← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 8 की सूची
अध्याय बारह: मोहिनी-मूर्ति अवतार भगवान शिव को भ्रमित करता है
8.12श्रीबादरायणिरुवाचवृषध्वजो निशम्येदं योषिद्रपेण दानवान् |
मोहयित्वा सुरगणान्हरि: सोममपाययत् ॥
१॥
वृषमारुहा गिरिशः सर्वभूतगणैर्वृतः |
सह देव्या ययौ द्रष्ट यत्रास्ते मधुसूदनः ॥
२॥
श्री-बादरायणि: उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; वृष-ध्वज:--बैल पर सवारी करने वाले शिवजी ने; निशम्य--सुनकर;इदम्--यह ( खबर ); योषित्-रूपेण--स्त्री का रूप धारण करके; दानवान्--दानवों को; मोहयित्वा--मुग्ध करके; सुर-गणानू्--देवताओं को; हरिः-- भगवान् ने; सोमम्ू-- अमृत; अपाययत्--पिलाया; वृषम्--बैल पर; आरुह्म-- चढ़कर;गिरिश:--शिवजी; सर्व --सारे; भूत-गणै:-- भूत-प्रेतों के द्वारा; वृतः--घिरे हुए; सह देव्या--उमा के साथ; ययौ--गये;द्रष्टभू--देखने के लिए; यत्र--जहाँ; आस्ते--रुकते हैं; मधुसूदन:-- भगवान् विष्णु |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : स्त्री के रूप में भगवान् हरि ने दानवों को मोह लिया औरदेवताओं को अमृत पिलाया |
इन लीलाओं को सुनकर बैल पर सवारी करने वाले शिवजी उसस्थान पर गये जहाँ भगवान् मधुसूदन रहते हैं |
शिवजी अपनी पत्नी उमा को साथ लेकर तथा अपने साथी प्रेतों से घिरकर वहाँ भगवान् के स्त्री-रूप को देखने गये |
सभाजितो भगवता सादरं सोमया भव: |
सूपविष्ट उबाचेदं प्रतिपूज्य स्मयन्हरिम् ॥
३॥
सभाजित:--सुसम्मानित; भगवता-- भगवान् विष्णु द्वारा; स-आदरम्--अत्यन्त सम्मानपूर्वक ( जो शिवजी के अनुकूल था );स-उम्या--उमा सहित; भवः--शम्भु ( शिवजी ); सु-उपविष्ट:--ठीक प्रकार से स्थित; उवाच--कहा; इृदम्--यह;प्रतिपूज्य--सम्मान प्रदर्शित करके ; स्मयन्--मुस्काते; हरिम्-- भगवान् के प्रति
भगवान् ने शिवजी तथा उमा का अत्यन्त सम्मान के साथ स्वागत किया और ठीक प्रकार सेबैठ जाने पर शिवजी ने भगवान् की विधिवत् पूजा की तथा मुस्काते हुए वे इस प्रकार बोले |
श्रीमहादेव उवाचदेवदेव जगद्व्यापिद्जगदीश जगन्मय |
सर्वेषामपि भावानां त्वमात्मा हेतुरी श्वर: ॥
४॥
श्री-महादेव: उबाच--शिवजी ( महादेव ) ने कहा; देव-देव--हे देवताओं में सर्वश्रेष्ठ देवता; जगत्-व्यापिन्--हे सर्वव्यापीभगवान्; जगत्-ईश-हे ब्रह्माण्ड के स्वामी; जगत्ू-मय--हे भगवान्, जो तुरन्त ही अपनी शक्ति से इस सृष्टि में बदल गए हैं;सर्वेषाम् अपि--समस्त प्रकार के; भावानामू--स्थितियाँ; त्वम्ू--तुम; आत्मा--गतिमान् शक्ति; हेतु:--इसका कारण; ईश्वर: --भगवान्, परमे श्वर |
महादेवजी ने कहा : हे देवताओं में प्रमुख देव! हे सर्वव्यापी, ब्रह्माण्ड के स्वामी! आपनेअपनी शक्ति से अपने को सृष्टि में रूपान्तरित कर दिया है |
आप हर वस्तु के मूल एवं सक्षमकारण हैं |
आप भौतिक नहीं हैं |
निस्सन्देह, आप हर एक की परम सञ्जीवनी शक्ति या परमात्माहैं |
अतएव आप परमेश्वर हैं अर्थात् सभी नियंत्रकों के परम नियंत्रक हैं |
आइद्चन्तावस्य यन्मध्यमिदमन्यदहं बहिः |
यतोडव्ययस्य नैतानि तत्सत्यं ब्रह्म चिद्भधवान् ॥
५॥
आदि--प्रारम्भ; अन्तौ--तथा अन्त; अस्य--इस व्यक्त जगत का या किसी भी भौतिक या दृश्य वस्तु का; यत्ू--जो; मध्यम्--आरम्भ एवं अन्त के मध्य, पालन; इृदम्--यह दृश्य जगत; अन्यत्ू--आपके अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु; अहम्ू--गलत धारणा;बहिः--आपसे बाहर; यत:--के कारण; अव्ययस्य--अक्षय; न--नहीं; एतानि--इतने सारे अन्तर; तत्ू--वह; सत्यम्--परमसत्य; ब्रह्म--ब्रहा; चित्--आध्यात्मिक; भवान्--आप |
हे भगवान्! व्यक्त, अव्यक्त, मिथ्या अहंकार तथा इस दृश्य जगत का आदि ( उत्पत्ति ),पालन तथा संहार सभी कुछ आपसे है |
किन्तु आप परम सत्य, परमात्मा, परम ब्रह्म हैं अतएवजन्म, मृत्यु तथा पालन जैसे परिवर्तन आप में नहीं पाये जाते |
तबैव चरणाम्भोज॑ श्रेयस्कामा निराशिष: |
विसृज्योभयतः सड़ं मुनयः समुपासते ॥
६॥
तव--तुम्हारे; एब--निस्सन्देह; चरण-अम्भोजम्--चरणकमल; श्रेयः-कामा:--चरम कल्याण रूपी जीवन के चरम लक्ष्य केइच्छुक व्यक्ति; निशाशिष:--बिना किसी भौतिक इच्छा के; विसृज्य--त्यागकर; उभयत:--इस जीवन में तथा अगले जीवन में;सड्डम--आसक्ति; मुनयः--मुनिगण; समुपासते--पूजा करते हैं |
जो शुद्ध भक्त या महान् सन्त पुरुष ( मुनिगण ) जीवन का चरम लक्ष्य प्राप्त करने केइच्छुक हैं तथा इन्द्रियतृप्ति की समस्त भौतिक इच्छाओं से रहित हैं, वे आपके चरणकमलों कीनिरन्तर भक्ति में लगे रहते हैं |
त्वं ब्रह्म पूर्णमममृतं विगुणं विशोक-मानन्दमात्रमविकारमनन्यदन्यत् ॥
विश्वस्य हेतुरूुदयस्थितिसंयमाना-मात्मेश्वरश्न तदपेक्षतयानपेक्ष: ॥
७॥
त्वमू--आप; ब्रह्म--सर्वव्यापी परम सत्य; पूर्णम्ू--परम पूर्ण; अमृतम्--कभी नष्ट न होने वाले; विगुणम्-प्रकृति के गुणों सेमुक्त, आध्यात्मिक रूप से स्थित; विशोकम्--शोक रहित; आनन्द-मात्रम्ू--सदैव दिव्य आनन्द से युक्त; अविकारम्--परिवर्तनरहित; अनन्यत्--हर वस्तु से पृथक्; अन्यतू--फिर भी सब कुछ हो; विश्वस्थ--हृश्य जगत के; हेतु:--कारण; उदय--प्रारम्भ के; स्थिति--पालन; संयमानाम्--तथा विश्व के विभिन्न विभागों को नियंत्रण में रखने वाले समस्त निदेशकों में से;आत्म-ईश्वर:--हर एक को निर्देश देने वाले परमात्मा; च--भी; तत्-अपेक्षतया--हर व्यक्ति आप पर आश्ित है; अनपेक्ष: --सदैव पूर्णतः स्वतंत्र
हे प्रभु! आप परब्रह्म तथा सभी प्रकार से पूर्ण हैं |
पूर्णतः आध्यात्मिक होने के कारण आपनित्य, प्रकृति के भौतिक गुणों से मुक्त तथा दिव्य आनन्द से पूरित हैं |
निस्सन्देह, आपके लिएशोक करने का प्रश्न ही नहीं उठता |
चूँकि आप समस्त कारणों के परम कारण हैं अतएवआपके बिना कोई भी अस्तित्व में नहीं रह सकता |
फिर भी जहाँ तक कारण तथा कार्य कासम्बन्ध है हम आपसे भिन्न हैं क्योंकि एक दृष्टि से कार्य तथा कारण पृथक्-पृथक् हैं |
आपसृष्टि, पालन तथा संहार के मूल कारण हैं और आप समस्त जीवों को वर देते हैं |
हर व्यक्तिअपने कार्यों के फलों के लिए आप पर निर्भर है, किन्तु आप सदा स्वतंत्र हैं |
एकस्त्वमेव सदसद्द्वयमद्दयं चस्वर्ण कृताकृतमिवेह न वस्तुभेद: |
अज्ञानतस्त्वयि जनैर्विहितो विकल्पो यस्मादगुणव्यतिकरो निरुपाधिकस्थ ॥
८॥
एकः--केवल एक; त्वमू--आप; एव--निस्सन्देह; सत्ू--जिसका अस्तित्व है, यथा फल; असत्--जिसका अस्तित्व नहीं है,यथा कारण; द्वयम्--दो; अद्दयम्ू--द्वैतरहित; च--तथा; स्वर्णम्ू--सोना; कृत--विभिन्न रूपों में निर्मित; आकृतम्-स्वर्ण कामूल स्त्रोत ( सोने की खान ); इब--सहृश; इह--इस संसार में; न--नहीं; वस्तु-भेद:ः--वस्तु में भेद; अज्ञानतः--अज्ञान केकारण; त्वयि--तुममें; जनैः--जनसमूह द्वारा; विहित:--ऐसा होना चाहिए; विकल्प:--विभेद; यस्मात्--जिसके कारण;गुण-व्यतिकरः--प्रकृति के भौतिक गुणों द्वारा उत्पन्न अन्तरों से रहित; निरुपाधिकस्य--किसी भौतिक उपाधि के बिना |
हे प्रभ!! आप अकेले ही कार्य तथा कारण हैं, अतएवं आप दो प्रतीत होते हुए भी परम एकहैं |
जिस तरह आभूषण के सोने तथा खान के सोने में कोई अन्तर नहीं होता, उसी तरह कारणतथा कार्य में अन्तर नहीं होता, दोनों ही एक हैं |
अज्ञानवश ही लोग अन्तर तथा द्वैत गढ़ते हैं |
आप भौतिक कल्मष से मुक्त हैं और चूँकि समस्त ब्रह्माण्ड आपके द्वारा उत्पन्न है और आपकेबिना नहीं रह सकता अतएवं यह आपके दिव्य गुणों का प्रभाव है |
इस प्रकार इस धारणा कोकोई बल नहीं मिलता कि ब्रह्म सत्य है और जगत मिथ्या है |
त्वां ब्रह्म केचिदवयन्त्युत धर्ममेकेएके परं सदसतो: पुरुषं परेशम् |
अन्येवर्यन्ति नवशक्तियुतं परं त्वांकेचिन्महापुरुषमव्ययमात्मतन्त्रम् ॥
९॥
त्वामू--तुमको; ब्रह्म--परम सत्य, ब्रह्म; केचित्ू--कुछ लोग, यथा मायावादी जो वेदान्ती कहलाते हैं; अवयन्ति--मानते हैं;उत--निश्चय ही; धर्मम्--धर्म को; एके--कुछ लोग; एके -- कुछ अन्य लोग; परम्ू--दिव्य; सत्-असतो:--कार्य तथा कारणदोनों; पुरुषम्--परम पुरुष को; परेशम्--परम नियन्ता; अन्ये--दूसरे लोग; अवयन्ति--वर्णन करते हैं; नव-शक्ति-युतम्--नौशक्तियों से युक्त; परम्-दिव्य; त्वाम्--तुमको; केचित्--कुछ; महा-पुरुषम्-- भगवान् को; अव्ययम्-शक्तिक्षय के बिना;आत्म-तन्त्रमू--परम स्वतंत्र |
जो निर्विशेष मायावादी कहलाते हैं, वे आपको निर्विशेष ब्रह्म के रूप में मानते हैं |
मीमांसक विचारक आपको धर्म के रूप में मानते हैं |
सांख्य दार्शनिक आपको ऐसा परम पुरुषमानते हैं, जो प्रकृति तथा पुरुष के परे है और देवताओं का भी नियंत्रक है |
जो लोग पद्ञरात्रनामक भक्ति के नियमों के अनुयायी हैं, वे आपको नौ शक्तियों से युक्त मानते हैं |
तथा पतञ्जलिमुनि के अनुयायी, जो पतञ्जल दार्शनिक कहलाते हैं, आपको उस परम स्वतंत्र भगवान् के रूपमें मानते हैं जिसके न तो कोई तुल्य है और जिस से कोई श्रेष्ठ है |
नाहं परायुरृषयो न मरीचिमुख्याजानन्ति यद्विरचितं खलु सच्त्वसर्गा: |
यन्मायया मुषितचेतस ईश दैत्य-मर्त्यादय: किमुत शश्वदभद्गवृत्ता: ॥
१०॥
न--न तो; अहम्--मैं; पर-आयु: --ऐसा व्यक्ति जो लाखों करोड़ों वर्ष जीवित रहता है ( ब्रह्माजी ); ऋषय:--सात लोकों केसात ऋषि; न--न तो; मरीचि-मुख्या:--मरीचि ऋषि इत्यादि; जानन्ति--जानते हैं; यत्--जिससे ( भगवान् से ); विरचितम्--यह ब्रह्माण्ड रचा गया; खलु--निस्सन्देह; सत्त्व-सर्गा:--यद्यपि भौतिक सतोगुण में उत्पन्न; यत्ू-मायया--जिसकी माया के प्रभाव से; मुषित-चेतस: --मोहित चित्त; ईश--हे स्वामी; दैत्य--असुर; मर्त्य-आदय: --मनुष्य इत्यादि; किम् उत--क्या कहाजाये; शश्वत्--सदैव; अभद्ग-वृत्ता:--प्रकृति के निम्न गुणों से प्रभावित |
हे प्रभु! सभी देवताओं में श्रेष्ठ माना जाने वाला मैं, ब्रह्माजी तथा मरीचि इत्यादि महर्षिसतोगुण से उत्पन्न हैं |
तब भी हम सभी आपकी माया से मोहग्रस्त हैं और यह नहीं समझ पाते कियह सृष्टि क्या है |
आप हमारी बात छोड़ भी दें तो उन असुरों तथा मनुष्यों के बारे में क्या कहाजाये जो प्रकृति के निम्न गुणों ( रजो तथा तमो गुणों ) से युक्त हैं ? वे आपको कैसे जान सकतेहैं? स त्वं समीहितमद: स्थितिजन्मनाशंभूतेहितं च जगतो भवबन्धमोक्षौ |
वायुर्यथा विशति खं च चराचराख्यंसर्व तदात्मकतयावगमोवरुन्त्से ॥
११॥
सः--वह; त्वम्ू--आप भगवान्; समीहितम्--( आपके द्वारा ) उत्पन्न किया हुआ; अद:--इस भौतिक जगत का; स्थिति-जन्म-नाशम्ू--सृजन, पालन तथा संहार; भूत--जीवों का; ईहितम् च--तथा विभिन्न कार्य या उद्योग; जगतः--सारे जगत का; भव-बन्ध-मोक्षौ--सांसारिक बन्धन में पड़ने और छूटने में; वायु:--हवा; यथा--जिस तरह; विशति--प्रवेश करती है; खम्--विस्तृत आकाश में; च--तथा; चर-अचर-आख्यम्--तथा चर और अचर; सर्वम्--हर वस्तु; तत्ू--वह; आत्मकतया--आपकी उपस्थिति से; अवगम:ः --आपके अवगत रहने से; अवरुन्त्से--सर्वव्यापी होने के कारण आप सब कुछ जानते हैं |
हे प्रभु! आप साक्षात् परम ज्ञान हैं |
आप इस सृष्टि तथा इसके सृजन, पालन तथा संहार केविषय में सब कुछ जानते हैं |
आप जीवों द्वारा किये जाने वाले उन सारे प्रयासों से अवगत हैंजिनके द्वारा वे इस भौतिक जगत से बँधते या मुक्त होते हैं |
जिस प्रकार वायु विस्तीर्ण आकाशके साथ-साथ समस्त चराचर प्राणियों में प्रविष्ट करती है उसी प्रकार आप सर्वत्र विद्यमान हैं,अतएव सर्वज्ञ हैं |
अवतारा मया हदृष्टा रममाणस्य ते गुणैः |
सोहं तददरष्ठुमिच्छामि यत्ते योषिद्वपुर्धृतम् ॥
१२॥
अवतारा:--अवतार; मया-- मेरे द्वारा; दृष्टाः--देखे जा चुके हैं; रममाणस्य--लीला करते समय; ते--तुम्हारे; गुणैः--दिव्यगुणों से प्रकट; सः--शिवजी; अहम्--मैं; तत्--वह अवतार; द्रष्टम् इच्छामि--देखना चाहता हूँ; यत्--जो; ते--तुम्हारा;योषितू-वपु:--स्त्री का शरीर; धृतम्-- धारण किया हुआ |
हे प्रभु! मैंने आपके उन सभी अवतारों का दर्शन किया है जिन्हें आप अपने दिव्य गुणों केद्वारा प्रकट कर चुके हैं |
अब जबकि आप एक सुन्दर तरुणी के रूप में प्रकट हुए हैं, मैं आपकेउसी स्वरूप का दर्शन करना चाहता हूँ |
येन सम्मोहिता दैत्या: पायिताश्चामृतं सुरा: |
तदिदृक्षव आयाता: परं कौतूहलं हि न: ॥
१३॥
येन--ऐसे अवतार से; सम्मोहिता:--मोहित हो गये थे; दैत्या:--असुरगण; पायिता:--पिलाया गया था; च--भी; अमृतम्--अमृत; सुरा:--देवतागण; तत्--वह रूप; दिदृदक्षव:ः--देखने की इच्छा से; आयाता: --हम आये हैं; परम्--अत्यधिक;कौतूहलम्--अत्यन्त उत्सुकता; हि--निस्सन्देह; नः--हमारी |
है भगवान्! हम लोग यहाँ पर आपके उस रूप का दर्शन करने आये हैं जिसे आपने असुरोंको पूर्णतया मोहित करने के लिए दिखलाया था और इस प्रकार देवताओं को अमृत पान करनेदिया था |
मैं उस रूप को देखने के लिए अत्यन्त उत्सुक हूँ |
श्रीशुक उबाचएवमभ्यर्थितो विष्णुर्भगवान्शूलपाणिना |
प्रहस्य भावगम्भीरं गिरिशं प्रत्यभाषत ॥
१४॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; अभ्यर्थित:--प्रार्थना किये जाने पर; विष्णु: भगवान्--भगवान् विष्णु ने; शूल-पाणिना--त्रिशूलधारी शिवजी द्वारा; प्रहस्थ--हँसते हुए; भाव-गम्भीरम्--अत्यन्त गम्भीरतापूर्वक;गिरिशम्--शिवजी को; प्रत्यभाषत--उत्तर दिया
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब त्रिशूलधारी शिवजी ने भगवान् विष्णु से इस तरह प्रार्थनाकी तो वे गम्भीर होकर हँस पड़े और उन्होंने उनको इस प्रकार से उत्तर दिया |
श्रीभगवानुवाचकौतूहलाय दैत्यानां योषिद्वेषो मया धृतः |
पश्यता सुरकार्याणि गते पीयूषभाजने ॥
१५॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; कौतूहलाय--मोहग्रस्त करने के लिए; दैत्यानाम्--असुरों को; योषित्-वेष: --सुन्दर स्त्रीका रूप; मया--मेरे द्वारा; धृत:--धारण किया गया; पश्यता--देखते हुए कि यह मेरे लिए आवश्यक है; सुर-कार्याणि--देवताओं के हितों की रक्षा करने के लिए; गते--छीन लिए जाने पर; पीयूष-भाजने--अमृत घट के |
भगवान् ने कहा : जब असुरों ने अमृत घट छीन लिया तो मैंने उन्हें प्रत्यक्ष छलावा देकरमोहित करने के उद्देश्य से और इस तरह देवताओं के हित में कार्य करने के लिए, एक सुन्दर स्त्रीका रूप धारण कर लिया |
तत्तेडहं दर्शयिष्यामि दिदृक्षो: सुरसत्तम |
कामिनां बहु मन्तव्यं सड्डूल्पप्रभवोदयम् ॥
१६॥
तत्--वह; ते--तुमको; अहम्--मैं; दर्शयिष्यामि--दिखलाऊँगा; दिद्क्षो:--देखने के इच्छुक; सुर-सत्तम--हे देवताओं मेंश्रेष्ठ; कामिनामू--कामी पुरुषों के; बहु--अनेक; मन्तव्यम्ू--आराधना का लक्ष्य; सड्डल्प--कामेच्छाएँ; प्रभव-उदयम्--प्रबलरूप से जगाते हुए |
हे देवश्रेष्ठ) अब मैं तुम्हें अपना वह रूप दिखाऊँगा जो कामी पुरुषों द्वारा अत्यधिक सराहाजाता है |
चूँकि तुम मेरा वैसा रूप देखना चाहते हो अतएव मैं तुम्हारे समक्ष उसे प्रकट करूँगा |
तात्पर्य : शिवजी द्वारा भगवान् विष्णु से स्त्री का सबसे अधिक आकर्षक रूप प्रकट करने कहनानिश्चय ही उपहास का विषय था |
शिवजी जानते थे कि वे किसी तथाकथित सुन्दर स्त्री द्वारा विचलित श्रीशुक उबाचइति ब्रुवाणो भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत |
सर्वतश्चारयंश्चक्षुरभव आस्ते सहोमया ॥
१७॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; ब्रुवाण:--बोलते हुए; भगवान्-- भगवान् विष्णु; तत्र--वहाँ; एब--तुरन्त; अन्तरधीयत--शिवजी तथा उनके पार्षदों की दृष्टि से ओझल हो गये; सर्वतः--सर्वत्र; चारयन्ू--घुमाते हुए;चक्षु;--आँखें; भव: --शिव; आस्ते--रह गए; सह-उमया--अपनी पत्नी उमा के साथ |
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : ऐसा कहकर भगवान् विष्णु तुरन्त ही अन्तर्धान हो गयेऔर शिवजी उमा सहित वहीं पर चारों ओर आँखें घुमाते उन्हें ढूँढ़ते रह गये |
ततो ददर्शोपवने वरस्त्रियंविचित्रपुष्पारुणपललवदुमे |
विक्रीडतीं कन्दुकलीलया लसदू-दुकूलपर्यस्तनितम्बमेखलाम् ॥
१८ ॥
ततः--तत्पश्चात्; ददर्श--शिवजी ने देखा; उपवने--सुन्दर वन में; वर-स्त्रियम्ू--एक अत्यन्त सुन्दर स्त्री को; विचित्र--नानाप्रकार के; पुष्प--फूल; अरुण--गुलाबी; पल्लव--पत्तियाँ; द्रमे--वृक्षों के बीच में; विक्रीडतीम्--खेलने में व्यस्त;कन्दुक--गेंद से; लीलया--खेल-खेल में; लसत्--चमकता; दुकूल--साड़ी से; पर्यस्त--ढका; नितम्ब--कूल्हों पर;मेखलाम्--करधनी पहने |
तत्पश्चात् शिवजी ने गुलाबी पत्तियों तथा विचित्र फूलों से भरे निकट के एक सुन्दर जंगल मेंएक सुन्दर स्त्री को गेंद से खेलते देखा |
उसके कूल्हे एक चमचमाती साड़ी से ढके थे तथा एक करधनी से सुशोभित थे |
आवर्तनोद्वर्तनकम्पितस्तन-प्रकृष्टहारोरु भर: पदे पदे |
प्रभज्यमानामिव मध्यतश्चलत्-पदफप्रवालं नयतीं ततस्ततः ॥
१९॥
आवर्तन--नीचे गिरने से; उद्दर्तनत--तथा ऊपर उछलने से; कम्पित--हिलते; स्तन--दोनों स्तनों का; प्रकृष्ट--सुन्दर; हार--तथामाला के; उरु-भरैः--गुरु भार के कारण; पदे पदे-- प्रत्येक पग पर; प्रभज्यमानाम् इब--मानो टूट जायेगी; मध्यत:--शरीर केमध्य भाग में; चलत्--इस तरह हिलती डुलती; पद-प्रवालम्--मूँगे के समान लाल-लाल पाँव; नयतीम्--चंचल; ततः ततः--जहाँ-तहाँ |
चूँकि गेंद ऊपर तथा नीचे उछल रही थी अतएवं जब वह उससे खेलती तो उसके स्तन हिलतेथे और जब वह अपने मूँगों जैसे लाल मुलायम पाँवों से इधर-उधर चलती तो उन स्तनों के गुरूभार से तथा फूलों की भारी माला से उसकी कमर प्रत्येक पग पर टूटती हुई प्रतीत हो रही थी |
दिश्लु भ्रमत्कन्दुकचापले भुंशंप्रोद्विगनतारायतलोललोचनाम् |
स्वकर्णविभ्राजितकुण्डलोल्लसत्-कपोलनीलालकमण्डिताननाम् ॥
२०॥
दिश्षु--सारी दिशाओं में; भ्रमत्--उछलते; कन्दुक--गेंद; चापलै:--चपलता; भृूशम्--अब और तब; प्रोद्विग्न--चिन्ता सेयुक्त; तार--आँखें; आयत--चौड़ी खुली; लोल--चंचल; लोचनाम्--आँखों वाली; स्व-कर्ण--अपने दोनों कानों में;विभ्राजित--प्रकाशमान्; कुण्डल--कान की बालियाँ; उललसत्--चमकती; कपोल--गाल; नील--साँवले; अलक--बालोंसे युक्त; मण्डित--सुशोभित था; आननामू--मुख |
उस स्त्री का मुखमण्डल विस्तृत तथा सुन्दर था और चंचल आँखों से सुशोभित था और वहअपने हाथों द्वारा उछाली गई गेंद के साथ घूम रही थीं |
उसके कानों के दो जगमगाते कुण्डलउसके चमकते गालों पर साँवली छाया की तरह सुशोभित हो रहे थे और उसके मुख पर बिखरेबाल उसे देखने में और भी सुन्दर बना रहे थे |
एलथहुकूलं कबरीं च विच्युतांसन्नह्मतीं वामकरेण वल्गुना |
विनिघ्नतीमन्यकरेण कन्दुकंविमोहयन्तीं जगदात्ममायया ॥
२१॥
शए्लथत्--नीचे गिरती या ढीली ढाली; दुकूलम्--साड़ी; कबरीम् च--तथा सिर के बाल; विच्युतामू--खुलकर बिखरते हुए;सन्नह्मयतीम्--बाँधने का प्रयत्त करती; वाम-करेण--बाएँ हाथ से; वल्गुना--अत्यन्त आकर्षक; विनिध्नतीम्-- प्रहार करती;अन्य-करेण--दाएँ हाथ से; कन्दुकम्-गेंद को; विमोहयन्तीम्--इस प्रकार हर एक को सम्मोहित करती; जगत्--सारा संसार;आत्म-मायया--अपनी अन्तरंगा शक्ति से |
जब वह गेंद खेलती तो उसके शरीर को ढकने वाली साड़ी ढीली पड़ जाती और उसकेबाल बिखर जाते |
वह अपने सुन्दर बाएँ हाथ से अपने बालों को बाँधने का प्रयास करती औरसाथ ही दाएँ हाथ से गेंद को मारकर खेलती जा रही थी |
यह इतना आकर्षक दृश्य था किभगवान् ने अपनी अन्तरंगा शक्ति से इस तरह हर एक को मोह लिया |
तां वीक्ष्य देव इति कन्दुकलीलयेषदू-ब्रीडास्फुटस्मितविसूष्टकटाक्षमुष्ट: |
स्त्रीप्रेक्षणप्रतिसमी क्षणविह्लात्मानात्मानमन्तिक उमां स्वगणांश्व वेद ॥
२२॥
तामू--उसको; वीक्ष्य--देखकर; देव:ः--शम्भु की; इति--इस प्रकार; कन्दुक-लीलया--गेंद खेलते हुए; ईषत्--कुछ कुछ;ब्रीडा--लज्जा से; अस्फुट-- अस्पष्ट; स्मित--हँसी से युक्त; विसृष्ट-- भेजा हुआ; कटाक्ष-मुष्ट:--तिरछी चितवन से पराजित;स्त्री-प्रेक्षण --उस सुन्दर स्त्री को देखते हुए; प्रतिसमीक्षण--तथा निरन्तर उसके द्वारा देखा जाकर; विह्ल-आत्मा--जिसका मनविचलित हो; न--नहीं; आत्मानम्--स्वयं का; अन्तिके --पास ही( स्थित ); उमाम्--अपनी पत्नी उमा को; स्व-गणान् च--तथा अपने पार्षदों को; वेद--शिवजी जान सके
जब शिवजी इस सुन्दर स्त्री को गेंद खेलते हुए देख रहे थे, तब वह कभी इन पर दृष्टिडालती और लज्ा से थोड़ा हँस देती |
ज्योंही शिवजी ने उस सुन्दर स्त्री को देखा और उसने इन्हेंताका त्योंही वे स्वयं को तथा अपनी सर्वसुन्दर पत्नी उमा और अपने निकटस्थ पार्षदों को भूलगये |
तस्थाः कराग्रात्स तु कन्दुको यदागतो विदूरं तमनुव्रजत्तस्त्रिया: |
बासः ससूत्र लघु मारुतोहरद्भवस्य देवस्य किलानुपश्यतः ॥
२३॥
तस्या:--उस सुन्दरी के; कर-अग्रात्ू--हाथ से; सः--वह; तु--लेकिन; कन्दुक:ः--गेंद; यदा--जब; गत: -- गया हुआ;विदूरम्--दूर; तम्--उस गेंद को; अनुब्रजत्--पीछे-पीछे चलने लगी; स्त्रिया:--उस स्त्री के; वास:--वस्त्र; स-सूत्रमू--करधनीसहित; लघु--अत्यन्त सुन्दर होने से; मारुत:--मन्द वायु; अहरत्--उड़ा ले गई; भवस्य--शिव का; देवस्य--प्रमुख देवता;किल--निस्सन्देह; अनुपश्यतः --निरन्तर देख रहा था |
जब गेंद उसके हाथ से उछलकर दूर जा गिरी तो वह स्त्री उसका पीछा करने लगी, किन्तु जब शिवजी इन लीलाओं को देख रहे थे तो अचानक वायु उसके सुन्दर वस्त्र तथा उसकीकरधनी को जो उसे ढके हुए थे, उड़ा ले गई |
एवं तां रुचिरापाड़ीं दर्शनीयां मनोरमाम् |
इृष्ठा तस्यां मनश्नक्रे विषज्जन्त्यां भवः किल ॥
२४॥
एवम्--इस तरह; तामू--उस; रुचिर-अपाड्रीमू--आकर्षक अंगों वाली को; दर्शनीयाम्--देखने में सुहावनी; मनोरमाम्--सुगठित; दृष्ठा--देखकर; तस्याम्--उस पर; मन: चक्रे --सोचा; विषज्न्त्यामू--उसके द्वारा आकृष्ट होने के लिए; भव:--शिवजी; किल--निस्सन्देह |
इस प्रकार शिवजी ने उस स्त्री को देखा जिसके शरीर का अंग प्रत्यंग सुगठित था और उससुन्दर स्त्री ने भी उनकी ओर देखा |
अतएव यह सोचकर कि वह स्त्री उनके प्रति आकृष्ट है,शिवजी उसके प्रति अत्यधिक आकृष्ट हो गये |
तयापहतविज्ञानस्तत्कृतस्मरविहलः |
भवान्या अपि पश्यन्त्या गतह्लीस्तत्पदं ययौ ॥
२५॥
तया--उसके द्वारा; अपहत--चुराया गया; विज्ञान:--विवेक; तत्-कृत--उसके द्वारा किया गया; स्मर--मुस्कान से;विह॒लः--उसके लिए पागल होकर; भवान्या:--शिवजी की पत्नी भवानी द्वारा; अपि--यद्यपि; पश्यन्त्या:--ये घटनाएँ देखीजा रही थीं; गत-ह्ीः--सारी लज्जा से रहित; तत्-पदम्--उस स्थान पर, जहाँ पर वह थी; ययौ--गये |
उस स्त्री के साथ रमण करने की कामेच्छा के कारण अपना विवेक खोकर शिवजी उसकेलिए इतने पागल हो उठे कि भवानी की उपस्थिति में भी वे उसके पास जाने में तनिक भी नहींहिचकिचाये |
सा तमायान्तमालोक्य विवस्त्रा त्रीडिता भूशम् |
निलीयमाना वृशक्षेषु हसन्ती नान्वतिष्ठत ॥
२६॥
सा--वह स्त्री; तम्ू--शिव को; आयान्तम्ू--निकट आते हुए; आलोक्य--देखकर; विवस्त्रा--नंगी; ब्रीडिता--अत्यन्त लज्जित;भूशम्--इतनी अधिक; निलीयमाना--छिपा रही थी; वृक्षेषु--पेड़ों के बीच में; हसन्ती--हँसती हुई; न--नहीं; अन्वतिष्ठत--एक स्थान पर खड़ी रही |
वह सुन्दरी पहले ही नंगी हो चुकी थी और जब उसने देखा कि शिवजी उसकी ओर चले आरहे हैं, तो वह अत्यन्त लज्जित हुई |
इस तरह वह हँसती रही, किन्तु उसने अपने आपको वृक्षों केबीच छिपा लिया |
वह किसी एक स्थान पर खड़ी नहीं रही |
तामन्वगच्छद्धगवान्भव: प्रमुषितेन्द्रियः |
कामस्य च वशं नीतः करेणुमिव यूथप: ॥
२७॥
तामू--उसका; अन्वगच्छत्--पीछा किया; भगवान्--शिवजी ने; भवः--भव नाम से विख्यात; प्रमुषित-इन्द्रिय:--जिनकीइन्द्रियाँ विचलित थीं; कामस्य--कामवासनाओं के; च--तथा; वशम्--वशी भूत; नीत:--हो कर; करेणुम्--हथिनी; इव--सहश; यूथप:--हा थी |
शिवजी की इन्द्रियाँ विचलित थीं और वे कामवासनाओं के वशीभूत होकर उसका पीछाकरने लगे जिस तरह कोई कामी हाथी हथिनी का पीछा करता है |
सोनुव्रज्यातिवेगेन गृहीत्वानिच्छतीं स्त्रियम् |
केशबन्ध उपानीय बाहुभ्यां परिषस्वजे ॥
२८॥
सः--शिवजी ने; अनुब्रज्य--उसका पीछा करके ; अति-बेगेन--तेजी से; गृहीत्वा--पकड़ कर; अनिच्छतीम्--उसके न चाहनेपर भी; स्त्रियम्--स्त्री को; केश-बन्धे --चोटी से; उपानीय--अपने पास खींचकर; बाहुभ्याम्-- अपनी भुजाओं से;परिषस्वजे--उसका आलिंगन किया |
तेजी से उसका पीछा करते हुए शिवजी ने उसके बालों का जूड़ा पकड़ लिया और उसेअपने पास खींच लिया |
फिर उसके न चाहने पर भी उन्होंने अपनी भुजाओं में भरकर उसकाआलिड्डन कर लिया |
सोपगूढा भगवता करिणा करिणी यथा |
इतस्ततः प्रसर्पन्ती विप्रकीर्णशिरोरूहा ॥
२९॥
आत्मानं मोचयित्वाडु सुरर्षभभुजान्तरात् |
प्राद्रवत्सा पृुथुओणी माया देवविनिर्मिता ॥
३०॥
सा--वह स्त्री; उपगूढा--पकड़ी तथा आलिंगन की जाकर; भगवता--शिवजी द्वारा; करिणा--हाथी द्वारा; करिणी --हथिनी;यथा--जिस तरह; इतः तत:--इधर-उधर; प्रसर्पन््ती--साँप की तरह सरकती; विप्रकीर्ण--बिखरे; शिरोरुहा-- उसके सिर के सारे बाल; आत्मानम्--स्वयं को; मोचयित्वा--मुक्त करके; अड्र--हे राजा; सुर-ऋषभ--देवताओं में श्रेष्ठ ( शिव ); भुज-अन्तरात्--अपनी भुजाओं में बाँधकर; प्राद्रवत्--तेजी से भागने लगे; सा--वह; पृथु-श्रोणी--बड़े कूल्हों वाली; माया--अन्तरंगा शक्ति; देव-विनिर्मिता--भगवान् द्वारा प्रकट की गई |
जिस तरह हाथी हथिनी का आलिंगन करता है उसी तरह वह स्त्री, जिसके बाल बिखरे थे,शिवजी द्वारा आलिंगित होकर साँप की तरह सरकने लगी |
हे राजा, यह बड़े और ऊँचे नितम्बोंवाली स्त्री भगवान् द्वारा प्रस्तुत की गई योगमाया थी |
उसने अपने को जिस-तिस भाँति शिवजीके आलिंगन से छुड़ाया और वह भाग गई |
तस्यासौ पदवीं रुद्रो विष्णोरद्भधुतकर्मण: |
प्रत्यपद्यत कामेन वैरिणेव विनिर्जित: ॥
३१॥
तस्य--उनका ( शिवजी ); असौ--शिवजी; पदवीम्--स्थान; रुद्र: --शिवजी; विष्णो: -- भगवान् विष्णु की; अद्भुत-कर्मण:--वह जो अद्भुत कार्य करता है; प्रत्यपद्यत--पीछा करने लगा; कामेन--कामवासना के कारण; बैरिणा इब--शत्रुकी तरह; विनिर्जित:--सताया गया |
शिवजी भगवान् विष्णु का जो आश्चर्यजनक कार्य करने वाले हैं और जिन्होंने मोहिनी रूपधारण कर रखा था, ऐसे पीछा करने लगे जैसे वे काम-वासना रूपी शत्रु द्वारा सताये गए हों |
तस्यानुधावतो रेतश्वस्कन्दामोघरेतस: |
शुष्मिणो यूथपस्येव वासितामनुधावत: ॥
३२॥
तस्य--उनका ( शिवजी का ); अनुधावत:--जो पीछा कर रहा था; रेत:--वीर्य; चस्कन्द--गिरा; अमोघ-रेतस:--उस पुरुषका, जिसका वीर्य-स्खलन कभी निष्फल नहीं जाता; शुष्पिण:--मदान्ध; यूथपस्थ--नर हाथी; इब--की भाँति; वासिताम्--गर्भधारण करने में सक्षम हथिनी; अनुधावत:--पीछा करने वाला
जिस प्रकार गर्भधारण करने में सक्षम हथिनी का पीछा मदान्ध हाथी करता है, उसी तरहशिवजी उस सुन्दर स्त्री का पीछा कर रहे थे |
यद्यपि उनका वीर्य व्यर्थ में स्खलित नहीं होता,किन्तु इस अवसर पर उनका वीर्य स्खलित हो गया |
यत्र यत्रापतन्मह्मां रेतस्तस्य महात्मन: |
तानि रूप्यस्य हेम्नश्व क्षेत्राण्यासन्महीपते ॥
३३॥
यत्र--जहाँ; यत्र--जहाँ; अपतत्--गिरा; मह्याम्-- भूमि पर; रेत:--वीर्य; तस्य--उसका; महा-आत्मन:--महापुरुष ( शिव )का; तानि--उन स्थानों का; रूप्यस्थ--चाँदी की; हेम्न:--सोने की; च--तथा; क्षेत्राणि--खानें; आसन्ू--बन गईं; मही-पते--हे राजा |
हे राजा! पृथ्वी पर जहाँ-जहाँ महापुरुष शिवजी का वीर्य गिरा वहीं-वहीं बाद में सोने तथाचाँदी की खानें प्रकट हो गईं |
सरित्सरःसु शैलेषु वनेषुपवनेषु च |
यत्र क्व चासन्नृषयस्तत्र सन्निहितो हर: ॥
३४॥
सरित्--नदी के किनारों के निकट; सरःसु--तथा झीलों के निकट; शैलेषु--पर्वतों के पास; वनेषु--जंगलों में; उपवनेषु--उद्यानों या छोटे जंगलों में; च-- भी; यत्र--जहाँ; क्व--कहीं; च-- भी; आसनू--विद्यमान थे; ऋषय:--ऋषिगण; तत्र--वहाँ;सन्निहितः--उपस्थित थे; हर:ः--शिवजी |
शिवजी मोहिनी का पीछा करते हुए नदियों तथा झीलों के किनारे, पर्वतों, जंगलों, उद्यानोंके पास तथा जहाँ कहीं ऋषिमुनि रह रहे थे, गये |
स्कन्ने रेतसि सोपश्यदात्मानं देवमायया |
जडीकृतं नृपश्रेष्ठ सन््यवर्तत कश्मलातू ॥
३५॥
स्कन्ने--पूर्णतया स्खलित होने पर; रेतसि--वीर्य; सः--शिवजी ने; अपश्यत्--देखा; आत्मानम्--अपने को; देव-मायया--भगवान् की माया से; जडीकृतम्--मूर्ख की भाँति वशीभूत हुआ; नृप-श्रेष्ठ--हे राजाओं में श्रेष्ठ ( महाराजपरीक्षित );सन्ञ्यवर्तत--अपने को आगे बढ़ने से रोका; कश्मलात्--मोह सेहे राज
श्रेष्ठ महाराज परीक्षित! जब शिवजी का वीर्य पूर्णतया स्खलित हो गया तो उन्होंनेदेखा कि वे किस प्रकार भगवान् द्वारा उत्पन्न माया के द्वारा वशीभूत हो गए |
इस तरह उन्होंनेअपने आपको माया द्वारा और अधिक वशीभूत होने से रोका |
अथावगतमाहात्म्य आत्मनो जगदात्मन: |
अपरिज्नेयवीर्यस्य न मेने तदु हाद्भुतम् ॥
३६॥
अथ--इस प्रकार; अवगत--आश्वस्त होकर; माहात्म्यः --महानता; आत्मन: --अपनी; जगत्-आत्मन: --तथा भगवान् की;अपरिज्ेय-वीर्यस्थ--असीम शक्तिमान; न--नहीं; मेने--विचार किया; तत्--मोहित करने में भगवान् के अद्भुत कार्यकलापोंको; उह--निश्चय ही; अद्भुतम्ू--मानो अद्भुत
इस प्रकार शिवजी को अपनी तथा असीम शक्तिमान भगवान् की स्थिति का बोध हो गया |
इस ज्ञान के प्राप्त होने पर उन्हें तनिक भी आश्चर्य नहीं हुआ कि भगवान् विष्णु ने किस अद्भुतविधि से उन पर माया का जाल फैलाया था |
तमविक्लवमत्रीडमालक्ष्य मधुसूदन: |
उवाच परमप्रीतो बिभ्रत्स्वां पौरुषीं तनुम्ू ॥
३७॥
तम्ू--उसको ( शिवजी को ); अविक्लवम्--इस घटना से विचलित हुए बिना; अब्रीडम्--बिना लज्जा के; आलक्ष्य--देखकर;मधु-सूदन:--मधु राक्षस का वध करने वाले भगवान् ने; उबाच--कहा; परम-प्रीत:--अत्यधिक प्रसन्न होकर; बिभ्रत्ू-- धारणकरके; स्वाम्--अपना; पौरुषीम्--मूल; तनुम्ू-रूप |
शिवजी को अविचलित एवं लज्जारहित देखकर भगवान् विष्णु ( मधुसूदन ) अत्यन्त प्रसन्नहुए |
तब उन्होंने अपना मूल रूप धारण कर लिया और वे इस प्रकार बोले |
श्रीभगवानुवाचदिष्टद्या त्वं विबुधश्रेष्ठ स्वां निष्ठामात्मना स्थित: |
अन्से स्त्रीरूपया स्वैरं मोहितो प्यड़ मायया ॥
३८॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; दिष्टयया--कल्याण हो; त्वमू--तुम्हारा; विबुध-श्रेष्ट--हे समस्त देवताओं में श्रेष्ठ;स्वामू--अपनी; निष्ठाम्--स्थिर दशा में; आत्मना--अपने आप; स्थित: --स्थित हो; यत्--क्योंकि; मे--मेरे; स्त्री-रूपया--स्त्रीजैसे स्वरूप से; स्वैरम्--पर्याप्त; मोहित:--सम्मोहित; अपि--होते हुए भी; अड़--हे शिवजी; मायया--मेरी शक्ति के द्वारा
भगवान् ने कहा : हे देवताओं में श्रेष्ठ! यद्यपि तुम मेरे द्वारा स्त्रीरूप धारण करने की मेरीशक्ति द्वारा अत्यधिक पीड़ित हुए हो, किन्तु तुम अपने पद पर स्थिर हो |
अतएव तुम्हारा कल्याणहो |
को नु मेतितरेन्मायां विषक्तस्त्वहते पुमान् |
तांस्तान्विसृजतीं भावान्दुस्तरामकृतात्मभि: ॥
३९॥
कः--क्या; नु--निस्सन्देह; मे--मेरा; अतितरेत्ू--पार पा सकता है; मायाम्--माया को; विषक्त:-- भौतिक इन्द्रिय-भोग मेंआसक्त; त्वतू-ऋते--आपके अतिरिक्त; पुमान्-व्यक्ति; तानू--ऐसी दशाओं; तान्ू--आसक्त पुरुषों को; विसृजतीम्--पार करसकने में; भावानू-- भौतिक कार्यकलापों के फलों को; दुस्तराम्--पार कर पाना दुष्कर; अकृत-आत्मभि:--अपनी इन्द्रियों कोवश में करने में असमर्थ व्यक्तियों द्वारा |
हे प्रिय शम्भु! इस भौतिक जगत में तुम्हारे अतिरिक्त ऐसा कौन है, जो मेरी माया से पार पासके ? सामान्यतया लोग इन्द्रियभोग में आसक्त रहते हैं और इसके प्रभाव में फँस जाते हैं |
निस्सन्देह, उनके लिए माया के प्रभाव को लाँघ पाना अत्यन्त कठिन है |
सेयं गुणमयी माया न त्वामभिभविष्यति |
मया समेता कालेन कालरूपेण भागशः ॥
४०॥
सा--वह दुर्लध्य; इयम्--यह; गुण-मयी--प्रकृति के तीनों गुणों से युक्त; माया--माया; न--नहीं; त्वामू--तुमको;अभिभविष्यति-- भविष्य में मोहित करने में समर्थ होगी; मया--मेरे साथ; समेता--संयुक्त; कालेन--नित्य समय द्वारा; काल-रूपेण--काल के रूप में; भागश:--अपने विभिन्न अंशों सहित |
यह भौतिक बहिरंगा शक्ति ( माया ), जो सृष्टि में मुझे सहयोग देती है और प्रकृति के तीनोंगुणों में प्रकट होती है अब तुम्हें मोहित नहीं कर सकेगी |
श्रीशुक उबाचएवं भगवता राजन्श्रीवत्साड्डेन सत्कृतः |
आमन्त्र्य तं परिक्रम्य सगण: स्वालयं ययौ ॥
४१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; भगवता-- भगवान् द्वारा; राजन्--हे राजा; श्रीवत्स-अद्डजेन--अपने वक्षस्थल पर श्रीवत्स-चिह्न धारण करने वाले; सत्-कृतः--अत्यन्त प्रशंसित होकर; आमनत्रय--अनुमति लेकर;तम्--उसको; परिक्रम्य--परिक्रमा करके; स-गण:--अपने गणों समेत; स्व-आलयम्--अपने धाम को; ययौ--वापस चलेगये
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा! वक्षस्थल पर श्रीवत्स-चिन्ह धारण करने वाले भगवान्द्वारा इस प्रकार प्रशंसित होकर शिवजी ने उनकी परिक्रमा की |
फिर उनकी अनुमति लेकरशिवजी अपने गणों सहित अपने धाम कैलास लौट गये |
आत्मांशभूतां तां मायां भवानीं भगवान्भव: |
सम्मतामृषिमुख्यानां प्रीत्याचष्टाथ भारत ॥
४२॥
आत्म-अंश-भूताम्-परमात्मा की शक्ति; तामू--उस; मायामू--माया को; भवानीम्--शिवजी की पत्नी को; भगवानू--शक्तिमान; भव:--शिवजी; सम्मताम्--स्वीकार किया हुआ; ऋषि-मुख्यानाम्--महान् ऋषियों द्वारा; प्रीत्या--हर्ष सहित;आचष्ट--सम्बोधित किया; अथ--तब; भारत--हे भरतवंशी महाराज परीक्षित |
है भरतवंशी महाराज! तब शिवजी ने परम प्रसन्न होकर अपनी पत्नी भवानी को सम्बोधित किया जो सभी अधिकारियों द्वारा भगवान् विष्णु की शक्ति के रूप में स्वीकार की जाती हैं |
अयि व्यपश्यस्त्वमजस्य मायांपरस्य पुंसः परदेवताया: |
अहं कलानामृषभोपि मुझेययावशोडन्ये किमुतास्वतन्त्रा: ॥
४३॥
अयि--ओह; व्यपश्य:--देखा है; त्वमू--तुमने; अजस्यथ--अजन्मा का; मायाम्ू--माया को; परस्य पुंसः--परम पुरुष का; पर-देवताया: --परम सत्य; अहम्--मैं; कलानाम्--स्वांशों का; ऋषभ: -- प्रमुख; अपि--यद्यपि; मुहो--मोहित हो गया; यया--जिसके द्वारा; अवश:--अवश; अन्ये--अन्य; किम् उत--क्या कहा जाये; अस्वतन्त्रा:--माया पर पूरी तरह आश्रित
शिवजी ने कहा : हे देवी! अब तुमने भगवान् की माया देख ली है, जो सबके अजन्मास्वामी हैं |
यद्यपि मैं उनके प्रमुख विस्तारों में से एक हूँ तो भी मैं उनकी शक्ति से भ्रमित हो गयाथा |
तो फिर, उन लोगों के विषय में क्या कहा जाये जो माया पर पूर्णतः आश्रित हैं ? यं मामपृच्छस्त्वमुपेत्य योगात्समासहस्त्रान्त उपारतं वे |
स एष साक्षात्पुरुष: पुराणोन यत्र कालो विशते न वेद: ॥
४४॥
यमू्--जिसके विषय में; माम्--मुझसे; अपृच्छ: --पूछा; त्वमू--तुमने; उपेत्य--पास आकर; योगात्--योग साधन से; समा--वर्ष; सहस्त्र-अन्ते--एक हजार के अन्त में; उपारतम्--समाप्त होकर; बै--निस्सन्देह; सः--वह; एष:--यहाँ है; साक्षात्--प्रत्यक्ष; पुरुष: --परम पुरुष; पुराण:--आदि; न--नहीं; यत्र--जहाँ; काल:--काल; विशते-- प्रवेश कर सकता है; न--नहीं;वेदः--वेद |
जब मैंने एक हजार वर्षों की योग-साधना पूरी कर ली तो तुमने मुझसे पूछा था कि मैंकिसका ध्यान कर रहा था |
अब ये वही परम पुरुष हैं जिन तक काल नहीं पहुँच पाता औरजिन्हें वेद नहीं समझ पाते |
श्रीशुक उबाचइति तेडभिहितस्तात विक्रम: शार्डूधन्वन: |
सिन्धोर्निर्मथने येन धृतः पृष्ठे महाचल: ॥
४५॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; ते--तुमको; अभिहित:--बताया गया; तात--हे राजा;विक्रम:--पराक्रम; शार्ड-धन्वन:--शार्ड़ धनुष धारण करने वाले भगवान् का; सिन्धो: --क्षीरसागर के; निर्मथने--मन्थन में;येन--जिससे; धृतः--धारण किया गया था; पृष्ठे--पीठ पर; महा-अचलः:--विशाल पर्वत
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा! जिस पुरुष ने क्षीरसागर के मन्थन के लिए अपनी पीठपर महान् पर्वत धारण किया था वही शार्ड्धन्वा नामक भगवान् हैं |
मैंने तुमसे अभी उन्हीं केपराक्रम का वर्णन किया है |
एतन्मुहु: कीर्तयतोनुश्रुण्वतोन रिष्यते जातु समुद्यम: क्वचित् |
यदुत्तमश्लोकगुणानुवर्णनंसमस्तसंसारपरिश्रमापहम् ॥
४६॥
एतत्--यह कथा; मुहुः--निरन्तर; कीर्तयत:--कीर्तन करने वाले का; अनुश्रुण्वतः--तथा सुनने वाले का है; न--नहीं;रिष्यते--विनाश किया जाता है; जातु--किसी समय; समुद्यम:-- प्रयास; क्वचित्ू--किसी समय; यत्--क्योंकि;उत्तमशलोक--भगवान् का; गुण-अनुवर्णनम्--दिव्य गुणों का वर्णन करते हुए; समस्त--सभी; संसार--संसार का;परिश्रम--कष्ट; अपहम्--समाप्त करने वाला |
जो कोई क्षीरसागर के मन्थन की इस कथा को निरन्तर सुनता या सुनाता है, उसका प्रयासकभी भी निष्फल नहीं होगा |
निस्सन्देह, भगवान् के यश का कीर्तन इस भौतिक संसार मेंसमस्त कष्टों को ध्वस्त करने का एकमात्र साधन है |
असदविषयमडिंध्रि भावगम्यं प्रपन्ना-नमृतममरवर्यानाशयत्तसिन्धुमथ्यम् |
'कपटयुवतिवेषो मोहयन्यः सुरारीं-स्तमहमुपसूतानां कामपूरं नतोस्मि ॥
४७॥
असतू-अविषयम्--नास्तिकों की समझ में न आने वाला; अड्प्रिमू-- भगवान् के चरणकमलों को; भाव-गम्यम्--भक्तों कीसमझ में आने वाला; प्रपन्नान्ू--पूर्णतया शरणागत; अमृतम्--अमृत; अमर-बर्यान्ू--केवल देवताओं को; आशयत्-पीने केलिए; सिन्धु-मथ्यम्-- क्षीरसागर से उत्पन्न; कपट-युवति-वेष:--मिथ्या तरुणी के रूप में प्रकट होकर; मोहयन्--मोहते हुए;यः--जो; सुर-अरीन्ू--देवताओं के शत्रुओं को; तम्--उसको; अहम्--मैं; उपसृतानाम्--भक्तों का; काम-पूरम्--समस्तइच्छाओं को पूरा करने वाला; नतः अस्मि--मैं नमस्कार करता हूँ |
एक तरुण स्त्री का रूप धारण करके तथा इस प्रकार असुरों को मोहित करके भगवान् नेअपने भक्तों अर्थात् देवताओं को क्षीरसागर के मन्थन से उत्पन्न अमृत बाँट दिया |
मैं उन भगवान्को जो अपने भक्तों की इच्छाओं को सदा पूरा करते हैं अपना सादर नमस्कार अर्पित करता हूँ |
