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अध्याय ग्यारह: उत्तम समाज: चार सामाजिक वर्ग
7.11श्रीशुक उवाचश्रुत्वेहितं साधु सभासभाजितंमहत्तमाग्रण्य उरुक्रमात्मन: ।
युथिष्ठिरो दैत्यपतेर्मुदान्वितःपप्रच्छ भूयस्तनयं स्वयम्भुव: ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; श्रुत्वा--सुनकर; ईहितमू--कथा, वृत्तान्त; साधु सभा-सभाजितम्--जो ब्रह्मातथा शिव जैसे भागवतों की सभा में चर्चित होता है; महत्-तम-अग्रण्य:--साधु पुरुषों में सर्वश्रेष्ठ ( युधिष्टिर ); उरुक्रम-आत्मन:--भगवान् में सदैव अपना मन लगाये रखने वाले ( प्रह्द महाराज ) का जो सदैव असाधारण विधि से कार्य करता है;युथिष्ठिर: --राजा युधिष्ट्िर ने; दैत्य-पतेः--असुरों के स्वामी का; मुदा-अन्वित:-- प्रसन्न मुद्रा में; पप्रच्छ--पूछा; भूय:--पुनः;तनयमू--पुत्र से; स्वयम्भुवः--ब्रह्माजी के |
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : प्रह्द महाराज, जिनके कार्यकलाप तथा चरित्र की पूजातथा चर्चा ब्रह्म तथा शिव जी जैसे महापुरुष करते हैं, उनके विषय में सुनने के बाद महापुरुषोंमें सर्वाधिक आदरणीय राजा युध्िष्ठटिर महाराज ने नारद मुनि से अत्यन्त प्रसन्न मुद्रा में पुनः पूछा।
"
श्रीयुधिष्ठिर उवाचभगवन्श्रोतुमिच्छामि नृणां धर्म सनातनम् ।
वर्णाश्रमाचारयुतं यत्पुमान्विन्दते परम् ॥
२॥
श्री-युथिष्टिर: उबाच--महाराज युधिष्ठिर ने पूछा; भगवन्--हे प्रभु; श्रोतुम्ू--सुनने के लिए; इच्छामि--मेरी इच्छा है; नृणाम्--मानव समाज के; धर्मम्--वृत्तिपरक कार्यो को; सनातनम्--सामान्य तथा ( प्रत्येक के लिए ) नित्य; वर्ण-आश्रम-आचार-युतम्ू--समाज तथा आध्यात्मिक प्रगति के चार विभागों के सिद्धान्तों पर आधारित; यत्--जिससे; पुमान्ू--सामान्य लोग;विन्दते--शान्तिपूर्वक भोग कर सकते हैं; परम्ू--परम ज्ञान ( जिससे भक्ति प्राप्त की जा सकती है )॥
महाराज युधिष्ठिर ने कहा : हे प्रभु, मैं आपसे धर्म के उन सिद्धान्तों के विषय में सुनने काइच्छुक हूँ जिनसे मनुष्य जीवन के चरम लक्ष्य भक्ति को प्राप्त कर सकता है।
मैं मानव समाज केसामान्य वृत्तिपरक कर्तव्यों तथा वर्णाश्रम धर्म के नाम से विख्यात सामाजिक तथा आध्यात्मिकउन्नति की प्रणाली के विषय में सुनना चाहता हूँ।
"
भवान्प्रजापते: साक्षादात्मज: परमेष्ठटिन: ।
सुतानां सम्मतो ब्रह्म॑स््तपोयोगसमाधिभि: ॥
३॥
भवान्--आप; प्रजापते:--प्रजापति ( ब्रह्मा ) के; साक्षात्-प्रत्यक्ष; आत्म-ज:--पुत्र; परमेष्ठटिन:--इस ब्रह्माण्ड के परम पुरुष( ब्रह्म ) को; सुतानाम्ू--सारे पुत्रों में से; सम्मतः--सर्व श्रेष्ठ माने हुए; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण श्रेष्ठ; तप:--तपस्या; योग--योगाभ्यास; समाधिभि:--तथा समाधि या चिन्तन द्वारा ( सभी तरह से आप उत्तम हैं )।
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, आप प्रजापति ( ब्रह्मा ) के साक्षात् पुत्र हैं।
आप अपनी तपस्या, योग तथासमाधि के कारण ब्रह्मा के समस्त पुत्रों में से सर्व श्रेष्ठ माने जाते हैं।
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नारायणपरा विप्रा धर्म गुह्ंं परं विदु: ।
करुणा: साधव: शान्तास्त्वद्विधा न तथापरे ॥
४॥
नारायण-परा:-- भगवान् के प्रति सदैव आज्ञाकारी रहने वाले; विप्रा:--ब्राह्मणों में श्रेष्ठ; धर्मम्--धार्मिक सिद्धान्त; गुहाम्--अत्यन्त गोपनीय; परमू-- परम; विदुः--जानते हैं; करुणा: --ऐसे व्यक्ति अत्यन्त दयालु होते हैं ( भक्त होने से ); साधव:--जिनका आचरण अत्यन्त श्रेष्ठ है; शान्ता:--शान्त; त्वत्ू-विधा:--आपके ही समान; न--नहीं; तथा--इस तरह; अपरे-- अन्य (भक्ति के अतिरिक्त अन्य विधियों के अनुयायी)
शान््त जीवन तथा दया में आपसे श्रेष्ठ कोई नहीं है और आपसे बढ़कर कोई यह नहीं जानताकि भक्ति किस तरह की जाये या ब्राह्मणों में सर्वश्रेष्ठ किस प्रकार बना जाये।
अतएवं आप गुहायधार्मिक जीवन के समस्त सिद्धान्तों के जानने वाले हैं और आपसे बढ़कर उन्हें अन्य कोई नहींजानता।
"
श्रीनारद उबाचनत्वा भगवतेजाय लोकानां धर्मसेतवे ।
वक्ष्ये सनातन धर्म नारायणमुखाच्छुतम् ॥
५॥
श्री-नारदः उवाच-- श्री नारद मुनि ने कहा; नत्वा--नमस्कार करके; भगवते-- भगवान् को; अजाय---अजन्मा, सदैव विद्यमान;लोकानाम्--सप्पूर्ण ब्रह्माण्ड भर के; धर्म-सेतवे-- धार्मिक सिद्धान्तों का रक्षक; वक्ष्ये--मैं बतलाऊँगा; सनातनम्--नित्य;धर्मम्--वृत्तिपरक कर्तव्य ( धर्म ); नारायण-मुखात्--नारायण के मुँह से; श्रुतम्--जिसे मैंने सुन रखा है।
श्री नारद मुनि ने कहा : मैं सर्वप्रथम समस्त जीवों के धार्मिक सिद्धान्तों के रक्षक भगवान्कृष्ण को नमस्कार करके नित्य धार्मिक पद्धति ( सनातन धर्म ) के सिद्धान्तों को बताता हूं जिन्हेंमैंने नारायण के मुख से सुना है।
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योउवतीर्यात्मनोउंशेन दाक्षायण्यां तु धर्मतः ।
लोकानां स्वस्तये ध्यास्ते तपो बदरिकाश्रमे ॥
६॥
यः--जो ( नारायण ); अवतीर्य--अवतार लेकर; आत्मन:--अपने; अंशेन--अंश ( नर ) के द्वारा; दाक्षायण्याम्--महाराज दक्षकी पुत्री दाक्षायणी के गर्भ में; तु--निस्सन्देह; धर्मतः--धर्म महाराज से; लोकानाम्--सारे लोगों के; स्वस्तये--लाभ हेतु;अध्यास्ते--सम्पन्न करता है; तप:--तपस्या; बदरिकाश्रमे --बद्विका श्रम नामक स्थान में |
भगवान् नारायण अपने अंश नर समेत इस संसार में दक्ष महाराज की मूर्ति नामक पुत्री सेप्रकट हुए।
धर्म महाराज द्वारा उनका जन्म समस्त जीवों के लाभ हेतु था।
वे आज भीबदरिकाश्रम नामक स्थान के निकट महान् तपस्या करने में लगे हुए हैं।
"
धर्ममूलं हि भगवान्सर्ववेदमयो हरि: ।
स्मृतं च तद्विदां राजन्येन चात्मा प्रसीदति ॥
७॥
धर्म-मूलम्--धार्मिक सिद्धान्तों की जड़; हि--निस्सन्देह; भगवान्-- भगवान्; सर्व-वेद-मय:--समस्त वैदिक ज्ञान का सार;हरिः--परम पुरुष; स्मृतम् च--तथा शास्त्र; तत्ू-विदाम्--परमे श्वर को जानने वाले का; राजनू--हे राजा; येन--जिससे; च--भी; आत्मा--आत्मा, मन, शरीर तथा हर वस्तु; प्रसीदति--पूर्णतया प्रसन्न हो जाती है
परम पुरुष भगवान् समस्त वैदिक ज्ञान के सार, समस्त धर्मों के मूल तथा महापुरुषों कीस्मृति हैं।
हे राजा युधिष्ठटिर, इस धर्म के सिद्धान्त को प्रमाणस्वरूप समझना चाहिए।
इसी धार्मिकसिद्धान्त के आधार पर सबों की तुष्टि होती है, यहाँ तक कि मनुष्य के मन, आत्मा तथा शरीरकी भी तुष्टि होती है।
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सत्यं दया तपः शौच तितिक्षेक्षा शमो दम: ।
अहिंसा ब्रह्मचर्य च त्याग: स्वाध्याय आर्जवम् ॥
८॥
सन्तोषः समहकसेवा ग्राम्येहोपरम: शनेः ।
नृणां विपर्ययेहेक्षा मौनमात्मविमर्शनम् ॥
९॥
अन्नाठ्यादे: संविभागो भूतेभ्यश्च यथाईतः ।
तेष्वात्मदेवताबुद्द्धि: सुतरां नृूषु पाण्डव ॥
१०॥
श्रवण कीर्तन चास्य स्मरणं महतां गतेः ।
सेवेज्यावनतिर्दास्यं सख्यमात्मसमर्पणम् ॥
११॥
नृणामयं परो धर्म: सर्वेषां समुदाहतः ।
त्रिंशल्लक्षणवात्राजन्सर्वात्मा येन तुष्पति ॥
१२॥
सत्यम्-बिना तोड़े-मरोड़े सत्य का भाषण; दया-- प्रत्येक दुखी व्यक्ति पर सहानुभूति; तप:--तपस्या ( यथा एकादशी के दिनमास में दो बार उपवास करना ); शौचम्--स्वच्छता ( दिन में दो बार, सुबह-शाम, नियमित रूप से स्नान करना तथा भगवान् केनाम का जप करना याद रखना ); तितिक्षा--सहनशक्ति ( ऋतु परिवर्तनों या असुविधाजनक परिस्थितियों में भी अश्षुब्ध रहना );ईक्षा--सद्-असद् में अन्तर करना; शम:--मन का संयम ( मन को मनमाना कार्य न करने देना ); दम:--इन्द्रियों का संयम( इन्द्रियों को असंयमित न होने देना ); अहिंसा--अहिंसा ( किसी जीव को तीन प्रकार के तापों से पीड़ित न होने देना );ब्रह्मचर्यम्--अपने वीर्य का दुरुपयोग न होने देना ( अपनी पतली के अतिरिक्त किसी अन्य स्त्री से संभोग न करना तथा वर्जितअवसरों पर यथा मासिक धर्म के अवसर पर पत्नी के साथ संभोग न करना ); च--तथा; त्याग: -- अपनी आय का कम से कमपचास प्रतिशत दान में देना; स्वाध्याय:-- भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत, रामायण, महाभारत जैसे दिव्य ग्रंथों का पठन ( अथवाजो बैदिक संस्कृति के लोग नहीं हैं, उनके द्वारा बाइबिल या कुरान का पठन ); आर्जवम्--सादगी( मानसिक द्वन्द्द से मुक्ति );सनन््तोष:--कठिन प्रयास के बिना जो भी उपलब्ध हो उसी में सन्तुष्ट रहना; समहक्-सेवा--उन साधु पुरुषों की सेवा करना जोएक जीव तथा दूसरे जीव में अन्तर नहीं करते तथा जो प्रत्येक जीव को आत्मा के रूप में देखते हैं ( पण्डिता: समदर्शिनः );ग्राम्य-ईह-उपरम:--तथाकथित परोपकारी कार्यो में भाग न लेते हुए; शनैः-- धीरे-धीरे; नृणाम्--मानव समाज में; विपर्यय-ईहा--अनावश्यक कार्य; ईक्षा--वाद-विवाद; मौनम्--गम्भीर तथा शान्त रहना; आत्म--अपने में; विमर्शनम्--शोध ( यह किमनुष्य शरीर है या आत्मा ); अन्न-आद्य-आदे:--अन्न, पेय आदि का; संविभाग:--समान वितरण; भूतेभ्य:--विभिन्न जीवों केलिए; च-- भी; यथा-अर्हत:--अनुकूल; तेषु--सारे जीवों में; आत्म-देवता-बुर्द्धि:--आत्मा या देवताओं के रूप में स्वीकारकरना; सुतराम्ू--प्रारम्भिक रूप से; नृषु--सारे मनुष्यों में; पाण्डब--हे महाराज युथिष्ठटिर; श्रवणम्--सुनना; कीर्तनम्-कीर्तनकरना; च--भी; अस्य--उस ( भगवान ) का; स्मरणम्--स्मरण करना ( भगवान् के शब्दों तथा कार्यों का ); महताम्--महापुरुषों का; गतेः-- आश्रय स्वरूप; सेवा--सेवा; इज्या-- पूजा; अवनति:ः --नमस्कार करना; दास्यम्--सेवा करना;सख्यम्--मित्र मानना; आत्म-समर्पणम्--अपना सब कुछ अर्पित कर देना; नृणाम्--सारे मनुष्यों का; अयम्--यह; पर: --सर्वश्रेष्ठ; धर्म:--धार्मिक सिद्धान्त; सर्वेषामू--सबों में; समुदाहृतः --पूर्णतया वर्णित; त्रिंशत्-लक्षण-वान्--तीस लक्षणों सेयुक्त; राजनू--हे राजा; सर्व-आत्मा--सबों का परमात्मा; येन--जिससे; तुष्यति--तुष्ट होता है |
सभी मनुष्यों को जिन सामान्य नियम का पालन करना होता है, ये हैं--सत्य, दया, तपस्या,( महीने में कुछ दिन उपवास करना ), दिन में दो बार स्नान, सहनशीलता , अच्छे बुरे काविवेक, मन का संयम, इन्द्रिय संयम, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, दान, शास्त्रों का अध्ययन, सादगी,सन्तोष, साधु पुरुषों की सेवा, अनावश्यक कार्यों से क्रमशः अवकाश लेना, मानव समाज केअनावश्यक कार्यों की व्यर्थता समझना, गम्भीर तथा शान्त बने रहना एवं व्यर्थ की बातें करने सेबचना, मनुष्य शरीर या इस आत्मा के विषय में विचार करना, सभी जीवों ( पशुओं तथामनुष्यों ) में अन्न का समान वितरण करना, प्रत्येक आत्मा को ( विशेषतया मनुष्य को ) परमेश्वरका अंश मानना, भगवान् के कार्यकलापों तथा उनके उपदेशों को सुनना ( भगवान् साधु पुरुषोंके आश्रय हैं ), इन कार्यों तथा उपदेशों का कीर्तन करना, इनका नित्य स्मरण करना, सेवाकरने का प्रयास, पूजा करना, नमस्कार करना, दास बनना, मित्र बनना और आत्म-समर्पणकरना।
हे राजा युथ्रिष्टिर, मनुष्य जीवन में इन तीस गुणों को अर्जित करना चाहिए मनुष्य इनगुणों को अर्जित करने मात्र से भगवान् को प्रसन्न कर सकता है।
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संस्कारा यत्राविच्छिन्ना: स द्विजोडउजो जगाद यम् ।
इज्याध्ययनदानानि विहितानि द्विजन्मनाम् ।
जन्मकर्मावदातानां क्रियाश्वा भ्रमचोदिता: ॥
१३॥
संस्कारा:--संस्कार, शुद्द्विकरण की विधियाँ; यत्र--जिसमें; अविच्छिन्ना:--बिना किसी क्रम भंग के; सः--ऐसा व्यक्ति; द्वि-जः--दो बार जन्मा; अज:--ब्रह्मा ने; जगाद--विधान किया; यम्--जो; इज्या--पूजा; अध्ययन--वेदाध्ययन; दानानि--तथादान; विहितानि--बताये गये; द्वि-जन्मनाम्--द्विजों का; जन्म--जन्म से; कर्म--तथा कर्म से; अवदातानामू--विमल, पवित्र;क्रिया:--कार्यकलाप; च-- भी; आश्रम-चोदिता:--चारों आश्रमों के लिए संस्तुत।
जो लोग अविच्छिन्न रूप से वैदिक मंत्रों द्वारा सम्पन्न होने वाले गर्भाधान संस्कार तथा अन्यनियत विधियों द्वारा शुद्ध किये जा चुके हैं तथा जिनकी स्वीकृति ब्रह्मा द्वारा दी जा चुकी है, वेद्विज कहलाते हैं।
ऐसे ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य जो अपनी पारिवारिक परम्परा तथा अपनेआचरण द्वारा शुद्ध किये जा चुके हैं उन्हें चाहिए कि भगवान् की पूजा करें, वेदों का अध्ययनकरें तथा दान दें।
इस पद्धति में उन्हें आश्रमों ( ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास ) केनियमों का पालन करना चाहिए।
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विप्रस्याध्ययनादीनि षडन्यस्याप्रतिग्रह: ।
राज्ञो वृत्ति: प्रजागोप्तुरविप्राद्या करादिभि: ॥
१४॥
विप्रस्थ--ब्राह्मण का; अध्ययन-आदीनि--वेदाध्ययन इत्यादि; षघट्ू--छ:ः ( वेदों का अध्ययन, वेदों का अध्यापन, दैव पूजा,अन्यों को पूजा-विधि बताना, दान ग्रहण करना तथा दान देना ); अन्यस्य--ब्राह्मण के अलावा अन्य ( क्षत्रियों ) का;अप्रतिग्रह:--अन्यों से दान लिए बिना ( क्षत्रिय ब्राह्मणों के लिए नियत अन्य पाँच कर्तव्य निभा सकता है ); राज्ञ:--क्षत्रिय की;वृत्तिः--जीविका का साधन; प्रजा-गोप्तु:--प्रजा के पालक; अविप्रात्--जो ब्राह्मण नहीं हैं उससे; वा--अथवा; कर-आदिभिः--कर, दण्ड हेतु, जुर्माना आदि वसूल करके |
ब्राह्मण के लिए छः वृत्तिपरक कर्तव्य हैं।
क्षत्रिय के लिए दान लेना वर्जित है किन्तु वहइनमें से अन्य पाँच कर्तव्य कर सकता है।
राजा या क्षत्रिय को ब्राह्मण से कर वसूलने कीअनुमति नहीं है, किन्तु वह अपनी अन्य प्रजा पर न्यूनतम कर तथा दण्ड के लिए जुर्माना लगाकरअपनी जीविका चला सकता है।
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वैश्यस्तु वातवित्ति: स्यान्नित्यं ब्रहाकुलानुग: ।
शूद्रस्य द्विजशुश्रूषा वृत्तिश्व स्वामिनो भवेत् ॥
१५॥
वैश्य:--व्यवसायी वर्ग; तु--निस्सन्देह; वार्ता-वृत्तिः--कृषि, गोरक्षा तथा व्यापार में लगे; स्थात्--हो; नित्यम्--सदैव; ब्रह्म-कुल-अनुग:--ब्राह्मणों के निर्देशों का पालन करते हुए; शूद्रस्थ-- श्रमिकों का, चतुर्थ श्रेणी के लोग; द्विज-शुश्रूषा --तीन उच्चवर्गों ( ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य ) की सेवा; वृत्ति:--जीविका-साधन; च--तथा; स्वामिनः -- स्वामी; भवेत्--उसे होनाचाहिए।
व्यवसायी वर्ग को सदैव ब्राह्मणों के आदेशों का पालन करना चाहिए और कृषि, व्यापारतथा गोरक्षा जैसे वृत्तिपरक कर्तव्यों में लगे रहना चाहिए।
शूद्र का एकमात्र कर्तव्य है उच्चवर्ण मेंसे किसी को स्वामी बनना और उस की सेवा करना।
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वार्ता विचित्रा शालीनयायावरशिलोड्छनम् ।
विप्रवृत्तिश्चतुर्थयं श्रेयसी चोत्तरोत्तरा ॥
१६॥
वार्ता--वैश्य की जीविका का साधन ( कृषि, गोरक्षा तथा व्यापार ); विचित्रा--विभिन्न प्रकार; शालीन--बिना प्रयास के प्राप्तजीविका; यायावर--थोड़ा धान माँगने के लिए खेत में जाना; शिल--खेत में गिरे हुए अन्न को चुनना; उज्छनम्--दूकानों मेंबोरों से गिरे हुए अन्न को चुनना; विप्र-वृत्ति:--ब्राह्मणों की जीविका; चतुर्धा--चार प्रकार की; इयम्--यह; श्रेयसी --श्रेयस्कर, श्रेष्ठतर; च-- भी; उत्तर-उत्तरा--उत्तरोत्तर।
विकल्प के रूप में ब्राह्मण वैश्य की कृषि, गोरक्षा या व्यापार की वृत्तियाँ ग्रहण कर सकताहै।
जो कुछ बिना माँगे मिल जाये वह उस पर आश्रित रह सकता है, वह प्रति दिन धान के खेतमें जाकर भिक्षा माँग सकता है, वह स्वामी द्वारा खेत में थोडा अन्न इकट्ठा कर सकता है; या अन्न के व्यापारियों की दूकान में पिछले गिरे हुए अन्न को एकत्र कर सकता है।
जीविका के ये चारसाधन हैं जिन्हें ब्राह्मण भी अपना सकते हैं।
इन चारों में से प्रत्येक साधन अपने पिछेले से( उत्तरोत्तर ) श्रेष्ठ है।
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जघन्यो नोत्तमां वृत्तिमनापदि भजेन्नर: ।
ऋते राजन्यमापत्सु सर्वेषामपि सर्वशः ॥
१७॥
जघन्य:--निम्न ( पुरुष ); न--नहीं; उत्तमाम्ू--उच्च; वृत्तिमू--जीविका का साधन; अनापदि--जहाँ सामाजिक उपद्गव नहींहोते; भजेत्--स्वीकार करे; नर:--मनुष्य; ऋते--के अतिरिक्त; राजन्यमू--क्षत्रिय का व्यवसाय; आपत्सु--आपात्काल में;सर्वेषाम्--जीवन के प्रत्येक स्तर के प्रत्येक व्यक्ति का; अपि--निश्चय ही; सर्वश:--सारे
व्यवसाय या वृत्तिपरक कर्तव्यआपात्काल के अतिरिक्त निम्न लोगों को उच्च वर्ग के वृत्तिपरक कार्य नहीं करने चाहिए।
हाँ, यदि आपात्काल हो तो क्षत्रिय के अतिरिक्त अन्य सभी लोग अन्यों की जीविकाएँ स्वीकारकर सकते हैं।
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ऋतामृताभ्यां जीवेत मृतेन प्रमृतेन वा ।
सत्यानृताभ्यामपि वा न श्ववृत््या कदाचन ।
ऋतमुज्छशिल प्रोक्तममृतं यदयाचितम् ॥
१८ ॥
मृतं तु नित्ययाच्ञा स्यात्प्रमृतं कर्षणं स्मृतम् ।
सत्यानृतं च वाणिज्यं श्ववृत्तिनीचसेवनम् ॥
१९॥
वर्जयेत्तां सदा विप्रो राजन्यश्न जुगुप्सिताम् ।
सर्ववेदमयो विप्र: सर्वदेवमयो नृपः ॥
२०॥
ऋत-अमृता भ्याम्ू--ऋत तथा अमृत नामक वृत्तियों से; जीवेत--जीवित रहे; मृतेन--मृत वृत्ति द्वारा; प्रमतेन बा-- अथवा प्रमृतवृत्ति द्वारा; सत्यानृताभ्याम् अपि--सत्य अनृत वृत्ति के द्वारा भी; वा--अथवा; न--कभी नहीं; श्व-वृत्त्या--कूकर वृत्ति द्वारा;कदाचन--कभी भी; ऋतम्--ऋत; उब्छशिलम्--खेत या बाजार से गिरे अन्न बीनने की वृत्ति; प्रोक्तमू--कहा गया; अमृतम्--अमृत वृत्ति; यत्--जो; अयाचितम्--किसी से माँगे बिना प्राप्त; मृतम्--मृत की वृत्ति; तु--लेकिन; नित्य-याच्ञा-- प्रतिदिनकिसानों से अन्न की भीख माँगना; स्थात्--हो; प्रमृतम्--प्रमृत वृत्ति; कर्षणम्--खेत जोतना; स्मृतम्--ऐसा स्मरण किया जाताहै; सत्यानृतम्--सत्यानृत वृत्ति; च--तथा; वाणिज्यम्--व्यापार; श्व-वृत्ति:--कूकरों की वृत्ति; नीच-सेवनम्--नीचों ( वैश्योंतथा शूद्रों ) की सेवा; वर्जयेत्--छोड़ देनी चाहिए; ताम्--उसको ( कूकर वृत्ति ); सदा--सदैव; विप्र: --ब्राह्मण; राजन्य: च--तथा क्षत्रिय; जुगुप्सिताम्ू--अत्यन्त ग्हित; सर्व-वेद-मय:--सारे वैदिक ज्ञान में पटु; विप्र:--ब्राह्मण; सर्व-देव-मयः--साक्षात्समस्त देवता; नृप:--क्षत्रिय या राजा)
आपात्काल में मनुष्य ऋत, अमृत, मृत, प्रमृत तथा सत्यनृत नामक विभिन्न वृत्तियों में सेकिसी एक को स्वीकार कर सकता है।
किन्तु कूकर वृत्ति से कभी नहीं अपनानी चाहिए।
उज्छशिल वृत्ति में अर्थात् खेती से अन्न एकत्र करने की वृत्ति को होता है।
इसे ही ऋत कहते हैं।
बिना भीख माँगे एकत्र करना अमृत कहलाता है, अन्न की भीख माँगना मृत है, जमीन कोजोतना प्रमृत है और व्यापार करना सत्यानृत है।
किन्तु निम्न पुरुषों की सेवा करना श्रवृत्ति याकूकर वृत्ति कहलाती है।
विशेषतः ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों को शूद्रों की निम्न तथा गर्हित सेवा मेंनही लगना चाहिए।
ब्राह्मणों को समस्त वैदिक ज्ञान में पटु होना चाहिए और क्ष्त्रियों कोदेवताओं की पूजा से भली भान्ति परिचित होना चाहिए।
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शमो दमस्तपः शौच सन््तोष: क्षान्तिराज॑वम् ।
ज्ञानं दयाच्युतात्मत्वं सत्यं च ब्रह्मलक्षणम् ॥
२१॥
शमः--मन का संयम; दमः--इन्द्रिय संयम; तप:--तपस्या; शौचम्--पतवित्रता; सन्तोष: --तुष्टि; क्षान्ति:--क्षमाशीलता ( क्रोधसे विश्लुब्ध न होना ); आर्जवम्--सरलता; ज्ञानम्--ज्ञान; दया--दया; अच्युत-आत्मत्वम्-- अपने को ईश्वर का नित्य दासमानना; सत्यम््-सत्य; च--भी; ब्रह्म-लक्षणम्--ब्राह्मण के लक्षण
ब्राह्मण के लक्षण इस प्रकार हैं--मन का संयम, इन्द्रिय संयम, तपस्या, पवित्रता, सन्तोष,क्षमाशीलता, सरलता, ज्ञान, दया, सत्य तथा भगवान् के प्रति पूर्ण आत्म-समर्पण ।
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शौर्य वीर्य धृतिस्तेजस्त्यागश्चात्मजय: क्षमा ।
ब्रह्मण्यता प्रसादश्च सत्यं च क्षत्रलक्षणम् ॥
२२॥
शौर्यम्--युद्ध में पराक्रम; वीर्यम्ू--अजेय होना; धृतिः--धैर्य ( यहाँ तक कि हारने पर भी क्षत्रिय गम्भीर रहता है ); तेज:--अन्यों को पराजित करने की सामर्थ्य; त्याग:--दान देना; च--तथा; आत्म-जय: --शारीरिक आवश्यकताओं से अभिभूत नहोना; क्षमा-- क्षमाशीलता; ब्रह्मण्यता--ब्राह्मण नियमों के प्रति आज्ञाकारिता; प्रसाद:--जीवन की किसी भी परिस्थिति मेंप्रसन्न रहना; च--तथा; सत्यम् च--तथा सत्य; क्षत्र-लक्षणम्--ये क्षत्रिय के लक्षण हैं।
युद्ध में प्रभावशाली, अजेय, थेर्यवान, तेजवान तथा दानवीर होना, शारीरिकआवश्यकताओं को वश्ञ में करना, क्षमाशील होना, ब्राह्मण नियमों का पालन करना तथा सदैवप्रसन्न रहना और सत्यनिष्ठ होना--ये क्षत्रिय के लक्षण हैं।
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देवगुर्वच्युते भक्तिस्त्रिवर्गपरिपोषणम् ।
आस्तिक्यमुद्यमो नित्य॑ नैपुण्यं वैश्यलक्षणम् ॥
२३॥
देव-गुरु-अच्युते--देवताओं, गुरु तथा भगवान् विष्णु में; भक्ति:-- भक्तिभाव; त्रि-वर्ग--पवित्र जीवन के तीन सिद्धान्तों ( धर्म,अर्थ तथा काम ) का; परिपोषणम्--सम्पन्न होना; आस्तिक्यम्-शास्त्रों, गुरु तथा परमे श्वर में श्रद्धा; उद्यम:--सक्रिय;नित्यमू--निरन्तर, अनवरत; नैपुण्यम्--निपुणता; वैश्य-लक्षणम्--वैश्य के लक्षण |
देवता, गुरु तथा भगवान् विष्णु के प्रति सदैव अनुरक्ति, धर्म, अर्थ तथा काम मेंप्रयलशीलता; गुरु तथा शास्त्र के शब्द में विश्वास; तथा धनार्जन में निपुणता सहित प्रयलशीलहोना--ये वैश्य के लक्षण हैं।
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शूद्रस्य सन्नतिः शौचं सेवा स्वामिन्यमायया ।
अमन्त्रयज्ञो हास्तेयं सत्यं गोविप्ररक्षणम् ॥
२४॥
शूद्रस्थ--शूद्र ( समाज के चतुर्थ वर्ण, श्रमिक ) का; सन्नतिः--उच्च वर्णों ( ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य ) के प्रति आज्ञाकारिता;शौचम्--पवित्रता; सेवा--सेवा भाव; स्वामिनि--अपने पालने वाले स्वामी के प्रति; अमायया--द्विविधता के बिना; अमन्त्र-यज्ञ:--बिना मंत्रों के यज्ञ करना; हि--ही; अस्तेयम्--चोरी न करने का अभ्यास; सत्यम्ू--सत्य; गो--गाय; विप्र--ब्राह्मणकी; रक्षणम्--रक्षा |
समाज के उच्च वर्णों ( ब्राह्मणों, क्षत्रिय तथा वैश्यों ) को नमस्कार करना, सदैव स्वच्छरहना, द्वैतभाव से मुक्त रहना, अपने स्वामी की सेवा करना, मंत्र पढ़े बिना यज्ञ करना, चोरी नकरना, सदा सत्य बोलना तथा गायों एवं ब्राह्मणों को सदा संरक्षण प्रदान करना--ये शूद्र केलक्षण हैं।
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स्त्रीणां च पतिदेवानां तच्छुश्रूषानुकूलता ।
तद्वन्धुष्वनुवृत्तिश्च नित्यं तद्व्रतधारणम् ॥
२५॥
स्त्रीणाम्--स्त्रियों का; च-- भी; पति-देवानाम्--जिन्होंने अपने पतियों को पूज्य मान रखा है; तत्-शुश्रूषा-- अपने पति कीसेवा करने में तत्परता; अनुकूलता--अपने पति के प्रति अनुकूल रहना; ततू-बन्धुषु--पति के मित्रों तथा सम्बन्धियों में;अनुवृत्ति:--उसी प्रकार अनुकूलता ( पति के सन््तोष के लिए उनसे भी सद्व्यवहार करना ); च--तथा; नित्यम्ू--नियमित रूपसे; तत्-ब्रत-धारणम्-पति के ब्रतों को स्वीकार करते हुए अथवा पति के अनुसार कर्म करना।
पति की सेवा करना, अपने पति के अनुकूल रहना, पति के सम्बन्धियों तथा मित्रों के प्रतिभी समान रूप से अनुकूल रहना तथा पति के ब्रतों का पालन करना--ये चार नियम पतिब्रतास्त्री के लिए पालनीय हैं।
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सम्मार्जनोपलेपाभ्यां गृहमण्डनवर्तनै: ।
स्वयं च मण्डिता नित्यं परिमृष्टपरिच्छदा ॥
२६॥
कामैरुच्चावचे: साध्वी प्रश्रयेण दमेन च ।
वाक्यै: सत्य: प्रियैः प्रेम्णा काले काले भजेत्पतिम् ॥
२७॥
सम्मार्जन--साफ करने; उपलेपाभ्यामू--जल या तरल पदार्थ से लीपने; गृह--घर; मण्डन--सजाने; वर्तनैः--घर में रहकर ऐसेकार्यों में व्यस्त रहने; स्ववम्--खुद; च-- भी; मण्डिता--सुन्दर वस्त्रों से विभूषित; नित्यमू--सदैव; परिमृष्ट-- स्वच्छ किया;परिच्छदा--वस्त्र तथा घरेलू बर्तन; कामैः--पति की इच्छानुसार; उच्च-अवचै: --बड़ा तथा छोटा दोनों; साध्वी--पतित्रता स्त्री;प्रश्रयेण--विनयपूर्वक; दमेन--इन्द्रिय संयम से; च-- भी; वाक्यै:--वाणी से; सत्यैः --सत्य से; प्रियैः--अत्यन्त सुहावने;प्रेम्णा--प्रेमपूर्वक; काले काले--अनुकूल समय पर; भजेत्--पूजा करे; पतिम्ू--पति की |
पतिक्रता ( साध्वी ) स्त्री को चाहिए कि अपने पति की प्रसन्नता के लिए स्वयं को अच्छे-अच्छे वस्त्रों से सजाये तथा स्वर्णाभूषणों से अलंकृत हो।
सदैव स्वच्छ तथा आकर्षक वस्त्रपहने।
अपना घर बुहारे तथा उसे पानी तरल पदार्थों से धोए जिससे सारा घर सदा शुद्ध तथास्वच्छ रहे।
उसे गृहस्थी की सामग्री एकत्र करनी चाहिए और घर को अगुरु तथा पुष्पों सेसुगन्धित रखना चाहिए।
उसे अपने पति की इच्छा पूरी करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
साध्वीस्त्री को विनीत तथा सत्यनिष्ठ रहकर, अपनी इन्द्रियों पर संयम रख कर तथा मधुर वचन बोलकरकाल तथा परिस्थिति के अनुसार अपने पति की प्रेमपूर्ण सेवा में लगना चाहिए।
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सन्तुष्टालोलुपा दक्षा धर्मज्ञा प्रियसत्यवाक् ।
अप्रमत्ता शुचि: स्निग्धा पतिं त्वपतितं भजेत् ॥
२८॥
सन्तुष्टा-- सदैव तुष्ठ; अलोलुपा--लालची हुए बिना; दक्षा--सेवा करने में पटु; धर्म-ज्ञा-- धार्मिक नियमों से पूर्णतया परिचित;प्रिय--सुहावना; सत्य--सत्यनिष्ठ; वाक्--बोलने में; अप्रमत्ता--अपने पति की सेवा में दत्तचित; शुचिः--सदैव स्वच्छ तथाशुद्ध; स्निग्धा--स्नेहिल; पतिम्--पति को; तु--लेकिन; अपतितम्--जो पतित नहीं है; भजेत्--पूजा करे
साध्वी स्त्री को लालची नहीं होना चाहिए, अपितु उसे सभी परिस्थितियों में संतुष्ट रहनाचाहिए।
उसे गृहस्थी के काम-काज में अत्यन्त पटु होना चाहिए और धार्मिक नियमों से पूर्णतयाअवगत होना चाहिए।
उसे मधुर तथा सत्यभाषिणी होना चाहिए; उसे अत्यन्त सतर्क तथा सदैव शुद्ध एवं पवित्र रहना चाहिए।
इस प्रकार एक साध्वी स्त्री को उस पति की प्रेमपूर्वक सेवा करनीचाहिए जो पतित न हो।
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या पति हरिभावेन भजेत्श्रीरिव तत्परा ।
हर्यात्मना हरेलोंकि पत्या श्रीरिव मोदते ॥
२९॥
या--जो स्त्री; पतिमू--अपने पति को; हरि-भावेन--मानसिक रूप से उसे हरि या भगवान् के समान मानकर; भजेत्--पूजाकरती है या सेवा करती है; श्री: इब--लक्ष्मी के समान; तत्-परा--अनुरक्त होकर; हरि-आत्मना--हरि के विचारों में लीन; हरेः लोके--आध्यात्मिक जगत या बैकुण्ठलोक में; पत्या--अपने पति के साथ; श्री: इब--लक्ष्मी के सहश; मोदते--आध्यात्मिकनित्य जीवन का भोग करती है।
जो स्त्री लक्ष्मी जी के पदचिन्हों पर पूरी तरह चलकर अपने पति की सेवा में लगी रहती है,वह निश्चित रूप से अपने भक्त पति के साथ भगवद्धाम वापस जाती है और वैकुण्ठलोक मेंअत्यन्त सुखपूर्वक रहती है।
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वृत्ति: सड्भूरजातीनां तत्तत्कुलकृता भवेत् ।
अचौराणामपापानामन्त्यजान्तेवसायिनाम् ॥
३०॥
वृत्तिः--वृत्तिपरक कर्तव्य; सट्ढटर-जातीनाम्-मिश्रित वर्णो के लोगों का ( चारों वर्णो के अतिरिक्त ); तत्ू-तत्--वे-वे; कुल-कृता--पारिवारिक परम्परा; भवेत्--हो; अचौराणाम्--जो वृत्ति से चोर नहीं हैं; अपापानाम्--जो पापी नहीं हैं; अन्त्यज--निम्न वर्ग के; अन्तेबसायिनामू--अन्तेवसायी या चाण्डाल नाम से ज्ञात
संकर जातियों में से जो चोर नहीं होते वे अन्तेबसायी या चण्डाल ( कुत्ता खाने वाले )कहलाते हैं और उनके कुल में चले आने वाले रीति-रिवाजों को होते हैं।
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प्राय: स्वभावविहितो नृणां धर्मो युगे युगे ।
वेदहृग्भि: स्मृतो राजन्प्रेत्य चेह च शर्मकृत् ॥
३१॥
प्राय:--सामान्यतया; स्व-भाव-विहितः--नियत, अपने गुण के अनुसार; नृणाम्ू--मानव समाज का; धर्म:--वृत्तिपरककर्तव्य; युगे युगे-- प्रत्येक युग में; वेद-हग्भिः--वैदिक ज्ञान में पारंगत ब्राह्मण के द्वारा; स्मृत:--मान्य; राजनू--हे राजा;प्रेत्य--मृत्यु के बाद; च--तथा; इह--यहाँ ( इस शरीर में ); च-- भी; शर्म-कृतू--शुभ, कल्याणकारी |
हे राजन, वैदिक ज्ञान में पारंगत ब्राह्मणों का निर्णय है कि प्रत्येक युग में अपने-अपनेभौतिक गुणों के अनुसार विभिन्न वर्णों के लोगों का आचरण इस जीवन में तथा अगले जीवनमें कल्याणकारी होता है।
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वृत्त्या स्वभावकृतया वर्तमान: स्वकर्मकृत् ।
हित्वा स्वभावजं कर्म शनैर्निर्गुणतामियात् ॥
३२॥
वृत््या--वृत्ति से; स्व-भाव-कृतया--अपने भौतिक गुणों के अनुसार किया गया; वर्तमान:--विद्यमान; स्व-कर्म-कृत्--अपना-अपना कार्य करते हुए; हित्वा--त्याग कर; स्व-भाव-जम्--अपने ही गुणों से उत्पन्न; कर्म--कार्य ; शनैः -- धीरे-धीरे;निर्गुणतामू--दिव्य स्थिति; इयात्-- प्राप्त कर सकता है।
यदि कोई अपनी प्रकृति जन्य भौतिक स्थिति के अनुसार अपना वृत्तिपरक कार्य करता हैतथा धीरे-धीरे इन कार्यों को छोड़ देता है, तो उसे निष्काम अवस्था प्राप्त हो जाती है।
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उप्यमान मुहुः क्षेत्र स्वयं निर्वीर्यतामियात् ।
न कल्पते पुनः सूत्यै उप्तं बीज॑ च नश्यति ॥
३३॥
एवं कामाशयं चित्तं कामानामतिसेवया ।
विरज्येत यथा राजन्नग्निवत्कामबिन्दुभि: ॥
३४॥
उप्यमानम्--इस प्रकार जोतने से; मुहुः--पुनः-पुन:; क्षेत्रमू--खेत; स्वयम्--अपने आप; निर्वार्यताम्--बंजर; इयात्--हो जाताहै; न कल्पते--उपयुक्त नहीं है; पुन:--फिर; सूत्यै--अगली फसल उगाने के लिए; उप्तम्--बोया गया; बीजम्--बीज; च--तथा; नश्यति--नष्ट हो जाता है; एवम्--इस प्रकार; काम-आशयम्--कामेच्छाओं से पूर्ण; चित्तम्--अन्तःकरण; कामानामू--वांछित वस्तुओं के; अति-सेवया--बारम्बार भोग के कारण; विरज्येत--विरक्त हो सकता है; यथा--जिस तरह; राजनू--हेराजा; अग्नि-वत्--अग्नि; काम-बिन्दुभि:--घी की छोटी-छोटी बूँदों से |
हे राजनू, यदि कोई खेत को बारम्बार जोता-बोया जाता है, तो उसकी उत्पादन शक्ति घटजाती है और जो भी बीज बोये जाते हैं वे नष्ट हो जाते हैं।
जिस प्रकार घी की एक एक बूँदडालने से अग्नि कभी नहीं बुझती अपितु घी की धारा से वह बुझ जाएगी उसी प्रकारविषयवासना में अत्यधिक लिप्त होने पर ऐसी इच्छाएँ पूरी तरह नष्ट हो जाती हैं।
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यस्य यल्लक्षणं प्रोक्त पुंसो वर्णाभिव्यज्ञकम् ।
यदन्यत्रापि दृश्येत तत्तेनेव विनिर्दिशेत् ॥
३५॥
यस्य--जिसका; यत्--जो; लक्षणम्--लक्षण; प्रोक्तम्--कहे गये ( ऊपर ); पुंसः --मनुष्य के; वर्ण-अभिव्यज्ञलकम्--विभाजनको सूचित करने वाले ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इत्यादि ); यत्--यदि; अन्यत्र--कहीं और; अपि-- भी; दृश्येत--देखाजाता है; तत्ू--वह; तेन--उस लक्ष्य से; एब--निश्चय ही; विनिर्दिशेत्--उसका नाम धरना चाहिए।
यदि कोई उपर्युक्त प्रकार से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र के लक्षण प्रदर्शित करता है, तोभले ही वह भिन्न जाति का क्यों न हो, उसे वर्गीकरण के उन लक्षणों के अनुसार स्वीकार किया जाना चाहिए।
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