ्ना प्रतिगिरिरिवाशोभताथो धृताद्वि: ॥
१७॥
मेघ-श्याम:--बादल जैसे श्याम रंग वाले; कनक-परिधि:--पीले वस्त्र पहने; कर्ण--कानों में; विद्योत-विद्युत्--जिसके कुंडलबिजली की तरह चमक रहे थे; मूर्ध्नि--सिर पर; भ्राजतू--चमकते हुए; विलुलित--हिलते हुए; कच:--जिसके बाल; स्त्रक्-धरः--फूलों की माला पहने; रक्त-नेत्र:--लाल-लाल आँखों वाले; जैत्रै:--विजय प्राप्त; दोर्भिः -- भुजाओं से; जगत्--विश्वको; अभय-दैः--अभयदान देने वाले के द्वारा; दन्दशूकम्--सर्प ( वासुकि ) को; गृहीत्वा--पकड़ कर; मथ्नन्--मथते हुए;मथ्ना--मथानी ( मन्दर पर्वत ) से; प्रतिगिरि:--दूसरा पर्वत; इब--सहश; अशोभत--शोभा पा रहा था; अथो--तब; धृत-अद्विः--पर्वत धारण किये भगवान् श्याम बादल की भाँति प्रकट हो रहे थे |
वे पीले वस्त्र पहने थे, उनके कान केकुंडल बिजली की तरह चमक रहे थे और उनके बाल कन्धों पर बिखरे हुए थे |
वे फूलों कीमाला पहने थे और उनकी आँखे गुलाबी थीं |
विश्वभर में अभय देने वाली अपनी बलिष्ठ यशस्वीभुजाओं से उन्होंने वासुकि को पकड़ लिया और वे मन्दर पर्वत को मथानी बनाकर समुद्र कामन्थन करने लगे |
जब वे इस प्रकार व्यस्त थे तो वे इन्द्रनील नामक सुन्दर पर्वत की भाँति प्रतीतहो रहे थे |
निर्मथ्यमानादुदधेरभूद्विषंमहोल्बणं हालहलाह्ममग्रतः |
सम्भ्रान्तमीनोन्मकराहिकच्छपात् तिमिद्ठिपग्राहतिमिड्रिलाकुलात् ॥
१८॥
निर्मथ्यमानातू--जब मथने का कार्य चल रहा था; उदधे: --समुद्र से; अभूत्-- था; विषम्--विष; महा-उल्बणम्--अत्यन्तभयानक; हालहल-आह्म्--हालहल नाम से; अग्रतः--सर्वप्रथम; सम्भ्रान्त--क्षुब्ध तथा इधर-उधर गतिशील; मीन--विभिन्नप्रकार की मछलियाँ; उन््मकर--हांगर; अहि--तरह-तरह के सर्प; कच्छपात्--तरह-तरह के कछुओं से; तिमि--व्हेल मछलियाँ;द्विप--समुद्री हाथी; ग्राह--घड़ियाल; तिमिड्निल--छोटी क््हेलों को निगल जाने वाली बड़ी व्हेल मछलियाँ; आकुलातू--अत्यधिक व्याकुल होकर |
मछलियाँ, हांगर, कछुवे तथा सर्प अत्यन्त विचलित एवं श्लुब्ध थे |
सारा समुद्र उत्तेजित होउठा और व्हेल, समुद्री हाथी, घड़ियाल तथा तिमिड्रिल मछली जैसे बड़े-बड़े जलचर सतह परआ गये |
जब इस प्रकार से समुद्र-मन्थन हो रहा था, तो इससे सर्वप्रथम हालहल नामक घातकविष उत्पन्न हुआ |
तदुग्रवेगं दिशि दिश्युपर्यधोविसर्पदुत्सर्पदसह्ममप्रति |
भीताः प्रजा दुद्गुवुरड़ से श्वराअरक्ष्यमाणा: शरणं सदाशिवम् ॥
१९॥
तत्--वह; उग्र-वेगम्--अत्यन्त भयानक तथा तेज विष; दिशि दिशि--सभी दिशाओं में; उपरि--ऊपर; अधः--नीचे;विसर्पत्ू--मुड़ता हुआ; उत्सर्पत्--ऊपर जाते हुए; असहाम्--असह्ा; अप्रति--वश में न होने वाला; भीता: --अत्यधिक डरेहुए; प्रजा:--सारे विश्वों के निवासी; दुद्ुबुः--इधर-उधर जा रहे थे; अड्ग--हे महाराज परीक्षित; स-ईश्वरा:-- भगवान् सहित;अरक्ष्यमाणा:--असुरक्षित; शरणम्--शरण; सदाशिवम्--शिवजी के चरणकमलों में |
है राजा! जब वह उग्र विष ऊपर नीचे तथा सभी दिशाओं में वेग के साथ फैलने लगा तोसारे देवता भगवान् समेत शिवजी ( सदाशिव ) के पास गये |
अपने को असुरक्षित तथा अत्यन्तभयभीत पाकर वे सब उनकी शरण मांगने लगे |
विलोक्य तं देववरं त्रिलोक्याभवाय देव्याभिमतं मुनीनाम् |
आसीनमद्रावपवर्गहितो-स्तपो जुषाणं स्तुतिभि: प्रणेमु: ॥
२०॥
विलोक्य--देखकर; तम्--उस; देव-वरम्--देवताओं में सर्वश्रेष्ठ को; त्रि-लोक्या:--तीनों लोकों के; भवाय--उन्नति के लिए;देव्या--अपनी पत्नी भवानी सहित; अभिमतम्--स्वीकृत; मुनीनाम्ू--मुनियों का; आसीनम्--एकसाथ बैठे; अद्रौ--कैलाशपर्वत की चोटी से; अपवर्ग-हेतो:--मुक्ति की कामना करते; तप:--तपस्या में; जुषाणम्--सेवित; स्तुतिभि:--स्तुतियों से;प्रणेमु:--सादर नमस्कार किया |
देवताओं ने शिवजी को अपनी पतली भवानी सहित कैलाश पर्वत की चोटी पर तीनों लोकोंके मंगलमय अभ्युदय हेतु तपस्या करते हुए देखा |
मुक्ति की कामना करने वाले मुनि-गणउनकी पूजा कर रहे थे |
देवताओं ने उन्हें प्रणाम किया और आदरपूर्वक प्रार्थना की |
श्रीप्रजापतय ऊचु:देवदेव महादेव भूतात्मन्भूतभावन |
त्राहि न: शरणापन्नांस्त्रेलोक्यदहनाद्विषात्ू ॥
२१॥
श्री-प्रजापतय: ऊचु:--प्रजापतियों ने कहा; देव-देव--हे देवताओं में श्रेष्ठ, महादेव; महा-देव--हे महान् देवता; भूत-आत्मन्--इस संसार में हरएक के प्राण तथा आत्मा स्वरूप; भूत-भावन--हे सबके सुख तथा समृद्धि के कारण; त्राहि--उद्धारकरें; नः--हमारा; शरण-आपतन्नानू-- अपने शरणागतों को; त्रैलोेक्य--तीनों लोकों का; दहनातू--दहन करने वाले; विषात्--इस विष से |
प्रजापतियों ने कहा : हे देवश्रेष्ठ महादेव, हे समस्त जीवों के परमात्मा तथा उनकी सुख-समृद्धि के कारण! हम आपके चरणकमलों की शरण में आये हैं |
अब आप तीनों लोकों मेंफैलने वाले इस उग्र विष से हमारी रक्षा करें |
त्वमेकः सर्वजगत ईश्वरो बन्धमोक्षयो: |
त॑ त्वामर्चन्ति कुशला: प्रपन्नार्तिहरें गुरुम् ॥
२२॥
त्वम् एक:--निस्सन्देह तुम हो; सर्व-जगत:--तीनों लोकों के; ईश्वरः--नियन्ता; बन्ध-मोक्षयो:--बन्धन तथा मोक्ष दोनों के;तम्--उस नियन्ता को; त्वाम् अर्चन्ति--आपको पूजते हैं; कुशला:--धनधान्य चाहने वाले व्यक्ति; प्रपन्न-आर्ति-हरम्--शरणागत भक्तों के समस्त कष्टों का हरण करने वाला; गुरुम्--जो समस्त पतितात्माओं के लिए सदुपदेशक का कार्य करे उसे |
हे प्रभु! आप सारे विश्व के बन्धन तथा मोक्ष के कारण हैं क्योंकि आप इसके शासक हैं |
जोलोग आध्यात्मिक चेतना में बढ़े-चढ़े हैं, वे आपकी शरण में जाते हैं, अतएव आप उनके कष्टोंको दूर करने वाले हैं और उनकी मुक्ति के भी आप ही कारण हैं |
अतएव हम आपकी पूजाकरते हैं |
गुणमय्या स्वशक्त्यास्य सर्गस्थित्यप्ययान्विभो |
धत्से यदा स्वह्ग्भूमन्ब्रह्मविष्णुशिवाभिधाम् ॥
२३॥
गुण-मय्या--तीनों गुणों में कार्य करते हुए; स्व-शक्त्या--अपनी बहिरंगा शक्ति द्वारा; अस्थ--इस जगत का; सर्ग-स्थिति-अप्ययानू--सृष्टि, पालन तथा संहार; विभो--हे प्रभु; धत्से--आप सम्पन्न करते हैं; यदा--जब; स्व-हक्--आप अपने कोप्रकट करते हैं; भूमन्--हे महान्; ब्रह्म-विष्णु-शिव-अभिधाम्--ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव के रूप में |
हे प्रभु! आप स्वयं-प्रकाशित तथा सर्वश्रेष्ठ हैं |
आप अपनी निजी शक्ति से इस भौतिकजगत का सृजन करते हैं और जब आप सृष्टि, पालन तथा संहार का कार्य करते हैं, तो ब्रह्मा,विष्णु तथा महे ध्वर के नाम धारण कर लेते हैं |
त्वं ब्रह्म परमं गुहां सदसद्धावभावनम् |
नानाशक्तिभिराभातस्त्वमात्मा जगदी श्वर: ॥
२४॥
त्वम्-तुम; ब्रह्म--निराकार ब्रह्म; परमम्--परम; गुहाम्--गुहा, गोपनीय; सत्-असत्-भाव-भावनम्--सब की सृष्टि काकारण, इसका कारण तथा फल; नाना-शक्तिभि:--अनेक प्रकार की शक्तियों से; आभात: --व्यक्त; त्वमू--तुम हो; आत्मा--परमात्मा; जगतू-ई श्वरः + भगवान् |
आप समस्त कारणों के कारण, आत्म-प्रकाशित, अचिन्त्य, निराकार ब्रह्म हैं, जो मूलतःपरब्रह्म हैं |
आप इस दृश्य जगत में विविध शक्तियों को प्रकट करते हैं |
त्वं शब्दयोनिर्जगदादिरात्माप्राणेन्द्रियद्रव्यगुण: स्वभाव: |
कालः क्रतुः सत्यमृतं च धर्म-स्त्वय्यक्षरं यत्त्रिवृदामनन्ति ॥
२५॥
त्वमू--आप; शब्द-योनि:--वैदिक ज्ञान का स्त्रोत; जगत्-आदिः--सृष्टि का मूल कारण; आत्मा--आत्मा; प्राण--जीवनीशक्ति; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; द्रव्य-- भौतिक तत्त्व; गुण:--तीन गुण; स्व-भावः--प्रकृति; काल:--नित्य समय; क्रतु:--यज्ञ;सत्यम्--सत्य; ऋतम्--सच्चाई; च--तथा; धर्म:--धर्म के दो प्रकार; त्वयि--आपमें; अक्षरम्--मूल अक्षर, ओड्ढार; यत्ू--जो; त्रि-वृतू--तीन अक्षरों वाला, आ, उ, म् से युक्त; आमनन्ति--कहते हैं हे स्वामी! आप वैदिक ज्ञान के मूल स्त्रोत हैं |
आप भौतिक सृष्टि, प्राण, इन्द्रियों, पाँचतत्त्वों, तीन गुणों तथा महत् तत्त्व के मूल कारण हैं |
आप नित्य काल, संकल्प तथा सत्य औरऋत कही जाने वाली दो धार्मिक प्रणालियाँ हैं |
आप तीन अक्षरों--अ, उ तथा म् वाले ३ शब्द के आश्रय हैं |
अग्निर्मुखं तेडखिलदेवतात्माक्षितिं विदु्लोकभवाड्प्रिपड्टजम् |
काल गतिं तेडखिलदेवतात्मनोदिशश्व कर्णों रसनं जलेशम् ॥
२६॥
अग्नि:--अग्नि; मुखम्-- मुँह; ते--आपका; अखिल-देवता-आत्मा--सारे देवताओं के उद्गम; क्षितिमू--महिमंडल; विदुः--वे जानते हैं; लोक-भव--हे समस्त लोकों के उद्गम; अड्प्रि-पड्डजम्ू--आपके चरणकमल; कालम्--नित्य काल; गतिम्ू--प्रगति; ते--आपका; अखिल-देवता-आत्मन:--सभी देवताओं के सार समाहार; दिशः--सारी दिशाएँ; च--तथा; कर्ण --आपके कान; रसनमू्--स्वाद; जल-ईशम्--जल के अधिष्ठाता देवता |
हे समस्त लोकों के पिता! विद्वान लोग जानते हैं कि अग्नि आपका मुख है, पृथ्वी आपकेचरणकमल हैं, आप निखिल देवरूप हैं, नित्य काल आपकी गति है, सारी दिशाएँ आपके कानहैं और जल का स्वामी वरुण आपकी जीभ है |
नाभिर्नभस्ते श्वसन नभस्वान्सूर्य श्न चक्षूंषि जल॑ सम रेत: |
परावरात्मा श्रयणं तवात्मासोमो मनो द्यौर्भगवन्शिरस्ते ॥
२७॥
नाभि:--नाभि; नभ:ः--आकाश; ते-- आपकी; श्वसनम्--साँस लेना; नभस्वान्--वायु; सूर्य: च--तथा सूर्य का गोला;चक्षूंषि--आपकी आँखें; जलम्--जल; स्म--निस्सन्देह; रेत:--वीर्य; पर-अवर-आत्म-आश्रयणम्---उच्च एवं निम्म सारे जीवोंका आश्रय; तब--तुम्हारा; आत्मा--आत्मा; सोम: -- चन्द्रमा; मन: --मन; द्यौ:--उच्चतर लोक मण्डल; भगवनू-हे प्रभु;शिरः--सिर; ते--तुम्हारा |
हे प्रभ!ु आकाश आपकी नाभि है, वायु आपकी श्वसन क्रिया है, सूर्य आपकी आँखे हैं तथाजल आपका वीर्य है |
आप समस्त प्रकार के उच्च तथा निम्न जीवों के आश्रय हैं |
चन्द्रदेवआपका मन है |
उच्चतर लोक मण्डल आपका सिर है |
कुक्षिः समुद्रा गिरयोस्थिसज्जारोमाणि सर्वौषधिवीरुधस्ते |
छन््दांसि साक्षात्तव सप्त धातव-स्त्रयीमयात्मन्हदयं सर्वधर्म: ॥
२८ ॥
कुक्षि:--उदर, कोख,; समुद्रा:--समुद्र; गिरय:ः--पर्वत; अस्थि--हड्डियाँ; सज्ञ:--मेल, समूह; रोमाणि--शरीर के रोएँ; सर्व--सभी; औषधि--औषधियाँ; वीरुध:--पौधे तथा लताएँ; ते--आपका; छन्दांसि--वैदिक मंत्र; साक्षात्- प्रत्यक्ष; तव--आपका; सप्त--सात; धातव:--शरीर के स्तर ( कोश ); त्रयी-मय-आत्मन्--हे साक्षात् तीनों वेद; हृदयम्--हृदय; सर्व-धर्म:--सभी प्रकार के धर्म |
हे प्रभु! आप साक्षात् तीनों वेद हैं |
सातों समुद्र आपके उदर हैं और पर्वत आपकी हड्डियाँ है |
सारी औषधियाँ, लताएँ तथा वनस्पतियाँ आपके शरीर के रोएँ हैं |
गायत्री जैसे वैदिक मंत्रआपके शरीर के सात कोश हैं और वैदिक धर्म पद्धति आपका हृदय है |
मुखानि पञ्जञोपनिषदस्तवेशयैस्बत्रिशदृष्टोत्तरमन्त्रवर्ग: |
यत्तच्छिवाख्यं परमात्मतत्त्वंदेव स्वयंज्योतिरवस्थितिस्ते ॥
२९॥
मुखानि--मुखमण्डल; पञ्ञ--पाँच; उपनिषदः --वैदिक वाड्मय; तव--तुम्हारा; ईश--हे स्वामी; यैः --जिससे; त्रिंशत्-अष्ट-उत्तर-मन्त्र-वर्ग: --अड़तीस महत्त्वपूर्ण वैदिक मंत्रों की कोटि में; यत्--जो; तत्--जैसा है; शिव-आख्यम्--शिवनाम सेविख्यात; परमात्म-तत्त्वम्--जो परमात्मा विषयक सत्य की पुष्टि करता है; देव--हे भगवान्; स्वयम्-ज्योति:ः--आत्म प्रकाशित;अवस्थिति:--स्थिति; ते--आपकी |
हे प्रभो! पाँच महत्वपूर्ण वैदिक मंत्र आपके पाँच मुखों के द्योतक हैं जिनसे अड़तीसमहत्वपूर्ण वैदिक मंत्र उत्पन्न हुए हैं |
आप शिव नाम से विख्यात स्वयं प्रकाशित हैं |
आप परमात्मानाम से प्रत्यक्ष परम सत्य के रूप में स्थित हैं |
छाया त्वधर्मोर्मिषु यैर्विसगोंनेत्रत्रयं सत्त्तरजस्तमांसि |
साड्ख्यात्मन: शास्त्रकृतस्तवेक्षाछन््दोमयो देव ऋषि: पुराण: ॥
३०॥
छाया--छाया; तु--लेकिन; अधर्म-ऊर्मिषु-- अधर्म की लहरों में, यथा काम, क्रोध, लोभ, मोह में; यैः--जिससे; विसर्ग:--इतनी सारी सृष्टियाँ; नेत्र-त्रयमू--तीन आँखें; सत्त्व--सतोगुण; रज:--रजोगुण; तमांसि--तथा तमोगुण; साड्ख्य-आत्मन:--सारे वैदिक साहित्य का उद्गम; शास्त्र--शास्त्र; कृत:--बनाया हुआ; तब--आपकी; ईक्षा--चितवन मात्र से; छन्दः-मय: --वैदिक छन््दों से युक्त; देव--हे प्रभु; ऋषि:--सारा वैदिक साहित्य; पुराण: --तथा पुराण |
हे भगवान्! आपकी छाया अधर्म में दिखती है, जिससे नाना प्रकार की अधार्मिक सृष्टियाँउत्पन्न होती हैं |
प्रकृति के तीनों गुण--सत्त्व, रज तथा तमो--आपके तीन नेत्र हैं |
छन्दों से युक्तसारे वैदिक ग्रंथ आपसे उद्भूत हैं क्योंकि उनके संग्रहकर्ताओं ने आपकी कृषपाद्ृष्टि प्राप्त करकेही उन शास्त्रों को लिखा |
न ते गिरित्राखिललोकपाल-विरिश्ञवैकुण्ठसुरेन्द्रगम्यम् |
ज्योतिः परं यत्र रजस्तमश्नसत्त्वं न यद्वह्म निरस्तभेदम् ॥
३१॥
न--नहीं; ते--आपका; गिरि-त्र--हे पर्वतों के राजा; अखिल-लोक-पाल-- भौतिक कार्यकलापों के विभागों के सारेनिदेशक; विरिज्ञ--ब्रह्मा; वैकुण्ठ-- भगवान् विष्णु; सुर-इन्द्र--स्वर्ग का राजा; गम्यम्ू--सरलता से समझा जाने वाला;ज्योतिः--तेज; परम्ू--दिव्य; यत्र--जहाँ; रज:--रजोगुण; तमः च--तथा तमोगुण; सत्त्वमू--सतोगुण; न--नहीं; यत् ब्रह्म--जो निराकार ब्रह्म है; निरस्त-भेदम्--देवताओं तथा मनुष्यों में किसी अन्तर के बिना |
हे गिरीश! चूँकि निराकार ब्रह्म तेज सतो, रजो तथा तमो गुणों से परे है अतएवं इस भौतिकजगत के विभिन्न निदेशक ( लोकपाल ) न तो इसकी प्रशंसा कर सकते हैं न ही यह जान सकतेहैं कि वह कहाँ है |
वह ब्रह्मा, विष्णु या स्वर्ग के राजा महेन्द्र द्वारा भी ज्ञेय नहीं है |
कामाध्वरत्रिपुरकालगराद्यनेक-भूतद्गुह: क्षपयतः स्तुतये न तत्ते |
यस्त्वन्तकाल इदमात्मकृतं स्वनेत्र-वह्िस्फुलिड्शिखया भसितं न वेद ॥
३२॥
काम-अध्वर--इन्द्रियतृप्ति के लिए यज्ञ ( यथा दक्ष द्वारा सम्पन्न दक्ष-यज्ञ ); त्रिपुर--त्रिपुरासुर; कालगर--कालगर; आदि--तथा अन्य; अनेक--कई; भूत-द्गुह:ः--जीवों को कष्ट देने वाले; क्षपयत:--उनके विनाश में लगे हुए; स्तुतये--आपकी स्तुति;न--नहीं; तत्ू--वह; ते--आपसे बोलते हुए; यः तु--क्योंकि; अन्त-काले-- प्रलय के समय; इृदम्--इस भौतिक जगत में;आत्म-कृतम्--अपने से किया गया; स्व-नेत्र--आपकी आँखों से; वह्नि-स्फुलिड्र-शिखया--आग की चिनगारियों से;भसितम्-भस्मसात्; न वेद--मैं नहीं जानता कि यह कैसे हो रहा है |
जब आपकी आँखों से उद्भूत लपटों तथा चिनगारियों से प्रलय होता है, तो सारी सृष्टिजलकर राख हो जाती है |
तो भी आपको पता नहीं चलता कि यह कैसे होता है |
अतएव आपकेद्वारा दक्ष-यज्ञ, त्रिपुरासुर तथा कालकूट विष विनष्ट किये जाने के विषय में क्या कहा जासकता है? ऐसे कार्यकलाप आपको अर्पित की जाने वाली स्तुतियों के विषय नहीं बन सकते |
ये त्वात्मरामगुरुभिईदि चिन्तिताडूप्रि-इन्द्दं चरन्तमुमया तपसाभितप्तम् |
कत्थन्त उग्रपरुषं निरतं एमशानेते नूनमूतिमविदंस्तव हातलज्जा: ॥
३३॥
ये--जो व्यक्ति; तु--निस्सन्देह; आत्म-राम-गुरुभिः--जो आत्मतुष्ट हैं और संसार भर के गुरु माने जाते हैं; हदि--हृदय में;चिन्तित-अद्धध्नि-द्वन्द्मू-- आपके दोनों चरणकमलों का चिन्तन करते; चरन्तम्--विचरण करते; उमया--अपनी प्रेयसी उमा केसाथ; तपसा अभितप्तम्ू--तपस्या द्वारा उच्चपद को प्राप्त; कत्थन्ते--आपके कार्यों की आलोचना करते हैं; उग्र-परूषम्--अभद्र व्यक्ति; निरतम्--सदैव; शमशाने--श्मशान में; ते--ऐसे व्यक्ति; नूनम्--निस्सन्देह; ऊतिम्--ऐसे कार्यकलाप;अविदनू--न जानते हुए; तब--आपके कार्यकलाप; हात-लज्जा:--निर्लज् |
सारे विश्व को उपदेश देने वाले महान् आत्मतुष्ट व्यक्ति अपने हृदयों में आपके चरणकमलोंका निरन्तर चिन्तन करते हैं, किन्तु जब आपकी तपस्या को न जानने वाले व्यक्ति आपको उमाके साथ विचरते देखते हैं, तो वे आपको भ्रमवश कामी समझते हैं अथवा जब वे आपकोश्मशान में घूमते हुए देखते हैं, तो भ्रमवश वे आपको अत्यन्त नृशंस तथा ईर्ष्यालु समझते हैं |
निस्सन्देह, वे निर्लज्न हैं |
वे आपके कार्यकलापों को कभी नहीं समझ सकते |
तत्तस्य ते सदसतो: परतः परस्यना: स्वरूपगमने प्रभवन्ति भूम्न: |
ब्रह्मादयः किमुत संस्तवने वयं तुतत्सर्गसर्गविषया अपि शक्तिमात्रम् ॥
३४॥
तत्--अतएव; तस्य--उसका; ते--आपका; सत्-असतो:--चर तथा अचर सारे जीवों का; परत:--दिव्य पद पर स्थित;'परस्य--समझ पाना दुष्कर; न--न तो; अज्ञ: --जैसा है; स्वरूप-गमने-- आपकी वास्तविकता तक पहुँच पाना; प्रभवन्ति--सम्भव है; भूम्न:--हे महान्; ब्रह्य-आदय: --ब्रह्मा जैसे पुरुष; किम् उत--अन्यों के विषय में क्या कहा जाये; संस्तवने--प्रार्थनाकरने में; वयम् तु--जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है; तत्ू--आपका; सर्ग-सर्ग-विषया:--सृष्टि की सृष्टियाँ; अपि--यद्यपि; शक्ति-मात्रमू--यथाशक्ति |
ब्रह्मा जी तथा अन्य देवतागण जैसे व्यक्ति तक आपकी स्थिति नहीं समझ सकते क्योंकिआप चर तथा अचर सृष्टि से भी परे हैं |
चूँकि आपको सही रूप में कोई नहीं समझ सकता तोफिर भला कोई किस तरह आपकी स्तुति कर सकता है? यह असम्भव है |
जहाँ तक हमारासम्बन्ध है, हम ब्रह्मा जी की सृष्टि के प्राणी हैं |
अतएव ऐसी परिस्थितियों में हम आपकी ठीक से स्तुति नहीं कर सकते, किन्तु हमने अपनी बुद्धि के अनुसार अपनी भावनाएँ व्यक्त की हैं |
एतत्परं प्रपश्यामो न परं ते महेश्वर |
मृडनाय हि लोकस्य व्यक्तिस्तेउव्यक्तकर्मण: ॥
३५॥
एतत्--ये सारी वस्तुएँ; परम्ू--दिव्य; प्रपश्याम: --हम देख सकते हैं; न--नहीं; परम्--वास्तविक दिव्य स्थिति; ते--आपकी;महा-ई श्वर--हे महान् शासक; मृडनाय--सुख के लिए; हि--निस्सन्देह; लोकस्य--सारे जगत के; व्यक्ति:--प्रकट; ते--आपके; अव्यक्त-कर्मण: --जिसके कार्यकलाप सबको अज्ञात हैं |
हे महान् शासक! हमारे लिए आपके असली स्वरूप को समझ पाना असम्भव है |
जहाँ तकहम देख पाते हैं, आपकी उपस्थिति हरएक के लिए सुख-समृद्द्धि लाती है |
इसके परे, कोई भीआपके कार्यकलापों को नहीं समझ सकता |
हम इतना ही देख सकते हैं, इससे अधिक कुछ भीनहीं |
श्रीशुक उवाचतद्वीक्ष्य व्यसनं तासां कृपया भूशपीडितः |
सर्वभूतसुहृद्देव इृदमाह सतीं प्रियाम् ॥
३६॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; तत्--यह स्थिति; वीक्ष्य--देखकर; व्यसनम्--खतरनाक, भयानक;तासाम्--सारे देवताओं की; कृपया--कृपा के कारण; भूश-पीडितः--अत्यधिक दुखी; सर्व-भूत-सुहृत्--सारे जीवों के मित्र;देवः--महादेव ने; इदम्--यह; आह--कहा; सतीम्--सती देवी से; प्रियाम्ू-- अपनी अत्यन्त प्रिय पत्नी को |
श्रील शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : शिवजी सारे जीवों के प्रति सदैव उपकारी हैं |
जबउन्होंने देखा कि सारे जीव विष के सर्वत्र फैलने के कारण अत्यधिक उद्दिग्न हैं, तो वे अत्यन्तदयाद््र हो उठे |
अतः उन्होंने अपनी नित्य संगिनी सती से इस प्रकार कहा |
श्रीशिव उवाच अहो बत भवान्येतत्प्रजानां पश्य वैशसम् |
क्षीरोदमथनोद्धूतात्कालकूटादुपस्थितम् ॥
३७॥
श्री-शिव: उवाच-- श्री शिव ने कहा; अहो बत--कितनी दयनीय है; भवानि--हे प्राणप्यारी भवानी; एतत्--यह स्थिति;प्रजानामू--सारे जीवों की; पश्य--देखो तो; वैशसम्-- अत्यन्त भयानक; क्षीर-उद--क्षीरसागर के; मथन-उद्धूतात्ू--मन्थन सेउत्पन्न; कालकूटात्--विष उत्पन्न होने से; उपस्थितम्--वर्तमान स्थिति
शिवजी ने कहा : हे प्रिय भवानी! जरा देखो तो किस तरह ये सारे जीव क्षीरसागर के मन्थनसे उत्पन्न विष के कारण संकट में पड़ गये हैं! आसां प्राणपरीप्सूनां विधेयमभयं हि मे |
एतावान्हि प्रभोरर्थो यद्दीनपरिपालनम् ॥
३८ ॥
आसामू--ये सारे जीव; प्राण-परीप्सूनामू--अपने जीवन की रक्षा के लिए अत्यन्त उत्सुक; विधेयमू--कुछ न कुछ करनाचाहिए; अभयम्ू--सुरक्षा; हि--निस्सन्देह; मे--मेरे द्वारा; एतावान्ू--इतना; हि--निस्सन्देह; प्रभो: --प्रभु का; अर्थ:--कर्तव्य;यत्--जो; दीन-परिपालनम्--पीड़ित मानवता को सुरक्षा प्रदान करना |
जीवन-संर्घष में लगे समस्त जीवों को सुरक्षा प्रदान करना मेरा कर्तव्य है |
निश्चय ही स्वामीका कर्तव्य है कि वह पीड़ित अधीनस्थों की रक्षा करे |
प्राणै: स्वै: प्राणिन: पान्ति साधव: क्षणभट्ठुरैः |
बद्धवैरेषु भूतेषु मोहितेष्वात्ममायया ॥
३९॥
प्राणै:--प्राणों से; स्वै:-- अपने; प्राणिन:-- अन्य जीवों की; पान्ति--रक्षा करते हैं; साधव:--भक्तगण; क्षण-भद्ठैरैः ज-नाशवान; बद्ध-वैरेषु--व्यर्थ ही शत्रुता में लगे; भूतेषु--जीवों में; मोहितेषु--मोह ग्रस्त; आत्म-मायया-- भगवान् को बहिरंगाशक्ति द्वारा
भगवान् की माया से मोहग्रस्त सामान्य लोग सदैव एक दूसरे के प्रति शत्रुता में लगे रहते हैं |
किन्तु भक्तगण अपने नश्वर शरीरों को भी संकट में डालकर उनकी रक्षा करने का प्रयास करतेहैं |
पुंसः कृपयतो भद्रे सर्वात्मा प्रीयते हरि: |
प्रीते हरौ भगवति प्रीयेडहं सचराचर: |
तस्मादिदं गरं भुझ्ले प्रजानां स्वस्तिरस्तु मे ॥
४०॥
पुंसः--मनुष्य के साथ; कृपयत:--परोपकार में लगा; भद्रे--हे भद्र भवानी; सर्व-आत्मा--परमात्मा; प्रीयते--प्रसन्न होते हैं;हरिः-- भगवान्; प्रीते--अपनी प्रसन्नता के कारण; हरौ--हरि; भगवति-- भगवान् में; प्रीये-- प्रसन्न होता हूँ; अहम्--मैं; स-चर-अचरः--समस्त चर तथा अचर प्राणियों से; तस्मातू--इसलिए; इृदम्--यह; गरम्--विष; भुझ्ले--पीने दो; प्रजानाम्--जीवों का; स्वस्तिः--कल्याण; अस्तु--हो; मे--मेरे द्वारा
हे मेरी भद्र पली भवानी! जब कोई अन्यों के लिए उपकार के कार्य करता है, तो भगवान्हरि अत्यधिक प्रसन्न होते हैं और जब भगवान् प्रसन्न होते हैं, तो मैं भी अन्य सारे प्राणियों केसाथ अत्यधिक प्रसन्न होता हूँ |
अतएव मुझे यह विष पीने दो क्योंकि मेरे कारण सारे जीव इसप्रकार सुखी हो सकेंगे |
श्रीशुक उबाचएवमामन्त्रय भगवान्भवानीं विश्वभावन: |
तद्ठिषं जग्धुमारेभे प्रभावज्ञान्वयमोदत ॥
४१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; आमन््रय--सम्बोधित करके; भगवान्--शिवजी;भवानीम्-- भवानी को; विश्व-भावन: --सारे विश्व के शुभचिन्तक; तत् विषम्--उस विष को; जग्धुम्--पीना; आरेभे-- प्रारम्भकिया; प्रभाव-ज्ञा--शिवजी की सामर्थ्य को भलीभाँति जानने वाली माता भवानी ने; अन्वमोदत--अनुमति दी |
श्रील शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : इस प्रकार भवानी को सूचित करके शिवजी वहविष पीने लगे और भवानी ने उन्हें ऐसा करने की अनुमति दे दी क्योंकि वे शिवजी की क्षमताओंको भलीभाँति जानती थीं |
ततः करतलीकृत्य व्यापि हालाहलं विषम् |
अभक्षयन्महादेव: कृपया भूतभावन: ॥
४२॥
ततः--तत्पश्चात्; करतली-कृत्य--हाथ में लेकर; व्यापि--विस्तृत; हालाहलम्--हालाहल नामक; विषम्--विष को;अभक्षयत्--पी लिया; महा-देव:--शिवजी ने; कृपया--कृपा करके; भूत-भावन:--सारे जीवों के कल्याण हेतु
तत्पश्चात् मानवता के लिए शुभ तथा उपकारी कार्य में समर्पित शिवजी ने कृपा करके साराविष अपनी हथेली में रखा और वे उसे पी गये |
तस्यापि दर्शयामास स्ववीर्य जलकल्मष: |
यच्चकार गले नीलं तच्च साधोर्विभूषणम् ॥
४३॥
तस्य--शिवजी की; अपि-- भी; दर्शबाम् आस--प्रदर्शित किया; स्व-वीर्यम्--अपनी शक्ति; जल-कल्मष:--जल से उत्पन्नवह विष; यत्--जो; चकार--बनाया; गले--गर्दन में; नीलम्--नीली रेखा; तत्--वह; च-- भी; साधो: --साधुपुरुष का;विभूषणम्--आभूषण, गहना |
अपयश्ञ के कारण क्षीरसागर से उत्पन्न विष ने मानो अपनी शक्ति का परिचय शिवजी केगले में नीली रेखा बनाकर दिया हो |
किन्तु अब वही रेखा भगवान् का आभूषण मानी जाती है |
तप्यन्ते लोकतापेन साधव: प्रायशो जना: |
परमाराधनं तद्द्धि पुरुषस्याखिलात्मन: ॥
४४॥
तप्यन्ते--स्वेच्छा से कष्ट उठाते हैं; लोक-तापेन--सामान्य लोगों के कष्ट के कारण; साधव:--साधुपुरुष; प्रायशः--प्राय:,सदैव; जना:--ऐसे पुरुष; परम-आराधनम्--पूजा की सर्वोच्च विधि; तत्ू--वह कार्य; हि--निस्सन्देह; पुरुषस्थ--परम पुरुषका; अखिल-आत्मन:--जो सबका परमात्मा है |
कहा जाता है कि सामान्य लोगों के कष्टों के कारण महापुरुष सदैव स्वेच्छा से कष्ट भोगनास्वीकार करते हैं |
प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में स्थित भगवान् के पूजने की यह सर्वोच्च विधि मानीजाती है |
निशम्य कर्म तच्छम्भोर्देवदेवस्य मीढुष: |
प्रजा दाक्षायणी ब्रह्मा वैकुण्ठश्न शशंसिरे ॥
४५॥
निशम्य--सुनकर; कर्म--कार्य; तत्--वह; शम्भो:--शिवजी का; देव-देवस्थ--देवताओं के भी आराध्य; मीढुष: --सामान्यलोगों को बड़े-बड़े वरदान देने वाले; प्रजा:--लोग; दाक्षायणी--दक्षपुत्री भवानी; ब्रह्मा--ब्रह्माजी ने; बैकुण्ठ: च--तथाविष्णु ने भी; शशंसिरे--अत्यधिक प्रशंसा की |
इस कार्य को सुनकर भवानी ( दक्षकन्या ), ब्रह्मा, विष्णु समेत सामान्य लोगों ने देवताओंद्वारा पूजित और लोगों को वरदान देने वाले शिवजी के इस कार्य की अत्यधिक प्रशंसा की |
प्रस्कन्न॑ पिबतः पाणेर्यत्किल्धिजगृहुः सम तत् |
वृश्चिकाहिविषौषध्यो दन्दशूकाश्व येउपरे ॥
४६॥
प्रस्कन्नमू--इधर-उधर फैला हुआ; पिबतः--शिवजी द्वारा पीते समय; पाणे:--हथेली से; यत्--जो; किल्चित्-- थोड़ा सा;जगृहुः--पी लेने का अवसर पाया; स्म--निस्सन्देह; तत्ू--वह; वृश्चिक--बिच्छू; अहि--सर्प; विष-औषध्य: --विषैली दवाएँ;दन्दशूका: च--तथा वे जानवर जिनका दंश विषैला होता है; ये--जो; अपरे--अन्य जीव |
जब शिवजी विषपान कर रहे थे उस समय उनके हाथ से जो थोड़ा सा विष गिरकर छितरगया उसे बिच्छू, सर्प, विषैली औषधियाँ तथा अन्य पशु जिनका दंश विषैला होता है पी गए |
