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अध्याय बीस: बलि महाराज ने ब्रह्मांड का समर्पण कर दिया
8.20श्रीशुक उबाचबलिरेवं गृहपति: कुलाचार्येण भाषितः |
तूष्णीं भूत्वा क्षणंराजन्नुवाचावहितो गुरुम् ॥
१॥
श्री-शुक: उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; बलि: --महाराज बलि ने; एवम्--इस प्रकार; गृह-पति:--गृहस्थी केस्वामी, यद्यपि पुरोहितों द्वारा मार्गदर्शित; कुल-आचार्येण--पारिवारिक गुरु के द्वारा; भाषित:--सम्बोधित किया गया;तृष्णीमू--मौन; भूत्वा--होकर; क्षणम्--एक क्षण के लिए; राजन्--हे राजा ( महाराज परीक्षित ); उबाच--कहा; अवहितः--पूर्ण विचार-विमर्श करने के बाद; गुरुम्--अपने गुरु से
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा परीक्षित! जब बलि महाराज को उनके गुरु एवंकुलपुरोहित शुक्राचार्य ने इस प्रकार सलाह दी तो वे कुछ समय तक चुप रहे और फिर पूर्णविचार-विमर्श के बाद अपने गुरु से इस प्रकार बोले |
श्रीबलिरुवाचसत्यं भगवता प्रोक्त धर्मोड्यं गृहमेधिनाम् |
अर्थ काम यशो वृत्ति यो न बाधेत कहिंचित् ॥
२॥
श्री-बलिः उवाच--बलि महाराज ने कहा; सत्यम्ू--सत्य है; भगवता--आपके द्वारा; प्रोक्तम्ू--कहा गया; धर्म:--धर्म;अयम्--यह; गृहमेधिनाम्--विशेष रूप से गृहस्थों के लिए; अर्थम्--आर्थिक विकास; कामम्--इन्द्रियतृप्ति; यशः वृत्तिम्--यश एवं जीविका का साधन; यः--जो धर्म; न--नहीं; बाधेत--बाधा पहुँचाता है; कर्हिचित्--किसी समय |
बलि महाराज ने कहा : जैसा कि आप कह चुके हैं, जो धर्म किसी के आर्थिक विकास,इन्द्रियतृप्ति, यश तथा जीविका के साधन में बाधक नहीं होता वही गृहस्थ का असली धर्म है |
मैंभी सोचता हूँ कि यही धर्म सही है |
स चाहं वित्तलोभेन प्रत्याचक्षे कथ॑ं द्विजम् |
प्रतिश्रुत्य ददामीति प्राह्मादि: कितवो यथा ॥
३॥
सः--वह पुरुष; च-- भी; अहम्--मैं हूँ; वित्त-लोभेन-- धन के लालच से; प्रत्याचक्षे--मैं धोखा दूँ या हाँ कहकर अब नाकरूँ; कथम्--कैसे; द्विजम्ू--ब्राह्मण को; प्रतिश्रुत्य--पहले ही वचन दे चुकने पर; ददामि--कि मैं दूँगा; इति--इस प्रकार;प्राह्मादिः--मैं जो महाराज प्रह्माद के पौत्र के रूप में प्रसिद्ध हूँ; कितवः--सामान्य ठग; यथा--जिस तरह |
मैं महाराज प्रह्माद का पौत्र हूँ |
जब मैं पहले ही कह चुका हूँ कि मैं यह भूमि दान में दूँगा तोफिर धन के लालच से मैं अपने वचन से किस तरह विचलित हो सकता हूँ? मैं किस तरह एकसामान्य वज्ञक का आचरण कर सकता हूँ और वह भी एक ब्राह्मण के प्रति? न हासत्यात्परो धर्म इति होवाच भूरियम् |
सर्व सोढुमलं मन््ये ऋतेडलीकपरं नरम् ॥
४॥
न--नहीं; हि--निस्सन्देह; असत्यात्--असत्य से; पर:--बढ़कर; अधर्म: --अधर्म; इति--इस प्रकार; ह उवाच--सचमुच कहाहै; भूः--माता पृथ्वी ने; इयम्--यह; सर्वम्--सर्वस्व; सोढुमू--सहन करने के लिए; अलम्--मैं समर्थ हूँ; मन्ये-- यद्यपि मैंमानता हूँ; ऋते--के अतिरिक्त, सिवाय; अलीक-परम्--अत्यन्त जघन्य झूठा; नरमू--मनुष्य |
असत्य से बढ़कर पापमय कुछ भी नहीं है |
इसी कारण से एक बार माता पृथ्वी ने कहा था,’मैं किसी भी भारी बोझ को सहन कर सकती हूँ, किसी झूठे व्यक्ति को नहीं |
नाहं बिभेमि निरयान्नाधन्यादसुखार्णवात् |
न स्थानच्यवनान्मृत्योर्यथा विप्रप्रलम्भनात् ॥
५॥
न--न तो; अहम्--मैं; बिभेमि--डरता हूँ; निरयात्ू--नारकीय अवस्था से; न--न तो; अधन्यात्--गरीबी की अवस्था से;असुख-अर्णवात्--दुख रूपी समुद्र से; न--नहीं; स्थान-च्यवनात्--पदच्युत होने से; मृत्यो: --मृत्यु से; यथा--जिस तरह;विप्र-प्रलम्भनात्--ब्राह्मण को ठगने से |
मैं नरक, दरिद्रता, दुख रूपी सुमद्र, पदच्युत होने या साक्षात् मृत्यु से उतना नहीं डरताजितना कि एक ब्राह्मण को ठगने से डरता हूँ |
यद्यद्धास्यति लोकेउस्मिन्सम्परेतं धनादिकम् |
तस्य त्यागे निमित्तं किं विप्रस्तुष्येन्न तेन चेत् ॥
६॥
यत् यत्--जो कुछ भी; हास्यति--छोड़ेगा; लोके--संसार में; अस्मिन्--इस; सम्परेतम्--पहले से मृत; धन-आदिकम्--उसका धनधान्य; तस्य--ऐसी सम्पत्ति के; त्यागे--त्याग में; निमित्तम्-हेतु; किम्ू--क्या है; विप्र: --ब्राह्मण जो गुप्त रूप मेंभगवान् विष्णु है; तुष्येत्-- प्रसन्न किया जाना चाहिए; न--नहीं है; तेन--ऐसे धन से; चेतू--काश
हे प्रभ!! आप यह भी देख सकते हैं कि इस संसार का सारा भौतिक ऐश्वर्य उसके स्वामी कीमृत्यु के समय निश्चित रूप से विलग हो जाता है |
अतएवं यदि ब्राह्मण वामनदेव दिये गयेउपहारों ( दान ) से तुष्ट नहीं होते तो क्यों न उन्हें उस धन से तुष्ट कर लिया जाये जो मृत्यु के समयचला जाने वाला है? श्रेय: कुर्वन्ति भूतानां साधवो दुस्त्यजासुभि: |
दध्यड्शिबिप्रभूतयः को विकल्पो धरादिषु ॥
७॥
श्रेयः:--अत्यधिक महत्त्व के कार्यकलाप; कुर्वन्ति--करते हैं; भूतानामू--जन सामान्य के; साधव:--सन्त पुरुष; दुस्त्यज--जिनका त्याग पाना कठिन है; असुभिः--अपने प्राणों के द्वारा; दध्यड---महाराज दधीचि; शिबि--महाराज शिब्रि; प्रभूतयः--तथा अन्य महापुरुष; कः--क्या; विकल्प:--सोच-विचार; धरा-आदिषु--ब्राह्मण को भूमि देने में |
दधीचि, शिवि तथा अन्य अनेक महापुरुष जनसाधारण के लाभ हेतु अपने प्राणों तक कीआहुति देने के इच्छुक थे |
इतिहास इसका साक्षी है |
तो फिर इस नगण्य भूमि को क्यों न त्यागदिया जाये ? इसके लिए गम्भीर सोच विचार कैसा ? यैरियं बुभुजे ब्रहान्दैत्येन्द्रैनिवर्तिभि: |
तेषां कालोग्रसील्लोकान्न यशोउधिगतं भुवि ॥
८॥
यैः--जिनके द्वारा; इयमू--यह जगत; बुभुजे-- भोग किया गया; ब्रह्मनू-हे ब्राह्मण- श्रेष्ठ; दैत्य-इन्द्रै:-- असुर कुलों में उत्पन्नशूरवीरों तथा राजाओं द्वारा; अनिवर्तिभि:--उनके द्वारा जो लड़कर मरने या विजयी होने के लिए हृढ़संकल्प थे; तेषामू--ऐसेव्यक्तियों का; काल:--काल ने; अग्रसीत्ू--हर लिया; लोकान्--सारी सम्पत्ति, भोग की सारी वस्तुओं को; न--नहीं; यश: --यश; अधिगतम्ू--प्राप्त किया; भुवि--इस जगत में
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! निस्सन्देह, उन महान् असुर राजाओं ने इस संसार का भोग किया है, जो युद्धकरने से कभी भी हिचकिचाते नहीं थे, किन्तु कालान्तर में उनकी कीर्ति के अतिरिक्त उनके पासकी हर वस्तु छीन ली गई और वे उसी कीर्ति के बल पर आज भी विद्यमान हैं |
दूसरे शब्दों में,मनुष्य को चाहिए कि सब कुछ छोड़कर सुयश अर्जित करने का प्रयास करे |
सुलभा युधि विप्रषें ह्मनिवृत्तास्तनुत्यज: |
न तथा तीर्थ आयाते श्रद्धया ये धनत्यज: ॥
९॥
सु-लभा:--सहज ही प्राप्त; युधि--युद्धभूमि में; विप्र-ऋषे--हे ब्राह्मण श्रेष्ठ; हि--निस्सन्देह; अनिवृत्ता:--लड़ने से न डरकर;तनु-त्यज:--इस प्रकार अपना जीवन होम दिया; न--नहीं; तथा--उसी तरह; तीर्थे आयाते--सन्त पुरुषों के आगमन पर,जिनसे तीर्थस्थल बनते हैं; श्रद्धया-- श्रद्धा तथा भक्तिपूर्वक; ये--जो; धन-त्यज:--संचित धन को त्याग सकते हैं |
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ) ऐसे अनेक लोग हैं जिन्होंने युद्ध से न डरकर युद्धभूमि में अपने प्राणों कीबलि दे दी है, किन्तु ऐसा अवसर किसी को विरले ही मिला है जब किसी मनुष्य ने अपनासंचित धन किसी ऐसे साधु पुरुष को निष्ठापूर्वक दान दिया हो जो तीर्थस्थल को जन्म देता है |
मनस्विनः कारुणिकस्य शोभनंयदर्थिकामोपनयेन दुर्गतिः |
कुतः पुनर्ब्रह्मविदां भवाहशांततो वटोरस्य ददामि वाउ्छतम् ॥
१०॥
मनस्विन:ः --अ त्यन्त उदार; कारुणिकस्य--अत्यन्त कृपालु पुरुषों का; शोभनम्--अत्यन्त शुभ; यत्--जो; अर्थि-- धन के लिएजरूरतमन्द व्यक्तियों का; काम-उपनयेन-- इच्छा पूर्ति द्वारा; दुर्गतिः--दरिद्रता का मारा; कुतः--क्या; पुन:ः--फिर; ब्रह्म-विदाम्--ब्रह्मविद्या में पटु पुरुषों का; भवाहशाम्ू--आप जैसे; ततः--अतएव; वटो: --ब्रह्मचारी का; अस्य--इस वामनदेव;ददामि--दूँगा; वाज्छितम्ू--वह जो भी चाहता है |
दान देने से उदार तथा दयालु व्यक्ति निस्सन्देह और अधिक शुभ बन जाता है, विशेषतयाजब वह आप जैसे व्यक्ति को दान देता है |
ऐसी परिस्थिति में मुझे इस लघु ब्रह्मचारी को उसकामुँहमाँगा दान देना चाहिए |
यजन्ति यज्ञ क्रतुभिर्यमाहताभवन्त आम्नायविधानकोविदा: |
स एव विष्णुर्वरदोस्तु वा परोदास्याम्यमुष्मै क्षितिमीप्सितां मुने ॥
११॥
यजन्ति-- पूजा करते हैं; यज्ञम्--यज्ञभोक्ता; क्रतुभि:--यज्ञ की विविध सामग्रियों द्वारा; यमू--परम पुरुष को; आहता: --अत्यन्त आदरपूर्वक; भवन्त:--आप सभी; आम्नाय-विधान-कोविदा:--यज्ञ सम्पन्न करने के वैदिक नियमों से पूर्णतया ज्ञातमहान् सन्त पुरुष; सः--वह; एव--निस्सन्देह; विष्णु: -- भगवान् विष्णु है; वरद:ः--या तो वह आशीर्वाद देने के लिए तैयार है;अस्तु--हो जाता है; वा--अथवा; पर: --शत्रु रूप में आता है; दास्यामि--दूँगा; अमुष्मै--उसको ( विष्णु या वामनदेव को );क्षितिमू-- भूमि; ईप्सितामू-- अभीष्ट; मुने--हे मुनि
हे महामुनि! आप जैसे सन्त महापुरुष जो कर्मकाण्ड तथा यज्ञ सम्पन्न करने के वैदिकसिद्धान्तों से पूर्णतया ज्ञात हैं सभी परिस्थितियों में भगवान् विष्णु की आराधना करते हैं |
अतएववही भगवान् विष्णु यहाँ चाहे मुझे वरदान देने के लिए आये हों या शत्रु के रूप में मुझे दण्ड देनेआये हों, मेरा कर्तव्य है कि मैं उनके आदेश का पालन करूँ और बिना हिचक के उनके द्वारामाँगी गई भूमि उन्हें दूँ |
यद्यप्यसावधर्मेण मां बध्नीयादनागसम् |
तथाप्येनं न हिंसिष्ये भीतं ब्रह्मतनुं रिपुम् ॥
१२॥
यद्यपि--यद्यपि; असौ-- भगवान् विष्णु; अधर्मेण--छल से; माम्--मुझको; बध्नीयात्--मारते हैं; अनागसम्--यद्यपि मैं पापीनहीं हूँ; तथापि--फिर भी; एनम्--उनके विरुद्ध; न--नहीं; हिंसिष्ये--बदला लूँगा; भीतम्--क्योंकि वे भयभीत हैं; ब्रह्म-तनुम्--ब्राह्मण ब्रह्मचारी का वेश धारण करके; रिपुम्-भले ही वे मेरे शत्रु हों
यद्यपि वे साक्षात् विष्णु हैं, किन्तु भयवश उन्होंने मेरे पास भिक्षा माँगने आने के लिएब्राह्मण का वेश धारण कर रखा है |
ऐसी परिस्थिति में जब उन्होंने ब्राह्यण रूप धारण कर रखाहै, तो वे चाहे अधर्म द्वारा मुझे बन्दी बनाते हैं या मेरा वध भी कर देते हैं तब भी मैं उनसे बदलानहीं लूँगा यद्यपि वे मेरे शत्रु हैं |
एष वा उत्तमएलोको न जिहासति यद्य॒श: |
हत्वा मैनां हरेद्युद्धे शयीत निहतो मया ॥
१३॥
एप: --यह ( ब्रह्मचारी ); वा--अथवा; उत्तम-श्लोक:-- भगवान् विष्णु जिनकी पूजा वैदिक स्तुतियों से की जाती है; न--नहीं;जिहासति--त्यागना चाहता है; यत्--क्योंकि; यश: --यश; हत्वा--मारकर; मा--मुझको; एनाम्--इस भूमि; हरेत्--ले लेगा;युद्धे--युद्ध में; शयीत--लेट जायेगा; निहतः--मारा जाकर; मया--मेरे द्वारा
यदि यह ब्राह्मण वास्तव में भगवान् विष्णु है, जिसकी पूजा वैदिक स्तुतियों द्वारा की जातीहै, तो वह अपने सर्वव्यापक यश को कभी नहीं छोड़ेगा; वह या तो मेरे द्वारा मारा जाकर लेटजायेगा या युद्ध में मेरा वध कर देगा |
श्रांशुक उबाचएवमश्रद्धितं शिष्यमनादेशकरं गुरु: |
शशाप दैवप्रहितः सत्यसन्धं मनस्विनम् ॥
१४॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; अश्रद्धितम्-गुरु के आदेश का आदर न करने वाले;शिष्यम्ू-शिष्य को; अनादेश-करम्--जो अपने गुरु के आदेश का पालन करने को तैयार न था; गुरु:--गुरु ( शुक्राचार्य ) ने;शशाप--शाप दिया; दैव-प्रहितः -- भगवान् से प्रेरित होकर; सत्य-सन्धम्--जो सत्य पर अडिग थे; मनस्विनम्--जिसका चरित्रअत्युच्च था, सच्चरित्र |
श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : तत्पश्चात् भगवान् से प्रेरित होकर गुरु शुक्राचार्य नेअपने उच्च शिष्य बलि महाराज को शाप दे दिया जो इतने उदार एवं सत्यनिष्ठ थे कि अपने गुरुके आदेशों को मानने की बजाये उनकी आज्ञा का उल्लघंन करना चाह रहे थे |
हढं पण्डितमान्यज्ञः स्तब्धोस्यस्मदुपेक्षया |
मच्छासनातिगो यस्त्वमचिरादभ्रश्यसे अ्रियः ॥
१५॥
हढम्--तुम अपने निर्णय में इतने हढ़ हो; पण्डित-मानी--अपने को अत्यधिक विद्वान मानने वाले; अज्ञ:--मूर्ख; स्तब्ध:--धुृष्ट,उद्धत; असि--हो गये हो; अस्मत्--हम सबकी; उपेक्षया--उपेक्षा करके; मत्-शासन-अतिग: --मेरे शासन की सीमा काअतिक्रमण करते हुए; यः--ऐसा व्यक्ति ( जैसे तुम ); त्वम्--तुम; अचिरातू--शीघ्र ही; भ्रश्यसे--नीचे गिर जाओगे; थ्रिय:--सारे ऐश्वर्य से |
यद्यपि तुम्हें कोई ज्ञान नहीं है फिर भी तुम तथाकथित विद्वान पुरुष बन गये हो; और इतनेधृष्ट होकर तुम मेरे आदेश का उल्लंघन करने का दुस्साहस कर रहे हो |
मेरी आज्ञा का उल्लंघनकरने के कारण तुम शीघ्र ही सारे ऐश्वर्य से विहीन हो जाओगे |
एवं शप्तः स्वगुरुणा सत्यान्न चलितो महान् |
वामनाय ददावेनामर्चित्वोदकपूर्वकम् ॥
१६॥
एवम्--इस प्रकार से; शप्त:--शापित होकर; स्व-गुरुणा -- अपने ही गुरु द्वारा; सत्यात्ू--सत्य से; न--नहीं; चलित:--चलायमान; महान्--महापुरुष; वामनाय--वामनदेव को; ददौ--दान में दे दिया; एनाम्--सारी भूमि; अर्चित्वा--पूजा करके;उदक-पूर्वकम्--पहले जल अर्पित करके
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : अपने गुरु द्वारा इस प्रकार शापित होने पर भी महापुरुषहोने के नाते बलि महाराज अपने संकल्प से टले नहीं |
अतएव प्रथा के अनुसार उन्होंने सर्वप्रथमवामनदेव को जल अर्पित किया और तब उन्हें वह भूमि भेंट की जिसके लिए वे वचन दे चुकेथे |
विन्ध्यावलिस्तदागत्य पत्नी जालकमालिनी |
आनिन्ये कलशं हैममवनेजन्यपां भूतम् ॥
१७॥
विन्ध्यावलि:--विन्ध्यावलि; तदा--उस समय; आगत्य--वहाँ आकर; पत्ती--महाराज बलि की पत्नी; जालक-मालिनी--मोतियों की माला से सुसज्जित; आनिन्ये--ले आईं; कलशम्--जलपात्र; हैमम्--सोने का; अवनेजनि-अपाम्-- भगवान् केचरण धोने के लिए जल से युक्त; भूतम्-- भरा हुआ
बलि महाराज की पतली विध्यावलि जो गले में मोतियों की माला पहने थीं वहाँ पर तुरन्तआईं और भगवान् के चरणकमलों को धोकर उनकी पूजा करने के निमित्त अपने साथ पानी सेभरा सोने का एक बड़ा जलपात्र लेती आईं |
यजमान: स्वयं तस्य श्रीमत्पादयुगं मुदा |
अवनिज्यावहन्मूर्धिन तदपो विश्वपावनी: ॥
१८॥
यजमान:--पूजा करने वाला ( बलि महाराज ); स्वयम्--स्वयम्; तस्थ--वामनदेव के; श्रीमत् पाद-युगम्--शुभ एवं सुन्दरचरणकमल युगुल; मुदा--प्रसन्नतापूर्वक; अवनिज्य--ठीक से धोकर; अवहत्--चढ़ाया; मूर्ध्नि--सिर पर; तत्--वह; अपः--जल; विश्व-पावनी:--सारे संसार को मुक्ति देने वाला |
वामनदेव की पूजा करने वाले बलि महाराज ने प्रसन्नतापूर्वक भगवान् के चरणकमलों कोधोया; फिर उस जल को अपने सिर पर चढ़ाया क्योंकि वह जल सम्पूर्ण विश्व का उद्धार करताहै |
तदासुरेन्द्रं दिवि देवतागणागन्धर्वविद्याधरसिद्धचारणा: |
तत्कर्म सर्वेषपि गृणन्त आर्जवंप्रसूनवर्ष्ववृषुर्मुदान्विता: ॥
१९॥
तदा--उस समय; असुर-इन्द्रमू--असुरों के राजा बलि महाराज को; दिवि--स्वर्गलोक में; देवता-गणा:--देवता लोग;गन्धर्व--गन्धर्वगण; विद्याधर--विद्याधर; सिद्ध--सिद्धलोक के वासी; चारणा:--चारण लोक के वासी; तत्--उस; कर्म --काम; सर्वे अपि--सारे के सारे; गृणन्त:--घोषित करते हुए; आर्जवम्--सरल; प्रसून-वर्षै:--फूलों की वर्षा से; बवृषु:--वर्षाकी; मुदा-अन्विता: --उससे परम प्रसन्न होकर |
उस समय स्वंगलोक के निवासी--यथा देवता, गन्धर्व, विद्याधर, सिद्ध तथा चारणसभी--बलि महाराज के इस सरल द्वैतरहित कार्य से परम प्रसन्न हुए और उन्होंने उनके गुणों कीप्रशंसा की तथा उन पर लाखों फूल बरसाये |
नेदुर्मुहरर्दुन्दुभयः सहस्त्रशोगन्धर्वकिम्पूरुषकिन्नरा जगुः |
मनस्विनानेन कृतं सुदुष्करंविद्वानदाद्यद्रिपवे जगत्त्रयम् ॥
२०॥
नेदु:--बजने लगीं; मुहुः--पुनः पुनः; दुन्दुभय: --दुन्दुभियाँ; सहस्नरश:--हजारों; गन्धर्व--गन्धर्वलोक के वासी; किम्पूरूुष--किम्पुरुष लोक के वासी; किन्नरा:--किन्नर लोक के वासी; जगु:--गाने लगे; मनस्विना--अत्यन्त पूज्य व्यक्ति के द्वारा;अनेन--बलि महाराज द्वारा; कृतम्--किया गया; सु-दुष्करम्--अत्यन्त कठिन कार्य; विद्वानू--विद्वान होने के कारण;अदातू--दान दिया; यत्--जो; रिपवे--शत्रु को, बलि महाराज के शत्रु देवताओं का पक्ष लेने वाले विष्णु को; जगत्-त्रयम्--तीनों लोक |
गन्धर्वों, किम्पुरुषों तथा किन्नरों ने पुनः पुनः हजारों दुन्दुभियाँ बजाईं और परम प्रसन्न होकरगाना शुरू किया, '‘बलि महाराज कितने महान् पुरुष हैं और उन्होंने कितना कठिन कार्य सम्पन्नकिया है |
यद्यपि वे जानते थे कि भगवान् विष्णु उनके शत्रुओं के पक्ष में हैं, तो भी उन्होंनेभगवान् को दान में सम्पूर्ण तीनों लोक दे दिये |
'तद्वामनं रूपमवर्धताद्भुतंहरेरनन्तस्य गुणत्रयात्मकम् |
भू: खं दिशो द्यौर्विवरा: पयोधय-स्तिर्यडनूदेवा ऋषयो यदासत ॥
२१॥
तत्--वह; वामनम्-- भगवान् वामन का अवतार; रूपम्--रूप; अवर्धत--बढ़ने लगा; अद्भुतम्-- आश्चर्यजनक; हरे:--भगवान् का; अनन्तस्य--अनन्त का; गुण-त्रय-आत्मकम्--जिनका शरीर तीन गुणों से युक्त भौतिक शक्ति द्वारा विस्तारित है;भू:-- भूमि; खमू-- आकाश; दिशः--सभी दिशाएँ; द्यौ:--लोक ; विवरा:--ब्रह्माण्ड के विभिन्न छिद्र; पयोधय:--महान्सागर; तिर्यक्ू--निम्न पशु, पक्षी; नृ--मनुष्य; देवा:--देवता; ऋषय:--ऋषिगण; यत्--जिसमें; आसत--निवास करते थे |
तब अनन्त भगवान्, जिन्होंने वामन का रूप धारण कर रखा था, भौतिक शक्ति की दृष्टि सेआकार में बढ़ने लगे यहाँ तक कि ब्रह्माण्ड की सारी वस्तुएँ जिनमें पृथ्वी, अन्य लोक, आकाश,दिशाएँ, ब्रह्माण्ड के विभिन्न छिद्र, समुद्र, पक्षी, पशु, मनुष्य, देवता तथा ऋषिगण सम्मिलित थे,उनके शरीर के भीतर समा गये |
काये बलिस्तस्य महाविभूते:सहर्खिगाचार्यसदस्य एतत् |
ददर्श विश्व त्रिगुणं गुणात्मकेभूतेन्द्रियार्थाशयजीवयुक्तम् ॥
२२॥
काये--शरीर में; बलि:--महाराज बलि; तस्य-- भगवान् का; महा-विभूते:--समस्त अद्भुत ऐश्वर्यों से युक्त पुरुष का; सह-ऋत्विक्-आचार्य-सदस्यः--समस्त पुरोहितों, आचार्यों तथा उस पवित्र सभा के सदस्यों सहित; एतत्--यह; ददर्श--देखा;विश्वम्--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड; त्रि-गुणम्--तीन गुणों वाले; गुण-आत्मके--ऐसे समस्त गुणों के स्त्रोत में; भूत-- भौतिक तत्त्वोंसमेत; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; अर्थ--इन्द्रिय-विषयों सहित; आशय--मन, बुद्धि तथा अहंकार सहित; जीव-युक्तम्--समस्त जीवोंके सहित |
बलि महाराज ने अपने समस्त पुरोहितों, आचार्यों तथा सभा के सदस्यों सहित भगवान् केविश्वरूप को देखा जो षड्ऐश्वर्यों से युक्त था |
उस शरीर में ब्रह्माण्ड की सारी वस्तुएँ विद्यमानथीं--सारे भौतिक तत्त्व, इन्द्रियाँ, इन्द्रिय-विषय, मन, बुद्द्धि, अहंकार, विविध जीव तथा प्रकृतिके तीनों गुणों के कर्म तथा उनके फल |
रसामचष्टाड्प्रितलेथ पादयो-म॑हीं महीक्रान्पुरुषस्य जड्डयो: |
पतत्रत्रिणो जानुनि विश्वमूर्ते-रूवोर्गणं मारुतमिन्द्रसेन: ॥
२३॥
रसामू--अधोलोक; अचष्ट--देखा; अड्प्रि-तले--पाँव के नीचे, तलवे के नीचे; अथ--तत्पश्चात्; पादयो:--पाँवों पर;महीम्-- भूमि को; महीक्रान्--पर्वतों को; पुरुषस्य--विराट पुरुष की; जड्डयो:--पिंडलियों में; पतत्त्रिण:--उड़ने वाले जीव;जानुनि--घुटनों पर; विश्व-मूर्तें:--विराट भगवान् के रूप का; ऊर्वो:--जाँघों पर; गणम् मारुतम्ू--वायु के प्रकार; इन्द्रसेन:--बलि महाराज जिसे इन्द्र के सिपाही मिल गये थे और जो इन्द्र पद पर आसीन थे
तत्पश्चात् राजा इन्द्र के आसन पर आसीन बलि महाराज ने अधोलोकों को, यथा रसातलको, भगवान् के विराट रूप के पाँव के तलवों पर देखा |
उन्होंने भगवान् के पाँवों पर पृथ्वी को,पिंडलियों पर सारे पर्वतों को, घुटनों पर विविध पक्षियों को तथा जाँघों पर वायु के विभिन्नप्रकारों ( मरुदगण ) को देखा |
सन्ध्यां विभोर्वाससि गुह्य ऐक्षत्प्रजापतीज्घने आत्ममुख्यान् |
नाभ्यां नभः कुक्षिषु सप्तसिन्धू-नुरुक्रमस्योरसि चर्क्षमालाम् ॥
२४॥
सन्ध्यामू--शाम; विभो: --पर मे श्वर के ; वाससि--वस्त्र में; गुह्ो --गुप्तांगों में; ऐश्वत्--उसने देखा; प्रजापतीन्ू--विभिन्नप्रजापतियों को, जिन्होंने सारे जीवों को जन्म दिया; जघने--कूल्हों पर; आत्म-मुख्यान्ू--बलि महाराज के विश्वस्त मंत्रियों;नाभ्यामू--नाभि पर; नभ:--पूरा आकाश; कुक्षिषु--कमर में; सप्त--सात; सिन्धून्--समुद्रों के; उरुक्रमस्थ-- भगवान् के जोअदभुत कार्य कर रहे थे; उरसि--वक्षस्थल पर; च-- भी; ऋक्ष-मालाम्--तारों का समूह |
बलि महाराज ने अद्भुत कार्य करने वाले भगवान् के बस्त्रों के नीचे संध्या देखी, उनकेगुप्तांगों में प्रजापतियों को देखा और उनके कटि प्रदेश के गोल भाग में उन्होंने अपने को तथाअपने विश्वस्त पार्षदों को देखा |
उन्होंने भगवान् की नाभि में आकाश, कमर में सातों समुद्र तथाउनके वक्षस्थल में तारों के सारे समूह देखे |
हद्यड़ धर्म स्तनयोर्मुरारे-ऋत॑ च सत्यं च मनस्यथेन्दुम् |
श्रियं च वक्षस्यरविन्दहस्तांकण्ठे च सामानि समस्तरेफान् ॥
२५॥
इन्द्रप्रधानानमरान्भुजेषुतत्कर्णयो: ककुभो द्यौश्व मूर्धि |
केशेषु मेघाउ्छुसनं नासिकाया-मक्ष्णोश्व सूर्य वबदने च वह्विमू ॥
२६॥
वाण्यां च छन्दांसि रसे जलेशंभ्रुवोर्निषेधं च विधि च पक्ष्मसु |
अहृश्न रात्रिं च परस्य पुंसोमन्युं ललाटेउधर एवं लोभम् ॥
२७॥
स्पर्शे च काम नृप रेतसाम्भ:पृष्ठे त्वधर्म क्रमणेषु यज्ञम् |
छायासु मृत्युं हसिते च मायांतनूरुहेष्वोषधिजातयश्व ॥
२८॥
नदीश्व नाडीषु शिला नखेषुबुद्धावजं देवगणानृषीं श्व |
प्राणेषु गात्रे स्थिरजड्रमानिसर्वाणि भूतानि ददर्श वीर: ॥
२९॥
हृदि--हृदय के भीतर; अड्ु--हे राजा परीक्षित; धर्मम्-धर्म के; स्तनयो: --स्तनों पर; मुरारे:--मुरारि के; ऋतम्--अत्यन्त मधुरशब्द; च-- भी; सत्यम्--सत्य को; च-- भी; मनसि--मन में; अथ--तत्पश्चात्; इन्दुमू--चन्द्रमा को; थ्रियमू--लक्ष्मी को;च--भी; वक्षसि--छाती पर; अरविन्द-हस्ताम्--अपने हाथ में सदैव कमल धारण करने वाली; कण्ठे--गले में; च-- भी;सामानि--सारे वेद ( साम, यजुर्, ऋक् तथा अथर्व ); समस्त-रेफान्--सारी ध्वनियों को; इन्द्र-प्रधानान्ू--इन्द्र आदि को;अमरान्--सारे देवताओं को; भुजेषु--भुजाओं पर; तत्-कर्णयो: --कानों पर; ककुभः--सारी दिशाएँ; द्यौ: च--तथाज्योतिष्क; मूर्ध्ति--सिर के ऊपर; केशेषु--बालों में; मेघान्ू--बादलों को; श्रसनम्-- ध्वास; नासिकायाम्--नथुनों पर; अक्ष्णो:च--आँखों में; सूर्यम्--सूर्य को; वदने--मुख में; च-- भी; वहिम्--आग को; वाण्याम्--वाणी में; च-- भी; छन्दांसि--वैदिक स्तुतियाँ; रसे--जीभ में; जल-ईशम्--जल के देवता को; श्रुवो:--भौंहों पर; निषेधम्--चेतावनी; च-- भी; विधिम्--विधि-विधान; च-- भी; पक्ष्मसु--पलकों में; अह: च--दिन; रात्रिमू--रात; च--भी; परस्थ--परम; पुंसः--पुरुष का;मन्युमू--क्रोध को; ललाटे--मस्तक पर; अधरे--होठों पर; एब--निस्सन्देह; लोभम्--लालच; स्पर्शे--स्पर्श में; च-- भी;कामम्--कामेच्छाएँ; नृप--हे राजा; रेतसा--वीर्य से; अम्भ: --जल; पृष्ठे--पीठ पर; तु--लेकिन; अधर्मम्--अधर्म को;क्रमणेषु-- अद्भुत कार्यो में; यज्ञममू--अग्नि यज्ञ को; छायासु--छाया में; मृत्युम्--मृत्यु को; हसिते--हँसी में; च-- भी;मायाम्--माया को; तनू-रुहेषु--शरीर के बालों प;; ओषधि-जातय: --ओषधियों की सारी किसमें; च--तथा; नदी: --नदियोंको; च--भी; नाडीषु--नाड़ियों में; शिला:--चट्टानें; नखेषु--नाखूनों में; बुद्धौ--बुद्धि में; अजम्--ब्रह्मा को; देव-गणान्--देवताओं को; ऋषीन् च--तथा ऋषियों को; प्राणेषु--इन्द्रियों में; गात्रे--शरीर में; स्थिर-जड्रमानि--जड़ तथा चेतन को;सर्वाणि--सारे; भूतानि--जीवों को; ददर्श--देखा; बीर:--बलि महाराज ने |
हे राजा! उन्होंने भगवान् मुरारि के हृदय में धर्म, वक्षस्थल पर मधुर शब्द तथा सत्य, मन मेंचन्द्रमा, वक्षस्थल पर हाथ में कमल पुष्प लिए लक्ष्मीजी, गले में सारे वेद तथा सारी शब्दध्वनियां, बाहुओं में इन्द्र इत्यादि सारे देवता, दोनों कानों में सारी दिशाएँ, सिर पर उच्चलोक,बालों में बादल, नथुनों में वायु, आँखों में सूर्य और मुख में अग्नि को देखा |
उनके शब्दों से सारेवैदिक मंत्र निकल रहे थे, उनकी जीभ पर जलदेवता वरुणदेव थे, उनकी भौहों पर विधि-विधान तथा उनकी पलकों पर दिन-रात थे ( आँखें खुली रहने पर दिन और बन्द होने पर रात्रि ) |
उनके मस्तक पर क्रोध और उनके होठों पर लालच था |
हे राजा! उनके स्पर्श में कामेच्छाएँ,उनके वीर्य में सारे जल, उनकी पीठ पर अधर्म, उनके अद्भुत कार्यों या पगों में यज्ञ की अग्निथी |
उनकी छाया में मृत्यु, उनकी मुस्कान में माया थी और उनके शरीर के सारे बालों परओषधियाँ तथा लताएँ थीं |
उनकी नाड़ियों में सारी नदियाँ, उनके नाखूनों में सारे पत्थर, उनकीबुद्धि में ब्रह्माजी, देवता तथा महान् ऋषिगण और उनके सारे शरीर तथा इन्द्रियों में सारे जड़तथा चेतन जीव थे |
इस प्रकार बलि महाराज ने भगवान् के विराट शरीर में प्रत्येक वस्तु कोदेखा |
सर्वात्मनीदं भुवनं निरीक्ष्यसर्वेड्सुरा: कश्मलमापुरड्र |
सुदर्शन चक्रमसह्मतेजोधनुश्च शार्ड सस््तनयिलुघोषम् ॥
३०॥
सर्व-आत्मनि--परम पूर्ण या भगवान् में; इदम्--यह ब्रह्माण्ड; भुवनम्--तीनों लोक; निरीक्ष्य--देखकर; सर्वे--सभी;असुरा:--असुर, बलि महाराज के पार्षद; कश्मलम्--विलाप; आपु:--प्राप्त किया; अड्भ--हे राजा; सुदर्शनम्--सुदर्शननामक; चक्रमू--चक्र; असहा--न सहा जाने योग्य; तेज:--ताप; धनु: च--तथा धनुष; शार्डम्-शार्ड़ नामक; स्तनयित्नु--घिरे हुए बादलों की ध्वनि; घोषम्--की तरह ध्वनि करती |
हे राजा! जब महाराज बलि के समस्त असुर अनुयायियों ने भगवान् के विराट रूप कोदेखा, जिन्होंने अपने शरीर के भीतर सब कुछ समा लिया था, और जब उन्होंने भगवान् के हाथमें सुदर्शन नामक चक्र को देखा जो असह्य ताप उत्पन्न करता है और जब उन्होंने उनके धनुष कीकोलाहलपूर्ण ध्वनि सुनी तो इन सब के कारण उनके हृदयों में विषाद उत्पन्न हो गया |
पर्जन्यघोषो जलज: पाञ्जजन्यःकौमोदकी विष्णुगदा तरस्विनी |
विद्याधरोसि: शतचन्द्रयुक्त-स्तृणोत्तमावक्षयसायकौ च ॥
३१॥
पर्जन्य-घोष:--बादलों जैसी गर्जन; जलज:ः-- भगवान् का शंख; पाञ्जजन्य:--पाज्जजन्य नामक; कौमोदकी--कौमोदकीनामक; विष्णु-गदा--विष्णु की गदा; तरस्विनी--अत्यन्त वेगवान्; विद्याधर: --विद्याधर नामक; असि:--तलवार; शत-चन्द्र-युक्त:--सैकड़ों चन्द्रमाओं से अलंकृत ढाल; तूण-उत्तमौ-- श्रेष्ठ तरकस; अक्षयसायकौ--अक्षयसायक नामक; च--भीबादल की सी ध्वनि करने वाला भगवान् का पाझ्जजन्य नामक शंख, अत्यन्त वेगवान्कौमोदकी नामक गदा, विद्याधर नामक तलवार, सैकड़ों चन्द्रमा जैसे चिह् से अलंकृत ढालएवं तरकसों में सर्वश्रेष्ठ अक्षयसायक--ये सभी भगवान् की स्तुति करने के लिए एक साथप्रकट हुए |
सुनन्दमुख्या उपतस्थुरीशंपार्षदमुख्या: सहलोकपाला: |
स्फुरत्किरीटाड्ुदमीनकुण्डलःश्रीवत्सरत्नोत्तममेखलाम्बरै: ॥
३२॥
मधुव्रतस्त्रग्वनमालयावृतोरराज राजन्भगवानुरुक्रमः |
क्षितिं पदैकेन बलेविंचक्रमेनभ:ः शरीरेण दिशश्च बाहुभि: ॥
३३॥
सुनन्द-मुख्या: --सुनन्द आदि भगवान् के पार्षद; उपतस्थु:--स्तुति करने लगे; ईशम्-- भगवान् की; पार्षद-मुख्या:--अन्यप्रमुख पार्षद; सह-लोक-पाला:--समस्त लोकों के प्रधान देवों सहित; स्फुरत्ू-किरीट--चमकीले मुकुट सहित; अड्भद--बाजूबन्द; मीन-कुण्डल:--तथा मछली के आकार के कुण्डल; श्रीवत्स--उनके वक्षस्थल पर श्रीवत्स नामक बाल; रत्न-उत्तम-श्रेष्ठ रतन ( कौस्तुभ ); मेखला--पेटी; अम्बरैः--पीत वस्त्र सहित; मधु-वब्रत--भौंरों का; स्रकू--माला; वनमालया--फूलों की माला से; आवृतः --ढका; रराज-- प्रकट; राजन्--हे राजा; भगवान्-- भगवान्; उरुक्रम:-- अपने अद्भुत कार्यों सेप्रत्यक्ष; क्षितिमू--सारे विश्व को; पदा एकेन--एक ही पग से; बले: --बलि महाराज के; विचक्रमे--ढक लिया; नभ:--आकाश; शरीरेण--अपने शरीर से; दिशः च--तथा सारी दिशाएँ; बाहुभि:--अपनी भुजाओं से
सुनन्द तथा अन्य प्रमुख पार्षदों के साथ-साथ विभिन्न लोकों के प्रधान देवों ने भगवान् कीस्तुति की जो चमकीला मुकुट, बाजूबन्द तथा चमकदार मकराकृत कुण्डल पहने हुए थे |
भगवान् के वक्षस्थल पर श्रीवत्स नामक बालों का गुच्छा और दिव्य कौस्तुभ मणि थे |
वे'पीतवस्त्र पहने थे जिसके ऊपर कमर की पेटी बंधी थी |
वे फूलों की माला से सज्जित थे जिसकेचारों ओर भौरे मँडरा रहे थे |
हे राजा! इस प्रकार अपने आपको प्रकट करते हुए अद्भुतकार्यकलापों वाले भगवान् ने अपने एक पग से सम्पूर्ण पृथ्वी को, अपने शरीर से आकाश कोऔर अपनी भुजाओं से समस्त दिशाओं को ढक लिया |
पद द्वितीयं क्रमतस्त्रिविष्टपंन वे तृतीयाय तदीयमण्वपि |
उरुक्रमस्याडूप्रिरुपर्युपर्य थोमहर्जनाभ्यां तपस: परं गत: ॥
३४॥
'पदम्--पग; द्वितीयम्ू--दूसरा; क्रमत:ः--आगे बढ़ाकर; त्रि-विष्टपम्--सारा स्वर्गलोक; न--नहीं; वै--निस्सन्देह; तृतीयाय--तीसरे पग के लिए; तदीयम्--भगवान् के; अणु अपि-- भूमि का एक कण भी शेष बचा; उरुक्रमस्थ--असामान्य कार्य करनेवाले भगवान् का; अद्घ्रि:--ऊपर तथा नीचे घेरने वाले पग; उपरि उपरि--ऊपर और उससे भी ऊपर; अथो--अब; महः-जनाभ्याम्ू--महलोंक तथा जनलोक से भी; तपसः--तपोलोक; परम्ू--उससे भी परे; गत:--पहुँच गया |
जब भगवान् ने अपना दूसरा पग भरा तो उसमें सारे स्वर्गलोक आ गये |
अब तीसरे पग केलिए रंचमात्र भी भूमि न बची क्योंकि भगवान् का पग महलोक, जनलोक, तपोलोक, यहाँ तककि सत्यलोक से भी ऊपर तक फैल गया |
