← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 8 की सूची

अध्याय ग्यारह: राजा इंद्र ने राक्षसों का विनाश किया

8.11श्रीशुक उबाचअथो सुराः प्रत्युपलब्धचेतस:परस्य पुंस: परयानुकम्पया |

जछ्नुर्भूश॑ शक्रसमीरणादयस्‌तांस्तात्रणे यैरभिसंहता: पुरा ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; अथो--तत्पश्चात्‌; सुरा:--सारे देवता; प्रत्युपलब्ध-चेतस:--चेतना आ जानेसे पुनः जीवित होकर; परस्य--परम; पुंसः-- भगवान्‌ की; परया--परम; अनुकम्पया--कृपा से; जघ्नु:--पीटने लगे; भूशम्‌-- पुनः पुनः; शक्र--इन्द्र; समीरण--वायु; आदय: --इत्यादि; तान्‌ तानू--उन-उन राक्षसों को; रणे--युद्ध में; यैः --जिनके द्वारा;अभिसंहता: --हराये गये थे; पुरा--पहले |

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ श्रीहरि की परम कृपा से इन्द्र, वायु इत्यादिसारे देवता जीवित हो गये |

इस प्रकार जीवित होकर सारे देवता उन्ही असुरों को बुरी तरह पीटनेलगे जिन्होंने पहले उन्हें परास्त किया था |

वैरोचनाय संरब्धो भगवान्पाकशासन: |

उदयच्छद्यदा वजन प्रजा हा हेति चुक्रुशु: ॥

२॥

वैरोचनाय--बलि महाराज को ( मारने के लिए ); संरब्ध:--अत्यन्त क्रुद्ध होकर; भगवान्‌--अत्यन्त शक्तिशाली; पाक-शासन:--इनद्र ने; उदयच्छत्‌--हाथ में लिया; यदा--जिस समय; वज़म्‌--वज़; प्रजा:--सारे असुर; हा हा--हाय हाय; इति--इस प्रकार; चुक़्ुशु:--चिल्लाने लगे |

जब परमशक्तिशाली इन्द्र क्रुद्ध हो गए और उन्होंने महाराज बलि को मारने के लिए अपनेहाथ में बज्न ले लिया तो सारे असुर ' हाय हाय ' चिल्ला कर शोक करने लगे |

वज्रपाणिस्तमाहेदं तिरस्कृत्य पुरः:स्थितम्‌ |

मनस्तविनं सुसम्पन्नं विचरन्तं महामृथे ॥

३॥

वज़-पाणि:--हाथ में सदा वज़ रहता है, जिसके, इन्द्र; तम्‌ू--बलि महाराज को; आह--सम्बोधित किया; इृदम्‌--इस तरह;तिरस्कृत्य--प्रताड़ित करके; पुरः-स्थितम्‌--उसके सामने खड़े होकर; मनस्विनम्‌ू--अत्यन्त गम्भीर तथा सहिष्णु; सु-सम्पन्नम्‌ू--युद्ध के साज-सामान से युक्त; विचरन्तम्‌-घूमते हुए; महा-मृधे --विशाल युद्धस्थल में |

गम्भीर, सहिष्णु तथा लड़ने के साज-सामान से भलीभान्ति युक्त बलि महाराज उस विशालयुद्धस्थल में इन्द्र के सामने घूम रहे थे |

सदा हाथ में बज्न लिये रहने वाले इन्द्र ने बलि महाराजको इस प्रकार तिरस्कारपूर्वक ललकारा |

नटवन्मूढ मायाभिर्मायेशान्नो जिगीषसि |

जित्वा बालान्निबद्धाक्षान्नटो हरति तद्धनम्‌ ॥

४॥

नट-वत्‌-- धूर्त या ठग की तरह; मूढ-रे धूर्त; मायाभि:--माया करके; माया-ईशान्‌--माया को वश में करने वाले देवताओंको; नः--हम सब को; जिगीषसि--विजयी बनना चाहते हो; जित्वा--जीतकर; बालानू--बच्चों को; निबद्ध-अक्षान्‌-- आँखेंबाँध कर; नट:--ठग; हरति--ले जाता है; तत्‌ू-धनम्‌--बच्चे का धन |

इन्द्र ने कहा : रे धूर्त! जिस प्रकार ठग बच्चे की आँखों को बाँध कर कभी-कभी उसकाधन ले जाता है उसी प्रकार तुम यह जानते हुए कि हम सब ऐसी माया-शक्तियों के स्वामी हैं,अपनी कोई मायाशक्ति दिखलाकर हमें परास्त करना चाहते हो |

आरुरुक्षन्ति मायाभिरुत्सिसृप्सन्ति ये दिवम्‌ |

तान्दस्यून्विधुनोम्यज्ञान्पूर्वस्माच्य पदादध: ॥

५॥

आसरुरुक्षन्ति--व्यक्ति जो उच्च लोकों को जाना चाहते हैं; मायाभि:ः--तथाकथित योगशक्ति या विज्ञान के भौतिक विकास द्वारा;उत्सिसृप्सन्ति--या ऐसे झूठे प्रयासों से मुक्त होना चाहते हैं; ये--जो व्यक्ति; दिवमू--स्वर्गलोक को; तान्‌ू--ऐसे धूर्तों तथा लंठोंको; दस्यूनू--ऐसे चोरों को; विधुनोमि--मैं नीचे गिराता हूँ; अज्ञानू--मूर्ख ; पूर्वस्मात्‌ू--पिछला; च-- भी; पदात्‌-- पद से;अधः--नीचे |

उन मूर्खों तथा धूर्तों को जो माया से या यांत्रिक साधनों से उच्चलोकों तक पहुँचना चाहते हैंया जो उच्चलोकों को भी पार करके वैकुण्ठलोक या मुक्ति प्राप्त करना चाहते हैं, मैं उन्हेंब्रह्माण्ड के सबसे निम्न भाग में भिजवाता हूँ |

सोइहं दुर्मायिनस्तेउद्य वज्ेण शतपर्वणा |

शिरो हरिष्ये मन्दात्मन्धटस्व ज्ञातिभि: सह ॥

६॥

सः--वही शक्तिशाली पुरुष; अहम्‌--मैं ( इन्द्र ); दुर्मायिन:--माया से इतनी जादूगरी करने वाले तुम; ते--तुम्हारा; अद्य--आज; वज्ेण--वज़ से; शत-पर्वणा--सैकड़ों तीक्ष्ण धारों वाला; शिर:--सिर; हरिष्ये--पृथक्‌ कर दूँगा; मन्द-आत्मन्‌--हेअज्ञानी; घटस्व--इस युद्धस्थल में रहते रहो; ज्ञातिभि: सह--अपने सम्बन्धियों तथा सहायकों सहित |

आज, मैं, वही शक्तिशाली व्यक्ति, हजारों तेज धारों वाले अपने वज्र से तुम्हारे सिर कोशरीर से काटकर अलग कर दूँगा |

यद्यपि तुम माया द्वारा पर्याप्त चमत्कार दिखा सकते हो,किन्तु तुम्हारा ज्ञान अत्यल्प है |

अब तुम अपने परिजनों तथा मित्रों सहित युद्धभूमि में ठहरने कीही चेष्टा दिखा करो |

श्रीबलिरुवाचसड्ग्मामे वर्तमानानां कालचोदितकर्मणाम्‌ |

कीर्तिजयोजयो मृत्यु: सर्वेषां स्युरनुक्रमात्‌ ॥

७॥

श्री-बलि: उवाच--बलि महाराज ने कहा; सड्ग्रामे--युद्धभूमि में; वर्तमानानामू--यहाँ जो लोग उपस्थित हैं उनका; काल-चोदित--काल के प्रभाव से; कर्मणाम्‌ू--लड़ने या अन्य कार्यों में लगे मनुष्यों के लिए; कीर्ति:--यश; जय:--विजय;अजय:-हहार; मृत्यु:--मृत्यु; सर्वेषाम्‌--सब की; स्यु:--होनी चाहिए; अनुक्रमात्‌- क्रमशः

बलि महाराज ने उत्तर में कहा : सभी लोग जो इस युद्धभूमि में उपस्थित हैं निश्चय ही नित्यकाल के वश में हैं और वे अपने-अपने नियत कर्मों के अनुसार क्रमश: यश, विजय, हार तथामृत्यु प्राप्त करेंगे |

तदिदं कालरशनं जगत्पश्यन्ति सूरयः |

न हृष्यन्ति न शोचन्ति तत्र यूयमपण्डिता: ॥

८॥

तत्‌--अतएव; इृदम्‌--यह सम्पूर्ण भौतिक जगत; काल-रशनम्‌--काल के कारण गतिमान्‌; जगत्‌--आगे बढ़ता ( यह सम्पूर्णब्रह्माण्ड ); पश्यन्ति--देखते हैं; सूरय:ः--सत्य से अवगत होने के कारण जो बुद्धिमान्‌ हैं; न--नहीं; हृष्यन्ति--हर्षित होते हैं;न--न तो; शोचन्ति-- पछताते हैं; तत्र--ऐसे में; यूयम्‌--तुम सारे देवता; अपण्डिता:--पण्डित नहीं हो ( यह भूलकर कि तुमकाल के अधीन कार्य कर रहे हो )॥

काल की गतियों को देखकर, जो लोग वास्तविक सत्य से अवगत हैं, वे विभिन्नपरिस्थितियों के लिए न तो हर्षित होते हैं, न सोचते हैं |

चूँकि तुम लोग अपनी विजय पर हर्षितहो अतः तुम्हें अत्यन्त विद्वान नहीं कहा जा सकता |

न वयं मन्यमानानामात्मानं तत्र साधनम्‌ |

गिरो वः साथधुशोच्यानां गृह्लीमो मर्मताडना: ॥

९॥

न--नहीं; वयम्‌--हम; मन्यमानानाम्‌--मानने वालों का; आत्मानम्‌--स्वयं; तत्र--विजय या हार में; साधनम्‌--कारण;गिर:--शब्द; वः--तुम्हारा; साधु-शोच्यानाम्‌ू--जिन पर साधु पुरुषों को तरस आता है; गृह्लीम:--स्वीकार करते हैं; मर्म-ताडना:ः:--हृदय को पीड़ा पहुँचाने वाले |

तुम देवता लोग अपने आपको अपनी ख्याति तथा विजय प्राप्त करने का कारण मानते हो |

तुम लोगों की अज्ञानता के कारण साधु पुरुष तुम्हारे लिए शोक करते हैं |

अतएव तुम्हारे वचनमर्मस्पर्शी होते हुए भी हमें स्वीकार्य नहीं हैं |

श्रीशुक उबाचइत्याक्षिप्य विभुं वीरो नाराचेर्वीरमर्दन: |

आकर्णपूर्णरहनदाक्षेपैराह तं पुन: ॥

१०॥

श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; आक्षिप्य--प्रताड़ित करके; विभुम्‌--इन्द्र को; वीर: --बहादुर बलि महाराज; नाराचै:--नाराच नामक बाणों से; वीर-मर्दन:--बड़े-बड़े वीरों को भी दमित करने वाले बलि महाराज;आकर्ण-पूर्ण:--कानों तक खींचकर; अहनत्‌--आक्रमण किया; आश्षेपै:--प्रताड़ना के शब्दों से; आह--कहा; तम्‌--उससे;पुनः--फिर |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : स्वर्ग के राजा इन्द्र को इस प्रकार कटु वचनों से फटकारने केबाद वीरों को मर्दन करने वाले बलि महाराज ने नाराच बाणों को अपने कान तक खींचा और उनसे इन्द्र पर आक्रमण कर दिया |

उन्होंने पुन: इन्द्र को कठोर शब्दों से प्रताड़ित किया |

एवं निराकृतो देवो वैरिणा तथ्यवादिना |

नामृष्यत्तदधिक्षेपं तोत्राहत इव द्विप: ॥

११॥

एवम्‌--इस प्रकार; निराकृत:--हारकर; देव: --राजा इन्द्र; वैरिणा-- अपने शत्रु से; तथ्य-वादिना--सत्य कहने में पटु; न--नहीं; अमृष्यत्‌--पछताया; तत्‌--उसकी ( बलि की ); अधिक्षेपम्‌--प्रताड़ना; तोत्र--अंकुश या दण्ड से; आहत:ः--माराजाकर; इब--सहश; द्विप:--हाथी |

चूँकि महाराज बलि की फटकारें सत्य थीं अतएव इन्द्र तनिक भी खिन्न नहीं हुआ जिस तरहएक हाथी पीलवान द्वारा अंकुश से पीटा जाने पर भी कभी विचलित नहीं होता |

प्राहरत्कुलिशं तस्मा अमोघं परमर्दनः |

सयानो न्यपतद्धूमौ छिन्नपक्ष इवाचल: ॥

१२॥

प्राहरत्‌--मारा जाकर; कुलिशम्‌--वज् दण्ड; तस्मै--उसको ( बलि महाराज को ); अमोघम्‌--अच्युत; पर-मर्दन:--शत्रु कोहराने में पटु, इन्द्र; स-यान:--अपने वायुयान सहित; न्यपतत्‌--गिर पड़ा; भूमौ--पृथ्वी पर; छिन्न-पक्ष:--जिसके पंख काटलिये गये हों; इब--सहश; अचल: --पर्वत |

जब शत्रुओं को हराने वाले इन्द्र ने अपना अमोघ वज्ञ बलि महाराज पर उन्हें मारने की इच्छासे चलाया तो सचमुच बलि महाराज अपने वायुयान समेत भूमि पर गिर पड़े मानो कोई पर्वतपंख काटे जाने से गिरा हो |

सखाय॑ पतितं दृष्ठा जम्भो बलिसख: सुहत्‌ |

अभ्ययात्सौहदं सख्युहतस्थापि समाचरन्‌ ॥

१३॥

सखायम्‌--अपने घनिष्ठ मित्र को; पतितम्‌--गिरा हुआ; दृष्टा--देखकर; जम्भ:--जम्भ नामक राक्षस; बलि-सख:--बलिमहाराज का घनिष्ठ मित्र; सुहृतू--तथा निरन्तर शुभ चाहने वाला; अभ्ययात्‌--वहाँ पर प्रकट हुआ; सौहदम्‌--अत्यन्त दयालुमित्रता; सख्यु:--अपने मित्र का; हतस्य--जो चोट खाकर गिर गया था; अपि--यद्यपि; समाचरनू--मैत्रीपूर्ण कार्य निबाहने केलिए

जब जम्भासुर ने देखा कि उसका मित्र बलि गिर गया है, तो वह उसके शत्रु इन्द्र के समक्ष प्रकट हुआ मानो मैत्रीपूर्ण आचरण से बलि महाराज की सेवा करने के लिए आया हो |

स सिंहवाह आसाद्य गदामुद्यम्य रहसा |

जत्रावताडयच्छक्रं गजं च सुमहाबल: ॥

१४॥

सः--जम्भासुर ने; सिंह-वाह:--सिंह द्वारा ले जाया गया; आसाद्य--इन्द्र के समक्ष आकर; गदाम्‌ू--अपनी गदा को; उद्यम्य--निकालकर; रंहसा--बलपूर्वक; जत्रौ--गर्दन के निचले भाग पर; अताडयत्‌--मारा; शक्रम्‌--इन्द्र को; गजम्‌ च--तथा उसकेहाथी को; सु-महा-बल:--उस शक्तिशाली जम्भासुर ने |

अत्यन्त शक्तिशाली जम्भासुर सिंह पर सवार होकर इन्द्र के पास आया और उसने अपनीगदा से उसके कंधे पर बलपूर्वक प्रहार किया |

उस ने इन्द्र के हाथी पर भी प्रहार किया |

गदाप्रहारव्यधितो भूशं विह्लितो गज: |

जानुभ्यां धरणीं स्पृष्ठा कश्मलं परमं ययौ ॥

१५॥

गदा-प्रहार-व्यधित:--जम्भासुर की गदा की चोट से पीड़ित; भूशम्‌--अत्यधिक; विहलितः--उद्विग्न; गज:--हाथी;जानुभ्याम्‌--अपने दोनों घुटनों से; धरणीम्‌--पृथ्वी को; स्पृष्टठा--छूकर; कश्मलम्‌--अचेत; परमम्‌--अत्यधिक; ययौ--होगया |

जम्भासुर की गदा से चोट खाकर इन्द्र का हाथी विचलित और पीड़ित हो गया |

उसने भूमिपर घुटने टेक दिये और वह अचेत होकर गिर गया |

ततो रथो मातलिना हरिभिर्दशशतैर्वृतः |

आनीतो द्विपमुत्सृज्य रथमारुरुहे विभु: ॥

१६॥

ततः--तत्पश्चात्‌; रथ: --रथ; मातलिना--मातलि नामक सारथी द्वारा; हरिभि:ः--घोड़ों से; दश-शतैः--सौ का दस गुना, एकहजार; वृतः--जुते हुए; आनीत:--लाया जाकर; द्विपम्‌--हाथी को; उत्सृज्य--छोड़कर; रथम्‌--रथ में; आरुरुहे--चढ़ गया;विभुः--महान्‌ इच्ध |

तत्पश्चात्‌ इन्द्र का सारथी मातलि इन्द्र का रथ ले आया जिसे एक हजार घोड़े खींच रहे थे |

तब इन्द्र ने अपने हाथी को छोड़ दिया और वह रथ पर चढ़ गया |

तस्य तत्पूजयन्कर्म यन्तुर्दानवसत्तम: |

शूलेन ज्वलता तं तु स्मयमानो हनन्मृथे ॥

१७॥

तस्य--मातलि की; तत्‌--वह सेवा ( इन्द्र के समक्ष रथ को लाना ); पूजयन्‌-- प्रशंसा करते हुए; कर्म--स्वामी की ऐसी सेवा;यन्तु:--सारथी का; दानव-सत्‌ू-तमः --असुर श्रेष्ठ, जम्भासुर; शूलेन--त्रिशूल से; ज्वलता-- अग्नि की लपटें निकालता;तम्‌--मातलि को; तु--निस्सन्देह; स्मयमान: --मुस्काते हुए; अहनत्‌--मारा; मृधे--युद्धस्थल में |

मातलि के सेवाभाव की प्रशंसा करते हुए असुरश्रेष्ठ जम्भासुर मुस्कराने लगा |

फिर भी उसनेयुद्धभूमि में अग्नि के समान जलते हुए अपने त्रिशूल से मातलि पर प्रहार कर दिया |

सेहे रुजं सुदुर्मर्षा सत्त्तमालम्ब्य मातलि: |

इन्द्रो जम्भस्य सड़्क्रुद्धो वज़ेणापाहरच्छिर: ॥

१८॥

सेहे--सहन कर लिया; रुजम्‌ू--पीड़ा को; सु-दुर्मर्षाम्‌--असहा; सत्त्वम्‌--थैर्य; आलम्ब्य-- धारण करके; मातलि:--सारथीमातलि ने; इन्द्र:--इन्द्र; जम्भस्य--जम्भासुर का; सड्क्रुद्ध:--उस पर क्ुद्ध होकर; वज़ेण--अपने वज् से; अपाहरत्‌ू--अलगकर दिया; शिरः--सिर को |

यद्यपि मातलि की वेदना असहा थी, किन्तु उसने बड़े धैर्य से उसे सह लिया |

किन्तु इन्द्रजम्भासुर पर अत्यधिक क्रुद्ध हो उठा |

उसने अपने वज्ञ से उस पर प्रहार किया और उसके सिरको धड़ से अलग कर दिया |

जम्भं श्रुत्वा हतं तस्य ज्ञातयो नारदाहषे: |

नमुचिश्च बलः पाकस्तत्रापेतुस्त्वरान्विता: ॥

१९॥

जम्भम्‌--जम्भासुर को; श्रुत्वा--सुनकर; हतम्‌--मारा गया; तस्य--उसके ; ज्ञातय: --मित्र तथा सम्बन्धी; नारदातू--नारद से;ऋषे:--ऋषि से; नमुचि:--नमुचि; च-- भी; बल:--बल नामक असुर; पाक:ः--तथा पाक राक्षस; तत्र--वहाँ; आपेतु:--तुरन्त आ गये; त्वरा-अन्विता:--फुर्ती से

जब नारद ऋषि ने जम्भासुर के मित्रों तथा सम्बन्धियों को यह जानकारी दी कि जम्भासुरमारा गया है, तो नमुचि, बल तथा पाक नामक तीन असुर बड़ी तेजी से युद्धभूमि में आ गए |

वचोभि: परुषैरिन्द्रमर्दयन्तो स्य मर्मसु |

शरैरवाकिरन्मेघा धाराभिरिव पर्वतम्‌ ॥

२०॥

वचोभि:--कटु वचनों से; परुषैः:--अत्यन्त भद्दे तथा कठोर; इन्द्रमू--राजा इन्द्र को; अर्दयन्त:--प्रताड़ित करते; अस्य--इन्द्रके; मर्मसु--हृदय में; शरैः--बाणों से; अवाकिरन्‌--चारों ओर से ढक दिया; मेघा:--बादल; धाराभि:--वर्षा की झड़ी से;इब--जिस तरह; पर्वतम्‌--पर्वत को

इन्द्र को कठोर, मर्मभेदी शब्दों से भला-बुरा कहते हुए इन असुरों ने उस पर बाणों से उसीप्रकार वर्षा की जिस तरह वर्षा की झड़ी किसी महान्‌ पर्वत को धो देती है |

हरीन्दशशतान्याजौ हर्य श्रस्थ बल: शरै: |

तावद्धिर्दयामास युगपल्‍लघुहस्तवान्‌ ॥

२१॥

हरीनू--घोड़ों को; दश-शतानि--एक हजार; आजौ--युद्धभूमि में; हर्यश्वस्थ--इन्द्र के; बल:ः--बल नामक असुर ने; शरैः --बाणों से; ताबद्द्रिः--इतनों से; अर्दयाम्‌ आस--कठिनाई में डाल दिया; युगपत्‌--एक साथ; लघु-हस्तवान्‌ू--हाथ की सफाईसे |

बल नामक असुर ने युद्धभूमि में परिस्थिति को तुरन्त सँभालते हुए इन्द्र के सभी एक हजारघोड़ों को उतने ही बाणों से एकसाथ घायल करके संकट में डाल दिया |

शताभ्यां मातलिं पाको रथं सावयवं पृथक्‌ |

सकृत्सन्धानमोक्षेण तदद्भुतमभूद्रणे ॥

२२॥

शताभ्याम्‌--दो सौ बाणों से; मातलिम्--मातलि नामक सारथी को; पाकः--पाक नामक राक्षस ने; रथम्‌--रथ को; स-अवयवम्‌--सारे साज-सामान सहित; पृथक्‌ू--अलग-अलग; सकृत्‌--एक ही बार में; सन्धान-- धनुष पर बाण चढ़ाकर;मोक्षेण--तथा छोड़कर; तत्‌--ऐसे कार्य को; अद्भुतम्‌ू--अद्भुत; अभूत्‌--हो गया; रणे--युद्ध भूमि में |

एक दूसरे असुर पाक ने अपने धनुष पर दो सौ बाण चढ़ाकर और उन्हें एक ही साथछोड़कर सारे साज-सामान से भरे रथ पर तथा सारथी मातलि पर आक्रमण किया |

युद्धभूमि मेंयह निस्सन्देह एक अदभुत कार्य था |

नमुचि: पञ्जदशभिः स्वर्णपुड्डैमहिषुभि: |

आहत्य व्यनद॒त्सड्ख्ये सतोय इब तोयद: ॥

२३॥

नमुचि:--नमुचि नामक राक्षस ने; पदञ्ञ-दशभि:--पन्द्रह; स्वर्ण-पुद्चाः--सुनहले पंखों वाले; महा-इषुभि:--अत्यन्त शक्तिशालीबाणों से; आहत्य-- भेदकर; व्यनदत्‌--गर्जना की; सड्ख्ये--युद्धभूमि में; स-तोय:--जल से भरे हुए; इब--सहृश; तोय-दः--वर्षा करने वाला बादल |

तब एक दूसरे असुर नमुचि ने इन्द्र पर आक्रमण किया और उसे पन्द्रह सुनहरे पंखों वालेअत्यन्त शक्तिशाली बाणों से घायल कर दिया जो जल से भरे बादल के समान गरज रहे थे |

सर्वतः शरकूटेन शक्रं सरथसारथधिम्‌ |

छादयामासुरसुराः प्रावृट्सूर्यमिवाम्बुदा: ॥

२४॥

सर्वतः--चारों ओर; शर-कूटेन--बाणों की घनी वर्षा से; शक्रम्‌--इन्द्र को; स-रथ--रथ सहित; सारधिम्‌--सारथी को;छादयाम्‌ आसु:--ढक दिया; असुराः:--सारे असुरों ने; प्रावृट्‌--वर्षा ऋतु में; सूर्यम्‌--सूर्य को; इब--सहश; अम्बु-दा:--बादल |

अन्य असुरों ने अपने बाणों की निरन्तर वर्षा से इन्द्र को उसके रथ तथा सारथी सहित ढकदिया जिस तरह वर्षा ऋतु में बादल सूर्य को ढक लेते हैं |

अलक्षयन्तस्तमतीव विहलाविचुक्रुशुर्देवगणा: सहानुगा: |

अनायकाः शत्रुबलेन निर्जितावणिक्पथा भिन्ननवो यथार्णवे ॥

२५॥

अलक्षयन्त:--देख सकने में असमर्थ; तम्‌ू--इन्द्र को; अतीव--अत्यधिक बुरी तरह से; विह्ला:--मोह ग्रस्त; विचुक्रुशु:--पश्चाताप करने लगे; देव-गणा: --सारे देवता; सह-अनुगा: -- अपने अनुयायियों सहित; अनायका:--बिना नेता के; शत्रु-बलेन--अपने शत्रुओं की श्रेष्ठ शक्ति द्वारा; निर्जिता:--अत्यधिक सताये गये; वणिक्‌-पथा: --व्यापारी; भिन्न-नव:--जिसकाजहाज टूट गया हो; यथा अर्णवे--जिस तरह समुद्र के बीच में |

देवतागण अपने शत्रुओं द्वारा बुरी तरह से सताये जाने तथा युद्धभूमि में इन्द्र को न देख पानेके कारण अत्यन्त चिन्तित थे |

वे बिना नायक या कप्तान के उसी तरह विलाप करने लगे जिसतरह समुद्र के बीच में जहाज ध्वंस होने पर व्यापारी विलाप करते हैं |

ततस्तुराषाडिषुबद्धपञ्भराद्‌विनिर्गतः साश्चरथध्वजाग्रणी: |

बभौ दिशः खं पृथिवीं च रोचयन्‌स्वतेजसा सूर्य इव क्षपात्यये ॥

२६॥

ततः--तत्पश्चात्‌; तुराषाट्‌ू--इन्द्र का दूसरा नाम; इषु-बद्ध-पद्धरात्‌-शर पंजर से; विनिर्गतः--छूटकर; स--सहित; अश्व--घोड़े; रथ--रथ; ध्वज--झंडा; अग्रणी:--तथा सारथी; बभौ--हो गये; दिशः--सारी दिशाएँ; खम्‌--आकाश को;पृथिवीम्‌--पृथ्वी को; च--तथा; रोचयन्‌--सुहावना बनाते; स्व-तेजसा--अपने तेज से; सूर्य:--सूर्य; इब--सहश; क्षपा-अत्यये--रात्रि बीत जाने पर |

तत्पश्चात्‌ इन्द्र ने बाणों के पिंजर से अपने को छुड़ाया |

वह अपने रथ, झंडे, घोड़े तथासारथी के साथ प्रकट हुआ और आकाश, पृथ्वी तथा सभी दिशाओं में प्रसन्नता फैलाते हुए वहतेजी से ऐसे चमकने लगा मानो रात बीद जाने पर सूर्य तेजी से चमक रहा हो |

इन्द्र सब की दृष्टिमें तेजवान्‌ तथा सुन्दर लग रहा था |

निरीक्ष्य पृतनां देव: परैरभ्यर्दितां रणे |

उदयच्छद्रिपुं हन्तुं वज्ज॑ वज़््धरो रुषा ॥

२७॥

निरीक्ष्य--देखकर; पृतनाम्‌--अपने सैनिकों को; देव: --इन्द्र ने; परैः--शत्रुओं द्वारा; अभ्यर्दिताम्‌-- अत्यधिक सताया गया;रणे--युद्धभूमि में; उदयच्छत्‌--ले लिया; रिपुम्‌-शत्रुओं को; हन्तुमू--मारने के लिए; वज्ञम्‌ू--वज्; वज्ञ-धर:--वज़धारणकरने वाला; रुषा--अत्यधिक गुस्से से |

जब वज्रधर नाम से विख्यात इन्द्र ने देखा कि उसके सैनिक युद्धभूमि में शत्रुओं द्वारा इसतरह सताये जा रहे हैं, तो वह अत्यन्त क्रुद्ध हुआ |

तब उसने शत्रुओं को मारने के लिए अपनाबज्ज उठा लिया |

स तेनैवाष्टधारेण शिरसी बलपाकयो: |

ज्ञातीनां पश्यतां राजज्जहार जनयन्भयम्‌ ॥

२८॥

सः--वह ( इन्द्र ); तेन--उसके द्वारा; एब--निस्सन्देह; अष्ट-धारेण--वज् द्वारा; शिससी--दो सिरों को; बल-पाकयो:--बलतथा पाक असुरों के; ज्ञातीनाम्‌ पश्यताम्‌--उनके सम्बन्धियों तथा सैनिकों के देखते-देखते; राजन्‌--हे राजा; जहार--( इन्द्र ने )काट दिया; जनयन्‌--उत्पन्न करते हुए; भयम्‌ू--( उनके बीच ) भय |

हे राजा परीक्षित! राजा इन्द्र ने बल तथा पाक दोनों असुरों के सिरों को उनके सम्बन्धियोंतथा अनुयायियों की उपस्थिति में अपने वज्र द्वारा काट दिया |

इस तरह उसने युद्धभूमि मेंअत्यन्त भयावह वातावरण उत्पन्न कर दिया |

नमुचिस्तद्वधं इृष्टठा शोकामर्षरुषान्वितः |

जिघांसुरिन्द्रं नूपते चकार परमोद्यमम्‌ ॥

२९॥

नमुचि:--नमुचि ने; तत्‌--उन दो असुरों की; वधम्‌--हत्या; हृष्ठा--देखकर; शोक-अमर्ष--शोक तथा दुख; रुषा-अन्बवित:--इससे अत्यन्त क्रुद्ध; जिघांसु:--मारना चाहा; इन्द्रमू--इन्द्र को; नू-पते--हे महाराज परीक्षित; चकार--किया; परम--महान्‌उद्यमम्‌--प्रयास |

हे राजा! जब असुर नमुचि ने बल तथा पाक दोनों असुरों को मारे जाते देखा तो वह दुखतथा शोक से भर गया |

अतएव उसने क्रुद्ध होकर इन्द्र को मारने का महान्‌ प्रयास किया |

अश्मसारमयं शूलं घण्टावद्धेमभूषणम्‌ |

प्रगृह्याभ्यद्रवत्क्रुद्धो हतोउसीति वितर्जयन्‌ |

प्राहिणोद्देववाजाय निनदन्मृगराडिव ॥

३०॥

अश्मसार-मयम्‌--इस्पात का; शूलम्‌-- भाला; घण्टा-वत्‌--घण्टियों से बँधा; हेम-भूषणम्‌--सोने के आभूषणों से विभूषित;प्रगृह्द--हाथ में लेकर; अभ्यद्रवत्‌--बलपूवर्क गया; क्रुद्ध:--क्रुद्ध मुद्रा में; हतः असि इति--अब तुम मारे गए; वितर्जयन्‌ू--गर्जना करते हुए; प्राहिणोत्‌-- प्रहार किया; देव-राजाय--राजा इन्द्र को; निनदन्‌--गर्जना करते; मृग-राट्‌--सिंह; इब--समान

सिंह गर्जना करते हुए नमुचि ने क्रोध में आकर इस्पात का एक भाला उठाया जिसमेंघण्टियाँ बँधी थीं और जो सोने के आभूषणों से सज्जित था |

वह उच्चस्वर से चिल्‍लाया ‘अबतुम मारे गये' |

इस प्रकार इन्द्र को मारने के लिए उसके समक्ष जाकर नमुचि ने अपना हथियारचलाया |

तदापतदगगनतले महाजवंविचिच्छिदे हरिरिषुभि: सहस्त्रधा |

तमाहनन्नूप कुलिशेन कन्धरेरुषान्वितस्त्रिदशपति: शिरो हरन्‌ ॥

३१॥

तदा--उस समय; अपतत्‌--उल्का की तरह गिर पड़ा; गगन-तले--आकाश के नीचे अर्थात्‌ भूमि पर; महा-जबम्‌--अत्यन्तशक्तिशाली; विचिच्छिदे--खंड-खंड कर डाला; हरि: --इन्र ने; इषुभि:--अपने बाणों से; सहस्त्रधा--हजारों खण्डों में; तमू--उस नमुचि को; आहनतू-- प्रहार किया; नृप--हे राजा; कुलिशेन--अपने वज्ज से; कन्धरे--कन्धे पर; रुषा-अन्वित: -- अत्यन्तक्रुद्ध होकर; त्रिदश-पति:--देवताओं का राजा इन्द्र; शिर:--सिर; हरनू--काटने के लिए

है राजा! जब स्वर्ग के राजा इन्द्र ने इस अत्यन्त शक्तिशाली भाले को ज्वलित उल्का कीभाँति भूमि की ओर गिरते देखा तो उसने तुरन्त ही उसे अपने बाणों से खण्ड-खण्ड कर दिया |

फिर अत्यन्त क्रुद्ध होकर उसने नमुचि के कन्धे पर अपने वज्ज से प्रहार किया जिससे उसका सिरकट सके |

न तस्य हि त्वचमपि वज्ज ऊर्जितोबिभेद यः सुरपतिनौजसेरितः |

तदद्भुतं परमतिवीर्यवृत्रभित्‌तिरस्कृतो नमुचिशिरोधरत्वचा ॥

३२॥

न--नहीं; तस्य--उसका ( नमुचि का ); हि--निस्सन्देह; त्वचम्‌ अपि--चमड़ी भी; वज्र:--वज्ञ; ऊर्जित: --अत्यन्तशक्तिशाली; बिभेद--घुस सका; यः--जो हथियार; सुर-पतिना--देवताओं के राजा द्वारा; ओजसा--अत्यन्त वेग के साथ;ईरितः--छोड़ा गया था; तत्‌ू--अतएव; अद्भुतम्‌ परम्‌--अत्यधिक अद्भुत; अतिवीर्य-बृत्र-भित्‌ू--इतना शक्तिशाली था किअत्यन्त बलवान वृत्रासुर के भी शरीर को भेद सकता था; तिरस्कृत:ः--जिसे अब पीछे धकेल दिया गया था; नमुचि-शिरोधर-त्वचा--नमुचि की गर्दन की खाल से |

यद्यपि इन्द्र ने नमुचि पर अपना वज् बड़े ही वेग से चलाया था, किन्तु वह उसकी खाल कोभेद तक नहीं पाया |

यह बड़ी विचित्र बात है कि जिस सुप्रसिद्ध वज् ने वृत्रासुर के शरीर कोभेद डाला था वह नमुचि की गर्दन की खाल को रंचमात्र भी क्षति नहीं पहुँचा पाया |

तस्मादिन्द्रोडबिभेच्छत्रोर्वज्: प्रतिहतो यतः |

किमिदं दैवयोगेन भूतं लोकविमोहनम्‌ ॥

३३॥

तस्मात्‌ू--अतएव; इन्द्र:--स्वर्ग के राजा; अबिभेत्‌--बहुत डर गया; शत्रो:--शत्रु ( नमुचि ) से; वज्ञ:--वज्; प्रतिहतः --मारकर लौटने में असमर्थ था; यतः--क्योंकि; किम्‌ इृदम्‌--यह क्या है; दैव-योगेन--दैवी शक्तिसे; भूतम्‌--हो गया है; लोक-विमोहनम्‌--सामान्य लोगों के लिए इतना आश्चर्यजनक |

जब इन्द्र ने वज़ को शत्रु से वापस आते देखा तो वह अत्यन्त भयभीत हो गया |

वह आश्चर्यकरने लगा कि कहीं किसी ऊँची दैवी शक्ति से तो यह सब कुछ नहीं हुआ |

येन मे पूर्वमद्रीणां पक्षच्छेद: प्रजात्यये |

कृतो निविशतां भारै: पतत्तै: पततां भुवि ॥

३४॥

येन--इसी वज् से; मे--मेरे द्वारा; पूर्वमू--पहले; अद्रीणाम्‌--पर्वतों का; पक्ष-च्छेद: --पंखों का काटा जाना; प्रजा-अत्यये--जब जनता का वध होता था; कृतः--किया गया था; निविशताम्‌-- प्रवेश किये गये पर्वतों को; भारैः--अत्यधिक बोझ से;पतत्तैः--पंखों से; पतताम्‌--गिरते हुए; भुवि--जमीन पर

इन्द्र ने सोचा: पूर्वकाल में जब अनेक पर्वत अपने पंखों के द्वारा आकाश में उड़ते हुए भूमिपर गिरते थे और लोगों को मार डालते थे तो मैं अपने इसी वज्ञ से उनके पंख काट लेता था |

तपःसारमयं त्वाष्ट्र वृत्रो येन विपाटितः |

अन्ये चापि बलोपेता: सर्वास्त्रिरक्षतत्वच: ॥

३५॥

तपः--तपस्या; सार-मयम्‌-- अत्यन्त शक्तिशाली; त्वाष्टम्‌ू-्वष्टा द्वारा सम्पन्न; वृत्र:--वृत्रासुर; येन--जिससे; विपाटित: --मारा गया; अन्ये-- अन्य; च-- भी; अपि--निस्सन्देह; बल-उपेता: -- अत्यन्त शक्तिशाली व्यक्ति; सर्व--सभी प्रकार के;अस्त्रै:--हथियारों से; अक्षत--बिना किसी चोट लगे; त्वच:--उनकी खाल |

यद्यपि वृत्रासुर त्वष्टा द्वारा की गईं तपस्या का सार-समाहार था, तो भी ( इन्द्र के ) वज्ज नेउसका काम तमाम कर दिया था |

निस्सन्देह, वही नहीं, अपितु ऐसे अनेक अग्रणी वीर भीजिनकी खाल को अन्य हथियार तनिक भी क्षति नहीं पहुँचा सके थे इसी वज् द्वारा मारे गए |

सोडयं प्रतिहतो बज्जो मया मुक्तोसुरेडल्पके |

नाहं तदाददे दण्डं ब्रह्मतेजो उप्यकारणम्‌ ॥

३६॥

सः अयम्‌--अतएव, यह वज्ञ; प्रतिहतः--लौट आया; वज़ः--वज़; मया--मेरे द्वारा; मुक्त:--छोड़ा गया; असुरे--असुर को;अल्पके--तुच्छ; न--नहीं; अहम्‌--मैं; तत्‌ू--उसे; आददे--पकड़े हुए हूँ; दण्डम्‌--डंडे की तरह; ब्रह्म-तेज: --ब्रह्मास्त्र केसमान शक्तिशाली; अपि--यद्यपि; अकारणम्‌--अब यह व्यर्थ हो चुका है |

किन्तु, अब वही वज्ज एक तुच्छ असुर पर छोड़े जाने पर भी प्रभावहीन हो गया है |

अतएवब्रह्मास्त्र जेसा होने पर भी यह मेरे लिए अब एक सामान्य डंडे की तरह व्यर्थ हो गया है |

इसलिएअब मैं इसे धारण नहीं करूँगा |

इति शक्रं विषीदन्‍्तमाह वागशरीरिणी |

नाय॑ शुष्कैरथो नाद्रैवंधमहति दानव: ॥

३७॥

इति--इस प्रकार; शक्रम्‌--इन्द्र को; विषीदन्तम्‌--शोक करते; आह--कहा; वाक्‌--वाणी; अशरीरिणी--देहरहित याआकाश से; न--नहीं; अयम्‌--यह; शुष्कै: --किसी सूखी वस्तु से; अथो-- भी; न--न तो; आर््रै:--किसी गीली वस्तु से;वधम्‌--संहार; अहति--के योग्य है; दानव:ः--यह दानव ( नमुचि )

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : जब दु:खी इन्द्र इस तरह विषाद कर रहा था, तो एकअशुभ देहरहित वाणी ने आकाश से कहा : यह असुर नमुचि किसी शुष्क या गीली वस्तु सेविनष्ट नहीं किया जा सकता |

मयास्मै यद्वरो दत्तो मृत्युनैवार्द्शुष्कयो: |

अतोडन्यश्विन्तनीयस्ते उपायो मघवत्रिपो: ॥

३८ ॥

मया--मेरे द्वारा; अस्मै--उसको; यत्‌-- क्योंकि; वर:--वरदान; दत्त: --दिया गया है; मृत्यु:--मृत्यु; न--नहीं; एव--निस्सन्देह; आई््र--या तो गीले; शुष्कयो:--या किसी सूखे माध्यम से; अत:--अतएव; अन्य: --अन्य कुछ, दूसरा;चिन्तनीय:--सोचना होगा; ते--तुम्हारे द्वारा; उपाय:--उपाय; मघवनू--हे इन्द्र; रिपो:--अपने शत्रु का |

आकाशवाणी ने यह भी कहा ‘'हे इन्द्र! चूँकि मैंने इस असुर को वर दे रखा है कि वहकभी किसी सूखे या गीले हथियार से नहीं मारा जायेगा, अतएवं उसे मारने के लिए कोई अन्यउपाय सोचो |

'तां दैवीं गिरमाकर्ण्य मघवान्सुसमाहितः |

ध्यायन्फेनमथापश्यदुपायमुभयात्मकम्‌ ॥

३९॥

ताम्‌--उस; दैवीम्‌--दैवी; गिरमू--वाणी को; आकर्ण्य--सुनकर; मघवानू--इन्द्र ने; सु-समाहित:--मनोयोग से; ध्यायन्‌--ध्यान करके; फेनम्‌--झाग को; अथ--तत्पश्चात्‌; अपश्यत्‌ू--देखा; उपायम्‌--साधन; उभय-आत्मकम्‌--एकसाथ शुष्क तथागीला

इस अशुभ वाणी को सुनकर इन्द्र बड़े मनोयोग से ध्यान करने लगा कि इस असुर को किसतरह मारा जाये |

तब उसे यह सूझा कि झाग ही ऐसा साधन है, जो न तो गीली होती है, न शुष्क |

न शुष्केण न चार्द्रेण जहार नमुचे: शिरः |

त॑ तुष्ठवुर्मुनिगणा माल्यैश्वावाकिरन्विभुम्‌ ॥

४०॥

न--न तो; शुष्केण -- शुष्क साधन से; न--न तो; च-- भी; आर्द्रेण--गीले हथियार से; जहार--उसने काट लिया; नमुचे:--नमुचि का; शिर:--सिर; तम्‌--उसको ( इन्द्र को ); तुष्ठवु:--सन्तुष्ट किया; मुनि-गणा:--सारे मुनियों ने; माल्यैः--फूलों कीमालाओं से; च-- भी; अवाकिरन्‌ू--ढक दिया; विभुम्‌--उस महापुरुष को |

इस तरह स्वर्ग के राजा इन्द्र ने अपनी झाग के हथियार से नमुचि का सिर काट दिया |

यहझाग न तो शुष्क थी, न आर्द्र |

तब सारे मुनियों ने उस महापुरुष इन्द्र पर फूलों की वर्षा की तथामाल्यार्पण द्वारा उसे लगभग ढक दिया और सन्तुष्ट कर लिया |

गन्धर्वमुख्यौ जगतुर्विश्चावसुपरावसू |

देवदुन्दुभयो नेदुर्नरतक्यो ननृतुर्मुदा ॥

४१॥

गन्धर्व-मुख्यौ--गन्धर्वों के दो प्रधान; जगतु:--सुन्दर गीत गाने लगे; विश्वावसु--विश्वावसु; परावसू--परावसु नामक; देव-दुन्दुभय:ः--देवताओं द्वारा बजाई गई दुन्दुभियाँ; नेदु:--बजाया; नर्तक्य:--नर्तकियाँ, जिन्हें अप्सरा कहा जाता है; ननृतुः--नाचने लगीं; मुदा--अत्यन्त प्रसन्नता से विश्वावसु तथा परावसु नामक दो गन्धर्व प्रमुखों ने अतीव प्रसन्नता में गीत गाये |

देवताओं नेदुन्दुभियाँ बजाईं और अप्सराओं ने हर्षित होकर नृत्य किया |

अन्येउ्प्येवं प्रतिद्वन्द्वान्वाय्वग्निवरुणादय: |

सूदयामासुरसुरान्मृगान्केसरिणो यथा ॥

४२॥

अन्ये--अन्यों ने; अपि-- भी; एवम्‌--इस प्रकार; प्रतिद्वन्द्दान्‌ू--विपक्षियों को; वायु--वायुदेव; अग्नि--अग्निदेव; वरुण-आदय:--वरुण देव तथा अन्य; सूदयाम्‌ आसु:--तेजी से मारने लगे; असुरान्‌--सारे असुरों को; मृगान्‌--हिरनों को;केसरिण:--सिंह; यथा--जिस तरह |

वायु, अग्नि, वरुण इत्यादि देवता अपने विरोधी असुरों को उसी तरह मारने लगे जिस तरहजंगल में हिरनों को सिंह मारते हैं |

ब्रह्मणा प्रेषितो देवान्देवर्षिनारदो नृप |

वारयामास विबुधान्दष्टा दानवसड्छक्षयम्‌ ॥

४३॥

ब्रह्मणा--ब्रह्माजी द्वारा; प्रेषित:-- भेजा गया; देवानू--देवताओं के ; देव-ऋषि:--स्वर्ग के महान्‌ ऋषि; नारद:--नारद मुनि ने;नृप--हे राजा; वारयाम्‌ आस--मना किया; विबुधान्‌--सारे देवताओं को; दृष्ठा--देखकर; दानव-सद्क्षयम्‌--असुरों का पूर्णविनाश |

हे राजा! जब ब्रह्मा ने देखा कि दानवों का पूर्ण संहार तुरन्त होने वाला है, तो उन्होंने नारदद्वारा सन्देश भेजा जो युद्ध रुकवाने के लिए देवताओं के समक्ष गये |

श्रीनारद उवाचभवद्धिरमृतं प्राप्त नारायणभुजा श्रयै: |

भ्रिया समेधिता: सर्व उपारमत विग्रहात्‌ ॥

४४॥

श्री-नारदः उबाच--नारद मुनि ने देवताओं से प्रार्थना की; भवद्धि:--आप लोगों के द्वारा; अमृतमू--अमृत; प्राप्तम्‌--प्राप्तकिया जा चुका है; नारायण--नारायण की; भुज-आश्रयैः --भुजाओं के द्वारा सुरक्षित; भ्रिया--लक्ष्मी द्वारा; समेधिता:--उन्नतिकी है; सर्वे--आप सब; उपारमत--अब रुक जाओ; विग्रहात्‌ू--इस लड़ाई से महामुनि

नारद ने कहा : तुम सारे देवता भगवान्‌ नारायण की भुजाओं द्वारा सुरक्षित हो औरउनकी कृपा से तुम सबको अमृत प्राप्त हुआ है |

लक्ष्मीजी की कृपा से तुम हर तरह से गौरान्वित हुए हो; अतएवं अब यह लड़ाई बन्द कर दो |

श्रीशुक उबाचसंयम्य मन्युसंरम्भं मानयन्तो मुनेर्वच: |

उपगीयमानानुचरैर्ययु: सर्वे त्रिविष्टपम्‌ ॥

४५॥

श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; संयम्य--रोककर; मन्यु--क्रोध का; संरम्भम्‌--वृद्धि, उभाड़; मानयन्तः--स्वीकार करते हुए; मुने: वच:--नारद मुनि के शब्द; उपगीयमान--प्रशंसित होकर; अनुचरैः--अनुयायियों द्वारा; ययु;--लौटगये; सर्वे--सारे देवता; त्रिविष्टपम्‌--स्वर्ग लोक को |

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : नारद मुनि के बचनों को मानकर देवताओं ने अपना क्रोधत्याग दिया और लड़ाई बन्द कर दी |

वे अपने अनुयायियों द्वारा प्रशंसित होकर स्वर्गलोक कोलौट गये |

येवशिष्टा रणे तस्मिन्नारदानुमतेन ते |

बलिं विपन्नमादाय अस्तं गिरिमुपागमन्‌ ॥

४६॥

ये--जो थोड़े से असुर; अवशिष्टा:--बचे थे; रणे--युद्ध में; तस्मिनू--उस; नारद-अनुमतेन--नारद की आज्ञा से; ते--वे सभी;बलिम्‌--महाराज बलि को; विपन्नम्‌--संकट ग्रस्त; आदाय--लेकर; अस्तम्‌--अस्त नामक; गिरिम्‌ू--पर्वत पर; उपागमन्‌--चले गये |

युद्धक्षेत्र में जितने भी असुर बचे थे, वे सब नारद मुनि के आदेशानुसार बलि महाराज कोजिनकी अवस्था अत्यन्त गम्भीर थी, अस्तगिरि ले गये |

तत्राविनष्टावयवान्विद्यमानशिरोधरान्‌ |

उशना जीवयामास संजीवन्या स्वविद्यया ॥

४७॥

तत्र--उस पर्वत पर; अविनष्ट-अवयवानू--बचे हुए अंगों वाले मारे गए असुरों को; विद्यमान-शिरोधरान्‌ू--जिनके सिर उनकेशरीरों में अभी तक लगे थे; उशना:--शुक्राचार्य; जीवयाम्‌ आस--जीवित कर दिया; संजीवन्या--सञ्जञी वनी मंत्र द्वारा; स्व-विद्यया--अपनी विद्या से |

उस पर्वत पर शुक्राचार्य ने उन सारे मृत असुर सैनिकों को जिनके सिर, धड़ तथा हाथ- पाँवकटे नहीं थे जीवित कर दिया |

उन्होंने अपने सञ्जीवनी मंत्र के द्वारा यह सब किया |

बलिश्रोशनसा स्पृष्ट: प्रत्यापन्नेन्द्रियस्मृति: |

पराजितोपि नाखिद्यल्लोकतत्त्वविचक्षण: ॥

४८ ॥

बलि:--महाराज बलि ने; च--भी; उशनसा--शुक्राचार्य द्वारा; स्पृष्ट: --स्पर्श से; प्रत्यापन्न--पुनः जीवित किया गया; इन्द्रिय-स्मृतिः--इन्द्रियों के कार्यों तथा स्मृति की अनुभूति; पराजित:--हरा दिया गया; अपि--यद्यपि; न अखिद्यत्‌ू--शोक नहींकिया; लोक-तत्त्व-विचक्षण: --सांसारिक कार्यो में अत्यन्त अनुभवी होने के कारण |

बलि महाराज सांसारिक कार्यों में अत्यन्त अनुभवी थे |

जब शुक्राचार्य की कृपा से उन्हेंहोश आया और उनकी स्मृति लौट आई तो जो कुछ हो चुका था उसे वे समझ गये |

इसलिए पराजित होने पर भी उन्हें शोक नहीं हुआ |

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