← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 8 की सूची
अध्याय पाँच: देवता सुरक्षा के लिए भगवान से अपील करते हैं
8.5श्रीशुक उवाचराजब्ुदितमेतत्ते हरे: कर्माघनाशनम् |
गजेन्द्रमोक्षणं पुण्य रैवतं त्वन्तरं श्रूणु ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; राजन्ू--हे राजा; उदितम्--पहले ही वर्णन किया जा चुका; एतत्--यह;ते--तुमसे; हरेः-- भगवान् का; कर्म--कर्म; अघध-नाशनम्--जिसे सुनकर मनुष्य सारे पापों से मुक्त हो सकता है; गजेन्द्र-मोक्षणम्--गजेन्द्र के मोक्ष को; पुण्यम्--सुनने तथा वर्णन करने में अत्यन्त पवित्र; रैवतम््--रैवत मनु के विषय में; तु--लेकिन; अन्तरम्--इस युग में; श्रुणु--कृपया मुझसे सुनो |
श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे राजा! मैंने तुमसे गजेन्द्रमोक्षण लीला का वर्णनकिया है, जो सुनने में अत्यन्त पवित्र है |
भगवान् की ऐसी लीलाओं के विषय में सुनकर मनुष्यसारे पापों के फलों से छूट सकता है |
अब मैं रैवत मनु का वर्णन कर रहा हूँ, कृपया उसे सुनो |
पञ्ञमो रैवतो नाम मनुस्तामससोदरः |
बलिविन्ध्यादयस्तस्य सुता हार्जुनपूर्वका: ॥
२॥
पश्मचमः--पाँचवाँ; रैवत:--रैवत; नाम--नामक; मनु:--मनु; तामस-सोदरः --तामस मनु का भाई; बलि--बलि; विन्ध्य--विन्ध्य; आदय:--इत्यादि; तस्थ--उसके; सुता:--पुत्र; ह--निश्चय ही; अर्जुन--अर्जुन; पूर्वका:--इनके पुत्रों में प्रधानतामस मनु का भाई रैवत पाँचवाँ मनु था |
उसके पुत्रों में अर्जुन, बलि तथा विन्ध्य प्रमुख थे |
विभुरिन्द्र: सुरगणा राजन्भूतरयादय: |
हिरण्यरोमा वेदशिरा ऊर्ध्वबाह्नादयो द्विजा: ॥
३॥
विभु:--विशभु; इन्द्र:--स्वर्ग का राजा; सुर-गणा:--देवता; राजन्--हे राजा; भूतरय-आदय: -- भूतरय आदि; हिरण्यरोमा--हिरण्यरोमा; वेदशिरा--वेदशिरा; ऊर्ध्वबाहु--ऊर्ध्वबाहु; आदय: --इ त्यादि; द्विजा:--ब्राह्मण या सातों लोकों के ऋषि |
हे राजा! रैवत मनु के युग में स्वर्ग का राजा ( इन्द्र ) विभु था, देवताओं में भूतरय इत्यादि थेऔर सप्त लोकों के अधिपति सात ब्राह्मण हिरण्यरोमा, वेदशिरा तथा ऊर्ध्वबाहु इत्यादि थे |
पतली विकुण्ठा शुभ्रस्य वैकुण्ठै: सुरसत्तमै: |
तयोः स्वकलया जज्ने वैकुण्ठो भगवान्स्वयम् ॥
४॥
पत्ली--पत्नी; विकुण्ठा--विकुण्ठा नाम की; शुभ्रस्य--शुभ्र की; बैकुण्ठै:--वैकुण्ठों सहित; सुर-सत्-तमैः --देवताओं केसाथ; तयो:--विकुण्ठा तथा शुभ्र से; स््व-कलया--स्वांश से; जज्ञे--प्रकट हुआ; बैकुण्ठ:-- भगवान्; भगवान्-- भगवान्;स्वयम्--साक्षात् |
शुभ्र तथा उसकी पत्नी विकुण्ठा के संयोग से भगवान् वैकुण्ठ अपने स्वांश देवताओं सहितप्रकट हुए |
वैकुण्ठ: कल्पितो येन लोको लोकनमस्कृतः |
रमया प्रार्थ्यमानेन देव्या तत्प्रियकाम्यया ॥
५॥
वैकुण्ठ:--वैकुण्ठ लोक; कल्पित:--बनाया गया; येन--जिसके द्वारा; लोक:--लोक; लोक-नमस्कृत:--सभी लोकों द्वारा'पूजित; रमया--रमा, धन की देवी द्वारा; प्रार्थ्यमानेन--प्रार्थना किये जाने पर; देव्या--देवी द्वारा; तत्ू--उसको; प्रिय-काम्यया--प्रसन्न करने के लिए |
धन की लक्ष्मी ( रमा ) को प्रसन्न करने के लिए भगवान् वैकुण्ठ ने उनकी प्रार्थना पर एकअन्य वैकुण्ठ लोक की रचना की जो सब के द्वारा पूजा जाता है |
तस्यानुभावः कथितो गुणाश्र परमोदया: |
भौमान्रेणूज्स विममे यो विष्णोर्वर्णयेद्गुणान् ॥
६॥
तस्य--वैकुण्ठ के रूप में प्रकट होने वाले भगवान् को; अनुभाव:--महान् कार्यकलाप; कथित:--बताये जा चुके; गुणा:--दिव्य गुण; च-- भी; परम-उदया: -- अत्यन्त यशस्वी; भौमान्--पृथ्वी के; रेणूनू--कण; सः--जो कोई; विममे--गिन सकताहै; यः--ऐसा पुरुष; विष्णो:--विष्णु के; वर्णयेत्ू--गिन सकता है; गुणान्ू--दिव्य गुणों को |
यद्यपि भगवान् के विविध अवतारों के महान् कार्यों तथा दिव्य गुणों का अदभुत रीति सेवर्णन किया जाता है, किन्तु कभी-कभी हम उन्हें नहीं समझ पाते |
किन्तु भगवान् विष्णु केलिए सब कुछ सम्भव है |
यदि कोई ब्रह्माण्ड के सारे परमाणुओं को गिन सके तो वह भगवान्के गुणों की गणना कर सकता है |
किन्तु ऐसा कर पाना सम्भव नहीं है |
अतः कोई भी भगवान्के दिव्य गुणों को नहीं गिन सकता |
षष्ठश्न चक्षुष: पुत्रश्चाक्षुषो नाम वै मनु: |
पूरुपूरुषसुद्युम्नप्रमुखा श्ाक्षुषात्मजा: ॥
७॥
षष्ठ:--छठा; च--तथा; चक्षुष:--चक्षु का; पुत्र:--पुत्र; चाक्षुष:--चाक्षुष; नाम--नामक; बै--निस्सन्देह; मनु;:--मनु; पूरू--पूरु; पूरूष--पूरुष; सुद्युम्न--सुद्युम्न; प्रमुखा: --प्रमुख; चाक्षुष-आत्म-जा:--चाक्षुष के पुत्र |
चक्षु का पुत्र चाक्षुप कहलाया जो छठा मनु था |
उसके कई पुत्र थे जिनमें पूरु, पूरुष तथासुद्युम्न प्रमुख थे |
इन्द्रो मन्त्रद्गमस्तत्र देवा आप्यादयो गणा: |
मुनयस्तत्र वै राजन्हविष्मद्वीरकादय: ॥
८॥
इन्द्र: --स्वर्ग का राजा; मन्त्रद्गुम:--मंत्रद्रम नाम का; तत्र--छठे मन्वन्तर में; देवा:--देवतागण; आप्य-आदय: --आप्य तथाअन्य; गणा:--वह सभा; मुनय:--सप्तर्षि; तत्र--वहाँ; वै--निस्सन्देह; राजन्--हे राजा; हविष्मत्--हविष्मान् नाम का;वीरक-आदय:--वीरक तथा अन्य
चाक्षुष मनु के राज्यकाल में स्वर्ग का राजा मंत्रद्रुम के नाम से विख्यात था |
देवताओं मेंआप्यगण तथा सप्तर्षियों में हविष्मान् तथा वीरक प्रमुख थे |
तत्रापि देवसम्भूत्यां वैराजस्थाभवत्सुत: |
अजितो नाम भगवानंशेन जगत: पति: ॥
९॥
तत्र अपि--पुनः उसी छठे मन्वन्तर में; देवसम्भूत्याम्ू--देवसम्भूति से; वैराजस्य--उसके पति वैराज का; अभवत्--हुआ;सुतः--पुत्र; अजित: नाम--अजित नामक; भगवानू-- भगवान्; अंशेन-- अंश से; जगत: पति:--ब्रह्माण्ड का स्वामी |
इस छठे मन्वन्तर में ब्रह्माण्ड के स्वामी भगवान् विष्णु अपने अंश रूप में प्रकट हुए |
वेवैराज की पली देवसम्भूति के गर्भ से उत्पन्न हुए और उनका नाम अजित था |
पयोधि येन निर्मथ्य सुराणां साधिता सुधा |
भ्रममाणोम्भसि धृतः कूर्मरूपेण मन्दर: ॥
१०॥
पयोधिम्--क्षीर सागर; येन--जिसके द्वारा; निर्मथ्य--मथा जाकर; सुराणाम्--देवताओं का; साधिता--उत्पन्न किया; सुधा--अमृत; भ्रममाण:--इधर-उधर भ्रमण करते हुए; अम्भसि--जल के भीतर; धृतः--टिका हुआ था; कूर्म-रूपेण--कछुबे केरूप में; मन्दर:--मन्दर पर्वत |
क्षीरसागर का मंथन करके अजित ने देवताओं के लिए अमृत उत्पन्न किया |
कछुवे के रूपमें वे महान् मन्दर पर्वत को अपनी पीठ पर धारण किये इधर-उधर हिल-डुल रहे थे |
श्रीराजोबवाचयथा भगवता ब्रह्मन्मथित: क्षीरसागर: ॥
यदर्थ वा यतश्चाद्रिं दधाराम्बुचरात्मना ॥
११॥
यथामृतं सुरैः प्राप्त कि चान्यदभवत्ततः |
एतद्धगवतः कर्म वदस्व परमाद्धुतम् ॥
१२॥
श्री-राजा उवाच--राजा परीक्षित ने प्रश्न किया; यथा--जिस तरह; भगवता-- भगवान् के द्वारा; ब्रह्मनू--हे विद्वान ब्राह्मण;मथितः--मथा गया; क्षीर-सागर:--दूध का सागर; यतू-अर्थम्--क्या उद्देश्य था; वा--अथवा; यत:--जहाँ से, किस कारणसे; च--तथा; अद्विम्ू--पर्वत को ( मन्दर ); दधार-- धारण किया; अम्बुचर-आत्मना--कछुवे के रूप में; यथा--जिस तरह;अमृतम्--अमृत; सुरैः--देवताओं द्वारा; प्राप्तम्--प्राप्त किया गया था; किम्--क्या; च--तथा; अन्यत्--दूसरा; अभवत्--बन गया; ततः--तत्पश्चात्; एतत्ू--ये सभी; भगवत:--भगवान् के; कर्म--कार्यकलाप, लीलाएँ; वदस्व--कृपा करकेबतलायें; परम-अद्भुतम्--जो इतने अद्भुत हैं
राजा परीक्षित ने पूछा : हे परम ब्राह्मण, शुकदेव गोस्वामी! भगवान् विष्णु ने क्षीरसागर कामंथन क्यों और कैसे किया? वे कच्छप रूप में जल के भीतर किसलिए रहे और मन्दर पर्वत कोक्यों धारण किये रहे ? देवताओं ने किस तरह अमृत प्राप्त किया? और सागर मन्थन से अन्यकौन-कौन सी वस्तुएँ उत्पन्न हुईं? कृपा करके भगवान् के इन सारे अद्भुत कार्यों का वर्णनकरें |
त्वया सड्डृथ्यमानेन महिम्ना सात्वतां पते: |
नातितृप्यति मे चित्तं सुचिरं तापतापितम् ॥
१३॥
त्वया--आपके द्वारा; सद्भुध्यमानेन--वर्णन किया जा रहे; महिम्ना--सारी महिमा से; सात्वताम् पते: --भक्तों के स्वामी,भगवान् का; न--नहीं; अति-तृप्यति--अत्यधिक तुष्ट होता है; मे--मेरा; चित्तम्ू--हृदय; सुचिरम्--दीर्घकाल तक; ताप--दुख से; तापितम्--दुखित होकर |
मेरा हृदय भौतिक जीवन के तीन तापों से विचलित है, किन्तु वह अब भी आपके द्वारावर्णित किये जा रहे भक्तों के स्वामी भगवान् के यशस्वी कार्यकलापों को सुनकर तृप्त नहींहुआ है |
श्रीसूत उवाचसम्पृष्टो भगवानेवं द्वैपायनसुतो द्विजा: |
अभिनन्द्य हरेवीर्यमभ्याच॒ष्टूं प्रचक्रमे ॥
१४॥
श्री-सूतः उबाच-- श्रीसूत गोस्वामी ने कहा; सम्पृष्ट:--पूछे जाने पर; भगवान्--शुकदेव गोस्वामी ने; एवम्--इस प्रकार;द्वैषायन-सुतः--व्यासदेव के पुत्र; द्वि-जा:--यहाँ पर समवेत ब्राह्मण; अभिनन्द्य--महाराज को बधाई देकर; हरे: वीर्यम्ू--भगवान् के यश को; अभ्याच्ष्टम-वर्णन करने के लिए; प्रचक्रमे--प्रयास किया |
श्रीसूत गोस्वामी ने कहा : यहाँ नैमिषारण्य में एकत्रित हे विद्वान ब्राह्मणो! जब द्वैपायन पुत्रशुकदेव गोस्वामी से राजा ने इस तरह से प्रश्न पूछा तो उन्होंने राजा को बधाई दी और भगवान्के यश को और भी आगे वर्णन करने का प्रयास किया |
श्रीशुक उवाचयदा युद्धेसुरैर्देवा बध्यमाना: शितायुधैः |
गतासवो निपतिता नोत्तिष्टेरन्स्म भूरिश: ॥
१५॥
यदा दुर्वास: शापेन सेन्द्रा लोकास्त्रयो नूप |
निःश्रीका श्चाभवंस्तत्र नेशुरिज्यादय: क्रिया: ॥
१६॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; यदा--जब; युद्धे--युद्ध में; असुरैः:--असुरों द्वारा; देवा:--देवतागण;बध्यमाना:--बाँधे गये; शित-आयुधैः--सर्प-आयुधों द्वारा; गत-आसवः:--प्रायः मृत; निपतिता:--गिरे हुए कुछ लोग; न--नहीं; उत्तिष्ठरनू--पुनः उठ पाये; स्म--ऐसे हो गये; भूरिश:--उनमें से अधिकांश; यदा--जब; दुर्वास:--दुर्वासा मुनि के;शापेन--शाप से; स-इन्द्रा:--इन्द्र समेत; लोका: त्रयः--तीनों लोक; नृप--हे राजा; नि: भ्रीका:--बिना किसी भौतिक ऐश्वर्यके; च-- भी; अभवनू--हो गया; तत्र--उस समय; नेशु:--सम्पन्न नहीं हो सका; इज्य-आदय: --यज्ञ; क्रिया:--अनुष्ठान
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब असुरों ने अपने-अपने सर्प-आयुधों से युद्ध में देवताओंपर घमासान आक्रमण कर दिया तो अनेक देवता धराशायी हो गये और मर गये |
वे फिर सेजीवित नहीं किये जा सके |
हे राजा! उस समय देवताओं को दुर्वासा मुनि ने शाप दिया हुआ था,तीनों लोक दरिद्रता से पीड़ित थे; इसीलिए अनुष्ठान सम्पन्न नहीं हो पा रहे थे |
इसके प्रभावअत्यन्त गम्भीर थे |
निशाम्यैतत्सुरगणा महेन्द्रवरूणादय: |
नाध्यगच्छन्स्वयं मन्त्रैमन्त्रयन्तो विनिश्चितम् ॥
१७॥
ततो ब्रह्मसभां जम्मुर्मेरोर्मूर्धनि सर्वशः |
सर्व विज्ञापयां चक्कु: प्रणता: परमेष्ठिने ॥
१८ ॥
निशाम्य--सुनकर; एतत्--यह घटना; सुर-गणा:ः --सारे देवता; महा-इन्द्र--राजा इन्द्र; वरुण-आदय:--वरुण तथा अन्यदेवता; न--नहीं; अध्यगच्छन्--पहुँचे; स्ववम्--साक्षात्; मन्त्रै:--मंत्रणा द्वारा, आपसी विचार-विमर्श करके; मन्त्रयन्त:--विचार-विमर्श करते हुए; विनिश्चितम्--असली निष्कर्ष; ततः--तत्पश्चात्; ब्रह्य-सभाम्--ब्रह्माजी की सभा में; जग्मु:--गये;मेरो:--सुमेरु पर्वत की; मूर्धनि--चोटी पर; सर्वश: --सबों ने; सर्वम्--सारी बातें; विज्ञापयाम् चक्रु:--सूचित किया;'प्रणताः:--नमस्कार किया; परमेष्ठटिने--ब्रह्मा को |
अपने जीवनों को ऐसी स्थिति में देखकर इन्द्र, वरुण तथा अन्य देवताओं ने परस्पर विचार-विमर्श किया, किन्तु उन्हें कोई हल न मिल सका |
तब सारे देवता एकत्र हुए और वे एकसाथसुमेरु पर्वत की चोटी पर गये |
वहाँ पर ब्रह्म जी की सभा में सब ने ब्रह्मा जी को साष्टांग प्रणाम किया और जितनी सारी घटनाओं से अवगत कराया |
स विलोक्येन्द्रवाय्वादीन्नि:सत्त्वान्विगतप्रभान् |
लोकानमड्ढनलप्रायानसुरानयथा विभु: ॥
१९॥
समाहितेन मनसा संस्मरन्पुरुषं परम् |
उवाचोत्फुल्लवदनो देवान्स भगवान्पर: ॥
२०॥
सः--ब्रह्मा ने; विलोक्य--देखकर; इन्द्र-वायु-आदीन्--इन्द्र, वायु इत्यादि देवताओं को; निःसत्त्वानू--आध्यात्मिक शक्ति सेविहीन; विगत-प्रभान्--सारे तेज से रहित; लोकान्--तीनों लोकों को; अमड्रगल-प्रायान्--दुर्भाग्य में डूबे; असुरान्--सारेअसुरों को; अयथा:--समृद्द्धि वाले; विभु:--ब्रह्मा, जो इस जगत में परम हैं; समाहितेन--पूरी तरह समंजित करके; मनसा--मन से; संस्मरनू--पुनः पुनः स्मरण करके; पुरुषम्--परम पुरुष को; परम्--दिव्य; उवाच--कहा; उत्फुल्ल-वदनः--प्रसन्नमुख; देवान्ू--देवताओं को; सः--वह; भगवान्--अत्यन्त शक्तिशाली; पर: --देवताओं का |
यह देखकर कि सारे देवता प्रभावहीन तथा बलहीन हो गये हैं जिसके फलस्वरूप तीनोंलोक अमंगलमय हो चुके हैं तथा यह देखकर कि देवताओं की स्थिति अटपटी है, किन्तुअसुरगण फल-फूल रहे हैं ब्रह्म ने, जो समस्त देवताओं के ऊपर हैं और अत्यन्त शक्तिशाली हैंअपना मन भगवान् पर केन्द्रित किया |
इस प्रकार प्रोत्साहित होने से उनका मुख चमक उठा औरवे देवताओं से इस प्रकार बोले |
अहं भवो यूयमथोसुरादयोमनुष्यतिर्यग्द्रुमघर्मजातय: |
यस्यावतारांशकलाविसर्जिताब्रजाम सर्वे शरणं तमव्ययम् ॥
२१॥
अहम्-मैं; भव: --शिवजी; यूयम्--तुम सारे देवता; अथो--तथा; असुर-आदय:--असुर इत्यादि; मनुष्य--मनुष्य; तिर्यक् --पशु; द्रुम--वृक्ष एवं पौधे; घर्म-जातय:--पसीने से उत्पन्न कीड़े-मकोड़े; यस्य--जिस ( भगवान् ) का; अवतार--पुरुष अवतारका; अंश--उनके अंश, गुण अवतार, ब्रह्म का; कला--ब्रह्मा के पुत्रों का; विसर्जिता:--पीढ़ी दर पीढ़ी उत्पन्न; ब्रजाम--जायेंगे; सर्वे--हम सभी; शरणम्--शरण में; तम्--उस; अव्ययम्--अव्यय ब्रह्म की |
ब्रह्मजी ने कहा : मैं, शिवजी, तुम सारे देवता, असुर, स्वेदज प्राणी, अण्डज, पृथ्वी सेउत्पन्न पेड़-पौधे तथा भ्रूण से उत्पन्न सारे जीव--सभी भगवान् से उन के रजोगुण अवतार( ब्रह्मा, गुणअवतार ) से तथा ऋषियों से जो मेरे ही अंश हैं |
अतएव हम सभी उन भगवान् केपास चलें और उनके चरणकमलों की शरण ग्रहण करें |
नथस्थ बव्या न च रक्षणायानोपेक्षणीयादरणीयपक्ष: |
तथापि सर्गस्थितिसंयमार्थधत्ते रज:सत्त्वतमांसि काले ॥
२२॥
न--नहीं; यस्य--जिसके ( भगवान् ) द्वारा; वध्य:--मारा जाने वाला; न--न तो; च--भी; रक्षणीय:--रक्षा का पात्र; न--नतो; उपेक्षणीय--उपेक्षणीय; आदरणीय--पूजनीय; पक्ष: --अंश; तथापि--फिर भी; सर्ग--सृष्टि; स्थिति--पालन; संयम--तथा संहार; अर्थम्--के लिए; धत्ते--स्वीकार करता है; रज:--रजोगुण; सत्त्व--सतोगुण; तमांसि--तथा तमोगुण को;काले--समय आने पर
भगवान् के लिए न तो कोई वध्य है, न रक्षणीय, न उपेक्षणीय और न पूजनीय |
फिर भीसमयानुसार सृष्टि, पालन तथा संहार के लिए वे सतो, रजो या तमो गुण में विभिन्न रूपों मेंअवतार लेना स्वीकार करते हैं |
अयं च तस्य स्थितिपालनक्षण:सत्त्वं जुषाणस्य भवाय देहिनाम् |
तस्मादव्रजामः शरणं जगदगुरूस्वानां स नो धास्यति शं सुरप्रियः ॥
२३॥
अयमू--यह अवधि; च--भी; तस्य-- भगवान् की; स्थिति-पालन- क्षण: --पालन या अपना शासन स्थापित करने का समय;सत्त्वमू--सतोगुण; जुषाणस्थ--( अब बिना प्रतीक्षा किये ) स्वीकार करते हुए; भवाय--अधिक उन्नति के लिए; देहिनाम्ू--भौतिक शरीरधारियों का; तस्मात्--इसलिए; ब्रजाम:--जाना चाहिए; शरणम्--शरण में; जगत्-गुरुम्-- भगवान् केचरणकमलों पर, जो संसार भर के गुरु हैं; स्वानामू--हमारा अपना; सः--वह ( भगवान् ); नः--हमको; धास्यति--देगा;शम्--आवश्यक सौभाग्य; सुर-प्रियः--देवताओं को स्वभावत: अत्यन्त प्रिय
देहधारी जीवों के सतोगुण का आह्वान करने का यही अवसर है |
सतोगुण भगवान् केशासन की स्थापना करने के निमित्त होता है, जो सृष्टि के अस्तित्व का पालन करेगा |
अतएवभगवान् की शरण ग्रहण करने के लिए यह उपयुक्त समय है |
चूँकि वे देवताओं पर स्वभावतःअत्यन्त दयालु हैं और उन्हें प्रिय हैं अतएव वे हमें निश्चय ही सौभाग्य प्रदान करेंगे |
श्रीशुक उवाचइत्याभाष्य सुरान्वेधा: सह देवैररिन्दम |
अजितस्य पदं साक्षाज्गाम तमसः परम् ॥
२४॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; आभाष्य--बातें करके; सुरानू--देवताओं को; वेधा: --ब्रह्माण्ड के प्रधान तथा सब को वैदिक ज्ञान प्रदान करने वाले ब्रह्माजी; सह--साथ; देवै:--देवताओं के; अरिम्ू-दम--सारेशत्रुओं ( यथा इन्द्रियों ) का दमन करने वाले, हे महाराज परीक्षित; अजितस्थ--भगवान् के; पदम्ू--स्थान तक; साक्षात्--प्रत्यक्ष; जगाम--गये; तमस:--अंधकार के संसार से; परम्ू--परे |
है समस्त शत्रुओं का दमन करने वाले महाराज परीक्षित! देवताओं से बातें करने के बादब्रह्माजी उन्हें भगवान् के धाम ले गये जो इस भौतिक जगत से परे है |
भगवान् का धाम श्रेतद्वीपनामक टापू में है, जो क्षीर सागर में स्थित है |
तत्रादष्टस्वरूपाय श्रुतपूर्वाय वै प्रभु: |
स्तुतिमब्रूत दैवीभिगीर्भिस्त्ववहितेन्द्रिय: ॥
२५॥
तत्र--वहाँ ( श्वेतद्वीप में ); अदृष्ट-स्वरूपाय-- भगवान् को, जिन्हें ब्रह्मा तक ने नहीं देखा था; श्रुत-पूर्वाय--किन्तु जो वेदों सेसुने गए थे; बै--निस्सन्देह; प्रभु:--ब्रह्माजी; स्तुतिमू--वैदिक वाड्मय से प्राप्त स्तुति; अब्रूत--की गई; दैवीभि:--स्तुतियोंद्वारा, या वैदिक सिद्धान्तों को पालने वाले व्यक्तियों द्वारा; गीर्भि: --ऐसे गीतों या उच्चारणों द्वारा; तु--तब; अवहित-इन्द्रिय:--स्थिरचित्त
वहाँ ( श्वेतद्वीप में ) ब्रह्माजी ने भगवान् की स्तुति की, यद्यपि उन्होंने परमेश्वर को इसके पूर्वकभी नहीं देखा था |
चूँकि उन्होंने वैदिक वाड्मय से भगवान् के विषय में सुना हुआ था अतएवउन्होंने स्थिरचित्त होकर भगवान् की उसी तरह स्तुति की जिस प्रकार वैदिक साहित्य में लिखीहुई या मान्य है |
श्रीब्रह्मोवाचअविक्रियं सत्यमनन्तमाद्ंगुहाशयं निष्कलमप्रतर्क्यम् |
मनोग्रयानं वचसानिरुक्तंनमामहे देववर वरेण्यम् ॥
२६॥
श्री-ब्रह्मा उबाच--ब्रह्माजी ने कहा; अविक्रियम्ू--अविकारी भगवान् को; सत्यम्--परम सत्य; अनन्तम्--अनन्त; आद्यम्--समस्त कारणों के आदि कारण; गुहा-शयम्-प्रत्येक हृदय में उपस्थित; निष्कलम्--शक्ति का ह्ास हुए बिना; अप्रतर्क्यम्--अचिन्त्य, जो भौतिक तर्को की सीमा से परे हैं; मन:-अग्रयानम्--मन से भी अधिक वेगवान्; वचसा--शब्द जाल से;अनिरुक्तम्--अवर्णनीय; नमामहे--हम सभी देवता आपको नमस्कार करते हैं; देव-वरम्--उन परमेश्वर को जिनकी न तो कोईतुलना कर सकता है, न उनसे बढ़कर है; वरेण्यम्--परम पूज्य, जिनकी पूजा गायत्री मंत्र द्वारा की जाती है |
ब्रह्माजी ने कहा : हे परमेश्वर, हे अविकारी, असीम परम सत्य! आप हर वस्तु के उद्गम हैं |
सर्वव्यापी होने के कारण आप प्रत्येक के हृदय में और परमाणु में भी रहते हैं |
आपमें कोई भौतिक गुण नहीं पाये जाते |
निस्सन्देह, आप अचिन्त्य हैं |
मन आपको कल्पना से नहीं ग्रहणकर सकता और शब्द आपका वर्णन करने में असमर्थ हैं |
आप सब के परम स्वामी हैं; अतएवआप हर एक के आराध्य हैं |
हम आपको सादर नमस्कार करते हैं |
विपश्चितं प्राणमनोधियात्मना-मर्थान्द्रयाभासमनिद्रमत्रणम् |
छायातपौ यत्र न गृश्नपक्षौतमक्षरं खं त्रियुगं ब्रजामहे ॥
२७॥
विपश्चितम्--सर्वज्ञ को; प्राण--किस तरह प्राण कार्यशील है; मनः--किस तरह मन कार्यशील है; धिय--किस तरह बुद्धिकार्यशील है; आत्मनाम्--सारे जीवों का; अर्थ--इन्द्रिय-विषय; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; आभासम्--ज्ञान; अनिद्रमू--सदैव जाग्रततथा अज्ञान से मुक्त; अब्रणम्--सुख तथा दुख से प्रभावित होने वाले भौतिक शरीर के बिना; छाया-आतपौ--अज्ञान से दुखीसमस्त लोगों के आश्रय; यत्र--जहाँ; न--नहीं; गृश्च-पक्षौ--किसी भी जीव का पक्षपात; तम्--उसको; अक्षरम्-- अच्युत;खम्--आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त; त्रि-युगम्--तीन युगों ( सत्य, त्रेता तथा द्वापर ) में छह ऐश्वर्यों समेत प्रकट होकर;ब्रजामहे--मैं शरण ग्रहण करता हूँ |
भगवान प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से जानते रहते हैं कि किस प्रकार प्राण, मन तथा बुद्धिसमेत प्रत्येक वस्तु उनके नियंत्रण में कार्य करती है |
वे हर वस्तु के प्रकाशक हैं और अज्ञान उन्हेंछू तक नहीं गया |
उनका भौतिक शरीर नहीं होता जो पूर्वकर्मों के फलों से प्रभावित हो |
वेपक्षपात तथा भौतिकतावादी विद्या के अज्ञान से मुक्त हैं |
अतएव मैं उन भगवान् के चरणकमलोंकी शरण ग्रहण करता हूँ जो नित्य, सर्वव्यापक तथा आकाश के समान विशाल हैं और तीनोंयुगों ( सत्य, त्रेता तथा द्वापर ) में अपने षड्ऐश्वर्यों समेत प्रकट होते हैं |
अजस्य चक्र त्वजयेर्यमाणंमनोमयं पञ्जदशारमाशु |
त्रिनाभि विद्युच्यलमष्टनेमियदक्षमाहुस्तमृतं प्रपद्ये ॥
२८॥
अजस्य--जीव का; चक्रम्-पहिये को ( इस जगत में जन्म-मृत्यु के चक्र को ); तु-लेकिन; अजया--भगवान् की बहिरंगाशक्ति द्वारा; ईर्यमाणम्--अत्यन्त वेग के साथ घूमती हुईं; मनः-मयम्--जो मुख्यतः मन पर आधारित मानसिक सृष्टि केअतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है; पञ्चदश--पन्द्रह; अरम्--तीलियों वाला; आशु--शीघ्र ही; त्रि-नाभि--तीन नाभियों वाला( भौतिक प्रकृति के तीन गुणों वाला ); विद्युत्--बिजली की भाँति; चलम्--गतिमान्; अष्ट-नेमि--आठ नेमियों ( परिधियों ) सेबनी ( भगवान् की आठ बहिरंगा शक्तियाँ, भूमिरापोनलो वायु इत्यादि ); यत्--जो; अक्षम्--धुरी; आहुः--वे कहते हैं; तम्--उनको; ऋतम्--सत्य; प्रपद्ये--हम नमस्कार करें |
भौतिक कार्यों के चक्र में, भौतिक शरीर मानसिक रथ के पहिये जैसा होता है |
दस इन्द्रियाँ(पाँच कर्मेंन्द्रियाँ तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ) तथा शरीर के भीतर के पाँच प्राण मिलकर रथ केपहिये के पन्द्रह अरे ( तीलियाँ ) बनाते हैं |
प्रकृति के तीन गुण ( सत्त्व, रजस् तथा तमस् ) कार्यकलापों के केन्द्रबिन्दु हैं और प्रकृति के आठ अवयव ( पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश,मन, बुद्धि तथा मिथ्या अहंकार ) इस पहिए की बाहरी परिधि बनाते हैं |
बहिरंगा भौतिक शक्तिइस पहिए को विद्युत् शक्ति की भाँति घुमाती है |
इस प्रकार यह पहिया बड़ी तेजी से अपनी धुरीया केन्द्रीय आधार अर्थात् भगवान् के चारों ओर घूमता है, जो परमात्मा तथा चरम सत्य हैं |
हमउन्हें सादर नमस्कार करते हैं |
य एकवर्ण तमस: पर त-दलोकमव्यक्तमनन्तपारम् |
आसां चकारोपसुपर्णमेन-मपासते योगरथेन धीरा: ॥
२९॥
यः--जो भगवान्; एक-वर्णम्--चरम, जो शुद्ध सतोगुणी हैं; तमस:-- भौतिक जगत के अंधकार को; परम्--दिव्य; तत्--वह; अलोकम्--जो देखा नहीं जा सकता; अव्यक्तम्--अप्रकट; अनन्त-पारम्-- असीम, भौतिक काल तथा दिक् की माप केपरे; आसाम् चकार--स्थित; उप-सुपर्णम्--गरुड़ की पीठ पर; एनम्--उनको; उपासते--पूजते हैं; योग-रथेन--योग के यानद्वारा; धीरा:--गम्भीर व्यक्ति, जो भौतिक क्षोभ से अविचलित रहते हैं |
भगवान् शुद्ध सत्त्व में स्थित हैं; अतएवं वे एकवर्ण--ओउड्डार ( प्रणव ) हैं |
चूँकि भगवान्अंधकार माने जाने वाले दृश्य जगत से परे हैं, अतएव वे भौतिक नेत्रों से नहीं दिखते |
फिर भी वेदिक् या काल द्वारा हमसे पृथक् नहीं होते, अपितु वे सर्वत्र उपस्थित रहते हैं |
अपने वाहन गरुड़पर आसीन उनकी पूजा क्षोभ से मुक्ति पा चुके व्यक्तियों के द्वारा योग शक्ति से की जाती है |
हमसभी उनको सादर नमस्कार करते हैं |
न यस्य कश्चातितितर्ति मायां यया जनो मुहाति वेद नार्थम् |
त॑ निर्जितात्मात्मगुणं परेशंनमाम भूतेषु सम॑ चरन्तम् ॥
३०॥
न--नहीं; यस्य--जिसका ( भगवान् का ); कश्च--कोई; अतितितर्ति--जीतने में समर्थ; मायामू--माया को; यया--जिसकेद्वारा ( माया द्वारा ); जन:--सामान्य लोग; मुह्ाति--मोहित हो जाता है; वेद--समझो; न--नहीं; अर्थम्--जीवन लक्ष्य; तम्--उस ( भगवान् ) को; निर्जित--पूरी तरह वशीभूत; आत्मा--जीव; आत्म-गुणम्--तथा उनकी बहिरंगा शक्ति; पर-ईशम्--दिव्यपद पर स्थित भगवान्; नमाम--हम नमस्कार करते हैं; भूतेषु--सारे जीवों मे; समम्--समभाव; चरन्तम्--उन्हें वश में करते याउन पर शासन करते
कोई भी व्यक्ति भगवान् की माया का पार नहीं पा सकता जो इतनी प्रबल होती है कि हरव्यक्ति इससे भ्रमित होकर जीवन के लक्ष्य को समझने की बुद्धि खो देता है |
किन्तु वही मायाउन भगवान् के वश में रहती है, जो सब पर शासन करते हैं और सभी जीवों पर समान दृष्टि रखतेहैं |
हम उन्हें नमस्कार करते हैं |
इमे वयं यत्प्रिययेव तन््वा सत्त्वेन सृष्टा बहिरन्तरावि: |
गतिं न सूक्ष्मामृषयश्न विद्दाहेकुतोसुराद्या इतरप्रधाना: ॥
३१॥
इमे--ये; वयम्--हम ( देवता ); यत्--जिसको ; प्रियया--अत्यन्त प्रिय लगने वाले; एब--निश्चय ही; तन्वा--भौतिक शरीर;सत्त्वेन--सतोगुण से; सृष्टा:--उत्पन्न; बहि:-अन्तः-आवि:--यद्यपि बाहर तथा भीतर से पूर्णतया अवगत; गतिम्ू--लक्ष्य; न--नहीं; सूक्ष्माम्-- अत्यन्त सूक्ष्य; ऋषय:--सन््त पुरुष; च-- भी; विद्यहे--समझते हैं; कुतः--कैसे; असुर-आद्या: --असुर तथानास्तिक; इतर--अन्य नगण्य लोग; प्रधाना: --यद्यपि वे अपने समाज के नेता हैं |
चूँकि हमारे शरीर सत्त्वगुण से निर्मित हैं इसलिए हम देवगण भीतर तथा बाहर से सतोगुणमें स्थित हैं |
सारे सन्त पुरुष भी इसी प्रकार स्थित हैं |
अतएव यदि हम भगवान् को न भी समझसकते हों तो उन नगण्य प्राणियों के विषय में क्या कहा जाये जो रजो तथा तमो गुणों में स्थितहैं? भला वे भगवान् को कैसे समझ सकते हैं ? हम उन भगवान् को सादर नमस्कार करते हैं |
पादौ महीयं स्वकृतैव यस्यचतुर्विधो यत्र हि भूतसर्ग: |
स वै महापूरुष आत्मतन्त्रःप्रसीदतां ब्रह्म महाविभूति: ॥
३२॥
पादौ--उनके चरणकमल; मही--पृथ्वी; इयम्--यह; स्व-कृत--उन्हीं के द्वारा उत्पन्न; एब--निस्सन्देह; यस्य--जिसका;चतु:-विध: --चार प्रकार के जीवों का; यत्र--जहाँ पर; हि--निस्सन्देह; भूत-सर्ग:--भौतिक सृष्टि; सः--वह; बै--निस्सन्देह;महा-पूरुष:--परम पुरुष; आत्म-तन्त्र:--आत्मनिर्भर, आत्माराम; प्रसीदताम्--वे हम पर कृपालु हों; ब्रह्म--महानतम; महा-विभूति:--असीम शक्ति से युक्त |
इस पृथ्वी पर चार प्रकार के जीव हैं और ये सारे के सारे उन्हीं के द्वारा उत्पन्न किये गये हैं |
यह भौतिक सृष्टि उनके चरणकमलों पर टिकी है |
वे एश्वर्य तथा शक्ति से पूर्ण परम पुरुष हैं |
वेहम पर प्रसन्न हों |
अम्भस्तु यद्वेत उदारवीर्य सिध्यन्ति जीवन्त्युत वर्धमाना: |
लोका यतोथाखिललोकपाला:प्रसीदतां नः स महाविभूति: ॥
३३॥
अम्भ:--इस लोक में या अन्य लोकों में दिखने वाली जलराशि; तु--लेकिन; यत्-रेत:--उनका वीर्य; उदार-वीर्यम्ू--इतनाशक्तिशाली; सिध्यन्ति--उत्पन्न किये जाते हैं; जीवन्ति-- जीवित रहते हैं; उत--निस्सन्देह; वर्धभाना:--फूलते-फलते हैं;लोका:ः--तीनों लोक; यत:--जिससे; अथ-- भी; अखिल-लोक-पाला: --ब्रह्माण्ड भर के सारे देवता; प्रसीदताम्--प्रसन्न हों;नः--हम पर; सः--वह; महा-विभूति:-- असीम शक्ति वाला पुरुष
सारा विराट जगत जल से निकला है और जल ही के कारण सारे जीव स्थित हैं, जीवितरहते तथा विकसित होते हैं |
यह जल भगवान् के वीर्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं है |
अतएवइतनी महान् शक्ति वाले भगवान् हम पर प्रसन्न हों |
सोम॑ मनो यस्य समामनन्तिदिवौकसां यो बलमन्ध आयु: |
ईशो नगानां प्रजनः प्रजानांप्रसीदतां नः स महाविभूति: ॥
३४॥
सोममू्--चन्द्रमा; मनः--मन; यस्य--जिस ( भगवान् ) का; समामनन्ति--वे कहते हैं; दिवौकसाम्--उच्चलोक के निवासियोंका; यः--जो; बलम्--बल; अन्ध:--अन्न; आयु: --उप्र; ईशः--पर मे श्वर; नगानाम्--वृक्षों का; प्रजन:--प्रजनन का स्त्रोत;प्रजानाम्--सारे जीवों का; प्रसीदताम्--वे प्रसन्न हों; न:--हम पर; सः--वे भगवान्; महा-विभूतिः--सारे ऐश्वर्यों का स्रोत)सोम ( चन्द्रमा )
समस्त देवताओं के लिए अन्न, बल तथा दीर्घायु का स्त्रोत है |
वह सारीवनस्पतियों का स्वामी तथा सारे जीवों की उत्पत्ति का स्त्रोत भी है |
जैसा कि विद्वानों ने कहा है,चन्द्रमा भगवान् का मन है |
ऐसे समस्त ऐश्वर्यों के स्रोत भगवान् हम पर प्रसन्न हों |
अग्निर्मुखं यस्य तु जातवेदाजात: क्रियाकाण्डनिमित्तजन्मा |
अन्तःसमुद्रेडनुपचन्स्वधातून्प्रसीदतां नः स महाविभूति: ॥
३५॥
अग्निः--अग्नि; मुखम्--मुँह जिससे भगवान् खाते हैं; यस्य--जिसका; तु--लेकिन; जात-वेदा:--सम्पत्ति या जीवन कीसमस्त आवश्यकताओं को उत्पन्न करने वाला; जातः--उत्पन्न किया; क्रिया-काण्ड--अनुष्ठान; निमित्त--के लिए; जन्मा--इसीलिए निर्मित; अन्तः-समुद्रे--समुद्र की गहराई में; अनुपचन्--सदैव पचाते हुए; स्व-धातून्--सारे तत्त्वों को; प्रसीदताम्--प्रसन्न हों; न:--हम पर; स:ः--वह; महा-विभूति:--परम शक्तिशाली
अनुष्ठानों की आहुति ग्रहण करने के लिए उत्पन्न अग्नि भगवान् का मुख है |
सागर कीगहराइयों के भीतर भी सम्पत्ति उत्पन्न करने के लिए अग्नि रहती है और उदर में भोजन पचाने केलिए तथा शरीर पालन हेतु विभिन्न स्त्रावों को उत्पन्न करने के लिए भी अग्नि उपस्थित रहती है |
ऐसे परम शक्तिमान भगवान् हम पर प्रसन्न हों |
यच्चक्षुरासीत्तरणिरद्देवयानंअ्रयीमयो ब्रह्मण एष धिष्ण्यम् |
द्वारं च मुक्तेरमृतं च मृत्यु:प्रसीदतां नः स महाविभूति: ॥
३६॥
यत्--जो; चक्षुः--आँख; आसीतू्--बना; तरणि:--सूर्यदेव; देव-यानम्--देवताओं के मोक्ष पथ का अधिष्ठाता देव; त्रयी-मयः--कर्मकाण्ड के वैदिक ज्ञान के मार्गदर्शन हेतु; ब्रह्मण: --परम सत्य का; एष:--यह; धिष्ण्यम्--साक्षात्कार का स्थान;द्वारम् च--तथा द्वार; मुक्ते:--मुक्ति के लिए; अमृतमू--नित्य जीवन का मार्ग; च-- भी; मृत्यु:--मृत्यु का कारण; प्रसीदताम्--हम पर प्रसन्न हों; न:--हमपर; सः--वे भगवान्; महा-विभूति:--परम शक्तिशाली |
सूर्यदेव मुक्ति के मार्ग को चिन्हित करते हैं, जो आर्चिरादि वर्त्मकहलाता है |
वे वेदों के ज्ञानके प्रमुख स्त्रोत हैं; वे परम सत्य के पूजे जाने वाले धाम हैं |
वे मोक्ष के द्वार हैं; वे नित्य जीवन केस्रोत हैं; वे मृत्यु के भी कारण हैं |
वे भगवान् की आँख हैं |
ऐसे परम ऐश्वर्यवान् भगवान् हम परप्रसन्न हों |
प्राणादभूद्यस्थ चराचराणांप्राण: सहो बलमोजश्च वायु: |
अन्वास्म सप्राजमिवानुगा वयंप्रसीदतां नः स महाविभूति: ॥
३७॥
प्राणात्--प्राण से; अभूत्--उत्पन्न हुआ; यस्य--जिसका; चर-अचराणाम्--समस्त चर तथा अचर जीवों का; प्राण:--प्राण;सहः--जीवन का मूल सिद्धान्त; बलमू--बल; ओज:--प्राण; च--तथा; वायु:--वायु; अन्वास्म-- अनुसरण करते हैं;सप्राजम्--सप्राट्; इब--सहृश; अनुगा:-- अनुयायी; वयम्--हम सभी; प्रसीदताम्--प्रसन्न हों; न:--हम पर; सः--वह; महा-विभूति:--परम शक्तिशाली |
सारे चर तथा अचर प्राणी अपनी जीवनी शक्ति ( प्राण ), अपनी शारीरिक शक्ति तथा अपनाजीवन तक वायु से प्राप्त करते हैं |
हम सभी अपने प्राण के लिए वायु का उसी तरह अनुसरणकरते हैं जिस प्रकार नौकर राजा का अनुसरण करता है |
वायु की जीवनी शक्ति भगवान् कीमूल जीवनी शक्ति से उत्पन्न होती है |
ऐसे भगवान् हम पर प्रसन्न हों |
श्रोत्राहििशों यस्य हृदश्न खानि प्रजज्ञिरि खं पुरुषस्य नाभ्या: |
प्राणेन्द्रियात्मासुशरी रकेतःप्रसीदतां नः स महाविभूति: ॥
३८॥
श्रोत्रात्ू-कानों से; दिश:--विभिन्न दिशाएँ; यस्य--जिसके ; हृदः--हृदय से; च--भी; खानि--शरीर के छेद; प्रजज्ञिरि--उत्पन्न किया; खम्--आकाश; पुरुषस्थ--परम पुरुष की; नाभ्या:--नाभि से; प्राण--जीवनी शक्ति का; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ;आत्मा--मन; असु--प्राण; शरीर--तथा शरीर; केत:--आश्रय; प्रसीदताम्--प्रसन्न हों; न:--हम पर; सः--वे; महा-विभूतिः--परम शक्तिमान |
परम शक्तिशाली भगवान् हम पर प्रसन्न हों |
विभिन्न दिशाएँ उनके कानों से उत्पन्न होती है,शरीर के छिद्र उनके हृदय से निकलते हैं एवं प्राण, इन्द्रियाँ, मन, शरीर के भीतर की वायु तथाशरीर आश्रय रूपी शून्य ( आकाश ) उनकी नाभि से निकलते हैं |
बलान्महेन्द्रस्त्रिदशा: प्रसादा-न्मन्योर्गिरीशो धिषणाद् विरिज्ञः |
खेम्यस्तुछन्दांस्यृषयो मेढ़ृत: कःप्रसीदतां नः स महाविभूति: ॥
३९॥
बलात्--उनके बल से; महा-इन्द्र:--राजा इन्द्र बन सके; त्रि-दशा: --तथा देवता; प्रसादात्--प्रसन्न होने से; मन््यो:--क्रोध से;गिरि-ईशः--शिवजी; धिषणात्--गम्भीर बुद्धि से; विरिज्ञ:--ब्रह्मा जी; खेभ्य:--शारीरिक छिद्रों से; तु--तथा; छन्दांसि--वैदिक मंत्र; ऋषय:--बड़े-बड़े मुनि; मेढ़त:ः--जननेन्द्रियों से; कः--प्रजापति-गण; प्रसिदताम्--प्रसन्न हों; नः--हम पर;सः--वे; महा-विभूति:--परम शक्तिशाली भगवान्
स्वर्ग का राजा महेन्द्र भगवान् के बल से उत्पन्न हुआ था, देवतागण भगवान् की कृपा सेउत्पन्न हुए थे, शिवजी भगवान् के क्रोध से उत्पन्न हुए थे और ब्रह्माजी उनकी गम्भीर बुद्धि सेउत्पन्न हुए थे |
सारे वैदिक मंत्र भगवान् के शरीर के छिद्रों से उत्पन्न हुए थे तथा ऋषि औरप्रजापतिगण उनकी जननेन्द्रियों से उत्पन्न हुए थे |
ऐसे परम शक्तिशाली भगवान् हम पर प्रसन्न हों! श्रीर्वक्षस: पितरएछाययासन्धर्म: स्तनादितरः पृष्ठतो भूत् |
झौर्यस्य शीष्णों प्सरसो विहारात्प्रसीदतां नः स महाविभूति: ॥
४०॥
श्री:--धन की देवी; वक्षस:--उनके वश्षस्थल से; पितर:--पितृलोक के निवासी; छायया--उनकी छाया से; आसन्--बनसके; धर्म:--धर्म का सिद्धान्त; स्तनात्ू--उनके स्तन से; इतर:--अधर्म ( धर्म का विपरीत ); पृष्ठतः--पीठ से; अभूत्--सम्भवहो सका; दयौ: --स्वर्ग लोक; यस्य--जिसका; शीर्ष्ण:--चोटी से; अप्सरस:--अप्सरोलोक के निवासी; विहारात्ू--उनकेइन्द्रिय भोग से; प्रसीदताम्--कृपया प्रसन्न हों; नः--हम पर; सः--वे ( भगवान् ); महा-विभूति:--समस्त पराक्रम में महानतम
लक्ष्मी उनके वक्षस्थल से उत्पन्न हुई, पितुलोक के वासी उनकी छाया से, धर्म उनके स्तन सेतथा अधर्म उनकी पीठ से उत्पन्न हुआ |
स्वर्ग लोक उनके सिर की चोटी से तथा अप्सराएँ उनकेइन्द्रिय भोग से उत्पन्न हुईं |
ऐसे परम शक्तिमान भगवान् हम पर प्रसन्न हों! विप्रो मुखाद्रह्म च यस्य गुहांराजन्य आसीद्धुजयोर्बलं च |
ऊर्वोर्विडोजोड्प्रिरवेदशूद्रौप्रसीदतां नः स महाविभूति: ॥
४१॥
विप्र:--ब्राह्मण-गण; मुखात्-- भगवान् के मुख से; ब्रह्य--वैदिक साहित्य; च-- भी; यस्य--जिसका; गुहाम्--अपने गुप्तज्ञान से; राजन्य:--क्षत्रियणण; आसीतू--सम्भव हो सका; भुजयो:--उनकी दोनों भुजाओं से; बलम् च--तथा शारीरिकशक्ति; ऊर्वो:--जाँघों से; विटू--वैश्यगण; ओज:--तथा उनका सक्षम उर्वर ज्ञान; अड्ध्रि:--उनके चरणों से; अवेद--वैदिकज्ञान की सीमा से परे रहने वाले; शूद्रौ -- श्रमिक वर्ग; प्रसीदताम्-प्रसन्न हों; न:--हम पर; सः--वे; महा-विभूति:--परमशक्तिमान भगवान्
ब्राह्मण तथा वैदिक ज्ञान भगवान् के मुख से निकले, क्षत्रिय तथा शारीरिक शक्ति उनकीभुजाओं से, वैश्य तथा उत्पादकता एवं सम्पत्ति सम्बन्धी उनका दक्ष ज्ञान उनकी जाँघों से तथावैदिक ज्ञान से विलग रहने वाले शूद्र उनके चरणों से निकले |
ऐसे भगवान्, जो पराक्रम से पूर्णहैं, हम पर प्रसन्न हों |
लोभो<धरात्प्रीतिरुपर्य भूदूदूयुति-न॑स्तः पशव्यः स्पर्शेन काम: |
ध्रुवोर्यम: पक्ष्मभवस्तु काल:प्रसीदतां नः स महाविभूति: ॥
४२॥
लोभ: --लालच; अधरात्--निचले होठ से; प्रीति:--प्यार; उपरि--ऊपरी होठ से; अभूत्--सम्भव हो सका; झ्युति:--शारीरिककान्ति; नस्त:--नाक से; पशव्यः--पशुओं के उपयुक्त; स्पर्शेन--स्पर्श से; काम:--कामेच्छाएँ; भ्रुवो:--भौंहों से; यम:--यमराज; पक्ष्म-भव:--पलकों से; तु--लेकिन; काल:--नित्यकाल, जो मृत्यु लाता है; प्रसीदताम्--प्रसन्न हों; नः--हम पर;सः--वे; महा-विभूति:--परम पराक्रम वाले भगवान्
लोभ उनके निचले होठ से, प्यार उनके ऊपरी होठ से, शारीरिक कान्ति उनकी नाक से,'पाशविक वासनाएँ उनकी स्पर्शेन्द्रियों से, यमराज उनकी भौहों से तथा नित्यकाल उनकी पलकोंसे उत्पन्न होते हैं |
वे भगवान् हम सबों पर प्रसन्न हों |
द्रव्यं बयः कर्म गुणान्विशेषं यद्योगमायाविहितान्वदन्ति |
यहुर्विभाव्यं प्रबुधापबाध॑प्रसीदतां नः स महाविभूति: ॥
४३॥
द्रव्यमू-- भौतिक जगत के पाँच तत्त्व; वयः--काल; कर्म--सकाम कर्म; गुणान्--प्रकृति के तीन गुणों को; विशेषम्--तेईसतत्त्वों के संयोग से उत्पन्न किसमें; यत्--जो; योग-माया-- भगवान् की सृजनात्मक शक्ति से; विहितानू--किया गया; वदन्ति--विद्वान लोग कहते हैं; यत् दुर्विभाव्यमू--जिसे समझ पाना वास्तव में कठिन है; प्रबुध-अपबाधम्--जो लोग पूर्णतया अवगत हैंउन दिद्वानों के द्वारा तिरस्कृत; प्रसीदताम्--प्रसन्न हों; न:--हम पर; सः--वह; महा-विभूति: --हर वस्तु के नियन्ता |
सभी विद्वान लोग कहते हैं कि पाँचों तत्त्व, नित्यकाल, सकाम कर्म, प्रकृति के तीनों गुणतथा इन गुणों से उत्पन्न विभिन्न किस्में--ये सब योगमाया की सृष्टरियाँ हैं |
अतएव इस भौतिकजगत को समझ पाना अत्यन्त कठिन है, किन्तु जो लोग अत्यन्त विद्वान हैं उन्होंने इसकातिरस्कार कर दिया है |
जो सभी वस्तुओं के नियन्ता हैं ऐसे भगवान् हम सब पर प्रसन्न हों |
नमोस्तु तस्मा उपशान्तशक्तयेस्वाराज्यलाभप्रतिपूरितात्मने |
गुणेषु मायारचितेषु वृत्तिभि-न॑ सज्जमानाय नभस्वदूतये ॥
४४॥
नमः--हमारा नमस्कार; अस्तु--हो; तस्मै--उसको; उपशान्त-शक्तये--जो अन्य कुछ उपलब्ध करने का प्रयास नहीं करता, जोअशान्त नहीं रहता; स्वाराज्य--पूर्णतया स्वतंत्र; लाभ--सारे लाभों का; प्रतिपूरित--पूरी तरह प्राप्त; आत्मने-- भगवान् में;गुणेषु-- भौतिक जगत का, जो तीन गुणों के कारण गतिशील है; माया-रचितेषु--माया द्वारा उत्पन्न वस्तुओं का; वृत्तिभि:--इन्द्रियों के ऐसे कार्यों से; न सजमानाय--जो आसक्त नहीं होता है या भौतिक सुख-दुख से परे है; नभस्वत्--वायु; ऊतये--भगवान् को जिसने अपने लीला-रूप में इस भौतिक जगत की सृष्टि की |
हम उन भगवान् को सादर नमस्कार करते हैं, जो पूर्णतया शान्त, प्रयास से मुक्त तथा अपनीउपलब्धियों से पूर्णतया सन्तुष्ट हैं |
वे अपनी इन्द्रियों द्वारा भौतिक जगत के कार्यों में लिप्त नहींहोते |
निस््सन्देह, इस भौतिक जगत में अपनी लीलाएँ सम्पन्न करते समय वे अनासक्त वायु कीतरह रहते हैं |
स त्वं नो दर्शयात्मानमस्मत्करणगोचरम् |
प्रपन्नानां दिदृक्षूणां सस्मितं ते मुखाम्बुजम् ॥
४५॥
सः--वह ( भगवान् ); त्वम्-तुम मेरे भगवान् हो; न:ः--हमारे लिए; दर्शय--दिखाई पड़ो; आत्मानम्--अपने मूल रूप में;अस्मत्ू-करण-गोचरम्--हमारी प्रत्यक्ष इन्द्रियों द्वारा विशेष रूप से आँखों से देखने योग्य; प्रपन्नानामू--हम सभी शरणागतोंका; दिदक्षूणामू--फिर भी आपको देखने को इच्छुक; सस्मितम्--मुस्काते; ते--तुम्हारा; मुख-अम्बुजम्--कमल जैसा मुख |
हे भगवान्! हम आपके शरणागत हैं फिर भी हम आपका दर्शन करना चाहते हैं |
कृपयाअपने आदि रूप को तथा अपने मुस्काते मुख को हमारे नेत्रों को दिखलाइये और अन्य इन्द्रियोंद्वारा अनुभव करने दीजिये |
तैस्तेः स्वेच्छाभूते रूपै: काले काले स्वयं विभो |
कर्म दुर्विषहं यन्नो भगवांस्तत्करोति हि ॥
४६॥
तैः--ऐसे प्राकट्यों द्वारा; तैः--ऐसे अवतारों द्वारा; स्व-इच्छा-भूतः--आपकी निजी इच्छा से सब कुछ प्रकट; रूपै:--वास्तविक रूपों द्वारा; काले काले--विभिन्न युगों में; स्वयम्--स्वयं; विभो--हे ब्रह्म; कर्म--कर्म ; दुर्विषहम्--असामान्य( अन्य किसी से न किया जा सकने वाला ); यत्--जो; न:--हम पर; भगवान्-- भगवान्; तत्ू--वह; करोति--सम्पन्न करताहै; हि--निस्सन्देह
हे भगवान्! आप विभिन्न युगों में अपनी इच्छा से विभिन्न अवतारों में प्रकट होते हैं और ऐसेअसामान्य कार्य आश्चर्यजनक ढंग से करते हैं, जिन्हें हम सब के लिए कर पाना दुष्कर है |
क्लेशभूर्यल्पसाराणि कर्माणि विफलानि वा |
देहिनां विषयार्तानां न तथेवार्पितं त्वयि ॥
४७॥
क्लेश--कठिनाई; भूरि-- अत्यधिक; अल्प--बहुत कम; साराणि--अच्छा फल; कर्माणि--कार्यकलाप; विफलानि--निराशा; वा--अथवा; देहिनाम्-- मनुष्यों का; विषय-अर्तानामू-- भौतिक जगत का भोग करने के इच्छुक; न--नहीं; तथा--उसी तरह; एब--निस्सन्देह; अर्पितम्--अर्पित; त्वयि-- आपको |
कर्मीजन अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए सदैव धनसंग्रह करने के लिए लालायित रहते हैं, किन्तुइसके लिए उन्हें अत्यधिक श्रम करना पड़ता है |
इतने कठोर श्रम के बावजूद भी उन्हें सन्तोषप्रद'फल नहीं मिल पाता |
निस्सन्देह ही कभी-कभी तो उनके कर्मफल से निराशा ही उत्पन्न होती है |
किन्तु जिन भक्तों ने भगवान् की सेवा में अपना जीवन अर्पित कर रखा है वे कठोर श्रम कियेबिना ही पर्याप्त फल प्राप्त कर सकते हैं |
ये फल भक्तों की आशा से बढ़कर होते हैं |
नावम: कर्मकल्पोपि विफलाये श्वरापित: |
'कल्पते पुरुषस्यैव स ह्यात्मा दयितो हितः ॥
४८ ॥
न--नहीं; अवम:--अत्यल्प, नगण्य; कर्म--कर्म; कल्प:--ढंग से सम्पन्न किया गया; अपि-- भी; विफलाय--व्यर्थ जाते हैं;ईश्वर-अर्पित:-- भगवान् को समर्पित होने के कारण; कल्पते--ऐसा मान लिया जाता है; पुरुषस्य--सारे पुरुषों का; एव--निस्सन्देह; सः--भगवान्; हि--निश्चय ही; आत्मा--परमात्मा, परम पिता; दयित:--अत्यन्त प्रिय; हित:--लाभप्रद |
भगवान् को समर्पित कार्य, भले ही छोटे पैमाने पर क्यों न किये जाँए, कभी भी व्यर्थ नहींजाते |
अतएव स्वाभाविक है कि परम पिता होने के कारण भगवान् अत्यन्त प्रिय हैं और वे जीवोंके कल्याण के लिए सदैव कर्म करने के लिए तैयार रहते हैं |
यथा हि स्कन्धशाखानां तरोमूलावसेचनम् |
एवमाराधन विष्णो: सर्वेषामात्मनश्चव हि ॥
४९॥
यथा--जिस प्रकार; हि--निस्सन्देह; स्कन्ध--तने; शाखानाम्--तथा डालों का; तरो:--वृक्ष की; मूल--जड़; अवसेचनम्--सिंचाई; एवम्--इस प्रकार; आराधनम्-- पूजा; विष्णो: -- भगवान् विष्णु की; सर्वेषामू--सब का; आत्मन:--परमात्मा का;च--भी; हि--निस्सन्देह
जब वृक्ष की जड़ में पानी डाला जाता है, तो वृक्ष का तना तथा शाखाएँ स्वतः तुष्ट हो जातीहैं |
इसी प्रकार जब कोई भगवान् विष्णु का भक्त बन जाता है, तो इससे हर एक की सेवा होजाती है क्योंकि भगवान् हर एक के परमात्मा हैं |
नमस्तुभ्यमनन्ताय दुर्वितर्क्यात्मकर्मणे |
निर्गुणाय गुणेशाय सत्त्वस्थाय च साम्प्रतम् ॥
५०॥
नमः--नमस्कार; तुभ्यम्-हे भगवान्, तुम्हें; अनन्ताय--जो काल की तीनों अवस्थाओं ( भूत, वर्तमान तथा भविष्य ) को पारकरके सदैव जीवित है उसको; दुर्वितर्क्य-आत्म-कर्मणे-- आपको, जो अचिन्त्य कार्यकलाप करने वाले हैं; निर्गुणाय--जोदिव्य तथा भौतिक गुणों की उन्मत्तता से मुक्त हैं; गुण-इशाय--आपको, जो प्रकृति के तीनों गुणों को वश में रखने वाले हैं;सत्त्व-स्थाय--सतोगुण में स्थित; च--भी; साम्प्रतम्ू--इस समय |
हे भगवान्! आपको नमस्कार है क्योंकि आप नित्य हैं, भूत, वर्तमान तथा भविष्य की कालसीमा से परे हैं |
आप अपने कार्यकलापों में अचिन्त्य हैं, आप भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों केस्वामी हैं और समस्त भौतिक गुणों से परे रहने के कारण आप भौतिक कल्मष से मुक्त हैं |
आपप्रकृति के तीनों गुणों के नियन्ता हैं, किन्तु इस समय आप सतोगुण में स्थित हैं |
मैं आपकोसादर नमस्कार करता हूँ |
