← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 8 की सूची
अध्याय अठारह: भगवान वामनदेव, बौने अवतार
8.18श्रीशुक उबाचइत्थं विरिश्जस्तुतकर्मवीर्य:प्रादुर्बभूवामृतभूरदित्याम् |
चतुर्भुजः शद्भुगदाब्जचक्र:पिशड्रबासा नलिनायतेक्षण: ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इत्थम्--इस तरह से; विरिज्ञ-स्तुत-कर्म-वीर्य:-- भगवान्, जिनके कार्यो एवंपराक्रम की प्रशंसा ब्रह्माजी भी करते हैं; प्रादुर्बभूव--प्रकट हुए; अमृत-भू:--जिनका प्राकट्य सदैव मृत्युरहित होता है;अदित्याम्--अदिति के गर्भ से; चतु:-भुज:--चार भुजाओं वाले; शद्भु-गदा-अब्ज-चक्र:--शंख, गदा, कमल तथा चक्र सेसुशोभित; पिशड्भ-वासा:--पीताम्बर धारण किये; नलिन-आयत-ईक्षण:-- कमल की पंखड़ियों के समान खिली हुई आँखोंबाले |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब ब्रह्माजी इस प्रकार भगवान् के कार्यो एवं पराक्रम का यशोगान कर चुके तो भगवान् जिनकी एक सामान्य जीव की भान्ति कभी मृत्यु नहीं होती,अदिति के गर्भ से प्रकट हुए |
उनके चार हाथ शंख, चक्र, गदा तथा पद्म से सुशोभित थे |
वेपीताम्बर धारण किये हुए थे और उनकी आँखें खिले हुए कमल की पंखड़ियों जैसी प्रतीत होरही थीं |
श्यामावदातो झषराजकुण्डल-त्विषोल्लसच्छीवदनाम्बुज: पुमान् |
श्रीवत्सवक्षा बलयाड्भदोल्लस-त्किरीटकाझ्लीगुणचारुनूपुरः ॥
२॥
श्याम-अवदात: --जिनका शरीर साँवला है और उन्माद से मुक्त है; झष-राज-कुण्डल--मगर के आकार के कुण्डल; त्विषा--कान्ति से; उललसत्--चमचमाते; श्री-वदन-अम्बुज:--सुन्दर कमल जैसे मुखमण्डल वाले; पुमानू--परम पुरुष; श्रीवत्स-वक्षा:--जिनके वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिह्न है; बलय--कड़े; अड्भद--बाजूबंद; उल््लसत्--चमचमाते; किरीट--मुकुट;काञ्ञी--करधनी; गुण--जनेऊ; चारु--सुन्दर; नूपुरः--पायल
भगवान् का शरीर साँवले रंग का था और समस्त उन्मादों से मुक्त था |
उनका कमलमुखमकराकृति जैसे कान के कुण्डलों से सुशोभित होकर अत्यन्त सुन्दर लग रहा था और उनकेवक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न था |
वे कलाइयों में कंगन पहने थे, अपनी भुजाओं में बाजूबंदपहने थे, सिर पर मुकुट लगाये थे, उनकी कमर में करधनी थी, छाती पर जनेऊ पड़ा था औरउनके चरणकमलों को पायल सुशोभित कर रही थीं |
मधुव्रतव्नातविघुष्टया स्वयाविराजित: श्रीवनमालया हरिः |
प्रजापतेर्वेश्मतम: स्वरोचिषाविनाशयन्कण्ठनिविष्टकौस्तुभ: ॥
३॥
मधु-ब्रत--शहद के लिए दीवानी मधुमक्खियों का; ब्रात--समूह; विधुष्टया--गुंजार करते; स्वया--असामान्य; विराजित: --स्थित; श्री--सुन्दर; बन-मालया--फूलों की माला से; हरिः-- भगवान्; प्रजापते:--प्रजापति कश्यपमुनि का; वेश्म-तम:--घरका अंधकार; स्व-रोचिषा--अपने तेज से; विनाशयन्--नष्ट करते हुए; कण्ठ--गले में; निविष्ट--पहना हुआ; कौस्तुभ:--कौस्तुभ मणि
उनके वक्षस्थल पर सुन्दर फूलों असाधारण की माला सुशोभित थी और फूलों के अत्यधिकसुगन्धित होने से मधुमक्खियों का बड़ा सा समूह गुंजार करता हुआ शहद के लिए उन पर टूटपड़ा था |
जब भगवान् अपने गले में कौस्तुभ मणि पहन कर प्रकट हुए तो उनके तेज से प्रजापतिकश्यप के घर का अंधकार दूर हो गया |
दिशः प्रसेदु: सलिलाशयास्तदाप्रजा: प्रहष्टा ऋतवो गुणान्विता: |
झौरन्तरीक्ष॑ क्षितिरग्निजिल्लागावो द्विजा: सद्जहृषुर्नगाश्च ॥
४॥
दिशः--सारी दिशाएँ; प्रसेदु:--प्रसन्न हो उठीं; सलिल--जल के; आशया:--आगार; तदा--उस समय; प्रजा:--सारे जीव;प्रहष्टा:--अत्यन्त प्रसन्न; ऋतव:--सारी ऋतुएँ; गुण-अन्विता:--अपने-अपने गुणों से पूर्ण; द्यौ:--ऊपरी लोक; अन््तरीक्षम्--बाह्य आकाश; क्षिति: --पृथ्वी; अग्नि-जिह्ला:--देवतागण; गाव: --गौवें; द्विजा:--ब्राह्मणणण; सञ्जहृषु; --सभी प्रसन्न हो गये;नगा: च--तथा पर्वत |
उस समय सभी दिशाओं में, नदी तथा सागर जैसे जलागारों में तथा सब के हृदयों में प्रसन्नताव्याप्त हो गईं |
विभिन्न ऋतुएँ अपने-अपने गुण दिखलाने लगीं तथा उच्चलोक, बाह्य आकाशएवं पृथ्वी पर के सारे जीव हर्षित हो उठे |
देवता, गाएँ, ब्राह्मण तथा सारे पर्वत हर्ष से पूरित होगए |
श्रोणायां श्रवणद्वादश्यां मुहूर्तेडभिजिति प्रभु: |
सर्वे नक्षत्रताराद्याश्चक्ुस्तज्जन्म दक्षिणम् ॥
५॥
श्रोणायाम्--जब चन्द्रमा श्रवण नक्षत्र पर था; श्रवण-द्वादश्याम्ू-- भाद्र मास के शुक्लपक्ष की द्वादशी को, जो श्रवण-द्वादशीकहलाती हैं; मुहूर्ते--शुभ क्षण में; अभिजिति--अभिजित नक्षत्र में, जो श्रवण राशि का पूर्वार्द्ध है तथा अभिजित मुहूर्त में( मध्यान्ह के समय ); प्रभु:-- भगवान्; सर्वे--सभी; नक्षत्र--तारे; तारा--लोक; आद्या:--सूर्य आदि लोक; चक्रुः--बनाया;तत्-जन्म--भगवान् का जन्म दिन; दक्षिणम्--अत्यन्त भव्य
श्रवण-द्वादशी के दिन जब चन्द्रमा श्रवण राशि पर था और शुभ अभिजित मुहूर्त था,भगवान् इस ब्रह्माण्ड में प्रकट हुए |
भगवान् के प्राकट्य को अत्यन्त शुभ मानकर सूर्य से लेकरशनि इत्यादि समस्त तारे तथा ग्रह अत्यन्त दानी बन गये |
द्वादश्यां सवितातिष्ठन्मध्यन्दिनगतो नृप |
विजयानाम सा प्रोक्ता यस्यां जन्म विदुर्हरे: ॥
६॥
द्वादश्याम्ू-द्वादशी के दिन; सविता--सूर्य; अतिष्ठत्--स्थित था; मध्यम्-दिन-गत:--आकाश के मध्य भाग में; नृप--हे राजा;विजया-नाम--विजया नामक; सा--वह दिन; प्रोक्ता--कहा जाता है; यस्याम्--जिसमें; जन्म--प्रादुर्भाव; विदु:;--वे जानतेहैं; हरेः-- भगवान् हरि का |
हे राजा! द्वादशी के दिन जब भगवान् प्रकट हुए तो सूर्य मध्य आकाश में था, जैसा किप्रत्येक विद्वान को पता है |
यह द्वादशी विजया कहलाती है |
शब्भुदुन्दुभयो नेदुर्मृदढ़पणवानका: |
चित्रवादित्रतूर्याणां निर्घोषस्तुमुलोभवत् ॥
७॥
शद्भु--शंख; दुन्दुभय:--दुन्दुभी नामक वाद्य; नेदु:--बजने लगे; मृदढ़--ढोल; पणब-आनका:--पणव तथा आनक नाम केढोल; चित्र--विविध; वादित्र--संगीत ध्वनि; तूर्याणाम्ू--तथा अन्य वाद्ययंत्रों ( तुरहियों ) का; निर्धोष:--उच्चस्वर; तुमुल:--अत्यन्त कोलाहलपूर्ण; अभवत्--हो गया |
शंख, ढोल, मृदंग, पणव तथा आनक बजने लगे |
इन तथा अन्य विविध वबाद्ययंत्रों कीध्वनि अत्यन्त कोलाहलपूर्ण थी |
प्रीताश्चाप्सरसो नृत्यनान्धर्वप्रवरा जगु; |
तुष्ठवुर्मुनयो देवा मनव: पितरोग्नय: ॥
८॥
प्रीता:--अत्यन्त प्रसन्न होकर; च-- भी; अप्सरस:--अप्सराएँ; अनृत्यनू--नाचने लगीं; गन्धर्व-प्रवरा: -- श्रेष्ठ गन्धर्व गण;जगुः--गाने लगे; तुष्ठ॒वु:--स्तुतियों द्वारा भगवान् को हर्षित किया; मुनयः--मुनियों ने; देवा:--देवताओं ने; मनव: --मनुओं ने;पितरः:--पितृलोक के वासियों ने; अग्नयः--अग्नि
देवताओं नेअत्यधिक हर्षित होकर अप्सराएँ प्रसन्नता के मारे नाचने लगीं, श्रेष्ठ गन्धर्व गाने लगे औरमहा-मुनि, देवता, मनु, पितरगण तथा अग्निदेवों ने भगवान् को प्रसन्न करने के लिए स्तुतियाँकीं |
सिद्धविद्याधरगणा: सकिम्पुरुषकिन्नरा: |
चारणा यक्षरक्षांसि सुपर्णा भुजगोत्तमा: ॥
९॥
गायन्तोतिप्रशंसन्तो नृत्यन्तो विबुधानुगा: |
अदित्या आश्रमपदं कुसुमै:ः समवाकिरन् ॥
१०॥
सिद्ध--सिद्धलोक के वासी; विद्याधर-गणा: --विद्याधर लोक के वासी; स--सहित; किम्पुरुष--किम्पुरुष लोक के वासी;किन्नराः--किन्नर लोक के निवासी; चारणा: --चारणलोक के वासी; यक्ष--यक्षगण; रक्षांसि--राक्षसगण; सुपर्णा:--सुपर्ण;भुजग-उत्तमा:--सर्पलोक के निवासियों में श्रेष्ठ; गायन्तः-- भगवान् का यशोगान करते; अति-प्रशंसन्तः--भगवान् की प्रशंसाकरते; नृत्यन्त:--नाचते हुए; विबुधानुगा:--देवताओं के अनुयायी; अदित्या:--अदिति के; आश्रम-पदम्--निवास स्थान;कुसुमैः--फूलों से; समवाकिरन्ू--ढका हुआ |
सिद्ध, विद्याधर, किम्पुरुष, किन्नर, चारण, यक्ष, राक्षस, सुपर्ण, सर्पलोक के सर्वश्रेष्ठनिवासी तथा देवताओं के अनुयायी--इन सबों ने भगवान् का यशोगान तथा प्रशंसा करते हुएएवं नृत्य करते हुए अदिति के निवास स्थान पर इतने फूल बरसाये कि उनका पूरा घर ढक गया |
इृष्टादितिस्तं निजगर्भसम्भवंपरं पुमांसं मुदमाप विस्मिता |
गृहीतदेहँ निजयोगमायया प्रजापतिश्चाह जयेति विस्मित: ॥
११॥
इृष्टा--देखकर; अदिति:--माता अदिति ने; तम्--उसको ( भगवान् को ); निज-गर्भ-सम्भवम्--अपने गर्भ से उत्पन्न; परम्--परम; पुमांसम्--पुरुष को; मुदम्--परम सुख; आप--उत्पन्न किया; विस्मिता--अत्यन्त चकित; गृहीत--स्वीकार किया;देहम्--शरीर या दिव्य रूप; निज-योग-मायया-- अपनी आध्यात्मिक शक्ति से; प्रजापति:--कश्यपमुनि ने; च-- भी; आह--कहा; जय--जय हो; इति--इस प्रकार; विस्मित:--आश्चर्यचकित होकर |
जब अदिति ने देखा कि भगवान् ने जो उनके अपने गर्भ से उत्पन्न हुए थे अपनी आध्यात्मिकशक्ति से दिव्य शरीर धारण कर लिया है, तो वे आश्वर्यचकित हो उठीं और अत्यन्त प्रसन्न हुईं |
उस बालक को देखकर प्रजापति कश्यप परम सुख एवं आश्चर्य के वशीभूत होकर जय! जय!की ध्वनि करने लगे |
चत्तद्वपुर्भाति विभूषणायुधै-रव्यक्तचिद्व्यक्तमधारयद्धरिः |
बभूव तेनैव स वामनो वदुःसम्पश्यतोर्दिव्यगतिर्यथा नट: ॥
१२॥
यत्--जो; तत्--वही; वपु:--दिव्य शरीर; भाति--दिखलाता है; विभूषण--आभूषणों; आयुधे:--तथा हथियारों समेत;अव्यक्त--अप्रकट; चितू-व्यक्तम्--आध्यात्मिक रूप से प्रकट; अधारयत्-- धारण कर लिया; हरिः-- भगवान् ने; बभूब--तुरन्त बन गया; तेन--उससे; एव--निश्चय ही; सः-- भगवान्; वामन: --बौना; वटुः--ब्राह्मण ब्रह्मचारी; सम्पश्यतो: -- अपनेमाता-पिता के देखते-देखते; दिव्य-गति:--अलौकिक गतियों वाला; यथा--जिस तरह; नट:--नट, अभिनेता |
भगवान् अपने आदि रूप में आभूषण पहने तथा हाथ में आयुध धारण किये प्रकट हुए |
यद्यपि उनका यह सदैव विद्यमान रहने वाला रूप भौतिक जगत में दृश्य नहीं है, तो भी वे इसीरूप में प्रकट हुए |
तत्पश्चात् अपने माता-पिता की उपस्थिति में ही उन्होंने उसी तरह ब्राह्मण वामनअर्थात् ब्रह्मचारी का रूप धारण कर लिया जिस तरह कोई अभिनेता कर लेता है |
त॑ं बटुं वामनं हृष्ठा मोदमाना महर्षय: |
कर्माणि कारयामासु: पुरस्कृत्य प्रजापतिम् ॥
१३॥
तम्--उस; वटुम्--ब्रह्मचारी को; वामनम्--बौने; हृष्टा--देखकर; मोदमाना: --प्रसन्न मुद्रा में; महा-ऋषय: --महर्षियों ने;कर्माणि--अनुष्ठानों को; कारयाम् आसु:--सम्पन्न किया; पुरस्कृत्य--आगे करके; प्रजापतिमू--प्रजापति कश्यपमुनि को |
जब ऋषियों ने भगवान् को ब्रह्मचारी वामन के रूप में देखा तो वे निश्चय ही परम प्रसन्नहुए |
अतएव प्रजापति कश्यपमुनि को आगे करके उन्होंने सारे अनुष्ठान--यथा जन्म संस्कार--सम्पन्न किये |
तस्योपनीयमानस्य सावित्रीं सविताब्रवीतू |
बृहस्पतिब्रहासूत्रं मेखलां कश्यपोददात् ॥
१४॥
तस्य-- भगवान् वामनदेव का; उपनीयमानस्य--उपवीत संस्कार के समय; सावित्रीम्--गायत्री मंत्र का; सविता--सूर्यदेव ने;अब्रवीत्--उच्चारण किया; बृहस्पति:--देवताओं के गुरु बृहस्पति; ब्रह्म-सूत्रमू--उपबीत, यज्ञोपवीत; मेखलाम्--मूँज कीपेटी; कश्यप:--कश्यप मुनि ने; अददात्--प्रदान की |
वामनदेव के यज्ञोपवीत संस्कार के समय सूर्यदेव ने स्वयं गायत्री मंत्र का जप किया,बृहस्पति ने जनेऊ प्रदान किया और कश्यप मुनि ने मूँज की मेखला भेंट की |
ददौ कृष्णाजिनं भूमिर्दण्डं सोमो वनस्पति: |
कौपीनाच्छादनं माता झौएछत्रं जगतः पते: ॥
१५॥
ददौ--दिया, भेंट किया; कृष्ण-अजिनमू्--मृगछाला; भूमि:ः--माता पृथ्वी ने; दण्डम्--ब्रह्मचारी का डंडा; सोम:--चन्द्रदेवने; बन:-पति:--जंगल का राजा; कौपीन--लंगोट ; आच्छादनम्--शरीर को ढकने वाला; माता--उनकी माता अदिति ने;दौः--स्वर्गलोक; छत्रम्--छाता; जगत: --सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के; पतेः--स्वामी का |
माता पृथ्वी ने उन्हें मृगचर्म प्रदान किया तथा वनस्पतियों के राजा चन्द्रदेव ने उन्हें ब्रह्मदण्ड( ब्रह्माचारी का डंडा ) प्रदान किया |
उनकी माता अदिति ने उन्हें कौपीन के लिए वस्त्र तथास्वर्गलोक के अधिनायक देवता ने उन्हें छत्र प्रदान किया |
कमण्डलुं बेदगर्भ: कुशान्सप्तर्षयो ददुः |
अक्षमालां महाराज सरस्वत्यव्ययात्मन: ॥
१६॥
'कमण्डलुम्--कमण्डल, जलपात्र; वेद-गर्भ:--ब्रह्माजी ने; कुशान्ू--कुशा; सप्त-ऋषय: --सप्तर्षियों ने; ददुः--भेंट किया;अक्ष-मालाम्ू--रुद्राक्ष की माला; महाराज--हे राजा; सरस्वती--देवी सरस्वती ने; अव्यय-आत्मन:--भगवान् को |
हे राजा! ब्रह्माजी ने अव्यय भगवान् को कमण्डल प्रदान किया, सप्तर्षियों ने कुशा औरमाता सरस्वती ने उन्हें रुद्राक्ष की माला भेंट की |
तस्मा इत्युपनीताय यक्षराट्पात्रिकामदात् |
भिक्षां भगवती साक्षादुमादादम्बिका सती ॥
१७॥
तस्मै--उनको ( वामनदेव को ); इति--इस प्रकार; उपनीताय--जिनका उपवीत संस्कार हो चुका है; यक्ष-राट्--स्वर्ग केकोषाध्यक्ष तथा यक्षों के राजा कुवेर ने; पात्रिकाम्-भिक्षापात्र; अदात्ू-दिया; भिक्षाम्-भिक्षा के लिए; भगवती--शिवपत्नी, माता भवानी ने; साक्षात्- प्रत्यक्ष; उमा--उमा; अदात्--दिया; अम्बिका--ब्रह्मण्ड की जननी; सती--सती साध्वी
जब इस प्रकार से वामन देव का यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न हो चुका तो यक्षराज कुवेर नेउन्हें भिक्षा माँगने के लिए भिक्षापात्र एवं शिव पती, ब्रह्माण्ड की परम साध्वी, माता भगवती नेउन्हें पहली भिक्षा दी |
स ब्रह्मवर्चसेनैवं सभां सम्भावितो वटु: |
ब्रह्मर्षिगणसझ्ुष्टामत्यरोचत मारिष: ॥
१८॥
सः--वह ( वामनदेव ); ब्रह्म-वर्चसेन-- अपने ब्रह्म -तेज से; एबम्--इस प्रकार; सभाम्--सभा में; सम्भावित:--हर एक केद्वारा समादरित; वटुः--ब्रह्मचारी; ब्रह्म -ऋषि-गण-सझ्ुष्टाम्-- ब्राह्मण ऋषियों से पूरित; अति-अरोचत--सबको मात कर रहाथा, सुन्दर लगता था; मारिष:--ब्रह्मचारियों में सर्वश्रेष्ठ |
इस प्रकार सब के द्वारा स्वागत किये जाने पर ब्रह्मचारियों में श्रेष्ठ वामनदेव ने अपनाब्रह्मतेज प्रकट किया |
इस तरह महान् सन्त ब्राह्मणों की उस पूरी सभा में वे अपनी सुन्दरता मेंअद्वितीय लगते थे |
समिद्धमाहितं वह्निं कृत्वा परिसमूहनम् |
परिस्तीर्य समभ्यर्च्य समिद्धिरजुह्देदिदूवज: ॥
१९॥
समिद्धम्--प्रज्वलित; आहितम्--स्थित; वह्िम्-- अग्नि; कृत्वा--करके ; परिसमूहनम्--समुचित रीति से; परिस्तीर्य--सब सेबढ़कर; समभ्यर्च्य--पूजा करके ; समिद्धिः--आहुतियों के द्वारा; अजुहोत्--यज्ञ सम्पन्न किया; द्विज:--ब्राह्मण श्रेष्ठ |
तत्पश्चात् श्री वामनदेव ने यज्ञ-अग्नि प्रज्बलित की, पूजा सम्पन्न की और यज्ञशाला में यज्ञकिया |
श्रुत्वा श्रमेधैर्यजमानमूर्जितंबलिं भूगूणामुपकल्पितैस्तत: |
जगाम तत्राखिलसारसम्भूतोभारेण गां सन्नमयन्पदे पदे ॥
२०॥
श्रुत्वा--सुनकर; अश्वमेधेः--अश्वमेध यज्ञ द्वारा; यजमानम्--यज्ञकर्ता; ऊर्जितम्--अत्यन्त तेजस्वी; बलिम्--बलि महाराज को;भूगूणाम्-भूगुवंशी ब्राह्मणों के निर्देशन में; उपकल्पितैः --सम्पन्न किया गया; ततः--उस स्थान से; जगाम--चला गया;तत्र--वहाँ; अखिल-सार-सम्भूत:--समस्त सृष्टि के सार भगवान्; भारेण-- भार से; गाम्ू--पृथ्वी को; सन्नमयन्--दबाते हुए;पदे पदे-- प्रत्येक पग में |
जब भगवान् ने सुना कि बलि महाराज भृगुवंशी ब्राह्मणों के संरक्षण में अश्वमेध यज्ञ सम्पन्नकर रहे हैं, तो वे परमपूर्ण भगवान् बलि महाराज पर अपनी कृपा दिखाने के लिए वहाँ के लिएचल पड़े |
प्रत्येक डग भरने पर उनके भार से पृथ्वी नीचे धँसने लगी |
त॑ं नर्मदायास्तट उत्तरे बले-य॑ ऋत्विजस्ते भूगुकच्छसंज्ञके |
प्रवर्तयन्तो भूगव:ः क्रतृत्तमंव्यचक्षतारादुदितं यथा रविम् ॥
२१॥
तम्--उसको ( वामनदेव को ); नर्मदाया:--नर्मदा नदी के; तटे--किनारे पर; उत्तरे--उत्तरी; बलेः --महाराज बलि का; ये--जो; ऋत्विज: --अनुष्ठान में लगे पुरोहितगण; ते--वे सभी; भूगुकच्छ-संज्ञके -- भूगुकक्ष नामक क्षेत्र में; प्रवर्तयन्त: --सम्पन्नकरते हुए; भूगव:ः --सारे भृगुवंशी; क्रतु-उत्तमम्--अश्वमेध नामक महत्त्वपूर्ण यज्ञ; व्यचक्षत--देखा; आरात्--पास ही;उदितम्--उदय हुए; यथा--जिस तरह; रविम्--सूर्य को
नर्मदा नदी के उत्तरी तट पर भृगुकक्ष नामक क्षेत्र में यज्ञ सम्पन्न करते हुए भूगुवंशी ब्राह्मणपुरोहितों ने वामनदेव को ऐसे देखा मानो पास ही सूर्य उदय हो रहा हो |
ते ऋत्विजो यजमान: सदस्याहतत्विषो वामनतेजसा नृप |
सूर्य: किलायात्युत वा विभावसु:सनत्कुमारोथ दिदृक्षया क्रतो: ॥
२२॥
ते--वे सभी; ऋत्विज: --पुरोहितगण; यजमान: --यज्ञ सम्पन्न कराने में व्यस्त बलि महाराज भी; सदस्या:--सभा के सारेसदस्य; हत-त्विष: --तेजरहित; वामन-तेजसा--वामन के चमकीले तेज से; नृूप--हे राजा; सूर्य: --सूर्य; किल--कहीं तो;आयाति--आ रहा है; उत वा--अथवा; विभावसु:--अग्निदेव; सनत्-कुमार:--सनत्कुमार; अथ-- अथवा; दिद्क्षया--देखनेकी इच्छा से; क्रतो:ः--यज्ञ |
है राजा! वामनदेव के चमकीले तेज से बलि महाराज एवं सभा के सारे सदस्यों सहित सारेपुरोहित तेजहीन हो गये |
वे परस्पर पूछने लगे कि कहीं साक्षात् सूर्यदेव अथवा सनत्कुमार याअग्निदेव तो यज्ञोत्सव को देखने नहीं आ गये ? इत्थं सशिष्येषु भृगुष्वनेक धावितर्क्यमाणो भगवान्स वामन: |
छत्र॑ सदण्डं सजलं कमण्डलुंविवेश बिभ्रद्धयमेधवाटम् ॥
२३॥
इत्थम्--इस प्रकार; स-शिष्येषु-- अपने शिष्यों सहित; भृगुषु-- भूगुओं के बीच; अनेकधा--अनेक प्रकार से; वितर्क्यमाण: --तर्क-वितर्क करते; भगवान्-- भगवान्; सः--वह; वामन:--वामन; छत्रम्--छाता; सदण्डम्ू--लाठी ( दंड ) सहित; स-जलम्--जल से पूरित; कमण्डलुमू--कमण्डल; विवेश--प्रवेश किया; बिभ्रत्ू--हाथ में लिए; हयमेध--अश्वमेध यज्ञ की;वाटम्-शाला में |
जब भृगुवंशी पुरोहित तथा उनके शिष्य अनेक प्रकार के तर्क-वितर्को में संलग्न थे उसीसमय भगवान् वामनदेव हाथों में दण्ड, छाता तथा जल से भरा कमण्डल लिए अश्वमेधयज्ञशाला में प्रविष्ट हुए |
मौज्ज्या मेखलया वीतमुपवीताजिनोत्तरम् |
जटिल वामनं विप्रं मायामाणवर्क हरिम् ॥
२४॥
प्रविष्टे वीक्ष्य भूगव: सशिष्यास्ते सहाग्निभि: |
प्रत्यगृहन्समुत्थाय सदड्क्षिप्तास्तस्थ तेजसा ॥
२५॥
मौउ्ज्या--मूँज की बनी; मेखलया--पेटी से; बीतम्--घिरा हुआ; उपवीत--जनेऊ; अजिन-उत्तरमू--मृगचर्म का उत्तरीय वस्त्रपहने हुए; जटिलम्--जटा धारण किये; वामनम्--वामन को; विप्रमू--ब्राह्मण; माया-माणवकम्--मनुष्य का मायावीपुत्र;हरिम्ू-- भगवान् को; प्रविष्टम्--प्रवेश किया हुआ; वीक्ष्य--देखकर; भूगव:--सारे भूगुबंशी पुरोहित; स-शिष्या:--अपनेशिष्यों समेत; ते--वे सभी; सह-अग्निभि: --यज्ञ अग्नि सहित; प्रत्यगृह्न्ू--ठीक से स्वागत किया गया; समुत्थाय--खड़ेहोकर; सद्क्षिप्ता:--घटा हुआ; तस्थ--उसके; तेजसा--तेज से |
भगवान् वामनदेव मूँज की मेखला, जनेऊ, मृगचर्म का उत्तरीय वस्त्र तथा जटाजूट धारणकिये हुए ब्राह्मण बालक के रूप में उस यज्ञशाला में प्रविष्ट हुए |
उनके तेज से सारे पुरोहितों एवंउनके शिष्यों का तेज घट गया; वे अपने-अपने आसनों से उठ खड़े हुए और प्रणाम करते हुएसबों ने समुचित रीति से उनका स्वागत किया |
यजमान: प्रमुदितो दर्शनीयं मनोरमम् |
रूपानुरूपावयवं तस्मा आसनमाहरत् ॥
२६॥
यजमान:--बलि महाराज, जिन्होंने सारे पुरोहितों को यज्ञ सम्पन्न करने के लिए लगा रखा था; प्रमुदित:--अत्यन्त प्रसन्न होकर;दर्शनीयम्-देखने में सुहावना; मनोरमम्--इतना सुन्दर; रूप--सौन्दर्य से युक्त; अनुरूप--उनके शारीरिक सौन्दर्य के तुल्य;अवयवम्ू--शरीर के विभिन्न अंग; तस्मै--उनको; आसनम्--बैठने का स्थान; आहरत्-- प्रदान किया |
भगवान् वामनदेव को देखकर परम प्रफुल्लित बलि महाराज ने परम प्रसन्नतापूर्वक उन्हेंबैठने के लिए आसन प्रदान किया |
भगवान् के शरीर के सुन्दर अंग उनके शरीर की सुन्दरता कोयोगदान दे ले रहे थे |
स्वागतेनाभिनन्द्याथ पादौ भगवतो बलि: |
अवनिज्यार्चयामास मुक्तसड्रमनोरमम् ॥
२७॥
सु-आगतेन--स्वागत के शब्दों से; अभिनन्द्य--स्वागत करके; अथ--इस प्रकार; पादौ--दोनों चरणकमल; भगवत: --भगवान् के; बलि:--बलि महाराज ने; अवनिज्य--धोकर; अर्चयाम् आस--पूजा की; मुक्त-सड़-मनोरमम्--मुक्तात्माओं कोसुन्दर लगने वाले भगवान् को |
इस प्रकार मुक्तात्माओं को सदैव सुन्दर लगने वाले भगवान् का समुचित स्वागत करते हुएबलि महाराज ने उनके चरणकमलों को धोकर उनकी पूजा की |
तत्पादशौच॑ जनकल्मषापहंस धर्मविन्मूर्ध्यदधात्सुमड्रलम् |
यहद्देवदेवो गिरिशश्चन्द्रमौलिर्दधार मूर्ध्ना परया च भक्त्या ॥
२८॥
ततू-पाद-शौचम्-- भगवान् के चरणकमलों को धोने से प्राप्त जल; जन-कल्मष-अपहम्--जनता के समस्त पापों के फलों कोधो डालने वाला; सः--उसने ( बलि महाराज ने ); धर्म-वित्--धर्म से पूर्णतया ज्ञात; मूर्थि--सिर पर; अदधात्-- धारण किया;सु-मड्गलम्--सर्वकल्याणकारी; यत्--जो; देव-देव: --देवताओं में श्रेष्ठ; गिरिश:--शिवजी; चन्द्र-मौलि: --ललाट पर चन्द्रमाका चिह्न धारण करने वाला; दधार--धारण किया; मूर्ध्ना--सिर पर; परया--परम; च-- भी; भक्त्या--भक्तिपूर्वक |
देवताओं में सर्वश्रेष्ठ ललाट पर चन्द्रमा का चिन्ह धारण करने वाले शिवजी विष्णु केअँगूठे से निकलने वाले गंगाजल को अपने सिर पर भक्तिपूर्वक धारण करते हैं |
धार्मिकसिद्धान्तों को जानने वाले होने के कारण बलि महाराज को यह ज्ञात था; फलस्वरूप शिवजीका अनुसरण करते हुए उन्होंने भी भगवान् के चरणकमलों के प्रक्षालन से प्राप्त जल को अपनेसिर पर रख लिया |
श्रीबलिरुवाचस्वागतं ते नमस्तुभ्यं ब्रह्मन्कि करवाम ते |
ब्रह्मर्षीणां तपः साक्षान्मन्ये त्वार्य वपुर्धरम् ॥
२९॥
श्री-बलि: उवाच--बलि महाराज ने कहा; सु-आगतम्--स्वागत है; ते--आपका; नमः तुभ्यमू--मैं आपको नमस्कार करता हूँ;ब्रह्मनू-हे ब्राह्मण; किमू--क्या; करवाम--हम कर सकते हैं; ते--आपके लिए; ब्रह्य-ऋषीणाम्--ब्रह्मर्षियों की; तपः--तपस्या; साक्षात्- प्रत्यक्ष; मन्ये --मानता हूँ; त्वा--तुमको; आर्य-हे श्रेष्ठ; वपु:-धरम्--साकार |
तब बलि महाराज ने वामनदेव से कहा : हे ब्राह्मण! मैं आपका हार्दिक स्वागत करता हूँऔर आपको सादर नमस्कार करता हूँ |
कृपया बतायें कि हम आपके लिए क्या करें? हमआपको ब्रहार्षियों की तपस्या का साकार रूप मानते हैं |
अद्य नः पितरस्तृप्ता अद्य न: पावितं कुलम् |
अद्य स्विष्ट: क्रतुरयं यद्भधवानागतो गृहान् ॥
३०॥
अद्य--आज; नः--हमारे; पितर: --पितरगण; तृप्ता:--तृप्त; अद्य--आज; न: --हमारे; पावितम्--पवित्र हुए; कुलमू--पूरापरिवार; अद्य--आज; सु-इष्ट:--भलीभाँति सम्पन्न; क्रतु:--यज्ञ; अयम्--यह; यत्-- क्योंकि; भवान्ू--आप; आगत: --पधारेहैं; गृहानू-- हमारे घर में
हे प्रभ!ु आप कृपा करके हमारे घर पधारे हैं अतः मेरे सारे पूर्वज संतुष्ट हो गये, हमारापरिवार तथा समस्त वंश पवित्र हो गया और हम जिस यज्ञ को कर रहे थे वह आपकी उपस्थितिसे अब पूरा हो गया |
अद्याग्नयो मे सुहुता यथाविधिद्विजात्मज त्वच्चरणावनेजनै: |
हतांहसो वार्भिरियं च भूरहोतथा पुनीता तनुभिः पदैस््तव ॥
३१॥
अद्य--आज; अग्नयः -- अग्नि; मे--मेरे द्वारा सम्पन्न; सु-हुताः-- भलीभाँति आहुति डाली गई; यथा-विधि--शास्त्रीयआदेशानुसार; द्विज-आत्मज-हे ब्राह्मण पुत्र; त्वत्-चरण-अवनेजनै: --जिसने आपके चरणकमल धोये हैं; हत-अंहस:--सारेपापों के फलों से पवित्र हो गये हैं, जो; वार्भि:--जल के द्वारा; इयम्--यह; च-- भी; भू:--पृथ्वी पर; अहो--ओह; तथा--और; पुनीता--पवित्र; तनुभि: --छोटे; पदैः--चरणकमलों के स्पर्श से; तब--आपके |
हे ब्राह्मणपुत्र! आज यह यज्ञ-अग्नि शास्त्रादेशानुसार प्रज्वलित हुई है और आपकेपादप्रक्षालित जल से मैं अपने पापकर्मों के सभी फलों से मुक्त हो गया हूँ |
हे स्वामी! आपकेलघु चरणारविन्द के स्पर्श से समग्र जगती-तल पवित्र हो गया है |
यद्य॒ट्टो वाउ्छसि तत्प्रतीच्छ मेत्वामर्थिनं विप्रसुतानुतर्कये |
गां काञ्जनं गुणवद्धाम मूष्टेंतथान्नपेयमुत वा विप्रकन्याम् |
ग्रामान्समृद्धांस्तुरगान्गजान्वारथांस्तथाहईत्तम सम्प्रतीच्छ ॥
३२॥
यत् यत्--जो जो; वटो--हे ब्रह्मचारी; वाज्छसि--चाहते हो; तत्--वह; प्रतीच्छ--ले सकते हो; मे--मुझसे; त्वामू--तुम;अर्थिनम्--इच्छा रखने वाले; विप्र-सुत--हे ब्राह्मण पुत्र; अनुतर्कये--मैं मानता हे; गामू--गाएँ; काञ्लनम्--सोना; गुणवत्धाम--सज्जित घर; मृष्टम्ू--सुस्वादु; तथा--और; अन्न--अनाज; पेयम्--पेय पदार्थ; उत--निस्सन्देह; बा--अथवा; विप्र-कन्याम्-ब्राह्मण की पुत्री; ग्रामानू-ग्रामों; समृद्धानू--समृद्ध; तुरगानू-घोड़ों; गजान्--हाथियों ; वा--अथवा; रथान्--रथोंको; तथा--और; अर्हत्-तम--परम पूज्य; सम्प्रतीच्छ--ले सकते हो |
हे ब्राह्मणपुत्र! ऐसा प्रतीत होता है कि आप यहाँ मुझसे कुछ माँगने आये हैं |
अतएबवं आपजो भी चाहें मुझसे ले सकते हैं |
हे परम पूज्य! आप गाय, सोना, सज्जित घर, स्वादिष्ट भोजनतथा पेय, पत्नी के रूप में ब्राह्मण कन्या, समृद्ध गाँव, घोड़े, हाथी, रथ या जो भी इच्छा होमुझसे ले सकते हैं |
