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अध्याय पंद्रह: बलि महाराज ने स्वर्गीय ग्रहों पर विजय प्राप्त की

8.15श्रीराजोबाचबले: पदत्रयं भूमेः कस्माद्धरिरयाचत |

भूतेश्वर कृपणवल्लब्धार्थोडपि बबन्ध तम्‌ ॥

१॥

एतद्वेदितुमिच्छामो महत्कौतूहलं हि नः |

याच्जे श्वरस्य पूर्णस्य बन्धनं चाप्यनागस: ॥

२॥

श्री-राजा उवाच--राजा ने कहा; बले:--बलि महाराज के; पद-त्रयम्‌--तीन पग; भूमेः-- भूमि के; कस्मात्‌--क्यों; हरिः --भगवान्‌ ( वामन के रूप में ) ने; अयाचत--माँगा; भूत-ई श्वरः --सारे ब्रह्माण्ड के स्वामी; कृपण-वत्‌--गरीब मनुष्य की तरह;लब्ध-अर्थ:--दान पाकर; अपि--यद्यपि; बबन्ध--बन्दी बना लिया; तमू--उसको ( बलि को ); एतत्‌--यह सब; वेदितुम्‌--समझने के लिए; इच्छाम:--हम इच्छा करते हैं; महत्‌--महान्‌; कौतूहलम्‌-- उत्सुकता; हि--निस्सन्देह; नः--हमारा; याच्ञा--भीख; ईश्वरस्थ-- भगवान्‌ की; पूर्णस्य--परम पूर्ण; बन्धनम्‌ू--बाँधते हुए; च-- भी; अपि--यद्यपि; अनागस:--निर्दोष कोमहाराज परीक्षित ने पूछा : भगवान्‌ सबके स्वामी हैं |

तो फिर उन्होंने निर्धन व्यक्ति की भाँतिबलि महाराज से तीन पग भूमि क्यों माँगी और जब उन्हें मुँहमाँगा दान मिल गया तो फिर उन्होंनेबलि महराज को बन्‍्दी क्‍यों बनाया? मैं इन विरोधाभासों के रहस्य को जानने के लिए अत्यन्तउत्सुक हूँ |

श्रीशुक उबाचपराजितश्रीरसुभिश्च हापितोहीन्द्रेण राजन्भूगुभि: स जीवित: |

सर्वात्मना तानभजद्धूगून्बलि:शिष्यो महात्मार्थनिवेदनेन ॥

३॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; पराजित--हराया जाकर; श्री:--ऐश्वर्य; असुभि: च--तथा प्राण का;हापितः--विहीन होकर; हि--निस्सन्देह; इन्द्रेण--राजा इन्द्र द्वारा; राजनू--हे राजा; भूगुभि:-- भूगुमुनि के बंशजों द्वारा; सः--वह ( बलि महाराज ); जीवित:--पुनः जीवनदान दिये जाने पर; सर्व-आत्मना--पूर्णतया अधीन होकर; तान्‌ू--उनको;अभजतू--पूजा की; भृगून्‌-- भूगुमुनि के वंशजों को; बलि:ः--बलि महाराज; शिष्य:--शिष्य; महात्मा--महात्मा; अर्थ-निवेदनेन--उन्हें सब कुछ देकर

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा! जब बलि का सारा ऐश्वर्य छिन गया और वे युद्ध मेंमारे गये तो भूगुमुनि के एक वंशज शुक्राचार्य ने उन्हें फिर से जीवित कर दिया |

इससे महात्माबलि शुक्राचार्य के शिष्य बन गये और अपना सर्वस्व अर्पित करके अत्यन्त श्रद्धापूर्वक उनकीसेवा करने लगे |

त॑ ब्राह्मणा भूगवः प्रीयमाणाअयाजयन्विश्वजिता त्रिणाकम्‌ |

जिगीषमाणं विधिनाभिषिच्यमहाभिषेकेण महानुभावा: ॥

४॥

तम्‌--उसको ( बलि महाराज को ); ब्राह्मणा: --सरे ब्राह्मणों ने; भूगवः--भभूगुमुनि के वंशज; प्रीयमाणा:--प्रसन्न होकर;अयाजयनू--यज्ञ सम्पन्न करने में लगा दिया; विश्वजिता--विश्वजित नामक; त्रि-नाकम्‌--स्वर्गलोक; जिगीषमाणम्‌--जीतने कीइच्छा से; विधिना--विधिपूर्वक; अभिषिच्य--शुद्ध करने के बाद; महा-अभिषेकेण--महान्‌ अभिषेक अनुष्ठान में स्नानकराकर; महा-अनुभावा:--उच्च ब्राह्मण

भूगुमुनि के ब्राह्मण वंशज बलि महाराज पर अत्यन्त प्रसन्न हो गए जो इन्द्र का साम्राज्यजीतना चाह रहे थे |

अतएव उन्होंने उन्हें अनुष्ठानपूर्वक शुद्ध करके तथा स्नान कराकर विश्वजितनामक यज्ञ करने में लगा दिया |

ततो रथ: कागझ्जनपट्टनद्धोहयाश्च हर्य श्वतुरड्रवर्णा: |

ध्वजश्न सिंहेन विराजमानोहुताशनादास हविर्भिरिष्टात्‌ ॥

५॥

ततः--तत्पश्चात्‌; रथ:--रथ; काझ्जनन--सोने से युक्त; पट्ट--रेशमी वस्त्र; नद्ध:--लिपटा हुआ; हया: च--घोड़े भी; हर्यश्व-तुरड्र-वर्णा:--इन्द्र के घोड़ों जैसे रंग का ( पीला ); ध्वज: च--ध्वजा भी; सिंहेन--सिंहचिह्न से युक्त; विराजमान:--उपस्थित;हुत-अशनातू-- प्रज्वलित अग्नि से; आस--था; हविर्भि: --घी की आहुति द्वारा; इष्टातू- पूजा किया |

जब यज्ञ-अग्नि में घी की आहुति दी गईं तो अग्नि से स्वर्ण तथा रेशम से आच्छादित एकदेवी रथ प्रकट हुआ |

साथ ही इन्द्र के घोड़ों जैसे पीले घोड़े तथा सिंह चिन्ह से अंकित एकध्वजा प्रकट हुए |

धनुश्न दिव्यं पुरटोपनद्धंतूणावरिक्तौ कबचं च दिव्यम्‌ |

पितामहस्तस्य ददौ च माला-मम्लानपुष्पां जलजं च शुक्र: ॥

६॥

धनु:--धनुष; च--भी; दिव्यमू-- असाधारण; पुरट-उपनद्धम्‌--सोने से मढ़ा; तृणौ--दो तरकस; अरिक्तौ--अच्युत; कवचम्‌च--तथा कवच; दिव्यम्‌--दिव्य; पितामहः तस्य--उसके पितामह, प्रह्माद महाराज ने; ददौ--दिया; च--तथा; मालामू--माला; अम्लान-पुष्पाम्‌--न मुरझाने वाले फूलों की; जल जम्‌ू--शंख ( जल में उत्पन्न ); च-- भी; शुक्र: --शुक्राचार्य ने |

उस यज्ञ अग्नि से एक सुनहरा धनुष, अच्युत बाणों से युक्त दो तरकस तथा एक दिव्यकवच भी प्रकट हुए |

बलि महाराज के पितामह प्रह्नाद महाराज ने उन्हें कभी न मुरझाने वालेफूलों की माला दी और शुक्राचार्य ने एक शंख प्रदान किया |

एवं स विप्रार्जितयोधनार्थ-स्तेः कल्पितस्वस्त्ययनोथ विप्रान्‌ |

प्रदक्षिणीकृत्य कृतप्रणाम:प्रह्मदमामन्त्य नमश्चकार ॥

७॥

एवम्‌--इस प्रकार; सः--वह ( बलि महाराज ); विप्र-अर्जित--ब्राह्मणों की कृपा से प्राप्त; योधन-अर्थ:--युद्ध के लिएसामग्री से लैस; तैः--उन ( ब्राह्मणों ) के द्वारा; कल्पित--सलाह; स्वस्त्ययन: --अनुष्ठान; अथ--जिस तरह; विप्रान्‌--सारेब्राह्मणों ( शुक्राचार्य तथा अन्यों ) को; प्रदक्षिणी-कृत्य--परिक्रमा करके; कृत-प्रणाम: --नमस्कार करके; प्रह्नदम्‌-प्रह्मदमहाराज को; आमन्त्रय--सम्बोधित करके; नमः-चकार--नमस्कार किया |

ब्राह्मणों की सलाह के अनुसार विशेष अनुष्ठान सम्पन्न कर चुकने तथा उनकी कृपा से युद्ध-सामग्री प्राप्त कर चुकने के बाद, महाराज बलि ने ब्राह्मणों की प्रदक्षिणा की और उन्हें नमस्कारकिया |

उन्होंने प्रहाद महाराज को भी नमस्कार किया |

अथारुह्म रथं दिव्यं भृगुदत्तं महारथ: |

सुस्त्रग्धरोथ सन्नह्म धन्वी खड़्गी धृतेषुधि: ॥

८॥

हेमाड्रदलसतद्वाहुः स्फुरन्मकरकुण्डलः |

रराज रथमारूढो धिष्ण्यस्थ इब हव्यवाद ॥

९॥

अथ--त्पश्चात्‌; आरुह्म--चढ़कर; रथम्‌--रथ पर; दिव्यम्‌--दैवी; भृगु-दत्तम्‌--शुक्राचार्य द्वारा दिया गया; महा-रथ: --महान्‌ सारथी बलि महाराज; सु-सत्रकु-धरः --सुन्दर माला से सुशोभित; अथ--इस तरह; सन्नह्य --कवच से शरीर ढककर;धन्वी--धनुष से लैस होकर; खड़्गी--तलवार धारण किये; धृत-इषुधि:--तरकस धारण किये; हेम-अड्भद-लसतू-बाहु: --अपनी भुजाओं में सुनहरे कड़ों से सुशोभित; स्फुरत्‌ू-मकर-कुण्डल:--मरकत के समान चमकीले कुण्डलों से सज्जित; रराज--प्रकाशित कर रहा था; रथम्‌ आरूढ:--रथ पर चढ़कर; धिष्ण्य-स्थ:--यज्ञवेदी पर स्थित होकर; इब--सहश; हव्य-वाट्‌--पूज्य अग्नि

तब शुक्राचार्य द्वारा दिये गये रथ पर सवार होकर सुन्दर माला से विभूषित बलि महाराज नेअपने शरीर में सुरक्षा-कवच धारण किया, अपने को बाणों से लैस किया, एक तलवार तथातूणीर ( तरकस ) लिया |

जब वे रथ में आसन ग्रहण कर चुके तो सुनहरे कड़ों से विभूषित बाहोंतथा मरकत मणि के कुण्डलों से विभूषित कानों सहित वे पूजनीय अग्नि की तरह चमक रहेथे |

तुल्यैश्वर्यजल श्रीभि: स्वयूथै्देत्ययूथपै: |

पिबद्धिरिव खं दृग्भिर्दहद्धि:ः परिधीनिव ॥

१०॥

वबृतो विकर्षन्महतीमासुरीं ध्वजिनीं विभु: |

ययाविन्द्रपुरीं स्वृद्धां कम्पयन्निव रोदसी ॥

११॥

तुल्य-ऐश्वर्य--ऐश्वर्य में समान; बल--शक्ति में; श्रीभि:--तथा सौन्दर्य में; स्व-यूथेः--अपने आदमियों से; दैत्य-यूथ-पैः--तथाअसुरों के प्रमुखों से; पिबद्धि:--पीते हुए; इब--मानो; खम्‌--आकाश को; दृग्भि:ः--दृष्टि से; दहर्द्धिः--जलती हुई;परिधीन्‌--सारी दिशाएँ; इब--मानो; वृत:--घिरा हुआ; विकर्षन्‌--आकृष्ट करती; महतीम्‌ू--महान्‌; आसुरीम्‌-- आसुरी;ध्वजिनीम्‌--सैनिकों को; विभुः--अत्यन्त शक्तिशाली; ययौ--गया; इन्द्र-पुरीम्‌--राजा इन्द्र की राजधानी में; सु-ऋद्धाम्‌--अत्यन्त ऐश्वर्यशाली; कम्पयन्‌--हिलाते हुए; इब--मानो; रोदसी --सारे संसार की धरती को |

जब वे अपने सैनिकों तथा असुर-नायकों समेत एकत्र हुए जो बल, ऐश्वर्य एवं सुन्दरता मेंउन्हीं के समान थे तो ऐसा लग रहा था मानो वे आकाश को निगल जायेंगे और अपनी दृष्टि सेसारी दिशाओं को जला देंगे |

इस तरह असुर-सैनिकों को एकत्र करके बलि महाराज ने इन्द्र कीऐश्वर्यमयी राजधानी के लिए प्रस्थान किया |

निस्सन्देह, ऐसा लग रहा था मानो वे सारे जगत कोकंपायमान कर देंगे |

रम्यामुपवनोद्यानै: श्रीमद्धिर्नन्दनादिभिः |

कूजद्विहड्रमिथुनेर्गायन्मत्तमधुव्रते: |

प्रवालफलपुष्पोरु भारशाखामरद्रुमै: ॥

१२॥

रम्यामू--सुहावने; उपवन--फलों के बागों; उद्यानै:ः--तथा बगीचों से युक्त; श्रीमद्धि:ः--देखने में अत्यन्त सुन्दर; नन्दन-आदिभि:--यथा नन्दन; कूजत्‌--चहचहाते; विहड्ग--पक्षी; मिथुनै:--जोड़ों समेत; गायत्‌--गाते हुए; मत्त--मतवाले; मधु-ब्रतः--मधुमक्खियों से; प्रवाल--पत्तियों का; फल-पुष्प--फूल तथा फल; उरू-- भारी; भार-- भार सहन करते हुए; शाखा--जिसकी शाखाएँ; अमर-ब्रुमैः -- अमर वृक्षों सहित |

राजा इन्द्र की पुरी सुहावने बाग बगीचों से, यथा नन्दन बाग से परिपूर्ण थी |

फूलों, पत्तियोंतथा फलों के भार से उनके शाश्वत वृक्षों की शाखाएँ नीचे झुकी हुई थीं |

इन उद्यानों में चहकतेपक्षियों के जोड़े तथा गाती मधुमक्खियाँ आती जाती थीं |

वहाँ का सारा वायुमण्डल अत्यन्तदिव्य था |

हंससारसचक्राह्कारण्डवकुलाकुला: |

नलिन्यो यत्र क्रीडन्ति प्रमदा: सुरसेविता: ॥

१३॥

हंस--हंस; सारस--सारस; चक्राह्--चकई, चकवा; कारण्डब--तथा जल मुर्गाबी; कुल--समूहों में; आकुला:--संकुलित;नलिन्य:--कमल के फूल; यत्र--जहाँ; क्रीडन्ति--खेलते हैं; प्रमदा:--सुन्दर स्त्रियाँ; सुर-सेविता: --देवताओं द्वारा रक्षित |

उद्यानों में देवताओं द्वारा रक्षित सुन्दर स्त्रियाँ खेलती थीं जिनके कमल-ताल हंसों, सारसों,अक्रवाकों तथा बत्तखों से भरे हुए थे |

आकाश गजड़या देव्या वृतां परिखभूतया |

प्राकारेणाग्निवर्णेन साट्टालेनोन्नतेन च ॥

१४॥

आकाश-गड़या-- आकाश गंगा नामक गंगाजल से; देव्या--सदैव पूजित देवी; वृताम्‌--घिरी हुईं; परिख-भूतया--खाई केरूप में ; प्राकरेण-- चहारदीवारी से; अग्नि-वर्णेन-- अग्नि की तरह; स-अट्टालेन--लड़ने के स्थानों सहित; उन्नतेन-- अत्यन्तऊँचे; च--तथा

वह पुरी आकाशगंगा नामक गंगाजल से पूर्ण खाइयों द्वारा तथा अग्नि जैसे रंग वाली एकअत्यन्त ऊँची दीवाल से घिरी हुई थी |

इस दीवाल पर लड़ने के लिए मुंडेर बने थे |

रुक्‍्मपट्टकपाटै श्ष द्वारे: स्फटिकगोपुरै: |

जुष्टां विभक्तप्रपथां विश्वकर्मविनिर्मिताम्‌ू ॥

१५॥

रुक्‍्म-पट्ट--सोने की पत्तरों वाले; कपाटैः--किवाड़ों से; च--तथा; द्वारैः--दरवाजों से; स्फटिक-गोपुरैः--उत्कृष्ट संगमरमरके बने फाटकों से युक्त; जुष्टाम्‌--जुड़े; विभक्त-प्रपथधाम्‌--अनेक सार्वजनिक सड़कों से; विश्वकर्म-विनिर्मिताम्‌--स्वर्ग केशिल्पी विश्वकर्मा द्वारा निर्मित

उसके दरवाजे ठोस सोने के पत्तरों से बने थे और फाटक उत्कृष्ट संगमरमर के थे |

ये सभीविभिन्न जन-मार्गो से जुड़े थे |

पूरी नगरी का निर्माण विश्वकर्मा ने किया था |

सभाचत्वररथ्याढ्यां विमानैर्न्यबुदर्युताम्‌ |

श्रुद्राटकैर्मणिमयैर्वज़विद्रुमबेदिभि: ॥

१६॥

सभा--सभाभवन; चत्वर--आंगन; रथ्य--तथा सार्वजनिक मार्गों से युक्त; आढ्याम्‌--ऐश्वर्यशाली; विमानै:--वायुयानों से;न्यर्बुदै:--दस करोड़ से कम नहीं; युताम्‌--से युक्त; श्रुड़ु-आटकै:--चौराहों से युक्त; मणि-मयैः--मणियों से बना; वज्ञ--हीरों के बने; विद्रुम--तथा मूंगे के बने; वेदिभि:--बैठने के स्थानों सहित

यह नगरी आँगनों, चौ मार्गों, सभाभवनों तथा कम से कम दस करोड़ विमानों से पूर्ण थी |

चौराहे मोती से बने थे और भी हीरे तथा मूँगे से बने थे |

यत्र नित्यवयोरूपा: श्यामा विरजवाससः |

भ्राजन्ते रूपवन्नार्यो हार्चिभिरिव वह्ययः ॥

१७॥

यत्र--उस नगरी में; नित्य-वयः-रूपा:--सदैव सुन्दर तथा तरुण बनी रहने वाली; श्यामा:--श्यामा के गुणों वाली; विरज-वासस:--सदैव स्वच्छ वस्त्र पहने; भ्राजन्ते--चमचमाती रहती हैं; रूप-वत्‌--अच्छी तरह सजी हुई; नार्य:--स्त्रियाँ; हि--निश्चयही; अर्चिर्भि:-- अनेक ज्वालाओं से युक्त; इब--सहृश; वहृयः--अग्नियाँ |

उस पुरी में नित्य सुन्दर तथा तरुण स्त्रियाँ स्वच्छ वस्त्र पहने ज्वालाओं से युक्त अग्नियों कीभाँति चमक रही थीं |

उन सब में शयामा के गुण विद्यमान थे॥

सुरस्त्रीकेशविभ्रष्टनवसौगन्धिकस्त्रजाम्‌ |

यत्रामोदमुपादाय मार्ग आवाति मारुतः ॥

१८॥

सुर-स्त्री--देवताओं की स्त्रियों के; केश--बालों से; विभ्रष्ट--गिरा हुआ; नव-सौगन्धिक--ताजे महकते फूलों से बने;सत्रजामू--फूलों की मालाओं की; यत्र--जिसमें; आमोदम्‌--सुगन्धि; उपादाय--ले जाकर; मार्गे--सड़कों पर; आवाति--बहता है; मारुत:--मन्द पवन |

उस पुरी की सड़कों में से होकर बहने वाला मन्द समीर देवताओं की स्त्रियों के बालों सेगिरे फूलों की सुंगधि से युक्त था |

हेमजालाक्षनिर्गच्छद्धूमेनागुरुगन्धिना |

पाण्डुरेण प्रतिच्छन्नमार्गे यान्ति सुरप्रिया: ॥

१९॥

हेम-जाल-अक्ष--सुनहरी जाली से बनी छोटी सुन्दर खिड़कियों से; निर्गच्छत्‌--निकलकर, उठकर; धूमेन-- धुएँ से; अगुरु-गन्धिना--अगुरु जलने से सुगन्धित; पाण्डुरेण--अत्यन्त श्वेत; प्रतिच्छन्न--ढका हुआ; मार्गे--सड़क पर; यान्ति--गुजरती हैं;सुर-प्रिया:--सुन्दर अप्सराएँ, दैवी बालाएँ |

अप्सराएँ जिन सड़कों से होकर गुजरती थीं वे अगुरु के श्वेत सुगन्धित धुएँ से ढकी हुई थींजो सुनहरी तारकशी वाली खिड़कियों से निकल रहा था |

मुक्तावितानर्मणिहेमकेतुभि-नॉनापताकावलभीभिरावृताम्‌ |

शिखण्डिपारावतभूड्रनादितांवैमानिकस्त्रीकलगीतमड्रलाम्‌ ॥

२०॥

मुक्ता-वितानैः:--मोतियों से सजे मण्डपों से; मणि-हेम-केतुभि:ः--मोती तथा सोने से बनी झंडियों से; नाना-पताका--तरह-तरह के ध्वजों वाला; वलभीभि:--महलों की गुम्बदों सहित; आवृताम्‌--ढका हुआ; शिखण्डि--मोर जैसे पक्षियों; पारावत--कबूतर; भूड़-- भौरे; नादिताम्‌ू-- अपनी-अपनी गुंजार करते; वैमानिक--विमानों में चढ़कर; स्त्री--स्त्रियों का; कल-गीत--सामूहिक गान से; मड्रलाम्‌--कल्याण से पूरित |

नगरी में मोतियों से सजे चँदोवे की छाया पड़ रही थी और महलों की गुम्बदों में मोती तथासोने की पताकाएँ थीं |

वह नगरी सदा मोरों, कबूतरों तथा भौरों की ध्वनि से गूँजती रहती थी |

उसके ऊपर विमान उड़ते रहते थे, जो कानों को अच्छे लगने वाले मधुर गीतों का निरन्तर गायनकरने वाली सुन्दर स्त्रियों से भरे रहते थे |

मृदड़शझ्जानकदुन्दुभिस्वनै:सतालवीणामुरजेष्टवेणुभि: |

नृत्यै: सवाद्यरुपदेवगीतकै -मनोरमां स्वप्रभया जितप्रभाम्‌ ॥

२१॥

मृदड्र--- ढोल; शद्भु--शंख; आनक-दुन्दुभि-- तथा दमामों के; स्वनै:--शब्दों से; स-ताल--पूर्ण ताल में; वीणा--वीणा;मुरज--एक प्रकार का ढोल; इृष्ट-वेणुभि:--वंशी की सुन्दर ध्वनि के साथ-साथ; नृत्यैः--नृत्य सहित; स-वाद्यैः--बाजोंसहित; उपदेव-गीतकै:--गौण देवताओं यथा गन्धर्वों के गीतों सहित; मनोरमाम्‌--सुन्दर तथा सुहावना; स्व-प्रभया--अपने तेजसे; जित-प्रभाम्‌--साक्षात्‌ सुन्दरता जीत ली गई |

वह नगरी मृदंग, शंख, दमामे, वंशी तथा तार वाले सुरीले वाद्ययंत्रों के समूहवादन के स्वरोंसे पूरित थी |

वहाँ निरन्तर नृत्य चलता रहता था और गन्धर्वगण गाते रहते थे |

इन्द्रपुरी की संयुक्तसुन्दरता साक्षात्‌ सुन्दरता ( छटा ) को जीत रही थी |

यां न ब्रजन्त्यधर्मिष्ठा: खला भूतद्गुह: शठा: |

मानिनः कामिनो लुब्धा एभिहींना ब्रजन्ति यत्‌ ॥

२२॥

यामू--नगरी की सड़कों में; न--नहीं; ब्रजन्ति--जाते हैं; अधर्मिष्ठा:--अधर्मी लोग; खला:--दुष्ट, ईर्ष्यालु; भूत-ब्रुह:-- अन्यजीवों पर उग्र भाव रखने वाले; शठा:--वंचक, धोखेबाज; मानिन:--झूठी प्रतिष्ठा वाले; कामिन: --कामी; लुब्धा:--लालची;एमिः--ये; हीना: --से पूर्णतः रहित; ब्रजन्ति--घूमते हैं; यत्‌--मार्ग पर |

जो पापी, ईर्ष्यालु, अन्य जीवों के प्रति उग्र, चालाक, मिथ्या अभिमानी, कामी या लालचीथे वे उस नगरी में प्रवेश नहीं कर सकते थे |

वहाँ रहने वाले सभी निवासी इन दोषों से रहित थे |

तां देवधानीं स वरूधिनीपतिर्‌बहिः समन्ताद्गुरुधे पृतन्‍्यया |

आचार्यदत्तं जलजं महास्वनंदध्मौ प्रयुज्न्भयमिन्द्रयोषिताम्‌ ॥

२३॥

तामू--उस; देव-धानीम्‌--इन्द्र के निवास स्थान को; सः--वह ( बलि महाराज ); वरूथिनी-पतिः --सैनिकों का नायक;बहिः--बाहर; समन्तात्‌--सभी दिशाओं से; रुरुधे-- आक्रमण किया; पृतन्यया--सैनिकों द्वारा; आचार्य-दत्तम्‌--शुक्राचार्यद्वारा प्रदत्त; जल-जम्‌ू--शंख को; महा-स्वनम्‌--उच्च स्वर; दध्मौ--बजाया; प्रयुज्ञनू--उत्पन्न करते हुए; भयम्‌-- भय; इन्द्र-योषिताम्‌--इन्द्र द्वारा रक्षित सारी स्त्रियों का |

असंख्य सैनिकों के सेनानायक बलि महाराज ने इन्द्र के इस निवास स्थान के बाहर अपनेसैनिकों को एकत्र किया और चारों दिशाओं से उस पर आक्रमण कर दिया |

उन्होंने अपने गुरूशुक्राचार्य द्वारा प्रदत्त शंख बजाया जिससे इन्द्र द्वारा रक्षित स्त्रियों के लिए भयावह स्थिति उत्पन्नहो गई |

मधवांस्तमभिप्रेत्य बले: परममुद्यमम्‌ |

सर्वदेवगणोपेतो गुरुमेतदुवाच ह ॥

२४॥

मधघवानू--इन्द्र; तम्‌--स्थिति को; अभिप्रेत्य--समझकर; बले:--बलि महाराज के; परमम्‌ उद्यमम्‌-महान्‌ उत्साह; सर्व-देव-गण--सभी देवताओं द्वारा; उपेतः --साथ-साथ; गुरुम्‌--गुरु को; एतत्‌--निम्नलिखित शब्द; उबाच--कहा; ह--निस्सन्देह |

बलि महाराज के अथक प्रयास को देखकर तथा उसके मन्तव्य को समझकर राजा इन्द्रअन्य देवताओं के साथ अपने गुरु बृहस्पति के पास गये और इस प्रकार बोले |

भगवच्ुद्यमों भूयान्बलेरन: पूर्ववैरिण: |

अविषह्ाममिमं मन्ये केनासीत्तेजसोर्जित: ॥

२५॥

भगवनू--हे भगवान्‌; उद्यम: --उत्साह; भूयानू--महान्‌; बले:--बलि महाराज का; नः--हमारा; पूर्व-वैरिण: --पुराना शत्रु;अविषहामम्‌-- असहा; इमम्‌--यह; मन्ये--मैं सोचता हूँ; केन--किसके द्वारा; आसीत्‌ू--पाया; तेजसा--तेज; ऊर्जित:--प्राप्तकिया गया |

हे प्रभु! हमारे पुराने शत्रु बलि महाराज में अब नया उत्साह पैदा हो गया है और उसने ऐसीआश्चर्यजनक शक्ति प्राप्त कर ली है कि हमारा विचार है कि हम उसके तेज का शायद प्रतिरोधनहीं कर सकते |

नैनं कश्चित्कुतो वापि प्रतिव्योदुमधी श्वरः |

पिबतन्निव मुखेनेदं लिहन्निव दिशो दश |

दहबन्निव दिशो हमग्भि: संवर्ताग्निरिवोत्थितः: ॥

२६॥

न--नहीं; एनम्‌--इस व्यवस्था को; कश्चित्‌--कोई भी; कुतः--कहीं से भी; वा अपि--या तो; प्रतिव्योढुमू--सामना करने केलिए; अधी श्वरः --समर्थ; पिबन्‌ इब--मानो पी रहे हों; मुखेन--मुख से; इृदम्‌--यह ( जगत ); लिहन्‌ इब--मानो चाट रहा हो;दिशः दश--दसों दिशाएँ; दहन्‌ इब--मानो जल रही हों; दिश:ः--सारी दिशाएँ; हग्भि:ः--अपनी दृष्टि से; संवर्त-अग्नि:--संवर्तअग्नि; इब--सहश; उत्थित:--उठी है |

कोई कहीं भी बलि की इस सैन्य व्यवस्था का सामना नहीं कर सकता |

अब ऐसा प्रतीतहोता है जैसे बलि सारे विश्व को अपने मुँह से पी जाना चाह रहा हो, अपनी जीभ से दसोंदिशाओं को चाट जाना चाह रहा हो और अपने नेत्रों से प्रत्येक दिशा में अग्निकाण्ड करने काप्रयास कर रहा हो |

निस्सन्देह, वह संवर्तक नामक प्रलयंकारी अग्नि के समान उठ पड़ा है |

ब्रूहि कारणमेतस्य दुर्धर्षत्वस्य मद्विपो: |

ओज: सहो बल॑ तेजो यत एतत्समुद्यम: ॥

२७॥

बूहि--कृपा करके हमें बतायें; कारणम्‌--कारण; एतस्य--इसका; दुर्धर्षत्वस्थ--दुर्धर्षता का; मत्‌-रिपो: --मेरे शत्रु का;ओज:--पराक्रम; सह:--शक्ति; बलमू--बल; तेज:--प्रभाव; यत:--जहाँ से; एतत्‌--यह सब; समुद्यम: --प्रयास |

कृपया मुझे बतायें कि बलि महाराज की शक्ति, उद्यम, प्रभाव तथा विजय का क्‍या कारणहै? वह इतना उत्साही कैसे हो गया है ?श्रीगुरुकुवाचजानामि मघवउछत्रोरुन्नतेरस्थ कारणम्‌ |

शिष्यायोपभूतं तेजो भृगुभि््रह्ठावादिभि: ॥

२८॥

श्री-गुरु: उवाच--बृहस्पति ने कहा; जानामि--जानता हूँ; मघवनू--हे इन्द्र; शत्रो: --शत्रु की; उन्नतेः--उन्नति का; अस्य--उसका; कारणम्‌--कारण; शिष्याय--शिष्य को; उपभृतम्‌-प्रदत्त; तेज: --शक्ति; भृगुभि:-- भृगुवंशियों द्वारा; ब्रह्म-वादिभि:--सर्वशक्तिमान ब्राह्मणों द्वारा |

देवताओं के गुरु बृहस्पति ने कहा : हे इन्द्र! मैं वह कारण जानता हूँ जिससे तुम्हारा शत्रुइतना शक्तिशाली बन गया है |

भृगुमुनि के ब्राह्मण वंशजों ने उनके शिष्य बलि महाराज से प्रसन्नहोकर उन्हें ऐसी अद्वितीय शक्ति प्रदान की है |

ओजस्विनं बलि जेतुं न समर्थोस्ति कश्चनभवद्ठिधो भवान्वापि वर्जयित्वे श्वरं हरिम्‌ |

विजेष्यति न कोप्येनं ब्रह्मतेज:समेधितम्‌नास्य शक्तः पुरः स्थातुं कृतान्तस्थ यथा जना; ॥

२९॥

ओजस्विनम्‌--इतना शक्तिशाली; बलिम्‌ू--बलि महाराज को; जेतुम्‌ू--जीतने के लिए; न--नहीं; समर्थ:--सक्षम; अस्ति--है;कश्चन--कोई; भवत्‌-विध: --तुम्हारी तरह; भवान्‌--तुम स्वयं; वा अपि--या तो; वर्जयित्वा--को छोड़कर; ईंश्वरम्‌--परमनियन्ता; हरिमू-- भगवान्‌ को; विजेष्यति--जीतेगा; न--नहीं; कः अपि--कोई भी; एनम्‌--उसको ( बलि महाराज को );ब्रह्म-तेज:-समेधितम्‌--ब्रह्मतेज से समन्वित; न--नहीं; अस्य--उसके; शक्त:--समर्थ; पुरः--सामने; स्थातुम्‌--ठहरने केलिए; कृत-अन्तस्य--यमराज के; यथा--जिस तरह; जना:--लोग

न तो तुम न ही तुम्हारे सैनिक परमशक्तिशाली बलि को जीत सकते हैं |

निस्सन्देह, भगवान्‌के अतिरिक्त कोई भी उसे जीत नहीं सकता क्योंकि वह अब ब्रह्मतेज से युक्त है |

जिस तरहयमराज के समक्ष कोई टिक नहीं पाता उसी तरह बलि महाराज के सामने भी कोई नहीं टिकसकता |

तस्मान्निलयमुत्सूज्य यूयं सर्वे त्रिविष्टपम्‌ |

यात काल प्रतीक्षन्तो यत:ः शत्रोर्विपर्यय: ॥

३०॥

तस्मात्‌ू--इसलिए; निलयम्‌-- अदृश्य; उत्सूज्य--त्यागकर; यूयम्‌--तुम; सर्वे--सभी; त्रि-विष्टपम्‌--स्वर्ग का राज्य; यात--अन्यत्र चले जाओ; कालम्‌--काल की; प्रतीक्षन्तः--प्रती क्षा करते हुए; यत:--जिससे; शत्रो: --तुम्हारे शत्रु की; विपर्यय: --विपरीत दशा आ जाये |

अतएव तुम सबको चाहिए कि अपने शत्रुओं की स्थिति के पलटने के समय तक प्रतीक्षाकरते हुए इस स्वंगलोक को छोड़ दो और कहीं ऐसे स्थान में चले जाओ जहाँ तुम दिखाई न दो |

एष विप्रबलोदर्क: सम्प्रत्यूजितविक्रम: |

तेषामेवापमानेन सानुबन्धो विनड्छ्यति ॥

३१॥

एष:--यह ( बलि महाराज ); विप्र-बल-उदर्क:--अपने में निहित ब्राह्मण शक्ति के कारण उन्नति करने वाला; सम्प्रति--इससमय; ऊर्जित-विक्रम:--अत्यन्त शक्तिशाली; तेषाम्‌--उन्हीं ब्राह्मणों के; एब--निस्सन्देह; अपमानेन-- अपमान से; स-अनुबन्ध:--अपने मित्रों तथा सहायकों सहित; विनड्छ््यति--विनष्ट हो जायेगा |

इस समय बलि ब्राह्मणों द्वारा प्रदत्त आशीषों के कारण अत्यन्त शक्तिशाली बन गया है, किन्तु बाद में जब वह इन्हीं ब्राह्मणों का अपमान करेगा तो वह अपने मित्रों तथा सहायकों सहितविनष्ट हो जायेगा |

एवं सुमन्त्रितार्थास्ते गुरुणार्थानुदर्शिना |

हित्वा त्रिविष्टपं जग्मुर्गीर्वाणा: कामरूपिण: ॥

३२॥

एवम्‌--इस प्रकार; सु-मन्त्रित-- भली भाँति उपदेश पाकर; अर्था:--कर्तव्यों के विषय में; ते--वे ( देवता ); गुरुणा--अपनेगुरु द्वारा; अर्थ-अनुदर्शिना--उपयुक्त आदेश; हित्वा--त्यागकर; त्रि-विष्टपम्‌--स्वर्ग का साम्राज्य; जग्मु:--गये; गीर्वाणा: --देवतागण; काम-रूपिण: --जो इच्छानुसार कोई भी रूप धारण कर सकते थे |

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : इस प्रकार बृहस्पति द्वारा अपने हित का उपदेश दिये जानेपर देवताओं ने तुरन्त उनकी बातें मान ली |

उन्होंने इच्छानुसार रूप धारण किया और वेस्वर्गलोक को छोड़कर असुरों की दृष्टि से ओझल होकर तितर-बितर हो गये |

देवेष्वथ निलीनेषु बलिवैंरोचन: पुरीम्‌ |

देवधानीमधिष्ठाय वशं निन्‍ये जगत्त्यम्‌ ॥

३३॥

देवेषु--सारे देवता; अथ--इस तरह से; निलीनेषु-- अदृश्य हो जाने पर; बलि:--बलि महाराज; वैरोचन:--विरोचन का पुत्र;पुरीम्‌-स्वर्ग के राज्य को; देव-धानीम्‌--देवताओं के निवास स्थान को; अधिष्ठाय--अधिकार में करके; वशम्‌--नियंत्रण में;निन्‍्ये--ले लिया; जगत्-त्रयम्‌--तीनों लोकों को |

जब देवतागण ओझल हो गये तो विरोचन के पुत्र बलि महाराज स्वर्ग में प्रविष्ट हुए औरवहाँ से उन्होंने तीनों लोकों को अपने अधिकार में कर लिया |

तं विश्वजयिनं शिष्यं भूगव: शिष्यवत्सला: |

शतेन हयमेधानामनुत्रतमयाजयन्‌ ॥

३४॥

तम्‌--उस ( बलि महाराज को ); विश्व-जयिनम्‌--समग्र विश्व के विजेता को; शिष्यम्‌--शिष्य होने के कारण; भूगव:-- भूगुवंशज, यथा शुक्राचार्य के; शिष्य-वत्सला:--शिष्य से अत्यन्त प्रसन्न होकर; शतेन--एक सौ के द्वारा; हय-मेधानाम्‌ू--अश्वमेधयज्ञों के; अनुब्रतम्‌-ब्राह्मणों के आदेशों का पालन करते हुए; अयाजयन्‌--सम्पन्न कराया |

भूगु के ब्राह्मण वंशजों ने अपने विश्वविजयी शिष्य से अत्यधिक प्रसन्न होकर उसे एक सौअश्वमेघ यज्ञ सम्पन्न करने में लगा दिया |

ततस्तदनुभावेन भुवनत्रयविश्रुताम्‌ |

कीर्ति दिक्षुवितन्वान: स रेज उडुराडिव ॥

३५॥

ततः-तत्पश्चात्‌; तत्‌-अनुभावेन--ऐसे महान्‌ यज्ञ सम्पन्न करने से; भुवन-त्रय--तीनों लोकों में; विश्रुतामू--विख्यात;कीर्तिम्‌ू--कीर्ति; दिक्षु--सभी दिशाओं में; वितन्वान:--फैली हुई; सः--वह ( बलि महाराज ); रेजे--तेजवान्‌ हो गया;उड्डराट्‌ू--चन्द्रमा; इब--समान

जब बलि महाराज ने इन यज्ञों को सम्पन्न कर लिया तो उनकी कीर्ति तीनों लोकों में सभीदिशाओं में फैल गई |

इस प्रकार वे अपने पद पर उसी प्रकार चमक उठे जिस तरह आकाश में चमकीला चाँद |

बुभुजे च भ्रियं स्वृद्धां द्विजदेवोपलम्भिताम्‌ |

कृतकृत्यमिवात्मानं मन्‍्यमानो महामना: ॥

३६॥

बुभुजे-- भोग किया; च-- भी; थ्रियम्--ऐश्वर्य; सु-ऋद्धामू--सम्पन्नता; द्विज--ब्राह्मणों के; देवब--देवताओं के तुल्य;उपलम्भिताम्‌-पक्षपात के कारण अर्जित; कृत-कृत्यम्‌--उसके कार्यों से अत्यन्त सन्तुष्ट; इब--सह्ृश; आत्मानम्‌--स्वयं को;मन्यमान:--सोचते हुए; महा-मना:--महान्‌-मस्तिष्क वाला, उदारमना |

ब्राह्मणों के पश्चात्‌ के कारण महात्मा बलि महाराज अपने आपको परम सन्तुष्ट मानते हुएपरम ऐश्वर्यवान्‌ तथा सम्पन्न बन गये और राज्य का भोग करने लगे |

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