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अध्याय दस: प्रह्लाद, श्रेष्ठ भक्तों में सर्वश्रेष्ठ
7.10श्रीनारद उवाचभक्तियोगस्य तत्सर्वमन्तरायतयार्भक: ।
मन्यमानो हषीकेशंस्मयमान उवाच ह ॥
१॥
श्री-नारदः उवाच--नारद मुनि ने कहा; भक्ति-योगस्य--भक्ति के नियमों का; तत्--वे ( नृसिंहदेव द्वारा दिये गये वर );सर्वमू--उनमें से प्रत्येक; अन्तरायतया--अवरोध के होने से ( भक्तियोग के पथ पर ); अर्भक:--बालक रूप प्रह्मद महाराज;मन्यमान:--मानते हुए; हषीकेशम्--नृसिंहदेव को; स्मयमान: --मुसकाते हुए; उवाच--कहा; ह-- भूतकाल का सूचक |
नारद मुनि ने आगे कहा : यद्यपि प्रह्ाद महाराज बालक थे किन्तु जब उन्होंने नूसिंहदेव द्वारादिये गये बरों को सुना तो उन्होंने इन्हें भक्ति के मार्ग में अवरोध समझा।
तब वे विनीत भाव सेमुसकाये और इस तरह बोले।
"
श्रीप्रह्दाद उवाचमा मां प्रलोभयोत्पत्त्या सक्तंकामेषु तेवर: ।
तत्सड़भीतो निर्विण्णो मुमुक्षुस्त्वामुपाअ्रित: ॥
२॥
श्री-प्रह्दाद: उबाच--प्रह्द महाराज ने ( भगवान् से ) कहा; मा--मत; माम्--मुझको; प्रलोभय--लालच दीजिए; उत्पत्त्या--मेरे जन्म के कारण ( असुर कुल में ); सक्तम्--( मैं पहले से ही ) अनुरक्त; कामेषु-- भौतिक भोग में; तैः--उन सभी; वरै:--भौतिक सम्पत्ति के वरों द्वारा; तत्ू-सड्र-भीतः--ऐसी भौतिक संगति से डर कर; निर्विण्णग:-- भौतिक इच्छाओं से पूर्णतयाविरक्त होकर; मुमुक्षुः--भौतिक जीवन से मुक्त होने का इच्छुक; त्वामू--आपके चरणकमलों में; उपाश्रित:--मैंने शरण ले लीहै।
प्रह्ाद महाराज ने आगे कहा : हे प्रभु, हे भगवान्, नास्तिक परिवार में जन्म लेने के कारणमैं स्वभावत: भौतिक भोग के प्रति अनुरक्त हूँ; अतएव आप मुझे इन मोहों से मत ललचाइये।
मैंभौतिक दशाओं से अत्यधिक भयभीत हूँ और भौतिकतावादी जीवन से मुक्त होने का इच्छुक हूँ।
यही कारण है कि मैंने आपके चरणकमलों की शरण ग्रहण की है।
"
भृत्यलक्षणजिज्ञासुर्भक्त कामेष्वबचोदयत् ।
भवान्संसारबीजेषु हृदयग्रन्थिषु प्रभो ॥
३॥
भृत्य-लक्षण-जिज्ञासु:--शुद्ध भक्त के लक्षण प्रकट करने का इच्छुक; भक्तम्-- भक्त को; कामेषु-- भौतिक जगत में, जहाँकामेच्छाएँ प्रधान हैं; अचोदयत्-- भेजा; भवान्-- आपने; संसार-बीजेषु--इस जगत में उपस्थित रहने का मूल कारण; हृदय-ग्रन्थिपु--( भौतिक सुख की इच्छाएं ) जो समस्त बद्धजीवों के हृदयों के भीतर हैं; प्रभो--हे पूज्य भगवान्
हे मेरे अराध्य देव, चूँकि हर एक के हृदय में भौतिक संसार के मूल कारण कामेच्छाओं काबीज रहता है, अतएव आपने मुझे इस भौतिक जगत में शुद्ध भक्त के लक्षण प्रकट करने केलिए भेजा है।
"
नान्यथा तेडखिलगुरो घटेत करुणात्मन: ।
यस्त आशिष आशास्ते न स भृत्य: स वै वणिक् ॥
४॥
न--नहीं; अन्यथा--और कुछ; ते--तुम्हारा; अखिल-गुरो--हे समस्त सृष्टि के परम शिक्षक; घटेत--ऐसा हो सकता है;'करुणा-आत्मन:--परम पुरुष जो अपने भक्तों पर अत्यन्त दयालु हैं; यः--जो व्यक्ति; ते--तुमसे; आशिष:-- भौतिक लाभ;आशास्ते--इच्छा करता है ( आपकी सेवा करने के बदले में ); न--नहीं; सः--ऐसा व्यक्ति; भृत्यः:--सेवक; सः--ऐसा व्यक्ति;वै--निस्सन्देह; वणिक्--व्यापारी ( जो अपने व्यापार से लाभ उठाना चाहता है )।
अन्यथा हे भगवान्, हे समस्त जगत के परम शिक्षक, आप अपने इस भक्त के प्रति इतनेदयालु हैं कि आपने उससे कुछ भी ऐसा करने को प्रेरित नहीं किया जो उसके लिए अलाभकारीहो।
दूसरी ओर, जो व्यक्ति आपकी भक्ति के बदले में कुछ भौतिक लाभ चाहता है, वह आपकाशुद्ध भक्त नहीं हो सकता।
वह उस व्यापारी की तरह ही है, जो सेवा के बदले में लाभ चाहताहै।
"
आशासानो न वै भृत्य: स्वामिन्याशिष आत्मन: ।
न स्वामी भृत्यतः स्वाम्यमिच्छन्यो राति चाशिष: ॥
५॥
आशासान:--( सेवा के बदले ) इच्छाएँ रखने वाला व्यक्ति; न--नहीं; बै--निस्सन्देह; भृत्य:--योग्य सेवक या भगवान् काशुद्ध भक्त; स्वामिनि--स्वामी से; आशिष:--भौतिक लाभ; आत्मन:--अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए; न--न तो; स्वामी--स्वामी, प्रभु; भृत्यतः--सेवक से; स्वाम्यम्--स्वामी होने के श्रेष्ठ पद से; इच्छन्--चाहते हुए; यः--ऐसा स्वामी जो; राति--प्रदान करता है; च-- भी; आशिष:-- भौतिक लाभ ।
जो सेवक अपने स्वामी से भौतिक लाभ की इच्छा रखता है, वह निश्चय ही योग्य सेवक याशुद्ध भक्त नहीं है।
इसी प्रकार जो स्वामी अपने सेवक को इसलिए आशीष देता है कि स्वामी केरूप में उसकी प्रतिष्ठा बनी रहे, वह भी शुद्ध स्वामी नहीं है।
"
अहं त्वकामस्स्त्वद्धक्तस्त्वं च स्वाम्यनपाश्रय: ।
नान्यथेहावयोरथों राजगसेवकयोरिव ॥
६॥
अहम्--जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है; तु--निस्सन्देह; अकाम:--निष्काम; त्वत्-भक्त:--निष्काम भाव से आपके प्रति पूर्णतयाआसक्त; त्वम् च--आप भी; स्वामी--असली मालिक; अनपाश्रय: --निष्काम भाव से ( सकाम होने पर आप स्वामी नहीं बनसकते ); न--नहीं; अन्यथा--सेवक-सेव्य जैसे सम्बन्ध के बिना; उहह--यहाँ; आवयो: --हमारा; अर्थ:--किसी स्वार्थ के ( भगवान् शुद्ध स्वामी हैं और प्रह्मद महाराज निःस्वार्थ शुद्ध भक्त हैं ); राज--राजा; सेवकयो:--तथा सेवक के; इब--सदृश( जिस तरह राजा सेवक के लाभ हेतु कर लेता है या जनता राजा हेतु कर देती है )॥
हे प्रभु, मैं आपका निःस्वार्थ सेवक हूँ और आप मेरे नित्य स्वामी हैं।
सेवक तथा स्वामी होनेके अतिरिक्त हमें कुछ भी नहीं चाहिए।
आप प्राकृतिक रूप से मेरे स्वामी हैं और मैं आपकासेवक हूँ।
हम दोनों में कोई अन्य सम्बन्ध नहीं है।
"
यदि दास्यसि मे कामान्वरांस्त्वं वरदर्षभ ।
कामानां हद्यसंरोह भवतस्तु वृणे वरम् ॥
७॥
यदि--यदि; दास्यसि--देना चाहते हैं; मे--मुझको; कामान्ू--इच्छित वस्तु; वरान्ू--अपने आशीर्वाद के रूप में; त्वमू--तुम;वरद-ऋषभ--हे भगवान् आप कोई भी वर दे सकते हैं; कामानाम्ू-- भौतिक सुख की सारी इच्छाओं का; हदि--अपने हृदय केभीतर; असंरोहम्--वृद्धि का न होना; भव त:--आपसे; तु--तब; वृणे-- प्रार्थना करता हूँ; वरम्ू-- ऐसे वरदान के लिए
हे सर्वश्रेष्ठ वरदाता स्वामी, यदि आप मुझे कोई वांछित वर देना ही चाहते हैं, तो मेरी आपसेप्रार्थना है कि मेरे हृदय में किसी प्रकार की भौतिक इच्छाएँ न रहें।
"
इन्द्रियाणि मन: प्राण आत्मा धर्मो धृतिर्मति: ।
हीः श्रीस्तेज: स्मृति: सत्यं यस्य नश्यन्ति जन्मना ॥
८॥
इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; मनः--मन; प्राण: -- प्राण; आत्मा--शरीर; धर्म:--धर्म; धृतिः --धैर्य; मतिः --बुद्द्धि; ही: --लज्जा;श्री:--ऐश्वर्य; तेज:--बल; स्मृतिः--स्मरण शक्ति; सत्यम्ू--सत्य; यस्य--जिसकी कामेच्छाएँ; नश्यन्ति--विनष्ट हो जाती हैं;जन्मना--जन्म से ही।
हे भगवान्, जन्म काल से ही कामेच्छाओं के कारण मनुष्य की इन्द्रियों के कार्य, मन,जीवन, शरीर, धर्म, थैर्य, बुद्धि, लज्जा, ऐश्वर्य, बल, स्मृति तथा सत्यनिष्ठा समाप्त हो जाते हैं।
"
विमुज्ञति यदा कामान्मानवो मनसि स्थितान् ।
तहोंव पुण्डरीकाक्ष भगवत्त्वाय कल्पते ॥
९॥
विमुञ्नति--छोड़ देता है; यदा--जब भी; कामान्--समस्त भौतिक इच्छाओं को; मानवः--मानव समाज; मनसि--मन केभीतर; स्थितान्ू--स्थित; तहि--तभी; एब--निस्सन्देह; पुण्डकीक-अक्ष--हे कमलनयन भगवान्; भगवत्त्वाय--भगवान् केसमान ही ऐश्वर्यवान होने का; कल्पते--पात्र बनता है।
हे प्रभु, जब मनुष्य अपने मन से सारी भौतिक इच्छाएँ निकालने में सक्षम हो जाता है, तोवह आपके ही समान सम्पत्ति तथा ऐश्वर्य का पात्र बन जाता है।
"
» नमो भगवते तुभ्यं पुरुषाय महात्मने ।
हरयेद्धुतसिंहाय ब्रह्मणे परमात्मने ॥
१०॥
४७--हे भगवान्; नमः --मैं नमस्कार करता हूँ; भगवते--परम पुरुष को; तुभ्यम्--तुम्हें; पुरुषाय--परम पुरुष को; महा-आत्मने--परमात्मा को; हरये--भक्तों के समस्त दुखों को हरने वाले भगवान् को; अद्भुत-सिंहाय--आपके अद्भुत सिंह रूपनृसिंहदेव को; ब्रह्मणे -- परब्रह्म को; परम-आत्मने--परमात्मा को |
हे षड्ऐश्वर्यवान् प्रभु, हे परम पुरुष, हे परमात्मा, हे समस्त दुखों के विनाशक, हे अद्भुतनृसिंह रूप में परम पुरुष, मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।
"
श्रीभगवानुवाचनैकान्तिनो मे मयि जात्विहाशिषआशासतेअमुत्र च ये भवद्विधा: ।
तथापि मन्वन्तरमेतदत्रदैत्येश्वराणामनुभुड्छ््व भोगान् ॥
११॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; न--नहीं; एकान्तिन: --अनन्य भक्ति के अतिरिक्त और किसी इच्छा से विहीन; मे--मुझसे; मयि-- मुझमें ; जातु-- किसी समय; इह--इस संसार में; आशिष: --वरदान; आशासते--आन्तरिक इच्छा; अमुत्र--अगले जीवन में; च--तथा; ये--जो भक्त; भवत्-विधा:--आपकी तरह; तथापि--फिर भी; मन्वन्तरम्--एक मनु की आयुतक; एतत्-- यह; अत्र--इस संसार में; दैत्य-ई श्वरराणाम्ू-- भौतिकतावादी मनुष्यों के ऐश्वर्यों का; अनुभुड्क्व-- भोग कर सकतेहो; भोगान्ू--सभी भौतिक ऐश्वर्यों को
भगवान् ने कहा : हे प्रिय प्रह्माद, तुम जैसा भक्त न तो इस जीवन में, न ही अगले जीवन मेंकिसी प्रकार के भौतिक ऐश्वर्य की कामना करता है।
तो भी मैं तुम्हें आदेश देता हूँ कि तुम इसमन्वन्तर तक असुरों के राजा के रूप में इस भौतिक जगत में उनके ऐश्वर्य का भोग करो।
"
कथा मदीया जुषमाण: प्रियास्त्व-मावेश्य मामात्मनि सन्तमेकम् ।
सर्वेषु भूतेष्वधियज्ञमीशंयजस्व योगेन च कर्म हिन्बन् ॥
१२॥
कथा: --सन्देश या उपदेश; मदीया: --मेरे द्वारा प्रदत्त; जुषमाण:--सदैव सुनकर या विचार करके; प्रिया:--अत्यन्त प्रिय;त्वम्--तुम; आवेश्य--पूर्णतया लीन होकर; माम्--मुझको; आत्मनि--अपने हृदय में; सनन््तम्--विद्यमान रहकर; एकम्--एक ( वही परमात्मा ); सर्वेषु--समस्त; भूतेषु--जीवों में; अधियज्ञम्--समस्त कर्मकाण्डों के भोक्ता; ईशम्--परमे श्वर को;यजस्व--पूजो; योगेन--भक्ति योग द्वारा; च-- भी; कर्म--सकाम कर्म; हिन्वनू--त्यागकर।
भले ही तुम इस भौतिक जगत में ही क्यों न रहो, लेकिन तुम्हें निरन्तर मेरे उपदेशों तथावचनों को सुनना चाहिए और मेरे ही विचार में लीन रहना चाहिए, क्योंकि मैं हर एक के हृदयमें परमात्मा रूप में निवास करता हूँ।
अतएवं तुम सकाम कर्मों का परित्याग करके मेरी पूजाकरो।
"
भोगेन पुण्यं कुशलेन पाप॑ंकलेवर कालजवेन हित्वा ।
कीर्ति विशुद्धां सुरलोकगीतांविताय मामेष्यसि मुक्तबन्ध: ॥
१३॥
भोगेन--भौतिक सुख की अनुभूतियों से; पुण्यम्--पुण्य कर्म या उनके काम; कुशलेन--पवित्रतापूर्वक कर्म करके ( समस्तपवित्र कर्मों में भक्ति सर्वश्रेष्ठ है ); पापम्--अपवित्र कार्यों के सभी प्रकार के फल; कलेवरम्--शरीर; काल-जवेन--शक्तिशाली काल द्वारा; हित्वा--त्याग कर; कीर्तिम्ू--कीर्ति, ख्याति; विशुद्धाम्-दिव्य या पूर्णतया शुद्ध; सुर-लोक-गीताम्--स्वर्ग में भी प्रशंसित; विताय--सारे ब्रह्माण्ड में विस्तार करके; माम्--मुझ तक; एष्यसि--वापस आओगे; मुक्त-बन्ध:--बन्धन से मुक्त होकर
हे प्रहाद, इस भौतिक जगत में रहते हुए तुम सुख का अनुभव करके अपने पुण्यकर्म से सारेफलों को समाप्त कर सकोगे और पुण्यकर्म करके पापकर्मों को विनष्ट कर दोगे।
शक्तिशालीकाल के कारण तुम अपना शरीर-त्याग करोगे, किन्तु तुम्हारे कार्यों की ख्याति का गुणगानस्वर्गलोक तक में होगा।
तुम बन्धनों से मुक्त होकर भगवद्धाम को लौट सकोगे।
"
य एतत्कीर्तयेन्मह् त्ववा गीतमिदं नरः ।
त्वां च मां च स्मरन््काले कर्मबन्धात्प्रमुच्यते ॥
१४॥
यः--जो कोई; एतत्--यह कार्य ; कीर्तयेत्ू--कीर्तन करता है; महामम्--मुझको; त्वया-- तुम्हारे द्वारा; गीतम्--प्रार्थना की गई;इदम्--यह; नरः--मनुष्य; त्वामू--तुमको; च-- भी; माम् च--मुझको भी; स्मरन्--स्मरण करते हुए; काले--कालान्तर में;कर्म-बन्धातू-कर्म के बन्धन से; प्रमुच्यते--छूट जाता है।
जो व्यक्ति तुम्हारे तथा मेरे कार्यो का सदैव स्मरण करता है और तुम्हारे द्वारा की गईप्रार्थनाओं का कीर्तन करता है, वह कालान्तर में भौतिक कर्म-फलों से मुक्त हो जाता है।
"
श्रीप्रह्दाद उवाचवर वरय एतत्ते वरदेशान्महेश्वर ।
यदनिन्दत्पिता मे त्वामदिद्वांस्तेज ऐश्वरम्ू ॥
१५॥
विद्धामर्षाशयः साक्षात्सर्वलोकगुरुं प्रभुम् ।
भ्रातृहेति मृषाहृष्टिस्त्वद्धक्ते मयि चाघवान् ॥
१६॥
तस्मात्पिता मे पूयेत दुरन्ताहुस्तरादघात् ।
पूतस्तेपाड्रसंदृष्टस्तदा कृपणवत्सल ॥
१७॥
श्री-प्रह्माद: उवाच--प्रह्माद महाराज ने कहा; वरम्--आशीर्वाद; वरये--माँगता हूँ; एतत्--यह; ते-- आपसे; वरद-ईशात्--जोब्रह्मा तथा शिव देवताओं को भी वर प्रदान करते हैं ऐसे ईश्वर से; महा-ईश्वर--हे परमेश्वर; यत्--उस; अनिन्दत्--निन््दा की;पिता--पिता ने; मे--मेरे; त्वामू--आपकी; अविद्वानू--ज्ञान-विहीन; तेज:--बल; ऐश्वरम्-- श्रेष्ठठा; विद्ध--दूषित होकर;अमर्ष--क्रोध में; आशय: --हृदय के भीतर; साक्षात्- प्रत्यक्ष; सर्व-लोक-गुरुम्--समस्त जीवों के परम गुरु को; प्रभुम्--परम स्वामी को; भ्रातृ-ह--उसके भाई की हत्या करने वाला; इति--इस प्रकार; मृषा-दृष्टि:--मिथ्या बोध के कारण ईर्ष्यालु;त्वतू-भक्ते--आपके भक्त; मयि--मुझमें; च--तथा; अघ-वान्--घोर पाप करने वाला; तस्मात्--उससे; पिता--पिता; मे--मेरा; पूयेत--शुद्ध हो जावे; दुरन््तातू--महान्; दुस्तरात्ू--दुस्तर; अघात्--समस्त पापकर्मों से; पूत:--पवित्र हुआ ( यद्यपि वहथा ); ते--तुम्हारी; अपाड्ु--चितवन से; संदृष्ट: --देखा जाकर; तदा--उस समय; कृपण-बत्सल--हे भौतिकतावादी परदयालु।
प्रह्माद महाराज ने कहा : हे परमेश्वर, चूँकि आप पतितात्माओं पर इतने दयालु हैं अतएव मैंआपसे एक ही वर माँगता हूँ।
मैं जानता हूँ कि आपने मेरे पिता की मृत्यु के समय अपनीकृपादृष्टि डालकर उन्हें पवित्र बना दिया था, किन्तु वे आपकी शक्ति तथा श्रेष्ठता से अनजान होनेके कारण आप पर मिथ्या ही यह सोचकर क्रुद्ध थे कि आप उनके भाई को मारने वाले हैं।
इसतरह उन्होंने समस्त जीवों के गुरु आपकी प्रत्यक्ष निन्दा की थी और आपको भक्त अर्थात् मेरेऊपर जघन्य पातक किये थे।
मेरी इच्छा है कि उन्हें इन पापों के लिए क्षमा कर दिया जाये।
"
श्रीभगवानुवाचत्रिःसप्तभिः पिता पूतः पितृभिः सह तेडनघ ।
यत्साधोस्य कुले जातो भवान्वै कुलपावन: ॥
१८॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; त्रिः-सप्तभि:--सात गुणित तीन अर्थात् इक्कीस; पिता--पिता; पूतः--पतवित्र;पितृभि:--तुम्हारे पुरखों सहित; सह--सभी एकसाथ; ते--तुम्हारा; अनघ-हे निष्पाप व्यक्ति ( प्रहाद महाराज ); यत्--चूँकि;साधो--हे परम साधु पुरुष; अस्य--इस व्यक्ति के; कुले--वंश में; जात:--जन्म लिया; भवानू--तुमने; वै--निस्सन्देह; कुल-पावन:--पूरे वंश को पवित्र करनेवाले।
भगवान् ने कहा : हे परम पवित्र, साधु पुरुष, तुम्हारे पिता तुम्हारे परिवार के इक्कीस पुरखोंसहित पवित्र कर दिये गये हैं।
चूँकि तुम इस परिवार में उत्पन्न हुए थे, अतएवं सारा कुल पवित्रहो गया।
"
यत्र यत्र च मद्धक्ता: प्रशान्ता: समदर्शिनः ॥
साधव: समुदाचारास्ते पूयन्तेषपि कीकटा: ॥
१९॥
यत्र यत्र--जहाँ-जहाँ; च-- भी; मत्-भक्ता: --मेरे भक्त; प्रशान्ता:--अत्यन्त शान्त; सम-दर्शिन:--सबों को समभाव से देखनेवाले; साधव:--समस्त सदगुणों से युक्त; समुदाचारा:--समान रूप से उदार; ते--वे सभी; पूयन्ते--पतवित्र हो जाते हैं; अपि--भी; कीकटा:--पतित देश या उसके वासी |
जहाँ कहीं भी सदाचारी तथा सद्गुणसम्पन्न, शान्त एवं समदर्शी भक्त होते हैं वह देश तथापरिवार भले ही गर्हित क्यों न हो, पवित्र हो जाते हैं।
"
सर्वात्मना न हिंसन्ति भूतग्रामेषु किज्न ।
उच्चावचेषु दैत्येन्द्र मद्भावविगतस्पृहा: ॥
२०॥
सर्व-आत्मना--सभी प्रकार से, यहाँ तक कि क्रोध तथा ईर्ष्या से युक्त; न--कभी नहीं; हिंसन्ति--ईर्ष्या करते हैं; भूत-ग्रामेषु--समस्त योनियों में; किज्लन--इनमें से किसी के प्रति; उच्च-अवचेषु--ऊँच-नीच जीवों में; दैत्य-इन्द्र--हे दैत्यों के राजा, प्रह्मद;मत्-भाव--मेरी भक्ति के कारण; विगत--त्यागा हुआ; स्पृहा:--क्रोध तथा लालच के सभी गुण।
हे दैत्यराज प्रह्मद, मेरी भक्ति में अनुरक्त रहने के कारण मेरा भक्त उच्च तथा निम्न जीवों मेंभेद-भाव नहीं बरतता।
सभी तरह से वह किसी से ईर्ष्या नहीं करता।
"
भवन्ति पुरुषा लोके मद्धक्तास्त्वामनुव्रता: ।
भवान्मे खलु भक्तानां सर्वेषां प्रतिरूपधृकू ॥
२१॥
भवन्ति--हो जाते हैं; पुरुषा:--मनुष्य; लोके--इस संसार में; मत्-भक्ता:--मेरे शुद्ध भक्त; त्वाम्--तुमको; अनुव्रता: --अनुसरण करते हुए; भवान्--तुम; मे--मेरा; खलु--निस्सन्देह; भक्तानाम्ू--समस्त भक्तों का; सर्वेषाम्--विभिन्न रसों में;प्रतिरूप-धूक्ू--यथार्थ आदर्श |
जो तुम्हारे आदर्श का अनुसरण करेंगे वे स्वभावत:ः मेरे शुद्ध भक्त हो जाएँगे।
तुम मेरे भक्तका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हो और अन्य लोग तुम्हारे पदचिन्हों का अनुसरण करेंगे।
"
कुरु त्व॑ प्रेतकृत्यानि पितु: पूतस्य सर्वशः ।
मदड़स्पर्शनेनाड़ लोकान्यास्यति सुप्रजा: ॥
२२॥
कुरू--सम्पन्न करो; त्वमू--तुम; प्रेत-कृत्यानि-- मृत्यु के बाद के क्रिया-कर्म; पितु:--अपने पिता के; पूतस्य--पहले ही शुद्धहुए; सर्वश:--सभी प्रकार से; मत्-अड्ु--मेरा शरीर; स्पर्शनेन--स्पर्श करने से; अड्र--हे बालक; लोकान्--लोकों को;यास्यति--जाएगा; सु-प्रजा:--भक्त-नागरिक बनने के लिए।
मेरे बालक, तुम्हारा पिता अपनी मृत्यु के समय मेरे शरीर के स्पर्श मात्र से पहले ही पवित्र होचुका है।
तो भी पुत्र का कर्तव्य है कि वह अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् श्राद्ध-क्रिया सम्पन्नकरे जिससे उसका पिता ऐसे लोक को जा सके जहाँ वह अच्छा नागरिक तथा भक्त बन सके।
"
पित्रयं च स्थानमातिष्ठ यथोक्तं ब्रह्मवादिभि: ।
मय्यावेश्य मनस्तात कुरु कर्माणि मत्पर: ॥
२३॥
पिन्यम्ू--पैतृक; च-- भी; स्थानम्--स्थान पर, सिंहासन पर; आतिष्ठ--बैठो; यथा-उक्तम्--जैसा कहा गया है;ब्रह्मवादिभि:--वैदिक सभ्यता के पालनकर्ताओं द्वारा; मयि--मुझमें; आवेश्य-- पूर्णतया लीन करके; मन:--मन को; तात--हे मेरे बालक; कुरू--सम्पन्न करो; कर्माणि--वैधानिक कार्य; मत्-परः--मेरे कार्य के लिए
अन्त्येष्टि क्रिया सम्पन्न करने के बाद तुम अपने पिता के साम्राज्य का भार सँभालो।
तुमसिंहासन पर बैठो और भौतिक कार्यकलापों से तनिक भी विचलित मत होओ।
तुम अपना मनमुझ पर स्थिर रखो।
तुम शिष्टाचार के रूप में वेदों के आदेशों का उल्लंघन किये बिना अपनाविहित कार्य कर सकते हो।
"
श्रीनारद उवाचप्रह्मदोडपि तथा चक्रे पितुर्यत्साम्परायिकम् ।
यथाह भगवात्राजन्नभिषिक्तो द्विजातिभि: ॥
२४॥
श्री-नारदः उवाच--नारद मुनि ने कहा; प्रह्मद:ः --प्रहाद महाराज; अपि-- भी; तथा--उस तरह से; चक्रे --सम्पन्न किया;पितुः--अपने पिता का; यत्--जो कुछ; साम्परायिकम्--मृत्यु के पश्चात् किये जाने वाले कर्मकाण्ड; यथा--जिस तरह;आह--आज्ञा दी; भगवान्-- भगवान्; राजनू--हे राजा युधिष्टिर; अभिषिक्त:--सिंहासन पर बैठाया गया; द्वि-जातिभि:--उपस्थित ब्राह्मणों द्वारा |
श्री नारद मुनि ने आगे कहा : भगवान् की आज्ञानुसार प्रह्माद महाराज ने अपने पिता कीअन्त्येष्टि क्रिया सम्पन्न की।
हे राजा युधिष्ठटिर, तब उसे हिरण्यकशिपु के राजसिंहासन पर ब्राह्मणोंके निर्देशानुसार बैठाया गया।
"
प्रसादसुमुखं दृष्ठा ब्रह्मा नरहरिं हरिम् ।
स्तुत्वा वाग्भि: पवित्राभि: प्राह देवादिभि्वृतः ॥
२५॥
प्रसाद-सुमुखम्-- भगवान् के प्रसन्न होने से जिसका मुख तेजोमय था; दृष्टा--यह दशा देखकर; ब्रह्मा--ब्रह्माजी; नर-हरिम्--नृसिंहदेव को; हरिम्-- भगवान्; स्तुत्वा--प्रार्थना करके; वाग्भि:--दिव्य शब्दों से; पवित्राभि:--पवित्र; प्राह-- बोले; देव-आदिभि: --अन्य देवताओं से; वृत:--घिरे हुए
अन्य देवताओं से घिरे हुए ब्रह्मजी का मुखमण्डल चमक रहा था क्योंकि भगवान प्रसन्नथे।
अतएव उन्होंने दिव्य शब्दों से भगवान् की प्रार्थना की।
"
श्रीब्रह्मोवाचदेवदेवाखिलाध्यक्ष भूतभावन पूर्वज ।
दिष्टया ते निहतः पापो लोकसन्तापनोउसुर: ॥
२६॥
श्री-ब्रह्म उवाच--ब्रह्माजी ने कहा; देव-देव--हे समस्त देवताओं के स्वामी; अखिल-अध्यक्ष--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी;भूत-भावन--हे समस्त जीवों के कारण; पूर्व-ज--हे आदि पुरुष; दिष्ठयया-- अपने उदाहरण से या हमारे सौभाग्य से; ते--तुम्हारेद्वारा; निहतः--मारा गया; पाप:--अत्यन्त पापी; लोक-सन्तापन:--समग्र ब्रह्माण्ड को दुख देने वाला; असुरः--हिरण्यकशिपुनामक असुर।
ब्रह्माजी ने कहा : हे देवताओं के परम स्वामी, हे समग्र ब्रह्माण्ड के अध्यक्ष, हे समस्त जीवोंके वरदाता, हे आदि पुरुष, यह हमारा सौभाग्य है कि आपने इस पापी असुर को मार डाला जोसमग्र ब्रह्माण्ड को दुख देने वाला था।
"
योउसौ लब्धवरो मत्तो न वध्यो मम सृष्टिभि: ।
तपोयोगबलोन्नद्धः समस्तनिगमानहन् ॥
२७॥
यः--जो व्यक्ति; असौ--वह ( हिरण्यकशिपु ); लब्ध-वर:--असामान्य वर प्रदान किये जाने पर; मत्त:--मुझसे; न वध्य:--नमारा जा सकने वाला; मम सृष्टिभि:--मेरे द्वारा उत्पन्न किसी भी जीव द्वारा; तप:-योग-बल--तपस्या, योग तथा बलद्वारा;उन्नद्ध:ः--इस प्रकार से अत्यन्त गर्वित; समस्त--सारे; निगमान्ू--वैदिक आदेशों को; अहनू--न मानते हुए, उल्लंघन करके |
इस असुर हिरण्यकशिपु ने मुझसे यह वरदान प्राप्त किया था कि वह मेरी सृष्टि में किसी भीजीव के द्वारा मारा नहीं जाएगा।
इस आश्वासन के कारण तथा तपस्या और योग से प्राप्त बलद्वारा वह अत्यन्त गर्वित हो उठा और समस्त वैदिक आदेशों का उल्लंघन करने लगा।
"
दिष्टय्या तत्तनय: साधुर्महाभागवतोर्भकः ।
त्वया विमोचितो मृत्योर्दिष्ठय्या त्वां समितोधुना ॥
२८॥
दिछ्टयया-- भाग्य से; तत्-तनय:--उसका पुत्र; साधु: --साधु पुरुष; महा-भागवत:ः --महान् भक्त; अर्भक:--बालक होते हुए;त्वया--आपके द्वारा; विमोचित:--मुक्त किया हुआ; मृत्यो: --मृत्यु के बन्धन से; दिछ्टयया -- भाग्य से; त्वाम् समितः --पूर्णतःआपकी शरण में; अधुना--इस समय |
सौभाग्य से हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रहाद अब मृत्यु से बचा लिया गया है और यद्यपि वहअभी बालक है, किन्तु है महाभागवत, अब वह पूर्णतया आपके चरणकमलों की शरण में है।
"
एतद्वपुस्ते भगवन्ध्यायत: परमात्मन: ।
सर्वतो गोप्तृ सन्त्रासान्मृत्योरपि जिघांसतः ॥
२९॥
एतत्--यह; वपु:--शरीर; ते--तुम्हारा; भगवन्--हे भगवान्; ध्यायत:--जो ध्यान करते हैं; परम-आत्मन:--परम पुरुष का;सर्वतः--सभी जगह से; गोप्तृ--रक्षक; सन्त्रासातू--सभी प्रकार के भय से; मृत्यो: अपि--यहाँ तक कि मृत्यु भय से भी;जिघांसतः --यदि शत्रु भी ईर्ष्या करे।
हे भगवान्, हे पूर्ण पुरुषोत्तम परमेश्वर! आप परमात्मा हैं।
यदि कोई आपके दिव्य शरीर काध्यान करता है, आप सभी प्रकार के भय से, यहाँ तक कि आसतन्न मृत्यु-भय से भी, उसकी रक्षाकरते हैं।
"
श्रीभगवानुवाचमैवं विभोउ्सुराणां ते प्रदेयः पद्मसम्भव ।
बरः क्रूरनिसर्गाणामहीनाममृतं यथा ॥
३०॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने ( ब्रह्मा को ) उत्तर दिया; मा--मत; एवम्--इस प्रकार; विभो--हे महापुरुष; असुराणाम्ू--असुरों के; ते--तुम्हारे द्वारा; प्रदेयः --दिया हुआ वर; पढ्य-सम्भव--हे कमल पुष्प से उत्पन्न ब्रह्माजी; वर: --वरदान; क्रूर-निसर्गाणाम्--जो व्यक्ति प्रकृति से अत्यन्त क्रूर तथा ईर्ष्यालु होते हैं; अहीनाम्ू--साँपों को; अमृतम्--अमृत या दूध; यथा--जिस प्रकार
भगवान् ने उत्तर दिया: हे ब्रह्मा, हे कमल पुष्प से उत्पन्न महानूप्रभु, जिस प्रकार साँप को दूधपिलाना घातक होता है उसी तरह असुरों को वर प्रदान करना घातक होता है, क्योंकि वे प्रकृतिसे क्रूर तथा ईर्ष्यालु होते हैं।
मैं तुम्हें सचेत करता हूँ कि तुम फिर से किभी किसी असुर को ऐसाबर मत प्रदान करना।
"
श्रीनारद उवाचइत्युक्त्वा भगवात्राजंस्ततश्चान्तर्दधे हरि: ।
अदृश्य: सर्वभूतानां पूजितः परमेष्ठिना ॥
३१॥
श्री-नारद: उबाच--नारद मुनि ने कहा; इति उक्त्वा--ऐसा कहकर; भगवानू-- भगवान्; राजन्--हे राजा युथिष्ठटिर; ततः--उसस्थान से; च-- भी; अन्तर्दधे--अन्तर्धान हो गये; हरि: -- भगवान् हरि; अदृश्य: --अदृश्य; सर्व-भूतानाम्--समस्त जीवों केद्वारा; पूजित:--पूजे जाकर; परमेष्ठटिना--ब्रह्मा द्वारा |
नारद मुनि ने आगे कहा : हे राजा युधिष्ठिर, ब्रह्मा को उपदेश देते हुए सामान्य व्यक्ति को नदिखने वाले भगवान् इस तरह बोले।
तब ब्रह्मा द्वारा पूजित होकर भगवान् उस स्थान से अहृश्यहो गये।
"
ततः सम्पूज्य शिरसा वबन्दे परमेष्ठिनम् ।
भवं प्रजापतीन्देवान्प्रहोदो भगवत्कला: ॥
३२॥
ततः--तत्पश्चात्; सम्पूज्य--पूजा करके; शिरसा--सिर झुका करके; ववन्दे--प्रार्थना की; परमेष्ठिनम्--ब्रह्मा को; भवम्--शिव को; प्रजापतीन्--प्रजापतियों को; देवान्--सारे बड़े-बड़े देवताओं को; प्रह्मद: --प्रह्ाद महाराज ने; भगवत्-कला: --भगवान् के अंश ।
तब प्रह्नाद महाराज ने भगवान् के अंश रूप समस्त देवताओं की यथा ब्रह्मा, शिव तथाप्रजापतियों की पूजा और स्तुति की।
"
ततः काव्यादिभि: सार्थ मुनिभि: कमलासन: ।
दैत्यानां दानवानां च प्रह्नदमकरोत्पतिम् ॥
३३॥
ततः--तत्पश्चात्; काव्य-आदिभि:--शुक्राचार्य तथा अन्यों के; सार्थम्--साथ; मुनिभि:--बड़े-बड़े सन्त पुरुषों के; कमल-आसनः--ब्रह्माजी; दैत्यानाम्ू--सारे असुरों का; दानवानाम्--सारे देवताओं का; च--तथा; प्रह्मदम्--प्रह्मद महाराज को;अकरोत्--बना दिया; पतिम्ू--राजा या स्वामी |
तत्पश्चात् शुक्राचार्य तथा अन्य बड़े-बड़े सन्त पुरुषों सहित कमलासीन ब्रह्माजी ने प्रहाद कोब्रह्माण्ड के सारे असुरों तथा दानवों का राजा बना दिया।
"
प्रतिनन्द्य ततो देवा: प्रयुज्य परमाशिष: ।
स्वधामानि ययू राजन्ब्रह्माद्या: प्रतिपूजिता: ॥
३४॥
प्रतिनन्द्य--बधाई देकर; ततः--तत्पश्चात्; देवा: --सारे देवता; प्रयुज्य--देकर; परम-आशिष:--शुभ आशीर्वाद; स्व-धामानि-- अपने-अपने धामों को; ययु:--लौट गये; राजनू--हे राजा युधिष्टिर; ब्रहा-आद्या:--ब्रह्मा आदि सारे देवता;प्रतिपूजिता:--( प्रह्द महाराज द्वारा ) भली-भाँति पूजित होकर।
हे राजा युधिष्टिर, प्रह्मद महाराज द्वारा भली-भाँति पूजित होकर ब्रह्मादि सारे देवताओं नेउन्हें अपने-अपने आशीर्वाद दिये और फिर अपने-अपने आवासों को वापस चले गये।
"
एवं च पार्षदौ विष्णो: पुत्रत्वं प्रापितौ दितेः ।
हृदि स्थितेन हरिणा वैरभावेन तौ हतौ ॥
३५॥
एवम्--इस तरह से; च--भी; पार्षदौ--दो निजी संगी; विष्णो: --विष्णु के ; पुत्रत्वम्-पुत्र बनकर; प्रापितौ--प्राप्त करके;दितेः--दिति के; हृदि--हृदय में; स्थितेन-- स्थित; हरिणा--पर मे श्वर द्वारा; वैर-भावेन--शत्रु मानकर; तौ--दोनों; हतौ--मारेगये।
इस प्रकार भगवान् विष्णु के दोनों पार्षद, जो दिति के पुत्र हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकशिपुबने थे, मार डाले गये।
भ्रमवश उन्होंने सोचा था कि हर एक के हृदय में निवास करने वालेपरमेश्वर उनके शत्रु हैं।
"
पुनश्च विप्रशापेन राक्षसौ तौ बभूवतु: ।
कुम्भकर्णदशग्रीवौ हतौ तौ रामविक्रमै: ॥
३६॥
पुनः--फिर; च--भी; विप्र-शापेन--ब्राह्मण द्वारा शापित होकर; राक्षसौ--दो राक्षस; तौ--वे दोनों; बभूवतु:--अवतरित हुए;कुम्भकर्ण-दश-ग्रीवौ--कुम्भकर्ण तथा दशशीश रावण के नाम से विख्यात; हतौ--वे भी मार डाले गये; तौ--दोनों; राम-विक्रमैः-- भगवान् राम के अतुलित बल से
ब्राह्मणों द्वारा शापित होने से इन दोनों पार्षदों ने कुम्भकर्ण तथा दशग्रीव रावण के रूप मेंफिर से जन्म लिया।
ये दोनों राक्षस भगवान् रामचन्द्र के अतुलित पराक्रम द्वारा मारे गये।
"
शयानौ युधि निर्भिन्नहदयौ रामशायकै: ।
तच्चित्तौ जहतुर्देह यथा प्राक्तनजन्मनि ॥
३७॥
शयानौ--लेटे हुए; युधि--युद्धस्थल में; निर्भिन्न--बींधे जाकर; हृदयौ--हृदय में; राम-शायकै:--रामचन्द्र के बाणों से; तत्ू-चित्तौ-- भगवान् राम के विषय में सोचते हुए; जहतु:--त्याग दिया; देहम्--शरीर; यथा--जिस प्रकार; प्राक्तन-जन्मनि--पूर्वजन्मों में
भगवान् रामचन्द्र के बाणों से बिंध कर कुम्भकर्ण तथा रावण दोनों ही युद्धभूमि में पड़े रहेऔर भगवान् के विचार में लीन होकर उसी तरह अपने अपने शरीर छोड़ दिये जिस तरह अपनेपूर्व-जन्म में हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकशिपु के रूप में किया था।
"
ताविहाथ पुनर्जाता शिशुपालकरूषजौ ।
हरौ वैरानुबन्धेन पश्यतस्ते समीयतु: ॥
३८ ॥
तौ--दोनों; इह--इस मानव समाज में; अथ--इस प्रकार; पुन:--फिर; जातौ--जन्म लिया; शिशुपाल--शिशुपाल; करूष-जौ--दन्तवक्र; हरौ-- भगवान् में; वैर-अनुबन्धेन-- भगवान् को शत्रु मानने के बन्धन द्वारा; पश्यतः--देखते हुए; ते--तुम्हारे;समीयतु:-- भगवान् के चरणकमलों में लीन हो गये या चले गये।
उन्होंने फिर से मानव समाज में शिशुपाल तथा दन्तवक्र के रूप में जन्म लिया और भगवान्से वैसा ही वैर-भाव बनाये रखा।
ये वही थे, जो ही तुम्हारे समक्ष भगवान् के शरीर में लीन होगये।
"
एनः पूर्वकृतं यत्तद्राजान: कृष्णवैरिण: ।
जहुस्तेन्ते तदात्मानः: कीट: पेशस्कृतो यथा ॥
३९॥
एन:--यह पापकर्म ( भगवान् की निन्दा का ); पूर्व-कृतम्--पूर्व जन्म में किया गया; यत्--जो; तत्--वह; राजान:--राजागण; कृष्ण-वैरिण:--सदैव कृष्ण के शत्रु बने रहने वाले; जहुः--त्याग दिया; ते--वे सभी; अन्ते--मृत्यु के समय; तत्ू-आत्मान:--वही आध्यात्मिक स्वरूप प्राप्त करके; कीट: --कीड़ा; पेशस्कृत:--काली भृड़ी द्वारा ( पकड़ा गया ); यथा--जिसतरह
न केवल शिशुपाल तथा दन्तवक्र अपितु अन्य अनेकानेक राजा जो कृष्ण के शत्रु बने हुएथे अपनी मृत्यु के समय मोक्ष को प्राप्त हुए।
चूँकि वे भगवान् के विषय में सोचते थे, अतः उन्हेंभगवान्-जैसा आध्यात्मिक स्वरूप प्राप्त हुआ जिस तरह भूंगी द्वारा पकड़ा गया कीड़ा भृंगी काशरीर प्राप्त कर लेता है।
"
यथा यथा भगवतो भक्त्या परमयाभिदा ।
नृपाश्चैद्यादयः सात्म्यं हरेस्तच्चिन्तया ययु: ॥
४०॥
यथा यथा--जिस जिस तरह; भगवतः -- भगवान् की; भक्त्या-- भक्ति से; परमया--परम; अभिदा--ऐसे कार्यकलापों कासतत चिन्तन करते हुए; नृपा:--राजा; चैद्य-आदय:--शिशुपाल, दन्तवक्र आदि; सात्म्यम्--वही रूप; हरेः-- भगवान् का;तत्-चिन्तया--निरन्तर उनका चिन्तन करने से; ययु:--भगवद्धाम वापस गये।
जो शुद्ध भक्त भक्ति के द्वारा भगवान् का निरन्तर चिन्तन करते रहते हैं, वे उन्हीं जैसा शरीरप्राप्त करते हैं।
यह सारूप्य मुक्ति कहलाती है।
यद्यपि शिशुपाल, दन्तवक्र तथा अन्य राजा कृष्णका अपने शत्रु के रूप में चिंतन करते थे, किन्तु उन्हें भी वैसा ही फल प्राप्त हुआ।
"
आख्यातं सर्वमेतत्ते यन्मां त्वं परिपृष्टवान् ।
दमघोषसुतादीनां हरे: सात्म्यमपि द्विषाम् ॥
४१॥
आख्यातम्--वर्णन किया गया; सर्वम्--सब कुछ; एतत्--यह; ते-- तुमसे; यत्--जो भी; माम्--मुझसे; त्वम्--तुमने;परिषृष्टवान्-- पूछा; दमघोष-सुत-आदीनाम्--दमघोष के पुत्र ( शिशुपाल ) तथा अन्यों का; हरेः-- भगवान् का; सात्म्यम्--समान स्वरूप से; अपि-- भी; द्विषाम्--यद्यपि वे शत्रु थे।
तुमने मुझसे पूछा था कि किस तरह शिशुपाल तथा अन्यों ने भगवान् का शत्रु होते हुए भीमोक्ष प्राप्त किया सो वह सब कुछ मैंने तुम्हे बतला दिया है।
"
एषा ब्रह्मण्यदेवस्थ कृष्णस्थ च महात्मन: ।
अवतारकथा पुण्या वधो यत्रादिदैत्ययो: ॥
४२॥
एषा--यह सब; ब्रह्मण्य-देवस्थ-- भगवान् का, जो समस्त ब्राह्मणों द्वारा पूजित हैं; कृष्णस्य--आदि भगवान् कृष्ण का; च--भी; महा-आत्मन:--परमात्मा; अवतार-कथा--उनके अवतार की कथाएँ; पुण्या--पवित्र, शुद्ध करने वाली; वध:--माराजाना, वध; यत्र--जिसमें; आदि-- प्रारम्भिक कल्प में; दैत्ययो: --दोनों असुरों ( हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकशिपु ) का।
भगवान् कृष्ण सम्बन्धी इस कथा में भगवान् के विभिन्न अवतार वर्णन किए गये हैं।
साथही इसमें हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकशिपु नामक दो असुरों के वध का भी वर्णन किया गया है।
"
प्रह्मदस्यानुचरितं महाभागवतस्य च ।
भक्तिज्ञान विरक्तिश्च याथार्थ्य चास्य वै हरे: ॥
४३॥
सर्गस्थित्यप्ययेशस्य गुणकर्मानुवर्णनम् ।
परावरेषां स्थानानां कालेन व्यत्ययो महान् ॥
४४॥
प्रह्मादस्य-- प्रह्दाद महाराज की; अनुचरितम्--विशेषताएँ ( पढ़कर या कार्यकलापों का वर्णन करके समझी गई ); महा-भागवतस्य--महान् भक्त की; च--भी; भक्ति:-- भगवान् की भक्ति; ज्ञानमू--आध्यात्म का पूर्णज्ञान ( ब्रह्म, परमात्मा तथाभगवान् ); विरक्ति:-- भौतिक संसार से वैराग्य; च--भी; याथार्थ्यम्--उन्हें सही सही समझने के लिए; च--तथा; अस्य--इसका; वै--निस्सन्देह; हरेः--सदैव भगवान् के सन्दर्भ में; सर्ग--सृजन; स्थिति--पालन; अप्यय--तथा संहार का; ईशस्य--स्वामी ( भगवान् ) का; गुण--दिव्य गुण तथा ऐश्वर्य; कर्म--तथा कार्यकलापों का; अनुवर्णनम्--परम्परा के भीतर वर्णन(अनु का अर्थ है 'पश्चात्'।
अधिकारी व्यक्ति पूर्व आचार्यों का पालन करते हैं, वे कोई नई चीज नहीं बनाते ); पर-अवरेषाम्--देवता तथा असुर नामक विभिन्न प्रकार के जीवों का; स्थानानाम्--विभिन्न लोकों या रहने के स्थानों का; कालेन--समय आनेपर; व्यत्यय:--हर वस्तु का संहार; महान्ू--यद्यपि महान्।
यह कथा महाभागवत प्रह्नाद महाराज के गुणों, उनकी हढ़ भक्ति, उनके पूर्ण ज्ञान तथाभौतिक कल्मष से पूर्ण विरक्ति को बताती है।
यह सृजन, पालन तथा संहार के कारणस्वरूपभगवान् का भी वर्णन करती है।
प्रहाद महाराज ने अपनी स्तुतियों में भगवान् के दिव्य गुणों केसाथ ही यह भी बताया कि किस तरह देवताओं तथा असुरों के आवास भगवान् के निर्देश मात्रसे ध्वस्त हो जाते हैं चाहे वे भौतिक ऐश्वर्य से कितने ही भरे क्यों न हो।
"
धर्मो भागवतानां च भगवान्येन गम्यते ।
आख्यानेस्मिन्समाम्नातमाध्यात्मिकमशेषत: ॥
४५॥
धर्म:--धार्मिक सिद्धान्त; भागवतानाम्-- भक्तों का; च--तथा; भगवान्-- भगवान्; येन--जिससे; गम्यते--समझे जा सकतेहैं; आख्याने--कथा में; अस्मिनू--इस; समाम्नातम्--पूर्णतया वर्णित है; आध्यात्मिकम्--अध्यात्म; अशेषतः --किसी भेदभावके बिनाधर्म के जिन सिद्धान्तों से भगवान् को वास्तव में समझा जा सकता है, वह भागवत धर्मकहलाता है।
अतएव इस कथा में इन सिद्धान्तों का समावेश होने से वास्तविक अध्यात्म काभली-भाँति वर्णन हुआ है।
"
य एतत्पुण्यमाख्यानं विष्णोर्वी्योपबृंहितम् ।
कीर्तयेच्छुद्धया श्रुत्वा कर्मपाशैर्विमुच्यते ॥
४६॥
यः--जो कोई; एतत्--इस; पुण्यम्--पवित्र; आख्यानम्--कथा को; विष्णो: --भगवान् विष्णु की; वीर्य--परम शक्ति;उपबूंहितम्-के वर्णन से युक्त; कीर्तयेत्--कीर्तन करता या दुहराता है; श्रद्धया--अतीव श्रद्धापूर्वक; श्रुत्वा--उचित स्त्रोत सेसुन कर; कर्म-पाशै: --सकाम कर्मो के बन्धन से; विमुच्यते--छूट जाता है।
जो कोई भगवान् विष्णु की सर्वव्यापकता विषयक इस कथा को सुनता है और इसकाकीर्तन करता है, वह निश्चित रूप से भव-बन्धन से मुक्त हो जाता है।
"
एतद्य आदिपुरुषस्य मृगेन्धलीलांदैत्येन्द्रयूथपवर्ध प्रयतः पठेत ।
दैत्यात्मजस्य च सतां प्रवरस्य पुण्यश्रुत्वानुभावमकुतो भयमेति लोकम् ॥
४७॥
एतत्--यह कथा; यः--जो कोई; आदि-पुरुषस्य-- आदि भगवान् की; मृग-इन्द्र-लीलाम्--नरसिंह की लीलाओं को; दैत्य-इन्द्र--असुरों का राजा; यूथ-प--हाथी के समान बलिष्ठ; वधम्--वध; प्रयत:--ध्यानपूर्वक; पठेत--पढ़ता है; दैत्य-आत्म-जस्य--असुर॒पुत्र प्रहाद महाराज का; च-- भी; सताम्- श्रेष्ठ भक्तों में; प्रवरस्य-- श्रेष्ठठम; पुण्यम्--पतवित्र; श्रुत्वा--सुनकर;अनुभावम्--कार्यकलाप; अकुतः-भयम्--जहाँ किसी समय तथा कहीं भी कोई भय नहीं है; एति--पहुँचता है; लोकम्--आध्यात्मिक जगत में |
प्रहाद महाराज भक्तों में सर्वश्रेष्ठ थे।
जो कोई प्रह्माद महाराज के कार्यकलापों,हिरण्यकशिपु के वध तथा भगवान् नृसिंहदेव की लीलाओं से सम्बद्ध इस कथा को अत्यन्तमनोयोग से सुनता है, वह निश्चयपूर्वक आध्यात्मिक जगत में पहुँचता है जहाँ कोई चिन्ता नहींरहती है।
"
यूयं नूलोके बत भूरिभागालोकं पुनाना मुनयोउभियन्ति ।
येषां गृहानावसतीति साक्षाद्गूढं परं ब्रह्म मनुष्यलिड्रम् ॥
४८ ॥
यूयम्ू--तुम सभी ( पांडव ); नू-लोके--इस भौतिक जगत में; बत--फिर भी; भूरि-भागा: --अत्यन्त भाग्यशाली; लोकम्--सारे लोकों को; पुनाना:--पवित्र कर सकने वाले; मुनय:--बड़े-बड़े साधु पुरूष; अभियन्ति--सदैव देखने आते हैं; येषाम्--जिनके; गृहानू--घर में; आवसति--रहते हैं; इति--इस प्रकार; साक्षात्-- प्रत्यक्ष; गूढम्--परम गोपनीय; परम् ब्रह्म--परब्रह्म,परमेश्वर; मनुष्य-लिड्रमू--मनुष्य की भाँति प्रकट होकर।
नारद मुनि ने आगे कहा : हे महाराज युथ्रिष्ठिर, तुम सभी ( पाण्डव ) अत्यन्त भाग्यशाली हो,क्योंकि भगवान् कृष्ण तुम्हारे महल में सामान्य मनुष्य की भाँति निवास करते हैं।
बड़े-बड़े साधुपुरुष इसे भली-भाँति जानते हैं इसीलिए वे निरन्तर इस घर में आते रहते हैं।
"
सवा अयं ब्रह्म महद्विमृग्य-कैवल्यनिर्वाणसुखानुभूति: ।
प्रिय: सुहृद्द: खलु मातुलेयआत्माईणीयो विधिकृद्गुरुश्च ॥
४९॥
सः--वह ( भगवान् कृष्ण ); वा-- भी; अयम्--यह; ब्रह्म--निराकार ब्रह्म ( जो कृष्ण का तेज है ); महत्--महापुरुषों के द्वारा;विमृग्य--खोजा जाकर; कैवल्य--एकत्व; निर्वाण-सुख--दिव्य सुख का; अनुभूति:--व्यावहारिक अनुभव का स्त्रोत;प्रियः--अत्यधिक प्रिय; सुहृत्--शुभचिन्तक; वः--तुम्हारा; खलु--निस्सन्देह; मातुलेय: --मामा का पुत्र; आत्मा--शरीर तथा आत्मा के ही समान; अ्हणीय: --पूज्य ( भगवान् होने से ); विधि-कृतू--सन्देशवाहक की तरह ( फिर भी बह तुम्हारी सेवाकरता है ); गुरु:--तुम्हारा परम सलाहकार; च--भी |
निराकार ब्रह्म साक्षात् कृष्ण हैं, क्योंकि कृष्ण निराकार ब्रह्म के स्त्रोत हैं।
वे बड़े-बड़े साधुपुरुषों द्वारा तलाश किये जाने वाले दिव्य आनन्द के उत्स हैं फिर भी परम पुरुष तुम्हारे सर्वाधिकप्रिय मित्र तथा चिरन्तन सुहृद् हैं और तुम्हारे मामा के पुत्ररूप में तुमसे घनिष्ठतः सम्बन्धित हैं।
निस्सन्देह, वे सदैव तुम्हारे शरीर तथा आत्मा के सदृश हैं।
वे पूज्य हैं फिर भी वे तुम्हारे सेवक कीतरह और कभी-कभी तुम्हारे गुरु की तरह कार्य करते हैं।
"
न यस्य साक्षाद्धवपदाजादिभीरूप॑ धिया वस्तुतयोपवर्णितम् ।
मौनेन भक्त्योपशमेन पूजितःप्रसीदतामेष स सात्वतां पति: ॥
५०॥
न--नहीं; यस्य--जिसका; साक्षात्- प्रत्यक्ष; भव--शिवजी; पद्य-ज--ब्रह्म ( कमल से उत्पन्न ); आदिभि:--उनके तथाअन्यों के द्वारा भी; रूपमू--रूप; धिया--ध्यान के द्वारा भी; वस्तुतया--मूल रूप से; उपवर्णितम्--वर्णित तथा अनुभूत;मौनेन--समाधि या गहन ध्यान द्वारा; भक्त्या--भक्ति द्वारा; उपशमेन--त्याग द्वारा; पूजित:--पूजित; प्रसीदताम्--प्रसन्न हो;एष: --यह; सः--वह; सात्वताम्--महान् भक्तों का; पति: --स्वामी |
शिव तथा ब्रह्माजी जैसे महापुरुष भगवान् कृष्ण के सत्य का सही-सही वर्णन नहीं करपाये।
वे भगवान् हम पर प्रसन्न हों जो सदा समस्त भक्तों के रक्षक रूप में उन महान् सन्तों द्वारापूजे जाते हैं, जो मौन, ध्यान, भक्ति तथा त्याग का ब्रत लिए रहते हैं।
"
स एष भगवात्राजन्व्यतनोद्विहतं यश: ।
पुरा रुद्रस्य देवस्य मयेनानन्तमायिना ॥
५१॥
सः एष: भगवान्--वही भगवान् कृष्ण जो परकब्रह्म हैं; राजन्ू--हे राजा; व्यतनोत्--विस्तार किया; विहतम्--खोया; यशः--कीर्ति में; पुरा-- प्राचीन काल में; रुद्रस्य--शिवजी की ( जो देवताओं में सर्वाधिक शक्तिमान हैं ); देवस्य--देवता का;मयेन--मय नामक असुर द्वारा; अनन्त--असीम; मायिना--तकनीकी ज्ञान से युक्त
हे राजा युधिष्ठटिर, बहुत समय पहले तकनीकी ज्ञान में अत्यन्त कुशल मय नामक दानव नेशिवजी के यश्ञ में बड्ठा लगाया।
उस स्थिति में भगवान् कृष्ण ने शिवजी की रक्षा की थी।
"
राजोबाचकस्मिन्कर्मणि देवस्य मयोहझ्जगदीशितु: ।
यथा चोपचिता कीर्ति: कृष्णेनानेन कथ्यताम् ॥
५२॥
राजा उवाच--राजा ने कहा; कस्मिनू--किस कारण से; कर्मणि--किन कार्यों से; देवस्थ--महादेव ( शिव ) के; मय:--मयदानव; अहनू्--नष्ट करना चाहता था; जगत्-ईशितुः--शिव की, जो भौतिक शक्ति का नियंत्रण करते हैं और दुर्गा देवी के पतिहैं; यथा--जिस प्रकार; च--तथा; उपचिता--पुनः विस्तार किया; कीर्ति:--कीर्ति; कृष्णेन--कृष्ण द्वारा; अनेन--इस;कथ्यताम्ू--कृपया कह सुनायें |
महाराज युधिष्ठिर ने पूछा : मय दानव ने किस कारण से शिवजी की कीर्ति नष्ट की ?
कृष्णने किस तरह शिव जी की रक्षा की?
और किस तरह उनकी कीर्ति का पुनः विस्तार किया ?
कृपया इन घटनाओं को कह सुनायें।
"
श्रीनारद उवाचनिर्जिता असुरा देवैर्युध्यनेनोपबूंहितैः ।
मायिनां परमाचार्य मयं शरणमाययु: ॥
५३॥
श्री-नारदः उवाच-- श्री नारद मुनि ने कहा; निर्जिता:--हार कर; असुरा:ः--सारे असुर; देवै:--देवताओं से; युधि--लड़ाई में;अनेन--कृष्ण द्वारा; उपबृंहितैः--शक्ति बढ़ाकर; मायिनाम्--सारे असुरों की; परम-आचार्यम्--सर्वश्रेष्ठ तथा महानतम;मयम्--मय दानव की; शरणम्--शरण; आययु:--ग्रहण की
नारद मुनि ने कहा : जब परम देवताओं ने जो भगवान् कृष्ण की दया से सदा शक्तिशालीबने रहते हैं असुरों से युद्ध किया तो असुर हार गये, अतएव उन्होंने महानतम असुर मय दानव कीशरण ग्रहण की।
"
स निर्माय पुरस्तिस्त्रो हैमीरौप्यायसीर्विभु: ।
दुर्लक्ष्यापायसंयोगा दुर्वितर्क्यपरिच्छदा: ॥
५४॥
ताभिस्तेसुरसेनान्यो लोकांस्त्रीन्सेश्वरात्रप ।
स्मरन्तो नाशयां चक्रु: पूर्ववैरमलक्षिता: ॥
५५॥
सः--वह ( मय दानव ); निर्माय--निर्मित करके; पुरः--बड़े-बड़े आवास; तिस्त्र:ः--तीन; हैमी--स्वर्ण से बने; रौप्या--चाँदीसे बने; आयसी: --लोहे से बने; विभु:--अत्यधिक शक्तिशाली; दुर्लक्ष्य-- अकूत; अपाय-संयोगा:--आने-जाने कीगतिविधियाँ; दुर्वितर्क्य--असामान्य; परिच्छदा:--साज-सामग्री से युक्त; ताभि:ः--उन सबों ( विमान जैसे तीन आवासों ) केद्वारा; ते--वे; असुर-सेना-अन्य:-- असुरों के सेनानायक; लोकानू् त्रीन्ू--तीनों लोकों को; स-ई श्वरान्-- उनके प्रधान शासकोंसहित; नृप--हे राजा युधिष्टिर; स्मरन्तः--स्मरण करते हुए; नाशयाम् चक्रु:--विनाश करने लगा; पूर्व--पहले की; वैरम्--शत्रुता; अलक्षिता:-- अहृश्य रहकर;असुरों के महान् नायक
मय दानव ने तीन अदृश्य आवास तैयार किये और उन्हें असुरों कोसौंप दिया।
ये तीनों आवास सोने, चाँदी तथा लोहे के बने विमानों जैसे थे और उनमें अपूर्वसाज-सामग्री थी।
हे राजा युधिष्टिर, इन तीनों आवसों के कारण असुरों के सेनानायक देवताओं से अदृश्य हो गए थे।
इस अवसर का लाभ उठाकर तथा अपनी पूर्व शत्रुता का स्मरण करते हुएअसुरगण तीनों लोकों--ऊर्ध्व, मध्य तथा अधो लोकों--का विनाश करने लगे।
"
ततस्ते सेश्वरा लोका उपासाद्येश्वर नता: ।
त्राहि नस्तावकान्देव विनष्टांस्त्रिपुरलय: ॥
५६॥
ततः--तत्पश्चात्; ते--वे ( देवगण ); स-ईश्वराः--अपने शासकों समेत; लोका:--सारे लोक; उपासाद्य--निकट जाकर;ईश्वरमू--शिवजी को; नता:--शरणागत होकर गिर पड़े; त्राहि--रक्षा करें; न:--हमारी; तावकान्ू--आपके होकर भी अत्यन्तभयभीत; देव-हे प्रभु; विनष्टान्ू--प्रायः विनष्ट; त्रिपुएर-आलयै: --उन तीनों पुरों में रहने वाले असुरों द्वारा
तत्पश्चात् जब असुरगण स्वर्गलोकों को तहस-नहस करने लगे तो उन लोकों के शासकशिवजी की शरण में आये और उन्होंने कहा--हे प्रभु, हम तीन लोकों के वासी देवता विनष्टहोने वाले हैं।
हम आपके अनुयायी हैं।
कृपया हमारी रक्षा करें।
अथा" नुगृहा भगवान्मा भैष्टेति सुरान्विभुः ।
शरं धनुषि सन्धाय पुरेष्वस्त्रं व्यमुज्ञत ॥
५७॥
अथ--तत्पश्चात्; अनुगृह्य--उन पर कृपा करके; भगवान्--अत्यन्त शक्तिशाली; मा--मत; भैष्ट--डरो; इति--इस प्रकार;सुरानू--देवताओं को; विभु:--शिवजी ने; शरम्--बाण; धनुषि-- धनुष पर; सन्धाय--चढ़ाकर; पुरेषु--असुरों से युक्त उनतीनों आवासों में; अस्त्रम्ू--अस्त्र; व्यमुज्ञत--छोड़ा |
अत्यन्त शक्तिशाली एवं समर्थ शिवजी ने उन्हें धैर्य बँधाते हुए कहा 'डरो मत।
' तब उन्होंनेअपने धनुष पर बाण चढ़ाकर असुरों द्वारा निवसित तीनों आवासों की ओर छोड़ा।
"
ततोग्निवर्णा इषव उत्पेतु: सूर्यमण्डलातू ।
यथा मयूखसन्दोहा नाहश्यन्त पुरो यतः ॥
५८॥
ततः--तत्पश्चात्; अग्नि-वर्णा: --अग्नि के समान चमकीले; इषव:--बाण; उत्पेतु:--छोड़े; सूर्य-मण्डलात्--सूर्यमण्डल से;यथा--जिस प्रकार; मयूख-सन्दोहा:-- प्रकाश की किरणें; न अहृश्यन्त--देखे नहीं जा सके; पुर:--तीनों आवास; यत:--इसके कारण ( शिवजी के बाणों से घिर कर )
शिवजी द्वारा छोड़े गये बाण सूर्यमण्डल से निकलने वाली प्रज्वचलित किरणों जैसे लग रहेथे।
उनसे तीनों आवास-रूपी विमान आच्छादित हो गये जिससे वे दिखने बन्द हो गये।
"
ते स्पृष्टा व्यसवः सर्वे निपेतु: सम पुरौकसः ।
तानानीय महायोगी मयः कूपरसेउक्षिपत् ॥
५९॥
तैः--उन ( बाणों ) के द्वारा; स्पृष्टा:--फ्पर्श किये जाने या आक्रमण किये जाने से; व्यसव:--निष्प्राण; सर्वे--सारे असुर;निपेतु:--गिर पड़े; स्म--पूर्वकाल में; पुर-ओकसः --उपर्युक्त तीनों आवासरूपी विमानों के निवासी होने के कारण; तानू--उनसबों को; आनीय--लाकर; महा-योगी--महान् योगी; मयः--मय दानव ने; कूप-रसे--अमृत के कुएँ में ( जिसे महायोगी मयने बनाया था ); अक्षिपत्--रख दिया।
शिवजी के सुनहरे बाणों से आक्रमण किये जाने से उन तीनों आवासों के निवासी असुरनिष्प्राण होकर गिर पड़े।
तब परम योगी मय दानव ने उन्हें अपने द्वारा निर्मित अमृत कूप मेंलाकर डाल दिया।
"
सिद्धामृतरसस्पृष्टा वज़सारा महौजसः ।
उत्तस्थुमेंघदलना वैद्युता इव वह्यः ॥
६०॥
सिद्ध-अमृत-रस-स्पृष्टा:--शक्तिशाली योग के अमृत का स्पर्श पाकर असुरगण; बज़-सारा:--जिनके शरीर वज्ञ के समान होगये हैं; महा-ओजसः--अत्यन्त बलिष्ठ; उत्तस्थु:--फिर से उठ खड़े हो गये; मेघ-दलना:--बादलों को चीरकर जाने वाले;वैद्युता:--बिजली ( जो बादल को चीर देती है ); इब--सहृश; वह्यः--अग्नि जैसे |
असुरों के मृत शरीर इस अमृत का स्पर्श करते ही बज्ञ के समान अभेद्य हो गये।
महान्शक्ति प्राप्त करने के कारण वे बादलों को विदीर्ण करने वाली बिजली की भाँति उठ खड़े होगये।
"
विलोक्य भग्नसड्डूल्पं विमनस्कं वृषध्वजम् ।
तदायं भगवान्विष्णुस्तत्रोपायमकल्पयत् ॥
६१॥
विलोक्य--देखकर; भग्न-सड्जलूल्पम्--निराश; विमनस्कम्-- अत्यन्त अप्रसन्न, अन्यमनस्क ; वृष-ध्वजम्--शिवजी को; तदा--उस समय; अयम्--यह; भगवान्-- भगवान्; विष्णु: --विष्णु ने; तत्र--अमृत कूप के पास; उपायम्--उपाय ( रोकने का );अकल्पयत्--विचार किया।
शिवजी को अत्यन्त दुखी तथा निराश देखकर भगवान् विष्णु ने विचार किया कि मयदानव द्वारा उत्पन्न इस उत्पात को किस प्रकार रोका जाये।
"
वत्सश्चासीत्तदा ब्रह्मा स्वयं विष्णुरयं हि गौ: ।
प्रविश्य त्रिपुरं काले रसकूपामृतं पपौ ॥
६२॥
वत्स:--बछड़ा; च-- भी; आसीतू्--बन गये; तदा--उस समय; ब्रह्मा--ब्रह्माजी; स्वयम्ू--खुद; विष्णु: -- भगवान् विष्णु;अयम्--यह; हि--निस्सन्देह; गौ: --गाय; प्रविश्य--घुसकर; त्रि-पुरम्ू--तीनों निवासस्थानों को; काले--दोपहर में; रस-कूप-अमृतम्-कुएँ के अमृत को; पपौ--पी लिया।
तब ब्रह्माजी बछड़ा और भगवान् विष्णु गाय बन गये और दोपहर के समय आवासों मेंप्रवेश करके वे कुएं का सारा अमृत पी गये।
"
तेडसुरा ह्ापि पश्यन्तो न न्यषेधन्विमोहिता: ।
तद्विज्ञाय महायोगी रसपालानिदं जगौ ।
स्मयन्विशोकः शोकार्तान्स्मरन्दैवगतिं च तामू ॥
६३॥
ते--वे; असुराः:--असुरगण; हि--निस्सन्देह; अपि-- यद्यपि; पश्यन्तः--देखते हुए ( कि बछड़ा तथा गाय अमृत पी रहे हैं );न--नहीं; न्यषेधन्--मना किया; विमोहिता:--मोह- ग्रस्त होने से; तत् विज्ञाय--यह भली-भाँति जानकर; महा-योगी--महान् योगी मय दानव ने; रस-पालान्ू--अमृत की रक्षा करने वाले असुरों से; इदम्--यह; जगौ--कहा; स्मयन्--मोहग्रस्त हुए;विशोक:--बहुत अप्रसन्न न होते हुए; शोक-आर्तान्ू--अत्यधिक पश्चात्ताप करते; स्मरन्--स्मरण करते हुए; दैव-गतिम्--आध्यात्मिक शक्ति को; च-- भी; तामू--उस |
असुरों ने बछड़े तथा गाय को देखा लेकिन भगवान् द्वारा उत्पन्न मोह शक्ति के कारण वे उन्हेंरोक नहीं पाये।
महायोगी मय असुर को पता चल गया कि बछड़ा तथा गाय अमृत पी रहे हैं औरवह यह समझ गया कि यह अदृश्य दैवी शक्ति के कारण हो रहा है।
इस प्रकार वह पश्चात्तापकरते हुए असुरों से बोला।
"
देवोसुरो नरोउन्यो वा नेश्वरोउस्तीह कश्चन ।
आत्मनोन्यस्य वा दि्टे दैवेनापोहितुं द्वययो: ॥
६४॥
देवः--देवता; असुर:--असुर; नरः--मनुष्य; अन्य:--अथवा कोई दूसरा; वा--या तो; न--नहीं; ईश्वर: --परमनियन्ता;अस्ति-- है; इह--इस संसार में; कश्चन--कोई; आत्मन:--अपना; अन्यस्य--दूसरे का; वा--अथवा; दिष्टमू-- भाग्य; दैवेन--भगवान् द्वारा प्रदत्त; अपोहितुमू--मिटा सकने के लिए; द्यो:--दोनों का |
मय दानव ने कहा : जो अपने, पराये अथवा दोनों के भाग्य में भगवान् द्वारा निश्चित करदिया गया है उसे कोई भी कहीं भी मिटा नहीं सकता चाहे वह देवता, असुर, मनुष्य या अन्यकोई क्यों न हो।
"
अथासौ शक्तिभिः स्वाभि: शम्भो: प्राधानिकं व्यधात् ।
धर्मज्ञानविरक्त्यूद्द्धितपोविद्याक्रियादिभि: ॥
६५॥
रथं सूतं ध्वजं वाहान्धनुर्वर्मशरादि यत् ।
सन्नद्धो रथमास्थाय शरं धनुरुपाददे ॥
६६॥
अथ--तत्पश्चात्; असौ--वह ( भगवान् कृष्ण ); शक्तिभि:--अपनी शक्तियों से; स्वाभि: --निजी; शम्भो:--शिवजी की;प्राधानिकम्--अवयव; व्यधात्--उत्पन्न किया; धर्म--धर्म; ज्ञान--ज्ञान; विरक्ति--वैराग्य; ऋद्द्धि--ऐश्वर्य ; तप:ः--तपस्या;विद्या--विद्या; क्रिया--कार्यकलाप; आदिभि:--इत्यादि के द्वारा; रथम्--रथ को; सूतम्--सारथी को; ध्वजम्--झंडे को;वाहान्ू--हाथी-घोड़ों को; धनु:--धनुष; वर्म--ढाल; शर-आदि--बाण इत्यादि; यत्-- प्रत्येक आवश्यक वस्तु से; सन्नद्ध:--संयुक्त; रथम्--रथ पर; आस्थाय--आसीन होकर; शरम्--बाण; धनु:-- धनुष पर; उपाददे--चढ़ाया, जोड़ा |
नारद मुनि ने आगे कहा--तत्पश्चात् कृष्ण ने शिवजी को अपनी निजी शक्ति से, जो धर्म,ज्ञान, त्याग, ऐश्वर्य, तपस्या, विद्या तथा कर्म से युक्त थी, सभी प्रकार की साज-सामग्री से--यथा रथ, सारथी, ध्वजा, घोड़े, हाथी, धनुष, ढाल तथा बाण से संयुक्त कर दिया।
इस तरह सेसंयुक्त होकर शिव जी अपने धनुष-बाण द्वारा असुरों से लड़ने के लिए रथ पर आसीन हुए।
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शरं धनुषि सन्धाय मुहूर्तेडभिजिती श्वर: ।
ददाह तेन दुर्भेद्या हरोथ त्रिपुरो नृप ॥
६७॥
शरम्--बाणों को; धनुषि-- धनुष पर; सन्धाय--एकसाथ जोड़कर; मुहूर्त अभिजिति--दोपहर के समय; ईश्वर: -- भगवान्शिव; ददाह-- अग्नि लगा दी; तेन--उन ( बाणों के द्वारा ); दुर्भेद्या:--दुर्भद्य, जिसको भेद पाना दुष्कर हो; हरः--शिवजी ने;अथ--झस प्रकार से; त्रि-पुरः--असुरों के तीनों निवासस्थान; नृप--हे राजा युथिष्टिर
हे राजा युधिष्ठिर, परम शक्तिशाली शिवजी ने अपने धनुष पर बाण चढ़ाये और दोपहर केसमय असुरों के तीनों आवासों में अग्नि लगाकर उन्हें नष्ट कर दिया।
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दिवि दुन्दुभयो नेदुर्विमानशतसड्डू ला: ।
देवर्षिपितृसिद्धेशा जयेति कुसुमोत्करैः ।
अवाकिरज्जगुईप्टा ननृतुश्चाप्सरोगणा: ॥
६८ ॥
दिवि--आकाश् में; दुन्दुभय:--दुन्दुभियाँ; नेदु:--बज उठीं; विमान--विमानों के; शत--सैकड़ों हजारों; सह्ढु लाः--एकत्र;देव-ऋषि--सारे देवता तथा सन्त; पितृ--पितृलोक के निवासी; सिद्ध--सिद्धलोक के निवासी; ईशा:--सभी महापुरुष; जयइति--'जय हो ' इस प्रकार उच्चारण किया; कुसुम-उत्करैः--तरह-तरह के फूलों से; अवाकिरन्ू--शिवजी के ऊपर वर्षा की;जगुः--उच्चारण किया; हृष्टा:--अत्यन्त प्रसन्नता में; ननृतु:--नाचा; च--तथा; अप्सरः-गणा: --स्वर्गलोक की सुन्दरी स्त्रियोंने
तब आकाश में अपने-अपने विमानों में आसीन उच्चलोकों के निवासियों ने दुन्दुभियाँबजाईं।
देवताओं, ऋषियों, पितरों, सिद्धों तथा विविध महापुरुषों ने शिव जी के ऊपर पुष्प-वर्षाकी और जयजयकार की।
अप्सराएँ परम प्रमुदित होकर नाचने-गाने लगीं।
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एवं दग्ध्वा पुरस्तिस्त्रो भगवान्पुरहा नूप ।
ब्रह्मादिभि: स्तूयमान: स्वं धाम प्रत्यपद्मयत ॥
६९॥
एवम्--इस प्रकार; दग्ध्वा-- भस्म करके; पुरः तिस्त्रः--असुरों के तीनों आवासों ( पुरियों ) को; भगवान्--अत्यन्त शक्तिशाली;पुर-हा-पुरों को नष्ट करने वाला; नृप--हे राजा युधिष्टिर; ब्रह्म-आदिभि:--ब्रह्माजी तथा अन्य देवताओं द्वारा; स्तूबमान: --पूजित होकर; स्वम्--अपने; धाम--धाम; प्रत्यपद्यत--लौट गये |
हे राजा युथिष्टिर, इस प्रकार शिवजी त्रिपुरारी कहलाते हैं, क्योंकि उन्होंने असुरों की तीनोंपुरियों को भस्म कर दिया था।
ब्रह्मा समेत समस्त देवताओं से पूजित होकर शिव जी अपने धामलौट गये।
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एवं विधान्यस्य हरे: स्वमाययाविडम्बमानस्य नृलोकमात्मनः ॥
वीर्याणि गीतान्यूषिभिर्जगद्गुरो-लेक पुनानान्यपरं वदामि किमू ॥
७०॥
एवम् विधानि--इस विधि से; अस्य--कृष्ण की; हरेः-- भगवान् की; स्व-मायया--अपनी दिव्य शक्तियों से; विडम्बमानस्थ--सामान्य मनुष्य की भाँति कार्य करते हुए; नू-लोकम्--मानव समाज में; आत्मन:--अपने; वीर्याणि--दिव्य कार्यकलापों की;गीतानि--कथाओं को; ऋषिभि:--ऋषियों द्वारा; जगतू-गुरो: --परम प्रभु का; लोकम्--सारे लोक; पुनानानि--पवित्र करतेहुए; अपरम्--और क्या; वदामि किमू--मैं क्या कह सकता हूँ।
यद्यपि भगवान् कृष्ण मनुष्य के रूप में प्रकट हुए थे फिर भी उन्होंने अपनी शक्ति से अनेकअसामान्य तथा आश्चर्यजनक लीलाएँ सम्पन्न कीं।
उन महान् सन्त पुरुषों द्वारा जो कुछ कहा जा चुका है उससे भला मैं और अधिक क्या कह सकता हूँ?
प्रत्येक व्यक्ति अधिकारी व्यक्ति सेभगवान् के कार्यकलापों के श्रवण मात्र से शुद्ध हो सकता है।
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