← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 7 की सूची

अध्याय सात: प्रह्लाद ने गर्भ में क्या सीखा

7.7श्रीनारद उबाचएवं दैत्यसुतैः पृष्ठो महाभागवतोसुरः ।

उवबाच तान्स्मयमान:स्मरन्मदनुभाषितम्‌ ॥

१॥

श्री-नारद: उवाच--महान्‌ सन्त नारद मुनि ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; दैत्य-सुतैः--दैत्य को पुत्रों द्वारा; पृष्ट:--पूछे जाने पर;महा-भागवतः-- भगवान्‌ के महान्‌ भक्त ने; असुरः--दैत्यों के वंश में उत्पन्न; उबाच--कहा; तान्‌ू--उनसे ( असुर पुत्रों से );स्मयमान:--हँसते हुए; स्मरन्‌--स्मरण करते हुए; मत्‌-अनुभाषितम्‌--मेरे द्वारा कहा गया |

नारद मुनि ने कहा : यद्यपि प्रह्मद महाराज असुरों के परिवार में जन्मे थे, किन्तु वे समस्तभक्तों में सबसे महान्‌ थे।

इस प्रकार अपने असुर सहपाठियों द्वारा पूछे जाने पर उन्होंने मेरे द्वाराकहे गये शब्दों का स्मरण किया और अपने मित्रों से इस प्रकार कहा।

"

श्रीप्रहाद उवाचपितरि प्रस्थितेउस्माकं तपसे मन्दराचलम्‌ ।

युद्धोद्यमं परं चक्रुर्विबुधा दानवान्प्रति ॥

२॥

श्री-प्रह्मद: उबाच--प्रह्माद महाराज ने कहा; पितरि--असुर पिता हिरण्यकशिपु के; प्रस्थिते--यहाँ से जाने पर; अस्माकम्‌--हमारे; तपसे--तपस्या करने के लिए; मन्दर-अचलम्‌ू--मन्दराचल नामक पर्वत पर; युद्ध-उद्यमम्‌--युद्ध करने का उद्योग;परम्‌-महान्‌; चक्रु:--सम्पन्न किया; विबुधा:--इन्द्र इत्यादि देवताओं ने; दानवान्‌ू--असुरों के ; प्रति--प्रति |

प्रहाद महाराज ने कहा : जब हमारे पिता हिरण्यकशिपु कठिन तपस्या करने के लिएमन्दराचल पर्वत चले गये तो उनकी अनुपस्थिति में इन्द्र इत्यादि देवताओं ने युद्ध में सारे असुरोंका दमन करने का घोर प्रयास किया।

"

पिपीलिकैरहिरिव दिछ्या लोकोपतापन: ।

पापेन पापोभक्षीति वदनतो वासवादयः ॥

३॥

पिपीलिकैः--छोटी-छोटी चीटियों के द्वारा; अहिः--साँप; इब--सहश; दिछ्या--ओह; लोक-उपतापन:--सदैव सबों काउत्पीड़न करने वाला; पापेन--अपने ही पाप कर्मों से; पाप:--पापी हिरण्यकशिपु; अभक्षि--खा लिया गया; इति--इस प्रकार;वदन्तः--कहते हुए; वासव-आदय:--राज इन्द्र आदि देवता

ओह! जिस प्रकार साँप को छोटी-छोटी चींटियाँ खा जाती हैं उसी प्रकार कष्टदायकहिरण्यकशिपु जो सभी प्रकार के लोगों पर कहर ढहाता था अपने ही पापकर्मों के कारणपराजित किया जा चुका है।

ऐसा कहकर इन्द्रादि देवताओं ने असुरों से लड़ने की योजनाबनाई।

"

तेषामतिबलोद्योगं निशम्यासुरयूथपा: ।

वध्यमाना: सुरैर्भीता दुद्ग॒ुवु: सर्वती दिशम्‌ ॥

४॥

कल्नत्रपुत्रवित्ताप्तान्गृहान्पशुपरिच्छदान्‌ ।

नावेक्ष्यमाणास्त्वरिता: सर्वे प्राणपरीप्सव: ॥

५॥

तेषाम्‌ू--इन्द्र आदि देवताओं का; अतिबल-उद्योगम्‌--अत्यधिक शक्ति तथा उद्योग; निशम्य--सुन कर; असुर-यूथपा:-- असुरोंके महन नायक; वध्यमाना:--एक के बाद एक मारे जाकर; सुरैः--देवताओं द्वारा; भीता:-- भयभीत; दुद्गुवु:-- भाग गये;सर्वतः--समस्त; दिशम्‌-दिशाओं में; कलत्र--पत्नियाँ; पुत्र-वित्त--लड़के तथा सम्पत्ति; आप्तान्‌ू--सम्बन्धी; गृहानू--घरोंको; पशु-परिच्छदान्‌ू-- पशु तथा गृहस्थी के सामान को; न--नहीं; अवेक्ष्यमाणा:--देखते हुए; त्वरिता:--जल्दी-जल्दी;सर्वे--सभी; प्राण-परीप्सब:ः--जीवित रहने की अत्यधिक इच्छा करते हुए।

एक के बाद एक मारे जाने पर जब असुरों के महान्‌ नायकों ने लड़ाई में देवताओं का अभूतपूर्व पराक्रम देखा, तो वे तितर-बितर होकर सभी दिशाओं में भागने लगे।

अपने प्राणों कीरक्षा करने के लिए वे अपने घरों, पत्नियों, बच्चों, पशुओं तथा घर के सारे साज-समान कोछोड़कर जल्दी-जल्दी भाग गये।

उन्होंने इन सबकी परवाह नहीं की और मात्र भागना आरम्भकर दिया।

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व्यलुम्पन्‌ राजशशिबिर्ममरा जयकाडक्षिण: ।

इन्द्रस्तु राजमहिषीं मातरं मम चाग्रहीत्‌ ॥

६॥

व्यलुम्पन्‌-- लूटा; राज-शिबिरम्‌-मेरे पिता हिरण्यकशिपु के महल को; अमरा:--देवताओं ने; जय-काड्क्षिण:--विजयी होनेके लिए उत्सुक; इन्द्र:--देवताओं के प्रमुख राजा इन्द्र ने; तु--लेकिन; राज-महिषीम्‌--रानी; मातरम्‌--माता को; मम--मेरी;च--भी; अग्रहीत्‌ू--पकड़ लिया।

विजयी देवताओं ने असुरराज हिरण्यकशिपु के महल को लूट लिया और उसके भीतर कीसारी वस्तुएँ नष्ट-भ्रष्ट कर दीं।

तब स्वर्ग के राजा इन्द्र ने मेरी माता को बन्दी बना लिया।

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नीयमानां भयोद्विग्नां रूदतीं कुररीमिव ।

यहच्छयागतत्तत्र देवर्षिदेदशे पथि ॥

७॥

नीयमानाम्‌--ले जाई जाती हुई; भय-उद्विग्नाम्‌--उद्विग्न तथा भयभीत; रुदतीम्‌ू--रोती हुईं; कुररीम्‌ इब--कुररी पक्षी की तरह;यहच्छया--दैववश; आगतः --आये हुए; तत्र--उस स्थान पर; देव-ऋषि: --परम सन्त नारद ने; दहशे -- देखा; पथि--रास्ते में |

जब इस प्रकार वे गृद्ध द्वारा पकड़ी गई कुररी पक्षी की भाँति भय से चिललाती हुई ले जाईजा रही थीं तो देवर्षि महर्षि नारद जो उस समय किसी भी कार्य में व्यस्त नहीं थे, घटनास्थल परप्रकट हुए और उन्होंने उस अवस्था में उन्हें देखा।

"

प्राह नैनां सुरपते नेतुमरहस्यनागसम्‌ ।

मुझ्न मुझ महाभाग सतीं परपरिग्रहम्‌ ॥

८॥

प्राह--कहा; न--नहीं; एनाम्‌--इसको; सुर-पते--हे देवताओं के राजा; नेतुमू--घसीटने के लिए; अहसि--तुम्हें चाहिए;अनागसम्‌--पापरहित, निर्दोष; मुझ मुझ्ञ--छोड़ दो, छोड़ दो; महा-भाग--हे परम भाग्यशाली; सतीम्‌--सती; पर-परिग्रहम्‌--पराये पुरुष की पत्नी को

नारद मुनि ने कहा: हे देवराज इन्द्र, यह स्त्री निश्चय ही पापरहित है।

तुम्हें इसे इस तरहक्रूरतापूर्वक घसीटना नहीं चाहिए।

हे परम सौभाग्यशाली, यह सती स्त्री किसी दूसरे की पत्नी है।

तुम इसे तुरन्त छोड़ दो।

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श्रीइन्द्र बाचआस्तेस्या जठरे वीर्यमविषटह्वंं सुरद्विष: ।

आस्यतां यावत्प्रसवं मोक्ष्येडर्थपदवीं गत: ॥

९॥

श्री-इन्द्र: उवाच--राजा इन्द्र ने कहा; आस्ते--है; अस्या:--उसके ; जठरे--उदर में; वीर्यम्‌--वीर्य; अविषह्ाम्‌-- असहनीय;सुर-द्विष:--देवताओं के शत्रु का; आस्यताम्‌--इसे रहने दें ( हमारी कैद में ); यावत्‌--जब तक; प्रसवम्‌--बच्चे का जन्म;मोक्ष्ये--मैं छोड़ दूँगा; अर्थ-पदवीम्‌--मेंरे लक्ष्य का मार्ग; गत:--प्राप्त हुआ |

राजा इन्द्र ने कहा : इस असुरपत्नी के गर्भ में उस असुर हिरण्यकशिपु का वीर्य है।

अतएवइसे तब तक हमारे संरक्षण में रहने दें जब तक बच्चा उत्पन्न नहीं हो जाता।

तब हम इसे छोड़देंगे।

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श्रीनारद उवाचअयं निष्किल्बिष: साक्षान्महाभागवतो महान्‌ ।

त्वया न प्राप्स्यते संस्थामनन्तानुचरो बली ॥

१०॥

श्री-नारद: उबाच--महान्‌ सन्त नारद मुनि ने कहा; अयम्‌--यह ( गर्भस्थ बालक ); निष्किल्बिष:--पूर्णतया पापरहित;साक्षात्‌-प्रत्यक्ष; महा-भागवतः--सन्त भक्त; महान्‌ू--महान्‌; त्वया--तुम्होरे द्वारा; न प्राप्स्थते--नहीं प्राप्त करेगा; संस्थाम्‌--अपनी मृत्यु; अनन्त-- भगवान्‌ का; अनुचर:--दास; बली--अत्यन्त शक्तिशाली |

नारद मुनि ने उत्तर दिया: इस स्त्री के गर्भ में स्थित बालक निर्दोष या निष्पाप है।

निस्सन्देह,वह महान्‌ भक्त तथा भगवान्‌ का शक्तिशाली दास है।

अतएव तुम उसे मार पाने में सक्षम नहींहोगे।

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इत्युक्तस्तां विहायेन्द्रो देवर्षेमानियन्वच: ।

अनन्तप्रियभक्त्यैनां परिक्रम्य दिवं ययौ ॥

११॥

इति--इस प्रकार; उक्त:--सम्बोधित होकर; तामू--उसको; विहाय--छोड़ कर; इन्द्र: --स्वर्ग का राजा; देव-ऋषे:--नारद मुनिके; मानयन्‌--मानते हुए, सम्मान करते हुए; वच:--शब्दों का; अनन्त-प्रिय-- भगवान्‌ के प्रिय; भक्त्या--भक्ति से; एनामू--इसको ( स्त्री को ); परिक्रम्य--परिक्रमा करके; दिवम्‌--स्वर्ग लोक को; ययौ--वापस चला गया |

जब परम सन्त नारद मुनि ने इस प्रकार कहा तो राजा इन्द्र ने नारद के वचनों का सम्मानकरते हुए तुरन्त ही मेरी माता को छोड़ दिया।

चूँकि मैं भगवद्भक्त था, अतएवं सब देवताओं नेमेरी माता की परिक्रमा की और तब वे सभी अपने अपने स्वर्गधाम को वापस चले गये।

"

ततो मे मातरमृषि: समानीय निजाश्रमे ।

आश्वास्येहोष्यतां वत्से यावत्ते भर्तुरागम: ॥

१२॥

ततः--तत्पश्चात्‌; मे--मेरी; मातरम्‌--माता को; ऋषि: --नारद ऋषि ने; समानीय--लाकर; निज-आश्रमे--अपने आश्रम में;आश्वास्य--आश्वासन देकर; इह--यहाँ; उष्यतामू--निवास करो; वत्से--मेरी बेटी; यावत्‌--जब तक; ते--तुम्हारे; भर्तु:--पति का; आगमः--आगमन, आना।

प्रह्दाद महाराज ने आगे बताया: परम सन्त नारद मुनि मेरी माता को अपने आश्रम ले गयेऔर यह कहकर सभी प्रकार से सुरक्षा का आश्वासन दिया 'मेरी बेटी, तुम मेरे आश्रम में अपने पति के वापस आने तक रहो।

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'तथेत्यवात्सीद्देवर्षरन्तिके साकुतोभया ।

यावद्दैत्यपति्घोरात्तपसो न न्यवर्तत ॥

१३॥

तथा--ऐसा ही हो; इति--इस प्रकार; अवात्सीत्‌--रहती रही; देव-ऋषे:--देवर्षि नारद के; अन्तिके--निकट; सा--वह ( मेरीमाता ); अकुतो-भया--किसी भी प्रकार के भय के बिना; यावत्‌--जब तक; दैत्य-पति:--मेंरे पिता असुरराज हिरण्यकशिपुने; घोरातू-- अत्यन्त कठिन; तपस:-- तपस्या; न--नहीं; न्यवर्तत--बन्द कर दिया।

देवर्षि नारद के उपदेशों को मानकर मेरी माता बिना किसी प्रकार के भय के उनकी देख-रेख में तब तक रहती रही जब तक मेरे पिता दैत्ययाज अपनी घोर तपस्या से मुक्त नहीं हो गये।

"

ऋषिं पर्यचरत्तत्र भक्त्या परमया सती ।

अन्तर्वली स्वगर्भस्य क्षेमायेच्छाप्रसूतये ॥

१४॥

ऋषिम्‌--नारद मुनि की; पर्यचरत्‌--सेवा करती रही; तत्र--वहाँ ( आश्रम में ); भक्त्या-- श्रद्धा तथा भक्तिपूर्वक; परमया--परम; सती--आज्ञाकारी स्त्री; अन्तर्वली--गर्भवती; स्व-गर्भस्य-- अपने गर्भ के; क्षेमाय--कल्याण के लिए; इच्छा--इच्छानुसार; प्रसूतये--सन्तान उत्पन्न करने के लिए

मेरी माता गर्भवती होने के कारण अपने गर्भ की सुरक्षा चाहती थीं और चाहती थीं कि पतिके आगमन के बाद सन्तान उत्पन्न हो।

इस तरह वे नारद मुनि के आश्रम पर रहती रहीं जहाँ वेअत्यन्त भक्तिपूर्वक नारद मुनि की सेवा करती रहीं।

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ऋषि: कारुणिकस्तस्या: प्रादादुभयमी श्वरः ।

धर्मस्य तत्त्वं ज्ञानं च मामप्युद्दिश्य निर्मलम्‌ ॥

१५॥

ऋषि:--नारद मुनि; कारुणिक:--पतितों पर अत्यधिक स्नेहिल या कृपालु; तस्या: --उसको ; प्रादातू--उपदेश दिया;उभयम्‌--दोनों को; ईश्वर: --शक्तिमान नियन्ता नारद मुनि जो चाहे सो कर दे; धर्मस्य-- धर्म का; तत्त्वम्‌--सत्य; ज्ञामम्‌ू--ज्ञान;च--तथा; मामू--मुझको; अपि--विशेष रूप से; उद्दिश्य--इंगित करके ; निर्मलम्‌ू--भौतिक कल्मष से रहित |

नारद मुनि ने गर्भ में स्थित मुझे तथा अपनी सेवा में लगी मेरी माता दोनों को उपदेश दिया।

चूँकि वे स्वभाव से पतितों पर अत्यन्त दयालु हैं, अतएवं अपनी दिव्य स्थिति के कारण उन्होंनेधर्म तथा ज्ञान के विषय में उपदेश दिये।

ये उपदेश भौतिक कल्मष से रहित थे।

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तत्तु कालस्य दीर्घ॑त्वास्त्रीत्वान्मातुस्तिरोदधे ।

ऋषिणानुगृहीतं मां नाधुनाप्यजहात्स्मृति: ॥

१६॥

तत्‌--वह ( धर्म तथा ज्ञान विषयक उपदेश ); तु--निस्सन्देह; कालस्य--समय के; दीर्घत्वात्‌--दीर्घ होने के कारण;स्त्रीत्वात्‌--स्त्री होने के कारण; मातुः--मेरी माता का; तिरोदधे--लुप्त हो गया; ऋषिणा--ऋषि द्वारा; अनुगृहीतम्‌-- आशीर्वादसे; मामू--मुझको; न--नहीं; अधुना--आज; अपि-- भी; अजहात्‌--छोड़ पाई; स्मृति: --स्मृति ( नारद मुनि के उपदेशों की )॥

अधिक काल बीत जाने तथा स्त्री होने से अल्पज्ञ होने के कारण मेरी माता उन सारे उपदेशोंको भूल गईं, किन्तु ऋषि नारद ने मुझे आशीर्वाद दिया था, अतएव मैं नहीं भूल पाया।

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भवतामपि भूयान्मे यदि श्रदधते बच: ।

वैज्ञारदी धी: श्रद्धातः स्त्रीबालानां च मे यथा ॥

१७॥

भवताम्‌--तुम लोगों की; अपि-- भी; भूयात्‌--हो सकता है; मे--मेरा; यदि--यदि; श्रद्धधते--तुम विश्वास करो; वच:--शब्द; वैशारदी--अत्यन्त दक्ष, या परमेश्वर के प्रति; धीः--बुद्द्धि; श्रद्धात:--हृढ़ श्रद्धा के कारण; स्त्री--स्त्रियों के;बालानाम्‌ू--बालकों के; च--भी; मे--मेरा; यथा--जिस तरह।

प्रह्माद महाराज ने कहा : हे मित्रों, यदि तुम मेरी बातों पर श्रद्धा करो तो तुम भी उसी श्रद्धासे मेरे ही समान दिव्य ज्ञान को समझ सकते हो, भले ही तुम सभी छोटे-छोटे बालक क्‍यों नहो।

इसी प्रकार एक स्त्री भी दिव्य ज्ञान को समझ सकती है और यह जान सकती है कि आत्माक्या है तथा भौतिक पदार्थ कया है।

हः न ते" जन्माद्या: षडिमे भावा दृष्टा देहस्य नात्मन: ।

'फलानामिव वृक्षस्य कालेने श्वरमूर्तिना ॥

१८॥

जन्म-आद्या:--जन्म से लेकर; षघट्‌ू--छः ( जन्म, अस्तित्व, वृद्धि, रूपान्तर, क्षय तथा अन्त में मृत्यु ); इमें--ये सब; भावा:--शरीर की विभिन्न अवस्थाएँ; दृष्टा:--देखे जाते हैं; देहस्थ--शरीर के; न--नहीं; आत्मन:--आत्मा के; फलानामू-- फलों के;इब--सहश्; वृक्षस्थ--वृक्ष के; कालेन--काल क्रम से; ईश्वर-मूर्तिना--जिसका स्वरूप रूपान्तर करने या शारीरिककार्यकलापों को वश में करने की क्षमता है।

जिस प्रकार वृक्ष के फलों तथा फूलों में कालक्रम से छः प्रकार के परिवर्तन--जन्म,अस्तित्व, वृद्धि, रूपान्तर, क्षय तथा अन्त में मृत्यु--होते हैं उसी प्रकार विभिन्न परिस्थितियों मेंआत्मा को जो भौतिक शरीर प्राप्त होता है उसमें भी ऐसे ही परिवर्तन होते हैं।

किन्तु आत्मा मेंऐसे परिवर्तन नहीं होते।

"

आत्मा नित्योव्ययः शुद्ध एक: क्षेत्रज्ञ आश्रय: ।

अविक्रिय: स्वह्ग्‌ हेतुर्व्यापकोसड्ग्यनावृतः ॥

१९॥

एतैर्द्गठाद्शभिर्विद्वानात्मनो लक्षणै: परैः ।

अहं ममेत्यसद्धावं देहादौ मोहजं त्यजेतू ॥

२०॥

आत्मा--आत्मा, भगवान्‌ का अंश; नित्य:--जन्म या मृत्यु से रहित; अव्यय:--क्षीण होने की सम्भावना से रहित; शुद्ध: --आसक्ति तथा विरक्ति के भौतिक कल्मष से रहित; एक: --अकेला।

क्षेत्र-ज्ञ:--जानने वाला अतएव भौतिक शरीर से पृथक्‌;आश्रय:--मूल आधार; अविक्रिय:--शरीर की तरह परिवर्तन नहीं होते; स्व-हक्‌-- आत्म-प्रकाशित; हेतु:--समस्त कारणों केकारण; व्यापक:--चेतना के रूप में सारे शरीर में फैला हुआ; असड्री--शरीर पर आश्रित न रहकर ( एक शरीर से दूसरे मेंदेहान्तर करने के लिए मुक्त ); अनावृत:--भौतिक कल्मष के द्वारा आच्छादित नहीं; एतैः--इन सबों के द्वारा; द्वादशभि:--बारह; विद्वानू-व्यक्ति जो मूर्ख नहीं हैं, अपितु वस्तुओं के यथारूप से परिचित हैं; आत्मन:--आत्मा के; लक्षणैः--लक्षणों से;'परैः--दिव्य; अहम्‌--मैं ( मैं यह शरीर हूँ ); मम--मेरा ( इस शरीर से सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु मेरी है ); इति--इस प्रकार;असत्‌-भावम्‌--जीवन की मिथ्या धारणा; देह-आदौ--अपनी पहचान भौतिक देह से और फिर अपनी पली, सन्‍्तान, परिवार,या जाति, राष्ट्र आदि से करना; मोह-जम्‌--मोहमय ज्ञान से उत्पन्न; त्यजेत्‌ू-त्याग देना चाहिए।

'आत्मा' परमेश्वर या जीवों का सूचक है।

ये दोनों ही आध्यात्मिक हैं, जन्म-मृत्यु से मुक्त हैंतथा क्षय से रहित एवं भौतिक कल्मष से भी मुक्त हैं।

ये व्यष्टि हैं, ये बाह्य शरीर के ज्ञाता हैं,प्रत्येक वस्तु के आश्रय या आधार हैं।

ये भौतिक परिवर्तन से मुक्त हैं, ये आत्मप्रकाशित हैं, येसमस्त कारणों के कारण हैं तथा सर्वव्यापी हैं।

इन्हें भौतिक शरीर से कोई सरोकार नहीं रहता,अतएव ये सदैव अनाकृष्ट रहते हैं।

इस दिव्य गुणों से युक्त जो मनुष्य वास्तव में विद्वान है उसेजीवन की भ्रान्त धारणा का परित्याग करना चाहिए जिसमें वह सोचता है 'मैं यह भौतिक शरीरहूँ और इस शरीर से सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु मेरी है।

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स्वर्ण यथा ग्रावसु हेमकारःक्षेत्रेषु योगैस्तदभिज्ञ आप्नुयात्‌ ।

क्षेत्रेषु देहेषु तथात्मयोगै-रध्यात्मविद्वह्गतिं लभेत ॥

२१॥

स्वर्णमू--सोने को; यथा--जिस प्रकार; ग्रावसु--स्वर्ण खनिज के पत्थरों में; हेम-कारः--स्वर्ण के विषय में जानने वाला,विशेषज्ञ; क्षेत्रेषु--सोने की खानों में; योगै:--विभिन्न विधियों द्वारा; तत्‌-अभिज्ञ:--जानकार जो यह जानता है कि सोना कहाँहै; आणुयात्‌--सरलता से प्राप्त कर लेता है; क्षेत्रेषु-- भौतिक खेतों में; देहेषु--मनुष्य शरीरों तथा शेष चौरासी लाख योनियोंमें; तथा--उसी प्रकार; आत्म-योगैः--आध्यात्मिक विधियों से; अध्यात्म-वित्‌--आत्मा तथा पदार्थ के अन्तर को समझने मेंपटु; ब्रह्म गगतिम्‌-- आध्यात्मिक जीवन में सिद्धि; लभेत--प्राप्त कर सकता है|

एक दक्ष भूविज्ञानी समझ सकता है कि सोना कहाँ पर है और वह उसे स्वर्णखनिज में सेविविध विधियों द्वारा निकाल सकता है।

इसी प्रकार आध्यात्मिक रूप से अग्रसर व्यक्ति यहसमझ सकता है कि शरीर के भीतर किस तरह आध्यात्मिक कण विद्यमान रहते हैं और इसप्रकार आध्यात्मिक ज्ञान के अनुशीलन द्वारा वह सिद्धि प्राप्त कर सकता है।

फिर भी जिस प्रकारएक अनाड़ी यह नहीं समझ पाता कि सोना कहाँ पर है, उसी प्रकार जिस मूर्ख व्यक्ति नेआध्यात्मिक ज्ञान का अनुशीलन नहीं किया वह यह नहीं समझ सकता कि शरीर के भीतरआत्मा किस तरह विद्यमान रह सकता है।

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अष्टौ प्रकृतयः प्रोक्तासत्रय एव हि तद्गुणा: ।

विकाराः षोडशाचार्य: पुमानेक: समन्वयात्‌ ॥

२२॥

अष्टौ-- आठ; प्रकृतबः--भौतिक शक्तियाँ; प्रोक्ताः--कही गयी हैं; त्रय:--तीन; एव--निश्चय ही; हि--निश्चित; तत्‌-गुणा:--भौतिक शक्ति के गुण; विकारा:--रूपान्तर, दोष; षोडश--सोलह; आचार्य: --अधिकारियों द्वारा; पुमान्‌ू-- जीव; एक:--एक; समन्वयात्‌--समन्वय से |

भगवान्‌ की आठ भिन्न भौतिक शक्तियों, प्रकृति के तीन गुणों तथा सोलह विकारों ( ग्यारहइन्द्रियों तथा पाँच स्थूल तत्त्व यथा पृथ्वी तथा जल ) के अन्तर्गत एक ही आत्मा साक्षी के रूप मेंविद्यमान रहता है।

अतएव सारे महान्‌ आचार्यो ने यह निष्कर्ष निकाला है कि आत्मा इन्हींभौतिक तत्त्वों द्वारा बद्ध है।

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देहस्तु सर्वसड्जातो जगत्तस्थुरिति द्विधा ।

अन्रैव मृग्यः पुरुषो नेति नेतीत्यतत्त्यजन्‌ ॥

२३॥

देह:--शरीर; तु--लेकिन; सर्व-सक्लतः--चौबीसों तत्त्वों का मेल; जगत्‌--चलायमान दिखने वाला चर; तस्थु:ः--तथा एकस्थान पर खड़ा, अचर; इति--इस प्रकार; द्विधा--दो प्रकार; अत्र एब--इस पदार्थ में; मृग्य:--खोजा जाना चाहिए; पुरुष: -- जीव, आत्मा; न--नहीं; इति--इस प्रकार; न--नहीं; इति--इस प्रकार; इति--इस प्रकार; अतत्‌--जो आत्मा नहीं है;त्यजन्‌-त्यागते हुए

प्रत्येक जीवात्मा के दो प्रकार के शरीर होते हैं--पाँच स्थूल तत्त्वों से बना स्थूल शरीर तथातीन सूक्ष्म तत्त्वों से बना सूक्ष्म शरीर।

किन्तु इन्हीं शरीरों में आत्मा है।

मनुष्य को चाहिए कि वह'यह नहीं है, यह नहीं है' कहकर विश्लेषण द्वारा आत्मा का अनुसन्धान करे।

इस तरह उसेआत्मा को पदार्थ से पृथक्‌ कर लेना चाहिए।

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अन्वयव्यतिरिकेण विवेकेनोशतात्मना ।

स्वर्गस्थानसमाम्नायर्विमृशद्धिरसत्वरै: ॥

२४॥

अन्वय-प्रत्यक्षतः; व्यतिरिकेण--तथा अप्रत्यक्ष रूप से; विवेकेन--प्रौढ़ विवेकता; उशता--शुद्ध हुआ; आत्मना--मन से;स्वर्ग--सृष्टि; स्थान--पालन; समाम्नायै: --तथा विनाश द्वारा; विमृशद्धिः--गम्भीर विश्लेषण करने वालों के द्वारा; असतू-वरैः--अत्यन्त धीर।

धीर तथा दक्ष पुरुषों को चाहिए कि आत्मा का अनुसन्धान वैश्लेषिक अध्ययन के द्वाराशुद्ध हुए मनों से करें जो सृष्टि, पालन तथा संहार होने वाली सारी वस्तुओं से आत्मा के सम्बन्धतथा अन्तर के रूप में किया गया हो।

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बुद्धेर्जागरणं स्वप्न: सुषुप्तिरिति वृत्तयः ।

ता येनैवानुभूयन्ते सोध्यक्ष: पुरुष: पर: ॥

२५॥

बुद्धेः--बुद्धि का; जागरणम्‌--जागरण या स्थूल इन्द्रियों की सक्रिय अवस्था; स्वप्न: --स्वष्न ( स्थूल शरीर के बिना ही इन्द्रियोंकी सक्रियता ); सुषुप्तिः:--प्रगाढ़, निद्रा या सारे कार्यकलापों का बन्द होना ( यद्यपि जीव दर्शक होता है ); इति--इस प्रकार;वृत्तय:--विभिन्न कार्यकलाप; ता:--वे; येन--जिससे; एब--निस्सन्देह; अनुभूयन्ते-- अनुभव किये जाते हैं; सः--वह;अध्यक्ष:--साक्षी ( जो कार्यकलापों से भिन्न है ); पुरुष:-- भोक्ता; पर:--दिव्यसक्रियता की तीन अवस्थाओं ( वृत्तियों ) में बुद्धि की अनुभूति की जा सकती है--जाग्रत,स्वप्न तथा सुषुप्ति।

जो व्यक्ति इन तीनों का अनुभव करता है उसे ही मूल स्वामी या शासक,पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ माना जाना चाहिए।

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एभिस्त्रिवर्णै: पर्यस्तैर्बुद्धिभेदेः क्रियोद्धवै: ।

स्वरूपमात्मनो बुध्येद्गन्धैर्वायुमिवान्बयात्‌ ॥

२६॥

एमिः--इन; त्रि-वर्णै:--तीन गुणों के द्वारा निर्मित; पर्यस्तै:--पूर्णतया तिरस्कृत ( प्राण का स्पर्श न करने से ); बुद्धि--बुद्धिके; भेदेः --प्रकारों से; क्रिया-उद्धवैः:--विभिन्न कार्यकलापों से उत्पन्न; स्वरूपम्‌ू--स्वाभाविक स्थिति; आत्मन:--आत्मा की;बुध्येत्‌ू-- समझना चाहिए; गन्धैः --गन्ध से; वायुमू--वायु को; इब--ठीक उसी तरह; अन्वयात्‌--घनिष्ठ सम्बन्ध से।

जिस प्रकार वायु की उपस्थिति उसके द्वारा ले जाई जाने वाली सुगन्धियों के द्वारा जानीजाती है उसी तरह भगवान्‌ के निर्देशन में मनुष्य बुद्धि के इन तीन विभागों द्वारा जीवात्मा कोसमझ सकता है।

किन्तु ये तीन विभाग आत्मा नहीं हैं, वे तीन गुणों से बने होते हैं और क्रियाओंसे उत्पन्न होते हैं।

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एतद्दवारो हि संसारो गुणकर्मनिबन्धन: ।

अज्ञानमूलोपार्थो उपि पुंसः स्वप्न इवार्प्पते ॥

२७॥

एतत्‌--यह; द्वारः--जिसका द्वार; हि--निस्सन्देह; संसार: -- भौतिक जगत जिसमें मनुष्य तीन प्रकार के कष्ट पाता है; गुण-कर्म-निबन्धन:--प्रकृति के तीन गुणों द्वारा बन्दी बनना; अज्ञान-मूलः--जिसकी जड़ अज्ञान है; अपार्थ:--निरर्थक; अपि--यद्यपि; पुंसः--जीव का; स्वप्न:--स्वण; इब--सहश; अर्प्यते--रखा जाता है।

दूषित बुद्धि के कारण मनुष्य को प्रकृति के गुणों के अधीन रहना पड़ता है और इस प्रकारवह भवबन्धन में पड़ जाता है।

इस संसार को, जिसका कारण अज्ञान है, उसी प्रकार अवांछिततथा नश्वर मानना चाहिए जिस प्रकार स्वप्नावस्था में मनुष्य को झूठे ही कष्ट भोगना पड़ता है।

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तस्माद्धवद्धि: कर्तव्यं कर्मणां त्रिगुणात्मनाम्‌ ।

बीजनिहरणं योग: प्रवाहोपरमो धियः ॥

२८ ॥

तस्मात्‌ू--अतएव; भवद्धि:--तुम लोगों द्वारा; कर्तव्यमू--करणीय; कर्मणाम्‌--सारे भौतिक कार्यकलापों का; त्रि-गुण-आत्मनाम्‌-प्रकृति के तीन गुणों द्वारा; बीज-निहरणम्‌--बीज का जलना; योग:--पर मे श्वर से जुड़ने की विधि; प्रवाह--जाग्रत, स्वप्न तथा सुषुप्ति के रूप में निरन्तर धारा की; उपरम:--समाप्ति; धियः--बुद्धि का |

अतएव हे मित्रो, हे असुर पुत्रो, तुम्हारा कर्तव्य है कि कृष्णभावनामृत को ग्रहण करो जोप्रकृति के गुणों द्वारा कृत्रिम रूप से उत्पन्न सकाम कर्मों के बीज को जला सकता है और जाग्रत,स्वप्न तथा सुषुप्त अवस्था में बुद्धि के प्रवाह को रोक सकता है।

दूसरे शब्दों में, कृष्णभावनामृतग्रहण करने पर मनुष्य का अज्ञान तुरन्त विनष्ट हो जाता है।

"

तत्रोपायसहस्त्राणामयं भगवतोदितः ।

यदीश्वरे भगवति यथा यैरज्जसा रति: ॥

२९॥

तत्र--उस सम्बन्ध में ( भवबन्धन से छूटने में )) उपाय--विधियों में; सहस्त्राणामू--हजारों; अयम्‌--यह; भगवता उदित: --भगवान्‌ द्वारा प्रदत्त; यत्‌ू--जो; ईश्वेर--ई श्वर में; भगवति-- भगवान्‌ में; यथा--जिस प्रकार; यैः--जिसके द्वारा; अज्ञसा--तेजीसे; रतिः--प्रेम तथा स्नेह से आसक्ति।

भौतिक जीवन से छूटने के लिए जितनी विधियाँ संस्तुत हैं उनमें से उस एक को जिसे स्वयंभगवान्‌ ने बताया है और स्वीकार किया है, सभी तरह से पूर्ण समझना चाहिए।

वह विधि हैकर्तव्य का सम्पन्न किया जाना जिससे परमेश्वर के प्रति प्रेम विकसित होता है।

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गुरुशुश्रूषया भक्त्या सर्वलब्धार्पणेन च ।

सड्डेन साधुभक्तानामी श्वराराधनेन च ॥

३०॥

श्रद्धया तत्कथायां च कीर्तनैर्गुणकर्मणाम्‌ ।

तत्पादाम्बुरुहध्यानात्तल्लिड्रेक्षाईणादिभि: ॥

३१॥

गुरु-शुश्रूषया-- प्रामाणिक गुरु की सेवा द्वारा; भक्त्या-- श्रद्धा तथा भक्ति से; सर्व--समस्त; लब्ध-- भौतिक लाभों के;अर्पणेन--अर्पण से ( गुरु को या गुरु के माध्यम से कृष्ण को ); च--तथा; सड़ेन--संगति से; साधु-भक्तानामू-- भक्तों तथासाधु पुरुषों की; ईश्वर-- भगवान्‌ की; आराधनेन-- पूजा से; च--तथा; श्रद्धबा--अत्यन्त श्रद्धापूर्वक; तत्‌-क थायाम्‌--भगवान्‌ की कथाओं में; च--तथा; कीर्तनै:--यशोगान द्वारा; गुण-कर्मणाम्‌-- भगवान्‌ के दिव्य गुणों तथा कर्मों का; तत्‌--उसके; पाद-अम्बुरुह--चरणकमलों पर; ध्यानात्‌ू-ध्यान से; तत्‌--उसका; लिड्ड--स्वरूप ( अर्चाविग्रह ); ईक्ष--दर्शन;अ्हण-आदिभि: --तथा पूजा द्वारा

मनुष्य को प्रामाणिक गुरु स्वीकार करना चाहिए और अत्यन्त भक्ति तथा श्रद्धा से उसकीसेवा करनी चाहिए।

उसके पास जो कुछ भी हो उसे गुरु को अर्पित करना चाहिए और सन्तपुरुषों तथा भक्तों की संगति में भगवान्‌ की पूजा करनी चाहिए, श्रद्धापूर्वक भगवान्‌ के यशका श्रवण करना चाहिए, भगवान्‌ के दिव्य गुणों तथा कार्यकलापों का यशोगान करना चाहिए,सदैव भगवान्‌ के चरणकमलों का ध्यान करना चाहिए तथा शास्त्र एवं गुरु के आदेशानुसारभगवान्‌ के अर्चाविग्रह की पूजा करनी चाहिए।

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हरिः सर्वेषु भूतेषु भगवानास्त ईश्वर: ।

इति भूतानि मनसा कामैस्तै: साधु मानयेत्‌ ॥

३२॥

हरिः--भगवान; सर्वेषु--समस्त; भूतेषु--जीवों में; भगवान्‌ू--परम पुरुष; आस्ते--स्थित है; ईश्वर:--सर्व श्रेष्ठ नियन्ता; इति--इस प्रकार; भूतानि--सारे जीव; मनसा--ऐसी समझ से; कामैः--इच्छाओं से; तैः--उन; साधु मानयेत्‌--मनुष्य को चाहिए किअत्यधिक आदर करे।

मनुष्य को चाहिए कि भगवान्‌ को उनके अन्तर्यामी प्रतिनिधि स्वरूप में परमात्मा को सदैवस्मरण करे, जो प्रत्येक जीव के अंतःकरण में स्थित हैं।

इस प्रकार उसे जीव की स्थिति यास्वरूप के अनुसार प्रत्येक जीव का आदर करना चाहिए।

"

एवं निर्जितषड्वर्गैं: क्रियते भक्तिरीश्वरे ।

वबासुदेवे भगवति यया संलभ्यते रति: ॥

३३॥

एवम्‌--इस प्रकार; निर्जित--दमन किया गया; षट्-वर्गैं: --इन्द्रियों के छह लक्षणों ( काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मत्सर )से; क्रियते--की जाती है; भक्तिः--भक्ति; ईश्वरे--परम नियन्ता में; वासुदेवे-- भगवान्‌ वासुदेव में; भगवति-- भगवान्‌;यया--जिससे; संलभ्यते-- प्राप्त की जाती है; रतिः--आसक्ति |

इन ( उपर्युक्त ) कार्यकलापों द्वारा मनुष्य शत्रुओं--काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, ईर्ष्या --के प्रभाव को दमन करने में समर्थ होता है और ऐसा कर लेने पर वह भगवान्‌ की सेवा करसकता है।

इस प्रकार वह भगवान्‌ की प्रेमाभक्ति को निश्चित रूप से प्राप्त कर लेता है।

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निशम्य कर्माणि गुणानतुल्यान्‌वीर्याणि लीलातनुभिः कृतानि ।

यदातिहर्षोत्पुलका श्रुगद्गदंप्रोत्कण्ठ उद्‌गायति रौति नृत्यति ॥

३४॥

निशम्य--सुनकर; कर्माणि--दिव्य कार्यकलापों को; गुणान्‌ू--आध्यात्मिक गुणों का; अतुल्यान्‌--असामान्य ( जो सामान्यपुरुष में नहीं दिखते ); वीर्याणि--अत्यन्त शक्तिमान; लीला-तनुभि: --अनेक लीला स्वरूपों के द्वारा; कृतानि--किये गये;यदा--जब; अतिहर्ष--अत्यन्त प्रसन्नता के कारण; उत्पुलक--रोमांच; अश्रु--आँखों में आँसू; गदगदम्‌--अवरुद्ध कण्ठ;प्रोत्कण्ठ:--खुले स्वर से; उद्गायति--उच्च स्वर से कीर्तन करता है; रौति--रोता है; नृत्यति--नाचता है

जो भक्ति के पद पर आसीन हो जाता है, वह निश्चय ही इन्द्रियों का नियंत्रक है और इसतरह वह एक मुक्त पुरुष हो जाता है।

जब ऐसा मुक्त पुरुष या शुद्ध भक्त विभिन्न लीलाएँ करनेके लिए भगवान्‌ के अवतारों के दिव्य गुणों तथा कार्यकलापों के विषय में सुनता है, तो उसकेशरीर में रोमांच हो आता है, उसकी आँखों से आँसू झरने लगते हैं और आध्यात्मिक अनुभूति केकारण उसकी वाणी अवरुद्ध हो जाती है।

कभी वह नाचता है, तो कभी जोर-जोर से गाता हैऔर कभी रोने लगता है।

इस प्रकार वह अपने दिव्य हर्ष को व्यक्त करता है।

"

यदा ग्रहग्रस्त इव क्वचिद्धस-त्याक्रन्दते ध्यायति बन्दते जनम्‌ ।

मुहुः श्वसन्वक्ति हरे जगत्पतेनारायणेत्यात्ममतिर्गतत्रप: ॥

३५॥

यदा--जब; ग्रह-ग्रस्त:--प्रेत द्वारा सताया गया; इब--सहश; क्वचित्‌--क भी; हसति--हँसता है; आक्रन्दते--जोर सेचिल्लाता है ( भगवान्‌ के दिव्य गुणों का स्मरण करके ); ध्यायति--ध्यान करता है; वन्दते--नमस्कार करता है; जनम्‌ू--सारेजीवों को ( उन्हें भगवान्‌ की सेवा में प्रवृत्त सोचकर ); मुहुः--निरन्तर; श्रसन्‌--तेजी से साँस लेते; वक्ति--बोलता है; हरे--हेप्रभु; जगत्‌-पते--हे सम्पूर्ण संसार के स्वामी; नारायण--हे नारायण; इति--इस प्रकार; आत्म-मति:-- भगवान्‌ के विचारों मेंपूर्णतया मग्न; गत-त्रप:--लज्जारहित |

जब भक्त प्रेतग्रस्त व्यक्ति के समान बन जाता है, तो वह हँसता है और उच्च स्वर से भगवान्‌के गुणों के विषय में कीर्तन करता है।

कभी वह ध्यान करने बैठता है और कभी प्रत्येक जीवको भगवान्‌ का भक्त मानते हुए प्रणाम करता है।

लगातार तेज साँस लेता हुआ वह सामाजिकशिष्टाचार के प्रति बेपरवाह हो जाता है और पागल व्यक्ति की तरह जोर-जोर से ' हरे कृष्ण, हरेकृष्ण, हे भगवान्‌, हे ब्रह्माण्ड के स्वामी, ' का उच्चारण करता है।

"

तदा पुमान्मुक्तसमस्तबन्धन-स्तद्भावभावानुकृताशयाकृतिः ।

निर्दग्धबीजानुशयो महीयसाभक्तिप्रयोगेण समेत्यधोक्षजम्‌ ॥

३६॥

तदा--उस समय; पुमान्‌ू--जीव; मुक्त--मुक्त; समस्त-बन्धन:--भक्ति पथ के समस्त अवरोधों से; तत्‌ू-भाव-- भगवान्‌ केकार्यकलापों की स्थिति के; भाव--चिन्तन से; अनुकृत--उसी प्रकार का बनाया हुआ; आशय-आकृति: --जिसका मन तथाशरीर; निर्दग्ध--पूर्णतया जला हुआ; बीज--बीज या जगत का मूल कारण; अनुशय: --इच्छा; महीयसा-- अत्यन्तशक्तिशाली; भक्ति--भक्ति का; प्रयोगेण--सम्प्रयोग से; समेति--प्राप्त करता है; अधोक्षजम्‌-- भगवान्‌ को, जो मन तथा ज्ञानकी पहुँच से परे हैं।

तब भक्त सारे भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाता है, क्योंकि वह निरन्तर भगवान्‌ कीलीलाओं के विषय में सोचता रहता है और उसका मन तथा शरीर आध्यात्मिक गुणों में बदलचुके होते हैं।

उसकी उत्कट भक्ति के कारण उसका अज्ञान, भौतिक चेतना तथा समस्त प्रकारकी भौतिक इच्छाएँ जलकर पूर्णतया भस्म हो जाती हैं।

यही वह अवस्था है जब मनुष्य भगवान्‌के चरणकमलों की शरण प्राप्त कर सकता है।

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अधोक्षजालम्भमिहाशुभात्मन:शरीरिण: संसृतिचक्रशातनम्‌ ।

तद्गह्मनिर्वाणसुखं विदुर्बुधा-स्ततो भजध्व॑ हृदये हृदीश्वरम्‌ ॥

३७॥

अधोक्षज-- भगवान्‌ से, जो भौतिकतावादी मन या प्रायोगिक ज्ञान की पहुँच से परे हैं; आलम्भम्‌--निरन्तर सम्पर्क में रहते हुए;इह--इस भौतिक जगत में; अशुभ-आत्मन: --जिसका मन भौतिकता से कलुषित है; शरीरिण:--देहधारी जीव का; संसृति--संसार का; चक्र--चक्कर; शातनमू-- पूर्णतया रोकते हुए; तत्‌--वह; ब्रह्म-निर्वाण--परब्रह्म या परम सत्य से जुड़ा हुआ;सुखम्‌--दिव्य सुख; विदुः--समझो; बुधा:--आध्यात्मिक दृष्टि से आगे बढ़े हुए; ततः--इसलिए; भजध्वम्‌-भक्ति में लगजाओ; हृदये--हृदय के भीतर; हत्‌-ईश्वरमू--हृदय के भीतर परमात्मा को।

जीवन की असली समस्या जन्म-मृत्यु का चक्कर है, जो पहिये ( चक्र ) की भाँति बारम्बारऊपर-नीचे चलता रहता है।

किन्तु जब कोई भगवान्‌ के सम्पर्क में रहता है, तो यह चक्र पूरीतरह रुक जाता है।

दूसरे शब्दों में, भक्ति में निरन्तर मग्न रहने से जो दिव्य आनन्द मिलता हैउससे वह इस संसार से पूर्णतया मुक्त हो जाता है।

सारे विद्वान व्यक्ति इसे जानते हैं।

अतएवं हेमित्रो, हे असुरपुत्रो, तुम सभी लोग तुरन्त अपने-अपने हृदय में स्थित परमात्मा का ध्यान औरपूजन प्रारम्भ कर दो।

"

कोतिप्रयासोसुरबालका हरे-रुपासने स्वे हृदि छिद्गवत्सतः ।

स्वस्यात्मन: सख्युरशेषदेहिनांसामान्यतः कि विषयोपपादने: ॥

३८॥

कः--क्या; अति-प्रयास:--कठिन प्रयास; असुर-बालका:ः--हे असुरपुत्रो; हरेः-- भगवान्‌ की; उपासने--भक्ति करने में;स्वे--अपने; हृदि--हृदय में; छिद्र-वत्‌--अवकाश की तरह; सतः--सदैव विद्यमान; स्वस्य--अपना या जीव का; आत्मन:--परमात्मा का; सख्यु:--शुभचिन्तक मित्र; अशेष-- असीम; देहिनाम्‌--देहधारी जीवों का; सामान्यत:--सामान्य रूप से;किम्‌--क्या आवश्यकता है; विषय-उपपादनै:--इन्द्रियभोग के लिए इन्द्रिय प्रदान करने वाली क्रियाओं से |

हे मित्रो, हे असुरपुत्रो, परमात्मा रूप में भगवान्‌ सदैव समस्त जीवों के अंतःकरण मेंविद्यमान रहते हैं।

निस्सन्देह, वे सारे जीवों के शुभचिन्तक तथा मित्र हैं और भगवान्‌ की पूजाकरने में कोई कठिनाई भी नहीं है।

तो फिर, लोग उनकी भक्ति क्‍यों नहीं करते ?

वे इन्द्रियतृष्तिके लिए कृत्रिम साज-सामान बनाने में व्यर्थ ही क्‍यों लिप्त रहते हैं ?

" राय: कलत्र॑ पशव: सुतादयोगृहा मही कुझ्ऋरकोशभूतय: ।

सर्वे<र्थकामाः क्षणभड्डुरायुषःकुर्वन्ति मर्त्यस्य कियत्प्रियं चला: ॥

३९॥

राय:--सम्पत्ति; कलत्रम्‌ू--अपनी पत्नी तथा सखियाँ; पशव: --गाय, घोड़े, गधे, बिल्ली, कुत्ते जैसे घरेलू पशु; सुत-आदय: --पुत्र इत्यादि; गृहा:--बड़े-बड़े महल तथा आवास; मही -- भूमि; कुझ्अज--हा थी; कोश-- खजाना; भूतय: --तथा इन्द्रियतृप्तिएवं भोगविलास की अन्य सामग्रियाँ; सर्वे--सभी; अर्थ--आर्थिक विकास; कामाः--तथा इन्द्रियतृप्ति; क्षण-भट्ठुर-- क्षण भरमें विनाश-शील; आयुष: --आयु वाले का; कुर्वन्ति--करते हैं या लाते हैं; मर्त्यस्थ--मरने वाले का; कियत्‌--कितना;प्रियमू-- आनन्द; चला:--क्षणिक या चलायमान।

मनुष्य का धन, सुन्दर स्त्री तथा सखियाँ, उसके पुत्र तथा पुत्रियाँ, उसका घर, उसके घरेलूपशु जैसे गाएँ, हाथी तथा घोड़े, उसका खजाना, आर्थिक विकास तथा इन्द्रियतृप्ति, यहाँ तककि उसकी आयु जिसमें वह इन भौतिक ऐश्वर्यों का भोग कर सकता है निश्चित रूप से क्षणभंगुरएवं नश्वर हैं।

चूँकि मनुष्य जीवन का अवसर अस्थायी है अतएव ये सारे भौतिक ऐश्वर्य ऐसेसमझदार व्यक्ति को कौन सा लाभ पहुँचा सकते हैं जिसने अपने आपको शाश्वत समझ रखा है ?

" एवं हि लोकाः क्रतुभिः कृता अमीक्षयिष्णव: सातिशया न निर्मला: ।

तस्माददृष्टश्रुतदूषणं परंभक्त्योक्तयेशं भजतात्मलब्धये ॥

४०॥

एवम्‌--इसी प्रकार ( जिस तरह सांसारिक सम्पत्ति तथा कुट॒म्बी नश्वर हैं ); हि--निश्चय ही; लोकाः--उच्चतरलोक, यथा स्वर्ग,चन्द्रमा, सूर्य तथा ब्रह्मलोक; क्रतुभि:--बड़े-बड़े यज्ञों को सम्पन्न करने से; कृता:--प्राप्त किया; अमी--ये सब; क्षयिष्णव:--अस्थायी, नश्वर; सातिशया:--यद्यपि अधिक आरामदेह तथा भाने वाले; न--नहीं; निर्मला:--शुद्ध ( उत्पातों से रहित );तस्मातू--इसलिए; अदृष्ट-श्रुत--न तो देखा हुआ, न सुना गया; दूषणम्‌--जिसकी त्रुटि; परम्‌--परम; भक्त्या--अत्यन्तभक्तिपूर्वक; उक्तया--जिस तरह वैदिक साहित्य में वर्णित है ( ज्ञान कर्म मिश्रित नहीं ); ईशम्‌-- भगवान्‌ को; भजत--पूजाकरो; आत्म-लब्धये--आत्म-साक्षात्कार के लिए।

वैदिक साहित्य से पता चलता है कि बड़े-बड़े यज्ञ सम्पन्न करके मनुष्य स्वर्गाद लोक तकऊपर उठ सकता है।

किन्तु स्वर्गलोक का जीवन पृथ्वी के जीवन की अपेक्षा सैकड़ों -हजारों गुनाअधिक सुखकर होने पर भी स्वर्गलोक न तो शुद्ध ( निर्मल ) हैं, न भौतिक जगत के दोष सेरहित हैं।

सारे स्वर्गलोक भी नश्वर हैं, अतएवं ये जीवन के लक्ष्य नहीं हैं।

किन्तु यह न तो कभीदेखा गया, न ही सुना गया कि भगवान्‌ में उनन्‍्माद होता है।

फलस्वरूप तुम्हें अपने निजी लाभ तथा आत्म-साक्षात्कार के लिए शास्क्रोक्त विधि से अत्यन्त भक्ति के साथ भगवान्‌ की पूजाकरनी चाहिए।

"

यदर्थ इह कर्माणि विद्वन्मान्यसकृन्नर: ।

करोत्यतो विपर्यासममोघं विन्दते फलम्‌ ॥

४१॥

यत्‌--जिसके; अर्थे--लिए; इह--इस भौतिक जगत में; कर्माणि--अनेक कार्य ( फैक्टरियों, उद्योगों, चिन्तन आदि में );विद्वत्‌ू--ज्ञान में बढ़ा-चढ़ा; मानी--मानने वाला; असकृत्‌--पुनः पुनः; नरः--पुरुष; करोति--करता है; अत:--इससे;विपर्यासम्‌--विपरीत; अमोघम्‌-- श्वुव; विन्दते--प्राप्त करता है; फलम्‌--फल।

भौतिकतावादी मनुष्य अपने को अत्यन्त बुद्धिमान समझ कर निरन्तर आर्थिक विकास केलिए कर्म करता रहता है।

किन्तु जैसाकि वेदों में बताया गया है, वह या तो इसी जीवन में याअगले जीवन में भौतिक कर्मों द्वारा बार-बार निराश होता रहता है।

निस्सन्देह, उसे अपनीइच्छाओं से सर्वथा विपरीत फल मिलते हैं।

"

सुखाय दुःखमोक्षाय सड्जूल्प इह कर्मिण: ।

सदाप्नोतीहया दुःखमनीहाया: सुखावृतः ॥

४२॥

सुखाय--जीवन के तथाकथित उच्चतर स्तर के द्वारा सुख प्राप्त करने के लिए; दुःख-मोक्षाय--दुख से छुटकारा पाने के लिए;सड्डूल्प:--संकल्प; इह--इस संसार में; कर्मिण:-- आर्थिक विकास के लिए प्रयलशील जीव का; सदा--सदैव; आप्नोति--प्राप्त करता है; ईहया--कर्म या महत्त्वाकांक्षा द्वारा; दुःखम्‌--केवल दुख; अनीहाया:--आर्थिक विकास न चाहते हुए; सुख--सुख से; आवृत:--ढका हुआ।

इस भौतिक जगत में प्रत्येक भौतिकतावादी सुख का इच्छुक रहता है और अपने दुख कमकरना चाहता है, अतएवं वह तदनुसार कर्म करता है।

किन्तु वास्तव में कोई तभी तक सुखीरहता है जब तक वह सुख के लिए प्रयत्नशील नहीं होता।

ज्योंही वह सुख के लिए कार्य प्रारम्भकर देता है त्योंही उसकी दुख की अवस्था प्रारम्भ होती है।

"

कामान्कामयते काम्यैर्यदर्थमिह पूरूष: ।

स वै देहस्तु पारक्‍्यो भड्ुरो यात्युपैति च ॥

४३॥

कामान्‌--इन्द्रिय तृप्ति की वस्तुओं को; कामयते--इच्छा करता है; काम्यैः--विभिन्न अभिलिषित कार्यो द्वारा; यत्‌--जिस;अर्थमू--के लिए; इह--इस भौतिक जगत में; पूरुष:--जीवात्मा; सः--वह; वै--निस्सन्देह; देह:--शरीर; तु-- लेकिन;पारक्य:--अन्यों का ( कुत्ता, चील्हों इत्यादि का ) ; भद्ठुरः--नश्वर; याति--चला जाता है; उपैति--आत्मा का आलिंगन करताहै; च--तथा।

जीवात्मा अपने शरीर के लिए सुख चाहता है और इस उद्देश्य से वह अनेक योजनाएँ बनाताहै, किन्तु वास्तविकता तो यह है कि यह शरीर तो दूसरों की सम्पत्ति होता है।

निस्सन्देह, नश्वरशरीर जीवात्मा को गले लगाता है और फिर उसे छोड़कर चल देता है।

"

किमु व्यवहितापत्यदारागारधनादय:ः ।

राज्यकोशगजामात्यभृत्याप्ता ममतास्पदा: ॥

४४॥

किम्‌ उ--क्या कहा जाये; व्यवहित--पृथक्‌ किया गया; अपत्य--सन्तानें; दार--पत्लियाँ; अगार--निवासस्थान; धन--सम्पत्ति; आदय:--इत्यादि; राज्य--राज्य; कोश--खजाना; गज--बड़े बड़े हाथी तथा घोड़े; अमात्य--मंत्री; भृत्य--नौकर-चाकर; आप्ता: --सम्बन्धी; ममता-आस्पदा: --घनिष्ठ सम्बन्धियों के झूठे स्थान या घर ( अपने लोग )॥

चूँकि शरीर को अन्ततः मल या मिट्टी में बदल जाना है अतएव इस शरीर से सम्बन्धितसाज-सामान--यथा पत्नियाँ, घर, धन, बच्चे, सम्बन्धी, नौकर-चाकर, मित्र, राज्य, खजाने,पुश तथा मंत्रियों--से क्‍या प्रयोजन ?

ये सभी नश्वर हैं।

इनके विषय में और अधिक क्या कहाजा सकता है?

" किमेतैरात्मनस्तुच्छै: सह देहेन नश्वरै: ।

अनर्धरथ्सड्डाशैर्नित्यानन्दरसोदधे; ॥

४५॥

किमू--क्या लाभ; एतै:--इन सबों से; आत्मन:--अपने को; तुच्छै: --जो प्रायः नगण्य हैं; सह--साथ; देहेन--शरीर के;नश्वरैः--नाशवान; अनर्थै: --अनिच्छित; अर्थ-सड्डाशै:--ऐसा प्रतीत होता है मानो आवश्यक हों; नित्य-आनन्द--नित्य सुखके; रस--अमृत के; उदधे:--समुद्र के लिए

ये सारे साज-सामान तभी तक अत्यन्त प्रिय लगते हैं जब तक यह शरीर है किन्तु ज्योंही यहशरीर नष्ट हो जाता है त्योंही शरीर से सम्बद्ध ये सारी वस्तुएँ भी समाप्त हो जाती हैं।

अतएववास्तव में किसी को इनसे कुछ लेना-देना नहीं रहता है किन्तु वह अज्ञानवश ही इन्हें मूल्यवानसमझ बैठता है।

शाश्वत सुख के सागर की तुलना में ये सारी वस्तुएँ अत्यन्त नगण्य हैं।

शाश्वतजीव के लिए ऐसे नगण्य सम्बन्धों से क्या लाभ है ?

" निरूप्यतामिह स्वार्थ: कियान्देहभूतोसुरा: ।

निषेकादिष्ववस्थासु क्लिश्यमानस्य कर्मभि: ॥

४६॥

निरूप्यताम्‌--निश्चित हो जाने दें; इह--इस संसार में; स्व-अर्थ:--निजी लाभ; कियान्‌--कितना; देह-भूतः--शरीरधारी जीवका; असुरा:--हे असुरपुत्रो; निषिक-आदिषु--मैथुन आदि से प्राप्त होने वाले सुख इत्यादि; अवस्थासु--नश्वर दशाओं में;क्लिश्यमानस्य--घोर कठिनाइयों को भोगने वाले का; कर्मभि:--पूर्वकर्मो के द्वारा ।

हे मित्रो, हे असुरपुत्रो, जीव को अपने पूर्वकर्मों के अनुसार नाना प्रकार के शरीर प्राप्त होतेहैं।

इस तरह वह अपने विशिष्ट जीवन की सभी स्थितियों में--गर्भ में प्रवेश करने से लेकर अपनेइस विशेष शरीर तक--कष्ट ही कष्ट भोगता प्रतीत होता है।

अतएव तुम लोग पूरी तरह विचारकरके मुझे बतलाओ कि जीव का ऐसे सकाम कर्मों में वास्तविक स्वार्थ क्या है, जबकि ये दुखतथा कष्ट प्रदान करने वाले हैं ?

" कर्माण्यारभते देही देहेनात्मानुवर्तिना ।

कर्मभिस्तनुते देहमुभयं त्वविवेकतः ॥

४७॥

कर्माणि--सकाम कर्म; आरभते--प्रारम्भ करता है; देही--देहधारी जीव; देहेन--उस शरीर से; आत्म-अनुवर्तिना--अपनीइच्छा तथा पूर्वकर्मों के अनुसार प्राप्त होने वाला; कर्मभि: --ऐसे कर्मों के द्वारा; तनुते--विस्तीर्ण करता है; देहम्‌--दूसरा शरीर;उभयम्‌--दोनों; तु--निस्सन्देह; अविवेकतः--अज्ञान के कारण

वह जीव, जिसे यह वर्तमान शरीर अपने विगत कर्म के कारण प्राप्त हुआ है, अपने इसजीवन में ही अपने कर्म के फलों को समाप्त कर सकता है, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं होता किवह शरीर के बन्धन से मुक्त हो गया है।

जीव को एक प्रकार का शरीर मिलता है और वह इसशरीर से कर्म करके दूसरे शरीर को जन्म देता है।

इस प्रकार वह अपने अज्ञान के कारण जन्म-मरण के चक्र द्वारा एक शरीर से दूसरे में देहान्तर करता रहता है।

"

तस्मादर्थाश्व॒ कामाश्च धर्माश्न यदपाश्रया: ।

भजतानीहयात्मानमनीहं हरिमी श्वरम्‌ ॥

४८ ॥

तस्मातू--इसलिए; अर्था:--आर्थिक विकास के लिए आकांक्षाएँ; च--तथा; कामा:--इन्द्रिय तृप्ति के लिए आकाशक्षाएँ; च--भी; धर्मा:--धर्म के कर्तव्य; च--तथा; यत्‌--जिस पर; अपा श्रया:-- आश्रित; भजत--पूजा करो; अनीहया--उनके लिएकिसी प्रकार की इच्छा से रहित; आत्मानम्‌-परमात्मा को; अनीहम्‌--विरस; हरिम्‌-- भगवान्‌ को; ईश्वरम्‌-ई धर कोआध्यात्मिक जीवन के चार सिद्धान्त--धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष-- भगवान्‌ की रुचि परआश्रित हैं।

अतएव हे मित्रो, भक्तों के चरणचिन्हों का अनुगमन करो।

बिना किसी प्रकार कीइच्छा किये ( निष्काम भाव से ) परमेश्वर पर आश्रित रहकर भक्तिपूर्वक परमात्मा की पूजा करो।

"

सर्वेषामपि भूतानां हरिरात्मे श्वर: प्रिय: ।

भूतर्महद्धिः स्वकृतैः कृतानां जीवसंज्ञित: ॥

४९॥

सर्वेषाम्‌--समस्त; अपि--निश्चय ही; भूतानाम्‌--जीवों में से; हरिः-- भगवान्‌ जो जीव के कष्टों को शमन करने वाले हैं;आत्मा--जीवन का आदि स्त्रोत; ईश्वर:-- पूर्ण नियन्ता; प्रियः--प्रिय; भूतेः--पाँच भौतिक तत्त्वों द्वारा; महद्धिः--समग्र भौतिकशक्ति महत्‌ तत्त्व से उदभूत; स्व-कृतैः--जो स्वतः प्रकट होते हैं; कृतानाम्‌ू--उत्पन्न; जीव-संज्ञित:--जीव के नाम से ज्ञात,क्योंकि सारे जीव भगवान्‌ की तटस्था शक्ति के अंश हैं।

भगवान्‌ हरि समस्त जीवों के आत्मा तथा परमात्मा हैं।

प्रत्येक जीव जीवित आत्मा तथाभौतिक शरीर के रूप में उनकी शक्ति का प्राकट्य है।

अतएवं भगवान्‌ अत्यन्त प्रिय हैं और परमनियन्ता हैं।

"

देवोउसुरो मनुष्यो वा यक्षो गन्धर्व एव वा ।

भजन्मुकुन्दचरणं स्वस्तिमान्स्याद्यथा वयम्‌ ॥

५०॥

देवः--देवता; असुर:--असुर; मनुष्य: --मनुष्य; वा--अथवा; यक्ष:--यक्ष ( आसुरी योनि का सदस्य ); गन्धर्व:--गन्धर्व;एव--निस्सन्देह; वा--अथवा; भजनू--सेवा करते हुए; मुकुन्द-चरणम्‌--मुक्तिदाता मुकुन्द या भगवान्‌ कृष्ण के चरणकमलोंपर; स्वस्ति-मानू--समस्त कल्याण से ओत-प्रोत; स्थात्‌ू--हो जाता है; यथा--जिस प्रकार; वयम्‌--हम ( प्रह्माद महाराज )

यदि देवता, असुर, मनुष्य, यक्ष, गन्धर्व या अन्य कोई इस संसार के भीतर मुक्तिदाता मुकुन्दके चरणकमलों की सेवा करता है, तो वह हमारे ( प्रह्माद महाराज जैसे महाजनों के ) ही समानजीवन की सर्वश्रेष्ठ कल्याणकारी स्थितियों कल्याण का भाजन होता है।

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नालं द्विजत्वं देवत्वमृषित्वं वासुरात्मजा: ।

प्रीणनाय मुकुन्दस्य न वृत्तं न बहुज्ञता ॥

५१॥

न दानं न तपो नेज्या न शौचं न ब्रतानिच ।

प्रीयतेडमलया भक्‍त्या हरिरन्यद्विडम्बनम्‌ ॥

५२॥

न--नहीं; अलमू--पर्या प्त; ट्विजत्वम्‌--अत्यन्त पूर्ण एवं योग्य ब्राह्मण होना; देवत्वम्‌-देवत्व; ऋषित्वम्‌--साधु पुरुष होना;बा--अथवा; असुर-आत्म-जा:--हे असुरों के वंशजो; प्रीणनाय--प्रसन्न करने के लिए; मुकुन्दस्य-- भगवान्‌ मुकुन्द का; न वृत्तमू--बुरा आचरण; न--नहीं; बहु-ज्ञता--पाण्डित्य; न--न तो; दानमू--दान; न--न तो; तपः--तपस्या; न--न तो;इज्या--पूजा; न--न तो; शौचम्‌--स्वच्छता; न ब्रतानि--न ब्रतों का पालन; च--भी; प्रीयते--प्रसन्न किया जाता है;अमलया--निष्कलंक; भक्त्या--भक्ति द्वारा; हरिः--भगवान्‌; अन्यत्‌--अन्य वस्तुएँ; विडम्बनम्‌--मात्र दिखावा।

हे मित्रो, हे असुरपुत्रो, तुम लोग न तो पूर्ण ब्राह्मण, देवता या महान्‌ सन्‍त बनकर, न हीसदाचरण या प्रकाण्ड ज्ञान के द्वारा परमेश्वर को प्रसन्न कर सकते हो।

इनमें से किसी भी योग्यतासे भगवान्‌ प्रसन्न होने वाले नहीं हैं।

न ही दान, तपस्या, यज्ञ, शुद्धता या ब्रतों से उन्हें कोई प्रसन्नकर सकता है।

भगवान्‌ तो तभी प्रसन्न होते हैं जब मनुष्य उनकी अविचल अनन्य भक्ति करताहै।

एकनिष्ठ भक्ति के बिना सब कुछ दिखावा मात्र है।

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ततो हरौ भगवति भक्ति कुरुत दानवा: ।

आत्मौपम्थेन सर्वत्र सर्वभूतात्मनी श्वरे ॥

५३॥

ततः--अतएव; हरौ-- भगवान्‌ हरि के प्रति; भगवति-- भगवान्‌; भक्तिम्‌-- भक्ति; कुरुत--करो; दानवा: --मेरे मित्रों,असुर॒पुत्रों; आत्म-औपम्येन-- अपनी ही तरह; सर्वत्र--सभी जगह; सर्व-भूत-आत्मनि--जो समस्त जीवों में आत्मा तथापरमात्मा के रूप में स्थित है; ईश्वर--नियन्ता भगवान्‌ में

हे मित्र असुरपुत्रो, जिस प्रकार तुम सब अपने आपको देखते हो और अपनी देखभाल करतेहो उसी तरह समस्त जीवों में परमात्मा के रूप में सर्वत्र विद्यमान रहने वाले भगवान्‌ को प्रसन्नकरने के लिए उनकी भक्ति स्वीकार करो।

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दैतेया यक्षरक्षांसि स्त्रियः शूद्रा त्रजौकसः ।

खगा मृगाः पापजीवा: सन्ति ह्ाच्युततां गता;: ॥

५४॥

स्दैतेया:--हे असुरो; यक्ष-रक्षांसि--यक्ष तथा राक्षस कहलाने वाले; स्त्रियः--स्त्रियाँ; शूद्रा:-- श्रमिक वर्ग; ब्रज-ओकस:--ग्रामीण ग्वाले; खगा:--पक्षी; मृगा:--पशु; पाप-जीवा:--पापी जीव; सन्ति--हो सकते हैं; हि--निश्चय ही; अच्युतताम्‌--अच्युत भगवान्‌ के गुण को; गता:--प्राप्त |

हे मित्रो! हे असुरपुत्रो, प्रत्येक व्यक्ति जिसमें तुम भी शामिल हो, ( यक्ष तथा राक्षस ) अज्ञानीत्रियाँ, शूद्र, ग्वाले, पक्षी, निम्नतर पशु तथा पापी जीव अपना-अपना मूल शाश्रत आध्यात्मिकजीवन पुनः प्राप्त कर सकते हैं और भक्तियोग के सिद्धान्तों को स्वीकार करने मात्र से सदा-सदाइसी तरह बने रह सकते हैं।

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एतावानेव लोकेस्मिन्पुंसः स्वार्थ: पर: स्मृतः ।

एकान्तभक्तिगेंविन्दे यत्सर्वत्र तदीक्षणम्‌ ॥

५५॥

एतावान्‌--इतना; एव--निश्चय ही; लोके अस्मिन्‌ू--इस जगत में ; पुंसः--जीव का; स्व-अर्थ:--असली हित; पर:--दिव्य;स्मृत:--माना जाने वाला; एकान्त-भक्ति: --अनन्य भक्ति; गोविन्दे--गोविन्द के प्रति; यत्‌--जो; सर्वत्र--सभी तरह; ततू-ईक्षणम्‌--गोविन्द या कृष्ण के साथ सम्बन्ध को देखना।

इस भौतिक जगत में समस्त कारणों के कारण गोविन्द के चरणकमलों के प्रति सेवा करनाऔर सर्वत्र उनका दर्शन करना ही एकमात्र जीवन-लक्ष्य है।

जैसाकि समस्त शास्त्रों ने बतलायाहै मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य इतना ही है।

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