← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 8 की सूची

अध्याय तेरह: भविष्य के मनु का वर्णन

8.13श्रीशुक उबाचमनुर्विवस्वत: पुत्र: श्राद्धदेव इति श्रुतः |

सप्तमो वर्तमानो यस्तदपत्यानि मे श्रुणु ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; मनुः--मनु; विवस्वत: --सूर्यदेव का; पुत्र:--पुत्र; श्राद्धदेव:-- श्राद्धदेव;इति--इस प्रकार; श्रुतः--ज्ञात, विख्यात; सप्तम:--सातवाँ; वर्तमान:--इस समय; य: --जो; तत्‌--उसकी; अपत्यानि--सन्तानें; मे--मुझसे; श्रूणु--सुनो

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : वर्तमान मनु का नाम श्राद्धदेव है और वे सूर्यलोक के प्रधानदेवता विवस्वान के पुत्र हैं |

श्राद्धदेव सातवें मनु हैं |

अब मैं उनके पुत्रों का वर्णन करता हूँ कृपाकरके मुझसे सुने |

इक्ष्वाकुर्नभगश्चेव धृष्ट: शर्यातिरिव च |

नरिष्यन्तोथ नाभागः सप्तमो दिष्ट उच्चते ॥

२॥

तरूषश्च पृषश्रश्च॒ दशमो वसुमान्स्मृतः |

मनोवैवस्वतस्यैते दशपुत्रा: परन्तप ॥

३॥

इक्ष्बाकु:--इ क्ष्वाकु; नभग: --नभग; च-- भी; एव--निस्सन्देह; धृष्ट: --ध्रृष्ट; शर्यातिः--शर्याति; एब--निश्चय ही; च--भी;नरिष्यन्त:--नरिष्यन्त; अथ-- भी; नाभाग: -- नाभाग; सप्तम: --सातवाँ; दिष्ट:--दिष्ट; उच्यते--विख्यात है; तरूष: च--तथातरूष; पृषश्च: च--तथा पृषश्च; दशम:--दसवाँ; वसुमान्‌--वसुमान; स्मृत:--ज्ञात; मनोः --मनु के; वैवस्वतस्थ--वैवस्वत;एते--ये सब; दश-पुत्रा:--दस पुत्र; परन्तप--हे राजा |

हे राजा परीक्षित! मनु के दस पुत्रों में ( प्रथम छः ) इक्ष्वाकु, नभग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्ततथा नाभाग हैं |

सातवाँ पुत्र दिष्ट नाम से जाना जाता है |

फिर तरूष तथा पृषश्च के नाम आते हैंऔर दसवाँ पुत्र वसुमान कहलाता है |

आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरूद्गणा: |

अश्विनावृभवो राजद्निन्द्रस्तेषां पुरन्दरः ॥

४॥

आदित्या:--आदित्यगण; वसव:--वसुगण; रुद्रा:--रुद्रगण; विश्वेदेवा:--विश्वेदेवा; मरुतू-गणा:--तथा मरुत्गण; अश्विनौ--दोनों अश्विनीकुमार; ऋभव:--ऋभुगण; राजन्‌--हे राजा; इन्द्र:--स्वर्ग का राजा; तेषाम्‌--उनमें से; पुरन्दर:--पुरन्दर |

तथा ऋशभु देवता हैं |

इनका प्रधान राजा ( इन्द्र ) पुरन्दर है |

'कश्यपोडत्रिर्वसिष्ठश्च विश्वामित्रोथ गौतम: |

जमदग्निर्भरद्वाज इति सप्तर्षय: स्मृता: ॥

५॥

कश्यपः--कश्यप; अत्रि:--अत्रि; वसिष्ठ:--वसिष्ठ; च--तथा; विश्वामित्र:--विश्वामित्र; अथ--तथा; गौतम: -- गौतम;जमदग्निः--जमदग्नि; भरद्वाज:-- भरद्वाज; इति--इस प्रकार; सप्त-ऋषय:--सप्तर्षि; स्मृता:--विख्यात |

कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि तथा भरद्वाज सप्तर्षि कहलाते हैं |

अत्रापि भगवज्जन्म कश्यपाददितेरभूत्‌ |

आदित्यानामवरजो विष्णुर्वामनरूपधृक्‌ ॥

६॥

अत्र--इस मनु के शासन में; अपि--निश्चय ही; भगवत्‌-जन्म-- भगवान्‌ का प्राकट्य; कश्यपात्‌ू--कश्यप मुनि से; अदिते:--माता अदिति के; अभूत्‌--सम्भव हुआ; आदित्यानाम्‌--आदित्यों में से; अवर-ज:--सबसे छोटा; विष्णु:--साक्षात्‌ विष्णु;वामन-रूप-धृक्‌ -- भगवान्‌ वामन का रूप धारण करते हुए |

इस मन्वन्तर में भगवान्‌ आदित्यों में सबसे छोटे, वामन के नाम से अवतरित हुए |

उनकेपिता कश्यप तथा माता अदिति थीं |

सदड्क्षेपतो मयोक्तानि सप्तमन्वन्तराणि ते |

भविष्याण्यथ वक्ष्यामि विष्णो: शक्त्यान्वितानिच ॥

७॥

सड्झ्षेपत:--संक्षेप में; मया--मेरे द्वारा; उक्तानि--बताये गये; सप्त--सात; मनु-अन्तराणि--मनुओं के परिवर्तन; ते--तुमको;भविष्याणि-- भावी मनु; अथ-- भी; वशक्ष्यामि--कहूँगा; विष्णो:--विष्णु के; शक्त्या अन्वितानि--शक्ति सम्पन्न; च--भी |

मैंने तुमसे संक्षेप में सात मनुओं की स्थिति बतला दी है |

अब मैं भगवान्‌ विष्णु के अवतारोंसहित भावी मनुओं का वर्णन करूँगा |

विवस्वतश्च द्वे जाये विश्वकर्मसुते उभे |

संज्ञा छाया च राजेन्द्र ये प्रागभिहिते तव ॥

८॥

विवस्वत:--विवस्वान की; च-- भी ; द्वे--दो; जाये--पत्लियाँ; विश्वकर्म-सुते--विश्वकर्मा की दो पुत्रियाँ; उभे--दोनों; संज्ञा--संज्ञा; छाया--छाया; च--तथा; राज-इन्द्र--हे राजा; ये--जो; प्राकु--पहले; अभिहिते--वर्णन किये गये; तब--तुमसे |

हे राजा! मैं तुमसे पहले ही ( छठे स्कंध में ) विश्वकर्मा की दो पुत्रियों का वर्णन कर चुका हूँजिनके नाम संज्ञा तथा छाया थे, जो विवस्वान की प्रथम दो पत्लियाँ थीं |

तृतीयां वडवामेके तासां संज्ञासुतास्त्रयः |

यमो यमी श्राद्धदेवश्छायायाश्व सुताउ्छुणु ॥

९॥

तृतीयाम्‌--तीसरी पत्नी; बडवाम्‌--वडवा को; एके --कुछ लोग; तासाम्‌--तीनों पतियों में से; संज्ञा-सुता: त्रयः--संज्ञा कीतीन संतानें; यम: --एक पुत्र यम; यमी--पुत्री यमी; श्राद्धदेव:--दूसरा पुत्र श्राद्धदेव; छायाया:--छाया का; च--तथा;सुतान्‌-पुत्रों को; श्रुणु--सुनो

ऐसा कहा जाता है कि सूर्यदेव के एक तीसरी पत्ती भी थी जिसका नाम वडवा था |

इनतीनों पत्नियों में से संज्ञा के तीन संतानें हुई--यम, यमी तथा श्राद्धदेव |

अब मैं छाया कीसन्‍्तानों का वर्णन करूँगा |

सावर्णिस्तपती कन्या भार्या संवरणस्य या |

शनैश्वरस्तृतीयो भूदश्चिनौ वडवात्मजौ ॥

१०॥

सावर्णि:--सावर्णि; तपती--तपती; कन्या--पुत्री; भार्या--पत्नी; संवरणस्थ--राजा संवरण की; या--जो; शनैश्वर: --शनैश्वर; तृतीय:--तीसरी सन्‍्तान; अभूत्‌--जन्म लिया; अश्विनौ--दोनों अश्विनी कुमार; वडवा-आत्म-जौ--वडवा नामक पत्नीके पुत्र

छाया के एक पुत्र सावर्णि तथा एक पुत्री तपती थी जो बाद में राजा संवरण की पत्नी बनी |

छाया की तीसरी सन्‍तान शनैश्वर ( शनि ) कहलाई |

वडवा ने दो पुत्रों को जन्म दिया जिनके नामअश्विनी-बन्धु हैं |

अष्टमेउन्तर आयाते सावर्णिर्भविता मनु: |

निर्मोकविरजस्काद्या: सावर्णितनया नृप ॥

११॥

अष्टमे--आठवें; अन्तरे--मन्वन्तर में; आयाते--आने पर; सावर्णि: --सावर्णि; भविता--हो जायेगा; मनु:ः--आठवाँ मनु;निर्मोक--निर्मोक; विरजस्क-आद्या: --विरजस्क इत्यादि; सावर्णि --सावर्णि के; तनया:--पुत्र; नृप--हे राजा

हे राजा! आठवें मनु का काल आने पर सावर्णि मनु बनेगा |

निर्मोक, विरजस्क इत्यादिउसके पुत्र होंगे |

तत्र देवा: सुतपसो विरजा अमृतप्रभा: |

तेषां विरोचनसुतो बलिरिन्द्रो भविष्यति ॥

१२॥

तत्र--उस मन्वन्तर में; देवा:ः--देवतागण; सुतपस:--सुतपा; विरजा:--विरजगण; अमृतप्रभा:--अमृत प्रभगण; तेषाम्‌--उनमेंसे; विरोचन-सुतः --विरोचन का पुत्र; बलि:--महाराज बलि; इन्द्र: --स्वर्ग का राजा; भविष्यति--होगा |

आठवें मन्वन्तर में सुतपा, विरज तथा अमृतप्रभगण देवता होंगे और विरोचन पुत्र बलिमहाराज देवताओं के राजा इन्द्र होंगे |

दत्त्वेमां याचमानाय विष्णवे यः पदत्रयम्‌ |

राद्धमिन्द्रपदं हित्वा ततः सिद्द्धिमवाप्स्यति ॥

१३॥

दत्त्वा--दान में देकर; इमामू--इस समग्र ब्रह्माण्ड को; याचमानाय--उससे याचना करने वाले; विष्णवे -- भगवान्‌ विष्णु को;यः--बलि महाराज; पद-त्रयम्‌--तीन पग भूमि; राद्धम्‌ू--प्राप्त किया; इन्द्र-पदम्‌--इन्द्र का स्थान; हित्वा--त्यागकर; तत:--तत्पश्चात्‌; सिद्धिमू--सिदर्द्धि; अवाप्स्यति--प्राप्त करेगा |

बलि महाराज ने भगवान्‌ विष्णु को तीन पग भूमि दान में दी जिसके कारण उन्हें तीनों लोकखोने पड़े |

किन्तु बाद में बलि द्वारा सर्वस्व दान दे दिये जाने पर जब भगवान्‌ विष्णु प्रसन्न हुए तोबलि महाराज को जीवन की सिद्धद्रि प्राप्त हो जाएगी |

योउसौ भगवता बद्धः प्रीतेन सुतले पुनः |

निवेशितोधिके स्वर्गादधुनास्ते स्वराडिव ॥

१४॥

यः--बलि महाराज; असौ--वही; भगवता-- भगवान्‌ द्वारा; बद्ध:--बाँधा जाकर; प्रीतेन--प्रेम के कारण; सुतले--सुतललोकमें; पुनः--फिर; निवेशित:--स्थित; अधिके--अधिक ऐश्वर्यवान्‌; स्वर्गातू--स्वर्ग की अपेक्षा; अधुना--इस समय; आस्ते--स्थित हैं; स्व-राट्‌ इब--इन्द्र के पद के समान |

भगवान्‌ ने प्रेमपूर्वक बलि को बाँध लिया और फिर उन्हें सुतल राज्य में अधिष्ठित किया जोस्वर्गलोक की अपेक्षा अधिक ऐश्वर्यशाली है |

इस समय बलि महाराज उसी लोक में रहते हैं औरइन्द्र की अपेक्षा अधिक सुखी हैं |

गालवो दीप्तिमान्नामो द्रोणपुत्र: कृपस्तथा |

ऋष्यश्वड़ः पितास्माक॑ भगवान्बादरायण: ॥

१७५॥

इमे सप्तर्षयस्तत्र भविष्यन्ति स्वयोगतः |

इदानीमासते राजन्स्वे स्व आश्रममण्डले ॥

१६॥

गालवः--गालव; दीप्तिमान्‌ू--दीप्तिमान; राम: --परशुराम; द्रोण-पुत्र:--द्रोणाचार्य का पुत्र अश्वत्थामा; कृप:--कृपाचार्य ;तथा--और; ऋष्यश्रुडर: --ऋष्य श्रृंग; पिता अस्माकम्‌--हमारे पिता; भगवान्‌-- भगवान्‌ के अवतार; बादरायण: --व्यासदेव;इमे--ये सब; सप्त-ऋषय: --सप्तर्षि; तत्र--उस मन्वन्तर में; भविष्यन्ति--होंगे; स्व-योगत:-- भगवान्‌ के प्रति सेवा के'परिणामस्वरुप; इदानीम्‌ू--इस समय; आसते--वे सब विद्यमान हैं; राजन्‌--हे राजा; स्वे स्वे-- अपने-अपने; आश्रम-मण्डले--विभिन्न आश्रमों में |

हे राजा! आठवें मन्वन्तर में गालव, दीप्तिमान, परशुराम, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, ऋष्यश्रृंगतथा हमारे पिता व्यासदेव, जो नारायण के अवतार हैं, सप्तर्षि होंगे |

इस समय वे सब अपने-अपने आश्रमों में निवास कर रहे हैं |

देवगुद्यात्सरस्वत्यां सार्वभौम इति प्रभु: |

स्थान पुरन्दराद्धृत्वा बलये दास्यती श्वर: ॥

१७॥

देवगुह्मात्‌-- अपने पिता देवगुहा से; सरस्वत्याम्‌-सरस्वती के गर्भ में; सार्वभौम: --सार्वभौम; इति--इस प्रकार; प्रभु:--स्वामी; स्थानम्‌--स्थान; पुरन्दरात्‌--इन्द्र से; हत्वा--बलपूर्वक छीने जाने पर; बलये--बलि महाराज को; दास्यति--देगा;ईश्वर:--स्वामी |

आठवें मन्वन्तर में अत्यन्त शक्तिशाली भगवान्‌ सार्वभौम जन्म ग्रहण करेंगे |

उनके पिता होंगेदेवगुह्म और माता होंगी सरस्वती |

वे पुरन्दर ( इन्द्र ) से राज्य छीन कर उसे बलि महाराज कोदेंगे |

नवमो दक्षसावर्णिमनुर्वरुणसम्भव: |

भूतकेतुर्दीप्तकेतुरित्याद्यास्तत्सुता नूप ॥

१८ ॥

नवमः--नौवाँ; दक्ष-सावर्णि:--दक्षसावर्णि; मनु:--मनु; वरुण-सम्भव: --वरुण के पुत्र रूप में; भूतकेतु:-- भूतकेतु;दीप्तकेतु:--दीप्तकेतु; इति--इस प्रकार; आद्या:--इत्यादि; तत्‌--उसके; सुता:--पुत्र; नृप--हे राजा |

हे राजा! नौवाँ मनु दक्षसावर्णि होगा जो वरुण का पुत्र होगा |

भूतकेतु, दीप्तकेतु इत्यादिउसके पुत्र होंगे |

पारामरीचिगर्भाद्या देवा इन्द्रोडद्धुतः स्मृतः |

झुतिमत्प्रमुखास्तत्र भविष्यन्त्यूषयस्ततः ॥

१९॥

पारा--पारगण; मरीचिगर्भ--मरीचिगर्भगण; आद्या:--आदि; देवा:--देवतागण; इन्द्र:--स्वर्ग का राजा; अद्भुत:--अद्भुत;स्मृत:--ज्ञात; द्युतिमत्‌--द्युतिमान; प्रमुखा: -- आदि; तत्र--उस नवें मन्वन्तर में; भविष्यन्ति--होंगे; ऋषय:--सप्तर्षि; तत:--तब |

नवें मन्वन्तर में पार तथा मरीचिगर्भ इत्यादि देवता रहेंगे |

स्वर्ग के राजा इन्द्र का नाम होगाअद्भुत और द्युतिमान सप्तर्षियों में से एक होगा |

आयुष्मतोम्बुधारायामृषभो भगवत्कला |

भविता येन संराद्धां त्रिलोकीं भोक्ष्यतेउद्भुतः ॥

२०॥

आयुष्मत:--पिता आयुष्पान का; अम्बुधारायाम्‌--माता अम्बुधारा के गर्भ में; ऋषभ:--ऋषभ; भगवत्‌-कला-- भगवान्‌ काअंशावतार; भविता--होगा; येन--जिससे; संराद्धाम्‌--सर्वशक्तिमान; त्रि-लोकीम्‌--तीनों लोकों को; भोक्ष्यते-- भोग करेगा;अद्भुत:--अद्भुत नामक इन्द्र |

भगवान्‌ के अंशावतार ऋषभदेव अपने पिता आयुष्मान तथा माता अम्बुधारा से जन्म लेंगे |

वे अद्भुत नामक इन्द्र को तीनों लोकों का ऐश्वर्य भोगने के योग्य बनायेंगे |

दशमो ब्रह्मसावर्णिरुपश्लोकसुतो मनु: |

तत्सुता भूरिषेणाद्या हविष्मत्प्रमुखा द्विजा: ॥

२१॥

दशमः:--दसवें मनु; ब्रह्म-सावर्णि: --ब्रह्मसावर्णि; उपश्लोक-सुत: --उपश्लोक का पुत्र; मनुः--मनु होगा; तत्‌-सुता:--उसकेपुत्र; भूरिषेण-आद्या: -- भूरिषेण इत्यादि; हविष्मत्‌--ह॒विष्मान; प्रमुखा:--प्रमुख; द्विजा:--सात ऋषि |

उपश्लोक का पुत्र ब्रहासावर्णि दसवाँ मनु होगा |

भूरिषेण उसके पुत्रों में एक होगा औरहविष्मान इत्यादि ब्राह्मण सप्तर्षि होंगे |

हविष्मान्सुकृतः सत्यो जयो मूर्तिस्तदा द्विजा: |

सुवासनविरुद्धाद्या देवा: शम्भु: सुरेश्वर: ॥

२२॥

हविष्मान्‌--हविष्मान; सुकृत:ः--सुकृत; सत्य:--सत्य; जय: --जय ; मूर्ति: --मूर्ति; तदा--उस समय; द्विजा:--सप्तर्षि;सुवासन--सुवासन-गण; विरुद्ध--विरुद्ध-गण; आद्या:--इत्यादि; देवा:--देवता; शम्भु:--शम्भु; सुर-ई श्वरः--देवताओं काराजा इन्द्र |

हविष्मान, सुकृत, सत्य, जय, मूर्ति इत्यादि सप्तर्षि होंगे; सुवासन-गण तथा विरुद्धगणदेवता होंगे और शम्भु उन सबका राजा इन्द्र होगा |

विष्वक्सेनो विषूच्यां तु शम्भो: सख्यं करिष्यति |

जातः स्वांशेन भगवान्गृहे विश्वस्ृजो विभु; ॥

२३॥

विष्वक्सेन:--विष्वक्सेन; विषूच्याम्‌--विषूची के गर्भ में; तु--तब; शम्भो: --शम्भु को; सख्यम्‌--मित्रता; करिष्यति--करेगा;जातः--उत्पन्न होकर; स्व-अंशेन--अपने अंश से; भगवान्‌-- भगवान्‌; गृहे--घर में; विश्वसृज:--विश्वसृष्टा का; विभु:--अत्यन्त शक्तिशाली भगवान्‌ |

,विश्वसृष्टा के घर में विषूची के गर्भ से भगवान्‌ के स्वांश विष्वक्सेन के रूप में भगवान्‌अवतरित होंगे |

वे शम्भु से मैत्री स्थापित करेंगे |

मनुर्वे धर्मसावर्णिरिकादशम आत्मवान्‌ |

अनागतास्तत्सुताश्च सत्यधर्मादयो दश ॥

२४॥

मनुः--मनु; वै--निस्सन्देह; धर्म-सावर्णि: -- धर्मसावर्णि; एकादशमः--ग्यारहवाँ; आत्मवान्‌--इन्द्रियों को वश में करने वाला;अनागता:--भविष्य में होंगे; तत्‌--उसके; सुता:--पुत्र; च--तथा; सत्यधर्म-आदय:--सत्यधर्म तथा अन्य; दश--दस |

ग्याहरवें मन्वन्तर में धर्मसावर्णि मनु होंगे जो अध्यात्म ज्ञान के अत्यन्त विद्वान होंगे |

उनकेदस पुत्र होंगे जिनमें सत्यधर्म प्रमुख होगा |

विहड्डमा: कामगमा निर्वाणरुचय: सुरा: |

इन्द्रश्न वैधृतस्तेषामृषयश्चारुणादय: ॥

२५॥

विहड्डमा:--विहड्रमगण; कामगमा: --कामगम-गण; निर्वाणरुचय: --निर्वाणरुचिगण; सुरा:--देवता; इन्द्र: --इन्द्र; च-- भी;वैधृतः--वैधृत; तेषाम्‌--उनमें से; ऋषय:--सप्तर्षि; च-- भी; अरूण-आदय:--अरुण इत्यादि

विहंगम, कामगम, निर्वाणरुचि इत्यादि देवता होंगे |

वैध्वत देवताओं का राजा इन्द्र होगा औरअरुण इत्यादि सप्तर्षि होंगे |

आर्यकस्य सुतस्तत्र धर्मसेतुरिति स्मृतः |

वैधृतायां हरेरंशस्त्रिलोकीं धारयिष्यति ॥

२६॥

आर्यकस्य--आर्यक का; सुतः--पुत्र; तत्र--उस ग्याहरवें मन्वन्तर में; धर्मसेतु:--धर्मसेतु; इति--इस प्रकार; स्मृत:--विख्यात;वैधृतायाम्‌--माता वैधृता से; हरेः-- भगवान्‌ के; अंशः--अंशावतार; त्रि-लोकीम्‌--तीनों लोकों पर; धारयिष्यति--शासनचलायेगा |

आर्यक का पुत्र धर्मसेतु आर्यक की पत्नी वैधृता की कोख से भगवान्‌ के अंशावतार केरूप में जन्म लेगा और तीनों लोकों में शासन करेगा |

भविता रुद्रसावर्णी राजन्द्दादशमो मनु: |

देववानुपदेवश्च देवश्रेष्ठादय: सुता: ॥

२७॥

भविता--होगा; रुद्र-सावर्णि:--रुद्र सावर्णि; राजन्‌ू--हे राजा; द्वादशम: --बारहवाँ; मनु:--मनु; देववान्‌ू--देववान;उपदेव:--उपदेव; च--तथा; देवश्रेष्ट--देव श्रेष्ठ; आदय:--इत्यादि; सुता:--मनु के पुत्र |

हे राजा! बारहवाँ मनु रुद्रसावर्णि कहलायेगा |

देववान, उपदेव तथा देवश्रेष्ठ उसके पुत्र होंगे |

ऋतधामा च तत्रेन्द्रो देवाश्न हरितादयः |

ऋषयश्च तपोमूर्तिस्तपस्व्याग्नीध्रकादय: ॥

२८॥

ऋतधामा--ऋतधामा; च-- भी; तत्र--उस काल में; इन्द्र:--स्वर्ग का राजा; देवा:--देवता; च--तथा; हरित-आदय: -- हरितइत्यादि; ऋषय: च--तथा सप्तर्षि; तपोमूर्ति:--तपोमूर्ति; तपस्वी --तपस्वी; आग्नीध्रक-- आग्नी ध्रक; आदय: --इत्यादि |

इस मन्वन्तर में ऋतधामा इन्द्र होगा और हरित इत्यादि देवता होंगे |

तपोमूर्ति, तपस्वी तथाआग्नीश्रक सप्तर्षि होंगे |

स्वधामाख्यो हरेरंश: साधयिष्यति तन्मनो: |

अन्तर सत्यसहसः सुनृताया: सुतो विभु: ॥

२९॥

स्वधामा-आख्य: --स्वधामा नामक; हरे: अंश:-- भगवान्‌ का अंश अवतार; साधयिष्यति--शासन करेगा; ततू-मनो:--उस मनुके; अन्तरम्‌--मन्वन्तर; सत्यसहस:--सत्यसहा का; सुनृताया:--सुनृता का; सुतः--पुत्र; विभु:--अत्यन्त शक्तिशाली |

माता सुनृता तथा पिता सत्यसहा से भगवान्‌ का अंशावतार स्वधामा उत्पन्न होगा |

वह उसमन्वन्तर में शासन करेगा |

मनुस्त्रयोदशो भाव्यो देवसावर्णिरात्मवान्‌ |

चित्रसेनविचित्राद्या देवसावर्णिदेहजा: ॥

३०॥

मनुः--मनु; त्रयोदशः -- तेरहवाँ; भाव्य:--हो गा; देव-सावर्णि:--देवसावर्णि; आत्मवानू-- आध्यात्मिक ज्ञान में उन्नत;चित्रसेन--चित्रसेन; विचित्र-आद्या: --तथा विचित्र इत्यादि; देव-सावर्णि--देवसावर्णि के; देह-जा:--पुत्र

तेरहवें मनु का नाम देवसावर्णि होगा और वह आध्यात्मिक ज्ञान में काफी बढ़ा-चढ़ा होगा |

चित्रसेन तथा विचित्र उसके पुत्रों में से होंगे |

देवा: सुकर्मसुत्रामसंज्ञा इन्द्रो दिवस्पति: |

निर्मोकतत्त्वदर्शाद्या भविष्यन्त्यूषयस्तदा ॥

३१॥

देवा:--देवतागण; सुकर्म--सुकर्मा-गण; सुत्राम-संज्ञा:--तथा सुत्राम नामक; इन्द्र: --इन्द्र; दिवस्पति:--दिवस्पति; निर्मोक --निर्मोक; तत्त्वदर्श-आद्या: --तत्त्वदर्श इत्यादि; भविष्यन्ति--होंगे; ऋषय:--सप्तर्षि; तदा--उस समय |

तेरहवें मन्वन्तर में सुकर्मा तथा सुत्रामा इत्यादि देवता होंगे, दिवस्पति स्वर्ग का राजा इन्द्रहोगा और निर्मोक तथा तत्त्वदर्श सप्तर्षि होंगे |

देवहोत्रस्यथ तनय उपहर्ता दिवस्पते: |

योगेश्वरो हरेरंशो बृहत्यां सम्भविष्यति ॥

३२॥

देवहोत्रस्य--देवहोत्र का; तनय:--पुत्र; उपहर्ता--उपकार करने वाला; दिवस्पते:--दिवस्पति अर्थात्‌ उस काल के इन्द्र का;योग-ईश्वरः--योगशक्ति का स्वामी, योगेश्वर; हरे: अंश:-- भगवान्‌ का अंशावतार; बृहत्याम्‌ू--अपनी माता बृहती के गर्भ में;सम्भविष्यति-- प्रकट होगा |

देवहोत्र का पुत्र योगेश्वर भगवान्‌ के अंशावतार रूप में प्रकट होगा |

उसकी माता का नामबृहती होगा |

वह दिवस्पति के कल्याणार्थ कार्य करेगा |

मनुर्वा इन्द्रसावर्णिश्षतुर्दशम एष्यति |

उरुगम्भीरबुधाद्या इन्द्रसावर्णिवीर्यजा: ॥

३३॥

मनुः--मनु; वा--या; इन्द्र-सावर्णि:--इन्द्रसावर्णि; चतुर्दशम:--चौदहवाँ; एष्यति--बनेगा; उरुू--उरु; गम्भीर--गम्भीर; बुध-आद्या:--बुध इत्यादि; इन्द्र-सावर्णि--इन्द्रसावर्णि के; वीर्य-जा:--वीर्य से उत्पन्न |

चौदहवें मनु का नाम इन्द्रसावर्णि होगा |

उसके पुत्रों के नाम उरु, गम्भीर तथा बुध होंगे |

पवित्राश्षाक्षुषा देवा: शुचिरिन्द्रो भविष्यति |

अग्निर्बाहु: शुचि: शुद्धों मागधाद्यास्तपस्विन: ॥

३४॥

पवित्रा:--पवित्रगण; चाश्लुषा:--चाक्षुषणण; देवा:--देवता; शुच्रि:--शुचि; इन्द्र: --स्वर्ग का राजा; भविष्यति--होगा;अग्नि:--अग्नि; बाहु:--बाहु; शुचिः --शुचि; शुद्धः--शुद्ध; मागध--मागध; आद्या: --इत्यादि; तपस्विन:--तपस्वी मुनि |

पवित्रगण तथा चाश्लुषगण इत्यादि देवता होंगे और शुचि इन्द्र होगा |

अग्नि, बाहु, शुचि,शुद्ध, मागध तथा अन्य तपस्वी सप्तर्षि होंगे |

सत्रायणस्य तनयो बृहद्धानुस्तदा हरिः |

वितानायां महाराज क्रियातन्तून्वितायिता ॥

३५॥

सत्रायणस्य--सत्रायण का; तनयः--पुत्र; बृहद्धानु:--बृहद्भानु; तदा--उस काल में; हरिः-- भगवान्‌; वितानायामू--वितानाके गर्भ से; महा-राज--हे राजा; क्रिया-तन्तून्‌ू--सारे आध्यात्मिक कार्यकलाप; वितायिता--सम्पन्न करेंगे |

हे राजा परीक्षित! चौदहवें मन्वन्तर में भगवान्‌ विताना के गर्भ से प्रकट होंगे और उनकेपिता का नाम सत्रायण होगा |

यह अवतार बृहदभानु के नाम से विख्यात होगा और वहआध्यात्मिक कार्यकलाप करेगा |

राज॑श्षतुर्दशैतानि त्रिकालानुगतानि ते |

प्रोक्तान्येभि्मितः कल्पो युगसाहस्त्रपर्यय: ॥

३६॥

राजनू--हे राजा; चतुर्दश--चौदह; एतानि--ये सब; त्रि-काल--तीनों काल ( भूत, वर्तमान, भविष्य ); अनुगतानि--फैले हुए;ते--तुमसे; प्रोक्तानि--वर्णन किए गए; एभमि:--इनके द्वारा; मित:--अनुमानित; कल्प:--ब्रह्म का एक दिन; युग-साहस्त्र--चारों युगों के एक हजार चक्र; पर्ययः--से युक्त

हे राजा! मैंने अभी तुमसे भूत, वर्तमान तथा भविष्य में हुए अथवा होने वाले चौदहों मनुओंका वर्णन किया |

ये मनु कुल मिलाकर जितने समय तक शासन करते हैं वह एक हजार युगचक्र है |

यह कल्प या ब्रह्माजी का एक दिन कहलाता है |

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