← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 8 की सूची
अध्याय सोलह: पूजा की पयो-व्रत प्रक्रिया को क्रियान्वित करना
8.16श्रीशुक उबाचएवं पुत्रेषु नष्टेचु देवमातादितिस्तदा |
हते त्रिविष्टपे दैत्यै: पर्यतप्यदनाथवत् ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; पुत्रेषु--अपने पुत्रों को; नष्टेपु--अपने पदों से अहृश्य हुए;देव-माता--देवताओं की माता; अदिति:--अदिति ने; तदा--उस समय; हते--खो जाने के कारण; त्रि-विष्टपे--स्वर्गलोक से;दैत्यै:--असुरों के प्रभाव के कारण; पर्यतप्यत्--पश्चाताप करने लगी; अनाथ-वत्--अनाथ की तरह |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा! जब अदिति के पुत्र देवतागण स्वर्गलोक से इस तरह सेअदृश्य हो गये और असुरों ने उनका स्थान ग्रहण कर लिया तो अदिति इस प्रकार विलाप करनेलगी मानो उसका कोई रक्षक न हो |
एकदा कश्यपस्तस्या आश्रमं भगवानगात् |
निरुत्सवं निरानन्दं समाधेर्विरतश्चिरातू ॥
२॥
एकदा--एक दिन; कश्यप:--कश्यपमुनि; तस्या:--अदिति के; आश्रमम्--आ श्रम में; भगवान्--अत्यन्त शक्तिशाली;अगातू--गये; निरुत्सवम्--बिना उत्साह के; निरानन्दम्--बिना हर्ष के; समाधे: --समाधि से; विरत:--जगकर; चिरातू--दीर्घकाल के बाद |
परम शक्तिशाली कश्यपमुनि कई दिनों बाद जब ध्यान की समाधि से उठे और घर लौटे तोदेखा कि अदिति के आश्रम में न तो हर्ष है, न उल्लास |
स पत्नीं दीनवदनां कृतासनपरिग्रहः |
सभाजितो यथान्यायमिदमाह कुरूद्बह ॥
३॥
सः--कश्यपमुनि; पत्लीमू-- अपनी पत्नी को; दीन-वदनाम्--सूखा मुखमंडल किये; कृत-आसन-परिग्रह: --आसन ग्रहणकरके; सभाजित:--अदिति द्वारा आदर किये जाकर; यथा-न्यायम्--काल तथा देश के अनुसार; इृदम् आह--इस प्रकार कहा;कुरु-उद्दद-हे कुरु श्रेष्ठ महाराज परीक्षित |
हे कुरुश्रेष्ठ! भलीभाँति सम्मान तथा स्वागत किये जाने के बाद कश्यपमुनि ने आसन ग्रहणकिया और अत्यन्त खिन्न दिख रही अपनी पत्नी अदिति से इस प्रकार कहा |
अप्यभद्रं न विप्राणां भद्रे लोकेधुनागतम् |
न धर्मस्य न लोकस्य मृत्योश्छन्दानुवर्तिन: ॥
४॥
अपि--क्या; अभद्रम्-दुर्भाग्य; न--नहीं; विप्राणाम्ू--ब्राह्मणों का; भद्रे--हे अदिति; लोके--इस संसार में; अधुना--इससमय; आगतम्--आ गया है; न--नहीं; धर्मस्य-- धर्म का; न--नहीं; लोकस्य--सामान्य लोगों का; मृत्यो:--मृत्यु; छन्द-अनुवर्तिन:--जो लोग मृत्यु के गालों में जाने वाले हैं |
हे भद्दे! मुझे आश्चर्य है कि कहीं धर्म पर, ब्राह्मण वर्ग या काल की सोच में पड़ी जनता कोकुछ हो तो नहीं गया ? अपि वाकुशलं किज्ञिद्गृहेषु गृहमेधिनि |
धर्मस्यार्थस्य कामस्य यत्र योगो हयोगिनाम् ॥
५॥
अपि--मुझे आश्चर्य हो रहा है; वा--या तो; अकुशलम्--अशुभ; किश्ञित्-- कुछ; गृहेषु --घर में; गृह-मेधिनि--गृहस्थ जीवनमें अनुरक्त हे मेरी पत्नी; धर्मस्य--धधर्म का; अर्थस्य--आर्थिक दशा का; कामस्य--इच्छापूर्ति का; यत्र--घर पर; योग:--ध्यानका फल; हि--निश्चय ही; अयोगिनाम्ू--जो अध्यात्मवादी नहीं हैं उनका |
हे गृहस्थ जीवन में अनुरक्त मेरी पत्नी! यदि कोई गृहस्थ जीवन में धर्म, अर्थ तथा काम कासमुचित पालन करता है, तो उसके कार्यकलाप एक अध्यात्मवादी ( योगी ) के ही समान श्रेष्ठहोते हैं |
मुझे आश्चर्य है कि क्या इन नियमों के पालन में कोई त्रुटि आ गई है? अपि वातिथयोभ्येत्य कुटुम्बासक्तया त्वया |
गृहादपूजिता याता: प्रत्युत्थानेन वा क्वचित् ॥
६॥
अपि--क्या; वा--या तो; अतिथय: --मेहमान; अभ्येत्य--घर आकर; कुटुम्ब-आसक्तया--जो परिवार वालों के प्रतिअत्यधिक आसक्त रहते हैं; त्ववा--तुम्हारे द्वारा; गृहात्--घर से; अपूजिता:--ठीक से सत्कार न किये जाकर; याता:--चलेगये; प्रत्युत्थानेन--खड़े होकर; वा--अथवा; क्वचित्--कभी-कभी |
मुझे आश्चर्य है कि कहीं तुम अपने परिवार के सदस्यों में अत्यधिक आसक्त रहने के कारणअचानक आए अतिथियों का ठीक से स्वागत नहीं कर पाईं और वे बिना सत्कार के ही वापसचले गये ? गृहेषु येष्वतिथयो नार्चिता: सलिलैरपि |
यदि निर्यान्ति ते नूनं फेरराजगृहोपमा: ॥
७॥
गृहेषु--घर पर; येषु--जिस; अतिथय:--अनामंत्रित मेहमान; न--नहीं; अर्चिता:--स्वागत किये गये; सलिलै:ः अपि--कम सेकम एक गिलास जल देकर के; यदि--यदि; निर्यान्ति--वापस चले जाते हैं; ते--ऐसा गृहस्थ जीवन; नूनम्--निस्सन्देह; फेरु-राज--सियारों का; गृह--घर; उपमा:ः--सहृश
जिन घरों से मेहमान एक गिलास जल भेंट किए गए बिना वापस चले जाते हैं, वे घर खेतोंके उन बिलों के समान हैं जिनमें सियार रहते हैं |
अप्यग्नयस्तु वेलायां न हुता हविषा सति |
त्वयोद्विग्नधिया भत्रे प्रोषिते मयि कर्हिचित् ॥
८ ॥
अपि--क्या; अग्नय: --अग्नि; तु--निस्सन्देह; वेलायाम्--अग्नियज्ञ में; न--नहीं; हुता:--डाला गया; हविषा--घी द्वारा;सति--हे सती; त्वया--तुम्हारे द्वारा; उद्विग्न-धिया--किसी चिन्ता के कारण; भद्रे--हे कल्याणी; प्रोषिते--घर से दूर था;मयि--जब मैं; कर्हिचित्ू--कभी-कभी
हे सती तथा शुभे! जब मैं घर से अन्य स्थानों को चला गया तो क्या तुम इतनी चिन्तित थींकि अग्नि में घी की आहुति भी नहीं दे सकीं ? यत्पूजया कामदुघान्याति लोकान्गृहान्वित: |
ब्राह्मणोउग्निश्व वै विष्णो: सर्वदेवात्मनो मुखम् ॥
९॥
यतू-पूजया--अग्नि तथा ब्राह्मणों की पूजा द्वारा; काम-दुघानू--इच्छाओं को पूरा करने वाला; याति--जो जाता है; लोकान्ू--उच्च लोकों को; गृह-अन्वित:--गृहस्थ जीवन के प्रति आसक्त; ब्राह्मण:--ब्राह्मणों; अग्नि: च--तथा अग्नि; वै--निस्सन्देह;विष्णो: -- भगवान् विष्णु का; सर्व-देव-आत्मन: --सारे देवताओं का आत्मा; मुखम्--मुख |
एक गृहस्थ अग्नि तथा ब्राह्मणों की पूजा करके उच्च लोकों में निवास करने के वांछितलक्ष्य को प्राप्त कर सकता है क्योंकि यज्ञ की अग्नि तथा ब्राह्मणों को समस्त देवताओं केपरमात्मा स्वरूप भगवान् विष्णु का मुख माना जाना चाहिए ॥
अपि सर्वे कुशलिनस्तव पुत्रा मनस्विनि |
लक्षयेस्वस्थमात्मानं भवत्या लक्षणैरहम् ॥
१०॥
अपि--चाहे तो; सर्वे--सभी; कुशलिन:--पूर्ण कुशलता के साथ; तवब--तुम्हारे; पुत्रा:--सारे पुत्र; मनस्विनि--हे विशालहृदय वाली नारी; लक्षये--देखता हूँ; अस्वस्थम्-- अशान्त; आत्मानम्--मन को; भवत्या:--तुम्हारे; लक्षणैः--लक्षणों से;अहम्-मैं |
हे मनस्विनि! तुम्हारे सारे पुत्र कुशलपूर्वक तो हैं ? तुम्हारे म्लान मुख को देखकर मुझे लगताहै कि तुम्हारा मन शान्त नहीं है |
ऐसा क्यों है ? श्रीअदितिरुवाचभद्रं द्विजगवां ब्रह्मन्धर्मस्यास्य जनस्य च |
त्रिवर्गस्थ पर क्षेत्रं गृहमेधिन्गूहा इमे ॥
११॥
श्री-अदिति: उबाच-- श्रीमती अदिति ने कहा; भद्रमू--कल्याण हो; द्विज-गवाम्--ब्राह्मणों तथा गायों का; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण;धर्मस्य अस्य--शास्त्र वर्णित धर्म का; जनस्य--लोगों का; च--तथा; त्रि-वर्गस्थ--उन्नति की तीन विधियों ( धर्म, अर्थ तथाकाम ) का; परम्--परम; क्षेत्रमू-क्षेत्र; गृहमेधिन्--हे गृहस्थ जीवन में आसक्त मेरे पति; गृहा:--तुम्हारा घर; इमे--ये सारीवस्तुएँ |
अदिति ने कहा: हे मेरे पूज्य ब्राह्मण पति! सारे ब्राह्मण, गाएँ, धर्म तथा अन्य लोगकुशलपूर्वक हैं |
हे मेरे घर के स्वामी! धर्म, अर्थ तथा काम--ये तीनों गृहस्थ जीवन में ही फलते'फूलते हैं जिसके फलस्वरूप यह जीवन सौभाग्य से पूर्ण होता है |
अग्नयोतिथयो भृत्या भिक्षवो ये च लिप्सवः |
सर्व भगवतो ब्रह्मन्ननुध्यानान्न रिष्यति ॥
१२॥
अग्नय:--अग्नि की पूजा; अतिथयः--अतिथियों का स्वागत; भृत्या:--सेवकों को तुष्ट करना; भिक्षवः--भिखारियों को प्रसन्नरखना; ये--जो; च--तथा; लिप्सव:--वे जैसा चाहते हैं ( वैसा ही उनका ध्यान रखा जाता है ); सर्वम्--सारे के सारे;भगवतः--मेरे स्वामी आपका; ब्रह्मनू-हे ब्राह्मण; अनुध्यानात्--निरन्तर ध्यान करने से; न रिष्यति--कुछ नहीं रह जाता ( सबकुछ ठीक से हो जाता है )
हे प्रिय पति! मैं अग्नि, अतिथि, सेवक तथा भिखारी इन सब की समुचित देखभाल करतीरही हूँ |
चूँकि मैं सदैव आपका चिन्तन करती रही हूँ अतएव धर्म में किसी प्रकार की उपेक्षा कीसम्भावना नहीं रही |
को नु मे भगवन्कामो न सम्पद्येत मानसः |
यस्या भवान्प्रजाध्यक्ष एवं धर्मान्प्रभाषते ॥
१३॥
कः--क्या; नु--निस्सन्देह; मे--मेरा; भगवन्--हे स्वामी; काम:--इच्छा; न--नहीं; सम्पद्येत--पूरा किया जा सकता है;मानस:--मन के भीतर; यस्या:--मेरे; भवान्--साक्षात् आप; प्रजा-अध्यक्ष: -- प्रजापति; एबम्--इस प्रकार; धर्मान्ू-- धार्मिकसिद्धान्तों की; प्रभाषते--बातें करते हैं|
हे स्वामी! जब आप प्रजापति हैं और धर्म के सिद्धान्तों के पालन में साक्षात् मेरे उपदेशक हैं,तो फिर मेरी इच्छाओं के पूरा न होने में क्या सम्भावना हो सकती है ? तबैव मारीच मनःशरीरजा:प्रजा इमा: सत्त्वरजस्तमोजुष: |
समो भवांस्तास्वसुरादिषु प्रभोतथापि भक्त भजते महेश्वरः ॥
१४॥
तब--तुम्हारा; एव--निस्सन्देह; मारीच--हे मरीचि के पुत्र; मनः-शरीर-जा:--आपके शरीर या मन से उत्पन्न ( सारे असुर तथादेवता ); प्रजा:--आपफसे उत्पन्न; इमा:--ये सब; सत्त्व-रज:-तम:-जुष:--सतो, रजो तथा तमो गुणों से दूषित; सम:--समान;भवान्--आप; तासु--उनमें से हर एक को; असुर-आदिषु--असुरों इत्यादि में; प्रभो--हे स्वामी; तथा अपि--फिर भी;भक्तमू-- भक्तों को; भजते--परवाह करता है; महा-ईश्वर:-- भगवान्, परम नियन्ता |
हे मरीचि पुत्र! आप महापुरुष होने के कारण असुरों तथा देवताओं के प्रति समभाव रखते हैंक्योंकि वे या तो आपके शरीर से उत्पन्न हैं या आपके मन से |
वे सतो, रजो तथा तमो गुणों में सेकिसी न किसी गुण से युक्त हैं |
लेकिन परम नियन्ता भगवान् समस्त जीवों पर समदर्शा होते हुए भी भक्तों पर विशेष रूप से अनकूल रहते हैं |
तस्मादीश भजल्त्या मे श्रेयश्चिन्तय सुब्रत |
हतश्नियो हतस्थानान्सपत्नै: पाहि नः प्रभो ॥
१५॥
तस्मात्ू--अतएव; ईश--हे परमशक्तिशाली नियन्ता; भजन्त्या:--अपने सेवक का; मे--मेरा; श्रेय:--कल्याण; चिन्तय--जराविचार करें; सु-ब्रत--हे भद्गर; हृत-भ्रिय:--ऐश्वर्यविहीन; हृत-स्थानान्ू--घर-बार से रहित; सपत्नैः--प्रतिद्वन्द्दियों द्वारा; पाहि--रक्षा कीजिये; न:ः--हम सबकी; प्रभो--हे स्वामी अतएबव हे भद्र स्वामी! अपनी दासी पर कृपा कीजिये |
हमारे प्रतिद्वन्द्दी असुरों ने अब हमेंऐश्वर्य तथा घर-बार से विहीन कर दिया है |
कृपा करके हमें संरक्षण प्रदान कीजिये |
परैर्विवासिता साहं मग्ना व्यसनसागरे |
ऐश्वर्य श्रीर्यशः स्थानं हतानि प्रबलैर्मम ॥
१६॥
परैः--अपने शत्रुओं द्वारा; विवासिता--अपने अपने घरों से निकाली जाकर; सा--वही; अहम्--मैं; मग्ना--डूबी हुई; व्यसन-सागरे--कष्ट के समुद्र में; ऐश्वर्यम्--ऐश्वर्य; श्री:--सौन्दर्य; यश:--कीर्ति; स्थानम्--स्थान; हतानि--छीने गये; प्रबलै:--अत्यन्त शक्तिशाली; मम--मेरा |
हमारे अत्यन्त शक्तिशाली शत्रु असुरों ने हमारा ऐश्वर्य, हमारा सौन्दर्य, हमारा यश यहाँ तककि हमारा घर भी हमसे छीन लिया है |
निस्सन्देह, हमें अब वनवास दे दिया गया है और हमविपत्ति के सागर में डूब रहे हैं |
यथा तानि पुनः साधो प्रपद्येरन््ममात्मजा: |
तथा विधेहि कल्याणं धिया कल्याणकृत्तम ॥
१७॥
यथा--जिस तरह; तानि--हमारी सारी खोई वस्तुओं को; पुनः--फिर से; साधो--हे साधु पुरुष; प्रपद्येरनू--पुनः प्राप्त करसकें; मम--मेरा; आत्मजा: --सन्तानें, पुत्र; तथा--उसी प्रकार; विधेहि--कृपा करके करें; कल्याणम्ू--कल्याण; धिया--विचारार्थ; कल्याण-कृत्-तम--हमारा कल्याण करने वाले सर्वोत्तम व्यक्ति आप |
हे श्रेष्ठ साधु, हे कल्याण करने वाले परम श्रेष्ठ! हमारी स्थिति पर विचार करें और मेरे पुत्रोंको ऐसा वर दें जिससे वे अपनी खोई हुई वस्तुएँ फिर से प्राप्त कर सकें |
श्रीशुक उबाचएवमभ्यर्थितोदित्या कस्तामाह स्मयन्निव |
अहो मायाबलं विष्णो: स्नेहबद्धमिदं जगत् ॥
१८॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार से; अभ्यर्थित:--प्रार्थना किये जाने पर; अदित्या--अदितिद्वारा; क:ः--कश्यपमुनि ने; तामू--उससे; आह--कहा; स्मयन्--मुस्काते हुए; इब--के सहश; अहो--ओह; माया-बलम्--माया का प्रभाव; विष्णो: --विष्णु की; स्नेह-बद्धम्--इस स्नेह से प्रभावित; इदम्--यह; जगत्--सारा संसार |
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : जब अदिति ने कश्यपमुनि से इस प्रकार प्रार्थना की तोवे कुछ मुस्काये और उन्होंने कहा ‘ओह! भगवान् विष्णु की माया कितनी प्रबल है, जिससेसारा संसार बच्चों के स्नेह से बँधा है |
'व देहो भौतिकोनात्मा क््व चात्मा प्रकृते: पर: |
कस्य के पतिपुत्राद्या मोह एव हि कारणम् ॥
१९॥
क्व--कहाँ है; देहः--यह भौतिक शरीर; भौतिक:--पाँच तत्त्व से बना; अनात्मा--जो आत्मा नहीं है; क्व--कहाँ है; च-- भी;आत्मा--आत्मा; प्रकृतेः:--भौतिक जगत के प्रति; पर:--दिव्य; कस्य--किसका; के--कौन है; पति--पति; पुत्र-आद्या:--अथवा पुत्र इत्यादि; मोह:--मोह; एव--निस्सन्देह; हि--निश्चय ही; कारणम्--कारण |
कश्यपमुनि ने आगे कहा : यह पाँच तत्त्वों से बना भौतिक शरीर है क्या? यह आत्मा सेभिन्न है |
निस््सन्देह, आत्मा उन भौतिक तत्त्वों से सर्वथा भिन्न है जिनसे यह शरीर बना हुआ है |
किन्तु शारीरिक आसक्ति के कारण ही किसी को पति या पुत्र माना जाता है |
ये मोहमय सम्बन्धअज्ञान के कारण उत्त्पन्न होते हैं |
उपतिष्ठस्व पुरुषं भगवन्तं जनार्दनम् |
सर्वभूतगुहावासं वासुदेव॑ जगद्गुरुम् ॥
२०॥
उपतिष्ठस्व--पूजने का प्रयास करो; पुरुषम्--परम पुरुष को; भगवन्तम्-- भगवान् को; जनार्दनमू--समस्त शत्रुओं का वध करसकने वाले को; सर्व-भूत-गुहा-वासम्--हर एक के हृदय में वास करने वाले; वासुदेवम्--वसुदेव के पुत्र, सर्वव्यापी वासुदेवकृष्ण को; जगत्-गुरुम्--सारे संसार के गुरु तथा शिक्षक को |
हे अदिति! तुम उन भगवान् की भक्ति में लगो जो हर एक के स्वामी हैं, जो हर एक केशत्रुओं का दमन करने वाले हैं तथा जो हर एक के हृदय के भीतर आसीन रहते हैं |
वे ही परमपुरुष, श्रीकृष्ण या वासुदेव, सब को शुभ वरदान दे सकते हैं क्योंकि वे विश्व के स्वामी हैं |
स विधास्यति ते कामान्हरिदीनानुकम्पन: |
अमोघा भगवद्धक्तिनेतरेति मतिर्मम ॥
२१॥
सः--वह ( वासुदेव ); विधास्यति--निश्चय ही पूरा करेगा; ते--तुम्हारी; कामान्ू--इच्छाएँ; हरिः-- भगवान्; दीन--दुखिया पर;अनुकम्पन:--अत्यन्त कृपालु; अमोघा--अच्युत; भगवत्-भक्ति: -- भगवान् की भक्ति; न--नहीं; इतरा-- भगवद्भक्ति केअतिरिक्त कुछ भी; इति--इस प्रकार; मतिः--अभिमत; मम--मेरा |
दीनों पर अत्यन्त दयालु भगवान् तुम्हारी सारी इच्छाओं को पूरा करेंगे क्योंकि उनकी भक्तिअच्युत है |
भक्ति के अतिरिक्त अन्य सारी विधियाँ व्यर्थ हैं |
ऐसा मेरा मत है |
श्रीअदितिरुवाचकेनाहं विधिना ब्रह्मन्रुपस्थास्ये जगत्पतिम् |
यथा मे सत्यसड्डूल्पो विदध्यात्स मनोरथम् ॥
२२॥
श्री-अदिति: उबाच-- श्रीमती अदिति प्रार्थना करने लगीं; केन--किसके द्वारा; अहम्--मैं; विधिना--विधानों द्वारा; ब्रह्मनू--हेब्राह्मण; उपस्थास्थे--प्रसन्न कर सकती हूँ; जगत्-पतिम्--ब्रह्माण्ड के स्वामी, जगन्नाथ को; यथा--जिससे; मे--मेरा; सत्य-सड्डल्प:--इच्छापूर्ति; विदध्यात्--पूरा करे; सः--वह ( भगवान् ); मनोरथम्--इच्छाएँ, कामनाएँ |
श्रीमती अदिति ने कहा : हे ब्राह्मण! मुझे वह विधि-विधान बतलायें जिससे मैं जगन्नाथ कीपूजा कर सकूँ और भगवान् मुझसे प्रसन्न होकर मेरी समस्त इच्छाओं को पूरा कर दें |
आदिश च्वं द्विजश्रेष्ठ विधि तदुपधावनम् |
आशु तुष्यति मे देव: सीदन्त्या: सह पुत्रकै: ॥
२३॥
आदिश--मुझे उपदेश दें; त्वमू-हे मेरे पति; द्विज-श्रेष्ठ--हे ब्राह्मणश्रेष्ठ; विधिमू--विधि-विधानों को; तत्-- भगवान्;उपधावनम्--पूजा की विधि; आशु--शीघ्र; तुष्यति--प्रसन्न हो जाता है; मे--मुझ पर; देव:-- भगवान्; सीदन्त्या:--अब शोककरते; सह--साथ; पुत्रकै:--अपने सारे पुत्र देवताओं के |
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ) कृपा करके मुझे भगवान् की भक्तिपूर्वक पूजा की पूर्ण विधि का उपदेश देंजिससे भगवान् मुझ पर तुरन्त ही प्रसन्न हो जायें और मुझे मेरे पुत्रों सहित इस अत्यन्त संकटपूर्णपरिस्थिति से उबार लें |
श्रीकश्यप उबाचएतन्मे भगवान्पृष्ट: प्रजाकामस्य पद्मज: |
यदाह ते प्रवक्ष्यामि ब्रतं केशवतोषणम् ॥
२४॥
श्री-कश्यप: उबाच--कश्यपमुनि ने कहा; एतत्--यह; मे--मेरे द्वारा; भगवान्--अत्यन्त शक्तिशाली; पृष्ठ: --पूछे जाने पर;प्रजा-कामस्य--सन््तान की इच्छा से; पद्य-ज:--कमल पुष्प से उत्पन्न ब्रह्माजी ने; यत्--जो भी; आह--कहा; ते--तुमको;प्रवक्ष्यामि--बताऊँगा; ब्रतम्--पूजा के रूप में; केशव-तोषणम्--जिसमें भगवान् केशव तुष्ट होते हैं |
श्री कश्यपमुनि ने कहा : जब मुझे सन््तान की इच्छा हुई तो मैंने कमलपुष्प से उत्पन्न होनेवाले ब्रह्माजी से जिज्ञासा की |
अब मैं तुम्हें वही विधि बताऊँगा जिसका उपदेश ब्रह्माजी ने मुझेदिया था और जिससे भगवान् केशव तुष्ट होते हैं |
फाल्गुनस्यामले पक्षे द्वादशाहं पयोव्रतम् |
अर्चयेदरविन्दाक्ष॑ं भकत्या परमयान्वित: ॥
२५॥
फाल्गुनस्य--फाल्गुन मास ( फरवरी-मार्च ) को; अमले--शुक्लपक्ष; पक्षे--पखवारे में; द्वादश-अहम्--बारह दिनों तक,जिसका अन्त द्वादशी के दिन होता है; पयः-ब्रतम्--केवल दूध ग्रहण करने का ब्रत; अर्चयेत्--पूजा करे; अरविन्द-अक्षम्--'कमलनयन भगवान् की; भकत्या--भक्ति के साथ; परमया--शुद्ध; अन्वित:--से युक्त |
'फाल्गुन मास ( फरवरी-मार्च ) के शुक्लपक्ष में द्वादशी तक के बारह दिनों तक मनुष्य कोकेवल दूध पर आश्रित रहकर ब्रत रखना चाहिए और भक्तिपूर्वक कमलनयन भगवान् की पूजाकरनी चाहिए |
सिनीवाल्यां मृदालिप्य स्नायात्क्रोडविदीर्णया |
यदि लक्येत बै स्त्रोतस्येतं मन्त्रमुदीरयेत् ॥
२६॥
सिनीवाल्याम्--अमावस्या के दिन; मृदा--मिट्टी से; आलिप्य--शरीर में लेप करके; स्नायात्ू--नहाए; क्रोड-विदीर्णया--सूअर की दाढ़ से खोदी हुई; यदि--यदि; लभ्येत--उपलब्ध हो; बै--निस्सन्देह; स्नोतसि--प्रवाहमान नदी में; एतम् मन्त्रम्ू--इस मंत्र को; उदीरयेत्--उच्चारण करे |
यदि सूअर द्वारा खोदी गई मिट्टी उपलब्ध हो तो अमावस्या के दिन अपने शरीर पर इस मिट्टीका लेप करे और बहती नदी में स्नान करे |
स्नान करते समय निम्नलिखित मंत्र का उच्चारणकरे |
त्वं देव्यादिवराहेण रसाया: स्थानमिच्छता |
उद्धृतासि नमस्तुभ्य॑ पाप्मानं मे प्रणाशय ॥
२७॥
त्वमू--तुम; देवि--हे माता पृथ्वी; आदि-वराहेण--वराह के रूप में भगवान् द्वारा; रसाया:--ब्रह्माण्ड के निचले भाग से;स्थानम्--स्थान; इच्छता--चाहते हुए; उद्धृूता असि--ऊपर उठाई गई; नमः तुभ्यम्--तुम्हें मेरा नमस्कार है; पाप्मानम्--सारेपापकर्म तथा उनके फल; मे--मेरे; प्रणाशय--विनष्ट कर दो |
हे माता पृथ्वी! तुम्हारे द्वारा ठहरने के लिए स्थान पाने की इच्छा करने पर भगवान् ने वराहरूप में तुम्हें ऊपर निकाला था |
मैं प्रार्थना करता हूँ कि कृपा करके मेरे पापी जीवन के सारे'फलों को आप विनष्ट कर दें |
मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ |
निर्वर्तितात्मनियमो देवमर्चेत्समाहितः |
अर्चायां स्थण्डिले सूर्ये जले वह्लौ गुरावषि ॥
२८॥
निर्वर्तित--समाप्त; आत्म-नियम:--प्रक्षालन, मंत्रोच्चारण इत्यादि नैत्यिक कर्म; देवम्-- भगवान् को; अर्चेत्ू-पूजे;समाहित: --पूर्ण मनोयोग से; अर्चायाम्--अर्चाविग्रहों को; स्थण्डिले--वेदी को; सूर्य--सूर्य को; जले--जल को; वह्नौ--अग्नि को; गुरौ--गुरु को; अपि--निस्सन्देह
तत्पश्चात् वह अपने नित्य तथा नैमित्तिक आध्यात्मिक कार्य करे और तब बड़े ही मनोयोग सेभगवान् के अर्चाविग्रह की पूजा करे |
साथ ही बेदी, सूर्य, जल, अग्नि तथा गुरु को भी पूजे |
नमस्तुभ्यं भगवते पुरुषाय महीयसे |
सर्वभूतनिवासाय वासुदेवाय साक्षिणे ॥
२९॥
नमः तुभ्यमू--मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ; भगवते-- भगवान् को; पुरुषाय--परम पुरुष; महीयसे--सभी पुरूषों मेंश्रेष्ठ; सर्व-भूत-निवासाय--उस व्यक्ति को जो हर एक के हृदय में वास करता है; वासुदेवाय-- भगवान् को जो सर्वत्र निवासकरता है; साक्षिणे--सबके साक्षी
हे भगवान्, हे महानतम, हे सब के हृदय में वास करने वाले तथा जिनमें सभी जीव वासकरते हैं, हे प्रत्येक वस्तु के साक्षी, हे सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वव्यापी पुरुष वासुदेव! मैं आपको सादरनमस्कार करता हूँ |
नमोडव्यक्ताय सूक्ष्माय प्रधानपुरुषाय च |
चतुर्विशद््गुणज्ञाय गुणसड्ख्यानहेतवे ॥
३०॥
नमः--मैं आपको नमस्कार करता हूँ; अव्यक्ताय--जो भौतिक आँखों से नहीं देखे जाते; सूक्ष्माय--दिव्य; प्रधान-पुरुषाय--परम पुरुष को; च-- भी; चतु:-विंशत्--चौबीस; गुण-ज्ञाय-- तत्त्वों के ज्ञाता को; गुण-सड्ख्यान--सांख्ययोग पद्धति का;हेतवे--मूल कारण
हे परम पुरुष! मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ |
अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण आपभौतिक आँखों से कभी नहीं दिखते |
आप चौबीस तत्त्वों के ज्ञाता हैं और आप सांख्ययोगपद्धति के सूत्रपात-कर्ता हैं |
नमो द्विशीष्ष्णे त्रिपदे चतु: श्रुड्भराय तन्तवे |
सप्तहस्ताय यज्ञाय त्रयीविद्यात्मने नम: ॥
३१॥
नमः--मैं आपको नमस्कार करता हूँ; द्वि-शीष्णें--दो सिरों वाले; त्रि-पदे--तीन पाँव वाले; चतु:-श्रुज्ञाय--चार सींगों वाले;तन्तवे--विस्तार करने वाले; सप्त-हस्ताय--सात हाथों वाले; यज्ञाय--यज्ञ पुरुष को; त्रयी--वैदिक अनुष्ठानों के तीन गुण;विद्या-आत्मने--समस्त ज्ञान के स्वरूप भगवान् को; नम:ः--नमस्कार करता हूँ |
हे भगवान्! मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ जिनके दो सिर ( प्रायणीय तथा उदानीय ),तीन पाँव ( सवन-त्रय ), चार सींग ( चार वेद ) तथा सात हाथ ( सप्त छन्द यथा गायत्री ) हैं |
मैंआपको नमस्कार करता हूँ जिनका हृदय तथा आत्मा तीनों वैदिक काण्डों ( कर्मकाण्ड,ज्ञानकाण्ड तथा उपासना काण्ड ) हैं तथा जो इन काण्डों को यज्ञ के रूप में विस्तार देते हैं |
नमः शिवाय रुद्राय नम: शक्तिधराय च |
सर्वविद्याधिपतये भूतानां पतये नमः ॥
३२॥
नमः--मैं सादर नमस्कार करता हूँ; शिवाय--शिवजी नामक अवतार को; रुद्राय--रुद्र नामक अंश को; नमः--नमस्कार;शक्ति-धराय--समस्त शक्तियों के आगार; च--तथा; सर्व-विद्या-अधिपतये--समस्त ज्ञान के भंडार; भूतानाम्--सारे जीवोंके; पतये--परम स्वामी को; नमः--नमस्कार करता हूँ
हे शिव, हे रुद्र! मैं समस्त शक्तियों के आगार, समस्त ज्ञान के भंडार तथा प्रत्येक जीव केस्वामी आपको सादर नमस्कार करता हूँ |
नमो हिरण्यगर्भाय प्राणाय जगदात्मने |
योगैश्वर्यशरीराय नमस्ते योगहेतवे ॥
३३॥
नमः--मैं आपको नमस्कार करता हूँ; हिरण्यगर्भाय--चार सिरों वाले हिरण्यगर्भ अर्थात् ब्रह्मा के रूप में स्थित; प्राणाय--हरएक के जीवन-स्त्रोत; जगत्-आत्मने--सम्पूर्ण विश्व के परमात्मा; योग-ऐश्वर्य-शरीराय--ऐश्वर्य तथा योग शक्ति से पूर्ण शरीरवाले; नमः ते--आपको नमस्कार करता हूँ; योग-हेतवे--समस्त योगशक्ति के आदि स्वामी को |
हिरण्यगर्भ रूप में स्थित, जीवन के स्त्रोत, प्रत्येक जीव के परमात्मा स्वरूप आपको मैंसादर नमस्कार करता हूँ |
आपका शरीर समस्त योग के ऐश्वर्य का स्रोत है |
मैं आपको सादरनमस्कार करता हूँ |
नमस्त आदिदेवाय साक्षिभूताय ते नमः |
नारायणाय ऋषये नराय हरये नमः ॥
३४॥
नमः ते--आपको सादर नमस्कार करता हूँ; आदि-देवाय--आदि भगवान् को; साक्षि-भूताय--प्रत्येक के हृदय के भीतर हरबात के साक्षी स्वरूप; ते--तुम्हें; नम:--नमस्कार करता हूँ; नारायणाय--नारायण का अवतार धारण करने वाले; ऋषये --ऋषि को; नराय--मनुष्य के अवतार; हरये-- भगवान् को; नम:--मैं सादर नमस्कार करता हूँ |
मैं आदि भगवान्, प्रत्येक के हृदय में स्थित साक्षी तथा मनुष्य रूप में नर-नारायण ऋषि केअवतार आपको सादर नमस्कार करता हूँ |
हे भगवान्! मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ |
नमो मरकतश्यामवपुषेधिगतश्रिये |
केशवाय नमस्तुभ्यं नमस्ते पीतवाससे ॥
३५॥
नमः--मैं नमस्कार करता हूँ; मरकत-श्याम-वपुषे--जिनके शरीर का रंग मरकत मणि के समान श्यामल है; अधिगत-श्रिये--माता लक्ष्मी जिनके अधीन हैं; केशवाय--केशी असुर का वध करने वाले भगवान् केशव को; नमः तुभ्यम्--मैं आपकोनमस्कार करता हूँ; नमः ते--पुन:-पुनः नमस्कार करता हूँ; पीत-वाससे--पीताम्बर वाले |
हे पीताम्बरधारी भगवान्! मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ |
आपके शरीर का रंग मरकतमणि जैसा है और आप लक्ष्मीजी को पूर्णतः वश में रखने वाले हैं |
हे भगवान् केशव! मैंआपको सादर नमस्कार करता हूँ |
त्वं सर्ववरद: पुंसां वरेण्य वरदर्षभ |
अतस्ते श्रेयसे धीरा: पादरेणुमुपासते ॥
३६॥
त्वमू-तुम; सर्व-वर-दः--सभी प्रकार का वरदान देने वाले; पुंसामू--सारे जीवों को; वरेण्य--हे परम पूज्य; वर-द-ऋषभ--समस्त वरदान देने वालों में सर्वशक्तिमान; अत:--इस कारण से; ते--तुम्हारा; श्रेयसे--समस्त कल्याण के स्त्रोत; धीरा:--अत्यन्त गम्भीर; पाद-रेणुम् उपासते--चरणकमलों की धूल को पूजते हैं |
हे परम पूज्य भगवान्, हे वरदायकों में श्रेष् आप हर एक की इच्छाओं को पूरा कर सकतेहैं अतएव जो धीर हैं, वे अपने कल्याण के लिए आपके चरणकमलों की धूल को पूजते हैं |
अन्ववर्तन्त य॑ देवा: श्रीक्ष तत्पादपदायो: |
स्पृहयन्त इवामोदं भगवान्मे प्रसीदताम् ॥
३७॥
अन्ववर्तन्त--भक्ति में रत; यम्--जिसको; देवा:--सारे देवता; श्री: च--तथा लक्ष्मीजी; तत्-पाद-पद्ायो: --उन भगवान् केचरणकमलों का; स्पृहयन्त:--चाहते हुए; इब--सहृश; आमोदम्--दैवी आनन्द; भगवान्-- भगवान्; मे--मुझ पर;प्रसीदताम्-प्रसन्न हों |
सारे देवता तथा लक्ष्मीजी भी उनके चरणकमलों की सेवा में लगी रहती हैं |
निस्सन्देह, वेउन चरणकमलों की सुगन्ध का आदर करते हैं |
ऐसे भगवान् मुझ पर प्रसन्न हों |
एतैर्मन्त्रईघीकेशमावाहनपुरस्कृतम् |
अर्चयेच्छुद्धया युक्त: पाद्योपस्पर्शनादिभि: ॥
३८॥
एतै: मन्त्रै:--इन मंत्रों के उच्चारण करने से; हषीकेशम्--समस्त इन्द्रियों के स्वामी भगवान् को; आवाहन--बुलाना;पुरस्कृतम्--सभी प्रकार से सम्मान करते हुए; अर्चयेत्--पूजा करे; श्रद्धया--श्रद्धा तथा भक्ति के साथ; युक्त:--लगा हुआ;पाद्य-उपस्पर्शन-आदिभि: --पूजा की साज-सामग्री ( पाद्य, अर्घध्य, आदि ) द्वारा )
कश्यप मुनि ने आगे कहा : इन सभी मंत्रों के उच्चारण द्वारा भगवान् का श्रद्धा तथा भक्तिके साथ स्वागत करके एवं उन्हें पूजा की वस्तुएँ ( पाद्य तथा अर्घ्य ) अर्पित करके मनुष्य कोकेशव अर्थात् हषीकेश भगवान् कृष्ण की पूजा करनी चाहिए |
अर्चित्वा गन्धमाल्याद्यैः पयसा स्नपयेद्विभुम् |
वस्त्रोपवीताभरणपाद्योपस्पशनिस्तत: |
गन्धधूपादिभिश्चार्चेद्द्वादशाक्षरविद्यया ॥
३९॥
अर्चित्वा--इस प्रकार पूजा करके; गन्ध-माल्य-आद्यि:--अगुरु, फूल की माला आदि के द्वारा; पयसा--दूध से; स्नपयेत्--नहलाए; विभुम्-- भगवान् को; वस्त्र--वस्त्र; उपवीत--जनेऊ; आभरण--गहने; पाद्य--चरणकमलों को धोने के लिए प्रयुक्तजल; उपस्पर्शनै: --स्पर्श द्वारा; ततः--तत्पश्चात्; गन्ध--सुगंध; धूप--धूपबत्ती; आदिभि:--इत्यादि से; च--तथा; अर्चेत्--पूजा करे; द्वादश-अक्षर-विद्यया--बारह अक्षरों वाले मंत्र से |
सर्वप्रथम भक्त को द्वादश अक्षर मंत्र का उच्चारण करना चाहिए और फूल की माला, अगुरुइत्यादि अर्पित करने चाहिए |
इस प्रकार से भगवान् की पूजा करने के बाद भगवान् को दूध सेनहलाना चाहिए और उन्हें समुचित वस्त्र तथा यज्ञोपवीत ( जनेऊ ) पहनाकर गहनों से सजानाचाहिए |
तत्पश्चात् भगवान् के चरणों का प्रक्षालन करने के लिए जल अर्पित करके सुगंधितपुष्प, अगुरु तथा अन्य सामग्री से भगवान् की पुनः पूजा करनी चाहिए |
श्रृतं पयसि नेवेद्यं शाल्यन्नं विभवे सति |
ससर्पि: सगुडं दत्त्वा जुहुयान्मूलविद्यया ॥
४०॥
श्रुतम्--पकाया गया; पयसि--दूध में; नैवेद्यममू--अर्चाविग्रह को भेंट; शालि-अन्नमू--चावल; विभवे--यदि उपलब्ध हो;सति--इस प्रकार से; स-सर्पि:--घी के साथ; स-गुडम्-गुड़ के साथ; दत्त्वा--उन्हें प्रदान करके; जुहुयात्ू-- अग्नि मेंआहुतियाँ डाले; मूल-विद्यया--उसी द्वादशाक्षर मंत्र के उच्चारण के साथ-साथ |
यदि सामर्थ्य हो तो भक्त अर्चाविग्रह पर दूध में घी तथा गुड़ के साथ पकाये चावल चढ़ाए |
उसी मूल मंत्र का उच्चारण करते हुए यह सामग्री अग्नि में डाली जाये |
निवेदितं तद्धक्ताय दद्याद्धुब्जीत वा स्वयम् |
दत्त्वाचमनमर्चित्वा ताम्बूलं च निवेदयेत् ॥
४१॥
निवेदितम्-चढ़ाया हुआ प्रसाद; तत्-भक्ताय--उनके भक्त को; दद्यात्-दिया जाये; भुज्जीत--खाये; वा--अथवा; स्वयम्--खुद; दत्त्ता आचमनम्--हाथ तथा मुखमार्जन के लिए जल देकर; अर्चित्वा--पूजा करके; ताम्बूलम्ू--पान; च--भी;निवेदयेत्--प्रदान करे |
उसे चाहिए कि वह सारा प्रसाद या उसका कुछ अंश किसी वैष्णव को दे और तब कुछप्रसाद स्वयं ग्रहण करे |
तत्पश्चात् अर्चाविग्रह को आचमन कराए और तब पान सुपारी चढ़ाकरफिर से भगवान् की पूजा करे |
जपेदष्टोत्तरशतं स्तुवीत स्तुतिभि: प्रभुम् |
कृत्वा प्रदक्षिणं भूमौ प्रणमेहण्डवन्मुदा ॥
४२॥
जपेत्--मन ही मन उच्चारण करे; अष्टोत्तर-शतम्--एक सौ आठ बार; स्तुबीत--स्तुति करे; स्तुतिभि:--महिमा-स्तुतियों द्वारा;प्रभुमू-- भगवान् को; कृत्वा--करके ; प्रदक्षिणम्--प्रदक्षिणा; भूमौ-- भूमि पर; प्रणमेत्--प्रणाम करे; दण्डबत्--साष्टांग भूमिपर लोटकर; मुदा-प्रसन्नतापूर्वक
तत्पश्चात् उसे चाहिए कि वह मुँह में १०८ बार मंत्र का जप करे और भगवान् की महिमा कीस्तुतियाँ करे |
तब वह भगवान् की प्रदक्षिणा करे और अन्त में परम सन््तोष तथा प्रसन्नतापूर्वकभूमि पर लोटकर ( दण्डवत् ) प्रणाम करे |
कृत्वा शिरसि तच्छेषां देवमुद्दासयेत्तत: |
दव्यवरान्भोजयेद्विप्रान्यायसेन यथोचितम् ॥
४३ ॥
कृत्वा--चढ़ा करके; शिरसि--माथे पर; तत्-शेषाम्--सारा अवशिष्ट ( अर्चाविग्रह को चढ़ाया जल तथा फूल ); देवम्--अर्चाविग्रह को; उद्बासयेत्--पवित्र स्थान में ले जाकर फेंक देना चाहिए; ततः--तत्पश्चात्; द्वि-अवरान्--कम से कम दो;भोजयेत्--खिलाए; विप्रान्--ब्राह्मणों को; पायसेन--खीर से; यथा-उचितम्--जैसा उचित हो |
अर्चाविग्रह पर चढ़ाये गये जल तथा सभी फूलों को अपने सिर से छूने के बाद उन्हें किसीपवित्र स्थान पर फेंक दे |
तब कम से कम दो ब्राह्मणों को खीर का भोजन कराए |
भुझ्जीत तैरनुज्ञात: सेष्ट: शेषं सभाजितै: |
ब्रह्मचार्यथ तद्रात्रयां श्रो भूते प्रथमेडहनि ॥
४४॥
स्नातः शुचिर्यथोक्तेन विधिना सुसमाहितः |
'पयसा स्नापयित्वार्चेद्यावद्व्रतसमापनम् ॥
४५॥
भुझ्जीत--प्रसाद ग्रहण करे; तैः--उन ब्राह्मणों से; अनुज्ञातः-- अनुमति लेकर; स-इष्ट:--मित्रों तथा परिवार वालों के सहित;शेषम्-शेष बचा हुआ; सभाजितै:--उचित रूप से सम्मानित; ब्रह्मचारी --ब्रह्मचर्य त्रत का पालन; अथ--निस्सन्देह; ततू-रात््याम्ू--उस रात में; श्रः भूते--सबेरा होने पर; प्रथमे अहनि--पहले दिन; स्नात:--स्नान किया हुआ; शुच्रि:--पवित्र होकर;यथा-उक्तेन--जैसाकि पहले कहा जा चुका है; विधिना--विधिपूर्वक; सु-समाहित:--एकाग्र होकर; पयसा--दूध से;स्नापयित्वा--अर्चा विग्रह को स्नान कराकर; अर्चेत्ू--पूजा करे; यावत्--जब तक; ब्रत-समापनम्--पूजा की अवधि समाप्त नहो जाये |
जिन सम्मान्य ब्राह्मणों को भोजन कराया हो उनका भलीभाँति सत्कार करे और तब उनकीअनुमति से अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों सहित स्वयं प्रसाद ग्रहण करे |
उस रात में पूर्ण ब्रह्मचर्यका पालन करे और दूसरे दिन प्रातः स्नान करने के बाद अत्यन्त शुद्धता तथा ध्यान के साथअर्चाविग्रह को दूध से स्नान कराए और विस्तारपूर्वक पूर्वोक्त विधियों के अनुसार उनकी पूजाकरे |
पयोभक्षो व्रतमिदं चरेद्विष्णवर्चनाहत: |
पूर्ववज्जुहुयादरगिन ब्राह्मणांश्रापि भोजयेत् ॥
४६॥
पय:-भक्ष:--केवल दूध का पान करने वाला; ब्रतम् इदम्ू--यह ब्रत; चरेत्--सम्पन्न करे; विष्णु-अर्चन-आहत:--अत्यन्तश्रद्धा तथा भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णु की पूजा करते हुए; पूर्व-वत्--पहले की तरह; जुहुयातू--आहुतियाँ डाले; अग्निम्ू--अग्नि में; ब्राह्मणान्ू--ब्राह्मणों को; च अपि-- भी; भोजयेत्-- भोजन कराए
केवल दूधपान करते हुए और श्रद्धा तथा भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णु की पूजा करते हुएभक्त इस ब्रत का पालन करे |
उसे चाहिए कि वह अग्नि में हवन करे और पूर्वोक्त विधि सेब्राह्मणों को भोजन कराए |
एवं त्वहरहः कुर्याददूवादशाहं पयोव्रतम् |
हरेराराधनं होममरईणं द्विजतर्पणम् ॥
४७॥
एवम्--इस प्रकार; तु--निस्सन्देह; अहः अहः--दिन प्रतिदिन; कुर्यातू-करना चाहिए; द्वादइश-अहम्--बारह दिनों तक; पय:-ब्रतम्-पयक्रत; हरे: आराधनम्-- भगवान् की पूजा; होमम्--हवन करके; अर्हणम्--अर्चा विग्रह की पूजा; द्विज-तर्पणम्--भोजन कराकर ब्राह्मणों को प्रसन्न करना |
इस तरह बारह दिनों तक प्रतिदिन भगवान् का पूजन, नैत्यिक कर्म, हवन तथा ब्राह्मण-भोजन सम्पन्न कराकर यह पयोत्रत रखा जाये |
प्रतिपद्दिनमारभ्य यावच्छुक्लत्रयोदशीम् |
ब्रह्मचर्यमधःस्वप्नं स्नान॑ त्रिषवर्ण चरेत् ॥
४८ ॥
प्रतिपत् -दिनम्--प्रतिपत् के दिन; आरभ्य--प्रारम्भ करके; यावत्--जब तक; शुक्ल--शुक्लपक्ष की; त्रयोदशीम्--तेरस( एकादशी के दो दिन बाद ); ब्रह्मचर्यम्--पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन; अध:-स्वजम्--फर्श पर शयन; स्नानम्--स्नान; त्रि-सवनमू--तीन बार ( प्रातः, सायं तथा दोपहर में ); चरेत्ू--सम्पन्न करे |
प्रतिपदा से लेकर अगले शुक्लपक्ष की तेरस (शुक्ल त्रयोदशी ) तक पूर्ण ब्रह्मचर्य कापालन करे, फर्श पर सोये, प्रतिदिन तीन बार स्नान करे और इस ब्रत को सम्पन्न करे |
वर्जयेदसदालापं भोगानुच्चावचांस्तथा |
अहिंस्त्र: सर्वभूतानां वासुदेवपरायण: ॥
४९॥
वर्जयेत्--न करे; असत्-आलापमू--सांसारिक विषयों पर वृथा बातचीत; भोगान्--इन्द्रियतृप्ति; उच्च-अवचानू-- श्रेष्ठ यानिकृष्ट; तथा--और; अहिंस्त्र:--ईर्ष्यारहित होकर; सर्व-भूतानामू--सारे जीवों का; वासुदेव-परायण:-- भगवान् वासुदेव कामात्र भक्त बनकर |
इस अवधि में सांसारिक प्रपंचों या इन्द्रियतृप्ति के विषय पर अनावश्यक चर्चा न चलाये,वह सारे जीवों की ईर्ष्या से पूर्णतया मुक्त रहे और भगवान् वासुदेव का शुद्ध एवं सरल भक्तबने |
त्रयोदश्यामथो विष्णो: स्नपन॑ पञ्जञकैर्विभो: |
कारयेच्छास्त्रदष्टन विधिना विधिकोविदेः ॥
५०॥
त्रयोदश्याम्--तेरस को; अथो--तत्पश्चात्; विष्णो: -- भगवान् विष्णु का; स्नपनम्--स्नान कराना; पञ्ञकै:--पश्ञामृत द्वारा;विभो:-- भगवान्; कारयेत्--करे; शास्त्र-दृष्टेन--शास्त्रों द्वारा आदिष्ट; विधिना--विधि से; विधि-कोविदैः --विधि-विधानों कोजानने वाले पुरोहितों की सहायता से |
तत्पश्चात् शास्त्रविद् ब्राह्मणों की सहायता से शास्त्रों के आदेशानुसार शुक्लपक्ष की तेरस कोभगवान् विष्णु को पशञ्ञामृत ( दूध, मट्ठा, घी, चीनी तथा शहद ) से स्नान कराये |
पूजां च महतीं कुर्याद्वित्तशाठ्यविवर्जित: |
चर निरूप्य पयसि शिपिविष्टाय विष्णवे ॥
५१॥
सूक्तेन तेन पुरुष यजेत सुसमाहितः |
नैवेद्यं चातिगुणवद्द्यात्पुरुषतुष्टिदम् ॥
५२॥
पूजाम्ू--पूजा; च--भी; महतीम्--अत्यन्त तड़क-भड़क वाला; कुर्यात्ू-करे; वित्त-शाठ््य--कंजूसी की मनोवृत्ति;विवर्जित:--त्यागकर; चरुम्--यज्ञ में डाला गया अन्न; निरूप्प--ठीक से देखकर; पयसि--दूध के साथ; शिपिविष्टाय--प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित परमात्मा को; विष्णवे--विष्णु को; सूक्तेन--पुरुष-सूक्त नामक वैदिक मंत्रोच्चार से; तेन--उसकेद्वारा; पुरुषम्-- भगवान् की; यजेत--पूजा करे; सु-समाहित:--मनोयोग से; नैवेद्यमू-- अर्चाविग्रह को चढ़ाया गया भोजन;श़च--तथा; अति-गुण-वत्--समस्त सुस्वादु व्यंजन; दद्यात्--प्रदान करे; पुरुष-तुष्टि-दम्-- भगवान् को अत्यन्त प्रसन्न करनेवाली प्रत्येक वस्तु |
धन न खर्च करने की कंजूसी की आदत छोड़कर अन्तर्यामी भगवान् विष्णु की भव्य पूजाका आयोजन करे |
मनुष्य को चाहिए कि वह अत्यन्त मनोयोग से घी में पकाये अन्न तथा दूध सेआहुति ( हव्य ) तैयार करे और पुरुष-सूक्त मंत्रोच्चार करे और विविध स्वादों वाले भोजन भेंटकरे |
इस प्रकार मनुष्य को भगवान् का पूजन करना चाहिए |
आचार्य ज्ञानसम्पन्नं वस्त्राभरणधेनुभि: |
तोषयेह्त्विजश्चेव तद्विद्धयाराधनं हरे: ॥
५३॥
आचार्यम्-गुरु को; ज्ञान-सम्पन्नम्ू--आध्यात्मिक ज्ञान में बढ़ा-चढ़ा; वस्त्र-आभरण-थधेनुभि:--वस्त्र, गहने तथा अनेक गायोंसहित; तोषयेत्--तुष्ट करके; ऋत्विज: --गुरु द्वारा बताये गये पुरोहित; च एब--तथा; तत् विद्द्धि--उसे समझने का प्रयास करे;आराधनम्--पूजा; हरेः -- भगवान् की |
मनुष्य को चाहिए कि वह वैदिक साहित्य में पारंगत गुरु ( आचार्य ) को तुष्ट करे और उनकेसहायक पुरोहितों को (जो होता, उद््गाता, अध्वर्यु तथा ब्रह्म कहलाते हैं ) तुष्ट करे |
उन्हें वस्त्र,आभूषण तथा गाएँ देकर प्रसन्न करे |
यही विष्णु-आराधन अनुष्ठान है |
भोजसयेत्तान्गुणवता सदन्नेन शुचिस्मिते |
अन्यांश्व ब्राह्मणाउ्छक्त्या ये च तत्र समागता: ॥
५४॥
भोजयेत्-- प्रसाद बाँटे; तान्ू--उन सब को; गुण-बता--अच्छे भोजन से; सतू-अन्नेन--घी तथा दूध से बने भोजन से, जोअत्यन्त शुद्ध माना जाता है; शुचि-स्मिते--हे परम पवित्र स्त्री; अन्यान् च--अन्यों को भी; ब्राह्मणानू--ब्राह्मणों को; शकत्या--यथाशक्ति; ये-- जो; च-- भी; तत्र--वहाँ ( अनुष्ठानों में )) समागता: --एकत्र |
हे परम पवित्र स्त्री! मनुष्य को चाहिए कि वह ये सारे अनुष्ठान विद्वान आचार्यो केनिर्देशानुसार सम्पन्न करे और उन्हें तथा उनके पुरोहितों को तुष्ट करे |
उसे चाहिए कि प्रसादवितरण करके ब्राह्मणों को तथा वहाँ पर एकत्र हुए लोगों को भी तुष्ट करे |
दक्षिणां गुरवे दद्याहत्विग्भ्यश्च यथाहईत: |
अन्नाहेनाश्वपाकांश्व प्रीणयेत्समुपागतान् ॥
५५॥
दक्षिणाम्ू--धन या सोने का दान; गुरवे--गुरु को; दद्यातू--दे; ऋत्विग्भ्य:ः च--तथा गुरु द्वारा नियुक्त पुरोहितों को; यथा-अर्हतः--यथाशक्ति; अन्न-अद्येन-- प्रसाद वितरण द्वारा; आश्व-पाकान्--चंडाल तक को जो कुत्ते का माँस खाने के आदी हैं;च-भी; प्रीणयेत्--प्रसन्न करे; समुपागतान्--अनुष्ठान में एकत्र होने के कारण |
मनुष्य को चाहिए कि गुरु तथा सहायक पुरोहितों को वस्त्र, आभूषण, गाएँ तथा कुछ धनका दान देकर प्रसन्न करे |
तथा प्रसाद वितरण द्वारा वहाँ पर आये सभी लोगों को यहाँ तक किसबसे अधम व्यक्ति चण्डाल ( कुत्ते का माँस खाने वाले ) को भी तुष्ट करे |
भुक्तवत्सु च सर्वेषु दीनान््थकृपणादिषु |
विष्णोस्तत्प्रीणनं विद्वान्भुद्जीत सह बन्धुभि: ॥
५६॥
भुक्तवत्सु-- भोजन कराने के बाद; च--भी; सर्वेषु--वहाँ पर उपस्थित सब को; दीन--अत्यन्त निर्धन; अन्ध--अन्धा;कृपण--जो ब्राह्मण नहीं है; आदिषु--इत्यादि; विष्णो:--अन्तर्यामी भगवान् विष्णु का; तत्--वह ( प्रसाद ); प्रीणनम्--प्रसन्नकरते हुए; विद्वानू--इस दर्शन को जानने वाला; भुझ्जीत--स्वयं प्रसाद ग्रहण करे; सह--साथ; बन्धुभि:--मित्रों तथासम्बन्धियों के
मनुष्य को चाहिए कि वह दरिद्र, अन्धे, अभक्त तथा अब्राह्मण हर व्यक्ति को विष्णु-प्रसादबाँटे |
यह जानते हुए कि जब हर एक व्यक्ति पेट भरकर विष्णु-प्रसाद पा लेता है, तो भगवान्विष्णु परम प्रसन्न होते हैं, यज्ञकर्ता को अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों सहित प्रसाद ग्रहण करनाचाहिए |
नृत्यवादित्रगीतैश्व स्तुतिभि: स्वस्तिवाचकै: |
कारयेत्तत्कथाभिश्च पूजां भगवतोउन्वहम् ॥
५७॥
नृत्य--नाच कर; वादित्र--बाजा ( ढोल ) बजाकर; गीतैः--तथा गाकर; च-- भी ; स्तुतिभि: -- शुभ मंत्रोच्चार द्वारा; स्वस्ति-वाचकै: --स्तुति करके ; कारयेत्ू--सम्पन्न करे; तत्-कथाभि: -- भागवत, भगवद्गीता तथा इसी प्रकार का साहित्य सुनाकर;च--भी; पूजाम्-- पूजा; भगवतः -- भगवान् विष्णु की; अन्वहम्--प्रतिदिन ( प्रतिपदा से त्रयोदशी तक )॥
प्रतिपदा से त्रयोदशी तक इस अनुष्ठान को मनुष्य प्रतिदिन नाच, गाना, बाजा, स्तुति तथाशुभ मंत्रोच्चार एवं श्रीमद्भागवत के पाठ के साथ-साथ जारी रखे |
इस प्रकार मनुष्य भगवान्की पूजा करे |
एतत्पयोब्रतं नाम पुरुषाराधनं परम् |
पितामहेनाभिहितं मया ते समुदाहतम् ॥
५८॥
एतत्--यह; पयः-ब्रतम्--पयोत्रत नामक अनुष्ठान; नाम--नामक; पुरुष-आराधनम्-- भगवान् की पूजा विधि; परम्- श्रेष्ठ;पितामहेन--मेरे पितामह द्वारा; अभिहितम्--कही गई; मया--मेरे द्वारा; ते--तुमको; समुदाहतम्--विस्तार के साथ वर्णित |
यह धार्मिक अनुष्ठान पयोत्रत कहलाता है, जिसके द्वारा भगवान् की पूजा की जा सकती है |
यह ज्ञान मुझे अपने पितामह ब्रह्माजी से मिला और अब मैंने विस्तार के साथ इसका वर्णन तुमसेकिया है |
त्वं चानेन महाभागे सम्यक्नीणेंन केशवम् |
आत्मना शुद्धभावेन नियतात्मा भजाव्ययम् ॥
५९॥
त्वम् च--तुम भी; अनेन--इस विधि से; महा-भागे--हे भाग्यशालिनी; सम्यक् चीर्णेन-- भलीभाँति सम्पन्न करने पर;केशवम्--केशव को; आत्मना--अपने; शुद्ध-भावेन--शुद्ध मन से; नियत-आत्मा--अपने को वश में करते हुए; भज--पूजाकरते रहो; अव्ययम्-- भगवान् की, जो अक्षय हैं |
हे परम भाग्यशालिनी! तुम अपने मन को शुद्ध भाव में स्थिर करके इस पयोत्रत विधि कोसम्पन्न करो और इस तरह अच्युत भगवान् केशव की पूजा करो |
अयं बै सर्वयज्ञाख्य: सर्वत्रतमिति स्मृतम् |
तपःसारमिदं भद्रे दानं चेश्वरतर्पणम् ॥
६०॥
अयमू्--यह; वै--निस्सन्देह; सर्व-यज्ञ--सभी प्रकार का धार्मिक अनुष्ठान तथा यज्ञ; आख्य:--कहलाता है; सर्व-ब्रतम्--सारेधार्मिक अनुष्ठान; इति--इस प्रकार; स्मृतम्ू--समझा जाकर; तपः-सारम्ू--सारी तपस्याओं का सार; इृदम्--यह; भद्रे--हेउत्तम स्त्री; दानम्-दान के कार्य; च--तथा; ईश्वर-- भगवान्; तर्पणम्--प्रसन्न करने की विधि |
यह पयोत्रत सर्वयज्ञ भी कहलाता है |
दूसरे शब्दों में, इस यज्ञ को सम्पन्न कर लेने पर अन्यसारे यज्ञ स्वतः सम्पन्न हो जाते हैं |
इसे समस्त अनुष्ठानों में सर्वश्रेष्ठ भी माना गया है |
हे भद्गे! यहसमस्त तपस्याओं का सार है और दान देने तथा परम नियन्ता को प्रसन्न करने की विधि है |
त एवं नियमा: साक्षात्त एव च यमोत्तमा: |
तपो दान ब्रतं यज्ञो येन तुष्यत्यधोक्षज: ॥
६१॥
ते--वे; एव--निस्सन्देह; नियमा:--सारे विधि-विधान; साक्षात्- प्रत्यक्ष; ते--वे; एबव--निस्सन्देह; च-- भी; यम-उत्तमा: --इन्द्रियों को वश में करने की सर्वश्रेष्ठ विधि; तप:--तपस्या; दानमू--दान; ब्रतम्--व्रत; यज्ञ:--यज्ञ; येन--जिस विधि से;तुष्यति--प्रसन्न होता है; अधोक्षज:--भौतिक इन्द्रियों से अनुभव न हो सकने वाले भगवान् |
अधोक्षज नामक दिव्य भगवान् को प्रसन्न करने की यह सर्वोत्तम विधि है |
यह समस्तविधि-विधानों में श्रेष्ठ है, यह सर्व श्रेष्ठ तपस्या है, दान देने की और यज्ञ की सर्वश्रेष्ठ विधि है |
तस्मादेतदब्तं भद्दे प्रयता श्रद्धयाचर |
भगवान्परितुष्टस्ते वरानाशु विधास्यति ॥
६२॥
तस्मात्ू--अतएव; एतत्--यह; ब्रतम्--त्रत का पालन; भद्रे--प्रिय भद्र स्त्री; प्रयता--विधि-विधानों का पालन करके;श्रद्धबा-- श्रद्धा सहित; आचर--सम्पन्न करो; भगवान्-- भगवान्; परितुष्ट:--अत्यन्त प्रसन्न होकर; ते--तुमको; वरान्--वर,आशीर्वाद; आशु--शीघ्र; विधास्यति--प्रदान करेंगे |
अतएब हे भद्रे! तुम विधि-विधानों का हढ़ता से पालन करते हुए इस अनुष्ठानिक ब्रत कोसम्पन्न करो |
इस विधि से परम पुरुष तुम पर शाधघ्र ही प्रसन्न होंगे और तुम्हारी सारी इच्छाओं कोपूरा करेंगे |
