← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 8 की सूची
अध्याय चौबीस: मत्स्य, भगवान का मछली अवतार
8.24श्रीराजोबाचभगवज्छोतुमिच्छामि हरेरद्धुतकर्मण: |
अवतारकथामाद्यांमायामत्स्यविडम्बनम् ॥
१॥
श्री-राजा उवाच--राजा परीक्षित ने कहा; भगवन्--हे शक्तिमान; श्रोतुम्--सुनने की; इच्छामि--इच्छा करता हूँ; हरेः--भगवान् हरि के; अद्भुत-कर्मण:--जिनके कार्यकलाप अद्भुत हैं; अवतार-कथाम्--अवतार की लीलाएँ; आद्याम्-प्रथम;माया-मत्स्य-विडम्बनमू--जो मछली का अनुकरण मात्र है |
महाराज परीक्षित ने कहा : भगवान् हरि नित्य ही अपने दिव्य पद पर स्थित हैं; फिर भी वेइस भौतिक जगत में अवतरित होते हैं और विभिन्न रूपों में अपने आपको प्रकट करते हैं |
उनकापहला अवतार एक बड़ी मछली के रूप में हुआ |
हे सर्व-शक्तिमान शुकदेव गोस्वामी! मैं आपसेउस मत्स्यावतार की लीलाएँ सुनने का इच्छुक हूँ |
यदर्थमदधादूपं मात्स्यं लोकजुगुप्सितम् |
तमःप्रकृतिदुर्मर्ष कर्मग्रस्त इवेश्वर: ॥
२॥
एतन्नो भगवन्सर्व यथादद्वक्तुमहसि |
उत्तमएलोकचरितं सर्वलोकसुखावहम् ॥
३॥
यतू-अर्थम्-किस हेतु; अदधात्--स्वीकार किया; रूपम्ू--रूप; मात्स्यमू--मछली का; लोक-जुगुप्सितम्--इस संसार मेंतुच्छ मानी जाने वाली; तम:ः--तमोगुणी; प्रकृति--आचरण; दुर्मर्षम्ू--जो अत्यन्त पीड़ा-दायक तथा गर्हित है; कर्म-ग्रस्त:--कर्म के नियमों के अधीन; इब--सहश; ईश्वरः:-- भगवान्; एतत्--ये सारे तथ्य; न:--हमको; भगवनू--हे अत्यन्त शक्तिशालीसाधु; सर्वम्--हर वस्तु; यथावत्--ठीक से; वक्तुम् अहंसि--कृपा करके बतलायें; उत्तमशएलोक-चरितम्-- भगवान् कीलीलाएँ; सर्व-लोक-सुख-आवहम्--जिसको सुनने से सभी सुखी होते हैं |
किस कारण से भगवान् ने कर्म-नियम के अन्तर्गत विविध रूप धारण करने वाले सामान्यजीव की भाँति ग्ित मछली का रूप स्वीकार किया ? मछली का रूप निश्चित रूप से गर्हित एवंघोर पीड़ा से पूर्ण होता है |
हे प्रभु! इस अवतार का क्या उद्देश्य था? कृपा करके मुझे समझाइयेक्योंकि भगवान् की लीलाओं का श्रवण हर एक के लिए मंगलकारी होता है |
श्रीसूत उबाचइत्युक्तो विष्णुरातेन भगवान्बादरायणि: |
उवबाच चरितं विष्णोर्मत्स्यरूपेण यत्कृतम् ॥
४॥
श्री-सूतः उबाच-- श्री सूत गोस्वामी ने कहा; इति उक्त: --इस प्रकार पूछे जाने पर; विष्णु-रातेन--महाराज परीक्षित द्वारा, जोविष्णुरात कहलाते हैं; भगवान्--अत्यन्त शक्तिमान; बादरायणि:--व्यासदेव के पुत्र शुकदेव गास्वामी ने; उवाच--कहीं;चरितम्--लीलाएँ; विष्णो:-- भगवान् विष्णु की; मत्स्य-रूपेण--मछली के रूप में उनके द्वारा; यत्--जो भी; कृतम्--कीगईं |
सूत गोस्वामी ने कहा : जब परीक्षित महाराज ने शुकदेव गोस्वामी से इस प्रकार जिज्ञासाप्रकट की तो उस महान् शक्तिशाली साधु पुरुष ने भगवान् के मत्स्यावतार की लीलाओं कावर्णन करना प्रारम्भ कर दिया |
श्रीशुक उबाचगोविप्रसुरसाधूनां छन्दसामपि चेश्वर: |
रक्षामिच्छंस्तनूर्थत्ते धर्मस्यार्थस्य चैव हि ॥
५॥
श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; गो--गायों का; विप्र--ब्राह्मणों का; सुर--देवताओं का; साधूनाम्ू--तथाभक्तों का; छन्दसाम् अपि--यहाँ तक कि वैदिक वाड्मय का भी; च--तथा; ईश्वर: --परम नियन्ता; रक्षाम्--रक्षा; इच्छन् --चाहते हुए; तनूः धत्ते--अवतारों के रूप धारण करते हैं; धर्मस्य-- धर्म का; अर्थस्य--जीवन के उद्देश्य के नियमों का; च--तथा; एब--निस्सन्देह; हि--निश्चय ही |
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन! गायों, ब्राह्मणों, देवताओं, भक्तों, वैदिक वाड्मय,धार्मिक सिद्धान्तों तथा जीवन के उद्देश्य को पूरा करने वाले नियमों की रक्षा करने के लिएभगवान् अवतरित होते हैं |
उच्चावचेषु भूतेषु चरन्वायुरिवेश्वर: |
नोच्चावचत्वं भजते निर्गुणत्वाद्द्धियो गुणै: ॥
६॥
उच्च-अवचेषु--उच्च या निम्न स्वरूपों वाले; भूतेषु--जीवों में; चरन्ू--आचरण करते हुए; वायु: इब--वायु की भाँति;ईश्वरः--परमे श्वर; न--नहीं ; उच्च-अवचत्वम्-- उच्च या निम्न कोटि के जीवन का गुण; भजते--स्वीकार करते हैं;निर्गुणत्वात्ू--समस्त भौतिक गुणों से ऊपर या दिव्य होने के कारण; धिय:--सामान्यतया; गुणै:-- प्रकृति के गुणों के द्वारा |
यद्यपि भगवान् कभी मनुष्य रूप में और कभी निम्न पशु के रूप में प्रकट होते हैं, किन्तु वेविभिन्न प्रकार के वायुमण्डल में से गुजरने वाली वायु की तरह प्रकृति से सदैव परे रहते हैं |
प्रकृति के गुणों से परे रहने के कारण वे उच्च तथा निम्न रूपों से प्रभावित नहीं होते |
आसीदतीतकल्पान्ते ब्राह्मो नैमित्तिको लय॒ः |
समुद्रोपप्लुतास्तत्र लोका भूरादयो नूप ॥
७॥
आसीतू--था; अतीत-- भूतकाल में; कल्प-अन्ते--कल्प के अन्त में; ब्राह्मः--ब्रह्मा के एक दिन का; नैमित्तिक:--उसकेकारण; लयः--प्लावन, बाढ़; समुद्र--समुद्र में; उपप्लुताः--जलमग्न हो गये; तत्र--वहाँ; लोका:--सारे लोक; भूः-आदयः -भू:, भुवः तथा स्वः ये तीनों लोक; नृप--हे राजा
है राजा परीक्षित! विगत कल्प के अन्त में, ब्रह्म का दिन समाप्त होने पर ब्रह्मा की निद्रा केकारण रात में प्रलय आ गई और तीनों लोक समुद्र के जल से प्लवित हो गये |
कालेनागतनिद्रस्य धातु: शिशयिषोर्बली |
मुखतो निःसृतान्वेदान्हयग्रीवो उन्तिके हरत् ॥
८॥
कालेन--काल ( ब्रह्म के दिन के अन्त ) के कारण; आगत-निद्रस्य--जब उन्हें नींद आने लगी; धातु:--ब्रह्मा का;शिशयिषो:--सोने के लिए लेटने की इच्छा करते हुए; बली--शक्तिशाली; मुखत:--मुख से; निःसृतान्ू--निकलता हुआ;वेदानू--वैदिक ज्ञान को; हयग्रीव:--हयग्रीव नामक असुर ने; अन्तिके--पास ही; अहरत्--चुरा लिया |
ब्रह्मा का दिन समाप्त होने पर जब ब्रह्मा को नींद आने लगी और वे लेटने की इच्छा करनेलगे तब उस समय उनके मुख से वेद निकल रहे थे |
तभी हयग्रीव नामक महान् राक्षस ने उसवैदिक ज्ञान को चुरा लिया |
ज्ञात्वा तद्दानवेन्द्रस्थ हयग्रीवस्य चेष्टितम् |
दधार शफरीरूपं भगवान्हरिरीश्वर: ॥
९॥
ज्ञात्वा--जानकर; तत्--उस; दानव-इन्द्रस्य--महान् असुर; हयग्रीवस्य--हयग्रीव का; चेष्टितम्ू--कार्यकलाप; दधार-- धारणकिया; शफरी-रूपम्ू--मछली का रूप; भगवान्-- भगवान्; हरि: -- हरि ने; ईश्वर: --परम नियन्ता |
यह जानकर कि यह कार्य महान् असुर हयग्रीव ने किया है, सर्व-ऐश्वर्यशाली भगवान् हरि नेमछली का रूप धारण किया और उस असुर को मारकर वेदों को बचाया |
तत्र राजऋषि: कश्रिन्नाम्ना सत्यव्रतो महान् |
नारायणपरोतपत्तप: स सलिलाशन: ॥
१०॥
तत्र--उस प्रसंग में; राज-ऋषि:--राजा जो ऋषि के समान भी योग्य हो; कश्चित्ू--कोई; नाम्ना--नाम वाला; सत्यब्रत:--सत्यव्रत; महान्ू--महापुरुष; नारायण-पर:ः -- भगवान् नारायण का महान् भक्त; अतपत्--तपस्या की; तपः--तपस्या; सः--उसने; सलिल-आशन:--केवल जल पीकर
चाक्षुष मन्वन्तर में सत्यव्रत नाम का एक महानू् राजा हुआ जो भगवान् का बड़ा भक्त था |
उसने केवल जल-पान को आधार बनाकर तपस्या की |
योसावस्मिन्महाकल्पे तनयः: स विवस्वत: |
श्राद्धदेव इति ख्यातो मनुत्वे हरिणार्पित: ॥
११॥
यः--जो; असौ--वह ( परम पुरुष ); अस्मिन्ू--इसमें; महा-कल्पे--महा कल्प में; तनय:--पुत्र; सः--वह; विवस्वत: --सूर्यदेव का; श्राद्धदेव:--श्राद्धदेव के नाम से; इति--इस प्रकार; ख्यात:--प्रसिद्ध; मनुत्वे--मनु के पद पर; हरिणा-- भगवान्द्वारा; अर्पित:--स्थित था |
इस ( वर्तमान ) कल्प में राजा सत्यव्रत बाद में सूर्यलोक के राजा विवस्वान का पुत्र बनाऔर श्राद्धदेव के नाम से विख्यात हुआ |
भगवान् की कृपा से उसे मनु का पद प्राप्त हुआ |
एकदा कृतमालायां कुर्वतो जलतर्पणम् |
तस्याञ्जल्युदके काचिच्छफर्येका भ्यपद्मयत ॥
१२॥
एकदा--एक दिन; कृतमालायाम्--कृतमाला नदी के तट पर; कुर्बतः--देते हुए; जल-तर्पणम्--जल का अर्घ्य; तस्थ--उसकी; अज्जलि--अंजुलि भर; उदके--जल में; काचित्--कोई; शफरी--छोटी मछली; एका--एक; अभ्यपद्यत--प्रकटहुई
एक दिन जब राजा सत्यव्रत कृतमाला नदी के तट पर जल का तर्पण करके तपस्या कर रहा था, तो उसकी अंजुली के जल में एक छोटी सी मछली प्रकट हुईं |
सत्यव्रतोझजलिगतां सह तोयेन भारत |
उत्ससर्ज नदीतोये शफरीं द्रविडेश्वरः ॥
१३॥
सत्यव्रतः--राजा सत्यव्रत; अज्ञलि-गताम्--राजा की अंजुली के पानी में आई हुई; सह--साथ; तोयेन--जल के; भारत--हेराजा परीक्षित; उत्ससर्ज--फेंक दिया; नदी-तोये--नदी के जल में; शफरीम्--छोटी मछली को; द्रविड-ई श्ररः--द्रविड देश केराजा सत्यक्रत ने |
हे भरतवंशी राजा परीक्षित! द्रविडदेश के राजा सत्यव्रत ने अपनी अंजुली के जल के साथउस मछली को नदी के जल में फेंक दिया |
तमाह सातिकरुणं महाकारुणिकं नृपम् |
यादोभ्यो ज्ञातिघातिभ्यो दीनां मां दीनवत्सल |
कथ॑ं विसृजसे राजन्भीतामस्मिन्सरिज्ले ॥
१४॥
तम्--उससे ( सत्यव्रत से )) आह--कहा; सा--उस छोटी मछली ने; अति-करुणम्--अत्यन्त करुणामय; महा-कारुणिकम्--अत्यन्त कृपालु; नृपम्--राजा सत्यव्रत को; यादोभ्य:--जलच्रों के द्वारा; ज्ञाति-घातिभ्य:--जो छोटी मछलियों को खाने केलिए सदैव उत्सुक रहते हैं; दीनामू--बेचारी; माम्--मुझको; दीन-वत्सल--हे दीनों के रक्षक; कथम्--क््यों; विसृजसे--फेंकरहे हो; राजन्--हे राजा; भीताम्-- अत्यन्त भयभीत; अस्मिनू--इस; सरित्-जले--नदी के जल में |
उस बेचारी छोटी मछली ने अत्यन्त कृपालु राजा सत्यव्रत से करुणापूर्ण स्वर में कहा : हेदीनों के रक्षक राजा! आप मुझे नदी के जल में क्यों फेंक रहे हैं जहाँ पर अन्य जलचर हैं, जोमुझे मार सकते हैं ? मैं उनसे बहुत भयभीत हूँ |
तमात्मनो नुग्रहार्थ प्रीत्या मत्स्यवपुर्धरम् |
अजानन्रक्षणार्थाय शफर्या: स मनो दधे ॥
१५॥
तम्--उस; आत्मन:--निजी; अनुग्रह-अर्थम्--अनुग्रह दिखाने के लिए; प्रीत्या--अत्यधिक प्रसन्न होकर; मत्स्य-वपु:-धरम्--मछली का शरीर धारण करने वाले भगवान् को; अजाननू--बिना जाने; रक्षण-अर्थाय--रक्षा करने के लिए; शफर्या:--मछलीकी; सः--उस राजा ने; मन:ः--मन में; दधे--निश्चय किया |
राजा सत्यव्रत ने यह न जानते हुए कि यह मछली भगवान् है अपनी प्रसन्नता के लिए सहर्षउस मछली को संरक्षण प्रदान करने का निर्णय लिया |
तस्या दीनतरं वाक्यमाश्रुत्य स महीपति: |
कलशाप्सु निधायैनां दयालुर्निन्य आश्रमम् ॥
१६॥
तस्या:--उस मछली के; दीन-तरम्--अत्यन्त कारुणिक; वाक्यम्--वचन को; आश्रुत्य--सुनकर; सः --वह; मही-पतिः --राजा; कलश-अप्सु--कलश में रखे जल में; निधाय--रखकर; एनाम्--इस मछली को; दयालु:--दयालु; निन््ये--ले आया;आश्रमम्--अपने घर
उस मछली के कारुणिक शब्दों से प्रभावित होकर उस दयालु राजा ने उस मछली को एकजलपात्र में रख लिया और उसे अपने घर ले आया |
सा तु तत्रैकरात्रेण वर्धभाना कमण्डलौ |
अलब्ध्वात्मावकाशं वा इृदमाह महीपतिम् ॥
१७॥
सा--वह मछली; तु--लेकिन; तत्र--वहाँ; एक-रात्रेण--एक ही रात में; वर्धभाना--बढ़कर; कमण्डलौ--जलतपात्र में;अलब्ध्वा--न पाकर; आत्म-अवकाशम्--अपने शरीर के लिए सुविधाजनक स्थान; वा--अथवा; इृदम्--यह; आह--कहा;मही-पतिम्--राजा से |
किन्तु मछली एक ही रात में इतनी बड़ी हो गई कि उसे उस जलपात्र में अपना शरीर इधर-उधर घुमाने में कठिनाई होने लगी |
तब उसने राजा से इस प्रकार कहा |
नाहं कमण्डलावस्मिन्कृच्छूं वस्तुमिहोत्सहे |
कल्पयौक: सुविपुलं यत्राहं निवसे सुखम् ॥
१८॥
न--नहीं; अहम्--मैं; कमण्डलौ--जलपात्र में; अस्मिन्ू--इस; कृच्छुमू--बड़ी कठिनाई से; वस्तुम्--रहने के लिए; इह--यहाँ; उत्सहे-- पसन्द करती हूँ; कल्पय--जरा सोचो; ओक:--रहने का स्थान; सु-विपुलम्--अधिक विस्तृत; यत्र--जहाँ;अहम्--मैं; निवसे--रह सकूँ; सुखम्--सुखपूर्वक हे
मेरे प्रिय राजा! मैं इस जलपात्र में इतनी कठिनाई से रहना पसन्द नहीं करती हूँ |
अतएवकृपा करके इससे अच्छा जलाशय ढूँढें जहाँ मैं सुखपूर्वक रह सकूँ |
स एनां तत आदाय न्यधादौदग्जनोदके |
तत्र क्षिप्ता मुहूर्तेन हस्तत्रयमवर्धत ॥
१९॥
सः--राजा ने; एनाम्ू--मछली को; ततः--तत्पश्चात; आदाय--निकाल कर; न्यधात्--डाल दिया; औदश्लन-उदके--कुएँ केजल में; तत्र--वहाँ; क्षिप्ता--फेंकी जाकर; मुहूर्तेन--एक ही क्षण में; हस्त-त्रयमू--तीन हाथ; अवर्धत--तुरन्त बढ़ गई
तत्पश्चात् राजा ने उस मछली को जलपात्र से निकाल कर एक विशाल कुएँ में डाल दिया |
किन्तु वह मछली एक क्षण में ही बढ़कर तीन हाथ की हो गई |
नम एतदलं राजन्सुखं वस्तुमुदक्लनम् |
पृथु देहि पदं मह्यं यत्त्वाहं शरणं गता ॥
२०॥
न--नहीं; मे--मुझको; एतत्--यह; अलमू्--उपयुक्त; राजन्ू--हे राजा; सुखम्--सुख से; वस्तुम्ू--रहने के लिए; उदख्लननम्--जलाशय; पृथु--काफी बड़ा; देहि--दीजिये; पदम्--स्थान; महामम्--मुझको; यत्--जो; त्वा--तुम्हारी; अहम्--मैं;शरणमू--शरण में; गता--आई हुई
तब मछली ने कहा : हे राजा! यह जलाशय मेरे सुखमय निवास के लिए उपयुक्त नहीं है |
कृपया और अधिक विस्तृत जलाशय प्रदान करें क्योंकि मैं आपकी शरण में आई हूँ |
तत आदाय सा राज्ञा क्षिप्ता राजन्सरोवरे |
तदावृत्यात्मना सोयं महामीनोन्ववर्धत ॥
२१॥
ततः--वहाँ से; आदाय--लाकर; सा--वह मछली; राज्ञा--राजा द्वारा; क्षिप्ता--डाली जाकर; राजनू--हे राजा परीक्षित;सरोवरे--झील में; तत्--उस; आवृत्य--ढ़ककर; आत्मना--शरीर से; सः--मछली; अयम्--यह; महा-मीन:--विशालमछली; अन्ववर्धत--तुरन्त बढ़ गई |
हे महाराज परीक्षित! राजा ने उस मछली को कुएँ से निकाला और उसे एक झील में डालदिया, किन्तु तब उस मछली ने जल के विस्तार से भी अधिक विशाल रूप धारण कर लिया |
नैतन्मे स्वस्तये राजन्नुदकं सलिलौकस: |
निधेहि रक्षायोगेन ह॒ंदे मामविदासिनि ॥
२२॥
न--नहीं; एतत्--यह; मे--मुझको; स्वस्तये--सुखी; राजनू--हे राजा; उदकम्--जल; सलिल-ओकस:--क्योंकि मैं विशालजलवचर हूँ; निधेहि--रख दें; रक्षा-योगेन--किसी उपाय से; हृदे--झील में; माम्--मुझको; अविदासिनि--शाश्वत |
तब मछली ने कहा : हे राजा! मैं विराट जलचर हूँ और यह जल मेरे लिए तनिक भी उपयुक्तनहीं है |
अब कृपा करके मुझे बचाने का कोई उपाय ढूँढ निकालिए |
अच्छा हो यदि आप मुझेऐसी झील के जल में रखें जो कभी न घटे |
इत्युक्त: सोउनयन्मत्स्यं तत्र तत्राविदासिनि |
जलाशयेसम्सितं तं समुद्रे प्राक्षिपज्झषम् ॥
२३॥
इति उक्त:--इस प्रकार प्रार्थना किया गया; सः--राजा; अनयत्--ले गया; मत्स्यम्ू--मछली को; तत्र--वहाँ; तत्र--जहाँ;अविदासिनि--जल कभी नहीं घटता; जल-आशये--जल के आगार में; असम्मितम्-- असीम; तम्--उसको; समुद्रे--समुद्र में;प्राक्षिपत्--डाल दिया; झषम्--विशाल मछली को
इस प्रकार प्रार्थना किये जाने पर राजा सत्यव्रत उस मछली को जल के सबसे बड़े आगार मेंले आया |
किन्तु जब वह भी अपर्याप्त सिद्ध हुआ तो राजा ने अन्त में उस मछली को समुद्र मेंडाल दिया |
क्षिप्पमाणस्तमाहेदमिह मां मकरादय: |
अदन्त्यतिबला वीर मां नेहोत्स्त्रष्टमहसि ॥
२४॥
क्षिप्पमाण: --समुद्र में फेंके जाने पर; तमू--राजा से; आह--मछली ने कहा; इदम्--यह; इह--इस स्थान में; मामू--मुझको;मकर-आदयः:--मगर जैसे घातक जलचर; अदन्ति--खा लेंगे; अति-बला:--अत्यन्त बलशाली होने के कारण; वीर--हे वीरराजा; मामू--मुझको; न--नहीं; इह--इस जल में; उत्स्रष्टमू--फेंकना; अर्हसि--तुम्हें चाहिए |
समुद्र में फेंके जाते समय मछली ने राजा सत्यव्रत से कहा : हे वीर! इस जल में अत्यन्तशक्तिशाली एवं घातक मगर हैं, जो मुझे खा जायेंगे |
अतएव तुम मुझे इस स्थान में मत डालो |
एवं विमोहितस्तेन बदता वल्गुभारतीम् |
तमाह को भवानस्मान्मत्स्यरूपेण मोहयन् ॥
२५॥
एवम्--इस प्रकार; विमोहित:--मोह ग्रस्त; तेन--उस मछली के द्वारा; बदता--कहे जाने पर; वल्गु-भारतीम्--मधुर वचन;तम्ू--उससे; आह--कहा; क: -- कौन; भवान्--आप; अस्मान्--हमको; मत्स्य-रूपेण--मछली के रूप में; मोहयन्--मोहितकरने वाले |
मत्स्यरूप भगवान् से इन मधुर बचनों को सुनकर मोहित हुए राजा ने पूछा : आप कौन हैं ?आप तो हम सबको मोहित कर रहे हैं |
नैवं वीयों जलचरो दृष्टोउस्माभि: श्रुतोडपि वा |
यो भवान्योजनशतमह्नाभिव्यानशे सर: ॥
२६॥
न--नहीं; एवम्--इस प्रकार; वीर्य:--शक्तिशाली; जल-चर:--जलचर; दृष्ट:--देखा गया; अस्माभि: --हमारे द्वारा; श्रुतःअपि--न ही सुना गया; वा--अथवा; यः--जो; भवान्ू--आप; योजन-शतम्--सैकड़ों मील तक; अद्वा--एक दिन में;अभिव्यानशे--बढ़कर; सर:--जल |
हे प्रभु! एक ही दिन में आपने अपना विस्तार सैकड़ों मील तक करके नदी तथा समुद्र केजल को आच्छादित कर लिया है |
इससे पहले मैंने न तो ऐसा जलचर पशु देखा था और न हीसुना था |
नून॑ त्वं भगवान्साक्षाद्धरिनारायणोव्ययः |
अनुग्रहाय भूतानां धत्से रूपं जलौकसाम् ॥
२७॥
नूनम्--निश्चय ही; त्वम्--तुम हो; भगवान्-- भगवान्; साक्षात्- प्रत्यक्ष; हरिः-- भगवान्; नारायण: -- भगवान् ; अव्यय:--अव्यय; अनुग्रहाय--दया दिखाने के लिए; भूतानाम्--सारे जीवों के लिए; धत्से--धारण किया है; रूपमू--रूप; जल-ओकसाम्--जलचर की तरह |
हे प्रभु! आप निश्चय ही अव्यय भगवान् नारायण श्री हरि हैं |
आपने जीवों पर अपनी कृपाप्रदर्शित करने के लिए ही अब जलचर का स्वरूप धारण किया है |
नमस्ते पुरुषश्रेष्ठ स्थित्युत्पत्त्यप्यये श्वर |
भक्तानां नः प्रपन्नानां मुख्यो हयात्मगतिर्विभो ॥
२८॥
नमः--मैं सादर नमस्कार करता हूँ; ते--तुमको; पुरुष-श्रेष्ठ--हे जीवों में श्रेष्ठ, समस्त भोक्ताओं में श्रेष्ठ; स्थिति--पालन;उत्पत्ति--सृष्टि; अप्यय--तथा संहार के; ईश्वर--परमेश्वर; भक्तानाम्--अपने भक्तों के; नः--हम जैसे; प्रपन्नानामू--शरणागतोंके; मुख्य:--परम; हि--निस्सन्देह; आत्म-गति:--परम गन्तव्य; विभो-- भगवान् विष्णु |
हे प्रभु, हे सृष्टि, पालन तथा संहार के स्वामी! हे भोक्ताओं में श्रेष्ठ भगवान् विष्णु! आप हमजैसे शरणागत भक्तों के नेता तथा गन्तव्य हैं |
अतएव मैं आपको सादर प्रणाम करता हूँ |
सर्वे लीलावतारास्ते भूतानां भूतिहेतव: |
ज्ञातुमिच्छाम्यदो रूपं यदर्थ भवता धृतम् ॥
२९॥
सर्वे--सारी; लीला--लीलाएँ; अवतारा:--अवतार; ते--आपके ; भूतानाम्--जीवों के; भूति--फूलने-फलने ( अभ्युदय ) कीस्थिति के लिए; हेतवः--कारण; ज्ञातुमू--जानने के लिए; इच्छामि--इच्छा करता हूँ; अदः--यह; रूपम्--रूप; यत्-अर्थम्--जिसलिए; भवता--आपके द्वारा; धृतमू--धारण किया गया |
आपकी सारी लीलाएँ तथा अवतार निश्चय ही समस्त जीवों के कल्याण के लिए होते हैं |
अतएव हे प्रभु! मैं वह प्रयोजन जानना चाहता हूँ जिसके लिए आपने यह मत्स्यरूप धारण कियाहै |
न तेरविन्दाक्ष पदोपसर्पणंमृषा भवेत्सर्वसुहत्प्रियात्मन: |
यथेतरेषां पृथगात्मनां सता-मदीहृशो यद्वपुरद्भधुतं हि न: ॥
३०॥
न--कभी नहीं; ते--आपके ; अरविन्द-अक्ष--हे कमलनेत्रों वाले मेरे प्रभु; पद-उपसर्पणम्--चरणकमलों की पूजा; मृषा--व्यर्थ; भवेत्ू--हो सकती है; सर्व-सुहृत्--सबों के मित्र; प्रिय--सबों के प्यारे; आत्मन:--हर एक के परमात्मा; यथा--जिसप्रकार; इतरेषाम्--अन्यों ( देवताओं ) का; पृथक्-आत्मनाम्--आत्मा से भिन्न देहधारी जीव; सताम्--अध्यात्म में स्थित लोगोंका; अदीहश:--आपने दिखलाया है; यत्--जो; वपु:--शरीर; अद्भुतम्ू--अद्भुत; हि--निस्सन्देह; न:ः--हमको |
हे कमल की पंखुरियों के समान नेत्रों वाले प्रभु! देहात्मबुद्धि वाले देवताओं की पूजा सभीतरह से व्यर्थ है |
चूँकि आप हर एक के परम मित्र तथा प्रियतम परमात्मा हैं अतएव आपकेचरणकमलों की पूजा कभी व्यर्थ नहीं जाती |
इसलिए आपने मछली का रूप दिखलाया है |
श्रीशुक उबाचइति ब्लुवाणं नृपतिं जगत्पतिःसत्यक्रतं मत्स्यवपुर्युगक्षये |
विहर्तुकाम: प्रलयार्णवेब्रवी-चिविकीर्षुरिकान्तजनप्रिय: प्रियम् ॥
३१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; ब्रुवाणम्--बोलते हुए; नृपतिम्--राजा को; जगत्-पतिः--सम्पूर्ण विश्व के स्वामी; सत्यव्रतम्--सत्यव्रत को; मत्स्य-वपु:--मत्स्य का शरीर धारण करने वाले भगवान् ने; युग-क्षये--युग के अन्त में; विहर्तु-काम:--अपनी लीलाओं का भोग करने के लिए; प्रलय-अर्णवे--बाढ़ के जल में; अब्नवीत्--कहा; चिकीर्षु:--करने का इच्छुक; एकान्त-जन-प्रिय:--भक्तों के परम प्रिय; प्रियम्--अत्यन्त लाभप्रद वस्तु |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब राजा सत्यवब्रत ने इस तरह कहा तो अपने भक्त को लाभपहुँचाने तथा बाढ़ के जल में अपनी लीलाओं का आनन्द उठाने के लिए युग के अन्त में मछलीका रूप धारण करने वाले भगवान् ने इस प्रकार उत्तर दिया |
श्रीभगवानुवाचसप्तमे हाद्यतनादूर्ध्वमहन्येतदरिन्दम |
निमदृछ्त्यत्यप्ययाम्भोधौ त्रैलोक्यं भूर्भुवादिकम् ॥
३२॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; सप्तमे--सातवें; हि--निस्सन्देह; अद्यतनात्ू-- आज से; ऊर्ध्वम्ू-- आगे; अहनि--दिनमें; एतत्--यह सृष्टि; अरिम्दम--हे शत्रुओं को दमन कर सकने वाले राजा; निमड्छ््यति--जल में डूब जायेगी; अप्यय-अम्भोधौ--प्रलय के सागर में; त्रैलोक्यम्--तीनों लोक; भू:-भुव-आदिकम्-- भूलोक, भुवर्लोक तथा स्वलॉक
भगवान् ने कहा : हे शत्रुओं को दमन कर सकने वाले राजा! आज से सातवें दिन भू:,भुवः, तथा स्वः ये तीनों लोक बाढ़ के जल में डूब जायेंगे |
त्रिलोक्यां लीयमानायां संवर्ताम्भसि वै तदा |
उपस्थास्यति नौ: काचिद्विशाला त्वां मयेरिता ॥
३३॥
त्रि-लोक्याम्--तीनों लोकों; लीयमानायाम्--जलमग्न हो जाने पर; संवर्त-अम्भसि--प्रलय के जल में; बै--निस्सन्देह; तदा--उस समय; उपस्थास्थति-- प्रकट होगी; नौ: --नाव; काचित्--एक; विशाला--बहुत बड़ी; त्वाम्--तुम्हारे पास; मया--मेरेद्वारा; ईरिता-- भेजी गयी |
जब तीनों लोक जल में डूब जायेंगे तो मेरे द्वारा भेजी गई एक विशाल नाव तुम्हारे समक्षप्रकट होगी |
त्वं तावदोषधीः सर्वा बीजान्युच्यावचानि च |
सप्तर्षिभि: परिवृतः सर्वसत्त्वोपबृंहित: ॥
३४॥
आरुह्य बृहतीं नावं विचरिष्यस्यविक्लव: |
एकार्णवे निरालोके ऋषीणामेव वर्चसा ॥
३५॥
त्वमू--तुम; तावत्--उस समय तक; ओषधी:-- औषधियाँ; सर्वा:--सभी तरह की; बीजानि--बीज; उच्च-अवचानि--उच्चतथा निम्न; च--तथा; सप्त-ऋषिभि:--सात ऋषियों से; परिवृत:--घिरा हुआ; सर्व-सत्त्व--सभी प्रकार के जीव;उपबृूंहितः--से घिरा; आरुह्य--चढ़कर; बृहतीम्--अत्यन्त बड़ी; नावम्ू--नाव में; विचरिष्यसि--विचरण करोगे;अविक्लव:--खिन्नतारहित; एक-अर्णवे--बाढ़ के सागर में; निरालोके --बिना प्रकाश के; ऋषीणाम्--ऋषियों के; एव--निस्सन्देह; वर्चसा--तेज से |
हे राजा! तत्पश्चात् तुम सभी तरह की औषधियाँ एवं बीज एकत्र करोगे और उन्हें उस विशालनाव में लाद लोगे |
तब सप्तर्षियों समेत एवं सभी प्रकार के जीवों से घिरकर तुम उस नाव मेंचढ़ोगे और बिना किसी खिन्नता के तुम अपने संगियों सहित बाढ़ के समुद्र में सुगमता सेविचरण करोगे |
उस समय ऋषियों का तेज ही एकमात्र प्रकाश होगा |
दोधूयमानां तां नावं समीरेण बलीयसा |
उपस्थितस्य मे श्रुड्धे निबध्नीहि महाहिना ॥
३६॥
दोधूयमानाम्--डगमगाती; ताम्--उस; नावम्--नाव को; सरमीरेण--हवा से; बलीयसा--शक्तिशाली; उपस्थितस्थ--पास हीउपस्थित; मे--मेरे; श्रृद्धे--सींग में; निबध्नीहि--बाँध देना; महा-अहिना--महान् सर्प ( वासुकी ) से
तब ज्योंही नाव तेज हवा से डगमगाने लगे तुम उसे महान् सर्प वासुकि के द्वारा मेरे सींग सेबाँध देना क्योंकि मैं तुम्हारे पास ही उपस्थित रहूँगा |
अहं त्वामृषिभि: सार्थ सहनावमुदन्वति |
विकर्षन्विचरिष्यामि यावद्वाह्मी निशा प्रभो ॥
३७॥
अहमू--ैं; त्वामू--तुमको; ऋषिभि:--सारे ऋषियों के; सार्थम्ू--साथ; सह--से युक्त; नावम्--नाव; उदन्वति--प्रलय केजल में; विकर्षन्ू--खींचते हुए; विचरिष्यामि--विचरण करूँगा; यावत्--जब तक; ब्राह्मी--ब्रह्मा की; निशा--रात्रि; प्रभो--हे राजा
हे राजा! नाव में बैठे तुम्हं तथा सारे ऋषियों को खींचते हुए, प्रलय-जल में मैं तब तकविचरण करूँगा जब तक ब्रह्मा की शयन-रात्रि समाप्त नहीं हो जाती |
मदीयं महिमानं च परं ब्रह्मेति शब्दितम् |
वेल्स्यस्यनुगृहीतं मे सम्प्रश्नेर्विवृतं हदि ॥
३८ ॥
मदीयम्--मेरी; महिमानम्ू--महिमा; च--तथा; परम् ब्रह्म--परम ब्रह्म, परम सत्य; इति--इस प्रकार; शब्दितम्--विख्यात;वेत्स्यसि--तुम समझोगे; अनुगृहीतम्--कृपा पाकर; मे--मेरे द्वारा; सम्प्रश्नै:--प्रश्नों के द्वारा; विवृतम्--पूर्णतया व्याख्याकिया गया; हृदि--हृदय में
मैं तुम्हें ठीक से सलाह दूँगा और तुम्हारा पक्ष भी लूँगा और मुझ परब्रह्म की महिमाओं केविषय में तुम्हारी जिज्ञासाओं के कारण हर बात तुम्हारे हृदय के भीतर प्रकट होगी |
इस तरह तुममेरे विषय में सब कुछ जान लोगे |
इत्थमादिश्य राजानं हरिरन्तरधीयत |
सोडन्ववैक्षत तं काल॑ यं हषीकेश आदिशत् ॥
३९॥
इत्थम्--जैसाकि पहले कहा जा चुका है; आदिश्य-- आदेश देकर; राजानम्--राजा ( सत्यक्रत ) को; हरिः-- भगवान्अन्तरधीयत--उस स्थान से अदृश्य हो गये; सः--वह ( राजा ); अन्ववैक्षत--प्रतीक्षा करने लगा; तम् कालम्--उस समय की;यम्--जो; हषीक-ईश: --समस्त इन्द्रियों के स्वामी, हषीकेश ने; आदिशत्--आदेश दिया |
राजा को इस प्रकार आदेश देने के बाद भगवान् तुरन्त अन्तर्धान हो गये |
तब राजा सत्यत्रतउस काल की प्रतीक्षा करने लगा, जिसका आदेश भगवान् दे गये थे |
आस्तीर्य दर्भान्प्राकूलान्राजर्षि: प्रागुदद्मुख: |
निषसाद हरे: पादौ चिन्तयन्मत्स्यरूपिण: ॥
४०॥
आस्तीर्य--फैलाकर; दर्भानू-कुशों; प्राकु-कूलान्ू--जिसके सिरे पूर्व की ओर थे; राज-ऋषि:--सन्तराजा सत्यक्रत; प्राक्-उदक्-मुखः:--उत्तर पूर्व ( ईशान् ) की ओर मुख किये; निषसाद--बैठ गया; हरेः -- भगवान् के; पादौ--चरणकमलों पर;चिन्तयन्--ध्यान करते हुए; मत्स्य-रूपिण:--जिसने मछली का रूप धारण किया था |
सन्त राजा ने कुशों के सिरों को पूर्व दिशा की ओर करके उन्हें बिछा दिया और स्वयं उत्तरपूर्व की ओर मुख करके कुशों पर बैठकर उन भगवान् विष्णु का ध्यान करने लगा जिन्होंनेमछली का रूप धारण किया था |
ततः समुद्र उद्ेल: सर्वतः प्लावयन्महीम् |
वर्धमानो महामेघैर्वर्षद्धि: समहश्यत ॥
४१॥
ततः--तत्पश्चात्; समुद्र: --समुद्र; उद्वेल:--उमड़ता हुआ; सर्वतः--सर्वत्र; प्लावयन्ू--जलमग्न करते हुए; महीम्--पृथ्वी को;वर्धमान:--अधिकाधिक बढ़कर; महा-मेघै:--विशाल बादलों के द्वारा; वर्षद्धिः--लगातार वर्षा द्वारा; समहश्यत--राजा नेदेखा
तत्पश्चात् विशाल बादलों ने झड़ी लगाकर समुद्र के जल को और अधिक चढ़ा दिया |
इससेसमुद्र बढ़कर स्थल के ऊपर बहने लगा और उसने समस्त विश्व को जलमग्न करना आरम्भ करदिया |
ध्यायन्भगवदादेशं दहशे नावमागताम् |
तामारुरोह विप्रेन्द्रेशदायौषधिवीरुध: ॥
४२॥
ध्यायन्ू--स्मरण करते हुए; भगवत्-आदेशम्-- भगवान् के आदेश; दहशे--उसने देखा; नावम्--नाव को; आगताम्--पासआती हुई; तामू--उसमें; आरुरोह--चढ़ गया; विप्र-इन्द्रै:--साधु ब्राह्मणों सहित; आदाय--लेकर; औषधि---औषधियाँ;वीरुध:--तथा लताएँ |
ज्योंही सत्यत्रत को भगवान् का आदेश स्मरण आया त्योंही उसे अपनी ओर आती हुई एकनाव दिखी |
तब उसने वनस्पतियों तथा लताओं को एकत्र किया और वह साधु ब्राह्मणों कोसाथ लेकर उस नाव में चढ़ गया |
तमूचुर्मुनयः प्रीता राजन्ध्यायस्व केशवम् |
स वै नः सड्डूटादस्मादविता शं विधास्यति ॥
४३॥
तम्--उस राजा से; ऊचु:--कहा; मुनयः:--सारे सन्त ब्राह्मणों ने; प्रीता:--प्रसन्न होकर; राजन्--हे राजा; ध्यायस्व--ध्यानकरो; केशवम्-- भगवान् केशव का; सः--वह; बै--निस्सन्देह; न:ः--हमको; सड्जूटात्--संकट से; अस्मात्--जैसा अब दिखरहा है; अविता--बचायेगा; शम्--कल्याण की; विधास्यति--योजना करेगा
उन सन्त ब्राह्मणों ने प्रसन्न होकर राजा से कहा: हे राजा! भगवान् केशव का ध्यान'कीजिए |
वे हमें इस आसन्न संकट से उबार लेंगे और हमारे कल्याण की व्यवस्था करेंगे |
सोनुध्यातस्ततो राज्ञा प्रादुरासीन्महार्णवे |
एकश्रूड्रधरो मत्स्यो हैमो नियुतयोजन: ॥
४४॥
सः--भगवान्; अनुध्यात:--ध्यान किये जाने पर; ततः--त त्पश्चात् ( सन्त ब्राह्मणों के वचन सुनकर ); राज्ञा--राजा के द्वारा;प्रादुरासीत्ू--( उसके समक्ष ) प्रकट हुईं; महा-अर्णवे--प्रलय सागर में; एक-श्रूड़-धर:ः--एक सींग धारण किये; मत्स्य:--बड़ीमछली; हैमः--सोने की बनी; नियुत-योजन:ः--अस्सी लाख मील लम्बी
जब राजा भगवान् का निरन्तर ध्यान कर रहे थे तो प्रलय सागर में एक बड़ी सुनहरी मछलीप्रकट हुईं |
इस मछली के एक सींग था और वह अस्सी लाख मील लम्बी थी |
निबध्य नावं तच्छुड़े यथोक्तो हरिणा पुरा |
वरत्रेणाहिना तुष्टस्तुष्ठाव मधुसूदनम् ॥
४५ ॥
निबध्य--बांध कर; नावम्--नाव को; तत्- श्रृड़े-- बड़ी मछली के सींग पर; यथा-उक्त:--जैसी सलाह दी गई थी; हरिणा--भगवान् द्वारा; पुरा--पहले; वरत्रेण--रस्सी के द्वारा; अहिना--विशाल सर्प ( वासुकि ) द्वारा; तुष्ट:--प्रसन्न होकर; तुष्टाव--उसने प्रसन्न कर लिया; मधुसूदनम्--मधु के हन्ता भगवान् को
जैसा कि भगवान् पहले आदेश दे चुके थे उसका पालन करते हुए राजा ने वासुकि सर्प कोरस्सी बनाकर उस नाव को मछली के सींग में बाँध दिया |
फिर सन्तुष्ट होकर भगवान् की स्तुतिकरनी प्रारम्भ कर दी |
श्रीराजोबाचअनाद्यविद्योपहतात्मसंविद-स्तन्मूलसंसारपरिश्रमातुरा: |
यहच्छयोपसूता यमाप्नुयु-विमुक्तिदो नः परमो गुरुर्भवान् ॥
४६॥
श्री-राजा उवाच--राजा ने निम्नवत् स्तुति की; अनादि--अनन्त काल से; अविद्या--अज्ञान से; उपहत--विनष्ट हो गया है;आत्म-संविद:--आत्म-ज्ञान; तत्--वह है; मूल--जड़; संसार--भौतिक बन्धन; परिश्रम--दुखद स्थिति तथा कठिन श्रम सेपूर्ण; आतुरा:--कष्ट सहने वाले; यहच्छया--परम इच्छा से; उपसृता:--आचार्य का कृपापात्र; यम्-- भगवान् को; आजुयु:--प्राप्त कर सकता है; विमुक्ति-दः--मुक्ति की प्रक्रिया; न:ः--हमारा; परम: --परम; गुरु:--गुरु; भवानू--आप |
राजा ने कहा : भगवान् की कृपा से उन लोगों को जो अनन्त काल से आत्मज्ञान खो बैठे हैंऔर इस अविद्या के कारण भौतिक कष्टमय बद्ध जीवन में रह रहें हैं भगवद्भक्तों से भेंट करनेका अवसर मिलता है |
मैं उन भगवान् को परम आध्यात्मिक गुरु स्वीकार करता हूँ |
जनोबुधोयं निजकर्मबन्धन:सुखेच्छया कर्म समीहतेसुखम् |
यत्सेवया तां विधुनोत्यसन्मतिंग्रन्थि स भिन्द्यादधृदयं स नो गुरु: ॥
४७॥
जनः--जन्म तथा मृत्यु के अधीन बद्धजीव; अबुध:--शरीर को आत्मा स्वीकार करने के कारण सर्वाधिक मूर्ख; अयम्ू--यह;निज-कर्म-बन्धन:--अपने पापपूर्ण कार्यो के फलस्वरूप विभिन्न प्रकार के शरीरों को स्वीकार करते हुए; सुख-इच्छया--इसजगत में सुखी बनने की इच्छा से; कर्म--सकाम कर्म; समीहते--योजना बनाता है; असुखम्--केवल दुख के लिए; यत्-सेवया--जिसकी सेवा करने से; ताम्--कर्म बन्धन को; विधुनोति--स्वच्छ बनाता है; असत्-मतिमू--मलिन मनोवृत्ति ( शरीरको आत्मा मानते हुए ); ग्रन्थिम्--कठिन गाँठ; सः-- भगवान्; भिन्द्यात्ू--काटी जाकर; हृदयम्--हृदय में; सः--वह( भगवान् ); नः--हमारा; गुरु:--गुरु |
इस संसार में सुखी बनने की आकांक्षा से मूर्ख बद्धजीव सकाम कर्म करता है जिनसे केवलकष्ट ही मिलते हैं |
किन्तु भगवान् की सेवा करने से मनुष्य सुख की ऐसी झूठी इच्छाओं से मुक्तहो जाता है |
हे मेरे गुरु! मेरे हृदय से झूठी इच्छाओं की ग्रंथि को काट दें |
यत्सेवयाग्नेरिव रुद्ररोदनंपुमान्विजह्यान्मलमात्मनस्तम: ॥
भजेत वर्ण निजमेष सोव्ययोभूयात्स ईशः परमो गुरो्गुरु: ॥
४८ ॥
यत्-सेवया--जिस ( भगवान् की ) सेवा से; अग्ने: --अग्नि के स्पर्श में; इब--मानो; रुद्र-रोदनम्--चाँदी या सोने का टुकड़ापवित्र हो जाता है; पुमान्ू--पुरुष; विजह्मत्ू--त्याग सकता है; मलम्--संसार की सारी गंदी वस्तुओं को; आत्मन:--अपनी;तमः--तमोगुण, जिसके अन्तर्गत मनुष्य पवित्र तथा अपवित्र कर्म करता है; भजेत--असली रूप को प्राप्त करता है; वर्णम्--मूल पहचान; निजमू-- अपनी; एष:--ऐसा; सः--वह; अव्यय:--अव्यय; भूयात्--हो; सः--वह; ईशः-- भगवान्; परम: --परम; गुरो: गुरु:--गुरुओं के
गुरुभवबन्धन से जो छूटना चाहता है उसे भगवान् की सेवा करनी चाहिए और पवित्र तथाअपवित्र कर्मों से युक्त तमोगुण का संसर्ग छोड़ देना चाहिए |
इस तरह मनुष्य को अपनी मूलपहचान फिर से प्राप्त होती है, जिस प्रकार अग्नि में तपाने पर चाँदी या सोने का टुकड़ा अपनासारा मल छुड़ा कर शुद्ध हो जाता है |
ऐसे अव्यय भगवान्! आप हमारे गुरु बनें क्योंकि आपअन्य सभी गुरुओं के आदि गुरु हैं |
न यत्प्रसादायुतभागलेश-मन्ये च देवा गुरवो जना: स्वयम् |
कर्तु समेताः प्रभवन्ति पुंस-स्तमीथ्वरं त्वां शरणं प्रपदे ॥
४९॥
न--नहीं; यत्-प्रसाद-- भगवान् की कृपा; अयुत-भाग-लेशम्--मात्र दस हजारवाँ भाग; अन्ये-- अन्य; च-- भी; देवा: --देवता तक; गुरब:--तथाकथित गुरु; जना:--सारे लोग; स्वयम्--स्वयं; कर्तुमू--सम्पन्न करने के लिए; समेता:--कुलमिलाकर; प्रभवन्ति--समान रूप से समर्थ बन सकते हैं; पुंस:-- भगवान् द्वारा; तम्ू--उसको; ईश्वरम्--ई श्वर को; त्वामू--तुम्हारी; शरणम्--शरण; प्रपद्ये--ग्रहण करने दें |
न तो सारे देवता, न तथाकथित गुरू, न ही अन्य सारे लोग, स्वतंत्र रूप से या साथमिलकर, आपकी कृपा के दस हजारवें भाग के बराबर भी कृपा प्रदान कर सकते हैं |
अतएव मैंआपके चरणकमलों की शरण लेना चाहता हूँ |
अचक्षुरन्धस्य यथाग्रणी: कृतस् तथा जनस्याविदुषोबुधो गुरु: |
त्वमर्कहक्सर्वह॒शां समीक्षणोबृतो गुरु: स्वगतिं बुभुत्सताम् ॥
५०॥
अचक्षु:--जिसमें देखने की शक्ति न हो; अन्धस्य--अन्धे पुरुष का; यथा--जिस तरह; अग्रणी:--आगे चलने वाला नेता;कृतः--स्वीकृत; तथा--उसी प्रकार; जनस्य--ऐसे व्यक्ति का; अविदुष: --जिसे जीवन के लक्ष्य का कोई ज्ञान नहो; अबुध:--मूर्ख, मूढ़; गुरु: --गुरु; त्वमू--तुम; अर्क-हक्--सूर्य के समान प्रतीत होते हो; सर्व-हशाम्--ज्ञान के सारे स्त्रोतों में से;समीक्षण:--पूर्ण द्रष्टा; वृत:--स्वीकृत; गुरु:--गुरु; न:--हमारा; स्व-गतिम्-- अपने असली जीवन-लक्ष्य को जानने वाला;बुभुत्सताम्-ऐसे प्रबुद्ध व्यक्ति को |
जिस प्रकार एक अन्धा पुरुष न देख सकने के कारण दूसरे अन्धे को अपना नायक मानलेता है, उसी तरह जो लोग जीवन-लक्ष्य को नहीं जानते वे किसी न किसी धूर्त तथा मूर्ख कोअपना गुरु बना लेते हैं, किन्तु हमारा लक्ष्य आत्म-साक्षात्कार है अतएव हम आपको अपना गुरूस्वीकार करते हैं क्योंकि आप सभी दिशाओं में देखने में समर्थ हैं और सूर्य की तरह सर्वज्ञ हैं |
जनो जनस्यादिशतेसतीं गतिंयया प्रपद्येत दुरत्ययं तम: |
त्वं त्वव्ययं ज्ञामममोघमझसाप्रपद्यते येन जनो निजं पदम् ॥
५१॥
जनः--व्यक्ति जो प्रामाणिक गुरु नहीं है ( साधारण मनुष्य ); जनस्य--उस साधारण व्यक्ति का जिसे जीवन का लक्ष्य ज्ञात नहींहै; आदिशते--आदेश देता है; असतीम्--नश्वर, भौतिक; गतिम्--जीवन लक्ष्य; यया--ऐसे ज्ञान से; प्रपद्येत--शरण में जाताहै; दुरत्ययम्--दुर्लघ्य; तम:--अज्ञान; त्वमू--तुम; तु--लेकिन; अव्ययम्--जो विनष्ट न किया जा सके; ज्ञानमू--ज्ञान;अमोघम्--बिना भौतिक कल्मष के; अज्ञसा--तुरन्त; प्रपद्यते--प्राप्त करता है; येन--ऐसे ज्ञान से; जनः--व्यक्ति; निजमू--अपना; पदम्--मूल स्थान |
तथाकधित भौतिकतावादी गुरु अपने भौतिकतावादी शिष्यों को आर्थिक विकास एवंइन्द्रियतृप्ति के विषय में उपदेश देता है और ऐसे उपदेशों से मूर्ख शिष्य अज्ञान के भौतिक संसारमें पड़े रहते है |
किन्तु आप शाश्वत ज्ञान प्रदान करते हैं और बुद्धिमान् व्यक्ति ऐसा ज्ञान प्राप्तकरके तुरन्त ही अपनी मूल वैधानिक स्थिति को प्राप्त कर लेता है |
त्वं सर्वलोकस्य सुहत्प्रिये श्वरोह्ात्मा गुरुज्ञानमभीष्टसिद्धि: |
तथापि लोको न भवन्तमन्धधी-जानाति सन््तं हृदि बद्धकामः ॥
५२॥
त्वमू--तुम, हे भगवान्; सर्व-लोकस्य--सारे लोकों एवं उनके निवासियों के; सुहृत्--शुभचिन्तक; प्रिय--अत्यन्त प्यारे;ईश्वर:-- परम नियन्ता; हि-- भी; आत्मा--परमात्मा; गुरु:--गुरु; ज्ञाममू--परम ज्ञान; अभीष्ट-सिद्धि:--समस्त इच्छाओं कीपूर्ति; तथा अपि--फिर भी; लोक:--लोग; न--नहीं; भवन्तम्--आपको; अन्ध-धी:--अन्धी बुद्धि के कारण; जानाति--जानसकता है; सन््तम्--स्थित; हृदि--उसके हृदय में; बद्ध-कामः-- भौतिक कामेच्छाओं से मोहित होने के कारण |
हे प्रभु! आप सबों के परम हितैषी तथा प्रियतम मित्र, नियन्ता, परमात्मा, परम उपदेशक,परम ज्ञान के दाता तथा समस्त इच्छाओं को पूरा करने वाले हैं |
यद्यपि आप हृदय में रहते हैं,किन्तु हृदय में बसी कामेच्छाओं के कारण मूर्ख व्यक्ति आपको समझ नहीं पाता |
श़ त्वं त्वामहं देववरं वरेण्यंप्रपद्य ईशं प्रतिबोधनाय |
छिन्ध्यर्थदीपैर्भगवन्वचोभि-ग्रन््थीन्हदय्यान्विवृणु स्वमोक: ॥
५३॥
त्वमू--आप कितने उच्च हैं; त्वामू--तुमको; अहम्--मैं; देव-वरम्--देवताओं द्वारा पूजित; वरेण्यम्--सबों में महान्; प्रपद्ये--पूरी तरह शरणागत; ईशम्--परम नियन्ता को; प्रतिबोधनाय--जीवन के असली प्रयोजन को समझने के लिए; छिन्धि--काटदो; अर्थ-दीपैः--साभिप्राय उपदेश रूपी प्रकाश के द्वारा; भगवन्--हे भगवान्; वचोभि:--अपने शब्दों से; ग्रन्थीन्--गाँठोंको; हृदय्यान्--हृदय के भीतर बँधी; विवृणु--बतलाइये; स्वम् ओक:ः--जीवन में मेरा गन्तव्य
हे परमेश्वर! आत्म-साक्षात्कार के लिए मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ |
आप सभी वस्तुओंके परम नियन्ता के रूप में देवताओं द्वारा पूजित होते हैं |
आप अपने उपदेशों से जीवन केप्रयोजन को प्रकट करते हुए कृपया मेरे हृदय की ग्रंथि को काट दीजिये और मुझे जीवन कालक्ष्य बतलाइये |
श्रीशुक उबाचइत्युक्तवन्तं नृपतिं भगवानादिपूरुष: |
मत्स्यरूपी महाम्भोधौ विहरंस्तत्त्वमत्रवीत्ू ॥
५४॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; उक्तवन्तम्--महाराज सत्यक्रत के द्वारा कहे जाने पर;नृपतिम्--राजा को; भगवान्-- भगवान्; आदि-पूरुष: --आदि पूरुष; मत्स्य-रूपी--मछली के रूप में; महा-अम्भोधौ--बाढ़के जल में; विहरन्ू--विचरण करते; तत्त्वम् अब्नवीत्-परम सत्य के विषय में बतलाया |
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : जब सत्यक्रत ने मत्स्य रूप धारण करने वाले भगवान् सेइस प्रकार प्रार्थना की तो उसको बाढ़ के जल में विचरण करते हुए भगवान् ने परम सत्य केविषय में उपदेश दिया |
पुराणसंहितां दिव्यां साड्ख्ययोगक्रियावतीम् |
सत्यब्रतस्य राजर्षेरात्मगुह्ममशेषत: ॥
५५॥
पुराण--पुराणों में, विशेष रूप से मत्स्य पुराण में, बतलाई गईं विषय-वस्तु; संहिताम्ू--ब्रह्म-संहिता तथा अन्य संहिताओं मेंनिहित वैदिक आदेश; दिव्याम्--सारा दिव्य वाड्मय; साइख्य--सांख्ययोग; योग--आत्म-साक्षात्कार का विज्ञान याभक्तियोग; क्रियावतीम्--जीवन में व्यवहारिक रूप में प्रयुक्त; सत्यव्रतस्थ--राजा सत्यव्रत के; राज-ऋषे: --राजर्षि; आत्म-गुहाम्--आत्म-साक्षात्कार के सारे रहस्य; अशेषत:ः--सभी शाखाओं सहित |
इस प्रकार भगवान् ने राजा सत्यव्रत को वह आध्यात्मिक विज्ञान बतलाया जो सांख्ययोगकहलाता है, जिससे पदार्थ तथा आत्मा का अन्तर ( अर्थात् भक्तियोग ) जाना जाता है |
इसकेसाथ ही भगवान् ने पुराणों ( प्राचीन इतिहास ) तथा संहिताओं में पाये जाने वाले उपदेश भीबतलाये |
भगवान् ने इन सरे ग्रंथों में अपनी व्याख्या की है |
अश्रौषीदषिभिः साकमात्मतत्त्वमसंशयम् |
नाव्यासीनो भगवता प्रोक्त ब्रह्म सनातनम् ॥
५६॥
अश्रौषीत्--उसने सुना; ऋषिभि:--ऋषियों के; साकम्ू--साथ; आत्म-तत्त्वम्ू-आत्म-साक्षात्कार का विज्ञान; असंशयम्--बिना किसी सन््देह के ( क्योंकि यह भगवान् द्वारा कहा गया था ); नावि आसीन:--नाव में बैठा; भगवता-- भगवान् द्वारा;प्रोक्तमू--बताया गया; ब्रह्म--सारा दिव्य साहित्य; सनातनम्--सदा विद्यमान
राजा सत्यव्रत ने ऋषियों सहित नाव में बैठे-बैठे आत्म-साक्षात्कार के विषय में भगवान् केउपदेशों को सुना |
ये सारे उपदेश शाश्रत वैदिक साहित्य ( ब्रह्म ) से थे |
इस तरह राजा तथाऋषियों को परम सत्य ( परब्रह्म ) के विषय में कोई संशय नहीं रहा |
अतीतप्रलयापाय उत्थिताय स वेधसे |
हत्वासुरं हयग्रीवं वेदान्प्रत्याहरद्धरि: ॥
५७॥
अतीत--बीता हुआ; प्रलय-अपाये--बाढ़ के अन्त में; उत्थिताय--निद्रा के बाद होश में लाने के लिए; सः--भगवान् ने;वेधसे--ब्रह्मा को; हत्वा--मारकर; असुरम्--असुर; हयग्रीवम्--हयग्रीव को; वेदान्--सारे वैदिक अभिलेख; प्रत्याहरत्--लाकर दे दिए; हरिः--भगवान् ने |
( स्वायंभुव मनु के काल में ) पिछली बाढ़ के अन्त में भगवान् ने हयग्रीव नामक असुर कोमारा और ब्रह्मा के निद्रा से जगने पर उन्हें सारा वैदिक साहित्य प्रदान कर दिया |
स तु सत्यब्रतो राजा ज्ञानविज्ञानसंयुतः |
विष्णो: प्रसादात्कल्पेस्मिन्नासीद्वैवस्वतो मनु: ॥
५८ ॥
सः--वह; तु--निस्सन्देह; सत्यव्रत:--सत्यव्रत; राजा--राजा; ज्ञान-विज्ञान-संयुतः--ज्ञान तथा उसके व्यावहारिक उपयोग सेअभिज्ञ; विष्णो: -- भगवान् विष्णु की; प्रसादातू-कृपा से; कल्पे अस्मिन्ू--इस काल में ( वैवस्वत मनु के राज्य में );आसीत्--हो गया; बैवस्व॒त: मनु:--वैवस्वत मनु |
भगवान् विष्णु की कृपा से राजा सत्यव्रत को सारा वैदिक ज्ञान प्राप्त हो गया और इस कालमें उसने अब सूर्यदेव के पुत्र वैवस्वत मनु के रूप में जन्म लिया है |
सत्यब्रतस्य राजर्षे्मायामत्स्यस्य शार्किण: |
संवादं महदाख्यानं श्रुत्वा मुच्येत किल्बिषात्ू ॥
५९॥
सत्यव्रतस्थ--राजा सत्यतब्रत का; राज-ऋषे: -महान् राजा; माया-मत्स्यस्य--तथा मत्स्यावतार का; शाहिणः -+सिर पर एकसींग वाला; संवादम्--वर्णन या व्यवहार; महत्-आख्यानम्--महान् कथा; श्रुत्वा--सुनकर; मुच्येत--उबर जाता है;किल्बिषात्--सारे पापों के फलों से |
महान् राजा सत्यव्रत तथा भगवान् विष्णु के मत्स्यावतार से सम्बन्धित यह कथा एक महान्दिव्य आख्यान है |
जो भी इसे सुनता है, वह पापमय जीवन के फलों से छूट जाता है |
अवतारं हरेयोंयं कीर्तयेदन्वहं नरः |
सड्डूल्पास्तस्य सिध्यन्ति स याति परमां गतिम् ॥
६०॥
अवतारम्--अवतार; हरेः -- भगवान् का; यः--जो भी; अयम्--यह; कीर्तयेत्ू--कहता है और कीर्तन करता है; अन्वहम्--रोज; नरः--ऐसा व्यक्ति; सड्डूल्पा:--सारी आकांक्षाएं; तस्य--उसकी; सिध्यन्ति--सफल होती हैं; सः--ऐसा व्यक्ति; याति--वापस जाता है; परमाम् गतिमू-- भगवद्धाम या परम स्थान को |
जो कोई मत्स्य अवतार तथा राजा सत्यव्रत के इस वर्णन को सुनाता है उसकी सारीआकाक्षाएं पूरी होंगी और वह निश्चित रूप से भगवद्धाम वापस जाएगा |
प्रलयपयसि धातु: सुप्तशक्तिर्मुखे भ्य:श्रुतिगणमपनीत प्रत्युपादत्त हत्वा |
दितिजमकथयद्यो ब्रह्म सत्यव्रतानांतमहमखिलहेतुं जिहामीनं नतोस्मि ॥
६१॥
प्रलय-पयसि--बाढ़ के जल में; धातु:--ब्रह्माजी से; सुप्त-शक्ते:--जो नींद के कारण निष्क्रिय था; मुखेभ्य: --मुँहों से; श्रुति-गणम्--वैदिक अभिलेख; अपनीतम्--चुराये गये; प्रत्युपादत्त--वापस दे दिया; हत्वा--मारकर; दितिजम्--महान् असुर को;अकथयत्--बतलाया; यः--जो; ब्रह्म--वैदिक ज्ञान; सत्यब्रतानाम्--सत्यब्रत तथा महर्षियों के प्रकाश हेतु; तम्-- उसको;अहम्--मैं; अखिल-हेतुम्--समस्त कारणों के कारण को; जिहा-मीनम्--बड़ी मछली का बहाना करके प्रकट होने वाले को;नतः अस्मि--मैं सादर नमस्कार करता हूँ |
मैं उन भगवान् को सादर नमस्कार करता हूँ जिन्होंने उस विशाल मछली का रूप धारण करने का बहाना किया जिसने ब्रह्मा के निद्रा से जगने पर उन्हें वैदिक साहित्य वापस लाकरदिया और राजा सत्यक्रत तथा महर्षियों को वैदिक साहित्य का सार कह समझाया |
