← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 7 की सूची
अध्याय एक: सर्वोच्च भगवान सभी के लिए समान है
7.1श्रीराजोबाचसम: प्रियः सुहड्गह्मन्भूतानां भगवान्स्वयम् ।इन्द्रस्यार्थकथं दैत्यानवधीद्विषमो यथा ॥ १॥
श्री-राजा उवाच--महाराज परीक्षित ने कहा; सम:--समान ; प्रिय: --प्रिय; सुहत्--मित्र; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण ( शुकदेव );भूतानाम्--समस्त जीवों के; भगवान्--परमे श्वर, विष्णु; स्वयम्--स्वयं; इन्द्रस्य--इन्द्र के; अर्थ--लाभ के लिए; कथम्--कैसे; दैत्यान्-- असुरों को; अवधीत्--मारा; विषम:ः--पक्षपात; यथा--मानो |
राजा परीक्षित ने पूछा : हे ब्राह्मण, भगवान् विष्णु सबों के शुभचिन्तक होने के कारण हरएक को समान रूप से अत्यधिक प्रिय हैं, तो फिर उन्होंने किस तरह एक साधारण मनुष्य कीभांति इन्द्र का पक्षपात किया और उसके शत्रुओं को मारा?
सबों के प्रति समभाव रखने वाला" न हास्यार्थ: सुरगणैः साक्षान्रि: श्रेयसात्मनः ।नैवासुरेभ्यो विद्वेषो नोद्वेगश्रागुणस्य हि ॥
२॥
न--नहीं; हि--निश्चय ही; अस्य--उनके; अर्थ:--लाभ, हित; सुर-गणैः--देवताओं के साथ; साक्षात्--स्वयं; नि: श्रेयस--सर्वोच्च वरदान का; आत्मन:--जिसका स्वभाव; न--नहीं; एब--निश्चय ही; असुरेभ्य: --असुरों के लिए; विद्वेष: --ईर्ष्या, द्वेष;न--नहीं; उद्देगः--भय; च--तथा; अगुणस्य-- भौतिक गुणों से रहित; हि--निश्चय ही |
भगवान् विष्णु साक्षात् भगवान् तथा समस्त आनन्द के आगार हैं; अतएव उन्हें देवताओं कापक्ष-ग्रहण करने से क्या लाभ मिलेगा ?
इस प्रकार उनका कौन सा स्वार्थ सधेगा ?
जब भगवान्दिव्य हैं, तो फिर उन्हें असुरों से भय कैसा ?
और उनसे ईर्ष्या कैसी ?
" इति नः सुमहाभाग नारायणगुणान्प्रति ।संशयः सुमहाझ्जातस्तद्धवांश्छेत्तुमहति ॥
३॥
इति--इस प्रकार; न:ः--हमारा; सु-महा-भाग--हे भाग्यवान्:; नारायण-गुणान्--नारायण के गुणों के; प्रति--प्रति; संशय:--सन्देह; सु-महान्--अत्यन्त महान्; जात:--उत्पन्न; तत्ू--वह; भवान्ू--आप; छेत्तुम् अहति--कृपया दूर कर दें।
है सौभाग्यशाली तथा विद्वान ब्राह्मण, यह अत्यन्त सन्देहास्पद विषय बन गया है किनारायण पक्षपातपूर्ण हैं या निष्पक्ष हैं ?
कृपया निश्चित साक्ष्य द्वारा मेरे इस सन्देह को दूर करें किनारायण सर्वदा उदासीन तथा सबों के प्रति सम हैं।"
श्रीऋषिरुवाचसाधु पृष्ठ महाराज हरेश्वरितमद्भुतम् ।यद्भागवतमाहात्म्यं भगवद्धक्तिवर्धनम् ॥
४॥
गीयते परम॑ पुण्यमृषिभिर्नारदादिभि: ।नत्वा कृष्णाय मुनये कथयिष्ये हरे: कथाम् ॥
५॥
श्री-ऋषि: उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; साधु--सर्व श्रेष्ठ; पृष्टमू-- प्रश्न; महा-राज--हे महान् राजा; हरे: --पर मे श्वर,हरि के; चरितम्-कार्यकलाप; अद्भुतम्--अद्भुत; यत्--जिससे; भागवत-- भगवान् के भक्त ( प्रह्मद ) का; माहात्म्यम्--यश; भगवत्-भक्ति-- भगवान् की भक्ति को; वर्धनमू--बढ़ाने वाली; गीयते--गाई जाती है; परमम्--अग्रणी; पुण्यम्--पवित्र; ऋषिभि:--ऋषियों के द्वारा; नारद-आदिभि:--नारद आदि द्वारा; नत्वा--नमस्कार करके ; कृष्णाय--कृष्णद्वैपायनव्यास को; मुनये--मुनि; कथयिष्ये-- मैं कह सुनाऊँगा; हरेः--हरि की; कथाम्ू--कथाएँ।
महामुनि शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा, आपने मुझसे अतीव श्रेष्ठ प्रश्न किया है।
भगवान् के कार्यकलापों से सम्बन्धित कथाएँ, जिनमें उनके भक्तों के भी यशों का वर्णन रहताहै, भक्तों को अत्यन्त भाने वाली हैं।
ऐसी अद्भुत कथाएँ सदैव भौतिकतावादी जीवनशैली केकष्टों का निवारण करने वाली होती हैं।
अतएव नारद-जैसे मुनि श्रीमद्भागवत के विषय मेंसदैव उपदेश देते रहते हैं, क्योंकि इससे मनुष्य को भगवान् के अद्भुत कार्यकलापों के श्रवणतथा कीर्तन की सुविधा प्राप्त होती है।
अब मैं श्रील व्यासदेव को सादर प्रणाम करके भगवान्हरि के कार्यकलापों से सम्बन्धित कथाओं का वर्णन प्रारम्भ करता हूँ।
"
निर्गुणोपि ह्ाजोव्यक्तो भगवान्प्रकृते: पर: ।
स्वमायागुणमाविश्य बाध्यबाधकतां गत: ॥
६॥
निर्गुण:--भौतिक गुणों से रहित; अपि--यद्यपि; हि--निश्चय ही; अज:--अजन्मा; अव्यक्त:--अप्रकट; भगवानू्--पर मेश्वर;प्रकृते:--भौतिक प्रकृति से; पर:--दिव्य; स्व-माया--अपनी शक्ति के; गुणम्--भौतिक गुण में; आविश्य--प्रवेश करके;बाध्य--बाध्य; बाधकताम्--बाध्य होने की स्थिति; गतः--स्वीकार करता है।
भगवान् विष्णु सदा भौतिक गुणों से परे रहने वाले हैं अतएव वे निर्गुण कहलाते हैं।
अजन्मा होने के कारण उनका शरीर राग तथा द्वेष से प्रभावित नहीं होता।
यद्यपि भगवान् सदैव भौतिकजगत से ऊपर हैं, किन्तु अपनी आध्यात्मिक ( परा ) शक्ति से वे प्रकट हुए और बद्धजीव कीभाँति कर्तव्यों तथा दायित्वों ( बाध्यताओं ) को ऊपर से स्वीकार करके उन्होंने सामान्य मनुष्यकी भाँति कार्य किया।
"
सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्नात्मनो गुणा: ।
न तेषां युगपद्राजन्हास उल्लास एवं वा ॥
७॥
सत्त्वमू--सतोगुण; रज:--रजोगुण; तम: --तमोगुण; इति--इस प्रकार; प्रकृते:-- भौतिक प्रकृति के; न--नहीं; आत्मन: --आत्मा के; गुणा:--गुण; न--नहीं; तेषाम्-- उनके; युगपत्--एकसाथ; राजन्--हे राजा; हास: --कमी; उल्लास: -- प्रधानता;एव--निश्चय ही; वा--अथवा।
हे राजा परीक्षित, सत्व, रज, तम--ये तीनों भौतिक गुण भौतिक जगत से सम्बद्ध हैं, अतःये भगवान् को छू तक नहीं पाते।
ये तीनों गुण एकसाथ बढ़ या घट कर कार्य नहीं कर सकते।
"
जयकाले तु सत्त्वस्य देवर्षीत्रजसो सुरान् ।
तमसो यक्षरक्षांसि तत्कालानुगुणोभजत् ॥
८॥
जय-काले--प्रसिद्धि के समय में; तु--निस्मन्देह; सत्त्वस्थ--सतोगुण का; देव--देवताओं; ऋषीन्ू--तथा ऋषियों को;रजसः--रजोगुण का; असुरान्--असुरों को; तमस:--तमोगुण का; यक्ष-रक्षांसि--यक्षों तथा राक्षसों को; तत्ू-काल-अनुगुण:--विशेष अवसर के अनुकूल; अभजतू--अपनाया।
जब सतोगुण प्रधान होता है, तो ऋषि तथा देवता उस गुण के बल पर समुन्नति करते हैंजिससे वे परमेश्वर द्वारा प्रोत्साहित एवं प्रेरित किये जाते हैं।
इसी प्रकार जब रजोगुण प्रधान होताहै, तो असुरगण फूलते-फलते हैं और जब तमोगुण प्रधान होता है, तो यक्ष तथा राक्षस समृद्धिपाते हैं।
भगवान् प्रत्येक के हृदय में स्थित रह कर सतोगुण, रजोगुण तथा तमोगुण के फलों कोपुष्ठ करते हैं।
"
ज्योतिरादिरिवाभाति सज्ञतान्न विविच्यते ।
विदन्त्यात्मानमात्मस्थं मथित्वा कवयोउन्ततः ॥
९॥
ज्योति:--अग्नि; आदि:--तथा अन्य तत्त्व; इब--सह्ृश; आभाति--प्रतीत होती हैं; सज्ञतात्--देवताओं तथा अन्यों के शरीरोंसे; न--नहीं; विविच्यते-- पहचाने जाते हैं; विदन्ति--अनुभव करते हैं; आत्मानम्--परमात्मा को; आत्म-स्थम्--हृदय मेंस्थित; मधित्वा--विलग करके; कवयः--दक्ष चिन्तक; अन्ततः-- भीतरसर्वव्यापी
भगवान् प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित रहते हैं और एक कुशल चिन्तक हीअनुभव कर सकता है कि वे अधिक या न्यून मात्रा में कैसे वहाँ उपस्थित हैं।
जिस प्रकार काष्ठमें अग्नि, जलपात्र में जल या घड़े के भीतर आकाश को समझा जा सकता है उसी प्रकार जीवकी भक्तिमयी क्रियाओं को देखकर यह समझा जा सकता है कि वह जीव असुर है या देवता।
विचारशील व्यक्ति किसी मनुष्य के कर्मों को देखकर यह समझ सकता है कि उस मनुष्य परभगवान् की कितनी कृपा है।
"
यदा सिसृक्षु: पुर आत्मनः परोरजः सृजत्येष पृथक्स्वमायया ।
सत्त्वं विचित्रासु रिरंसुरी श्वरःशयिष्यमाणस्तम ईरयत्यसौ ॥
१०॥
यदा--जब; सिसृक्षु:--सृष्टि करने को इच्छुक; पुर: -- भौतिक शरीर; आत्मन:--जीवों के लिए; पर:--भगवान्; रज: --रजोगुण; सृजति--प्रकट करता है; एष: --वह; पृथक्--अलग, मुख्यतया; स्व-मायया--अपनी सृजन शक्ति के द्वारा;सत्त्वम्--सतोगुण; विचित्रासु--विभिन्न प्रकार के शरीरों में; रिरंसु:--कर्म करने का इच्छुक; ईश्वरः-- भगवान्;शयिष्यमाण: --समाप्त करने के निकट; तमः--तमोगुण; ईरयति--प्रकट करता है; असौ--वह परमे श्वर।
जब भगवान् विभिन्न प्रकार के शरीर उत्पन्न करते हैं और प्रत्येक जीव को उसके चरित्र तथासकाम कर्मों के अनुसार विशिष्ट प्रकार का शरीर प्रदान करते हैं, तो वे प्रकृति के सारे गुणों--सत्त्व गुण, रजोगुण तथा तमोगुण--को पुनरुज्जीवित करते हैं।
तब परमात्मा के रूप में वेप्रत्येक शरीर में प्रविष्ट होकर सृजन, पालन तथा संहार के गुणों को प्रभावित करते हैं जिनमें सेसतोगुण का उपयोग पालन के लिए, रजोगुण का उपयोग सृजन के लिए तथा तमोगुण काउपयोग संहार के लिए किया जाता है।
"
काल चरन्तं सृजतीश आश्रयं ।
प्रधानपुम्भ्यां नरदेव सत्यकृत् ॥
११॥
कालमू--समय; चरन्तम्--गतिशील; सृजति--उत्पन्न करता है; ईशः--भगवान्; आश्रयम्--शरण; प्रधान--भौतिक शक्ति केलिए; पुम्भ्यामू--तथा जीव के द्वारा; नर-देव--हे मनुष्यों के शासक; सत्य--असली; कृत्--स्त्रष्टा
हे महान् राजा, भौतिक तथा आध्यात्मिक शक्तियों के नियंता भगवान्, जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके सत्रष्टा हैं, काल की सृष्टि करते हैं जिससे भौतिक शक्ति तथा जीव काल की सीमा के भीतरपरस्पर क्रिया कर सकें।
इस प्रकार परम पुरुष न तो कभी काल के अधीन होता है, न हीभौतिक शक्ति ( माया ) के अधीन होता है।
"
य एघ राजन्नपि काल ईशितासत्त्वं॑ सुरानीकमिवैधयत्यत: ।
तत्प्रत्यनीकानसुरान्सुरप्रियोरजस्तमस्कान्प्रमिणोत्युरु श्रवा: ॥
१२॥
यः--जो; एब:--यह; राजन्ू--हे राजा; अपि-- भी; काल:-- काल, समय; ईशिता-- पर मे श्वर; सत्त्वम्--सतोगुण; सुर-अनीकमू--अनेक देवताओं को; इब--निश्चय ही; एधयति--बढ़ाता है; अत:--अतएव; तत्-प्रत्यनीकान्ू-- उनके प्रति वैरभाव; असुरान्--असुरों को; सुर-प्रियः--देवताओं का मित्र होने से; रज:-तमस्कान्--रजो तथा तमों गुणों से आच्छादित;प्रमिणोति--नष्ट करता है; उरू-भ्रवा:--जिसका यश दूर-दूर तक फैला है।
हे राजन् यह काल सत्त्वगुण को बढ़ाता है।
इस तरह यद्यपि परमेश्वर नियन्ता हैं, किन्तु वेदेवताओं पर कृपालु होते हैं, जो अधिकांशतः सतोगुणी होते हैं।
तभी तमोगुणी असुरों काविनाश होता है।
परमेश्वर काल को विभिन्न प्रकार से कार्य करने के लिए प्रभावित करते हैं,किन्तु वे कभी पक्षपात नहीं करते।
उनके कार्यकलाप यशस्वी हैं, अतएव वे उरुश्रवा कहलातेहैं।
"
अन्नैवोदाहतः पूर्वमितिहास: सुर्षिणा ।
प्रीत्या महाक्रतौ राजन्पृच्छतेजातशत्रवे ॥
१३॥
अत्र--इस प्रसंग में; एब--निश्चय; उदाहत: --सुनाया गया; पूर्वम्--पहले; इतिहास:--पुरानी कथा; सुर-ऋषिणा--देवर्षिनारद द्वारा; प्रीत्या--प्रसन्नतापूर्वक; महा-क्रतौ--महान् राजसूय यज्ञ के अवसर पर; राजन्--हे राजा; पृच्छते--जिज्ञासा करनेवाले; अजात-शत्रवे--महाराज युथिष्टिर को, जिनका कोई शत्रु न था।
हे राजन, पूर्वकाल में जब महाराज युधिष्ठिर राजसूय यज्ञ कर रहे थे तो महर्षि नारद ने उनकेपूछे जाने पर कुछ ऐतिहासिक तथ्य कह सुनाये जिससे पता चलता है कि भगवान् असुरों कावध करते समय भी कितने निष्पक्ष रहते हैं।
इस सम्बन्ध में उन्होंने एक जीवन्त उदाहरण प्रस्तुतकील ।
"
इृष्टा महाद्भुतं राजा राजसूये महाक्रतौ ।
वबासुदेवे भगवति सायुज्यं चेदिभूभुज: ॥
१४॥
तत्रासीनं सुरऋषिं राजा पाण्डुसुतः क्रतौ ।
पप्रच्छ विस्मितमना मुनीनां श्रृण्वतामिदम् ॥
१५॥
इष्ठा--देखकर; महा-अद्भुतम्--अत्यन्त अद्भुत; राजा--राजा; राजसूये--राजसूय नामक; महा-क्रतौ--महान् यज्ञ के अवसरपर; वासुदेवे--वासुदेव में; भगवति-- भगवान् में; सायुज्यमू--लीन हुआ; चेदिभू-भुज:--चेदि के राजा शिशुपाल का; तत्र--वहाँ; आसीनम्--बैठा हुआ; सुर-ऋषिम्ू--नारदमुनि से; राजा--राजा; पाण्डु-सुत:ः--पाए-डु पुत्र युधिष्टिर ने; क्रतौ--यज्ञ में;पप्रच्छ--पूछा; विस्मित-मना:--आश्चर्यचकित होकर; मुनीनाम्--मुनियों की उपस्थिति में; श्रूण्वताम्--सुनते हुए; इदम्--यह |
हे राजन, महाराज पाण्डु के पुत्र महाराज युथ्िष्ठिर ने राजसूय यज्ञ के समय शिशुपाल कोभगवान् कृष्ण के शरीर में विलीन होते हुए स्वयं देखा।
अतएवं आश्चर्यच्कित होकर उन्होंने वहींपर बैठे महर्षि नारद से इसका कारण पूछा।
जब उन्होंने यह प्रश्न पूछा तो वहाँ पर उपस्थित सारेऋषियों ने भी इस प्रश्न को पूछे जाते सुना।
"
श्रीयुधिष्ठटिर उवाचअहो अत्यद्भुतं होतदुर्लभैकान्तिनामपि ।
बासुदेवे परे तत्त्वे प्राप्तिश्षेद्यस्थ विद्विष: ॥
१६॥
श्री-युधिष्ठटिर: उवाच--महाराज युधिष्ठटिर ने कहा; अहो--ओह; अति-अद्भुतम्-- अत्यन्त आश्चर्यजनक; हि--निश्चय ही; एतत्--यह; दुर्लभ--प्राप्त करने में कठिन; एकान्तिनाम्ू--अध्यात्मवादियों के लिए; अपि-- भी; वासुदेवे --वासुदेव में; परे--परम;तत्त्वे--परम सत्य; प्राप्ति:--प्राप्ति; चैद्यस्य--शिशुपाल की; विद्विष:--ईर्ष्यालु |
महाराज युधिष्ठिर ने पूछा : यह अत्यन्त आश्वर्यजनक है कि असुर शिशुपाल अत्यन्त ईर्ष्यालुहोते हुए भी भगवान् के शरीर में लीन हो गया।
यह सायुज्य मुक्ति बड़े-बड़े अध्यात्मवादियों केलिए भी दुष्प्राप्प है, तो फिर भगवान् के शत्रु को यह कैसे प्राप्त हुई ?
" एतद्ठेदितुमिच्छाम: सर्व एव बयं मुने ।
भगवत्निन्दया वेनो द्विजैस्तमसि पातित: ॥
१७॥
एतत्--यह; वेदितुम्--जानना; इच्छाम:--चाहते हैं; सर्वे--सभी; एव--निश्चय ही; वयम्--हम सब; मुने--हे मुनि; भगवत्-निन्दया-- भगवान् की निन््दा करने के कारण; वेन:--वेन, पृथु महाराज का पुत्र; द्विजैः:--ब्राह्मणों के द्वारा; तमसि--नरक में;पातितः--गिरा दिया गया।
हे मुनि, हम सभी भगवान् की इस कृपा का कारण जानने के लिए उत्सुक हैं।
मैंने सुना हैकि प्राचीन काल में वेन नामक राजा ने भगवान् की निन््दा की।
फलस्वरूप सारे ब्राह्मणों ने उसेबाध्य किया कि वह नरक में जाये।
शिशुपाल को भी नरक जाना चाहिए था।
तो फिर वहभगवान् के शरीर में किस तरह लीन हो गया ?
" दमघोषसुतः पाप आरभ्य कलभाषणात् ।
सम्प्रत्यमर्षी गोविन्दे दन्तवक्र श्च दुर्मति:ः ॥
१८ ॥
दमघोष-सुत:ः--दमधघोष का पुत्र, शिशुपाल; पाप:--पापी; आरभ्य--प्रारम्भ करके; कल-भाषणात्--बालक जैसी तोतलीबोली से; सम्प्रति--आज भी; अमर्षी--ईर्ष्यालु; गोविन्दे-- श्रीकृष्ण के प्रति; दनन््तवक्र:--दन्तवक़ ; च-- भी ; दुर्मति:--दुर्बद्धि
अपने बाल्यकाल के प्रारम्भ से ही, जब वह ठीक से बोल नहीं पाता था, दमघोष के महापापी पुत्र शिशुपाल ने भगवान् की निन्दा करनी प्रारम्भ कर दी थी और वह मृत्यु काल तकश्रीकृष्ण से ईर्ष्या करता रहा।
इसी प्रकार उसका भाई दन्तवक्र भी ऐसी आदतें पाले रहा।
"
शपतोरसकृद्रिष्णुं यद्रह् परमव्ययम् ।
श्रित्रो न जातो जिह्दायां नान्धं विविशतुस्तम: ॥
१९॥
शपतो:--निन्दा करने वाले शिशुपाल तथा दन्तवक्र दोनों ही का; असकृत्--बारम्बार; विष्णुम्-- भगवान् कृष्ण को; यत्--जो; ब्रह्म परमू--परब्रह्म; अव्ययम्--बिना किसी कमी के; श्रित्र:-- श्वेत कुष्ठ; न--नहीं; जात:--प्रकट; जिह्लायाम्-- जीभ पर;न--नहीं; अन्धम्--अँधेरा; विविशतु:--वे घुसे; तम:--नरक में ।
यद्यपि शिशुपाल तथा दन्तवक्र दोनों ही भगवान् विष्णु ( कृष्ण ) की बारम्बार निन््दा करतेरहे तो भी वे पूर्ण स्वस्थ रहे।
न तो उनकी जीभों में ही श्वेत कुष्ठ रोग हुआ, न वे नारकीय जीवनके गहन अंधकार में प्रविष्ट हए।
हम सचम्च इससे अत्यधिक चकित हैं।
"
कथ॑ं तस्मिन्भगवति दुरवग्राह्धामनि ।
पश्यतां सर्वलोकानां लयमीयतुरञझसा ॥
२०॥
कथम्--कैसे; तस्मिन्ू--उसमें; भगवति-- भगवान् में; दुरवग्राह्म--प्राप्त करने में कठिन; धामनि--जिसका स्वभाव;पश्यतामू--देखते-देखते; सर्ब-लोकानामू--सारे लोगों के; लयम् ईयतु:--लीन हो गये; अद्भधसा--सरलता से
यह कैसे सम्भव हो पाया कि शिशुपाल तथा दन्तवक्र अनेक महापुरुषों की उपस्थिति में उनकृष्ण के शरीर में सरलता से प्रविष्ट हो सके, जिन भगवान् की प्रकृति को प्राप्त कर पाना इतनाकठिन है?
" एतदश्राम्यति मे बुद्धिर्दीपाचिरिव वायुना ।
ब्रूह्मेतदद्धुततमं भगवान्ह्त्र कारणम् ॥
२१॥
एतत्--इसे लेकर; भ्राम्यति--डगमगा रही है; मे--मेरी; बुद्धिः:-- बुद्धि; दीप-अर्चि:ः--दीपक की लौ; इब--सहश; वायुना--वायु से; ब्रूहि--कृपा करके कहें; एतत्--यह; अद्भुततमम्--सर्वाधिक अद्भुत; भगवान्--समस्त ज्ञान से युक्त; हि--निश्चयही; अब्र--यहाँ; कारणम्--कारण यह विषय निस्सन्देह अत्यन्त अद्भुत है।
मेरी बुद्धि उसी तरह डगमगा रही है, जिस तरहबहती हुई वायु से दीपक की लौ विचलित हो जाती है।
हे नारद मुनि, आप सब कुछ जानते हैं।
कृपा करके मुझे इस अदभुत घटना का कारण बताएँ।
"
श्रीबादरायणिरुवाचराज्ञस्तद्बब्य आकर्ण्य नारदो भगवानृषि: ।
तुष्ट: प्राह तमाभाष्य श्रण्वत्यास्तत्सद: कथा; ॥
२२॥
श्री-बादरायणि: उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; राज्:--राजा ( युधिष्ठटिर ) के; तत्ू--वे; वच:--शब्द; आकर्ण्य--सुनकर; नारद:--नारद मुनि ने; भगवान्--अत्यन्त शक्तिशाली; ऋषि: --ऋषि; तुष्ट: -- प्रसन्न होकर; प्राह--कहा; तम्--उसको; आभाष्य--सम्बोधित करके; श्रृण्वत्या: तत्ू-सदः--सभासदों की उपस्थित में; कथा:--कथाएँ।
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : महाराज युधिष्ठटिर की विनती सुनकर अत्यन्त शक्तिशालीगुरु नारद मुनि अत्यन्त प्रसन्न हुए, क्योंकि वे हर बात को जानने वाले हैं।
इस तरह उन्होंने यज्ञ में भाग लेने वाले सभी व्यक्तियों के समक्ष उत्तर दिया।
"
श्रीनारद उवाचनिन्दनस्तवसत्कारन्यक्कारार्थ कलेवरम् ।
प्रधानपरयो राजन्नविवेकेन कल्पितम् ॥
२३॥
श्री-नारदः उबाच-- श्री नारद मुनि ने कहा; निन्दन--निन्दा; स्तव--स्तुति, प्रशंसा; सत्कार--सम्मान; न्यक्कार-- अपमान;अर्थम्-के प्रयोजन से; कलेवरम्--शरीर; प्रधान-परयो:--प्रकृति तथा भगवान् का; राजन्--हे राजा; अविवेकेन--बिनाभेदभाव के; कल्पितम्ू--उत्पन्न |
महर्षि नारद ने कहा : हे राजन, निन्दा तथा स्तुति, अपमान तथा सम्मान का अनुभव अज्ञानके कारण होता है।
बद्धजीव का शरीर भगवान् द्वारा अपनी बहिरंगा शक्ति के माध्यम से इसजगत में कष्ट भोगने के लिए बनाया गया है।
"
हिंसा तदभिमानेन दण्डपारुष्ययोर्यथा ।
वैषम्यमिह भूतानां ममाहमिति पार्थिव ॥
२४॥
हिंसा--कष्ट; तत्ू--इसका; अभिमानेन--मिथ्या धारणा; दण्ड-पारुष्ययो:--दण्ड तथा अपमान की; यथा--जिस तरह;वैषम्यम्-- भ्रान्ति; इह-- यहाँ ( इस शरीर में ); भूतानामू--जीवों का; मम-अहम्--मेरा और मैं; इति--इस प्रकार; पार्थिव--हेपृथ्वी के स्वामी
हे राजन, देहात्म-बुद्धि के कारण बद्धजीव अपने शरीर को ही आत्मा मान लेता है औरअपने शरीर से सम्बद्ध हर वस्तु को अपनी मानता है।
चूँकि उसे जीवन की यह मिथ्या धारणारहती है, अतएव उसे प्रशंसा तथा अपमान जैसे ढूंद्वों को भोगना पड़ता है।
"
यत्रिबद्धोइभिमानोयं तद्वधात्प्राणिनां वध: ।
तथा न यस्य कैवल्यादभिमानोखिलात्मन: ।
परस्य दमकर्तुहि हिंसा केनास्य कल्प्यते ॥
२५॥
यत्--जिसमें; निबद्ध:--बँधा हुआ; अभिमान:--मिथ्या धारणा; अयमू--यह; तत्--उस ( शरीर ) के; वधात्--विनाश से;प्राणिनामू--जीवों का; वध:--विनाश; तथा--उसी प्रकार से; न--नहीं; यस्य--जिसका; कैवल्यात्-- अद्वितीय या परम होनेके कारण; अभिमान:-- भ्रान्त धारणा; अखिल-आत्मन:--समस्त जीवों के परमात्मा का; परस्थ-- भगवान् का; दम-कर्तु:--परम नियन्ता; हि--निश्चय ही; हिंसा-- क्षति; केन--कैसे; अस्य--उसका; कल्प्यते--सम्पन्न की जाती है।
देहात्मा-बुद्धि के कारण बद्धजीव सोचता है कि जब शरीर नष्ट हो जाता है, तो जीव नष्ट होजाता है।
भगवान् विष्णु ही परम नियन्ता तथा समस्त जीवों के परमात्मा हैं।
चूँकि उनका कोईभौतिक शरीर नहीं होता, अतएव उनमें 'मैं तथा मेरा ' जैसी भ्रान्त धारणा नहीं होती।
अतएवयह सोचना सही नहीं है कि जब उनकी निन्दा की जाती है या उनकी स्तुति की जाती है, तो वेपीड़ा या हर्ष का अनुभव करते हैं।
ऐसा कर पाना उनके लिए असम्भव है।
इस प्रकार उनका नकोई शत्रु है और न कोई मित्र।
जब वे असुरों को दण्ड देते हैं, तो उनकी भलाई के लिए ऐसाकरते हैं और जब भक्तों की स्तुतियाँ स्वीकार करते हैं, तो वह उनके कल्याण के लिए होता है।
बे न तो स्तुतियों से प्रभावित होते हैं न निन््दा से।
"
तस्मद्वैरानुबन्धेन निर्वरेण भयेन वा ।
स्नेहात्कामेन वा युउ्ज्यात्कथद्धिन्नेक्षते पृथक् ॥
२६॥
तस्मात्ू--अतएव; वैर-अनुबन्धेन--निरन्तर शत्रुता से; निर्वेण -- भक्ति से; भयेन-- भय से; वा--अथवा; स्नेहात्-स्नेह से;कामेन--विषय वासनाओं से; वा--अथवा; युज्ज्यात्-केन्द्रित करे; कथज्जित्ू--किसी न किसी तरह; न--नहीं; ईक्षते--देखता है; पृथक् --अन्य कुछ
अतएव यदि कोई बद्धजीव किसी तरह शत्रुता या भक्ति, भय, स्नेह या विषयवासनाद्वारा--इनमें से सभी या किसी एक के द्वारा--अपने मन को भगवान् पर केन्द्रित करता है, तोपरिणाम एक सा मिलता है, क्योंकि अपनी आनन्दमयी स्थिति के कारण भगवान् कभी भीशत्रुता या मित्रता द्वारा प्रभावित नहीं होते।
"
यथा वैरानुबन्धेन मर्त्यस्तन्मयतामियात् ।
न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मति: ॥
२७॥
यथा--जिस तरह; बैर-अनुबन्धेन--निरन््तर शत्रुता से; मर्त्य:--व्यक्ति; तत्-मयताम्--उनमें तल्लीनता; इयात्--प्राप्त करसकता है; न--नहीं; तथा--उसी तरह; भक्ति-योगेन-- भक्ति से; इति--इस प्रकार; मे--मेरा; निश्चिता--निश्चित; मति:--मत,विचार
नारद मुनि ने आगे बताया--मनुष्य को भक्ति द्वारा भगवान् के विचार में ऐसी गहनतल्लीनता प्राप्त नहीं हो सकती जितनी कि उनके प्रति शत्रुता के माध्यम से।
ऐसा मेरा विचार है।
"
कीटः पेशस्कृता रुद्ध: कुड्यायां तमनुस्मरन् ।
संरम्भभययोगेन विन्दते तत्स्वरूपताम् ॥
२८॥
एवं कृष्णे भगवति मायामनुज ईश्वरे ।
वैरेण पूतपाप्मानस्तमापुरनुचिन्तया ॥
२९॥
कीट:--कीड़ा; पेशस्कृता--मधुमक्खी ( भूंगी ) द्वारा; रुद्ध:--बन्दी बनाया गया; कुड्यायाम्--दीवाल के छेद में; तम्--उस( मधुमक्खी ) को; अनुस्मरन्--सोचते हुए; संरम्भ-भय-योगेन-- अत्यधिक भय तथा शत्रुता के द्वारा; विन्दते--प्राप्त करता है;ततू--उस मक्खी का; स्व-रूपताम्--वही रूप; एवम्--इस प्रकार; कृष्णे--कृष्ण में; भगवति-- भगवान्; माया-मनुजे--जोअपनी ही शक्ति से मनुष्य रूप में; ईश्वेर--परम; वैरेण--शत्रुता से; पूत-पाप्मान:--पापों से शुद्ध हुए; तम्ू--उसको; आपु:--प्राप्त किया; अनुचिन्तया--चिन्तन से |
एक मधुमक्खी ( भूंगी ) द्वारा दीवाल के छेद में बन्दी बनाया गया एक कीड़ा सदैव भयतथा शत्रुता के कारण उस मधुमक्खी के विषय में सोचता रहता है और बाद में मात्र चिन्तन सेस्वयं मधुमक्खी बन जाता है।
इसी प्रकार यदि सारे बद्धजीव किसी तरह सच्चिदानन्द विग्रहश्रीकृष्ण का चिन्तन करें, तो वे पापों से मुक्त हो जाएँगे।
वे भगवान् को चाहे पूज्य रूप में मानेंया शत्रु के रूप में, निरन्तर उनका चिन्तन करते रहने से उन सबों को आध्यात्मिक शरीर कीपुनःप्राप्ति हो जाएगी।
"
कामाददवेषाद्धयात्स्नेहाद्यथा भक्त्येश्वेर मन: ।
आवेश्य तदघं हित्वा बहवस्तद्गतिं गता: ॥
३०॥
कामात्--काम से; द्वेषातू-घृणा से; भयात्-- भय से; स्नेहातू-स्नेह से; यथा--तथा; भक्त्या--भक्ति से; ईश्वर--ई श्वर में;मनः--मन; आवेश्य--लीन करके; तत्--उस; अघम्--पाप को; हित्वा--त्याग कर; बहवः--अनेक; तत्--उस; गतिम्--मुक्ति के मार्ग को; गता:--प्राप्त हुए।
अनेकानेक व्यक्तियों ने केवल अत्यन्त एकाग्रतापूर्वक कृष्ण का चिन्तन करके तथापापपूर्ण कर्मों का त्याग करके मुक्ति प्राप्त की है।
यह ध्यान कामवासनाओं, शजत्रुतापूर्णभावनाओं, भय, स्नेह या भक्ति के कारण हो सकता है।
अब मैं यह बताऊँगा कि किस प्रकारसे मनुष्य भगवान् में अपने मन को एकाग्र करके कृष्ण की कृपा प्राप्त करता है।
"
गोप्यः कामाद्धयात्कंसो द्वेषाच्चैद्यादयो नृपा: ।
सम्बन्धाद्वष्णय: स्नेहाद्यूयं भक्त्या वयं विभो ॥
३१॥
गोप्य:--गोपियाँ; कामात्--काम-वासनाओं से; भयात्-- भय से; कंसः--राजा कंस; द्वेषात्-द्वेष से; चैद्य-आदय:--शिशुपाल तथा अन्य; नृपा:--राजा; सम्बन्धात्--नाते से; वृष्णय: --वृष्णिजन या यादवगण; स्नेहात्ू--स्नेह से; यूयमू--तुमसब, सारे ( पाण्डव ); भक्त्या--भक्ति से; वयम्--हम सब; विभो--हे महान् राजा।
हे राजा युधिष्ठिर, गोपियाँ अपनी विषयवासना से, कंस भय से, शिशुपाल तथा अन्य राजाईर्ष्या से, यदुगण कृष्ण के साथ पारिवारिक सम्बन्ध से, तुम सब पाण्डव कृष्ण के प्रति अपारस्नेह से तथा हम सारे सामान्य भक्त अपनी भक्ति से कृष्ण की कृपा को प्राप्त कर सके हैं।
"
कतमोपि न वेनः स्यात्पञ्ञानां पुरुषं प्रति ।
तस्मात्केनाप्युपायेन मनः कृष्णे निवेशयेत् ॥
३२॥
कतमः अपि--कोई भी; न--नहीं; वेन:--नास्तिक राजा वेन; स्थातू--ग्रहण करेगा; पञ्ञानाम्--पाँचों का ( जिनका उल्लेखपहले हो चुका है ); पुरुषम्-- भगवान् के; प्रति--प्रति; तस्मात्ू--अतएव; केनापि--किसी भी; उपायेन--उपाय से; मन:ः--मनको; कृष्णे--कृष्ण में; निवेशयेत्--स्थिर करना चाहिये।
मनुष्य को किसी न किसी प्रकार से कृष्ण के स्वरूप पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए।
तब ऊपर बताई गई पाँच विधियों में से किसी एक के द्वारा वह भगवद्धाम वापस जा सकता है।
लेकिन राजा वेन जैसे नास्तिक इन पाँचों विधियों में से किसी एक के द्वारा कृष्ण के स्वरूप काचिन्तन करने में असमर्थ होने से मोक्ष नहीं पा सकते।
अतएव मनुष्य को चाहिए कि जैसे भी हो,चाहे मित्र बनकर या शत्रु बनकर, वह भगवान् का चिन्तन करे।
"
मातृष्वस््रेयो वश्चैद्यो दन््तवक्रश्च पाण्डव ।
पार्षदप्रवरौ विष्णोर्विप्रशापात्पदच्युतौ ॥
३३॥
मातृ-स्वस्त्रे:ः --मौसी का पुत्र ( शिशुपाल ); व: --तुम्हारा; चैद्यः --राजा शिशुपाल; दन्तवक्र:--दन्तवक्र ; च--तथा;पाण्डव--हे पाण्डव; पार्षद-प्रवरौ --दोनों श्रेष्ठ पार्षद; विष्णो: --विष्णु के; विप्र--ब्राह्मणों के; शापात्ू--शाप से; पद--बैकुण्ठ लोक में अपने पद से; च्युतौ--गिरे हुए
नारद मुनि ने आगे कहा : हे पाण्डवश्रेष्ठ, तुम्हारी मौसी के दोनों पुत्र तुम्हारे चचेरे भाईशिशुपाल तथा दन्तवक्र पहले भगवान् विष्णु के पार्षद थे, लेकिन ब्राह्मणों के शाप से वेवैकुण्ठ लोक से इस भौतिक जगत में आ गिरे।
"
श्रीयुधिष्ठटिर उवाच'कीहशः कस्य वा शापो हरिदासाभिमर्शन: ।
अश्रद्धेय इवाभाति हरेरेकान्तिनां भव: ॥
३४॥
श्री-युधिष्ठटिर: उवाच--महाराज युधिष्ठटिर ने कहा; कीहश:--किस प्रकार का; कस्य--किसका; वा--अथवा; शाप: -- श्राप;हरि-दास--हरि का सेवक; अभिमर्शन:--हरा कर; अश्रद्धेयः--अविश्वसनीय; इब--मानो; आभाति-- प्रकट होता है; हरे: --हरि का; एकान्तिनामू--उनका जे श्रेष्ठ पार्षदों के रूप में अनुरक्त हैं; भव:--जन्म |
महाराज युधिष्टिर ने पूछा : किस प्रकार के महानू श्राप ने मुक्त विष्णु-भक्तों को भीप्रभावित किया और किस तरह का व्यक्ति भगवान् के भी पार्षदों को श्राप दे सका ?
भगवान् केहढ़ भक्तों के लिए इस भौतिक जगत में फिर से आ गिरना असम्भव है।
मैं इस पर विश्वास नहींकर सकता।
"
देहेन्द्रियासुहीनानां वैकुण्ठपुरवासिनाम् ।
देहसम्बन्धसम्बद्धमेतदाख्यातुमहसि ॥
३५॥
देह-- भौतिक शरीर की; इन्द्रिय--इन्दियाँ; असु-- प्राण; हीनानाम्--जो रहित हैं उनका; बैकुण्ठ-पुर--वैकुण्ठ के;वासिनाम्--निवासियों का; देह-सम्बन्ध-- भौतिक शरीर में; सम्बद्धम्--बन्धन; एतत्--यह; आख्यातुम् अहंसि--कृपया वर्णनकरें।
वैकुण्ठवासियों के शरीर पूर्णतया आध्यात्मिक होते हैं, उनको भौतिक शरीर से, इन्द्रियों याप्राण से कुछ लेना-देना नहीं रहता।
अतएवं कृपा करके बताइये कि किस तरह भगवान् केपार्षदों को सामान्य व्यक्तियों की तरह भौतिक शरीर में अवतरित होने का श्राप दिया गया ?
" श्रीनारद उवाचएकदा ब्रह्मण: पुत्रा विष्णुलोक॑ यहच्छया ।
सनन्दनादयो जम्मुश्चरन्तो भुवनत्रयम् ॥
३६॥
श्री-नारद: उबाच-- श्री नारद मुनि ने कहा; एकदा--एक बार; ब्रह्मण: --ब्रह्माजी के; पुत्रा:--पुत्र; विष्णु-- भगवान् विष्णु के;लोकम्--लोक में; यहच्छया--संयोगवश; सनन्दन-आदय: --सनन्दन तथा अन्य; जग्मु;--गये; चरन्त:--विचरण करते;भुवन-त्रयम्--तीनों लोकों में |
परम साधु नारद ने कहा--एक बार ब्रह्मा के चारों पुत्र जिनके नाम सनक, सनन्दन, सनातनतथा सनत्कुमार हैं, तीनों लोकों का विचरण करते हुए संयोगवश विष्णुलोक में आये।
"
पञ्जषड्डायनार्भाभा: पूर्वेषामपि पूर्वजा: ।
दिग्वासस: शिशून्मत्वा द्वा:स्थौ तान्प्रत्यपेधताम् ॥
३७॥
पञ्ञ-षट्-धा--पाँच या छः वर्ष; आयन--लगभग; अर्भ-आभा:--बालकों जैसे; पूर्वेषाम्-ब्रह्माण्ड के पुराने लोग ( मरीचितथा अन्य ); अपि--यद्यपि; पूर्व-जा:--पहले उत्पन्न; दिकु-वासस:--नंगे होने से; शिशून्-- बच्चे; मत्वा--सोचकर; द्वा:-स्थौ--दो द्वारपालों, जय तथा विजय ने; तान्ू--उनको; प्रत्यषेधताम्--मना किया |
यद्यपि ये चारों महर्षि मरीचि आदि ब्रह्मा के अन्य पुत्रों की अपेक्षा बड़े थे, किन्तु वे पाँच याछः वर्ष के छोटे-छोटे नंगे बच्चों जैसे प्रतीत हो रहे थे।
जय तथा विजय नामक इन द्वारपालों नेजब उन्हें वैकुण्ठलोक में प्रवेश करने का प्रयास करते देखा तो सामान्य बच्चे समझ कर उन्हेंप्रवेश करने से मना कर दिया।
"
अश्पन्कुपिता एवं युवां वासं न चारहथ: ।
रजस्तमोभ्यां रहिते पादमूले मधुद्विष: ।
पापिष्ठामासुरीं योनिं बालिशौ यातमाश्चतः ॥
३८॥
अशपनू--शाप दिया; कुपिता:--क्रोध से भर कर; एवम्--इस प्रकार; युवाम्--तुम दोनों; वासम्--निवास स्थान; न--नहीं;च--तथा; अईथः --योग्य हो; रज:-तमोभ्याम्--रजो तथा तमो गुणों से; रहिते--रहित; पाद-मूले--चरण कमलों पर; मधु-द्विष:--मधु असुर का वध करने वाले विष्णु के; पापिष्ठामू--अत्यन्त पापी; आसुरीम्--आसुरी; योनिम्--योनि में, गर्भ में;बालिशौ--ओरे तुम दोनों मूर्ख; यातम्ू--जाओ; आशु--शीघ्र; अतः--इसलिए |
जय तथा विजय नामक द्वारपालों द्वारा इस प्रकार रोके जाने पर सनन्दन तथा अन्य मुनियों नेक्रोधपूर्वक उन्हें श्राप दे दिया।
उन्होंने कहा--' रे दोनों मूर्ख द्वारपालों, तुम रजो तथा तमोगुणों से क्षुभित होने के कारण मधुद्विष के चरण-कमलों की शरण में रहने के अयोग्य हो,क्योंकि वे ऐसे गुणों से रहित हैं।
तुम्हारे लिए श्रेयस्कर होगा कि तुरन्त ही भौतिक जगत में जाओऔर अत्यन्त पापी असुरों के परिवार में जन्म ग्रहण करो।
"
'एवं शप्तौ स्वभवनात्पतन्तौ तौ कृपालुभि: ।
प्रोक्तौ पुनर्जन्मभिर्वा त्रिभिलोकाय कल्पताम् ॥
३९॥
एवम्--इस प्रकार; शप्तौ--शापित होकर; स्व-भवनात्--अपने निवास बैकुण्ठ से; पतन्तौ--गिरते हुए; तौ--वे दोनों ( जयतथा विजय ); कृपालुभि:--दयालु मुनियों ( सनन्दन आदि ) द्वारा ); प्रोक्तौ--सम्बोधित किये; पुनः--फिर; जन्मभि:--जन्मोंसे; वाम्--तुम्हारे; त्रिभिः--तीन; लोकाय--पद के लिए; कल्पताम्--सम्भव हो |
मुनियों द्वारा इस प्रकार शापित होकर जब जय तथा विजय भौतिक जगत में गिर रहे थे तोउन मुनियों ने उन पर दया करके इस प्रकार सम्बोधित किया, 'हे द्वारपालो, तुम तीन जन्मों केबाद वैकुण्ठलोक में अपने-अपने पदों पर लौट सकोगे, क्योंकि तब श्राप की अवधि समाप्त होचुकी होगी।
'" जज्ञाते तौ दितेः पुत्रौ दैत्यदानववन्दितौ ।
हिरण्यकशिपुर्ज्येप्टो हिरण्याक्षोडनुजस्तत: ॥
४०॥
जज्ञाते-उत्पन्न हुए; तौ--वे दोनों; दितेः--दिति के; पुत्रौ--दो पुत्र; दैत्य-दानव--समस्त असुरों से; वन्दितौ--पूजित;हिरण्यकशिपु:--हिरण्यकशिपु; ज्येष्ठ: --बड़ा; हिरण्याक्ष: --हिरण्याक्ष; अनुज:--छोटा; तत:ः--तत्पश्चात् |
भगवान् के ये दोनों पार्षद, जय तथा विजय, बाद में दिति के दो पुत्रों के रूप में जन्म लेकरइस भौतिक जगत में अवतरित हुए।
इनमें हिरण्यकशिपु बड़ा और हिरण्याक्ष छोटा था।
सारेदैत्यों तथा दानवों ( आसुरी योनियाँ ) द्वारा दोनों का अत्यधिक सम्मान किया जाता था।
"
हतो हिरण्यकशिपुरहरिणा सिंहरूपिणा ।
हिरण्याक्षो धरोद्धारे बिभ्रता शौकरं वपु: ॥
४१॥
हतः--मारा गया; हिरण्यकशिपु:--हिरण्यकशिपु; हरिणा--हरि या विष्णु द्वारा; सिंह-रूपिणा--शेर के ( भगवान् नृसिंह के )रूप में; हिरण्याक्ष:--हिरण्याक्ष; धरा-उद्धारे--पृथ्वी उठाने के लिए; बिभ्रता-- धारण करके; शौकरम्--सूकर जैसा; वपु:--स्वरूप।
भगवान् श्री हरि ने नूसिंह देव के रूप में प्रकट होकर हिरण्यकशिपु का वध किया।
जबभगवान् गर्भोदक सागर में गिरी हुई पृथ्वी का उद्धार कर रहे थे तो हिरण्याक्ष ने उन्हें रोकने काप्रयलल किया और बाद में भगवान् ने वराह के रूप में हिरण्याक्ष का वध कर दिया।
"
हिरण्यकशिपु:ः पुत्र प्रह्दं केशवप्रियम् ।
जिघांसुरकरोन्नाना यातना मृत्युहेतवे ॥
४२॥
हिरण्यकशिपु:--हिरण्यकशिपु; पुत्रम्ू-पुत्र; प्रह्दम्--प्रहाद महाराज को; केशव-प्रियम्--केशव का प्रिय भक्त; जिघांसु:--मारने की इच्छा से; अकरोत्--किया; नाना--विविध; यातना:--यातनाएँ; मृत्यु--मृत्यु ; हेतवे--के हेतु |
हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्ाद को, जो भगवान् विष्णु का महान् भक्त था, मारने के लिएनाना प्रकार के कष्ट दिये।
"
त॑ सर्वभूतात्मभूतं प्रशान्तं समदर्शनम् ।
भगवत्तेजसा स्पूष्ट नाशक्नोद्धन्तुमुद्यमै: ॥
४३॥
तम्--उसको; सर्व-भूत-आत्म-भूतम्--समस्त जीवों में आत्मा; प्रशान्तम्-शान्त किन्तु घृणा आदि से रहित; सम-दर्शनम्--समदर्शी; भगवत्-तेजसा--भगवान् की शक्ति से ; स्पृष्टम्--सुरक्षित; न--नहीं; अशक्नोत्--समर्थ हुआ; हन्तुम्-मारने में;उद्यमैः--महान् प्रयत्नों तथा विविध अस्त्रों के द्वारा
समस्त जीवों के परमात्मा भगवान् गम्भीर शान्त तथा समदर्शा हैं।
चूँकि महान् भक्त प्रह्मादभगवान् की शक्ति द्वारा सुरक्षित था, अतएव हिरण्यकशिपु नाना प्रकार के यत्न करने पर भी उसेमारने में असमर्थ रहा।
"
ततस्तौ राक्षसौ जातौ केशिन्यां विश्रव:सुतौ ।
रावण: कुम्भकर्णश्र सर्वलोकोपतापनौ ॥
४४॥
ततः--तत्पश्चात्८ तौ--दोनों द्वारपाल ( जय तथा विजय ); राक्षतौ--असुर; जातौ--उत्पन्न; केशिन्याम्--केशिनी के गर्भ से;विश्रवः-सुतौ--विश्रवा के पुत्र; रावण: --रावण; कुम्भकर्ण: --कुम्भकर्ण; च--तथा; सर्व-लोक--सभी लोगों को;उपतापनौ--कष्ट देने वाले |
तत्पश्चात् भगवान् विष्णु के दोनों द्वारपाल जय तथा विजय रावण तथा कुम्भकर्ण के रूप मेंविश्रवा द्वारा केशिनी के गर्भ से उत्पन्न किए गये।
वे ब्रह्माण्ड के समस्त लोगों को अत्यधिककष्टप्रद थे।
"
तत्रापि राघवो भूत्वा न्यहनच्छापमुक्तये ।
रामवीर्य श्रोष्यसि त्वं मार्कण्डेयमुखात्प्रभो ॥
४५॥
तत्र अपि--तत्पश्चात्; राघव:--भगवान् रामचन्द्र के रूप में; भूत्वा--प्रकट होकर; न्यहनत्--वध किया; शाप-मुक्तये--शाप-मुक्त करने के लिए; राम-वीर्यम्-- भगवान् राम का पराक्रम; श्रोष्यसि--सुनोगे; त्वमू-तुम; मार्कण्डेय-मुखात्ू--ऋषिमार्कण्डेय के मुख से; प्रभो-हे प्रभु |
नारद मुनि ने आगे कहा : हे राजा, जय तथा विजय को ब्राह्मणों के शाप से मुक्त करने केलिए भगवान् रामचन्द्र रावण तथा कुम्भकर्ण का वध करने के लिए प्रकट हुए।
अच्छा होगा कितुम भगवान् रामचन्द्र के कार्यकलापों के विषय में मार्कण्डेय से सुनो।
"
तावत्र क्षत्रियौं जातौ मातृष्वस्त्रात्मजौ तव ।
अधुना शापनिर्मुक्तौ कृष्णचक्रहतांहसौ ॥
४६॥
तौ--दोनों; अत्र--यहाँ, तीसरे जन्म में; क्षत्रियौ--क्षत्रिय अथवा राजा; जातौ--उत्पन्न; मातृ-स्वसू-आत्म-जौ--मौसी के पुत्र;तब--तुम्हारी; अधुना--अब; शाप-निर्मुक्तौ--शाप से मुक्त; कृष्ण-चक्र--कृष्ण के चक्र द्वारा; हत--विनष्ट; अंहसौ--जिसकेपाप
तीसरे जन्म में वही जय तथा विजय क्षत्रियों के कुल में तुम्हारी मौसी के पुत्रों के रूप मेंतुम्हारे मौसरे भाई बने हैं।
चूँकि भगवान् कृष्ण ने उनका वध अपने चक्र से किया है, अतएवउनके सारे पाप नष्ट हो चुके हैं और अब वे शाप से मुक्त हैं।
"
वैरानुबन्धतीब्रेण ध्यानेनाच्युतसात्मताम् ।
नीतौ पुन्रेः पार्श्व जम्मतुर्विष्णुपार्षदी ॥
४७॥
वैर-अनुबन्ध--घृणा का बन्धन; तीव्रेण--तीक्र; ध्यानेन--ध्यान से; अच्युत-सात्मताम्--अच्युत भगवान् के तेज को; नीतौ--प्राप्त किया; पुन:--फिर; हरेः:--हरि का; पार्श्रमू--सान्निध्य; जग्मतु:--वे पहुँचे; विष्णु-पार्षदौ-- भगवान् विष्णु के द्वारपालपार्षद
भगवान् विष्णु के ये दोनों पार्षद, जय तथा विजय, दीर्घकाल तक शत्रुता का भाव बनायेरहे।
इस प्रकार कृष्ण के विषय में सदैव चिन्तन करते रहने से भगवद्धाम जाने पर उन्हें पुनःभगवान् की शरण प्राप्त हो गई।
"
श्रीयुधिष्ठटिर उवाचविद्वेषो दयिते पुत्रे कथमासीन्महात्मनि ।
ब्रृहि मे भगवन्येन प्रह्मादस्याच्युतात्मता ॥
४८॥
श्री-युधिष्ठटिर: उवाच--महाराज युधिष्टठिर ने कहा; विद्वेष:--घृणा, द्वेष; दयिते--अपने प्रिय; पुत्रे--पुत्र के लिए; कथम्--किसप्रकार; आसीत्-- था; महा-आत्मनि--महान् आत्मा, प्रह्मद; ब्रृहि--कृपया कहें; मे--मुझे; भगवन्--हे श्रेष्ठ मुनि; येन--जिससे; प्रह्मदस्थ--प्रह्नाद महाराज की; अच्युत--अच्युत से; आत्मता--आत्मीयता, अत्यधिक आसक्ति |
महाराज युथिष्टठिर ने पूछा : हे नारद मुनि, हिरण्यकशिपु तथा उसके प्रिय पुत्र प्रहाद महाराजके बीच ऐसी शत्रुता क्यों थी?
प्रहाद महाराज भगवान् कृष्ण के इतने बड़े भक्त कैसे बने?
कृपया यह मुझे बतायें।
"
