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अध्याय उन्नीस: भगवान वामनदेव ने बलि महाराज से दान मांगा
8.19श्रीशुक उबाचइति वैरोचनेर्वाक्यं धर्मयुक्ते स सूनृतम् |
निशम्यभगवान्प्रीत: प्रतिनन्द्ेदमब्रवीत् ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; बैरोचने:--विरोचन के पुत्र के; वाक्यम्--शब्दों को;धर्म-युक्तम्-धर्म से युक्त; सः--वह; सू-नृतम्--अत्यन्त सुहावने; निशम्य--सुनकर; भगवान्-- भगवान्; प्रीत:ः--पूर्णतयाप्रसन्न होकर; प्रतिनन््य --उसको बधाई देकर; इदम्--निम्नलिखित शब्द; अब्रवीत्ू--कहे |
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : जब भगवान् वामनदेव ने बलि महाराज को इस प्रकारसुहावने ढंग से बोलते हुए सुना तो वे परम प्रसन्न हुए क्योंकि बलि महाराज धार्मिक सिद्धान्तों केअनुरूप बोले थे |
इस तरह वे बलि की प्रशंसा करने लगे |
श्रीभगवानुवाचवचस्तवैतज्जनदेव सूनृतंकुलोचितं धर्मयुतं यशस्करम् |
यस्य प्रमाणं भूगवः साम्परायेपितामहः कुलदृद्धः प्रशान्त: ॥
२॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; वच: --शब्द; तव--तुम्हारे; एतत्--इस प्रकार के; जन-देव--हे जनता के राजा; सू-नृतम्--अत्यन्त सच; कुल-उचितम्--तम्हारे वंश के अनुरूप; धर्म-युतम्-धार्मिक सिद्धान्तों के अनुसार; यश:ः-करम्--तुम्हारा यश फैलाने के लिए उपयुक्त; यस्य--जिसका; प्रमाणम्--साक्ष्य, प्रमाण; भूगव:-- भूगुवंशी ब्राह्मण; साम्पराये-- अगलेजगत में; पितामहः --तुम्हारे बाबा; कुल-वृद्ध:ः--कुल में सबसे बूढ़े, वयोवृद्ध; प्रशान्तः--अत्यन्त शान्त ( प्रह्मद महाराज ) |
भगवान् ने कहा : हे राजा! तुम सचमुच महान् हो क्योंकि तुम्हें वर्तमान सलाह देने वाले ब्राह्मण भृगुवंशी हैं, और तुम्हारे भावी जीवन के शिक्षक तुम्हारे बाबा ( पितामह ) प्रह्नद महाराजहैं, जो शान्त एवं सम्माननीय ( वयोवृद्ध ) हैं |
तुम्हारे कथन अत्यन्त सत्य हैं और वे धार्मिकशिष्टाचार से पूरी तरह मेल खाते हैं |
वे तुम्हारे वंश के आचरण के अनुरूप हैं और तुम्हारे यशको बढ़ाने वाले हैं |
न होतस्मिन्कुले कश्रिन्निःसत्त्व: कृपण: पुमान् |
प्रत्याख्याता प्रतिश्रुत्य यो वादाता द्विजातये ॥
३॥
न--नहीं; हि--निस्सन्देह; एतस्मिन्--इसमें; कुले--कुल या परिवार में; कश्चित्--कोई; निःसत्त्व: --संकुचित मन वाला;कृपण:--कंजूस; पुमान्-- कोई व्यक्ति; प्रत्याख्याता--मना करता है; प्रतिश्रुत्य-- वचन देकर; यः वा--अथवा; अदाता--नदेने वाला; द्विजातये--ब्राह्मणों को |
मुझे ज्ञात है कि आज तक तुम्हारे परिवार में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जन्मा है, जो संकीर्ण मन वाला या कंजूस हो |
न तो किसी ने ब्राह्मणों को दान देने से मना किया है, न ही दान देने कावचन देकर कोई उसे पूरा करने से विमुख हुआ है |
न सन्ति तीर्थे युधि चार्थिनार्थिता:पराड्मुखा ये त्वमनस्विनो नृप |
युष्पत्कुले यद्यशसामलेनप्रह्मद उद्धाति यथोडुप: खे ॥
४॥
न--नहीं; सन्ति--हैं; तीर्थे--तीर्थस्थानों में; युधि--युद्धभूमि में; च-- भी; अर्थिना--ब्राह्मण या क्षत्रिय द्वारा; अर्थिता: --जिनसे माँगा गया हो; पराड्मुखा: --जिसने प्रार्थना को ठुकरा दिया हो; ये--ऐसे व्यक्ति; तु--निस्सन्देह; अमनस्विन:--ऐसे क्षुद्रहृदय वाले, निम्न कोटि के राजा; नृप--हे राजा ( बलि महाराज ); युष्मत्-कुले--तुम्हारे कुल में; यत्--जिसमें; यशसाअमलेन--निष्कलंक कीर्ति से; प्रह्मदः--प्रह्नाद महाराज; उद्धाति--उदय होता है; यथा--जिस प्रकार; उड़ुप:--चन्द्रमा; खे--आकाश में
हे राजा बलि! तुम्हारे कुल में कभी भी ऐसा क्षुद्र हृदय वाला राजा उत्पन्न नहीं हुआ जिसनेतीर्थस्थानों में ब्राह्मणों द्वारा माँगे जावे पर दान न दिया हो या युद्धभूमि में क्षत्रियों से लड़ने सेमना किया हो |
तुम्हारा वंश तो प्रहाद महाराज के कारण और भी यशस्वी है क्योंकि वे आकाशमें सुन्दर चन्द्रमा के समान हैं |
यतो जातो हिरण्याक्षश्नरन्नेक इमां महीम् |
प्रतिवीरं दिग्विजये नाविन्दत गदायुधः ॥
५॥
यतः--जिस वंश में; जात:--उत्पन्न हुआ था; हिरण्याक्ष:--हिरण्याक्ष नामक राजा; चरन्--घूमते हुए; एक:--अकेले;इमाम्--इस; महीम्--पृथ्वी को; प्रतिवीरम्--प्रतिद्वन्द्दी; दिकू-विजये--सारी दिशाओं को जीतने के लिए; न अविन्दत--नहींपा सका; गदा-आयुधः -- अपनी गदा लिए
तुम्हारे ही वंश में हिरण्याक्ष ने जन्म लिया था |
वह केवल अपनी गदा लेकर सारी दिशाओंको जीतने के लिए बिना किसी सहायता के सारी पृथ्वी में अकेले घूम आया, किन्तु उसे कोईऐसा वीर न मिला जो उस का सामना कर सके |
यं विनिर्जित्य कृच्छेण विष्णु: क्ष्मोद्धार आगतम् |
आत्मानं जयिन॑ मेने तद्वीर्य भूर्यनुस्मरन् ॥
६॥
यम्--जिसको; विनिर्जित्य--जीतकर; कृच्छेण--कठिनाई से; विष्णु;--वराह अवतार में भगवान् विष्णु ने; क्ष्मा-उद्धारे--पृथ्वी के उद्धार के समय; आगतम्--उनके समक्ष प्रकट हुआ; आत्मानम्--स्वयं; जयिनम्--विजयी; मेने--विचार किया; ततू-वीर्यमू-हिरण्याक्ष का पराक्रम; भूरि--निरन्तर, या अधिकाधिक; अनुस्मरन्--चिन्तन करते हुए |
गर्भोदक सागर से पृथ्वी का उद्धार करते समय भगवान् विष्णु ने वराह अवतार में हिरण्याक्षका वध किया जो उनके समक्ष प्रकट हो गया था |
तब घमासान युद्ध हुआ और भगवान् ने उसेबड़ी कठिनाई से मारा |
बाद में जब भगवान् ने हिरण्याक्ष के असाधारण पराक्रम के विषय मेंविचार किया, तो उन्होंने अपने को सचमुच विजयी अनुभव किया |
निशम्य तद्वधं भ्राता हिरण्यकशिपु: पुरा |
हन्तुं भ्रातृहणं क्रुद्धो जगाम निलयं हरे: ॥
७॥
निशम्य--सुनकर; तत्-वधम्--हिरण्याक्ष के वध को; भ्राता-- भाई; हिरण्यकशिपु:--हिरण्यकशिपु; पुरा--बहुत पहले;हन्तुमू--मारने के लिए; भ्रातृ-हणम्-- अपने भाई के हत्यारे को; क्रुद्ध:--अत्यन्त क्रोधित; जगाम--गया; निलयमू--धाम में;हरेः--भगवान् के
जब हिरण्यकशिपु ने सुना कि उसके भाई का वध कर दिया गया है, तो वह अत्यन्त क्रुद्धहोकर अपने भाई के हत्यारे विष्णु को मारने उनके धाम गया |
तमायान्तं समालोक्य शूलपाणिं कृतान्तवत् |
चिन्तयामास कालनज्ञो विष्णुर्मायाविनां वर: ॥
८॥
तम्--उसको ( हिरण्यकशिपु को ); आयान्तमू--आगे आते हुए; समालोक्य--बारीकी से देखकर; शूल-पाणिम्--अपने हाथमें त्रिशूल लेकर; कृतान्त-वत्--साक्षात् काल के समान; चिन्तयाम् आस--सोचा; काल-ज्ञ:--काल की गति को जानने वाले;विष्णु: --विष्णु ने; मायाविनाम्--सभी प्रकार के मायावियों के; वर:--प्रमुख, मुखिया |
हिरण्यकशिपु को हाथ में त्रिशूल लिए साक्षात् काल की भाँति आगे बढ़ते देखकर समस्तमायावियों में श्रेष्ठ तथा काल की गति को जानने वाले भगवान् विष्णु ने इस प्रकार सोचा |
यतो यतोऊहं तत्रासौ मृत्यु: प्राणभूतामिव |
अतोहमस्य हृदयं प्रवेक्ष्यामि पराग्हशः: ॥
९॥
यतः यतः--जहाँ-जहाँ, जहाँ कहीं भी; अहम्--मैं; तत्र--वहीं; असौ--यह हिरण्यकशिपु; मृत्यु: --मृत्यु; प्राण-भूताम्--समस्त जीवों के; इब--सहृश; अतः--इसलिए; अहम्--मैं; अस्य--उसके; हृदयम्-- अन्तःस्थल में ; प्रवेक्ष्यामि-- प्रवेशकरूँगा; पराक्-हृशः--ऐसे व्यक्ति का जिसको केवल बाह्य दृष्टि प्राप्त है|
जहाँ कहीं भी मैं जाऊँगा, हिरण्यकशिपु मेरा पीछा करेगा जिस तरह मृत्यु सभी जीवों कापीछा करती है |
अतएव मेरे लिए यही श्रेयस्कर होगा कि इसके अन्तःस्थल में प्रवेश कर जाऊँ |
तब यह अपनी केवल बहिर्मुखी दृष्टि की शक्ति के कारण मुझे नहीं देख सकेगा |
एवं स निश्चित्य रिपो: शरीर-माधावतो निर्विविशेड्सुरेन्द्रश्वासानिलान्तर्हितसूक्ष्मदेह-स्तत्प्राणरन्श्रेण विविग्नचेता: ॥
१०॥
एवम्--इस तरह से; सः--वह ( भगवान् विष्णु ); निश्चित्य--निर्णय करके; रिपो:--शत्रु के; शरीरम्--शरीर में; आधावत: --जो तेजी से भगवान् के पीछे-पीछे दौड़ रहा था; निर्विविशे--घुस गया; असुर-इन्द्र--हे असुर राजा ( महाराज बलि ); ध्वास-अनिल--साँस के साथ; अन्तर्हित-- अदृश्य; सूक्ष्म-देह:ः --अपने सूक्ष्म शरीर में; ततू-प्राण-रन्श्रेण--उसके नथुने के छिद्र सेहोकर; विविग्न-चेता: --अत्यन्त उत्सुक होकर |
भगवान् वामनदेव ने आगे कहा : हे असुर राजा! इस निर्णय के बाद भगवान् अपने पीछेतेजी से दौते अपने शत्रु हिरण्यकशिपु के शरीर में प्रवेश कर गये |
सूक्ष्म शरीर जिसकीहिरण्यकशिपु कल्पना भी न कर सकता था, धारण करके चिन्तामग्न भगवान् विष्णु उसकीश्वास के साथ उसके नथुने में प्रविष्ट हो गए |
स ततन्निकेतं परिमृश्य शून्य-मपश्यमान: कुपितो ननाद |
क्ष्मां द्यां दिशः खं विवरान्समुद्रान्विष्णुं विचिन्वन्न ददर्श वीर: ॥
११॥
सः--उस हिरण्यकशिपु ने; तत्-निकेतम्-- भगवान् विष्णु के निवास को; परिमृश्य--दूँढकर; शून्यम्--रिक्त; अपश्यमान: --विष्णु को न देखकर; कुपित:ः--अत्यन्त क्रुद्ध होकर; ननाद--जोर से गर्जना की; क्ष्मामू--पृथ्वी पर; द्यामू--बाह्य आकाश में;दिशः--सभी दिशाओं में; खम्--आकाश में; विवरान्ू--सारी गुफाओं में; समुद्रान्--सारे समुद्रों में; विष्णुम्--विष्णु को;विचिन्वन्--ढूँढते हुए; न--नहीं; ददर्श--देखा; वीर:--यद्यपि वह अत्यन्त शक्तिशाली था |
भगवान् विष्णु के निवासस्थान को रिक्त देखकर हिरण्यकशिपु ने सर्वत्र उन की खोजकरनी शुरू की |
उन्हें न पाने के कारण क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने जोर से गर्जना की औरफिर सारे ब्रह्माण्ड, पृथ्वी, स्वर्गलोक, सारी दिशाओं तथा सारी गुफाओं एवं समुद्रों में उन्हेंखोजना शुरू किया |
किन्तु महान् वीर विष्णु को कहीं नहीं देख पाया |
अपश्यन्निति होवाच मयान्विष्टमिंदं जगत् |
भ्रातृहा मे गतो नूनं यतो नावर्तते पुमान् ॥
१२॥
अपश्यन्--उन्हें न देखकर; इति--इस प्रकार; ह उबाच--बोला; मया--मेरे द्वारा; अन्विष्टम्--खोजा गया; इदम्--यह सम्पूर्ण;जगत्--ब्रह्माण्ड; भ्रातृ-हा-- भाई का वध करने वाला विष्णु; मे--मेरे; गतः--चला गया होगा; नूनम्--निश्चय ही; यतः --जहाँ से; न--नहीं; आवर्तते--वापस आ सकता है; पुमान्--कोई मनुष्य |
उन्हें न देखकर हिरण्यकशिपु ने कहा : मैंने सारा ब्रह्माण्ड छान मारा, किन्तु अपने भाई केहत्यारे विष्णु को मैं कहीं नहीं पा सका |
अतएव वह अवश्य ही ऐसी जगह चला गया होगा जहाँसे कोई भी लौट नहीं सकता ( अर्थात् वह अब मर गया होगा ) |
वैरानुबन्ध एतावानामृत्योरिह देहिनाम् |
अज्ञानप्रभवो मन्युरहंमानोपबृंहित: ॥
१३॥
वैर-अनुबन्ध:--शत्रुभाव, शत्रुता; एतावान्ू--इतनी अधिक; आमृत्यो:--मृत्यु पर्यन्त; इह--इस; देहिनाम्--देहात्मबुद्धि मेंलिप्त पुरुषों का; अज्ञान-प्रभव:--अज्ञान के महान् प्रभाव वश; मन्यु:--क्रोध; अहम्ू-मान--अहंकार से; उपबूंहित:--बढ़ाहुआ
भगवान् विष्णु के प्रति हिरण्यकशिपु का क्रोध उसकी मृत्यु तक बना रहा |
देहात्मबुद्धिवाले अन्य लोग केवल मिथ्या अहंकार तथा अज्ञान के प्रबल प्रभाव के कारण क्रोध बनायेरखते हैं |
पिता प्रह्मादपुत्रस्ते तद्विद्वान्द्रिजवत्सल: |
स्वमायुद्विजलिड्रेभ्यो देवेभ्योदात्स याचित: ॥
१४॥
पिता--पिता; प्रह्माद-पुत्र:--महाराज प्रह्लाद का पुत्र; ते--तुम्हारा; तत्-विद्वानू--यद्यपि यह उसे ज्ञात था; द्विज-वत्सलः--फिरभी ब्राह्मणों के प्रति प्रेम होने से; स्वम्ू--अपनी; आयु:--उम्र; द्विज-लिड्रेभ्य:--जो ब्राह्मणों के वेश में थे; देवेभ्य:--देवताओंको; अदात्ू--दे दिया; सः--उसने; याचित:ः--माँगे जाने पर |
तुम्हारे पिता विरोचन, जो महाराज प्रह्लाद के पुत्र थे, ब्राह्मणों के प्रति अत्यन्त स्नेहिल थे |
यद्यपि वे भलीभान्ति जानते थे कि ब्राह्मणों का वेश धारण करके देवतागण उनके समक्ष आयेथे, किन्तु उनके मांगने पर उन्होंने उन्हें अपनी आयु दे डाली |
भवानाचरितान्धर्मानास्थितो गृहमेधिभिः |
ब्राह्मणै: पूर्वजै: शूरैरन्यैश्वोद्यामकीर्तिभि: ॥
१५॥
भवान्--आपने; आचरितान्--सम्पन्न किया; धर्मान्ू--धार्मिक सिद्धान्तों को; आस्थित:--स्थित होकर; गृहमेधिभि: --गृहस्थोंके द्वारा; ब्राह्मणैः ब्राह्मणों के द्वारा; पूर्व-जैः--अपने पुरखों के द्वारा; शूरै:--वीरों केद्वारा; अन्यै: च--तथा अन्यों के द्वाराभी; उद्दाम-कीर्तिभि: --अत्यन्त उच्च तथा प्रसिद्ध |
तुमने भी गृहस्थ ब्राह्मणों, अपने पुरखों तथा महान् कार्यों के लिए सुविख्यात शूरवीरों जैसेमहान् पुरुषों के सिद्धान्तों का पालन किया है |
तस्मात्त्वत्तो महीमीषद्गुणेहं वरदर्षभात् |
पदानि त्रीणि दैत्येन्द्र सम्मितानि पदा मम ॥
१६॥
तस्मात्--ऐसे व्यक्ति से; त्वत्त:--आपसे; महीम्--पृथ्वी; ईषत्-- थोड़ी सी; वृणे--माँग रहा हूँ; अहम्--मैं; वरद-ऋषभात् --मुक्तहस्त दान देने वाले व्यक्ति से; पदानि--पग; त्रीणि--तीन; दैत्य-इन्द्र--हे दैत्यराज; सम्मितानि--माप के बराबर; पदा--पाँव के द्वारा; मम--मेरे |
हे दैत्ययाज! ऐसे कुलीन एवं मुक्तहस्त दान देने वाले आपसे मैं अपने पैरों से मापकर केवलतीन पग भूमि की याचना करता हूँ |
नान्यत्ते कामये राजन्वदान्याज्जगदी श्वरात् |
नैनः प्राप्नोति बे विद्वान्यावदर्थप्रतिग्रहः ॥
१७॥
न--नहीं; अन्यत्--अन्य कुछ; ते--तुमसे; कामये--याचना करता हूँ; राजनू--हे राजा; वदान्यात्--जो इतने दानी हैं; जगत्-ईश्वरात्--सारे ब्रह्माण्ड के राजा से; न--नहीं; एन:--दुख; प्राप्पोति--प्राप्त करता है; वै--निस्सन्देह; विद्वानू--विद्वान;यावत्ू-अर्थ--जिसे जितना चाहिए; प्रतिग्रह:--अन्यों से दान लेना |
हे समग्र ब्रह्माण्ड के नियामक राजा! यद्यपि आप अत्यन्त उदार हैं और जितनी भूमि चाहूँमुझे दे सकते हैं, किन्तु मैं आपसे अनावश्यक वस्तु नहीं माँगना चाहता |
यदि कोई विद्वानब्राह्मण अन्यों से अपनी आवश्यकतानुसार दान लेता है, तो वह पापपूर्ण कर्मों में नहीं फँसता |
श्रीबलिरुवाचअहो ब्राह्मणदायाद वाच्स्ते वृद्धसम्मता: |
त्वं बालो बालिशमतिः स्वार्थ प्रत्यबुधो यथा ॥
१८॥
श्री-बलि: उबाच--बलि महाराज ने कहा; अहो--आह; ब्राह्मण-दायाद--ब्राह्मण पुत्र; वाच:--वचन; ते--तुम्हारे; वृद्ध-सम्मता:--विद्वानों तथा गुरुजनों को मान्य हैं; त्वम्--तुम; बाल:--बालक; बालिश-मतिः--पर्याप्तज्ञान के बिना; स्व-अर्थम्--स्वार्थ या हित; प्रति--के प्रति; अबुध:--ठीक से न जानते हुए; यथा--मानो |
बलि महाराज ने कहा : हे ब्राह्मण पुत्र! तुम्हारे उपदेश विद्वान तथा वयोवृद्ध पुरुषों जैसे हैं |
तो भी अभी तुम बालक हो और तुम्हारी बुद्धि अल्प है |
अतएव तुम्हें अपने हित का पूरी तरहज्ञान नहीं है |
मां वचोभि: समाराध्य लोकानामेकमी श्वरम् |
पदत्रयं वृणीते यो<बुद्धिमान्द्रीपदाशुषम् ॥
१९॥
माम्--मुझको; वचोभि: --मधुर वचनों से; समाराध्य--पर्याप्त तुष्ट करके; लोकानाम्--इस ब्रह्माण्ड के सारे लोकों का;एकम्--एकमात्र; ईश्वरम्--स्वामी, नियन्ता; पद-त्रयम्ू--तीन पग; वृणीते--माँग रहा है; यः--जो; अबुद्द्धिमानू-- मूर्ख; द्वीप-दाशुषम्-क्योंकि मैं तुम्हें समूचा द्वीप दे सकता हूँ |
मैं तुम्हें समूचा द्वीप दे सकता हूँ क्योंकि मैं ब्रह्माण्ड के तीनों विभागों का स्वामी हूँ |
तुममुझसे कुछ लेने आये हो और तुमने मुझे अपने मधुर बचनों से सन्तुष्ट किया है, किन्तु तुम केवलतीन पग भूमि माँग रहे हो अतएव तुम मुझे अधिक बुद्ध्धिमान् नहीं लगते हो |
न पुमान्मामुपब्रज्य भूयो याचितुमईति |
तस्माद्वत्तिकरीं भूमिं वटो काम॑ प्रतीच्छ मे ॥
२०॥
न--नहीं; पुमानू--कोई व्यक्ति; माम्--मेरे पास; उपब्रज्य--पास आकर; भूयः--पुनः; याचितुम्--माँगने के लिए; अर्हति--योग्य होता है; तस्मात्--इसलिए; वृत्ति-करीम्--अपना पालन करने के लिए उपयुक्त; भूमिमू-- भूमि को; बटो--हे लघुब्रह्मचारी; कामम्--जीवन की आवश्यकता के अनुसार; प्रतीच्छ--ले लो; मे--मुझसे |
हे बालक! जो एक बार कुछ माँगने के लिए मेरे पास आता है उसे अन्यत्र कुछ भी माँगनेकी आवश्यकता नहीं रहनी चाहिए |
अतएवं, चाहो तो तुम मुझसे उतनी भूमि माँग सकते होजितने से तुम्हारी जीवन-यापन संबंधी आवश्यकता पूरी हो सके |
श्रीभगवानुवाचयावन्तो विषया:ः प्रेष्ठास्त्रिलोक्यामजितेन्द्रियम् |
न शब्नुवन्ति ते सर्वे प्रतिपूरयितुं नूप ॥
२१॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; यावन्त:--यथासम्भव; विषया: --इन्द्रिय भोग के विषय; प्रेष्ठाः--हर एक के लिएसुहावना; त्रि-लोक्याम्--तीनों लोकों में; अजित-इन्द्रियम्ू--जिसकी इन्द्रियाँ वश में न हों; न शक््नुवन्ति-- असमर्थ हैं; ते--वे;सर्वे--सभी मिलाकर; प्रतिपूरयितुम्--सन्तुष्ट करने के लिए; नूप--हे राजा
भगवान् ने कहा: हे राजा! जिस मनुष्य की इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं उसे तीनों लोकों मेंइन्द्रियों को तृप्त करने के लिए जो कुछ भी है संतुष्ट नहीं कर सकता |
त्रिभिः क्रमैरसन्तुष्टो द्वीपेनापि न पूर्यते |
नववर्षसमेतेन सप्तद्वीपवरेच्छया ॥
२२॥
त्रिभिः--तीन; क्रमैः--क्रमवार; असन्तुष्ट:--असन्तुष्ट; द्वीपेन--द्वीप से; अपि--यद्यपि; न पूर्यते--सन्तुष्ट नहीं होता; नव-वर्ष-समेतेन--नौ वर्षो को प्राप्त करके भी; सप्त-द्वीप-वर-इच्छया--सातों द्वीपों पर अधिकार पाने की इच्छा |
यदि मैं तीन पग भूमि से सन्तुष्ट न होऊँ तब तो यह निश्चित है कि नौ वर्षो से युक्त सातों द्वीपोंमें से एक द्वीप पाकर भी मैं सन्तुष्ट नहीं हो सकूँगा |
यदि मुझे एक द्वीप भी मिल जाये तो मैं अन्यद्वीपों को पाने की आशा करूँगा |
सप्तद्वीपाधिपतयो नृपा वैण्यगयादय: |
अर्थे: कामैर्गता नान्तं तृष्णाया इति नः श्रुतम् ॥
२३॥
सप्त-द्वीप-अधिपतय:--सात द्वीपों के मालिक; नृपाः--राजा; वैण्य-गय-आदय:--महाराज पृथु, महाराज गय तथा अन्य;अर्थे:--उद्देश्यपूर्ति के लिए; कामैः--अपनी इच्छाओं की तुष्टि हेतु; गता: न--नहीं पहुँच सके; अन्तम्--अन्त तक; तृष्णाया:--अपनी इच्छाओं के; इति--इस प्रकार; नः--हमारे द्वारा; श्रुतम्--सुना गया |
हमने सुना है कि यद्यपि महाराज पृथु तथा महाराज गय जैसे शक्तिशाली राजाओं ने सातोंद्वीपों पर स्वामित्व प्राप्त कर लिया था, किन्तु फिर भी उन्हें न तो सन्तोष प्राप्त हुआ न ही वेअपनी आकांक्षाओं का कोई अन्त पा सके |
यहच्छयोपपन्नेन सन्तुष्टो वर्तते सुखम् |
नासन्तुष्टस्त्रभिलेकिरजितात्मोपसादितै: ॥
२४॥
यहच्छया--अपने कर्म के अनुसार परम सत्ता द्वारा जो कुछ प्रदत्त है; उपपन्नेन--जो कुछ मिला है उससे; सन्तुष्ट:--मनुष्य कोसन््तुष्ट होना चाहिए; वर्तते--है; सुखम्--सुख; न--नहीं; असन्तुष्ट:ः --असन्तुष्ट के लिए; त्रिभि: लोकैः--तीनों लोकों को पालने पर; अजित-आत्मा--जो अपनी इन्द्रियों को वश में नहीं कर सकता; उपसादितैः -- भले ही प्राप्त क्यों न कर ले |
मनुष्य को अपने प्रारब्ध से जो कुछ मिलता है उससे सन्तुष्ट रहना चाहिए क्योंकि असन्तोष पुंसोयं संसूतेहतुरसन्तोषो रथ कामयो: |
यहच्छयोपपत्नेन सन्तोषो मुक्तये स्मृत: ॥
२५॥
पुंस:--जीव का; अयम्--यह; संसृतेः--संसार में आवागमन का; हेतु:--कारण; असन्तोष: -- भाग्य में लिखे फल सेअसंतोष; अर्थ-कामयो: --काम तथा अर्थ के लिए; यहच्छया--प्रारब्ध से; उपपन्नेन--प्राप्त हुआ; सनन््तोष:--सन्तोष; मुक्तये--मुक्ति के लिए; स्मृत:ः--उपयुक्त माना जाता है |
भौतिक जीवन कामेच्छा की पूर्ति एवं अधिक धन पाने की इच्छा में असन्तोष उत्पन्न करताहै |
बारम्बार जन्म तथा मृत्यु से पूर्ण भौतिक जीवन के बने रहने का यही कारण है |
किन्तु प्रारब्धसे जो कुछ प्राप्त होता है उसी से सन्तुष्ट रहने वाला मनुष्य इस भौतिक जगत से मुक्ति पाने केयोग्य है |
यहच्छालाभतुष्टस्य तेजो विप्रस्य वर्धते |
तत्प्रशाम्यत्यसन्तोषादम्भसेवाशुशुक्षणि: ॥
२६॥
यहच्छा-लाभ-तुष्टस्थ-- भगवान् की कृपा से जो कुछ प्राप्त हो जाये उसी से सन्तुष्ट; तेज:--तेज; विप्रस्थ--ब्राह्मण का;वर्धते--बढ़ जाता है; तत्ू--वह ( तेज ); प्रशाम्यति--कम हो जाता है; असन्तोषात्--असन्तोष के कारण; अम्भसा--जलडालने से; इब--मानो; आशुशुक्षणि: --अग्नि
जो ब्राह्मण प्रारब्ध से जो कुछ भी प्राप्त होता है उसी से सन्तुष्ट रहता है, वह आध्यात्मिकशक्ति में निरन्तर बढ़ते जाकर प्रबुद्ध होता रहता है, किन्तु असन्तुष्ट ब्राह्मण की आध्यात्मिकशक्ति उसी तरह क्षीण होती जाती है, जिस प्रकार पानी छिड़कने से अग्नि की ज्वलनशक्ति घटतीहै |
तस्मात्त्रीणि पदान्येव वृणे त्वद्वरदर्षभात् |
एतावतैव सिद्धोहं वित्त यावत्प्रयोजनम् ॥
२७॥
तस्मात्ू--आसानी से मिली हुईं वस्तुओं से सन्तुष्ट होने के कारण; त्रीणि---तीन; पदानि--पग; एव--निस्सन्देह; वृणे--मैंयाचना करता हूँ; त्वत्--आपसे; वरद-ऋषभात् --मुक्तहस्त दान करने वाले से; एतावता एव--इतने ही से; सिद्ध: अहम्--मैंपूर्ण सन््तोष अनुभव करूँगा; वित्तम्ू--उपलब्धि; यावत्--जहाँ तक; प्रयोजनम्--आवश्यक है |
अतएव हे राजा! दानियों में सर्वश्रेष्ठ आपसे मैं केवल तीन पग भूमि माँग रहा हूँ |
इस दान सेमैं अत्यधिक प्रसन्न हो जाऊँगा क्योंकि सुखी होने की विधि यही है कि जो नितान्त आवश्यक होउसे पाकर पूर्ण सन्तुष्ट हो लिया जाये |
श्रीशुक उबाचइत्युक्त: स हसन्नाह वाउ्छात: प्रतिगृह्मताम् ॥
वामनाय महीं दातुं जग्राह जलभाजनम् ॥
२८ ॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति उक्त:--इस प्रकार कहे जाने पर; सः--उसने ( बलि महाराज ने );हसन्--हँसते हुए; आह--कहा; वाज्छात:--जैसी तुमने इच्छा की है; प्रतिगृह्मयताम्-- अब मुझसे ले लो; वामनाय--वामनभगवान् को; महीम्-- भूमि; दातुम्-देने के लिए; जग्राह--लिया; जल-भाजनम्--जलपात्र
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : जब बलि महाराज से भगवान् इस प्रकार बोले तो बलिहँस पड़े और उन्होंने कहा '‘बहुत अच्छा |
अब जो इच्छा हो प्राप्त करो |
वामनदेव को इच्छितभूमि देने के अपने वचन की पुष्टि करने के लिए उन्होंने अपना जलपात्र उठाया |
विष्णवे क्ष्मां प्रदास्यन्तमुशना असुरे श्वरम् |
जानंश्रिकीर्षितं विष्णो: शिष्यं प्राह विदां वर: ॥
२९॥
विष्णवे-- भगवान् विष्णु ( वामनदेव ) को; क्ष्मामू-- भूमि; प्रदास्यन्तम्--देने के लिए उद्यत; उशना:--शुक्राचार्य ने; असुर-ईश्वरम्--असुरों के राजा ( बलि महाराज ) को; जानन्-- भलीभाँति जानते हुए; चिकीर्षितम्--जो योजना थी; विष्णो: --भगवान् विष्णु की; शिष्यम्--अपने शिष्य से; प्राह--कहा; विदाम् वर: --हर बात को जानने वालों में श्रेष्ठ |
भगवान् विष्णु के प्रयोजन को जानते हुए दिद्वानों में श्रेष्ठ शुक्राचार्य ने तुरन्त ही अपने शिष्यबलि से, जो भगवान् वामनदेव को सब कुछ देने जा रहे थे, इस प्रकार कहा |
श्रीशुक्र उवाचएष वैरोचने साक्षाद्धगवान्विष्णुरव्ययः |
कश्यपाददितेरजातो देवानां कार्यसाधकः ॥
३०॥
श्री-शुक्र: उवाच--शुक्राचार्य ने कहा; एष:--यह ( वामन रूप बालक ); बैरोचने--हे विरोचनपुत्र; साक्षात्- प्रत्यक्ष;भगवान्-- भगवान्; विष्णु: --विष्णु; अव्यय:--अव्यय; कश्यपात्-- अपने पिता कश्यप से; अदिते:--अपनी माता अदिति केगर्भ से; जातः--उत्पन्न; देवानामू--देवताओं का; कार्य-साधक:--हित में काम करने वाला
शुक्राचार्य ने कहा : हे विरोचनपुत्र! यह वामन रूपधारी ब्रह्मचारी साक्षात् अव्यय भगवान्विष्णु है |
यह कश्यप मुनि को अपना पिता और अदिति को अपनी माता स्वीकार करकेदेवताओं का हित साधने के लिए प्रकट हुआ है |
प्रतिश्रुतं त्वयैतस्मै यदनर्थमजानता |
न साधु मन्ये दैत्यानां महानुपगतोनय: ॥
३१॥
प्रतिश्रुतम्--वचन दिया गया; त्वया--तुम्हारे द्वारा; एतस्मै--उसको; यत् अनर्थम्--जो अहित होना है; अजानता--न जाननेवाले तुम्हारे द्वारा; न--नहीं; साधु--उत्तम; मन्ये--मैं सोचता हूँ; दैत्यानामू--असुरों का; महान्--महान्; उपगत:--प्राप्त कियाहुआ; अनय:--अशुभ कार्य, अन्याय
तुम यह नहीं जान पा रहे कि इन्हें भूमि देने का वचन देकर तुमने कैसी घातक स्थितिअंगीकार कर ली है |
मेरी समझ में यह वचन ( प्रतिज्ञा ) तुम्हारे लिए उत्तम नहीं है |
इससे असुरोंको महान् क्षति होगी |
एष ते स्थानमैश्वर्य श्रियं तेजो यश: श्रुतम् |
दास्यत्याच्छिद्य शक्राय मायामाणवको हरि; ॥
३२॥
एष:--यह व्यक्ति जो ब्रह्मचारी लग रहा है; ते--तुम्हारी; स्थानम्-- अधिकृत भूमि; ऐ श्वर्यम्-- धन-धान्य; अ्रियम्-- भौतिकसौन्दर्य; तेज:--भौतिक शक्ति; यश: --कीर्ति, ख्याति; श्रुतम्--शिक्षा; दास्यति--देगा; आच्छिद्य--तुमसे लेकर; शक्राय--तुम्हारे शत्रु इन्द्र को; माया--नकली; माणवक:--मनुष्य का ब्रह्मचारी पुत्र; हरिः--वास्तव में भगवान् हरि है |
यह व्यक्ति जो ऊपर से ब्रह्मचारी लग रहा है वास्तव में भगवान् हरि है, जो तुम्हारी सारीभूमि, सम्पत्ति, सौन्दर्य, शक्ति, यश तथा शिक्षा लेने के लिए इस रूप में आया है |
यह तुम्हारासर्वस्व छीनकर तुम्हारे शत्रु इन्द्र को दे देगा |
त्रिभि: क्रमैरिमाल्लोकान्विश्वकाय: क्रमिष्यति |
सर्वस्वं विष्णवे दत्त्वा मूढ वर्तिष्यसे कथम् ॥
३३॥
त्रिभिः--तीन; क्रमैः--पगों द्वारा; इमानू--इन सभी; लोकान्--तीनों लोकों को; विश्व-काय:--विश्व रूप धारण करके;क्रमिष्यति--वे क्रमशः विस्तार करेंगे; सर्वस्वम्--सब कुछ; विष्णवे-- भगवान् विष्णु को; दत्त्वा--दान देकर; मूढ-हे मूर्ख;वर्तिष्यसे--तुम जीविका चलाओगे; कथम्--कैसे |
तुमने उन्हें दान में तीन पग भूमि देने का वचन दिया है, किन्तु जब तुम देने इसे दे दोगे तो वेतीनों लोकों में अधिकार जमा लेंगे |
तुम निपट मूर्ख हो |
तुम नहीं जानते कि तुमने कितनी बड़ीभूल की है |
भगवान् विष्णु को सर्वस्व दान देने पर तुम्हारे पास जीविका का कोई साधन नहींरहेगा |
तब तुम कैसे जिओगे ?क्रमतो गां पदैकेन द्वितीयेन दिवं विभो: |
खं च कायेन महता तार्तीयस्य कुतो गति: ॥
३४॥
क्रमतः--क्रमशः; गाम्-- भूमि; पदा एकेन--एक पग से; द्वितीयेन--दूसरे पग से; दिवम्ू--सारा बाह्य आकाश; विभो: --विश्वरूप का; खम् च--आकाश भी; कायेन--उनके दिव्य शरीर के विस्तार से; महता--विश्वरूप से; तार्तीयस्थ--जहाँ तकतीसरे पग की बात है; कुत:--कहाँ है; गतिः--पग रखने के लिए
सर्वप्रथम वामनदेव एक पग से तीनों लोकों को घेर लेंगे, तत्पश्चात् वे दूसरा पग भरेंगे औरबाह्य आकाश की प्रत्येक वस्तु को ले लेंगे और तब वे अपने विश्वरूप का विस्तार करके सर्वस्वपर अधिकार जमा लेंगे |
तब तुम उन्हें तीसरा पग रखने के लिए कहाँ स्थान दोगे ? निष्ठां ते नरके मन्ये ह्यप्रदातुः प्रतिश्रुतम् |
प्रतिश्रुतस्थ योउनीश: प्रतिपादयितुं भवान् ॥
३५॥
निष्ठामू-शाश्वत निवास स्थान; ते--तुम्हारा; नरके--नरक में; मन्ये--सोचता हूँ; हि--निस्सन्देह; अप्रदातु:--वचन पूरा न करसकने वाले पुरुष का; प्रतिश्रुम्--जिसको वचन दिया गया हो; प्रतिश्रुतस्थ--किसी के द्वारा दिये गये वचन का; यःअनीश:--अशक्त; प्रतिपादयितुम्--पूरी तरह पूर्ण करने में; भवान्--आप |
तुम निश्चित रूप से अपना वचन पूरा करने में असमर्थ होगे और मैं सोचता हूँ कि अपनी इसअसमर्थता के कारण तुम्हें नरक में शाश्रत निवास करना पड़ेगा |
न तह्दानं प्रशंसन्ति येन वृत्तिर्विपद्यते |
दान॑ यज्ञस्तपः कर्म लोके वृत्तिमतो यत: ॥
३६॥
न--नहीं; तत्--उस; दानम्--दान की; प्रशंसन्ति--सन्तजन प्रशंसा करते हैं; येन--जिससे; वृत्तिः--जीविका; विपद्यते--संकट में पड़ जाये; दानम्--दान; यज्ञ:--यज्ञ; तप:--तपस्या; कर्म--सकाम कर्म; लोके --इस संसार में; वृत्तिमतः--अपनीजीविका के अनुसार; यत:--जैसाकि है |
विद्वान व्यक्ति उस दान की प्रशंसा नहीं करते जिससे किसी की अपनी जीविका खतरे में पड़जाये |
दान, यज्ञ, तप तथा सकाम कर्म वही कर सकता है, जो अपनी जीविका कमाने में पूर्णसक्षम हो ( जो अपना भरण-पोषण न कर सके उसके लिए ये कार्य असम्भव हैं ) |
धर्माय यशसे<र्थाय कामाय स्वजनाय च |
पञ्ञधा विभजन्वित्तमिहामुत्र च मोदते ॥
३७॥
धर्माय--धर्म के लिए; यशसे--अपने यश के लिए; अर्थाय--अपना ऐश्वर्य बढ़ाने के लिए; कामाय--इन्द्रियतृप्ति के हेतु; स्व-जनाय च--तथा कुट॒म्बीजनों के पालन पोषण के लिए; पञ्ञधा--इन पाँच भिन्न-भिन्न लक्ष्यों के लिए; विभजनू्--बाँटते हुए;वित्तमू--अपने संचित धन को; इह--इस संसार में; अमुत्र--अगले संसार में; च--तथा; मोदते-- भोग करता है |
अतएव जो ज्ञानी है उसे चाहिए कि अपने संचित धन को पाँच भागों में विभाजित कर दे--धर्म के लिए, यश के लिए, ऐश्वर्य के लिए, इन्द्रियतृप्ति के लिए तथा कुट॒ुम्बी-जनों के भरण-पोषण के लिए |
ऐसा व्यक्ति इस लोक में तथा परलोक में भी सुखी रहता है |
अत्रापि बहृचैर्गातं श्रुणु मेउसुरसत्तम |
सत्यमोमिति यत्प्रोक्त यन्नेत्याहानृतं हि ततू ॥
३८ ॥
अतन्र अपि--इस सम्बन्ध में भी ( सत्य क्या है, क्या नहीं ); बहु-ऋचै:-- श्रुति मंत्रों के द्वारा जो बह्नच श्रुति कहलाते हैं और वेदोंका साक्ष्य हैं; गीतम्--गाया हुआ; श्रुणु--सुनो; मे-- मुझसे; असुर-सत्तम--हे असुरश्रेष्ठ; सत्यम्--सत्य है; ओम् इति--» सेआरम्भ होने वाला; यत्--जो; प्रोक्तमू--कहा हुआ; यत्--जो; न--» से आरम्भ नहीं होता; इति--इस प्रकार; आह--कहाजाता है; अनृतम्--असत्य; हि--निस्सन्देह; तत्ू--वह |
कोई यह तर्क कर सकता है कि चूँकि तुमने पहले ही वचन दे दिया है अतएवं अब कैसेमना कर सकते हो ? हे असुरश्रेष्ठ! तुम मुझसे बह्नच-श्रुति का साक्ष्य ले सकते हो जो यह कहतीहै कि वह वचन सत्य है, जिसके आरम्भ में ३४ हो; वह असत्य है, जो ३४ से आरम्भ न हो |
सत्य॑ पुष्पफलं विद्यादात्मवृक्षस्थ गीयते |
वृक्षेउजीवति तन्न स्थादनृतं मूलमात्मन: ॥
३९॥
सत्यम्--वास्तविक सत्य; पुष्प-फलम्--फूल तथा फल; विद्यातू-समझा जाना चाहिए; आत्म-वृक्षस्थ--शरीर रूपी वृक्ष के;गीयते--जैसा वेदों में वर्णित है; वृक्षे अजीवति--यदि वृक्ष ही न जीवित रहे; तत्--वह ( पुष्पफलम् ); न--नहीं; स्थात्ू-हो;अनृतम्--झूठ; मूलम्--जड़; आत्मन:--शरीर की |
वेदों का आदेश है कि शरीर रूपी वृक्ष का वास्तविक परिणाम तो इस से मिलने वाले उत्तम'फल तथा फूल हैं |
किन्तु यदि यह शरीर रूपी वृक्ष ही न रहे तो फिर इन वास्तविक फल-फूलोंके होने की कोई सम्भावना नहीं है |
यहाँ तक कि यदि शरीर असत्य की नींव पर भी टिका होतो भी शरीर रूपी वृक्ष के बिना वास्तविक फल-फूल नहीं हो सकते |
तद्यथा वृक्ष उन्मूल: शुष्यत्युद्वर्ततेडचिरात् |
एवं नष्टानृत: सद्य आत्मा शुष्येन्न संशय: ॥
४०॥
तत्--अतएव; यथा--जिस प्रकार; वृक्ष:ः--वृक्ष; उन््मूल:--जड़ समेत उखाड़ने पर; शुष्यति--सूख जाता है; उद्दर्तते--गिरपड़ता है; अचिरातू--शीघ्र ही; एवम्--उसी तरह; नष्ट--नष्ट हुआ; अनृतः--यह नाशवान् शरीर; सद्यः--तुरन्त; आत्मा--शरीर;शुष्येत्--सूख जाता है; न--नहीं; संशयः--कोई सन्देह |
जड़ समेत उखाड़ने पर वृक्ष तुरन्त गिर जाता है और सूखने लगता है |
इसी प्रकार यदि कोईइस शरीर की परवाह नहीं करता, जो असत्य माना जाता है--अर्थात् यदि इस असत्य काउन्मूलन कर दिया जाये--तो यह शरीर निश्चय ही सूख जाता है |
पराग्रिक्तमपूर्ण वा अक्षर यत्तदोमिति |
यत्किझ्िदोमिति ब्रूयात्तेन रिच्येत वै पुमान् |
भिक्षवे सर्वम् कुर्वन्नालं कामेन चात्मने ॥
४१॥
पराक्--जो पृथक् करे; रिक्तमू--जो आसक्ति से मुक्त बनाये; अपूर्णम्--अपूर्ण, अधूरा; वा--अथवा; अक्षरम्--यह अक्षर;यत्--जो; तत्--वह; ओम्--ओछ्डार; इति--इस प्रकार कहा गया; यत्--जो; किश्ञित्--जो कुछ भी; ३७--ओड्डार; इति--इस प्रकार; ब्रूयातू--यदि तुम कहो; तेन--ऐसा कहने से; रिच्येत--मुक्त हो जाता है; बै--निस्सन्देह; पुमान्--मनुष्य;भिक्षवे--भिक्षुक को; सर्वम्--सारा; ३» कुर्वन्-- ३» शब्द का उच्चारण करते हुए दान देने से; न--नहीं; अलमू्--पर्याप्त;'कामेन--इन्द्रियतृप्ति के लिए; च-- भी; आत्मने--आत्म-साक्षात्कार के लिए
शब्द का उच्चारण ही मनुष्य के धनधान्य के वियोग का सूचक है |
दूसरे शब्दों में, ३४७का उच्चारण करने से मनुष्य धन के प्रति आसक्ति से छूट जाता है क्योंकि उसका धन उससे लेलिया जाता है |
किन्तु धनविहीन होना ठीक नहीं है क्योंकि ऐसी अवस्था में मनुष्य अपनीइच्छाओं को पूरा नहीं कर सकता |
दूसरे शब्दों में, ७ शब्द का उच्चारण करने से मनुष्य विपन्नहो जाता है |
विशेषतया जब कोई किसी दरिद्र व्यक्ति या भिक्षुक को दान देता है, तो उसकाआत्म-साक्षात्कार तथा उसकी इन्द्रियतृप्ति अधूरे रह जाते हैं |
अशेतत्पूर्णमभ्यात्मं यच्च नेत्यनृतं वच: |
सर्व नेत्यनृतं ब्रूयात्स दुष्कीर्ति: श्वसन्मृत: ॥
४२॥
अथ--अतएव; एतत्--यह; पूर्णम्--पूर्णतया; अभ्यात्मम्-- अपने आपको नितान््त निर्धन बताकर दूसरे की सहानुभूति माँगना;यत्--जो; च-- भी; न--नहीं; इति--इस प्रकार; अनृतम्--मिथ्या, झूठा; बचः--शब्द; सर्वम्--पूर्णतया; न--नहीं; इति--इस प्रकार; अनृतम्--असत्य; ब्रूयातू--बोले; सः--ऐसा व्यक्ति; दुष्कीर्ति:--अपयश; श्रसन्--साँस लेता हुआ या जीवित;मृतः--मृत है या मार डाला जाये |
अतएबव सुरक्षित उपाय है कि 'नहीं' कह दिया जाये |
यद्यपि यह असत्य है, किन्तु इससे पूरीरक्षा हो जाती है, इससे अपने प्रति दूसरों की सहानुभूति भी मिलती है और अपने लिए अन्यों सेधन एकत्र करने में पूरी सुविधा मिलती है |
फिर भी यदि कोई सदा यही कहे कि उसके पासकुछ नहीं है, तो उसकी निनन््दा होती है क्योंकि वह जीवित रहकर भी मृत है या उसे जीवित हीमार डालना चाहिए |
स्त्रीषु नर्मविवाहे च वृत्त्यर्थे प्राणसड्डूटे |
गोब्राह्मणार्थ हिंसायां नानृतं स्थाज्जुगुप्सितम् ॥
४३॥
स्त्रीषु--स्त्री को प्रोत्साहित करके उसे अपने वश में करने के लिए; नर्म-विवाहे--हँसी में या विवाह में; च-- भी; वृत्ति-अर्थे--अपनी जीविका कमाने के लिए; प्राण-सड्भूटे--अथवा संकट आने पर; गो-ब्राह्मण-अर्थै--गोरक्षा तथा ब्राह्मण संस्कृति केलिए; हिंसायाम्ू--शत्रुता के कारण हत्या किये जाने वाले व्यक्ति के लिए; न--नहीं; अनृतम्--असत्य; स्यात्--होता है;जुगुप्सितम्-गर्हित
अपने वश में लाने के लिए किसी स्त्री से चिकनी-चुपड़ी बातें करने में, हास-परिहास में,विवाह-उत्सव में, अपनी जीविका कमाने में, प्राणों का संकट उपस्थित होने पर, गायों तथाब्राह्मण संस्कृति की रक्षा करने या शत्रु के हाथों से किसी व्यक्ति की रक्षा करने में असत्यभाषण भी कभी निन्दनीय नहीं माना जाता |
