← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 8 की सूची

अध्याय तीन: गजेंद्र की समर्पण प्रार्थना

8.3श्रीबादरायणिरुवाचएवं व्यवसितो बुद्धया समाधाय मनो हृदि |

जजाप परमंजाप्य॑ प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम्‌ ॥

१॥

श्री-बादरायणि: उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; व्यवसितः--स्थिर; बुद्धया--बुद्धि से;समाधाय--केन्द्रित करने के लिए; मनः--मन को; हृदि--हृदय में या चेतना में; जजाप--जप किया; परमम्‌--परम;जाप्यम्‌ू--उस मंत्र को जिसे उसने महान्‌ भक्तों से सीखा था; प्राकू-जन्मनि--पूर्वजन्म में; अनुशिक्षितम्‌-- अभ्यास किया हुआ |

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : तत्पश्चात्‌ गजेन्द्र ने अपना मन पूर्ण बुद्धि के साथ अपनेहृदय में स्थिर कर लिया और उस मंत्र का जप प्रारम्भ किया जिसे उसने इन्द्रद्यम्न के रूप मेंअपने पूर्वजन्म में सीखा था और जो कृष्ण की कृपा से उसे स्मरण था |

श्रीगजेन्द्र उबाच» नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम्‌ |

पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥

२॥

श्री-गजेन्द्र: उबाच--गजेन्द्र ने कहा; ३४--हे भगवान्‌; नम:--मैं सादर नमस्कार करता हूँ; भगवते-- भगवान्‌ को; तस्मै--उस;यतः--जिनसे; एतत्‌--यह शरीर तथा भौतिक जगत; चित्‌-आत्मकम्‌--चेतना ( आत्मा ) के कारण गतिशील; पुरुषाय--परमपुरुष को; आदि-बीजाय--जो उद्गम या प्रत्येक वस्तु के मूल कारण हैं, उन्हें; पर-ईशाय--परम, दिव्य तथा पूज्य;अभिधीमहि--उनका ध्यान करता हूँ |

गजेन्द्र ने कहा : मैं परम पुरुष वासुदेव को सादर नमस्कार करता हूँ ( ३७ नमो भगवतेवासुदेवाय ) |

उन्हीं के कारण यह शरीर आत्मा की उपस्थिति के कारण कर्म करता है; अतएव वेप्रत्येक जीव के मूल कारण हैं |

वे ब्रह्म तथा शिव जैसे महापुरुषों के लिए पूजनीय हैं और वेप्रत्येक जीव के हृदय में प्रविष्ट हैं |

मैं उनका ध्यान करता हूँ |

यस्मिन्रिदं यतश्वेदं येनेदं य इदं स्वयम्‌ |

योअस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्े स्वयम्भुवम्‌ ॥

३॥

यस्मिनू--जिस मूल पद पर; इदम्‌--यह ब्रह्माण्ड टिका है; यतः--जिन अवयवों से; च--तथा; इदम्‌--यह विराट विश्व बना है;येन--जिसके द्वारा; इदम्‌--यह विराट विश्व रचित तथा पालित है; यः--जो; इृदम्‌--यह भौतिक जगत है; स्वयम्‌--स्वयं;यः--जो; अस्मात्‌--इस भौतिक जगत ( फल ) से; परस्मात्‌ू--कारण से; च--तथा; पर: --दिव्य या भिन्न; तमू--उस;प्रपद्ये--शरण में जाता हूँ; स्वयम्भुवम्‌--आत्म-निर्भर की |

भगवान्‌ ही वह परम पद है, जिस पर प्रत्येक वस्तु टिकी हुई है; वे वह अवयव हैं जिससेप्रत्येक वस्तु उत्पन्न हुई है तथा वे वह पुरुष हैं जिसने सृष्टि की रचना की और जो इस विराट विश्वके एकमात्र कारण हैं |

फिर भी वे कारण-कार्य से पृथक्‌ हैं |

मैं उन भगवान्‌ की शरण ग्रहणकरता हूँ जो सभी प्रकार से आत्म-निर्भर हैं |

यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितंक्वचिद्विभातं क्‍्व च तत्तिरोहितम्‌ |

अविद्धवक्साक्ष्यु भयं तदीक्षतेस आत्ममूलोवतु मां परात्पर: ॥

४॥

यः--जो भगवान्‌; स्व-आत्मनि--अपने में; इदमू--इस विराट जगत को; निज-मायया--अपनी निजी शक्ति से; अर्पितम्‌--लगा हुआ; क्वचित्‌--कभी-कभी, कल्प के प्रारम्भ में; विभातम्‌ू--प्रकट होता है; कब च--कभी-कभी, प्रलय के समय;तत्‌--वह ( जगत ); तिरोहितम्‌ू--अहृश्य; अविद्ध-हक्‌--वह सब कुछ देखता है ( इन सभी परिस्थितियों में ); साक्षी--गवाह;उभयम्‌--दोनों ( उत्त्पत्ति तथा प्रलय ); तत्‌ ईक्षते--दृष्टि की हानि के बिना सब कुछ देखता है; सः--वह भगवान्‌; आत्म-मूल:--आत्मनिर्भर, अन्य कारण न होने पर; अवतु--कृपया हमें संरक्षण दें; मामू--मुझको; परातू-पर:--दिव्य से भी दिव्य,समस्त अध्यात्म से परे |

भगवान्‌ अपनी शक्ति के विस्तार द्वारा कभी इस दृश्य जगत को व्यक्त बनाते हैं और कभीइसे अव्यक्त बना देते हैं |

वे सभी परिस्थितियों में परम कारण तथा परम कार्य ( फल ), प्रेक्षकतथा साक्षी दोनों हैं |

इस प्रकार वे सभी वस्तुओं से परे हैं |

ऐसे भगवान्‌ मेरी रक्षा करें |

कालेन पश्ञत्वमितेषु कृत्स्नशोलोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु |

तमस्तदासीद्गहनं गभीरंयस्तस्य पारेडभिविराजते विभु: ॥

५॥

कालेन--कालान्तर में ( लाखों वर्ष बाद ); पञ्ञत्वम्‌--जब प्रत्येक मायावी वस्तु विनष्ट हो जाती है; इतेषु--सारे विकार;कृत्सनश:--इस दृश्य जगत के भीतर की प्रत्येक वस्तु सहित; लोकेषु--सारे लोकों में, या इनमें स्थित हर वस्तु में; पालेषु--ब्रह्मा जैसे पालनकर्ताओं में; च--भी; सर्व-हेतुषु--सारे कारणों में; तम:--महान्‌ अंधकार; तदा--तब; आसीत्‌--था;गहनम्‌--अत्यन्त घना; गर्भीरम्‌--अत्यन्त गहरा; य:--जो भगवान्‌; तस्य--इस अंधकारपूर्ण स्थिति के; पारे--इसके अतिरिक्त;अभिविराजते--स्थित है या चमकता है; विभु:--परमे श्वर

कालक्रम से जब लोकों तथा उनके निदेशकों एवं पालकों समेत ब्रह्माण्ड के सारे कार्य-कारणों का संहार हो जाता है, तो गहन अंधकार की स्थिति आती है |

किन्तु इस अंधकार केऊपर भगवान्‌ रहता है |

मैं उनके चरणकमलों की शरण ग्रहण करता हूँ |

न यस्य देवा ऋषय: पदं विदु-जन्तु: पुनः कोहति गन्तुमीरितुम्‌ |

यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्ठतोदुरत्ययानुक्रमण: स मावतु ॥

६॥

न--न तो; यस्य--जिसका; देवा:--देवतागण; ऋषय: --बड़े-बड़े मुनि; पदम्‌--पद; विदु:--समझ सकते हैं; जन्तु:--पशुओंके समान बुद्धिहीन जीव; पुनः--फिर; कः--कौन; अ्हति--समर्थ है; गन्तुमू--ज्ञान में प्रवेश करने में; ईरितुमू--अथवा शब्दोंद्वारा व्यक्त करने में; यथा--जिस प्रकार; नटस्य--कलाकार के; आकृतिभि:--शारीरिक स्वरूप से; विचेष्टत: --विभिन्न प्रकारसे नाचते हुए; दुरत्यय--अत्यन्त कठिन; अनुक्रमण: -- उसकी गतियाँ; सः--वही भगवान्‌; मा--मुझको; अवतु--संरक्षणप्रदान करें|

आकर्षक वेशभूषा से ढके रहने तथा विभिन्न प्रकार की गतियों से नाचने के कारण रंगमंचके कलाकार को श्रोता समझ नहीं पाते |

इसी प्रकार परम कलाकार के कार्यो तथा स्वरूपों कोबड़े-बड़े मुनि या देवतागण भी नहीं समझ पाते और बुद्धिहीन तो तनिक भी नहीं ( जो पशुओंके तुल्य हैं ) |

न तो देवता तथा मुनि, न ही बुद्धिहीन मनुष्य भगवान्‌ के स्वरूप को समझ सकतेहैं और न ही वे उनकी वास्तविक स्थिति को अभिव्यक्त कर सकते हैं |

ऐसे भगवान्‌ मेरी रक्षाकरें |

दिदक्षवो यस्य पदं सुमड्रलंविमुक्तसड्रा मुनयः सुसाधव: |

चरन्त्यलोकब्रतमत्रणं बनेभूतात्मभूता: सुहृदः स मे गति: ॥

७॥

दिहृक्षव:ः--( भगवान्‌ को ) देखने के इच्छुक; यस्थय--जिसके; पदम्‌--चरणकमल; सु-मड्रलम्‌--कल्याण प्रद; विमुक्त-सड्भडाः--भौतिक दशाओं से पूरी तरह मुक्त; मुनयः--मुनिगण; सु-साधव:--आध्यात्मिक चेतना में बढ़े-चढ़े; चरन्ति--अभ्यासकरते हैं; अलोक-ब्रतम्‌--ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ या संन्यास के व्रत; अवब्रणम्‌--बिना किसी त्रुटि के; बने--वन में; भूत-आत्म-भूता:--जो समस्त जीवों के प्रति समान भाव रखते हैं; सुहृदः--जो सबों के मित्र हैं; सः--वही भगवान्‌; मे--मेरा; गति: --गन्तव्य |

जो सभी जीवों को समभाव से देखते हैं, जो सबों के मित्रवत्‌ हैं तथा जो जंगल में ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ तथा संन्यास ब्रत का बिना त्रुटि के अभ्यास करते हैं, ऐसे विमुक्त तथा मुनिगणभगवान्‌ के कल्याणप्रद चरणकमलों का दर्शन पाने के इच्छुक रहते हैं |

वही भगवान्‌ मेरे गन्तव्यहों |

न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वान नामरूपे गुणदोष एव वा |

तथापि लोकाप्ययसम्भवाय यःस्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ॥

८॥

तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेउनन्तशक्तये |

अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्यकर्मणे ॥

९॥

न--नहीं; विद्यते--विद्यमान है; यस्थ--जिसका ( भगवान्‌ का ); च-- भी; जन्म--जन्म; कर्म--कर्म; वा-- अथवा; न--नतो; नाम-रूपे--कोई नाम या भौतिक स्वरूप; गुण--गुण; दोष: --त्रुटि; एव--निश्चय ही; वा--अथवा; तथापि--फिर भी;लोक--इस दृश्य जगत का; अप्यय--विनाश; सम्भवाय-- तथा सृष्टि; यः--जो; स्व-मायया-- अपनी निजी शक्ति से; तानि--कार्यों को; अनुकालमू--शाश्वत रीति से; ऋच्छति--स्वीकार करता है; तस्मै--उसको; नम:ः--नमस्कार करता हूँ; पर--दिव्य;ईशाय--परमनियन्ता को; ब्रह्मणे--परब्रह्म को; अनन्त-शक्तये-- असीमित शक्ति से; अरूपाय--निराकार; उरुू-रूपाय--अवतारों के विविध रूपों वाला; नम:--नमस्कार करता हूँ; आश्चर्य-कर्मणे--जिनके कार्य अद्भुत होते हैं |

भगवान्‌ भौतिक जन्म, कार्य, नाम, रूप, गुण या दोष से रहित हैं |

यह भौतिक जगत जिसअभिप्राय से सृजित और विनष्ट होता रहता है उसकी पूर्ति के लिए वे अपनी मूल अन्तरंगा शक्ति द्वारा रामचन्द्र या भगवान्‌ कृष्ण जैसे मानववत्‌ रूप में आते हैं |

उनकी शक्ति महान्‌ है और वेविभिन्न रूपों में भौतिक कल्मष से सर्वथा मुक्त होकर अद्भुत कर्म करते हैं |

अतएव वे परब्रह्महैं |

मैं उन्हें नमस्कार करता हूँ |

नम आत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने |

नमो गिरां विदूराय मनसश्लेतसामपि ॥

१०॥

नमः--मैं नमस्कार करता हूँ; आत्म-प्रदीपाय--आत्म-प्रकाशित को या जीवों को प्रकाश देने वाले को; साक्षिणे-- प्रत्येक केहृदय में साक्षी स्वरूप स्थित; परम-आत्मने--परमात्मा में; नम:ः--नमस्कार करता हूँ; गिरामू--वाणी से; विदूराय--अत्यन्त दूर,अगम्य; मनसः--मन से; चेतसाम्‌--या चेतना से; अपि--भी

मैं उन आत्मप्रकाशित परमात्मा को नमस्कार करता हूँ जो प्रत्येक हृदय में साक्षी स्वरूपस्थित हैं, व्यष्टि जीवात्मा को प्रकाशित करते हैं और जिन तक मन, वाणी या चेतना के प्रयासोंद्वारा नहीं पहुँचा जा सकता |

सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्करम्येण विपश्चिता |

नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥

११॥

सत्तवेन--शुद्ध भक्ति से; प्रति-लभ्याय-- भगवान्‌ को, जो ऐसी भक्ति से प्राप्त किये जाते हैं; नैष्कर्म्येण --दिव्य कार्यों से;विपश्चिता--अत्यन्त दिद्वान व्यक्तियों द्वारा; नम:ः--नमस्कार करता हूँ; कैवल्य-नाथाय--दिव्यलोक के स्वामी को; निर्वाण--भौतिक कार्यो से पूर्ण मुक्ति; सुख--सुख का; संविदे--प्रदान करने वाला |

भगवान्‌ की अनुभूति उन शुद्ध भक्तों को होती है, जो भक्तियोग की दिव्य स्थिति में रहकरकर्म करते हैं |

वे अकलुषित सुख के दाता हैं और दिव्यलोक के स्वामी हैं |

अतएव मैं उन्हेंनमस्कार करता हूँ |

नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे |

निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥

१२॥

नमः--नमस्कार; शान्ताय--जो समस्त भौतिक गुणों से ऊपर है और पूर्णतया शान्त है उसे अथवा प्रत्येक जीव में वास करनेवाले परमात्मा स्वरूप वासुदेव को; घोराय--भगवान्‌ के भयानक रूपों को यथा जामदग्न्य तथा नृसिंह देव को; मूढाय--पशुरूप में भगवान्‌ के स्वरूप को यथा वराह को; गुण-धर्मिणे--जो भौतिक जगत में विभिन्न गुण स्वीकार करता है;निर्विशेषाय-- भौतिक गुणों से विहीन और पूर्णतया आध्यात्मिक; साम्याय-- भगवान्‌ बुद्ध को जो निर्वाण रूप हैं, जहाँ भौतिककार्यकलाप रुक जाते हैं; नमः--मैं सादर नमस्कार करता हूँ; ज्ञान-घनाय--ज्ञान या निर्विशेष ब्रह्म को; च-- भी |

मैं सर्वव्यापी भगवान्‌ वासुदेव को, भगवान्‌ के भयानक रूप नृसिंह देव को, भगवान्‌ केपशुरूप ( वराह देव ) को, निर्विशेषवाद का उपदेश देने वाले भगवान्‌ दत्तात्रेय को, भगवान्‌बुद्ध को तथा अन्य सारे अवतारों को नमस्कार करता हूँ |

मैं उन भगवान्‌ को सादर नमस्कारकरता हूँ जो निर्गुण हैं, किन्तु भौतिक जगत में सतो, रजो तथा तमो गुणों को स्वीकार करते हैं |

मैं निर्विशेष ब्रह्मतेज को भी सादर नमस्कार करता हूँ |

क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे |

पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः ॥

१३॥

क्षेत्र-ज्ञाय--बाह्य शरीर की प्रत्येक वस्तु जानने वाले को; नमः--मैं नमस्कार करता हूँ; तुभ्यम्‌ू--तुमको; सर्व--सब कुछ;अध्यक्षाय--अध्यक्ष को; साक्षिणे--जो साक्षी परमात्मा या अन्तर्यामी हैं; पुरुषाय--परम पुरुष को; आत्म-मूलाय--मूल स्रोतको; मूल-प्रकृतये--पुरुष-अवतार को, जो प्रकृति तथा प्रधान का उद्गम है; नम:--मैं नमस्कार करता हूँ |

मैं आपको नमस्कार करता हूँ |

आप परमात्मा, हर एक के अध्यक्ष तथा जो कुछ भी घटितहोता है उसके साक्षी हैं |

आप परम पुरुष, प्रकृति तथा समग्र भौतिक शक्ति के उद्गम हैं |

आपभौतिक शरीर के भी स्वामी हैं |

अतएवं आप परम पूर्ण हैं |

मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ |

सर्वेन्द्रियगुणद्रष्टे सर्वप्रत्ययहेतवे |

असता च्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः ॥

१४॥

सर्व-इन्द्रिय-गुण-द्रष्टे--सभी इन्द्रिय-विषयों के द्रष्टा में; सर्ब-प्रत्यय-हेतवे--सभी संशयों के समाधान ( और जिनके बिना सभीअसमर्थताएँ तथा सारे संदेह हल नहीं किये जा सकते ); असता--असत्य या भ्रम के प्रकट होने से; छायया--समानता केकारण; उक्ताय--कहलाया; सत्‌--सत्य का; आभासाय--प्रतिबिम्ब के लिए; ते--तुमको; नमः--नमस्कार करता हूँ |

हे भगवान्‌! आप समस्त इन्द्रिय-विषयों के द्रष्टा हैं |

आपकी कृपा के बिना सन्देहों कीसमस्या के हल होने की कोई सम्भावना नहीं है |

यह भौतिक जगत आपके अनुरूप छाया केसमान है |

निस्सन्देह, मनुष्य इस भौतिक जगत को सत्य मानता है क्योंकि इससे आपके अस्तित्वकी झलक मिलती है |

नमो नमस्तेडखिलकारणायनिष्कारणायाद्धुतकारणाय |

सर्वागमाम्नायमहार्णवाय नमोपवर्गाय परायणाय ॥

१५॥

नमः--मैं नमस्कार करता हूँ; नम:--पुनः नमस्कार करता हूँ; ते--तुम्हें; अखिल-कारणाय--हर वस्तु के परम कारण को;निष्कारणाय--कारणरहित को; अद्भुत-कारणाय--हर वस्तु के अद्भुत कारण को; सर्व--समस्त; आगम-आम्नाय--वैदिकवाड्मय की परम्परा पद्धति के स्रोत को; महा-अर्णवाय--ज्ञान के विशाल सागर को अथवा उस विशाल समुद्र को जिसमें ज्ञानकी समस्त सरिताएँ मिलती हैं; नमः--नमस्कार करता हूँ; अपवर्गाय--मोक्ष दाता को; पर-अयणाय--समस्त अध्यात्मवादियोंके आश्रय को |

हे भगवान्‌! आप समस्त कारणों के कारण हैं, किन्तु आपका अपना कोई कारण नहीं है,अतएव आप हर वस्तु के अद्भुत कारण हैं |

मैं आपको अपना सादर नमस्कार अर्पित करता हूँ |

आप पश्नरात्र तथा वेदान्तसूत्र जैसे शास्त्रों में निहित वैदिक ज्ञान के आश्रय हैं, जो आपकेसाक्षात्‌ स्वरूप हैं और परम्परा पद्धति के स्त्रोत हैं |

चूँकि मोक्ष प्रदाता आप ही हैं अतएव आप हीअध्यात्मवादियों के एकमात्र आश्रय हैं |

मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ |

गुणारणिच्छन्नचिदुष्मपपायतत्क्षोभविस्फूर्जितमानसाय |

नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम-स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥

१६॥

गुण--प्रकृति के तीन गुणों ( सत्त्व, रजस्‌ तथा तमस्‌ ) द्वारा; अरणि--अरणि काष्ठ द्वारा; छन्न--आवृत; चित्‌--ज्ञान का;उष्मपाय--उसको जिसकी अग्नि; ततू-क्षोभ--प्रकृति के तीनों गुणों के क्षोभ से; विस्फूर्जित--बाहर; मानसाय--उसकोजिसका मन; नैष्कर्म्य-भावेन-- आध्यात्मिक ज्ञान की अवस्था के कारण; विवर्जित--त्याग देने वालों में; आगम--वैदिकसिद्धान्त; स्वयम्‌ू--स्वयं; प्रकाशाय--जो प्रकट है उसको; नमः करोमि--मैं सादर नमस्कार करता हूँ |

हे प्रभु! जिस प्रकार अरणि-काष्ठ में अग्नि ढकी रहती है उसी प्रकार आप तथा आपकाअसीम ज्ञान प्रकृति के भौतिक गुणों से ढका रहता है |

किन्तु आपका मन प्रकृति के गुणों केकार्यकलापों पर ध्यान नहीं देता |

जो लोग आध्यात्मिक ज्ञान में बढ़े-चढ़े हैं, वे वैदिक वाडमयमें निर्देशित विधि-विधानों के अधीन नहीं होते |

चूँकि ऐसे उन्नत लोग दिव्य होते हैं अतएव आपस्वयं उनके शुद्ध मनों में प्रकट होते हैं |

इसलिए मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ |

माहक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणायमुक्ताय भूरिकरूणाय नमोउलयाय |

स्वांशेन सर्वतनुभून्मनसि प्रतीत-प्रत्यग्हशे भगवते बृहते नमस्ते ॥

१७॥

माहक्‌-मेरे समान; प्रपन्न--शरणागत; पशु--पशु; पाश--बन्धन से; विमोक्षणाय--छुड़ाने वाले को; मुक्ताय--प्रकृति केकल्मष से अछूते परमेश्वर को; भूरि-करुणाय--असीम दयालु को; नम:--नमस्कार करता हूँ; अलयाय--कभी भी असावधानया अकर्मण्य न रहने वाले को ( मेरे उद्धार के लिए ); स्व-अंशेन--आपके परमात्मा रूप अंश से; सर्व--सबों का; तनु-भृत्‌--प्रकृति में देहधारी जीव; मनसि--मन में; प्रतीत--कृतज्ञ; प्रत्यक्‌-दशे--( समस्त कार्यों के ) प्रत्यक्ष द्रष्टा के रूप में; भगवते--भगवान्‌ को; बृहते-- असीम; नम: --नमस्कार करता हूँ; ते--तुमको |

चूँकि मुझ जैसे पशु ने परममुक्त आपकी शरण ग्रहण की है, अतएवं आप निश्चय ही मुझेइस संकटमय स्थिति से उबार लेंगे |

निस्सन्देह, अत्यन्त दयालु होने के कारण आप निरन्तर मेराउद्धार करने का प्रयास करते हैं |

आप अपने परमात्मा-रूप अंश से समस्त देहधारी जीवों केहृदयों में स्थित हैं |

आप प्रत्यक्ष दिव्य ज्ञान के रूप में विख्यात हैं और आप असीम हैं |

हेभगवान्‌! मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ |

आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै-्दुष्प्रापणाय गुणसड्भविवर्जिताय |

मुक्तात्मभि: स्वहृदये परिभावितायज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय ॥

१८ ॥

आत्म--मन तथा शरीर; आत्म-ज--पुत्र तथा पुत्रियाँ; आप्त--मित्र तथा सम्बन्धी; गृह--घर, जाति, समाज तथा राष्ट्र; वित्त--धन; जनेषु--विभिन्न दास तथा सहायक तक; सक्तै:--आसक्त लोगों द्वारा; दुष्प्रषणाय--आपको, जो दुष्प्राप्य हैं; गुण-सड़--तीन गुणों द्वारा; विवर्जिताय--कलुषित न होने वाले को; मुक्त-आत्मभि:--पहले से मुक्त हुए पुरुषों के द्वारा; स्व-हृदये --अपनेहृदय के भीतर; परिभाविताय--ध ध्यान किये जाने वाले आपको; ज्ञान-आत्मने--समस्त ज्ञान के आगार; भगवते-- भगवान्‌ को;नमः--नमस्कार करता हूँ; ईश्वराय--परमनियन्ता को |

हे प्रभु! जो लोग भौतिक कल्मष से पूर्णतः मुक्त हैं, वे अपने अन्तस्थल में सदैव आपकाध्यान करते हैं |

आप मुझ जैसों के लिए दुष्प्राप्प हैं, जो मनोरथ, घर, सम्बन्धियों, मित्रों, धन,नौकरों तथा सहायकों के प्रति अत्यधिक आसक्त रहते हैं |

आप प्रकृति के गुणों से निष्कलुषितभगवान्‌ हैं |

आप सारे ज्ञान के आगार, परमनियन्ता हैं |

अतएवं मैं आपको सादर नमस्कार करता>>हू |

यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामाभजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति |

किं चाशिषो रात्यपि देहमव्ययंकरोतु मेदभ्भदयो विमोक्षणम्‌ ॥

१९॥

यम्‌--जिस भगवान्‌ को; धर्म-काम-अर्थ-विमुक्ति-कामा:--ऐसे व्यक्ति जो धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष इन चार सिद्धान्तों कीकामना करते हैं; भजन्त:--पूजा द्वारा; इष्टामू--लक्ष्य को; गतिम्‌ू--गन्तव्य; आप्नुवन्ति--प्राप्त कर सकते हैं; किम्‌--क्या कहाजाये; च-- भी; आशिष:--अन्य आशीर्वाद; राति--प्रदान करता है; अपि-- भी; देहम्‌--शरीर को; अव्ययम्‌-- आध्यात्मिक;करोतु--आशीष दें; मे-- मुझको; अदभ्र-दय:-- अत्यधिक दयालु भगवान्‌; विमोक्षणम्‌--वर्तमान संकट से तथा भौतिक जगतसे मोक्ष

भगवान्‌ की पूजा करने पर जो लोग धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष--इन चारों में रुचि रखतेहैं, वे उनसे अपनी इच्छानुसार इन्हें प्राप्त कर सकते हैं |

तो फिर अन्य आशीर्वादों के विषय मेंक्या कहा जा सकता है? कभी-कभी भगवान्‌ ऐसे महत्वाकांक्षी पूजकों को आध्यात्मिक शरीरप्रदान करते हैं |

जो भगवान्‌ असीम कृपालु हैं, वे मुझे वर्तमान संकट से तथा भौतिकतावादीजीवन शैली से मुक्ति का आशीर्वाद दें |

एकान्तिनो यस्य न कझ्जनार्थवाउ्छन्ति ये वे भगवत्प्रपन्ना: |

अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमड्रलंगायन्त आनन्दसमुद्रमग्ना: ॥

२०॥

तमक्षरं ब्रह्म परं परेश-मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम्‌ |

अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूर-मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे ॥

२१॥

एकान्तिन:--अनन्य भक्त ( जिन्हें कृष्णचेतना के अतिरिक्त अन्य कोई चाह नहीं रहती ); यस्य--जिस भगवान्‌ का; न--नहीं;कझ्नन--कुछ; अर्थम्‌--आशीष; वाउ्छन्ति--इच्छा करते हैं; ये--जो भक्त; वै--निस्सन्देह; भगवत्-प्रपन्ना:-- भगवान्‌ केचरणकमलों में पूरी तरह शरणागत; अति-अद्भुतम्‌--जो अदभुत हैं; तत्‌-चरितमू-- भगवान्‌ के कार्यकलाप; सु-मड़्लम्‌--तथाजो सुनने में अत्यन्त शुभ हैं; गायन्त:--कीर्तन तथा श्रवण द्वारा; आनन्द--दिव्य आनन्द रूपी; समुद्र--समुद्र में; मग्ना:--डूबेहुए; तमू--उनको; अक्षरम्‌--अक्षर; ब्रह्म --ब्रह्म; परम्‌ू--दिव्य; पर-ईशम्‌--परम पुरुषों के स्वामी को; अव्यक्तम्‌ू--अदहृश्यअथवा मन तथा इन्द्रियों से अनुभव न किए जा सकने वाले; आध्यात्मिक--दिव्य; योग--भक्तियोग द्वारा; गम्यमू--प्राप्य( भक्त्या मामभिजानाति ); अति-इन्द्रियम्‌-- भौतिक इन्द्रियों की अनुभूति से परे; सूक्ष्मम्‌--सूक्ष्म; इब--सहृश; अति-दूरम्‌--अत्यन्त दूर; अनन्तम्‌--असीम; आद्यम्‌ू--आदि कारण को; परिपूर्णम्‌--सर्वतः पूर्ण; ईडे--मैं नमस्कार करता हूँ |

ऐसे अनन्य भक्त जिन्हें भगवान्‌ की सेवा करने के अतिरिक्त अन्य कोई चाह नहीं रहती, वेपूर्णतः: शरणागत होकर उनकी पूजा करते हैं और उनके आश्चर्यजनक तथा शुभ कार्यकलापों केविषय में सदैव सुनते तथा कीर्तन करते हैं |

इस प्रकार वे सदैव दिव्य आनन्द के सागर में मग्नरहते हैं |

ऐसे भक्त भगवान्‌ से कोई वरदान नहीं माँगते, किन्तु मैं तो संकट में हूँ |

अतएव मैं उनभगवान्‌ की स्तुति करता हूँ जो शाश्वत रूप में विद्यमान हैं, जो अदृश्य हैं, जो ब्रह्मा जैसेमहापुरुषों के भी स्वामी हैं और जो केवल दिव्य भक्तियोग द्वारा ही प्राप्य हैं |

अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण वे मेरी इन्द्रियों की पहुँच से तथा समस्त बाह्य अनुभूति से परे हैं |

वे असीम हैं, वेआदि कारण हैं और सभी तरह से पूर्ण हैं |

मैं उनको नमस्कार करता हूँ |

यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्वराचरा: |

नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृता: ॥

२२॥

यथार्चिषोग्ने: सवितुर्गभस्तयोनिर्यान्ति संयान्त्यसकृत्स्वरोचिष: |

तथा यतोयं गुणसम्प्रवाहोबुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गा: ॥

२३॥

सबै न देवासुरमर्त्यतिर्यड्श़ न स्त्री न षण्ढो न पुमान्न जन्तु: |

नायं गुण: कर्म न सन्न चासन्‌निषेधशेषो जयतादशेष: ॥

२४॥

यस्य-- भगवान्‌ का; ब्रह्य-आदय:--ब्रह्मा इत्यादि देवता; देवा:--तथा अन्य देवता; वेदा:--वैदिक ज्ञान; लोका:--विभिन्नपुरुष; चर-अचरा: --जड़ ( यथा वृक्ष ) तथा चेतन; नाम-रूप--विभिन्न नामों तथा विभिन्न रूपों के; विभेदेन--ऐसे विभागोंद्वारा; फल्गव्या--कम महत्त्वपूर्ण; च-- भी; कलया--अंशों से; कृता:--उत्पन्न; यथा--जिस तरह; अर्चिष: --स्फुलिंग;अग्ने:--अग्नि के; सवितु:--सूर्य से; गभस्तयः--चमकीले कण; निर्यान्ति--बाहर निकलते हैं; संयान्ति--तथा प्रवेश करते हैं;असकृत्‌-- पुनः पुनः; स्व-रोचिष: --अंशरूप; तथा-- उसी प्रकार से; यत:-- भगवान्‌ जिससे; अयम्‌--यह; गुण-सम्प्रवाह: --प्रकृति के विभिन्न गुणों का निरन्तर प्राकट्य; बुद्धि: मनः--बुद्धि तथा मन; खानि--इन्द्रियाँ; शरीर--शरीर की ( स्थूल तथासूक्ष्म ); सर्गा:--विभाग; सः--वह परमात्मा; बै--निस्सन्देह; न--नहीं है; देव--देवता; असुर--असुर; मर्त्य--मनुष्य;तिर्यक्‌ू-पक्षी या पशु; न--न तो; स्त्री--स्त्री; न--न तो; षण्ढ:--क्लीव; न--न तो; पुमान्‌ू--मनुष्य; न--न तो; जन्तु:--जीव या पशु; न अयमू--न तो वह है; गुण:-- भौतिक गुण; कर्म--सकाम कर्म; न--न तो; सत्‌--प्राकट्य; न--न तो; च--भी; असत्‌--अप्राकट्य; निषेध--नेति-नेति का भेदभाव; शेष:--वह अन्त है; जयतात्‌--उनकी जय हो; अशेष:--जो अनन्तहै

भगवान्‌ अपने सूक्ष्म अंश जीव तत्त्व की सृष्टि करते हैं जिसमें ब्रह्मा, देवता तथा वैदिक ज्ञानके अंग ( साम, ऋग्‌, यजुर्‌ तथा अथर्व ) से लेकर अपने-अपने नामों तथा गुणों सहित समस्तचर तथा अचर प्राणी सम्मिलित हैं |

जिस प्रकार अग्नि के स्फुलिंग या सूर्य की चमकीली किरणोंअपने स्त्रोत से निकल कर पुनः उसी में समा जाती हैं उसी प्रकार मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, स्थूलभौतिक तथा सूक्ष्म भौतिक शरीर तथा प्रकृति के गुणों के सतत रूपान्तर ( विकार )--ये सभीभगवान्‌ से उद्भूत होकर पुनः उन्हीं में समा जाते हैं |

वे न तो देव हैं न दानव, न मनुष्य न पक्षीया पशु हैं |

वे न तो स्त्री या पुरुष या क्लीव हैं और न ही पशु हैं |

न ही वे भौतिक गुण, सकामकर्म, प्राकट्य या अप्राकट्य हैं |

वे 'नेति-नेति' का भेदभाव करने में अन्तिम शब्द हैं और वेअनन्त हैं |

उन भगवान्‌ की जय हो |

जिजीविषे नाहमिहामुया कि-मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या |

इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव-स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम्‌ ॥

२५॥

जिजीविषे--दीर्घकाल तक रहने की इच्छा; न--नहीं; अहम्‌--मैं; इह--इस जीवन में; अमुया--या अगले जीवन में ( इससंकट से बच जाने पर मैं जीना नहीं चाहता ); किमू--क्या लाभ; अन्तः--भीतर से; बहि:ः--बाहर से; च--तथा; आवृतया--अज्ञान से आच्छादित; इभ-योन्या--हाथी रूप इस जन्म में; इच्छामि--मेरी इच्छा है; कालेन--काल के प्रभाव से; न--नहीं है;यस्य--जिसका; विप्लव:--संहार; तस्य--उस; आत्म-लोक-आवरणस्य--आत्म-साक्षात्कार के आवरण से; मोक्षम्‌-मोक्ष |

घड़ियाल के आक्रमण से मुक्त किये जाने के बाद मैं और आगे जीवित रहना नहीं चाहता |

हाथी के शरीर से क्‍या लाभ जो भीतर तथा बाहर से अज्ञान से आच्छादित हो ? मैं तो अज्ञान केआवरण से केवल नित्य मोक्ष की कामना करता हूँ |

यह आवरण काल के प्रभाव से विनष्ट नहींहोता |

सोउहं विश्वसृजं विश्वमविश्व॑ विश्ववेद्सम्‌ |

विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोस्मि पर पदम्‌ ॥

२६॥

सः--वह; अहम्‌--मैं ( भौतिक जीवन से छुटकारा चाहने वाला ); विश्व-सृजम्‌--इस विश्व का सृजन करने वाले को; विश्वम्‌--जो स्वयं सम्पूर्ण विश्व स्वरूप है; अविश्वम्‌-विश्व से परे; विश्व-वेदसम्‌--इस विश्व के ज्ञाता को या इस विश्व के अवयव को;विश्व-आत्मानम्‌--विश्व की आत्मा को; अजमू-- अजन्मा को; ब्रह्म--परम; प्रणतः अस्मि--नमस्कार करता हूँ; परम्‌--दिव्य;पदम्‌ू--आश्रयशरण

भौतिक जीवन से मोक्ष की कामना करता हुआ अब मैं उस परम पुरुष को सादर नमस्कारकरता हूँ जो इस ब्रह्माण्ड का स्त्रष्टा है, जो साक्षात्‌ विश्व का स्वरूप होते हुए भी इस विश्व से परेहै |

वह इस जगत में हर वस्तु का परम ज्ञाता है, ब्रह्माण्ड का परमात्मा है |

वह अजन्मा है औरपरम पद पर स्थित भगवान्‌ है |

उसे मैं सादर नमस्कार करता हूँ |

योगरन्धितकर्माणो हृदि योगविभाविते |

योगिनो य॑ प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोस्म्यहम्‌ ॥

२७॥

योग-रन्धित-कर्माण:--ऐसे व्यक्ति जिनके सकाम कर्मों के फल भक्तियोग द्वारा जलाये जा चुके हैं; हदि--हृदय में; योग-विभाविते-- पूर्णतः शुद्ध तथा विमल; योगिन: --दक्ष योगी; यम्‌-- भगवान्‌ को; प्रपश्यन्ति-- प्रत्यक्ष दर्शन करते हैं; योग-ईशम्‌--समस्त योग के स्वामी, भगवान्‌ को; तम्‌--उसको; नतः अस्मि--नमस्कार करता हूँ; अहम्‌--मैं |

मैं उन ब्रह्म, परमात्मा, समस्त योग के स्वामी को सादर नमस्कार करता हूँ जो सिद्ध योगियोंद्वारा अपने हृदयों में तब देखे जाते हैं जब उनके हृदय भक्तियोग के अभ्यास द्वारा सकाम कर्मोके फलों से पूर्णतया शुद्ध तथा मुक्त हो जाते हैं |

नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेगशक्तित्रयायाखिलधीगुणाय |

प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तयेकदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥

२८॥

नमः--नमस्कार करता हूँ; नम:ः--पुनः नमस्कार है; तुभ्यमू--तुमको; असहा--दुस्तर; बेग--वेग, प्रवाह; शक्ति-त्रयाय--तीनशक्तियों वाले परम पुरुष को; अखिल--ब्रह्माण्ड का; धी--बुद्धि के लिए; गुणाय--इन्द्रिय-विषयों के रूप में प्रकट होनेवाले; प्रपन्न-पालाय--शरणागतों को शरण देने वाले ब्रह्म को; दुरन्‍्त-शक्तये--दुर्जय शक्ति वाले; कत्‌-इन्द्रियाणाम्‌--उनव्यक्तियों द्वारा जो इन्द्रिय-संयम करने में अक्षम हैं; अनवाप्य--दुर्लभ; वर्त्मने--पथ पर |

हे प्रभु! आप तीन प्रकार की शक्तियों के दुस्तर वेग के नियामक हैं |

आप समस्त इन्द्रियसुखके आगार हैं और शरणागत जीवों के रक्षक हैं |

आप असीम शक्ति के स्वामी हैं, किन्तु जो लोगअपनी इन्द्रियों को वश में रखने में अक्षम हैं, वे आप तक नहीं पहुँच पाते |

मैं आपको बारम्बारसादर नमस्कार करता हूँ ॥

नायं वेद स्वमात्मानंयच्छक्त्याहंधिया हतम्‌ |

त॑ दुरत्ययमाहात्म्यंभगवन्तमितोउस्म्यहम्‌ ॥

२९॥

न--नहीं; अयम्‌--सामान्य लोग; वेद--जानते हैं; स्वमू-- अपनी; आत्मानम्‌--पहचान; यत्‌-शकक्‍त्या--जिसके प्रभाव से;अहम्‌--ैं स्वतंत्र हूँ; धिया--इस बुद्धि से; हतम्‌--पराजित या आच्छादित; तम्‌--उसको; दुरत्यय--समझने में कठिन;माहात्म्यमू--जिसका यश; भगवन्तमू-- भगवान्‌ का; इत:ः--शरण लेकर; अस्मि अहमू--मैं हूँ |

मैं उन भगवान्‌ को सादर नमस्कार करता हूँ जिनकी माया से ईश्वर का अंश जीवदेहात्मबुद्धि के कारण अपनी असली पहचान को भूल जाता है |

मैं उन भगवान्‌ की शरण ग्रहणकरता हूँ जिनके यश को समझ पाना कठिन है |

श्रीशुक उवाचएवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेष॑ब्रह्मादयो विविधलिड्डरभिदाभिमाना: |

नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वात्‌तत्राखिलामरमयो हरिराविरासीतू ॥

३०॥

श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; गजेन्द्रमू--गजेन्द्र को; उपवर्णित--जिसका वर्णन;निर्विशेषम्‌--किसी विशेष व्यक्ति के लिए न होकर ( किन्तु ब्रह्म के लिए यद्यपि वह यह नहीं जानता था कि ब्रह्म कौन है );ब्रह्मा-आदय:--ब्रह्मा, शिव, इन्द्र तथा चन्द्र जैसे देवता; विविध--नाना प्रकार के; लिड्-भिदा--पृथक्‌-पृथक्‌ स्वरूपों से;अभिमाना:--अपने को पृथक्‌ सत्ता मानते हुए; न--नहीं; एते--सभी; यदा--जब; उपससूपु:--पास आया; निखिल-आत्मकत्वात्‌ू-- भगवान्‌ के हरएक के परमात्मा होने से; तत्र--वहाँ; अखिल--ब्रह्माण्ड का; अमर-मय:--देवताओं से युक्त( जो शरीर के केवल बाहरी अंग हैं ); हरिः--भगवान्‌जो हर वस्तु का हरण कर सकते हैं; आविरासीत्‌--प्रकट हुआ ( हाथीके समक्ष )

श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : जब गजेन्द्र किसी व्यक्ति विशेष का नाम न लेकरपरम पुरुष का वर्णन कर रहा था, तो उसने ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, चन्द्र इत्यादि देवताओं का आह्वाननहीं किया |

अतएव इनमें से कोई भी उसके पास नहीं आये |

किन्तु चूँकि भगवान्‌ हरि परमात्मा,पुरुषोत्तम हैं अतएव वे गजेन्द्र के समक्ष प्रकट हुए |

तं तद्ददार्तमुपलभ्य जगन्निवासः स्तोत्र निशम्य दिविजै: सह संस्तुवद्धिः |

छन्दोमयेन गरुडेन समुहामान-अश्रक्रायुधो भ्यगमदाशु यतो गजेन्द्र: ॥

३१॥

तम्‌--उसको ( गजेन्द्र को ); तद्बत्‌ू--उस तरह से; आर्तम्‌ू-दुखी ( घड़ियाल के आक्रमण से ); उपलभ्य--समझकर; जगत्‌-निवास:--भगवान्‌, जो सर्वत्र विद्यमान हैं; स्तोत्रमू--स्तुति; निशम्य--सुनकर; दिविजैः--स्वर्गलोक के निवासियों के; सह--साथ; संस्तुवद्ध्धिः--स्तुति करने वालों के द्वारा; छन्‍्दोमयेन--उनकी इच्छित गति से; गरुडेन--गरुड़ द्वारा; समुहामान: --ले जायेजाकर; चक्र--चक्रधारण किये हुए; आयुध:--अन्य हथियार यथा गदा; अभ्यगमत्‌--आ गये; आशु--तुरन्‍्त; यत:--जहाँ;गजेन्द्र:--गजेन्द्र स्थित था |

गजेन्द्र के प्रार्थना करने के कारण उसकी विकट स्थिति को समझने के पश्चात्‌ सर्वत्र निवासकरने वाले भगवान्‌ हरि देवताओं समेत वहाँ प्रकट हुए |

ये देवता उनकी स्तुति कर रहे थे |

अपनेहाथों में चक्र तथा अन्य आयुध लिए और अपने वाहन गरुड़ की पीठ पर सवार होकर वे तीत्रगति से अपनी इच्छानुसार गजेन्द्र के समक्ष प्रकट हुए |

सोडन्तःसरस्युरुबलेन गृहीत आर्तोइृष्टा गरुत्मति हरिं ख उपात्तचक्रम्‌ |

उत्क्षिप्प साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छा-न्ञारायणाखिलगुरो भगवन्नमस्ते ॥

३२॥

सः--वह ( गजेन्ध ); अन्त:-सरसि--जल में; उरु-बलेन--बलपूर्वक; गृहीत:--जो घड़ियाल द्वारा पकड़ा गया था; आर्त:--तथा अत्यन्त पीड़ित; दृष्टा--देखकर; गरुत्मति--गरुड़ की पीठ पर; हरिम्‌-- भगवान्‌ को; खे--आकाश में; उपात्त-चक्रम्‌--अपना चक्र घुमाते; उत्क्षिप्प--उठा कर; स-अम्बुज-करम्‌ू--कमल का फूल लिए अपनी सूंड़ को; गिरमू-आह--शब्द कहे;कृच्छात्‌--कठिनाई से; नारायण--हे भगवान्‌, नारायण; अखिल-गुरो--हे विश्व के स्वामी; भगवन्‌--हे भगवान्‌; नमः ते--मैंनमस्कार करता हूँ |

घड़ियाल ने गजेन्द्र को जल में बलपूर्वक पकड़ रखा था जिससे वह अत्यधिक पीड़ा काअनुभव कर रहा था, किन्तु जब उसने देखा कि नारायण अपना चक्र घुमाते हुए गरुड़ की पीठ पर बैठ कर आकाश में आ रहे हैं, तो उसने तुरन्त ही अपनी सूंड़ में कमल का एक फूल ले लियाऔर अपनी वेदना के कारण अत्यन्त कठिनाई से निम्नलिखित शब्द कहे 'हे भगवान्‌, नारायण,हे ब्रह्माण्ड के स्वामी! हे परमेश्वर! मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ |

'तं वीक्ष्य पीडितमज: सहसावतीर्यसग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार |

ग्राह्मट्विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रंसंपश्यतां हरिर्मूमुचदुच्छियाणाम्‌ ॥

३३॥

तम्‌--उसको ( गजेन्द्र को ); वीक्ष्य--( उस अवस्था में ) देख कर; पीडितम्‌--पीड़ित; अज:--अजन्मा भगवान्‌; सहसा--अचानक; अवतीर्य--( गरुड़ से ) उतरकर; स-ग्राहमू--घड़ियाल सहित; आशु--तुरन्त; सरस:--जल से; कृपया--कृपाकरके; उजहार--बाहर निकाल लिया; ग्राहत्‌ू-घड़ियाल से; विपाटित--अलग किया; मुखात्‌--मुख से; अरिणा--चक्र से;गजेन्द्रमू--गजेन्द्र को; सम्पश्यताम्‌--जो देख रहे थे; हरि:-- भगवान्‌; अमूम्‌--उसको ( गजेन्द्र को ); उचत्‌--बचा लिया;उच्छियाणाम्‌--सभी देवताओं की उपस्थिति में |

तत्पश्चात्‌ गजेन्द्र को ऐसी पीड़ित अवस्था में देखकर अजन्मा भगवान्‌ हरि तुरन्त अहैतुकी कृपावश गरुड़ की पीठ से नीचे उतरे और गजेन्द्र को घड़ियाल समेत जल के बाहर खींच लाये |

तब समस्त देवताओं की उपस्थिति में जो सारा दृश्य देख रहे थे, भगवान्‌ ने अपने चक्र सेघड़ियाल के मुख को उसके शरीर से पृथक्‌ कर दिया |

इस प्रकार उन्होंने गजेन्द्र को बचा लिया |

TO

← पिछला अध्याय · अगला अध्याय →

← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 8 की सूची