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अध्याय आठ: भगवान नृसिंहदेव ने राक्षसों के राजा का वध किया
7.8श्रीनारद उबाचअथ दैत्यसुता: सर्वे श्रुत्वा तदनुवर्णितम् ।
जगुहुर्निरवद्यत्वान्नैव गुर्वनुशिक्षितम् ॥
१॥
श्री-नारद: उवाच-- श्री नारद मुनि ने कहा; अथ--तत्पश्चात्; दैत्य-सुता:--असुरों के पुत्र ( प्रह्दाद महाराज के सहपाठी );सर्वे--सभी; श्रुत्वा--सुनकर; तत्--उससे ( प्रह्मद से ); अनुवर्णितम्-- भक्तिमय जीवन के विषय में कथन; जगृहु: --स्वीकारकिया; निरवद्यत्वात्--उस उपदेश के श्रेष्ठ उपयोग के कारण; न--नहीं; एब--निस्सन्देह; गुरु-अनुशिक्षितम्--जो उनके गुरुओंने पढ़ाया था।
नारद मुनि ने आगे कहा : सारे असुए॒पुत्रों ने प्रह्दाद महाराज के दिव्य उपदेशों की सराहना कीऔर उन्हें अत्यन्त गम्भीरतापूर्वक ग्रहण किया।
उन्होंने षण्ड तथा अमर्क नामक अपने गुरुओंद्वारा दिये गये भौतिकतावादी उपदेशों का तिरस्कार कर दिया।
"
अथाचार्यसुतस्तेषां बुद्धिमेकान्तसंस्थिताम् ।
आलक्ष्य भीतस्त्वरितो राज्ञ आवेदयद्यथा ॥
२॥
अथ--तदुपरान्त; आचार्य-सुतः--शुक्राचार्य के पुत्र; तेषामू--उन ( असुर पुत्रों ) की; बुद्धिम्--बुद्धि; एकान्त-संस्थिताम्--केवल एक ही विषय, भक्ति, में स्थिर; आलक्ष्य--देखकर; भीत:-- भयभीत होकर; त्वरित:--तुरन्त; राज्ञे--राजा( हिरण्यकशिपु ) से; आवेदयत्--कह सुनाया; यथा--उचित ढंग से
जब शुक्राचार्य के पुत्र षण्ड तथा अमर्क ने देखा कि सारे विद्यार्थी असुर पुत्र प्रहाद महाराजकी संगति से कृष्णभक्ति में आगे बढ़ रहे हैं, तो वे डर गये।
अतएवं वे असुरराज के पास गयेऔर उनसे सारी स्थिति वर्णन कर दी।
"
कोपावेशचलदगात्र: पुत्र हन्तुं मनो दधे ।
क्षिप्ता परुषया वाचा प्रह्मदमतदर्हणम् ।
अहेक्षमाण: पापेन तिरश्रीनेन चक्षुषा ॥
३॥
प्रश्रयावनतं दान्तं बद्धाह्ललिमवस्थितम् ।
सर्प: पदाहत इव श्वसन्प्रकृतिदारुण: ॥
४॥
कोप-आवेश--अत्यन्त क्रुद्ध मुद्रा में; चलत्--काँपता हुआ; गात्र:--पूरा शरीर; पुत्रमू--अपने पुत्र को; हन्तुमू--मारने केलिए; मनः--मन को; दधे--स्थिर किया; क्षिप्त्वा--डाँटते हुए; परुषया--अत्यन्त कटु; वाचा--वाणी से; प्रह्मदम्--महाराजप्रह्दाद को; अ-तत्-अर्हणम्--( अपने उत्तम चरित्र तथा कोमल आयु के कारण ) प्रताड़ना के अयोग्य; आह--कहा;ईक्षमाण: --क्रोध में उसे देखते हुए; पापेन--अपने पापकर्मों के कारण; तिरश्लीनेन--टेढ़ी; चक्षुषा--आँखों से; प्रश्नय-अवनतम्--अत्यन्त विनप्रता से; दान्तमू--संयमित; बद्ध-अज्ञलिम्--हाथ जोड़े; अवस्थितम्--स्थित; सर्प:--साँप; पद-आहतः--पाँव से कुचला जाकर; इब--सहश; श्वसन्--फुफकारते; प्रकृति-- प्रकृति से; दारुण:--अत्यन्त दुष्ट |
जब हिरण्यकशिपु सारी स्थिति समझ गया तो वह इतना अधिक क्रुद्ध हुआ कि उसका साराशरीर काँपने लगा।
इस तरह उसने अन्ततः अपने पुत्र प्रह्दाद को मार डालने का निश्चय करलिया।
वह स्वभाव से अत्यन्त क्रूर था और अपने को अपमानित हुआ जानकर वह पाँव से कुचले सर्प की भाँति फुफकारने लगा।
उसका पुत्र प्रह्मद शान्त, विनप्र तथा उदार था, वहइन्द्रियसंयमी था और हिरण्यकशिपु के समक्ष हाथ जोड़े खड़ा था।
वह अपनी आयु तथाआचरण के अनुसार प्रताड़ना के योग्य न था।
फिर भी हिरण्यकशिपु ने टेढ़ी नजर से उसे घूरतेहुए निम्नलिखित कदु शब्दों के द्वारा फटकारा।
"
जेश्रीहिरण्यकशिपुरुवाचहे दुर्विनीत मन्दात्मन्कुलभेदकराधम ।
स्तब्धं मच्छासनोद्वृत्तं नेष्ये त्वाद्य यमक्षयम् ॥
५॥
श्री-हिरण्यकशिपु: उवाच--वरदान प्राप्त हिरण्यकशिपु ने कहा; हे--ेरे; दुर्विनीत--अत्यन्त बेशर्म, धृष्ट; मन्द-आत्मन्-- अरेमूर्ख; कुल-भेद-कर--परिवार को फोड़ने वाले; अधम--ओरे नीच; स्तब्धम्--अत्यन्त हठी; मत् -शासन--मेरी आज्ञा का;उद्धत्तमू--उल्लंघन करके; नेष्ये--मैं भेजूँगा; त्वा--तुमको; अद्य--आज; यम-क्षयम्--मृत्यु के अधीक्षक यमराज के पास
हिरण्यकशिपु ने कहा : अरे उहण्ड, निपट दुर्बुद्धि, परिवार को फोड़ने वाले! अरे नीच!तुमने अपने ऊपर शासन करने वाली शक्ति का उल्लघंन किया है, अतएव तू हठी मूर्ख है।
आजमैं तुझे यमराज के घर भेजूंगा ।
"
क्रुद्धस्य यस्य कम्पन्ते त्रयो लोकाः सहेश्वरा: ।
तस्य मेभीतवन्मूढ शासन कि बलोउत्यगा: ॥
६॥
क्रुद्धस्य-क्रुद्ध होने पर; यस्य--जिसके; कम्पन्ते--काँपते हैं; त्रयः लोकाः--तीनों लोक; सह-ईश्वरा:-- अपने-अपने नायकोंसमेत; तस्य--उस; मे--मेरे ( हिरण्यकशिपु के ); अभीत-वत्--निर्भीक; मूढ--धूर्त; शासनम्ू--आदेश; किम्--क्या;बल:ः--बल; अत्यगा: --अति हो गई है|
मेरे दुष्ट पुत्र प्रह्माद! तुम जानते हो कि जब मैं क्रुद्ध होता हूँ तो तीनों लोक अपने-अपनेनायकों सहित काँपने लगते हैं।
तो फिर तुम किसके बल पर इतने धृष्ट हो गये हो कि तुमनिर्भीक होकर मेरी आज्ञा का उल्लंघन कर रहे हो ?
" श्रीप्रहाद उवाचन केवल मे भवतश्च राजन्सवै बल॑ बलिनां चापरेषाम् ।
परेवरेमी स्थिरजड़मा येब्रह्मादयो येन वशं प्रणीता: ॥
७॥
श्री-प्रह्ाद: उवाच--प्रह्नाद महाराज ने उत्तर दिया; न--नहीं; केवलम्--केवल; मे--मेरा; भवत: -- आपका; च--तथा;राजनू--हे राजा; सः--वह; बै--निस्सन्देह; बलमू--बल; बलिनामू--बलियों के; च--तथा; अपरेषाम्--अन्यों का; परे--सम्माननीय; अबरे--अधीन; अमी--वे; स्थिर-जड्रमा:--चल या अचल जीव; ये--जो; ब्रह्म -आदय: --ब्रह्मा इत्यादि; येन--जिसके द्वारा; वशम्--वश में; प्रणीता:--लाया गया।
प्रह्ाद महाराज ने कहा, हे राजनू, आप जिस बल के मेरे स्रोत को जानना चाह रहे हैं वहआपके बल का भी स्त्रोत है।
निस्सन्देह, समस्त प्रकार के बलों का मूल स्रोत एक ही है।
वह नकेवल आपका या मेरा बल है, अपितु सबों का एकमात्र बल है।
उसके बिना किसी को कोईबल नहीं मिल सकता।
चाहे चल हो या अचल, उच्च हो या नीच, ब्रह्मा समेत सारे जीव भगवान्के बल द्वारा नियंत्रित हैं।
"
स ईश्वरः काल उरुक्रमोसा-वोज: सहः सत्त्वबलेन्द्रियात्मा ।
स एव विश्व परम: स्वशक्तिभि:सृजत्यवत्यत्ति गुणत्रयेश: ॥
८॥
सः--वह ( भगवान् ); ईश्वर: --परम नियन्ता; काल:--काल; उरुक्रम:-- भगवान् जिनके सारे कार्य असाधारण होते हैं;असौ--वे ही; ओज:--इन्द्रियों की शक्ति; सहः--मन की शक्ति; सत्त्व--स्थैर्य; बल--शारीरिक शक्ति; इन्द्रिय--तथा इन्द्रियोंका; आत्मा--आत्मा; सः--वह; एव--निस्सन्देह; विश्वम्--सारा विश्व; परम:--परम; स्व-शक्तिभि:--अपनी विविध दिव्यशक्तियों से; सृजति--सृजन करता है; अवति--पालन करता है; अत्ति--संहार कर देता है; गुण-त्रय-ईशः--तीनों गुणों कास्वामी |
परम नियन्ता एवं काल रूप भगवान् इन्द्रियों के बल, मन के बल, शरीर के बल तथाइन्द्रियों के प्राण हैं।
उनका प्रभाव असीम है।
वे समस्त जीवों में श्रेष्ठ तथा प्रकृति के तीनों गुणोंके नियन्ता हैं।
वे अपनी शक्ति से इस ब्रह्माण्ड का सृजन, पालन तथा संहार करते हैं।
"
जह्ासुरं भावमिमं त्वमात्मन:सम॑ मनो धत्स्व न सन्ति विद्विष: ।
ऋतेजितादात्मन उत्पथे स्थितात्तदिद्वि ह्मनन्तस्य महत्समहणम् ॥
९॥
जहि-्याग दो; आसुरम्--आसुरी; भावम्-प्रवृत्ति को; इमम्--इस; त्वम्--तुम ( मेरे पिता ); आत्मन:--अपने; समम्--बराबर; मन:ः--मन; धत्स्व--बनाओ; न--नहीं; सन्ति-- हैं; विद्विष:--शत्रु; ऋते--के अतिरिक्त; अजितातू--अनियंत्रित;आत्मन:--मन; उत्पथे--अवांछित प्रवृत्तियों के कुमार्ग पर; स्थितात्ू--स्थित होकर; तत् हि--वह ( प्रवृत्ति ); हि--निस्सन्देह;अनन्तस्य--असीम भगवान् की; महत्--सर्व श्रेष्ठ; समहणम्--पूजा-विधि |
प्रह्माद महाराज ने कहा : हे पिता, आप अपनी आसुरी प्रवृत्ति त्याग दें।
आप अपने हृदय मेंशत्रु-मित्र में भेदभाव न लाएँ, आप अपने मन को सबों के प्रति समभाव बनाएँ।
इस संसार मेंअनियंत्रित तथा पथशभ्रष्ट मन के अतिरिक्त कोई शत्रु नहीं है।
जब कोई मनुष्य प्रत्येक व्यक्ति कोसमता के पद पर देखता है तभी वह भगवान् की ठीक से पूजा करने की स्थिति में होता है।
"
दस्यून्पुरा षण्न विजित्य लुम्पतोमन्यन्त एके स्वजिता दिशो दश ।
जितात्मनो ज्ञस्थ समस्य देहिनांसाधो: स्वमोहप्रभवा: कुतः परे ॥
१०॥
दस्यूनू--लुटेरे; पुरा--प्रारम्भ में; घट्ू--छह; न--नहीं; विजित्य--जीत कर; लुम्पतः--किसी की सारी सम्पत्ति चुराते हुए;मन्यन्ते--मानते हैं; एके--कुछ; स्व-जिता:--जीता हुआ; दिशः दश--दसों दिशाएँ; जित-आत्मन:--जिसने इन्द्रियों को जीतलिया है, इन्द्रियजित; ज्स्य--विद्वान का; समस्य--समदर्शी ; देहिनामू--समस्त जीवों के प्रति; साधो:--ऐसे साधु पुरुष का;स्व-मोह-प्रभवा:--अपने ही मोह से उत्पन्न; कुतः--कहाँ; परे--शत्रु या विरोधी तत्त्व
प्राचीन काल में आपके समान ही अनेक मूढ हुए हैं जिन्होंने उन छह शत्रुओं को नहीं जीताजो शरीर रूपी सम्पत्ति को चुरा ले जाते हैं।
ये मूढ यह सोचकर गर्वित होते हैं 'मैंने तो दसोंदिशाओं के सारे शत्रुओं को जीत लिया है।
' किन्तु यदि कोई व्यक्ति इन छह शत्रुओं पर विजयी होता है और सारे जीवों पर समभाव रखता है, तो उसके लिए शत्रु नहीं होते।
शत्रु की कल्पनामूर्खतावश की जाती है।
"
श्रीहिरण्यकशिपुरुवाचव्यक्त त्वं मर्तुकामोसि योऊतिमात्रं विकत्थसे ।
मुमूर्षूणां हि मन्दात्मन्ननु स्युर्विक्लवा गिर: ॥
११॥
श्री-हिरण्यकशिपु: उबाच--वर प्राप्त हिरण्यकशिपु ने कहा; व्यक्तम्-स्पष्ट रूप से; त्वमू--तुम; मर्तु-काम: --मृत्यु के इच्छुक;असि-हो; यः--जो; अतिमात्रम्--असीम; विकत्थसे--डींग मार रहे हो ( मानो तुमने इन्द्रियों जीत ली हों और तुम्हारे पिता ने नजीती हों ); मुमूर्षूणाम्--तुरन्त ही मरने वाले व्यक्तियों का; हि--निस्सन्देह; मन्द-आत्मनू--हे मूर्ख; ननु--निश्चय ही; स्युः--होजाते हैं; विक््लवा:--ऊटपटाँग; गिर:--शब्द |
हिरण्यकशिपु ने उत्तर दिया: रे मूर्ख! तू मेरे महत्त्व को घटाने का प्रयास कर रहा है मानो तूमुझसे अधिक इन्द्रिय-संयमी है।
यह अति-बुद्धिमत्ता है।
अतएवं मैं समझ रहा हूँ कि तुम मेरेहाथों मरना चाहते हो, क्योंकि ऐसी बेसिर-पैर की ( ऊटपटाँग ) बातें वे ही करते हैं, जोमरणासतन्न होते हैं।
"
यस्त्वया मन्दभाग्योक्तो मदन्यो जगदीश्वरः ।
क्वासौ यदि स सर्वत्र कस्मात्स्तम्भे न दृश्यते ॥
१२॥
यः--जो; त्वया--ेरे द्वारा; मन्द-भाग्य--अरे अभागे; उक्त:--कहा गया; मत्-अन्य:--मेरे अतिरिक्त; जगत्-ईश्वर:--ब्रह्माण्डका परम नियन्ता; क्व--कहाँ; असौ--वही; यदि--यदि; सः--वह; सर्वत्र--सभी जगह ( सर्वव्यापी ); कस्मात्ू-क्यों;स्तम्भे--मेरे समक्ष के ख भे में; न हृश्यते-- नहीं दिखता।
अरे अभागे प्रह्नाद! तूने सदैव मेरे अतिरिक्त किसी परम पुरुष का वर्णन किया है, जो हरएक के ऊपर है, हर एक का नियन्ता है तथा जो सर्वव्यापी है।
लेकिन वह है कहाँ?
यदि वहसर्वत्र है, तो वह मेरे समक्ष के इस ख भे में क्यों उपस्थित नहीं है ?
" सोहं विकत्थमानस्य शिरः कायाद्धरामि ते ।
गोपायेत हरिस्त्वाद्य यस्ते शरणमीप्सितम् ॥
१३॥
सः--वह; अहम्--मैं; विकत्थमानस्थ--ऐसे अनर्गल प्रलाप करने वालों का; शिर:--सिर; कायात्--शरीर से; हरामि-छित्नकर दूँगा; ते--तुम्हारा; गोपायेत--वह तुम्हारी रक्षा करे; हरिः-- भगवान् हरि; त्वा--तुमको; अद्य--अब; यः--जो; ते--तुम्हारा; शरणम्--रक्षक; ईप्सितम्--वांछित |
चूँकि तुम इतना अधिक अनर्गल प्रलाप कर रहे हो अतएव अब मैं तुम्हारे शरीर से तुम्हाराशिर छिन्न कर दूँगा।
अब मैं देखूँगा कि तुम्हारा परमाराध्य ई श्वर तुम्हारी रक्षा किस तरह करता है।
मैं उसे देखना चाहता हूँ।
"
एवं दुरुक्तेमुहुरर्दयन्रुषासुतं महाभागवतं महासुरः ।
खड़गं प्रगृद्योत्पतितो वरासनात्स्तम्भं तताडातिबल: स्वमुष्टिना ॥
१४॥
एवम्--इस प्रकार; दुरुक्तैः:--कटु वचनों से; मुहुः--निरन्तर; अर्दयनू--प्रताड़ित किया जाकर; रुषा--अनावश्यक क्रोधसहित; सुतम्--अपने पुत्र को; महा-भागवतम्--महान् भक्त; महा-असुरः--महान् असुर हिरण्यकशिपु ने; खड्गम्--तलवार;प्रगृह्य --ग्रहण करके; उत्पतित:--उठकर; वर-आसनात् -- अपने अत्यन्त उच्च सिंहासन से; स्तम्भम्--ख भे को; तताड-- प्रहारकिया; अति-बल:--बलशाली; स्व-मुष्टिना--अपनी मुट्ठी या घूँसे से ।
अतिशय क्रोध के कारण अत्यन्त बलशाली हिरण्यकशिपु ने अपने महाभागवत पुत्र कोअत्यन्त कटु वचन कहे और उसकी भर्त्सना की।
उसे बारम्बार श्राप देते हुए हिरण्यकशिपु नेअपनी तलवार निकाली, अपने राजसी सिंहासन से उठ खड़ा होकर और अत्यन्त क्रोध के साथख भे पर मुष्टिका-प्रहार किया।
"
तदेव तस्मिन्निनदोउइतिभीषणोबभूव येनाण्डकटाहमस्फुटत् ।
यं वै स्वधिष्ण्योपगतं त्वजादयःश्र॒ुत्वा स्वधामात्ययमड़ मेनिरे ॥
१५॥
तदा--उसी समय; एव--ठीक; तस्मिन्ू--उस ( ख भे ) के भीतर; निनदः-- ध्वनि; अति-भीषण: --अत्यन्त भयावनी; बभूब--हुई; येन--जिससे; अण्ड-कटाहम्--ब्रह्माण्ड आवरण ( कोश ); अस्फुटतू--चिटखता प्रतीत हुआ; यम्ू--जिसको; बै--निस्सन्देह; स्व-धिष्ण्य-उपगतम्-- अपने-अपने घर पहुँच कर; तु--लेकिन; अज-आदय:--ब्रह्माजी इत्यादि देवतागण;श्रुत्वा--सुनकर; स्व-धाम-अत्ययम्--अपने-अपने निवासों का ध्वंस; अड़--हे राजा युधिष्ठिर; मेनिरि--सोचा ।
तब उस ख भे से एक भयानक आवाज आई जिससे ब्रह्माण्ड का आवरण विदीर्ण होताप्रतीत हुआ।
है युधिष्ठिर, यह आवाज ब्रह्मा आदि देवताओं के निवासों तक पहुँच गई और जबदेवताओं ने इसे सुना तो उन्होंने सोचा ' ओह! अब हमारे लोकों का विनाश होने जा रहा है।
'" स विक्रमम्पुत्रवधेप्सुरो जसानिशम्य निर्हादमपूर्वमद्भुतम् ।
अन्तःसभायां न ददर्श तत्पदंवितत्रसुर्येन सुरारियूथया: ॥
१६॥
सः--वह ( हिरण्यकशिपु ); विक्रमन्--अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए; पुत्र-वध-ईप्सु:--अपने ही पुत्र का वध करने काइच्छुक; ओजसा--अत्यन्त बलपूर्वक; निशम्य--सुनकर; निर्हादम्ू-- भयानक ध्वनि को; अपूर्बम्--पहले कभी न सुनी गई;अद्भुतम्-अत्यन्त अद्भुत; अन्तः-सभायामू--सभा के भीतर; न--नहीं; दरदर्श--देखा; तत्-पदम्--उस भयानक आवाज केस्त्रोत को; वितत्रसु:--भयभीत हुए; येन--जिस ध्वनि से; सुर-अरि-यूथ-पा:--असुरों के अन्य नेता ( हिरण्यकशिपु ही नहीं ) |
अपने पुत्र को मारने के इच्छुक हिरण्यकशिपु ने जो इस तरह अपना अद्वितीय शौर्य दिखलारहा था जब एक अद्भुत भीषण ( घोर ) ध्वनि सुनी जिसे इसके पूर्व उसने कभी नहीं सुना था।
इसी ध्वनि को सुनकर अन्य असुरनायक भी भयभीत हुए।
उस सभा में इस ध्वनि के उद्गम कोकोई नहीं ढूँढ़ पाया।
"
सत्यं विधातुं निजभृत्यभाषित॑व्याप्ति च॒ भूतेष्वखिलेषु चात्मन: ।
अदृश्यतात्यद्धुतरूपमुठ्ठह न्स्तम्भे सभायां न मृगं न मानुषम् ॥
१७॥
सत्यमू--सच; विधातुम्--सिद्ध करने के लिए; निज-भृत्य-भाषितम्--अपने दास के ही शब्दों को ( प्रह्नाद महाराज द्वारा कहेगये शब्द कि भगवान् सर्वव्यापी हैं ); व्याप्तिमू--उपस्थिति; च--तथा; भूतेषु--जीवों तथा तत्त्वों के मध्य; अखिलेषु--समस्त;च--तथा; आत्मन: --अपना; अदृश्यत--दिखाई पड़ा; अति--अत्यन्त; अद्भुत--अद्भुत; रूपमू--रूप को; उद्ददन्ू-- धारणकरके; स्तम्भे--ख भे में; सभायाम्ू--सभा के भीतर; न--नहीं; मृगम्ू--पशु; न--न तो; मानुषम्--मनुष्य ।
अपने दास प्रह्मद महाराज के वचनों को सिद्ध करने के लिए कि वे सत्य हैं--अर्थात् यहसिद्ध करने के लिए कि भगवान् सर्वत्र उपस्थित हैं, यहाँ तक कि सभा भवन के ख भे के भीतरभी हैं-- भगवान् श्री हरि ने अपना अभूतपूर्व अद्भुत रूप प्रकट किया।
यह रूप न तो मनुष्य काथा, न सिंह का।
इस प्रकार भगवान् उस सभाकक्ष में अपने अद्भुत रूप में प्रकट हुए।
"
स सत्त्वमेनं परितो विपश्यन् स्तम्भस्य मध्यादनुनिर्जिहानम् ।
नाय॑ मृगो नापि नरो विचित्र-महो किमेतन्नमृगेन्द्ररूपम् ॥
१८ ॥
सः--वह ( दैत्यराज हिरण्यकशिपु ); सत्त्वम्--सजीव प्राणी को; एनम्--इस; परितः--चारों ओर; विपश्यन्--देखते हुए;स्तम्भस्य--ख भे के; मध्यात्--बीच से; अनुनिर्जिहानम्ू--निकल कर; न--नहीं; अयम्ू--यह; मृग:-- पशु; न--नहीं;अपि--निस्सन्देह; नर:--मनुष्य; विचित्रम्-- अत्यन्त अद्भुत; अहो--ओह; किम्--किया; एतत्--यह; नृ-मृग-इन्द्र-रूपमू--मनुष्य तथा पशुओं के राजा सिंह का रूप |
जब हिरण्यकशिपु उस ध्वनि का स्त्रोत ढूँढ़ने के लिए इधर-उधर देख रहा था तो उस ख भेसे भगवान् का एक अद्भुत रूप प्रकट हुआ जो न तो मनुष्य का था और न सिंह का माना जाताथा।
हिरण्यकशिपु आश्चर्यचकित हुआ, 'यह कैसा प्राणी है, जो आधा पुरुष तथा आधा सिंहहै !" मीमांसमानस्य समुत्थितोग्रतो ।
नृसिंहरूपस्तदलं भयानकम् ॥
१९॥
प्रतप्तचामीकरचण्डलोचनंस्फुरत्सटाकेशरजृम्भिताननम् ॥
'करालदंएं करवालचञ्ललक्षुरान्तजिह्वं भ्रुकुटीमुखोल्बणम् ॥
२०॥
स्तब्धोर्ध्वकर्ण गिरिकन्दराद्भधुत-व्यात्तास्यनासं हनुभेदभीषणम् ।
दिविस्पृशत्कायमदीर्घपीवर-ग्रीवोरुवक्ष:स्थलमल्पमध्यमम् ॥
२१॥
अन्द्रांशुगौरैश्छुरितं तनूरुहै-विंष्वग्भुजानीकशतं नखायुधम् ।
दुरासदं सर्वनिजेतरायुध-प्रवेकविद्रावितदैत्यदानवम् ॥
२२॥
मीमांसमानस्य-- भगवान् के अद्भुत रूप के विषय में उधेड़-बुन करने वाले हिरण्यकशिपु के ; समुत्थित:--प्रकट हुआ;अग्रतः--समक्ष; नूसिंह-रूप:--नृसिंह देव ( आधा सिंह तथा आधा मनुष्य ) के रूप; ततू--वह; अलम्--विलक्षण रीति से;भयानकम्--अत्यन्त भयावना; प्रतप्त--पिघला हुआ; चामीकर--सोना; चण्ड-लोचनम्-- भयानक आँखों वाला; स्फुरत्--चमकाते हुए; सटा-केशर--अपनी गरदन के बाल; जृम्भित-आननम्--मुँह फैलाये; कराल-- भयानक; दंष्टम्--दाँतों से युक्त;'करवाल-चञ्जल--पैनी तलवार जैसी हिलती; क्षुर-अन्त--तथा छुरे के समान तेज; जिहम्ू--अपनी जीभ को; ध्रुकुटी -मुख--अपने क्रोध-पूर्ण मुख के कारण; उल्बणम्--डरावना; स्तब्ध--स्थिर; ऊर्ध्व--ऊपर की ओर फैले; कर्णम्--कान; गिरि-कन्दर--पर्वत की गुफाओं के सहश; अद्भुत--अत्यन्त भयानक; व्यात्तास्थ--मुँह फैलाये; नासम्--तथा नथुने; हनु-भेद-भीषणमू्--जबड़े अलग होने से भय उत्पन्न करता; दिवि-स्पृशत्-- आकाश को छूता हुआ; कायम्--शरीर; अदीर्घ--लघु;पीवर--मोटी; ग्रीव--गर्दन; उरुू--चौड़ा; वक्ष:-स्थलम्--सीना; अल्प--छोटा; मध्यमम्--शरीर का मध्य भाग; चन्द्र-अंशु--चन्द्रमा की किरणों की तरह; गौरैः--गौर वर्ण के; छुरितम्ू--आवृत; तनूरुहैः--बालों से; विष्वक्--सभी दिशाओं में; भुज--भुजाओं का; अनीक-शतम्--एक सौ पंक्तियों वाला; नख--नाखून; आयुधम्--घातक हथियार के रूप में; दुरासदम्--जीतपाना कठिन; सर्व--समस्त; निज--स्वयं; इतर--तथा अन्य; आयुध--हथियारों का; प्रवेक--सर्व श्रेष्ठ ( हथियार ) के प्रयोगद्वारा; विद्रावित--दौने लगा; दैत्य--असुरों; दानवम्--तथा धूर्तो ( नास्तिकों ) को
हिरण्यकशिपु ने अपने समक्ष खड़े नृसिंह देव के रूप का निश्चय करने के लिए भगवान् केरूप को ध्यान से देखा।
भगवान् का रूप पिघले सोने के सदश था।
उनकी क्रुद्ध आँखों केकारण जो पिघले स्वर्ण से मिलती थी वह रूप अत्यन्त भयानक लग रहा था; उनके चमकीलेअयाल ( गर्दन के बाल) उनके भयानक मुखमण्डल के आकार को फैला रहे थे; उनके दाँतमृत्यु-जैसे भयानक थे, उनकी उस्तरे जैसी तीक्ष्ण जीभ लड़ाई में तलवार के समान इधर-उधरचल रही थी; उनके कान खड़े तथा स्थिर थे और उनके नथुने तथा खुला मुख पर्वत की गुफा-जैसे लग रहे थे।
उनके जबड़े फैले हुए थे जिससे भय उत्पन्न हो रहा था और उनका समूचा शरीरआसमान को छू रहा था।
उनकी गर्दन अत्यन्त छोटी तथा मोटी थी; उनकी छाती चौड़ी थी तथाकमर पतली थी।
उनके शरीर के रोएँ चन्द्रमा की किरणों के समान श्रेत लग रहे थे।
उनकी भुजाएं चारों दिशाओं में फैले सैनिकों की टुकड़ियों से मिलती जुलती थी, जब वे असुरों धूर्तोंतथा नास्तिकों का अपने शंख, चक्र, गदा, कमल तथा अन्य प्राकृतिक अस्त्र-शस्त्रों से वध कररहे थे।
"
प्रायेण मेयं हरिणोरुमायिनावध: स्मृतोनेन समुद्यतेन किम् ।
एवं ब्रुव॑स्त्वभ्यपतद्गदायुधोनदन्नूसिंहं प्रति दैत्यकुझरः: ॥
२३॥
प्रायेण--शायद; मे--मेरा; अयम्--यह; हरिणा-- भगवान् द्वारा; उरु-मायिना--अत्यधिक योग शक्ति वाले; बध:--मृत्यु;स्मृत:---आयोजित; अनेन--इस; समुद्यतेन-- प्रयास के साथ; किमू--क्या लाभ; एवम्--इस प्रकार; ब्रुवन्ू--मन ही मन कहा;तु--निस्सन्देह; अभ्यपतत्--आक्रमण किया; गदा-आयुध: -- अपने गदा रूपी आयुध से युक्त; नदन्--जोर से गर्जना करतेहुए; नू-सिंहमू--आधा सिंह तथा आधा मनुष्य के रूप में प्रकट होने वाले भगवान्; प्रति--के प्रति; दैत्य-कुझर:--हाथी केतुल्य असुर हिरण्यकशिपु ने |
हिरण्यकशिपु ने मन ही मन कहा : 'अत्यधिक योग शक्ति वाले भगवान् विष्णु ने मेरा बधकरने के लिए यह योजना बनाई है, किन्तु ऐसा प्रयास करने से क्या लाभ है ?
भला ऐसा कौनहै, जो मुझसे युद्ध कर सकता है ?
' ऐसा सोचते हुए हाथी के समान हिरण्यकशिपु ने अपनीगदा उठाकर भगवान् पर आक्रमण कर दिया।
"
अलक्षितोग्नौ पतितः पतड़मोयथा नृसिंहौजसि सोसुरस्तदा ।
न तद्विचित्र॑ं खलु सत्त्वधामनिस्वतेजसा यो नु पुरापिबत्तम: ॥
२४॥
अलक्षित:--अहृश्य; अग्नौ--अग्नि में; पतित:--गिरा हुआ; पतड्रम:--पतंगा; यथा--जिस तरह; नूसिंह -- भगवान् नृसिंह देवका; ओजसि-ेज में; सः--वह; असुरः--हिरण्यकशिपु; तदा--उस समय; न--नहीं; तत्--वह; विचित्रमू-- अद्भुत;खलु--निस्सन्देह; सत्त्त-धामनि--सतोगुणी भगवान् में; स्व-तेजसा--अपने तेज से; यः--जो भगवान्; नु--निस्सन्देह; पुरा--प्राचीन काल में; अपिबत्ू--निगल लिया; तम:ः--भौतिक सृष्टि के भीतर अंधकार।
जिस तरह एक बेचारा छोटा पतंगा बरबस अग्नि में गिरकर अदृश्य हो जाता है उसी तरहजब हिरण्यकशिपु ने तेजोमय भगवान् पर आक्रमण किया तो वह अदृश्य हो गया।
यहआश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि भगवान् सदैव सतोगुण की स्थिति में रहते हैं।
प्राचीन काल मेंसृष्टि के समय वे अंधकारपूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रविष्ट हो गये थे और उसे उन्होंने अपने आध्यात्मिकतेज से प्रकाशित कर दिया था।
"
ततोभिपसद्या भ्यहनन्महासुरोरुषा नृसिंहं गदयोरूुवेगया ।
त॑ विक्रमन्तं सगदं गदाधरोमहोरगं तार्श््यसुतो यथाग्रहीत् ॥
२५॥
ततः--तत्पश्चात्; अभिपद्य--आक्रमण करके; अभ्यहनत्-- प्रहार किया; महा-असुर:--महान् असुर ( हिरण्यकशिपु ) ने;रुषा--क्रुद्ध होकर; नृसिंहम्-- भगवान् नृसिंह देव पर; गदया--अपनी गदा से; उरु-वेगया--अत्यधिक बलपूर्वक; तमू--उसे( हिरण्यकशिपु को ); विक्रमन्तम्--अपना पराक्रम दिखाते हुए; स-गदम्--उसकी गदा सहित; गदा-धर: --हाथ में गदा लिएभगवान् नृसिंह देव ने; महा-उरगम्--विशाल सर्प को; तार्श्य-सुत:--तार्क्ष्य पुत्र गरूड़; यथा--जिस तरह; अग्रहीतू--पकड़ ले।
तत्पश्चात् अत्यन्त क्रुद्ध उस महान् असुर हिरण्यकशिपु ने तेजी से नूसिंह देव पर अपनी गदासे आक्रमण कर दिया और उन्हें मारने लगा।
किन्तु भगवान् नृसिंह देव ने उस महान् असुर कोउसकी गदा समेत उसी तरह पकड़ लिया जिस तरह गरुड़ किसी साँप को पकड़ ले।
"
स तस्य हस्तोत्कलितस्तदासुरोविक्रीडतो यद्वदहिर्गरुत्मतः ।
असाध्वमन्यन्त हतौकसोमराघनच्छदा भारत सर्वधिष्ण्यपा: ॥
२६॥
सः--वह ( हिरण्यकशिपु ); तस्य--उस दिव्य ( भगवान् नृसिंह ) के; हस्त--हाथों से; उत्कलित:--छूट गया; तदा--उस समय;असुरः--दैत्यराज हिरण्यकशिपु; विक्रीडत:--खेलते हुए; यद्वत्ू--के सहश; अहिः--सर्प; गरुत्मतः--गरुड़ का; असाधु--बुरा; अमन्यन्त--मान लिया; हत-ओकस:--जिनके धाम हिरण्यकिशपु ने छीन लिये थे; अमरा:--देवगण; घन-च्छदा: --बादलों के पीछे स्थित; भारत--हे भरतपुत्र; सर्व-धिष्णय-पा: --समस्त स्वर्गलोकों के शासक।
हे भरत के महान् पुत्र युधिष्ठिर, जब नृसिंह देव ने हिरण्यकशिपु को अपने हाथ से छूट जानेका अवसर दे दिया, जिस तरह से कभी-कभी गरुड़ साँप के साथ खिलवाड़ करते हुए उसेअपने मुँह से सरक जाने देता है, तो सारे देवताओं ने, जिनके निवास स्थान उनके हाथों सेनिकल चुके थे और जो असुर के भय से बादलों के पीछे छिपे थे, इस घटना को शुभ नहींमाना।
निस्सन्देह, वे अत्यधिक विचलित थे।
"
तं मन्यमानो निजवीर्यशड्ितंयद्धस्तमुक्तो नृहरिं महासुरः ।
पुनस्तमासज्जत खड्गचर्मणीप्रगृह्म वेगेन गतश्रमो मृथे ॥
२७॥
तम्--उसको ( नृसिंह देव को ); मन्यमान:--सोचते हुए; निज-वबीर्य-शद्भितम्--अपने शौर्य से भयभीत; यत्--क्योंकि; हस्त-मुक्त:--भगवान् के चंगुल से मुक्त; नृ-हरिम्-- भगवान् नूसिंह देव को; महा-असुरः: --महान् असुर ने; पुन:--फिर से; तम्ू--उस पर; आसजत--आक्रमण किया; खड्ग-चर्मणी--अपनी ढाल-तलवार; प्रगृह्य--लेकर; वेगेन-- अत्यन्त वेग के साथ;गत-श्रम:--थकान से मुक्त; मृधे--युद्ध भूमि में |
जब हिरण्यकशिपु नृसिंह देव के हाथों से छूट गया तो उसे यह मिथ्या विचार हुआ किभगवान् उसके शौर्य से डर गये हैं।
अतएव युद्ध से थोड़ा विश्राम करके उसने अपनी ढाल-तलवार निकाली और फिर से अत्यन्त बलपूर्वक भगवान् पर आक्रमण कर दिया।
"
तं॑ श्येनवेगं शतचन्द्रवर्त्मभिश्चरन्तमच्छिद्रमुपर्य धो हरि: ।
कृत्वाइहासं खरमुत्स्वनोल्बणंनिमीलिताक्ष॑ं जगूहे महाजवः ॥
२८॥
तम्--उसको ( हिरण्यकशिपु को ); श्येन-वेगम्--बाज जैसी गति वाले; शत-चन्द्र-वर्त्मभि:--अपनी तलवार तथा एक सौचन्द्रमा जैसे चिह्नों से युक्त ढाल को भाँजते हुए; चरन्तम्--गति करते हुए; अच्छिद्रमू--किसी तरह का स्थान छोड़े बिना; उपरि-अधः--ऊपर तथा नीचे; हरिः-- भगवान्; कृत्वा--करते हुए; अट्ट-हासम्--जोर की हँसी; खरम्--अत्यन्त तीखी; उत्स्वन-उल्बणम्--इस तीक्र गर्जन से अत्यन्त भयभीत; निमीलित--बन्द; अक्षम्--आँखें; जगृहे--पकड़ लिया; महा-जब:--अत्यन्तशक्तिशाली भगवान् ने।
अट्टहास करते हुए अत्यन्त प्रबल तथा शक्तिशाली भगवान् नारायण ने हिरण्यकशिपु कोपकड़ लिया जो किसी प्रकार का वार करने की संभावना छोड़े बिना अपनी तलवार-ढाल सेअपनी रक्षा कर रहा था।
वह कभी बाज की गति से आकाश में चला जाता और कभी पृथ्वी परचला आता था।
वह नृसिंहदेव की हँसी के भय से अपनी आखें बन्द किये था।
"
विष्वक्स्फुरन्तं ग्रहणातुरं हरि-व्यालो यथाखुं कुलिशाक्षतत्वचम् ।
द्वार्यूरूमापत्य ददार लीलयानखैर्यथाहिं गरूडो महाविषम् ॥
२९॥
विष्वक्--चारों ओर; स्फुरन्तम्--अपने अंग हिलाते हुए; ग्रहण-आतुरम्-पकड़े जाने से पीड़ित; हरिः-- भगवान्, नृसिंह देवने; व्याल:--साँप; यथा--जिस तरह; आखुम्--चूहे को; कुलिश-अक्षत--जो इन्द्र के वज्र द्वारा भी न काटी जा सके;त्वचम्ू-त्वचा या खाल को; द्वारि--देहली पर; ऊरुम्--अपनी जाँघ पर; आपत्य--रखकर; ददार--फाड़ डाला; लीलया--सरलता से; नखैः--अपने नाखूनों से; यथा--जिस प्रकार; अहिमू--साँप को; गरुड:--गरुड़, विष्णु का वाहन; महा-विषम्--अत्यन्त विषधर
जिस प्रकार कोई साँप किसी चूहे को या कोई गरुड़ किसी अत्यन्त विषैले सर्प को पकड़ले उसी तरह भगवान् नृसिंहदेव ने उस हिरण्यकशिपु को पकड़ लिया जिसकी त्वचा में इन्द्र कावज् भी नहीं घुस सकता था।
ज्योंही पकड़े जाने पर वह अत्यन्त पीड़ित होकर अपने अंग इधर-उधर तथा चारों ओर हिलाने लगा त्योंही नूसिंहदेव ने उस असुर को अपनी गोद में रख लिया औरअपनी जांघों का सहारा देकर उस सभा भवन की देहली पर अपने हाथ के नाखूनों सेसरलतापूर्वक उस असुर को छिन्न-भिन्न कर डाला।
"
संरम्भदुष्प्रेन््यफराललोचनोव्यात्ताननान्तं विलिहन्स्वजिहया ।
असृग्लवाक्तारुणकेशराननोयथान्त्रमाली द्विपहत्यया हरि: ॥
३०॥
संरम्भ--अत्यन्त क्रोध के कारण; दुष्प्रेक्ष्य--अत्यन्त कठिनाई से दिखने वाला; कराल--अत्यन्त भयावह; लोचन:--आँखें;व्यात्त--फैली हुई; आनन-अन्तम्--मुँह की कोरों को; विलिहन्--चाटते हुए; स्व-जिह्या--अपनी जीभ से; असृक्ू-लव--रक्त के धब्बों से; आक्त--पुता हुआ; अरुण--लाल-लाल; केशर--गरदन के बाल; आनन:--तथा मुख; यथा--जिस तरह;अन्त्र-माली--आँतों की माला से विभूषित; द्विप-हत्यया--किसी हाथी को मारने से; हरिः--सिंह
भगवान् नृसिंहदेव के मुख तथा गरदन के बाल रक्त के छींटों से सने थे और क्रोध से पूर्णहोने के कारण उनकी भयानक आँखों की ओर देख पाना असम्भव था।
वे अपने मुँह की कोरोंको जीभ से चाट रहे थे तथा हिरण्यकशिपु के उदर से निकली आँतों की माला से सुशोभित थे।
वे उस सिंह की भाँति प्रतीत हो रहे थे जिस ने अभी-अभी किसी हाथी को मारा हो।
"
नखाडु रोत्पाटितहत्सरोरुहंविसृज्य तस्यानुचरानुदायुधान् ।
अहन्समस्तान्नखशस्त्रपाणिभि-दोर्दिण्डयूथोनुपथान्सहस्त्रश: ॥
३१॥
नख-अह्'ु र--नुकीले नाखूनों से; उत्पाटित--चीरा गया; हत्-सरोरुहम्ू--कमल पुष्प जैसे हृदय को; विसृज्य--एक तरफ फेंककर; तस्य--उसके; अनुचरान्ू--अनुयायियों ( सैनिक तथा अंगरक्षकों ) को; उदायुधानू--हथियार उठाते हुए; अहन्ू--मारडाला; समस्तान्--सभी; नख-शस्त्र-पाणिभि: --अपने नाखूनों तथा हाथ के अन्य हथियारों से; दोर्दण्ड-यूथ: --असंख्य बाहुओंवाले; अनुपथान्--हिरण्यकशिपु के अनुचरों को; सहस्त्रश:--हजारों |
अनेकानेक भुजाओं वाले भगवान् ने सर्वप्रथम हिरण्यकशिपु का हृदय निकाल लिया औरउसे एक ओर फेंक दिया।
फिर वे असुर के सैनिकों की ओर मुड़े।
ये सैनिक हजारों के झुंड मेंभगवान् से लड़ने आये थे और हाथों में हथियार उठाए थे।
ये हिरण्यकशिपु के अत्यन्तस्वामिभक्त अनुचर थे, किन्तु नृसिंह देव ने उन्हें अपने नाखून की नोकों से ही मार डाला।
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सटावधूता जलदा: परापतन्ग्रहाश्व तद्दृष्टिविमुष्टरोचिष: ।
अम्भोधय: श्वासहता विचुक्षुभु-निर्हादभीता दिगिभा विचुक्रुशु: ॥
३२॥
सटा--नृसिंह देव की जटा से; अवधूता: --हिले हुए; जलदा:--बादल; परापतन्--बिखरे हुए; ग्रहा:-- चमकी ले ग्रह; च--तथा; तत्-दृष्टि--पैनी दृष्टि से; विमुष्ट--निकाल ली गईं; रोचिष:--जिसका तेज; अम्भोधय:--समुद्रों का जल; श्वास-हता:ः --नृसिंह देव के श्वास से प्रताड़ित; विचुश्षुभु:--क्षुब्ध हो उठा; निर्हाद-भीता:--नृसिंह देव की गर्जना से भयभीत; दिगिभा:--दिशाओं की रखवाली करने वाले सारे हाथी; विचुक्रुशु:--चिग्घाड़ उठे ॥
नृसिंह देव के सिर के बालों से बादल हिलकर इधर-उधर बिखर गये।
उनकी जलती आँखोंसे आकाश के नक्षत्रों का तेज मंद पड़ गया और उनके श्वास से समुद्र क्षुब्ध हो उठे।
उनकीगर्जना से संसार के सारे हाथी भय से चिग्घाड़ने लगे।
"
चझौस्तत्सटोल्क्षिप्तविमानसड्डू लाप्रोत्सर्पत क्ष्मा च पदाभिपीडिता ।
शैला: समुत्पेतुरमुष्य रंहसातत्तेजसा खं ककुभो न रेजिरे ॥
३३॥
झौः--बाह्य आकाश; तत्-सटा--उनके बालों से; उत्क्षिप्--बाहर फेंका हुआ; विमान-सड्डु ला--विमानों से पूरित;प्रोत्सपत--स्थान से सरक गया; क्ष्मा--पृथ्वी; च-- भी; पद-अभिपीडिता-- भगवान् के चरणकमलों के गुरु भार से पीड़ित;शैला:--पर्वत; समुत्पेतु:--ऊपर उठ गया; अमुष्य--उस ( भगवान् ) के; रंहसा--असह्य बल से; तत्-तेजसा--उसके तेज से;खम्--आकाश; ककुभ:--दसों दिशाएँ; न रेजिरे--नहीं चमकीं
नूसिंह देव के सिर के बालों से वायुयान ( विमान ) बाह्य आकाश तथा उच्च लोकों में जागिरे।
भगवान् के चरणकमलों के दबाव से पृथ्वी अपनी स्थिति से छिटकती प्रतीत हुई औरउनके असहा बल से सारे पर्वत ऊपर उछल गये।
भगवान् के शारीरिक तेज से आकाश तथासमस्त दिशाओं का प्राकृतिक प्रकाश घट गया।
"
ततः सभायामुपविष्ठ मुत्तमेनृपासने सम्भूततेजसं विभुम् ।
अलक्षितद्वैरथमत्यमर्षणंप्रचण्डवक्त्रं न बभाज कश्चन ॥
३४॥
ततः--तत्पश्चात्; सभायामू--सभाभवतन में; उपविष्टमू--बैठे हुए; उत्तमे-- श्रेष्ठ; नूप-आसने--सिंहासन पर जिस परहिरण्यकश्पु बैठता था; सम्भृत-तेजसम्--पूर्ण तेजोमय; विभुम्--परमेश्वर को; अलक्षित-द्वैरथम्--जिनका प्रतिद्वन्द्दी या शत्रुदिख नहीं रहा था; अति--अत्यन्त; अमर्षणम्--( अपने क्रोध के कारण ) भयानक; प्रचण्ड-- भयंकर; वक्त्रमू--मुखमंडल;न--नहीं; बभाज--पूजे; कश्नन--कोई
अपना पूर्ण तेज तथा भंयकर मुखमंडल दिखलाते हुए नूसिंह देव अत्यन्त क्रुद्ध होने तथाअपने बल एवं ऐश्वर्य का सामना करने वाले किसी को न पाकर सभा भवतन में राजा के श्रेष्ठतमसिंहासन पर जा बैठे।
भय तथा आज्ञाकारिता के कारण किसी में साहस न हुआ कि सामनेआकर भगवान् की सेवा करे।
"
निशाम्य लोकत्रयमस्तकज्वरंतमादिदेत्यं हरिणा हतं मृथे ।
प्रहर्षवेगोत्कलितानना मुहुःप्रसूनवर्षर्ववृषु: सुरस्त्रिय: ॥
३५॥
निशाम्य--सुनकर; लोक-त्रय--तीनों लोकों का; मस्तक-ज्वरम्--सिर दर्द; तम्ू--उसको; आदि--मूल; दैत्यम्ू--असुर को;हरिणा--भगवान् द्वारा; हतम्--मारा गया; मृधे--युद्ध में; प्रहर्ष-वेग-- प्रसन्नता के मारे; उत्तलित-आनना: --खिले हुए चेहरोंवाली; मुहुः--पुनः पुनः; प्रसून-वर्षै:--फूलों की वर्षा से; ववृषु:--वर्षा की; सुर-स्त्रियः--देवताओं की स्त्रियों ने
हिरण्यकशिपु तीनों लोकों का सिर दर्द बना हुआ था।
अतएव जब स्वर्गलोक में देवताओंकी पत्नियों ने देखा कि इस महान् असुर का वध भगवान् के हाथों से हो गया है, तो उनके चेहरेप्रसन्नता के मारे खिल उठे।
देवताओं की स्त्रियों ने स्वर्ग से भगवान् नृसिंह देव पर पुनः पुनः'फूलों की वर्षा की।
"
तदा विमानावलिभिर्नभस्तलंदिदक्षतां सट्डु लमास नाकिनाम् ।
सुरानका दुन्दुभयोथ जघ्निरेगन्धर्वमुख्या ननृतुर्जगुः स्त्रियः ॥
३६॥
तदा--उस समय; विमान-आवलिभि:--विभिन्न प्रकार के विमानों से; नभस्तलम्--आकाश को; दिदृक्षताम्--देखने केइच्छुक; सद्डु लम्--समूहबद्ध; आस--हो गया; नाकिनाम्-देवातओं के; सुर-आनका:--देंवताओं के ढोल; दुन्दुभय:--दुन्दुभियाँ; अथ--तथा; जध्निरि--बजायी गईं; गन्धर्व-मुख्या: --गन्धर्वों के प्रमुख; ननृतु:--नाचने लगीं; जगुः--गाने लगे;स्त्रियः--स्वर्ग की स्त्रियाँ॥
उस समय भगवान् नारायण का दर्शन करने के इच्छुक देवताओं के विमानों से आकाश पटगया।
देवतागण ढोल तथा नगाड़े बजाने लगे जिन्हें सुनकर देव लोक की स्त्रियाँ नाचने लगींऔर गन्धर्वो के मुखिया मधुर गान गाने लगे।
"
तत्रोपब्रज्य विबुधा ब्रह्ोन्द्रगरिशादय:ः ।
ऋषय: पितरः सिद्धा विद्याधरमहोरगा: ।
मनव: प्रजानां पतयो गन्धर्वाप्सरचारणा: ॥
३७॥
यक्षा: किम्पुरुषास्तात वेताला: सहकिन्नरा: ।
ते विष्णुपार्षदा: सर्वे सुनन्दकुमुदादयः ॥
३८ ॥
मूर्ध्नि बद्धाज्अलिपुटा आसीनं तीब्रतेजसम् ।
ईडिरे नरशार्दुलं नातिदूरचरा: पृथक् ॥
३९॥
तत्र--वहाँ ( आकाश में ); उपब्रज्य--( अपने-अपने विमानों से ) आकर; विबुधा: --सारे देवता; ब्रह्म-इन्द्र-गिरिश-आदय:--ब्रह्मा, इन्द्र, शिव आदि; ऋषय:--ऋषिगण; पितरः--पितृलोक के निवासी; सिद्धा:--सिद्धलोक के निवासी; विद्याधर--विद्याधर लोक के निवासी; महा-उरगा:--सर्प लोक के वासी; मनवः--मनुष्यगण; प्रजानाम्ू--( विभिन्न लोक के ) जीवों के;'पतय:--प्रमुख; गन्धर्व--गन्धर्व लोक के वासी; अप्सर--अप्सरा लोक के वासी; चारणा:--चारण लोक के वासी; यक्षा:--यक्षगण; किम्पुरुषा:--किम्पुरुषणण; तात--हे प्रिय; बेताला:--वेतालगण; सह-किन्नरा: --किन्नरों समेत; ते--वे; विष्णु-पार्षदा:--( विष्णु लोक में ) भगवान् विष्णु के निजी सहयोगी; सर्वे--सभी; सुनन््द-कुमुद-आदय:--सुनन्द तथा कुमुद आदि;मूर्धि--अपने सिरों पर; बद्ध-अद्जलि-पुटा:--हाथ जोड़े; आसीनम्ू--सिंहासन पर बैठे हुए; तीब्र-तेजसम्--अपना आध्यात्मिकतेज बिखेरते हुए; ईंडिरि--सादर पूजा की; नर-शार्दुलम्--आधा मनुष्य तथा आधा सिंह के रूप में प्रकट होने वाले भगवान् को;न अति-दूरचरा:--पास आकर; पृथक् --अलग-अलग।
हे राजा युधिष्ठिर, तब सारे देवता भगवान् के निकट आ गये।
उनमें ब्रह्माजी, इन्द्र तथा शिवजी प्रमुख थे और उनके साथ बड़े-बड़े साधु पुरुष एवं पितुलोक, सिद्धलोक, विद्याधर लोकतथा नागलोक के निवासी भी थे।
वहीं सारे मनु तथा अन्य लोकों के प्रजापति भी पहुँच गये।
अप्सराओं के साथ-साथ गन्धर्व, चारण, यक्ष, किन्नर, बेताल, किम्पुरुष लोक के वासी तथाविष्णु के पार्षद सुनन््द एवं कुमुद आदि भी पहुँचे।
ये सभी भगवान् के निकट आये जो अपनेतीव्र प्रकाश से चमक रहे थे।
इन सबों ने अपने-अपने सिरों के ऊपर हाथ जोड़कर नमस्कारकिया और स्तुतियाँ कीं।
"
श्रीब्रह्मोवाचनतोअस्म्यनन्ताय दुरन्तशक्तयेविचित्रवीर्याय पवित्रकर्मणे ।
विश्वस्य सर्गस्थितिसंयमान्गुणैःस्वलीलया सन्दधतेव्ययात्मने ॥
४०॥
श्री-ब्रह्मा उबाच--ब्रह्माजी ने कहा; नतः--नतमस्तक; अस्मि--हूँ; अनन्ताय-- अनन्त भगवान् को; दुरन््त--जिसका अन्त ढूँढ़पाना कठिन है; शक्तये--विभिन्न शक्तियों से युक्त; विचित्र-वीर्याय--नाना प्रकार के पराक्रम से युक्त; पवित्र-कर्मणे--जिनकेकर्म का फल नहीं होता ( चाहे बुरा ही कर्म क्यों न करें, वे भौतिक गुण से दूषित नहीं होते ); विश्वस्य--विश्व की; सर्ग--सृष्टि;थिति--पालन; संयमान्--तथा संहार; गुणैः--गुणों से; स्व-लीलया--आसानी से; सन्दधते--सम्पन्न करता है; अव्यय-आत्मने--जिनके व्यक्तित्व का हास नहीं होता।
ब्रह्माजी ने प्रार्थना की: हे प्रभु, आप अनन्त हैं और आपकी शक्ति का कोई अन्त नहीं है।
कोई भी आपके पराक्रम तथा अद्भुत प्रभाव का अनुमान नहीं लगा सकता, क्योंकि आपके कर्ममाया द्वारा दूषित नहीं होते।
आप भौतिक गुणों से सहज ही ब्रह्माण्ड का सृजन, पालन तथासंहार करते हैं लेकिन तो भी आप अव्यय बने रहते हैं।
अतएव मैं आपको सादर नमस्कार करताहूँ।
"
श्रीरुद्र उबाचकोपकालो युगान्तस्ते हतोयमसुरोडइल्पक: ।
तत्सुतं पाह्मुपसृतं भक्त ते भक्तवत्सल ॥
४१॥
श्री-रुद्रः उबाच--शिवजी ने स्तुति की; कोप-काल:--( ब्रह्माण्ड का संहार करने के लिए ) आपके क्रोध का उचित समय;युग-अन्तः--कल्प का अन्त; ते--तुम्हारे द्वारा; हतः--मारा गया; अयम्--यह; असुरः--महान् दैत्य; अल्पक:--नगण्य; ततू-सुतम्--उसके पुत्र ( प्रहाद महाराज ) की; पाहि--रक्षा करो; उपसृतम्--शरणागत होकर पास ही खड़ा; भक्तम्-- भक्त; ते--तुम्हारा; भक्त-वत्सल--हे भक्तों के प्रति अत्यन्त वत्सल प्रभु!
शिव जी ने कहा : कल्प का अन्त ही आपके क्रोध का समय होता है।
अब जबकि यहनगण्य असुर हिरण्यकशिपु मारा जा चुका है, हे भक्तवत्सल प्रभु, कृपा करके उसके पुत्र प्रह्मदमहाराज की रक्षा करें जो आपके निकट पूर्ण शरणागत भक्त के रूप में खड़ा हुआ है।
"
श्रीइन्द्र उबाचप्रत्यानीता: परम भवता त्रायता नः स्वभागादैत्याक्रान्तं हृदयकमलं तदगृहं प्रत्यवोधि ।
कालग्रस्तं कियदिदमहो नाथ शुश्रूषतां तेमुक्तिस्तेषां न हि बहुमता नारसिंहापरै: किम् ॥
४२॥
श्री-इन्द्र: उबाच--स्वर्ग के राजा इन्द्र ने कहा; प्रत्यानीता:--लौटना है; परम--हे परम; भवता--आपके द्वारा; त्रायता--रक्षाकिये जाकर; नः--हम; स्व-भागा: --यज्ञ का अंश; दैत्य-आक्रान्तम्--दैत्य से पीड़ित; हृदय-कमलम्--अपने कमल रूपीहृदय; तत्-गृहम्--जो आपका वास्तविक धाम है; प्रत्यवोधि--प्रकाशित किया जा चुका; काल- ग्रस्तमू--समय द्वारा कबलित;कियत्--नगण्य; इदम्--यह ( संसार ); अहो--ओह; नाथ--हे स्वामी; शुश्रूषताम्--सेवा में लगे रहने वालों के लिए; ते--तुम्हारा; मुक्तिः-- भवबन्धन से मोक्ष; तेषामू--उनका ( शुद्ध भक्तों का ); न--नहीं; हि--निस्सन्देह; बहुमता--बहुत आवश्यकसमझा; नार-सिंह--हे नूसिंह देव; अपरैः किमू-- अन्य किसी सम्पत्ति से क्या लाभ ?
राजा इन्द्र ने कहा : हे परमेश्वर, आप हमारे उद्धारक तथा रक्षक हैं।
आपने देत्य से हमारेवास्तविक यज्ञ भाग जो वास्तव में आपके हैं लौटाये हैं।
चूँकि असुरराज हिरण्यकशिपु अत्यन्त भयानक था, अतः आपके स्थायी निवास हमारे हृदय उसके द्वारा विजित हो चुके थे।
अबआपकी उपस्थिति से हमारे हृदयों से निराशा तथा अंधकार दूर हो गये हैं।
हे प्रभु, जो लोगआपकी सेवा में सदैव लगे रहते हैं उनके लिए सारा भौतिक ऐश्वर्य तुच्छ है, क्योंकि आपकीसेवा मोक्ष से भी बढ़कर है।
वे जब मोक्ष की भी परवाह नहीं करते तो काम, अर्थ तथा धर्म केविषय में क्या कहा जाये ?
" श्रीऋषय ऊचु:त्वं नस्तपः परममात्थ यदात्मतेजोयेनेदमादिपुरुषात्मगतं ससर्क्थ ।
तद्ठिप्रलुप्तममुनाद्य शरण्यपालरक्षागृहीतवपुषा पुनरन्वमंस्था: ॥
४३॥
श्री-ऋषय: ऊचु:--ऋषियों ने कहा; त्वमू--तुम; न:ः--हमारी; तपः--तपस्या; परमम्--सर्वोच्च; आत्थ--उपदेश दिया; यत् --जो; आत्म-तेज:--आपकी आध्यात्मिक शक्ति; येन--जिससे; इदम्--यह ( भौतिक जगत ); आदि-पुरुष--हे परम आदिभगवान्; आत्म-गतमू--आपके भीतर लीन; ससक््थ--( आपने ) उत्पन्न किया; तत्ू--तप की वह विधि; विप्रलुप्तम्--चुराईगई; अमुना--उस दैत्य ( हिरण्यकशिपु ) द्वारा; अद्य--अब; शरण्य-पाल--शरणागत के परम पालक; रक्षा-गृहीत-वपुषा--आपके शरीर द्वारा जिसे आप रक्षा प्रदान करने के लिए धारण करते हैं; पुन:--फिर; अन्वमंस्था:-- आपने अनुमोदित किया है।
सारे उपस्थित ऋषियों ने उनकी इस प्रकार स्तुति की: हे प्रभु, हे शरणागत पालक, हे आदिपुरुष, आपने हमें पहले जिस तपस्या की विधि का उपदेश दिया है, वह आपकी ही आध्यात्मिकशक्ति है।
आप तपस्या से ही भौतिक जगत का सृजन करते हैं।
यह तपस्या आपमें सुप्त रहती है।
इस दैत्य ने अपने कार्यकलापों से इसी तपस्या को रोक सा रखा था, किन्तु अब हम लोगों कीरक्षा करने के लिए आप जिस नृसिंह देव के रूप में प्रकट हुए हैं उससे तथा इस असुर को मारनेसे तपस्या की विधि का फिर से अनुमोदन हुआ है।
"
श्रीपितर ऊचु:श्राद्धानि नोधिबुभुजे प्रसभं तनूजै-दत्तानि तीर्थसमयेप्यपिबत्तिलाम्बु ।
तस्योदरान्नखविदीर्णवपाद्य आर्च्छत्तस्मै नमो नृहरयेडखिलधर्मगोप्जे ॥
४४॥
श्री-पितर: ऊचु:--पितृलोक के वासियों ने कहा; श्राद्धानि-- श्राद्ध कर्म ( मृत पुरुखों को एक विशेष विधि से प्रदत्त भोज्यसामग्री ); नः--हमारा; अधिबुभुजे-- भोग किया; प्रसभम्--बल द्वारा; तनूजैः--अपने पुत्रों-पौत्रों द्वारा; दत्तानि-- प्रदत्त; तीर्थ-समये--तीर्थ स्थानों में स्नान करते समय; अपि-- भी; अपिबत्--पिया; तिल-अम्बु--तिल के साथ जलांजलि; तस्थ--उसअसुर के; उदरात्--पेट से; नख-विदीर्ण--नाखून से फाड़ा गया; वपात्ू--जिसकी आँतों की चमड़ी; यः--जिस ( भगवान् )ने; आर्च्छत्ू--प्राप्त किया; तस्मै--उसको ( भगवान् को ); नम:ः--नमस्कार; नृ-हरये--नृहरि को जो आधे सिंह तथा आधेपुरुष के रूप में प्रकट हुए; अखिल--विश्वजनीन; धर्म--धार्मिक नियम; गोप्त्रे--पालन करने वाले।
पितृलोक के वासियों ने प्रार्थना की: हम ब्रह्माण्ड के धार्मिक नियमों के पालनकर्ता भगवान्नृसिंह देव को सादर नमस्कार करते हैं।
आपने उस असुर को मार डाला है, जो हमारे श्राद्ध केअवसर पर हमारे पुत्रों-पौत्रों द्वारा अर्पित बलि को छीनकर खा जाता था और तीर्थस्थलों परअर्पित की जाने वाली तिलांजलि को पी जाता था।
हे प्रभु, आपने इस असुर को मारकर अपनेनाखूनों से इसके पेट को विदीर्ण करके उसमें से समस्त चुराई हुई सामग्री निकाल ली है।
अतएव हम आपको सादर नमस्कार करते हैं।
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श्रीसिद्धा ऊचुःयो नो गति योगसिद्धामसाधु-रहार्षद्योगतपोबलेन ।
नाना दर्प तं नखैर्विददारतस्मै तुभ्य॑ प्रणता: स्मो नूसिंह ॥
४५॥
श्री-सिद्धा: ऊचुः--सिद्धलोक के वासियों ने कहा; यः--जिस व्यक्ति ने; नः--हमारी; गतिम्--सिद्धि को; योग-सिद्धाम्ू--योग द्वारा प्राप्त: असाधु;:--अत्यन्त असभ्य तथा असत्यनिष्ठ; अहार्षीत्ू--चुरा लिया; योग--योग; तप:ः--तथा तप का;बलेन--बलपूर्वक; नाना दर्पम्--सम्पत्ति, ऐश्वर्य तथा शक्ति के कारण घमंडी; तम्--उसको; नखैः--नाखूनों से; विददार--'फाड़ डाला; तस्मै--उस; तुभ्यम्--तुम्हें; प्रणताः--नतमस्तक; स्मः--हम हैं; नूसिंह--हे नूसिंहदेव ॥
सिद्धलोक के वासियों ने प्रार्थना की: हे भगवान् नृसिंह देव, हम लोग सिद्धलोक केनिवासी होने के कारण अष्टांग योग में स्वतःसिद्ध होते हैं।
तो भी हिरण्यकशिपु इतना धूर्त थाकि उसने अपने बल तथा तपस्या से हमारी सारी शक्तियाँ छीन ली थीं।
इस तरह वह अपने योग-बल के प्रति घमंडी हो गया था।
अब आपके नखों से इस दुष्ट का वध हो जाने के कारण हमआपको सादर नमस्कार करते हैं।
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श्रीविद्याधरा ऊचुःविद्यां पृथग्धारणयानुराद्धांन्यषेधदज्ो बलवीर्यहप्त: ।
स येन सड्ख्ये पशुवद्धतस्तंमायानृसिंहं प्रणता: सम नित्यम् ॥
४६॥
श्री-विद्याधरा: ऊचु:--विद्याधर लोक के निवासियों ने प्रार्थना की; विद्यामू--जो विद्याएँ ( जिनसे प्रकट तथा अप्रकट हुआ जासकता है ); पृथक्ू-भिन्न-भिन्न; धारणया--मन के भीतर विविध ध्यानों से; अनुराद्धाम्-प्राप्त किया गया; न्यषेधत्-- रोकदिया; अज्ञ:--इस मूर्ख ने; बल-वीर्य-हप्त:--शारीरिक शक्ति तथा हर एक को जीत लेने की सामर्थ्य से फूल कर; सः--वह( हिरण्यकशिपु ); येन--जिसके द्वारा; सड्ख्ये--युद्ध में; पशु-बत्-- पशु के समान; हतः--मारा गया; तमू--उसको; माया-नृसिंहम्--अपनी माया के प्रभाव द्वारा नरसिंह रूप में प्रकट होने वाले नूसिंह देव को; प्रणता:--विनत; स्म--निश्चय ही;नित्यमू-शाश्रवत।
विद्याधर के निवासियों ने प्रार्थना की: उस मूर्ख हिरण्यकशिपु ने विविध प्रकार के ध्यान केअनुसार प्रकट तथा अप्रकट होने की हमारी शक्ति पर प्रतिबन्ध लगा दिया था, क्योंकि उसेअपनी श्रेष्ठ शारीरिक शक्ति तथा अन्यों को जीत लेने की सामर्थ्य का घमण्ड था।
अब भगवान्ने उसका उसी तरह वध कर दिया है जैसे वह असुर कोई पशु हो।
हम भगवान् नृसिंह देव के उसलीला रूप को सादर प्रणाम करते हैं।
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श्रीनागा ऊचु:येन पापेन रत्नानि स्त्रीरत्नानि हतानि नः ।
तद्क्षःपाटनेनासां दत्तानन्द नमोस्तु ते ॥
४७॥
श्री-नागा: ऊचु:--नागलोक के वासी, जो नाग सहृश दिखते हैं; येन--जिस व्यक्ति से; पापेन--अत्यन्त पापी ( हिरण्यकशिपु );रत्तानि--हमारे सिरों की मणियाँ; स्त्री-रत्तानि--सुन्दर स्त्रियाँ; हतानि--हर ली गईं; न:ः--हमारी; तत्--उसका; वक्ष:-पाटनेन--वक्षस्थल को चीर कर; आसाम्--समस्त स्त्रियों का ( जिनका अपहरण हुआ था ); दत्त-आनन्द--हे आनन्द के स्रोत;नमः--हमारा सादर नमस्कार; अस्तु--हो; ते--तुम्हारे प्रति
नागलोक के वासियों ने कहा : अत्यन्त पापी हिरण्यकशिपु ने हम सबके फणों की मणियाँतथा हम सबकी सुन्दर पत्नियाँ छीन ली थीं।
अब चूँकि उसके वक्षस्थल को आपने अपनेनाखूनों से विदीर्ण कर दिया है, अतएव आप हमारी पत्नियों की परम प्रसन्नता के कारण हैं।
इसतरह हम सभी मिलकर आपको सादर नमस्कार करते हैं।
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श्रीमनव ऊचु:मनवो वयं तव निदेशकारिणोदितिजेन देव परिभूतसेतव: ।
भवता खल: स उपसंहतः प्रभो'करवाम ते किमनुशाधि किड्डूरान् ॥
४८॥
श्री-मनव: ऊचु:--सभी मनुओं ने यह कहकर नमस्कार किया; मनवः--संसारी कार्यो के नेता ( विशेष रूप से भगवान् कीसुरक्षा में विधिपूर्वक रहने के लिए मानवता को ज्ञान प्रदान करने में ); वयम्--हम; तब--आपके ; निदेश-कारिण: --आज्ञापालक; दिति-जेन--दिति के पुत्र हिरण्यकशिपु द्वारा; देव--हे प्रभु; परिभूत--अवहेलना करके; सेतव:--मानव समाजमें वर्णा श्रम पद्धति सम्बन्धी नैतिक नियम; भवता--आपके द्वारा; खलः--दुष्ट; सः--वह; उपसंहत: --मारा गया; प्रभो--हेप्रभु; करवाम--हम करें; ते--तुम्हारा; किमू--क्या; अनुशाधि--कृपया आदेश दें; किड्जूरान्--अपने शाश्वत सेवकों को |
समस्त मनुओं ने इस प्रकार प्रार्थना की: हे प्रभो, हम सारे मनु आपके आज्ञापालक के रूपमें मानव समाज के लिए विधि प्रदान करते हैं किन्तु इस महान् असुर हिरण्यकशिपु कीक्षणभंगुर श्रेष्ठठा के कारण वर्णाश्रम धर्म पालन विषयक हमारे नियम नष्ट हो गये थे।
हे स्वामी,अब आपके द्वारा इस महान् असुर का वध हो जाने से हम अपनी सहज स्थिति में हैं।
कृपयाअपने इन शाश्वत दासों को आज्ञा दें कि अब वे क्या करें।
"
श्रीप्रजापतय ऊचु:प्रजेशा वयं ते परेशाभिसूष्टान येन प्रजा वै सृजामो निषिद्धा: ।
स एष त्वया भिन्नवक्षा नु शेतेजगन्मड्रलं सत्त्वमूर्तेअवतार: ॥
४९॥
श्री-प्रजापतय: ऊचु:--विभिन्न प्राणियों को उत्पन्न करने वाले महापुरुषों ने यह कहकर प्रार्थनाएँ कीं; प्रजा-ईशा:--जीवों कीअनेक पीढ़ियों को जन्म देने वाले ब्रह्मा द्वारा उत्पन्न सारे प्रजापति; वयम्--हम सभी; ते--तुम्हारे; पर-ईश--हे परमेश्वर;अभिसूष्टा:--उत्पन्न; न--नहीं; येन--जिस ( हिरण्यकशिपु ) से; प्रजा:--सारे जीव; बै--निस्सन्देह; सृजाम:--हम उत्पन्न करतेहैं; निषिद्धा:--मना किया गया; सः--वह ( हिरण्यकशिपु ); एष:--यह; त्वया-- तुम्हारे द्वारा; भिन्न-वक्षा:--जिसका वक्षस्थलविदीर्ण किया जा चुका है; नु--निस्सन्देह; शेते--शयन करता है; जगत्-मड्गनलम्--सारे जगत के कल्याण के लिए; सत्त्व-मूर्ते--शुद्ध सतोगुण के दिव्य रूप में; अवतार: --यह अवतार |
प्रजापतियों ने इस प्रकार स्तुति की: हे परमेश्वर, हे ब्रह्मा तथा शिव जी के भी पूज्य प्रभु, हमसारे प्रजापति आपके द्वारा दी गई आज्ञा के पालन के लिए उत्पन्न किये गये थे, किन्तुहिरण्यकशिपु ने हमें और उत्तम सन््तान उत्पन्न करने से रोक दिया।
अब यह असुर हमारे समक्षमृत पड़ा है, जिसके वक्षस्थल को आपने विदीर्ण कर दिया है।
अतएव हम आपको सादरनमस्कार करते हैं, क्योंकि इस शुद्ध सात्विक रूप में आपका यह अवतार समग्र ब्रह्माण्ड केकल्याण के निमित्त है।
श्रीगन्धर्वा ऊचु:बयं विभो ते नटनाट्यगायकायेनात्मसाद्वीर्यबलौजसा कृता: ।
स एष नीतो भवता दशामिमांकिमुत्पथस्थ: कुशलाय कल्पते ॥
५०॥
श्री-गन्धर्वा: ऊचु:--गन्धर्वलोक के निवासी ( जो सामान्यतः स्वर्ग के गायक होते हैं ) बोले; वयम्--हम; विभो--हे प्रभु; ते--तुम्हारे; नट-नाट्यू-गायका:--नाटक के नर्तक तथा गायक; येन--जिससे; आत्मसात्--पराधीन; वीर्य--उसके पराक्रम;बल--तथा शारीरिक शक्ति के; ओजसा--प्रभाव से; कृता:--बने ( लाये हुए ); सः--वह ( हिरण्यकशिपु ); एष:--यह;नीतः--लाया गया; भवता--आपके द्वारा; दशाम् इमामू--इस दशा को; किमू--क्या; उत्पथस्थ:--कुमार्गगामी; कुशलाय--कल्याण के लिए; कल्पते--समर्थ है।
गन्धर्वलोक के निवासियों ने प्रार्थना की: हे भगवान्, हम नाच तथा अभिनय में गायन द्वाराआपकी सेवा में लगे रहते थे, किन्तु इस हिरण्यकशिपु ने अपनी शारीरिक शक्ति तथा पराक्रम सेहमें अपने अधीन बना लिया था।
अब आपके द्वारा यह इस अधम दशा को प्राप्त हुआ है।
भलाहिरण्यकशिपु जैसे कुमार्गगामी के कार्यकलापों से हमें क्या लाभ हो सकता है ?
" श्रीचारणा ऊचुःहरे तवाड्प्रिपड्ठजं भवापवर्गमाश्रिता: ।
यदेष साधुहच्छयस्त्वयासुरः समापित: ॥
५१॥
श्री-चारणा: ऊचुः:--चारणलोक के निवासियों ने कहा; हरे--हे भगवान्; तब--तुम्हारे; अड्प्नि-पल्लडजम्ू--चरणकमल; भव-अपवर्गम्ू--संसार के कल्मष से मुक्त होने के लिए एकमात्र शरण; आश्रिता:--शरणागत; यत्--क्योंकि; एब: --यह; साधु-हत्-शयः--समस्त ईमानदार मनुष्यों के हृदयों में संकट; त्वया-- आपके द्वारा; असुरः--असुर ( हिरण्यकशिपु ); समापित:--मार डाला गया।
चारणलोक के निवासियों ने कहा : हे प्रभु, आपने उस असुर हिरण्यकशिपु को विनष्ट करदिया जो सारे निष्कपट पुरुषों के हृदयों में आतंक बना हुआ था।
अब हमें शान्ति मिली है।
हमसभी आपके उन चरणकमलों की शरण ग्रहण करते हैं, जो बद्धजीव को भौतिक कल्मष सेमुक्ति दिलानेवाले हैं।
"
श्रीयक्षा ऊचु:वयमनुचरमुख्या: कर्मभिस्ते मनोझै-स्त इह दितिसुतेन प्रापिता वाहकत्वम् ।
स तु जनपरितापं तत्कृतं जानता तेनरहर उपनीतः पश्ञतां पञ्ञविंश ॥
५२॥
श्री-यक्षा: ऊचु:--यक्षलोक के निवासियों ने प्रार्थना की; वयम्--हम; अनुचर-मुख्या:--आपके प्रमुख सेवक; कर्मभि:--सेवाओं से; ते--तुम्हारे; मनो-जैः--अत्यन्त अच्छे लगने वाले; ते--वे; इह--इस समय; दिति-सुतेन--दिति पुत्र हिरण्यकशिपुद्वारा; प्रापिता:--बलात् लगाये गये; वाहकत्वम्--कहार के कार्य में; सः--वह; तु--लेकिन; जन-परितापम्--मनुष्य कीदयनीय स्थिति; तत्-कृतम्ू--उसके द्वारा की गई; जानता--जानते हुए; ते--तुम्हारे द्वारा; नर-हर--हे नूसिंह रूप; उपनीत:--प्राप्त, लाया गया है; पञ्ञताम्-- मृत्यु को; पञ्ञ-विंश--हे पच्चीसवें सिद्धान्त ( अन्य चौबीस तत्त्वों के नियंत्रक )।
यक्षलोक के निवासियों ने प्रार्थना की: हे चौबीस तत्त्वों के नियामक, हम आपको भानेवाली सेवाएँ करने के कारण आपके सर्वश्रेष्ठ सेवक माने जाते हैं फिर भी दितिपुत्रहिरण्यकशिपु के आदेश पर हमसे पालकी ढोने का कार्य लिया जाता था।
हे नूसिंह देव, आपयह जानते हैं कि इस असुर ने किस तरह सबों को कष्ट पहुँचाया है, किन्तु अब आपने इसकावध कर दिया है और इसका शरीर पंच तत्त्वों में मिल गया है।
"
श्रीकिम्पुरुषा ऊचुःवयं किम्पुरुषास्त्वं तु महापुरुष ईश्वर: ।
अयं कुपुरुषो नष्टो धिक्कृतः साधुभिर्यदा ॥
५३॥
श्री-किम्पुरुषा: ऊचु:--किम्पुरुष लोक के निवासियों ने कहा; वयम्--हम; किम्पुरुषा: --किम्पुरुष लोक के वासी अथवा क्षुद्रप्राणी; त्वमू--आप; तु--फिर भी; महा-पुरुष: --परमे श्वर; ई श्वर:ः -- परम नियन्ता; अयम्--यह; कु-पुरुष:--अत्यन्त पापीपुरुष, हिरण्यकशिपु; नष्ट:--वध किया गया; धिक्-कृतः--तिरस्कृत होकर; साधुभि:--साधु पुरुषों द्वारा; यदा--जब
किम्पुरुषलोक के वासियों ने कहा : हम क्षुद्र जीव हैं और आप परम नियामक महापुरुष हैं।
अतएव हम आपकी समुचित स्तुति कैसे कर सकते हैं ?
जब भक्तों ने तंग आकर इस असुर कातिरस्कार कर दिया तो आपने इसका वध कर दिया।
"
श्रीवैतालिका ऊचुःसभासु सत्रेषु तवामलं यशोगीत्वा सपर्या महतीं लभामहे ।
अस्तामनैषीद्वशमेष दुर्जनोद्विप्ठया हतस्ते भगवन्यथामय: ॥
५४॥
श्री-वैतालिका: ऊचु:--वैतालिकलोक के वासियों ने कहा; सभासु--सभाओं में; सत्रेषु--यज्ञ-स्थल में; तब--तुम्हारा;अमलम्--किसी प्रकार के भी कल्मष से रहित, निर्मल; यश:--यश, कीर्ति; गीत्वा--गाते हुए; सपर्याम्--सम्माननीय पद;महतीम्--महान्; लभामहे--हमने प्राप्त किया; यः--जो; ताम्--उस ( आदरणीय पद ) को; अनैषीत्--ले आया; वशम्--अपने वश में; एब:--यह; दुर्जन:ः--कुटिल व्यक्ति; द्विष्ठया--सौभाग्य से; हतः--मारा गया; ते--तुम्हारे द्वारा; भगवन्--हेभगवान्; यथा--जिस तरह; आमय:--रोग |
वैतालिकलोक के निवासियों ने कहा : हे प्रभु, सभाओं तथा यज्ञस्थलों में आपके निर्मलयश का गायन करने के कारण प्रत्येक व्यक्ति हमें आदर प्रदान करता था।
किन्तु इस असुर नेहमारे उस पद को छीन लिया था।
अब हमारा बड़ा भाग्य है कि आपने इस महान् असुर का उसीतरह वध कर दिया जिस प्रकार कोई भीषण रोग को अच्छा कर देता है।
"
श्रीकिन्नरा ऊचु:वयमीश किन्नरगणास्तवानुगादितिजेन विष्टिममुनानुकारिता: ।
भवता हरे स वृजिनोवसादितोनरसिंह नाथ विभवाय नो भव ॥
५५॥
श्री-किन्नरा: ऊचु:--किन्नर लोक के निवासियों ने कहा; वयम्--हम सभी; ईश--हे ईश्वर; किन्नर-गणा:--किन्नर लोक केवासी; तब--तुम्हारे; अनुगा:--आज्ञाकारी दास; दिति-जेन--दिति पुत्र द्वारा; विष्टिमू--बिना किसी प्रकार के पारिश्रमिक केसेवा, बेगार; अमुना--उससे; अनुकारिता: --कराया गया; भवता--आपके द्वारा; हरे--हे भगवान्; सः--वह; वृजिन:--अत्यन्त पापी; अवसादितः--विनष्ट; नरसिंह--हे नूसिंह देव; नाथ--हे स्वामी; विभवाय--सुख तथा ऐश्वर्य के लिए; न:--हमारे; भव--हों |
किन्नरों ने कहा : हे परम नियन्ता, हम आपके सतत सेवक हैं, लेकिन आपकी सेवा में युक्तन होकर हम सभी इस असुर की बेगार में लगाये गये थे।
अब आपने इस पापी का वध कर दियाहै, अतएव हे नृसिंहदेव, हे स्वामी, हम आपको सादर नमस्कार करते हैं।
कृपा करके हमारेसंरक्षक बने रहें।
"
श्रीविष्णुपार्षदा ऊचु:अद्यैतद्धरिनररूपमद्भुतं तेहृ्ट न: शरणद सर्वलोकशर्म ।
सोयं ते विधिकर ईश विप्रशप्त-स्तस्थेदं निधनमनुग्रहाय विदा: ॥
५६॥
श्री-विष्णु-पार्षदा: ऊचु:--वैकुण्ठलोक के भगवान् विष्णु के पार्षदों ने कहा; अद्य--आज; एतत्--यह; हरि-नर--आधा सिंहतथा आधा पुरुष; रूपमू--रूप को; अद्भुतम्-- अद्भुत; ते--तुम्हारा; दृष्टमू--देखा हुआ; नः--हमारा; शरण-द--शाश्वतशरण प्रदान करने वाला; सर्व-लोक-शर्म--विभिन्न लोकों में सौभाग्य लाने वाला; सः--वह; अयम्--यह; ते--तुम्हारा;विधिकरः:--आज्ञापालक ( दास ); ईश--हे ईश्वर; विप्र-शप्त:--ब्राह्मण द्वारा शापित; तस्य--उसका; इृदम्--यह; निधनम्--वध; अनुग्रहाय--विशेष कृपा के लिए; विद्यः--हम समझते हैं|
विष्णु के वैकुण्ठलोक के पार्षदों ने यह प्रार्थना की: हे स्वामी, हे शरणदाता, आज हमनेनृसिंहदेव के रूप में आपके अद्भुत रूप का दर्शन किया है, जो समस्त जगत में सौभाग्य लानेवाला है।
हे भगवान्, हम यह समझते हैं कि हिरण्यकशिपु आपकी सेवा में रत रहने वाला जयही था, किन्तु उसे ब्राह्मणों ने शाप दे दिया था जिससे उसे असुर का शरीर प्राप्त हुआ था।
हमसमझते हैं कि उसका मारा जाना उस पर आपकी विशेष कृपा है।
"
