← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 8 की सूची

अध्याय इक्कीसवाँ: बाली महाराज को भगवान ने गिरफ्तार कर लिया

8.21श्रीशुक उबाचसत्यं समीक्ष्याब्जभवो नखेन्दुभि-ईतस्वधामद्युतिरावृतो भ्यगात्‌ |

मरीचिमिश्रा ऋषयो बृहद्व्वताःसनन्दनाद्या नरदेव योगिन: ॥

१॥

श्री-शुक: उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; सत्यम्‌--सत्यलोक; समीक्ष्य--देखकर; अब्ज-भव:--कमल से उत्पन्नब्रह्माजी ने; नख-इन्दुभि:ः--नाखूनों के तेज से; हत--क्षीण हुआ; स्व-धाम-द्युतिः--अपने धाम का प्रकाश; आवृत:--आच्छादित; अभ्यगात्‌--आया; मरीचि-मिश्रा:--मरीचि जैसे मुनियों के साथ; ऋषय:--ऋषिगण; बृहत्ू-ब्रता:--सारे के सारेपरम ब्रह्मचारी; सनन्दन-आद्या:--सनक, सनातन, सनन्दन तथा सनत्कुमार जैसे; नर-देव--हे राजा; योगिन:--योगी |

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : जब कमलपुष्प से उत्पन्न ब्रह्माजी ने देखा कि उनके धामब्रह्मलोक का तेज भगवान्‌ वामनदेव के अँगूठे के नाखूनों के चमकीले तेज से कम हो गया है,तो वे भगवान्‌ के पास गये |

ब्रह्मजी के साथ मरीचि इत्यादि ऋषि तथा सननन्‍्दन जैसे योगीजनथे, किन्तु हे राजा! उस तेज के समक्ष ब्रह्म तथा उनके पार्षद भी नगण्य प्रतीत हो रहे थे |

वेदोपवेदा नियमा यमान्विता-स्तर्केतिहासाड्रपुराणसंहिता: |

ये चापरे योगसमीरदीपित-ज्ञानाग्निना रन्धितकर्मकल्मषा: ॥

२॥

बवबन्दिरे यत्स्मरणानुभावतःस्वायम्भुवं धाम गता अकर्मकम्‌ |

अथाडख़ये प्रोन्नमिताय विष्णो-रुपाहरत्पद्ठ भवो ईणोदकम्‌ |

समर्च्य भक्त्याभ्यगृणाच्छुचि श्रवायन्नाभिपड्लेरूहसम्भव: स्वयम्‌ ॥

३॥

बेद--चारों वेद ( साम, यजुर, ऋग्‌ तथा अथर्व ), भगवान्‌ द्वारा प्रदत्त मूल ज्ञान; उपवेदा:--पूरक तथा गौण वैदिक ज्ञान यथाआयुर्वेद, धनुर्वेद; नियमा:--विधि-विधान; यम--संयम करने की विधियाँ; अन्विता: --ऐसे मामलों में पटु; तर्क--तर्क;इतिहास--इतिहास; अड्ग--वैदिक शिक्षा; पुराण--पुराण; संहिता:--संहिताएँ यथा ब्रह्म-संहिता, वेदों के पूरक ग्रंथ; ये--अन्य; च--भी; अपरे--ब्रह्मा तथा उनके पार्षदों के अतिरिक्त; योग-समीर-दीपित--योगाभ्यास की वायु से प्रज्वलित; ज्ञान-अग्निना--ज्ञान की आग से; रन्धित-कर्म-कल्मषा: --जिनके लिए कर्म का सारा दूषण रुक चुका है; ववन्दिरे--स्तुति की;यतू-स्मरण-अनुभावत:ः ---जिनका ध्यान मात्र करने से; स्वायम्भुवम्‌--ब्रह्म जी का; धाम--निवास स्थान; गता:--प्राप्त कियाथा; अकर्मकम्‌--जो सकाम कर्म से प्राप्त नहीं किया जा सकता; अथ--तत्पश्चात्‌; अड्घ्रये--चरणकमलों पर; प्रोन्नमिताय--प्रणाम किया; विष्णो: --विष्णु के; उपाहरत्‌--पूजा की; पद्य-भव:--कमल से उत्पन्न ब्रह्मजी ने; अहण-उदकम्‌--जल द्वाराअर्घ्य देना; समर्च्य--पूजा करके; भक्त्या--भक्तिपूर्वक; अभ्यगृणात्‌--उन्हें प्रसन्न किया; शुचि- भ्रवा:--परम प्रसिद्ध वैदिकविद्वान; यत्‌-नाभि-पट्लेरुह-सम्भव: स्वयम्‌--जिनकी नाभि से निकले कमल से उत्पन्न ब्रह्माजी |

जो महापुरुष भगवान्‌ के चरणकमलों की पूजा के लिए आए उनमें वे भी थे जिन्होंनेआत्मसंयम तथा विधि-विधानों में सिद्धि प्राप्त की थी |

साथ ही वे तर्क, इतिहास, सामान्य शिक्षातथा कल्प नामक ( प्राचीन ऐतिहासिक घटनाओं से सम्बन्धित ) वैदिक वाड्मय में दक्ष थे |

अन्यलोग ब्रह्म संहिताओं जैसे वैदिक उपविषयों, वेदों के अन्य ज्ञान तथा वेदांगों ( आयुर्वेद, धनुर्वेद,इत्यादि ) में पटु थे |

अन्य ऐसे थे जिन्होंने योगाभ्यास से जागृत दिव्यज्ञान के द्वारा कर्मफलों सेअपने को मुक्त कर लिया था |

कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने सामान्य कर्म से नहीं प्रत्युत उच्च वैदिकज्ञान द्वारा ब्रहलोक में निवासस्थान प्राप्त किया था |

जल तर्पण द्वारा भगवान्‌ के ऊपर उठेचरणकमलों की भक्तिपूर्वक पूजा कर लेने के बाद भगवान्‌ विष्णु की नाभि से निकले कमलसे उत्पन्न ब्रह्माजी ने भगवान्‌ की स्तुति की |

धातु: कमण्डलुजलं तदुरुक्रमस्यपादावनेजनपवित्रतया नरेन्द्र |

स्वर्धुन्यभून्नभसि सा पतती निर्माष्टिलोकत्रयं भगवतो विशदेव कीर्ति: ॥

४॥

धातु:--ब्रह्मजी का; कमण्डलु-जलम्‌--कमण्डल का पानी; तत्‌--वही; उरुक़मस्य-- भगवान्‌ विष्णु का; पाद-अवनेजन-पवित्रतया-- भगवान्‌ विष्णु के चरणकमलों को धोने और इस तरह दिव्य रूप से पवित्र होने से; नर-इन्द्र--हे राजा; स्वर्धुनी--दिव्यलोक की स्वर्धुनी नामक नदी; अभूत्‌--हो गई; नभसि--बाह्य आकाश में; सा--वह; पतती--नीचे गिरती हुई; निमाष्टि--पवित्र करती; लोक-त्रयम्‌--तीनों लोकों को; भगवत:-- भगवान्‌ के; विशदा--इतनी पवित्र; इब--मानो; कीर्ति:--यश यायशस्वी कार्यकलाप |

हे राजा! ब्रह्म के कमण्डल से निकला जल अद्भुत कार्यो को करने वाले उरुक्रम भगवान्‌वामनदेव के चरणकमलों को धोने लगा |

इस प्रकार यह जल इतना शुद्ध हो गया कि यहगंगाजल में परिणत होकर आकाश से नीचे बहता हुआ तीनों लोकों को शुद्ध करने लगा मानोभगवान्‌ का विमल यश हो |

ब्रह्मादयो लोकनाथा: स्वनाथाय समाहता: |

सानुगा बलिमाजहु: सदड्क्षिप्तात्मविभूतये ॥

५॥

ब्रह्य-आदय: -- ब्रह्मा इत्यादि महापुरुष; लोक-नाथा:--विभिन्न लोकों के प्रमुख देवता; स्व-नाथाय--अपने परम स्वामी को;समाहता:--अत्यधिक आदर के साथ; स-अनुगा:--अपने अनुयायियों सहित; बलिम्‌ू--पूजा की सामग्री; आजह्ु:-- एकत्रकिया; सड्क्षिप्त-आत्म-विभूतये-- भगवान्‌ को

जिन्होंने अपने निजी ऐश्वर्य का विस्तार किया था, किन्तु अब वामन रूप मेंघटा लिया था |

ब्रह्माजी तथा विभिन्न लोकों के समस्त प्रधान देवता अपने उन परम स्वामी भगवान्‌वामनदेव की पूजा करने लगे जिन्होंने अपने सर्वत्र-व्यापक रूप को छोटा करके अपना आदिरूप ग्रहण कर लिया था |

उन्होंने पूजा की सारी सामग्री एकत्रित की |

तोयैः समर्हणै: स्रश्भिर्दिव्यगन्धानुलेपनै: |

धूपैदीपै: सुरभिभिरलाजाक्षतफलाडुरै: ॥

६॥

स्तवनैर्जयशब्दै श्व तद्वीय॑महिमाड़ितेः |

नृत्यवादित्रगीतैश्न शद्भुदुन्दुभिनि:स्वनै: ॥

७॥

तोयबैः--चरणकमल धोने तथा स्नान के लिए आवश्यक जल से; समर्हणै: -- भगवान्‌ की पूजा के लिए पाद्य, अर्ध्य इत्यादिसामग्री से; स्नग्भिः--फूल की मालाओं से; दिव्य-गन्ध-अनुलेपनै:--चन्दन अगुरु से भगवान्‌ वामनदेव के शरीर पर करने केलिए लेप के द्वारा; धूपैः--धूप के द्वारा; दीपैः--दीपकों के द्वारा; सुरभिभि: --अत्यन्त सुगन्धित; लाज--लावा से; अक्षत--अक्षत द्वारा; फल--फलों से; अह्डुरैः --जड़ों तथा अंकुरों से; स्तवनैः--स्तुतियों से; जय-शब्देः--जयजयकार द्वारा; च-- भी;ततू-वीर्य-महिमा-अड्डितैः--जिससे भगवान्‌ के यशस्वी कार्य सूचित होते हैं; नृत्य-वादित्र-गीतै: च--नाच, संगीत यंत्रो केवबादन तथा गीतगायन से; शद्भु--शंख; दुन्दुभि--दुन्दुभि; निःस्वनै: -- ध्वनि से उन्होंने सुगन्धित पुष्प, जल, पाद्य तथा अर्घ्य, चन्दन तथा अगुरु के लेप, धूप, दीप, लावा,अक्षत, फल, मूल तथा अंकुर से भगवान्‌ की पूजा की |

ऐसा करते समय उन्होंने भगवान्‌ केयशस्वी कार्यों को सूचित करने वाली स्तुतियाँ कीं और जयजयकार किया |

इस तरह भगवान्‌की पूजा करते हुए उन्होंने नृत्य किया, वाद्ययंत्र बजाये, गाया और शंख और दुन्दुभियां बजाईं |

जाम्बवानृक्षराजस्तु भेरीशब्देर्मनोजव: |

विजय दिश्लु सर्वासु महोत्सवमघोषयत्‌ ॥

८ ॥

जाम्बवान्‌--जाम्बवान ने; ऋक्ष-राज: तु--रीछों के राजा; भेरी-शब्दै:--बिगुल बजाकर; मन:-जव: --मनमौज में; विजयम्‌--विजय, जीत; दिक्षु--सारी दिशाओं में; सर्वासु--सर्वत्र; महा-उत्सवम्‌--महोत्सव; अघोषयत्‌--घोषित कर दिया |

रीछों के राजा जाम्बवान भी इस उत्सव में सम्मिलित हो गये |

उन्होंने सारी दिशाओं में बिगुलबजाकर भगवान्‌ वामनदेव की विजय का महोत्सव घोषित कर दिया |

महीं सर्वा हतां दृष्ठा त्रिपदव्याजयाच्जया |

ऊचुः स्वभर्तुरसुरा दीक्षितस्यात्यमर्षिता: ॥

९॥

महीम्‌-पृथ्वी को; सर्वाम--सारी; हताम्‌--छीनी हुई; दृष्ठा--देखकर; त्रि-पद-व्याज-याच्जया--केवल तीन पग भूमि माँगनेके बहाने; ऊचु:--कहा; स्व-भर्तु:--अपने स्वामी; असुरा:--असुरगण; दीक्षितस्य--यज्ञ के लिए हढ़संकल्प बलि महाराज के;अति--अत्यधिक; अमर्षिता:--यह उत्सव जिनके लिए असहा था |

जब बलि महाराज के असुर अनुयायियों ने देखा कि उनके स्वामी ने जिन्होंने यज्ञ सम्पन्नकरने का संकल्प कर रखा था |

वामनदेव द्वारा तीन पग भूमि माँगे जाने के बहाने सब कुछ गँवादिया है, तो वे अत्यधिक क्रुद्ध हुए और इस प्रकार बोले |

न वायं ब्रह्मबन्धुर्विष्णुर्मायाविनां वर: |

द्विजरूपप्रतिच्छन्नो देवकार्य चिकीर्षति ॥

१०॥

न--नहीं; वा--अथवा; अयम्‌--यह; ब्रह्म-बन्धु;--ब्राह्मण वेश में वामनदेव; विष्णु:--साक्षात्‌ विष्णु है; मायाविनाम्‌--सारेठगों में; बर:-- श्रेष्ठ; द्विज-रूप--ब्राह्मण का रूप बनाकर; प्रतिच्छन्न:--ठगने के लिए वेश धारण किये है; देव-कार्यम्‌--देवताओं के हित के लिए; चिकीर्षति--प्रयत्न कर रहा है

यह वामन निश्चित रूप से ब्राह्मण न होकर ठगराज भगवान्‌ विष्णु है |

उसने ब्राह्मण का रूपधारण करके अपने असली रूप को छिपा लिया है और इस तरह यह देवताओं के हित के लिएकार्य कर रहा है |

अनेन याच्मानेन शत्रुणा वटुरूपिणा |

सर्वस्वं नो हतं भर्तु्न्यस्तदण्डस्य ब्हिषि ॥

११॥

अनेन--इसके द्वारा; याचमानेन--भिखारी के पद को प्राप्त; शत्रुणा --शत्रु के द्वारा; बटु-रूपिणा--ब्रह्मचारी के वेश में;सर्वस्वम्‌--सर्वस्व; न:ः--हमारे; हतम्‌--ले लिया गया है; भर्तु:--स्वामी का; न्यस्त--फेंका गया; दण्डस्य--दण्ड देने कीशक्ति का; बर्हिषि--अनुष्ठान का ब्रत लेने के कारण |

हमारे स्वामी बलि महाराज यज्ञ करने की स्थिति में होने के कारण दण्ड देने की अपनीशक्ति त्याग बैठे हैं |

इसका लाभ उठाकर हमारे शाश्वत शत्रु विष्णु ने ब्रह्मचारी भिखारी के वेश मेंउनका सर्वस्व छीन लिया है |

सत्यव्रतस्य सततं दीक्षितस्य विशेषतः |

नानृतं भाषितुं शक्यं ब्रह्मण्यस्थ दयावत: ॥

१२॥

सत्य-ब्रतस्य--सत्यसन्ध महाराज बलि का; सततम्‌--सदैव; दीक्षितस्थ--यज्ञ सम्पन्न करने के लिए दीक्षित हुए; विशेषतः--विशेष रूप से; न--नहीं; अनृतम्‌--झूठ, असत्य; भाषितुम्‌ू--बोलने के लिए; शक्यम्‌--समर्थ है; ब्रह्मण्यस्थ--ब्राह्मण सभ्यताया ब्राह्मण का; दया-वतः--दयावान्‌

हमारे स्वामी बलि महाराज सदैव सत्य पर हढ़ रहते हैं और इस समय तो विशेष रूप सेक्योंकि उन्हें यज्ञ करने के लिए दीक्षा दी गई है |

वे ब्राह्मणों के प्रति सदैव दयालु तथा सदय रहतेहैं और कभी भी झूठ नहीं बोल सकते |

तस्मादस्य वधो धर्मों भर्तु: शुश्रूषणं च न: |

इत्यायुधानि जगृहुर्बलेरनुचरासुरा: ॥

१३॥

तस्मात्‌ू--इसलिए; अस्य--इस ब्रह्मचारी वामन का; वध:--वध; धर्म:--हमारा कर्तव्य है; भर्तु:--हमारे स्वामी की; शुश्रूषणम्‌च--तथा सेवा करने का तरीका भी है; न:ः--हमारा; इति--इस प्रकार; आयुधानि--हथियार; जगृहुः--उठा लिया; बले:--बलि महाराज के; अनुचर-- अनुयायी; असुरा: --सारे असुरों ने |

अतएव इस वामनदेव भगवान्‌ विष्णु को मार डालना हमारा कर्तव्य है |

यह हमारा धर्म हैऔर अपने स्वामी की सेवा करने का तरीका है |

इस निर्णय के बाद महाराज बलि के असुरअनुयायियों ने वामनदेव को मारने के उद्देश्य से अपने-अपने हथियार उठा लिये |

ते सर्वे वामनं हन्तुं शूलपट्टिशपाणय: |

अनिच्छन्तो बले राजन्प्राद्रवद्भातमन्यव: ॥

१४॥

ते--वे असुर; सर्वे--सभी; वामनम्‌-- भगवान्‌ वामनदेव को; हन्तुम्‌ू-मारने के लिए; शूल--त्रिशूल; पट्टिश-- भाले;पाणय:--हाथ में लेकर; अनिच्छन्त:--इच्छा के विपरीत; बले:--बलि महाराज की; राजनू--हे राजा; प्राद्रवन्‌ू--आगे बढ़े;जात-मन्यव:--सामान्य क्रोध के द्वारा भड़क कर |

हे राजा! असुरों का सामान्य क्रोध भड़क उठा, उन्होंने अपने-अपने भाले तथा त्रिशूल अपनेहाथों में ले लिये और बलि महाराज की इच्छा के विरुद्ध वे वामनदेव को मारने के लिए आगेबढ़ गये |

तानभिद्रवतो हृष्टा दितिजानीकपान्नूप |

प्रहस्यानुचरा विष्णो: प्रत्यषेधन्ुदायुधा: ॥

१५॥

तान्‌ू--उनको; अभिद्रवत:--इस प्रकार आगे बढ़ते; हृष्टा--देखकर; दितिज-अनीक-पान्‌--असुरों के सैनिक; नृप--हे राजा;प्रहस्थ--हँसकर; अनुचरा: --सहयोगी; विष्णो: -- भगवान्‌ विष्णु के; प्रत्यषे धन्‌ू--मना किया; उदायुधा:--अपने हथियार ग्रहणकरने को

हे राजा! जब विष्णु के सहयोगियों ने देखा कि असुर सैनिक हिंसा पर उतारू होकर आगेबढ़े आ रहे हैं, तो वे हँसने लगे |

उन्होंने अपने हथियार उठाते हुए असुरों को ऐसा प्रयत्न करने सेमना किया |

नन्दः सुनन्दोथ जयो विजय: प्रबलो बल: |

कुमुदः कुमुदाक्षश्च विष्वक्सेन: पतत्नरिराटू ॥

१६॥

जयन्तः श्रुतदेवश्च पुष्पदन्तोथ सात्वतः |

सर्वे नागायुतप्राणाश्चमूं ते जघ्नुरासुरीम्‌ू ॥

१७॥

नन्दः सुनन्दः--विष्णु के संगी यथा नन्द तथा सुनन्द; अथ--इस प्रकार; जय: विजय: प्रबल: बल: कुमुदः कुमुदाक्ष: चविष्वक्सेन:--तथा जय, विजय, प्रबल, बल, कुमुद, कुमुदाक्ष तथा विष्वक्सेन; पतत्ति-राट्‌--पशक्षिराज गरुड़; जयन्त: श्रुतदेव:च पुष्पदन्त: अथ सात्वत:--जयन्त, श्रुतदेव, पुष्पदन्त तथा सात्वत; सर्वे--सभी; नाग-अयुत-प्राणा: --दस हजार हाथियों केसमान शक्तिशाली; चमूम्‌--सेना को; ते--उन्होंने; जघ्नु;--मार डाला; आसुरीम्‌--असुरों की |

नन्द, सुनन्द, जय, विजय, प्रबल, बल, कुमुद, कुमुदाक्ष, विष्वक्सेन, पतत्त्रिराट्‌ ( गरुड़ ),जयन्त, श्रुतदेव, पुष्पदन्‍्त तथा सात्वत--ये सभी भगवान्‌ विष्णु के संगी थे |

वे दस हजारहाथियों के तुल्य बलवान्‌ थे |

अब वे असुरों के सैनिकों को मारने लगे |

हन्यमानान्स्वकान्हष्ठा पुरुषानुचरैर्बलि: |

वारयामास संरब्धान्काव्यशापमनुस्मरन्‌ ॥

१८ ॥

हन्यमानानू--मारे जा रहे; स्वकान्‌--अपने सैनिकों को; दृष्टा--देखकर; पुरुष-अनुचरै: --परम पुरुष के अनुचरों द्वारा;बलि:--बलि महाराज ने; वारयाम्‌ आस--मना किया; संरब्धान्‌--अत्यधिक क्रुद्ध होते हुए भी; काव्य-शापम्‌--शुक्राचार्य केद्वारा प्रदत्त शाप को; अनुस्मरन्‌ू--याद करते हुए |

जब बलि महाराज ने देखा कि उनके अपने सैनिक भगवान्‌ विष्णु के अनुचरों द्वारा मारे जारहे हैं, तो उन्हें शुक्राचार्य का शाप याद आया और उन्होंने अपने सैनिकों को युद्ध जारी रखने सेमना कर दिया |

हे विप्रचित्ते हे राहो हे नेमे श्रूयतां वचः |

मा युध्यत निवर्तध्वं न न: कालोयमर्थकृत्‌ ॥

१९॥

हे विप्रचित्ते--हे विप्रचित्ति; हे राहो--हे राहु; हे नेमे--हे नेमि; श्रूयताम्‌--सुनो तो; वचः--मेरे शब्द; मा--मत; युध्यत--लड़ो;निवर्तध्वम्‌--यह लड़ाई बन्द करो; न--नहीं; नः--हमारा; काल: --उपयुक्त समय; अयम्‌--यह; अर्थ-कृत्‌ू--सफल होने का |

हे विप्रचित्ति, हे राहु, हे नेमि! जरा मेरी बात तो सुनो! तुम लोग मत लड़ो |

तुरन्त रुक जाओक्योंकि यह समय हमारे अनुकूल नहीं है |

यः प्रभु: सर्वभूतानां सुखदु:ःखोपपत्तये |

तं नातिवर्तितुं दैत्या: पौरुषैरी श्वरः पुमान्‌ ॥

२०॥

यः प्रभुः--जो परम पुरुष, स्वामी; सर्व-भूतानाम्‌ू--सभी जीवों का; सुख-दुःख-उपपत्तये--सुख तथा दुख देने के लिए; तमू--उसको; न--नहीं; अतिवर्तितुम्‌-जीतने के लिए; दैत्या:--हे दैत्यो; पौरुषै:--मानवीय प्रयास से; ईश्वरः--परम नियन्ता;पुमानू-पुरुष

हे दैत्यो! कोई भी व्यक्ति मानवीय प्रयासों से उन भगवान्‌ को परास्त नहीं कर सकता जो समस्त जीवों को सुख तथा दुख देने वाले हैं |

यो नो भवाय प्रागासीदभवाय दिवौकसाम्‌ |

स एवं भगवानद्य वर्तते तद्विपर्ययम्‌ ॥

२१॥

यः--भगवान्‌ का प्रतिनिधि काल; न:--हम सबकी; भवाय--उन्नति के लिए; प्राक्‌--पहले; आसीत्‌--स्थित था; अभवाय--हार के लिए; दिव-ओकसाम्‌--देवताओं का; सः--वही काल; एब--निस्सन्देह; भगवान्‌--परम पुरुष का प्रतिनिधि; अद्य--आज,; वर्तते--उपस्थित है; तत्‌-विपर्ययम्‌--हमारे पक्ष के विपरीत |

परम काल जो भगवान्‌ का प्रतिनिधि है और जो पहले हमारे अनुकूल और देवताओं केप्रतिकूल था, वही काल अब हमारे विरुद्ध है |

बलेन सचिवीर्बुद्धया दुग्गैर्मनत्रौषधादिभि: |

सामादिभिरुपायैश्न काल॑ नात्येति वै जनः ॥

२२॥

बलेन--बल द्वारा; सचिवै:--मंत्रियों की सलाह से; बुद्धवा--बुद्धि से; दुर्गैं:--किलों से; मन्त्र-औषध-आदिभि:--योगमंत्रों याऔषधियों के द्वारा; साम-आदिभि: --राजनीति तथा अन्य ऐसे साधनों से; उपायै: च--इसी प्रकार के अन्य उपायों से; कालमू--काल जो भगवान्‌ का प्रतिनिधि है; न--कभी नहीं; अत्येति--जीत सकता है; बै--निस्सन्देह; जनः--कोई व्यक्ति

कोई भी व्यक्ति भौतिक बल, मंत्रियों की सलाह, बुद्धि, राजनय, किला, मंत्र, औषधि,जड़ी-बूटी या अन्य किसी उपाय से भगवान्‌ स्वरूप काल स्वरूप को परास्त नहीं कर सकता |

भवद्धिर्निर्जिता होते बहुशोनुचरा हरे: |

दैवेनद् स्त एवाद्य युधि जित्वा नदन्ति नः ॥

२३॥

भवद्धिः--तुम सारे असुरों के द्वारा; निर्जिता:--पराजित किये गये थे; हि--निस्सन्देह; एते--देवताओं के सारे सैनिक;बहुशः--बड़ी संख्या में; अनुचरा:-- अनुयायी; हरे: --विष्णु के; दैवेन-- भाग्यवश; ऋष्ैः--ऐश्वर्य बढ़ने से; ते--वे ( देवता );एव--निस्सन्देह; अद्य--आज; युधि--युद्ध में; जित्वा--जीतकर; नदन्ति--हर्ष से नाद कर रहे हैं; नः--हमें |

पहले तुम सब ने भाग्य द्वारा शक्ति प्राप्त करके भगवान्‌ विष्णु के ऐसे अनेक अनुयायियोंको परास्त किया था |

किन्तु आज वे ही अनुयायी हमें परास्त करके शेरों की तरह हर्ष से दहाड़रहे हैं |

एतान्वयं विजेष्यामो यदि दैवं प्रसीदति |

तस्मात्काल प्रतीक्षध्वं यो नो$र्थत्वाय कल्पते ॥

२४॥

एतानू--देवताओं के इन सारे सैनिकों को; वयम्‌--हम; विजेष्याम:--जीत लेंगे; यदि--यदि; दैवम्‌-- भाग्य; प्रसीदति--हमारेअनुकूल है; तस्मात्‌ू--इसलिए; कालम्‌--अनुकूल काल की; प्रतीक्षध्वम्‌--तब तक प्रतीक्षा करो; यः--जो; नः--हमारा;अर्थत्वाय कल्पते--पक्ष में माना जाना चाहिए |

जब तक भाग्य हमारे अनुकूल न हो तब तक हम विजय प्राप्त नहीं कर सकेंगे |

अतएव हमेंउस उपयुक्त काल की प्रतीक्षा करनी चाहिए जब हम उन्हें पराजित कर सकेंगे |

श्रीशुक उबाचपत्युर्निंगदितं श्रुत्वा दैत्यदानवयूथपा: |

रसां निर्विविशू राजन्विष्णुपार्षद ताडिता: ॥

२५॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; पत्यु:--अपने स्वामी ( बलि महाराज ) को; निगदितम्‌--जिसका इस तरहवर्णन हुआ; श्रुत्वा--सुनकर; दैत्य-दानव-यूथ-पा:--दैत्यों तथा दानवों के सेनापति; रसाम्‌ू--रसातल लोक में; निर्विविशू:--घुस गये; राजन्‌--हे राजा; विष्णु-पार्षद--विष्णु के अनुचरों द्वारा; ताडिता:--खदेड़े जाकर |

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे राजा! अपने स्वामी बलि महाराज के आदेश के अनुसारदैत्यों तथा दानवों के सारे सेनापति ब्रह्माण्ड के निचले भागों में प्रविष्ट हुए जहाँ उन्हें विष्णु केसैनिकों ने खदेड़ दिया था |

अथ तार्क्च्यसुतो ज्ञात्वा विराट्प्रभुचिकीर्षितम्‌ |

बबन्ध वारुणै: पाशैर्बलिं सूत्येडहनि क्रतो ॥

२६॥

अथ-तत्पश्चात्‌; ताकक्ष्य-सुतः--गरुड़ ने; ज्ञात्वा--जानकर; विराट्‌--पक्षिराज; प्रभु-चिकीर्षितम्‌-- भगवान्‌ वामनदेव की इच्छासे; बबन्ध--बन्दी बना लिया; वारुणैः:--वरुण से सम्बन्धित; पाशैः--रस्सियों से; बलिम्‌--बलि को; सूत्ये--सोमरस पान के;अहनि--दिन; क्रतौ--यज्ञ के समय |

तत्पश्चात्‌ यज्ञ समाप्त हो जाने के बाद सोमपान के दिन पक्षिराज गरुड़ ने अपने स्वामी कीइच्छा जानकर बलि महाराज को वरुणपाश से बन्दी बना लिया |

हाहाकारो महानासीद्रोदस्यो: सर्वतों दिशम्‌ |

निगृह्ममाणेसुरपतौ विष्णुना प्रभविष्णुना ॥

२७॥

हाहा-कार:--विलाप का कोलाहलपूर्ण नाद; महान्‌--अत्यधिक; आसीतू-- था; रोदस्यो:--अधो एवं ऊर्ध्व दोनों लोकों में;सर्वतः--सर्वत्र; दिशम्‌--सारी दिशाएँ; निगृह्ममाणे--दबाये जाने के कारण; असुर-पतौ--असुरों के स्वामी बलि महाराज को;विष्णुना--विष्णु द्वारा; प्रभविष्णुना--जो सर्वत्र अत्यन्त शक्तिशाली है |

जब बलि महाराज परम शक्तिशाली भगवान्‌ विष्णु द्वारा इस प्रकार बन्दी बना लिये गये तोब्रह्माण्ड के अधो तथा ऊर्ध्व लोकों की समस्त दिशाओं में विलाप का आर्तनाद हुआ |

तं बद्धं वारुणै: पाशैर्भगवानाह वामन: |

नष्टश्रियं स्थिरप्रज्ञमुदारणशसं नूप ॥

२८ ॥

तम्‌--उसको; बद्धम्‌--बाँधे गये; वारुणैः पाशैः--वरुण पाश द्वारा; भगवान्‌-- भगवान; आह--कहा; वामन:--वामनदेव ने;नष्ट-अयम्‌--शारीरिक कान्ति से विहीन बलि महाराज से; स्थिर-प्रज्ञमम्‌--किन्तु फिर भी अपने निर्णय पर अटल; उदार-यशसम्‌--अत्यन्त सुन्दर एवं विख्यात; नृप--हे राजा

हे राजा! तब भगवान्‌ वामनदेव अत्यन्त उदार एवं विख्यात बलि महाराज से बोले जिन्हेंउन्होंने वरुणपाश से बन्दी बनवा लिया था |

यद्यपि बलि महाराज के शरीर की सारी कान्ति जाचुकी थी तो भी वे अपने निर्णय पर अटल थे |

पदानि त्रीणि दत्तानि भूमेर्महां त्वयासुर |

द्वाभ्यां क्रान्ता मही सर्वा तृतीयमुपकल्पय ॥

२९॥

पदानि--पग; त्रीणि--तीन; दत्तानि--दिये गये; भूमेः-- भूमि के; महमम्‌--मुझको; त्वया--तुम्हारे द्वारा; असुर--हे असुरराज;द्वाभ्यामू--दो पगों द्वारा; क्रान्ता--घेरी हुई; मही--सारी भूमि; सर्वा--पूर्णतया; तृतीयम्‌--तीसरे पग के लिए; उपकल्पय--साधन ढूँढो |

हे असुरराज! तुमने मुझे तीन पग भूमि देने का वचन दिया है, किन्तु मैंने तो दो ही पग मेंसारा ब्रह्माण्ड घेर लिया है |

अब बताओ कि मैं अपना तीसरा पग कहाँ रखूँ? यावत्तपत्थसौ गोभिर्यावदिन्दु: सहोडुभि: |

यावद्वर्षति पर्जन्यस्तावती भूरियं तब ॥

३०॥

यावत्‌--जब तक; तपति--चमक रहा है; असौ--सूर्य; गोभि:-- प्रकाश द्वारा; यावत्‌--जब तक या जहाँ तक; इन्दुः--चन्द्रमा; सह-उड़ुभि:--अन्य तारों के साथ; यावत्‌--जहाँ तक; वर्षति--वर्षा करते हैं; पर्जन्य:--बादल; तावती--उतनी दूरीतक; भू:--पृथ्वी; इयम्‌--यह; तब--तुम्हारे अधिकार में |

जहाँ तक सूर्य तथा तारों सहित चन्द्रमा चमक रहे हैं और जहाँ तक बादल वर्षा करते हैं,वहाँ तक ब्रह्माण्ड की सारी भूमि आपके अधिकार में है |

पदैकेन मयाक्रान्तो भूलोंक: खं दिशस्तनो: |

स्वलोकिस्ते द्वितीयेन पश्यतस्ते स्वमात्मना ॥

३१॥

पदा एकेन--एक पग से ही; मया--मेरे द्वारा; आक्रान्तः--आच्छादित; भूलोक:--समस्त भूलोक; खम्‌--आकाश; दिशः--तथा सारी दिशाएँ; तनो:--मेरे शरीर द्वारा; स्वलोक:--उच्च स्वर्गलोक; ते--तुम्हारे अधिकार में हैं, वे; द्वितीयेन--दूसरे पग में;पश्यतः ते--तुम्हारे देखते-देखते; स्वम्‌--तुम्हारा अपना; आत्मना--मेरे द्वारा

इन में से मैंने एक पग से भूलोक को अपना बना लिया है और अपने शरीर से मैंने साराआकाश तथा सारी दिशाएँ अपने अधिकार में कर ली हैं |

तुम्हारी उपस्थिति में ही मैंने अपने दूसरेपग से उच्च स्वर्गलोक को अपना लिया है |

प्रतिश्रुतमदातुस्ते निरये वास इष्यते |

विश त्वं निरयं तस्मादगुरुणा चानुमोदितः ॥

३२॥

प्रतिश्रुतम्‌--वचन दिया गया; अदातु:--न दे सका; ते--तुम्हारा; निरये--नरक में; वास: --वासस्थान; इष्यते--संस्तुत;विश--अब प्रवेश करो; त्वम्‌--तुम; निरयम्‌ू--नरकलोक में; तस्मात्‌ू--इसलिए; गुरुणा -- अपने गुरु द्वारा; च-- भी;अनुमोदित:--अनुमोदन किया हुआ |

चूँकि तुम अपने वचन के अनुसार दान देने में असमर्थ रहे हो अतएव नियम कहता है कितुम नरकलोक में रहने के लिए चले जाओ |

इसलिए अपने गुरु शुक्राचार्य के आदेश से अब तुमनीचे जाओ और वहाँ रहो |

वृथा मनोरथस्तस्य दूरः स्वर्ग: पतत्यध: |

प्रतिश्रुतस्थादानेन योउडर्थिनं विप्रलम्भते ॥

३३॥

वृथा--किसी अच्छे फल से रहित; मनोरथ: --मन की इच्छाएँ; तस्थ--उसकी; दूर:--दूर; स्वर्ग:--स्वर्गलोक को जाना;'पतति--गिरता है; अध:--जीवन की नारकीय अवस्था में; प्रतिश्रुतस्थ--जिन वस्तुओं के लिए वचन दिया गया हो; अदानेन--न दे सकने के कारण; य:--जो कोई; अर्थिनम्‌--भिखारी को; विप्रलम्भते--ठगता है

जो कोई भिखारी को वचन देकर ठीक से दान नहीं देता उसका स्वर्ग जाना या उसकी इच्छापूरी होना तो दूर रहा वरन्‌ वह नारकीय जीवन में जा गिरता है |

विप्रलब्धो ददामीति त्वयाहं चाढ्यमानिना |

तद्व्यलीकफलं भुड्छ्व निरयं कतिचित्समा: ॥

३४॥

विप्रलब्ध:--मैं ठगा गया हूँ; ददामि--तुम्हें दूँगा ऐसा वचन देता हूँ; इति--इस प्रकार; त्वया--तुम्हारे द्वारा; अहम्‌--मैं; च--भी; आढ्य-मानिना--अपने ऐश्वर्य पर गर्वित होने के कारण; तत्‌--अतएव; व्यलीक-फलम्‌--ठगने का दुष्परिणाम; भुड्छक््व--भोगो; निरयम्‌--नारकीय जीवन में; कतिचित्‌-- थोड़े; समा: --वर्ष |

अपने वैभव पर वृथा गर्वित होकर तुमने मुझे भूमि देने का वचन दिया, किन्तु तुम अपनावचन पूरा नहीं कर पाये |

अतएवं अब तुम्हारे वचन ( वादे ) झूठे हो जाने के कारण तुम्हें कुछवर्षों तक नारकीय जीवन बिताना होगा |

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