← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 6 की सूची
अध्याय पाँच: नारद मुनि को प्रजापति दक्ष द्वारा श्राप
6.5श्रीशुक उबाचतस्यां स पाञ्जजन्यां वै विष्णुमायोपबूंहितः ।
हर्यश्वसंज्ञानयुतं पुत्रानजनयद्विभु: ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; तस्याम्--उस; सः--प्रजापति दक्ष; पाज्जजन्याम्--पाञ्जजनी नामकअपनी पली; बै--निश्चितही; विष्णु-माया-उपबृंहित:-- भगवान् विष्णु की माया द्वारा सक्षम बनाया गया; हर्यश्व-संज्ञानू--हर्यश्व नामक; अयुतम्--दस हजार; पुत्रानू--पुत्रों को; अजनयत्--जन्म दिया; विभु:--शक्तिशाली होने से ।
श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा : भगवान् विष्णु की माया से प्रेरित होकर प्रजापति दक्षने पात्जनी ( असिक्नी ) के गर्भ से दस हजार पुत्र उत्पन्न किये।
हे राजन! ये पुत्र हर्यश्रकहलाये।
अपृथग्धर्मशीलास्ते सर्वे दाक्षायणा नृप ।
पित्रा प्रोक्ता: प्रजासगें प्रतीचीं प्रययुर्दिशम् ॥
२॥
अपूथक्--एकसमान; धर्म-शीला:--अच्छा चरित्र तथा स्वभाव; ते--वे; सर्वे--सभी; दाक्षायणा:--दक्ष के पुत्र; नृप--हे राजन्; पित्रा--पिता द्वारा; प्रोक्ताः--आदेश दिये गये; प्रजा-सर्गे--जनसंख्या बढ़ाने के लिए; प्रतीचीम्--पश्चिमी;प्रययु:--वे गये; दिशम्--दिशा में |
हे राजन! प्रजापति दक्ष के सारे पुत्र समान रूप से अत्यन्त विनम्र तथा अपने पिता केआदेशों के प्रति आज्ञाकारी थे।
जब उनके पिता ने सन्तानें उत्पन्न करने के लिए उन्हें आदेशदिया तो वे सभी पश्चिमी दिशा की ओर चले गये।
तत्र नारायणसरस्तीर्थ सिन्धुसमुद्रयो: ।
सड़मो यत्र सुमहन्मुनिसिद्धनिषेवितम् ॥
३॥
तत्र--उस दिशा में; नारायण-सर:--नारायण सरस नामक झील; तीर्थम्--अत्यन्त पवित्र स्थान; सिन्धु-समुद्रयो: --सिन्धुनदी तथा समुद्र का; सड्रम:--संगम; यत्र--जहाँ; सु-महत्--अत्यन्त महान्; मुनि--मुनियों; सिद्ध--तथा सिद्ध मनुष्योंद्वारा; निषेवितम्--रहते हुए |
पश्चिम में, जहाँ सिन्धु नदी सागर से मिलती है, नारायण सरस नामक एक महान्तीर्थस्थान है।
वहाँ पर अनेक मुनि तथा आध्यात्मिक चेतना में उन्नत अन्य लोग रहते हैं।
तदुपस्पर्शनादेव विनिर्धूतमलाशया: ।
धर्मे पारमहंस्ये च् प्रोत्पन्नमतयोप्युत ॥
४॥
तेपिरे तप एवोग्रं पित्रादेशेन यन्त्रिता: ।
प्रजाविवृद्धये यत्तान्देवर्षिस्तान्ददर्श ह ॥
५॥
तत्--उस तीर्थस्थान का; उपस्पर्शनात्ू--उस जल में स्नान करने से या इसे छूने से; एब--केवल; बिनिर्धूत--पूर्णतया धुलगये; मल-आशया:--जिनकी अशुद्ध इच्छाएँ; धर्मे-- अभ्यासों को; पारमहंस्ये--सर्वोच्च संन्यासियों द्वारा सम्पन्न; च--भी; प्रोत्पन्न--अत्यधिक उन्मुख; मतयः--जिनके मन; अपि उत--बद्यपि; तेपिरि--उन्होंने किया; तप:--तपस्या; एव--निश्चय ही; उग्रमू--कठिन; पितृ-आदेशेन--अपने पिता के आदेश से; यन्त्रिता:--लगाये गये; प्रजा-विवृद्धये--जनसंख्याबढ़ाने के उद्देश्य से; यत्तान्ू--तैयार; देवर्षि:--नारद ऋषि; तान्ू--उनको; ददर्श--देखा; ह--निस्सन्देह |
उस तीर्थस्थान में हर्यश्रगण नियमित रूप से नदी का जल स्पर्श करने और उसमें स्नानकरने लगे।
धीरे धीरे अत्यधिक शुद्ध हो जाने पर वे परमहंसों के कार्यों के प्रति उन्मुख होगये।
फिर भी चूँकि उनके पिता ने उन्हें जनसंख्या बढ़ाने का आदेश दिया था, अतः पिताकी इच्छापूर्ति के लिए उन्होंने कठिन तपस्या की।
एक दिन जब महर्षि नारद ने इन बालकोंको जनसंख्या बढ़ाने के लिए ऐसी उत्तम तपस्या करते देखा तो वे उनके निकट आये।
उबाच चाथ हर्यश्वा: कथं स्त्रक्ष्यथ वै प्रजा: ।
अह्ष्टान्तं भुवो यूयं बालिशा बत पालका: ॥
६॥
तथेकपुरुषं राष्ट्र बिल॑ चाहृष्टनिर्गमम् ।
बहुरूपां स्त्रियं चापि पुमांसं पुंश्नलीपतिम् ॥
७॥
नदीमुभयतो वाहां पञ्ञपञ्ञाद्भधुतं गृहम् ।
क्वचिद्धंसं चित्रकथ्थ॑ क्षौरपव्यं स्वयं भ्रमि ॥
८॥
उवाच--उसने कहा; च-- भी; अथ--इस प्रकार; हर्यश्वा: --हे हर्यश्वो, प्रजापति दक्ष के पुत्रो; कथम्--क्यों; स््रक्ष्यथ--उत्पन्न करोगे; बै--निस्सन्देह; प्रजा:--सन्तानें; अदृष्ठा--बिना देखे; अन्तम्-- अन्त; भुवः--इस पृथ्वी का; यूयम्--तुमसभी; बालिशा: -- अनुभवहीन; बत--हाय; पालका:--यद्यपि शासन चलाने वाले राजकुमार; तथा--उसी तरह भी;एक--एक; पुरुषम्--मनुष्य; राष्ट्रमू--राज्य; बिलमू--छेद; च-- भी; अदृष्ट-निर्गमम्--जिससे कोई बाहर नहीं आ रहा;बहु-रूपाम्ू-- अनेक रूप धारण करते हुए; स्त्रियम्ू-स्त्री को; च--तथा; अपि-- भी; पुमांसम्--मनुष्य को; पुंश्चली-पतिम्--वेश्या का पति; नदीम्--नदी को; उभयतः--दोनों ओर से; वाहाम्ू--बहती है; पञ्ञ-पञ्ञ--पाँच गुणित पाँच( पच्चीस ); अद्भुतम्--आश्चर्य; गृहम्--घर; क्वचित्--कहीं पर; हंसम्--हंस; चित्र-कथम्--जिसकी कथा विचित्र है;क्षौर-पव्यम्-तेज छूरों तथा बज्नों से बना; स्वयम्--स्वयं; भ्रमि--घूमने वाला |
महामुनि नारद ने कहा : हे हर्यश्रो! तुमने पृथ्वी के छोरों को नहीं देखा है।
एक ऐसाराज्य है, जिसमें केवल एक व्यक्ति रहता है और उसमें जहाँ पर एक छेद है, उसमें से भीतरघुसने वाला कभी निकल कर बाहर नहीं आता।
वहाँ पर एक स्त्री है, जो अत्यन्त कुमार्गिनी( असाध्वी ) है और वह नाना प्रकार के आकर्षक वस्त्रों से अपने को सुसज्जित करती है औरवहाँ जो पुरुष रहता है, वह उसका पति है।
उस राज्य में एक नदी है, जो दोनों दिशाओं मेंबहती है, पच्चीस पदार्थों से बना हुआ एक अद्भुत घर है, एक हंस है, जो नाना प्रकार कीध्वनियाँ करता है और एक स्वत: घूमने वाली वस्तु है, जो तेज छूरों तथा वज्नों से बनी है।
तुम लोगों ने इन सबों को नहीं देखा इसलिए तुम लोग उच्च ज्ञान से रहित अनुभवहीनबालक हो।
तो फिर तुम किस तरह सन्तान उत्पन्न करोगे ?
कथ्॑ स्वपितुरादेशमविद्वांसो विपश्चित: ।
अनुरूपमविज्ञाय अहो सर्ग करिष्यथ ॥
९॥
कथम्--किस तरह; स्व-पितु:--अपने पिता का; आदेशम्--आदेश; अविद्वांस:--अज्ञान; विपश्चित: --प्रत्येक बातजानने वाला; अनुरूपम्--तुम्हारे अनुरूप; अविज्ञाय--बिना जाने; अहो--हाय; सर्गम्--सृष्टि; करिष्यथ--तुम करोगे।
हाय! तुम्हारा पिता तो सर्वज्ञ है, किन्तु तुम उनके असली आदेश को नहीं जानते।
अपनेपिता के असली उद्देश्य को जाने बिना तुम किस तरह सन््तान उत्पन्न करोगे ?
श्रीशुक उबाचतन्निशम्याथ हर्यश्ला औत्पत्तिकमनीषया ।
वबाच: कूटं तु देवर्षे: स्वयं विममृशुरधिया ॥
१०॥
श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; तत्--वह; निशम्य--सुनकर; अथ--इसके बाद; हर्यश्वा:--प्रजापतिदक्ष के सारे पुत्र; औत्पत्तिक--स्वभावतः जाग्रत; मनीषया--विचार करने की शक्ति होने से; वाच:--वाणी का; कूटम्--आसानी से समझ में न आने वाली बात; तु--लेकिन; देवर्षे:--नारद मुनि की; स्वयम्--स्वयं; विममृशु:--विचार किया;धिया--पूरी बुद्धि से |
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : नारदमुनि के गूढ़ शब्दों को सुनकर हर्यश्वों ने अपनीस्वाभाविक बुद्धि से दूसरों से सहायता लिये बिना विचार किया।
भू: क्षेत्र जीवसंज्ञं यदनादि निजबन्धनम् ।
अद्दष्टा तस्य निर्वाणं किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥
११॥
भू:--पृथ्वी; क्षेत्रमू--कार्यक्षेत्र; जीव-संज्ञम--कर्म के विभिन्न फलों से बँधने की आध्यात्मिक जीव की उपाधि; यत्--जो; अनादि--अनादि काल से विद्यमान; निज-बन्धनम्--अपना ही बन्धन उत्पन्न करके; अददप्ठा--देखे बिना; तस्य--इसका; निर्वाणम्--अन्त; किमू--क्या लाभ; असत्-कर्मभि:--क्षणिक सकाम कर्मो से; भवेत्--हो सकता है।
[हर्यश्ों ने नारद के शब्दों का अर्थ इस प्रकार समझा थू: शब्द कर्मक्षेत्र का द्योतक है।
यह भौतिक शरीर जो मनुष्य के कर्मों का फल होता है, उसका कर्मक्षेत्र है और यह उसे झूठीउपाधियाँ देता है।
अनादि काल से मनुष्य को विविध प्रकार के भौतिक शरीर प्राप्त होते रहेहैं, जो भौतिक जगत से बन्धन के मूल हैं।
यदि कोई मनुष्य मूर्खतावश क्षणिक सकाम कर्मोंमें अपने को लगाता है और इस बन्धन को समाप्त करने की ओर नहीं देखता तो उसकोकर्मों का क्या लाभ मिलेगा ?
एक एवेश्वरस्तुर्यों भगवान्स्वाश्रय: पर: ।
तमहृष्ठाभवं पुंसः किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥
१२॥
एक:ः--एक; एव--निस्सन्देह; ई श्वरः --परम नियन्ता; तुर्य:--चतुर्थ दिव्य अवस्था, तुरीय; भगवान्-- भगवान्; स्व-आश्रयः--्वतंत्र, अपना ही आश्रय होने से; पर: --इस भौतिक सृष्टि के परे; तम्ू--उसको; अद्ृष्ठा --बिना देखे;अभवम्--जो उत्पन्न नहीं हुआ; पुंसः--मनुष्य का; किम्--क्या लाभ; असत्ू-कर्मभि: -- क्षणिक सकाम कर्मों से;भवेत्--हो सकता है
नारद मुनि ने कहा था कि एक ऐसा राज्य है जहाँ केवल एक नर है।
हर्यश्वों को इसकथन के आशय की अनुभूति हुई एकमात्र भोक्ता भगवान् हैं, जो हर वस्तु को हर जगहदेखते हैं।
वे षड़॒ऐश्वर्यों से पूर्ण हैं और अन्य सबों से पूर्णतया स्वतंत्र हैं।
वे कभी भी भौतिकप्रकृति के तीन गुणों से प्रभावित नहीं होते, क्योंकि वे सदा से इस भौतिक सृष्टि से परे रहे हैं।
यदि मानव-समाज के सदस्य ज्ञान तथा कर्मों की प्रगति के माध्यम से उन परम पुरुष कोनहीं समझते बल्कि क्षणिक सुख के लिए रात-दिन कुत्ते-बिल्लियों की तरह अत्यधिककठोर श्रम करते हैं, तो उनके कार्यों से क्या लाभ ?
पुमान्नैवैति यद्गत्वा बिलस्वर्ग गतो यथा ।
प्रत्यग्धामाविद इह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥
१३॥
पुमान्ू--मनुष्य; न--नहीं; एबव--निस्सन्देह; एति--वापस आता है; यत्--जिस तक; गत्वा--जाकर; बिल-स्वर्गम्--पाताल तक; गत:--गया हुआ; यथा--जिस तरह; प्रत्यकू-धाम--तेजोमय आध्यात्मिक जगत; अविदः--अज्ञानी मनुष्यका; इह--इस भौतिक जगत में; किमू--क्या लाभ; असत््-कर्मभि:--नश्वर सकाम कर्म से; भवेत्--हो सकता है |
[नारद मुनि ने कहा था कि एक बिल या छेद है, जिसमें प्रवेश करने के बाद कोईलौटता नहीं।
हर्यश्र इस रूपक का अर्थ समझ गये।
एक बार जो व्यक्ति पाताल नाम निम्नतर लोकों में प्रवेश करता है, वह मुश्किल से लौटता देखा जाता है।
इसी तरह यदिकोई वैकुण्ठ धाम ( प्रत्यग् धाम ) में प्रवेश करता है, तो वह इस भौतिक जगत में लौटकरनहीं आता।
यदि कोई ऐसा स्थान है जहाँ जाकर मनुष्य इस दुखमय भौतिक जीवन में नहींलौटता तो फिर नश्वर भौतिक जगत में बन्दरों की तरह उछलने-कूदने एवं उस स्थान को नदेखने या समझने से क्या लाभ ?
इससे क्या लाभ होगा ?
नानारूपात्मनो बुद्धि: स्वैरिणीव गुणान्विता ।
तन्निष्ठामगतस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥
१४॥
नाना--विविध; रूपा--रूप या वेश वाले; आत्मन:--जीव की; बुर्द्धि:--बुद्धि; स्वैरिणी--वेश्या जो स्वतंत्र रूप से नानाप्रकार के बस्त्रों तथा गहनों से अपने को सजाती है; इब--सहृश; गुण-अन्विता--रजोगुण इत्यादि से समन्वित; ततू-निष्ठामू--उसका अन्त; अगतस्य--जिसने नहीं प्राप्त किया है उसका; इह--इस भौतिक जगत में; किम् असत्-कर्मभिःभवेत्--नश्वर सकाम कर्म करने से क्या लाभ |
[ नारद मुनि ने एक स्त्री का वर्णन किया था, जो पेशेवर वेश्या है।
हर्यश्रों को इस स्त्रीकी पहचान समझ में आ गईं रजोगुण से मिश्रित हुई प्रत्येक जीव की अस्थिर बुद्धि उसवेश्या के समान है, जो किसी के ध्यान को आकृष्ट करने के लिए अपने वस्त्र बदलती रहतीहै।
यदि कोई मनुष्य यह जाने बिना कि यह किस तरह हो रहा है, पूरी तरह क्षणभंगुर सकामकर्मों में लगा रहता है, तो उसे वास्तव में कया लाभ मिलता है?
तत्सड्रभ्रंशितैश्वर्य संसरन्तं कुभार्यवत् ।
तद्गतीरबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥
१५॥
तत्-सड़--बुद्धिरूपी वेश्या की संगति से; भ्रंशित--हरी गई; ऐश्वर्यम्--स्वतंत्रता का ऐ श्वर्य; संसरन्तम्-- भौतिक जीवन-शैली बिताते हुए; कु-भार्य-वत्--उस व्यक्ति की तरह जिसकी पतली दूषित है; तत्-गती:ः --दूषित बुद्धि की हरकतें;अबुधस्य--न जानने वाले की; इह--इस जगत में; किम् असत्-कर्मभि: भवेत्--
क्षिणिक सकाम कर्मो के करने से क्यालाभ हो सकता है ?
[ नारद मुनि ने एक ऐसे मनुष्य की भी बात कही थी जो वेश्या का पति है।
हर्यश्रों नेइसे इस प्रकार समझा यदि कोई पुरुष किसी वेश्या का पति बनता है, तो वह अपनी सारीस्वतंत्रता खो देता है।
इसी तरह यदि जीव की बुद्धि दूषित है, तो वह अपने भौतिकतावादीजीवन को बढ़ा लेता है।
भौतिक प्रकृति से निराश होकर उसे बुद्धि की गतियों का अनुसरण करना पड़ता है, जो सुख तथा दुख की विविध स्थितियों को लाती हैं।
यदि कोई ऐसीस्थितियों में सकाम कर्म करता है, तो इससे क्या लाभ होगा ?
सृष्टय्॒प्ययकरीं मायां वेलाकूलान्तवेगिताम् ।
मत्तस्य तामविज्ञस्थ किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥
१६॥
सृष्टि--सृष्टि; अप्यय--प्रलय; करीम्--करने वाली; मायाम्--मोहिनी शक्ति; वेला-कूल-अन्त--किनारे के निकट;वेगिताम्--अत्यन्त तेज होने से; मत्तस्य--उन्मत्त का; तामू--उस भौतिक प्रकृति को; अविज्ञस्थ--न जानने वाला; किम्असत्ू-कर्मभिः भवेत्--क्षणिक सकाम कर्म करने से क्या लाभ हो सकता है[
नारद मुनि ने कहा था कि एक नदी है, जो दोनों दिशाओं में बहती है।
हर्यश्वों ने इसकथन का तात्पर्य समझा भौतिक प्रकृति दो प्रकार से कार्य करती है--सृजन द्वारा तथासंहार द्वारा।
इस तरह भौतिक प्रकृति-रूपी नदी दोनों दिशाओं में बहती है।
जो जीवअनजाने में इस नदी में गिर जाता है, वह इसकी लहरों में डूबता-उतराता जाता है और चूँकिनदी के किनारों के निकट धारा अधिक तेज रहती है, इसलिए वह बाहर निकल पाने मेंअसमर्थ रहता है।
माया-रूपी उस नदी में सकाम कर्म करने से क्या लाभ होगा ?
पञ्जञविंशतितत्त्वानां पुरुषोद्भुतदर्पण: ।
अध्यात्ममबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥
१७॥
पञ्ञ-विंशति--पच्चीस; तत्त्वानामू--तत्त्वों में से; पुरुष:-- भगवान्; अद्भुत-दर्पण: --अद्भुत का प्रकट कर्ता;अध्यात्ममू--समस्त कार्यो तथा कारणों का द्रष्टा; अबुधस्य--न जानने वाले का; इह--इस संसार में; किम् असत्-कर्मभिःभवेत्--क्षणभंगुर सकाम कार्यो में लगे रहने से क्या लाभ हो सकता है ?
[ नारद मुनि ने कहा था कि पच्चीस तत्त्वों से बना हुआ एक घर है।
हर्यश्वों को यहरूपक समझ में आ गया भगवान् पच्चीस तत्त्वों के आगार हैं और परम पुरुष होने केकारण कार्य-कारण के संचालक रूप में वे उनकी अभिव्यक्ति करते हैं।
यदि कोई व्यक्तिक्षणभंगुर सकाम कर्मों में अपने को लगाता है और उस परम पुरुष को नहीं जानता तो उसेक्या लाभ प्राप्त होगा ?
ऐश्वरं शास्त्रमुत्सृज्य बन्धमोक्षानुदर्शनम् ।
विविक्तपदमज्ञाय किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥
१८॥
ऐश्वरम्-ईश्वर का ज्ञान या कृष्णभावनामृत लाना; शास्त्रमू--वैदिक साहित्य; उत्सृज्य--त्यागकर; बन्ध--बन्धन का;मोक्ष--तथा मोक्ष का; अनुदर्शनम्--विधियों की जानकारी देना; विविक्त-पदम्--आत्मा को पदार्थ से पृथक् करना;अज्ञाय--न जानते हुए; किम् असत्-कर्मभिः भवेत्--क्षणभंगुर सकाम कर्मों का क्या लाभ हो सकता है।
[ नारद मुनि ने हंस की बात की थी।
इस श्लोक में हंस की व्याख्या की गई है ।
वैदिकग्रन्थ ( शास्त्र ) भलीभाँति यह बताते हैं, कि समस्त भौतिक तथा आध्यात्मिक शक्ति के स्त्रोतभगवान् को किस तरह समझना चाहिए।
दरअसल, वे इन दोनों शक्तियों की विस्तार सेव्याख्या करते हैं।
हंस वह है, जो पदार्थ तथा आत्मा में अन्तर करता है, जो हर वस्तु के सारको ग्रहण करता है और जो बन्धन के तथा मोक्ष के उपायों की व्याख्या करता है।
शास्त्रों केशब्द विविध प्रकार की ध्वनियों के रूप में हैं।
यदि कोई मूर्ख धूर्त व्यक्ति नश्वर कार्यों मेंलगने के लिए इन शास्त्रों के अध्ययन को ताक पर रख देता है, तो फिर परिणाम क्याहोगा ?
कालचक् भ्रमि तीक्ष्णं सर्व निष्कर्षयजगत् ।
स्वतन्त्रमबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥
१९॥
काल-चक्रम्--नित्यकाल का चक्र; भ्रमि-- स्वतः घूमता हुआ; तीक्ष्णम्-- अत्यन्त तेज; सर्वम्--समस्त; निष्कर्षयत् --हाँकते हुए; जगत्--संसार; स्व-तन्त्रम्--स्वतंत्र तथाकथित विज्ञानियों तथा दार्शनिकों की परवाह न करते हुए;अबुधस्य--( काल के नियम को ) न जानने वाले का; इह--इस भौतिक जगत में; किम् असत्-कर्मभि: भवेत्-- क्षणिकसकाम कर्मों में लगने से क्या लाभ |
[ नारद मुनि ने तेज छुरों तथा बज्रों से बनी एक भौतिक वस्तु की बात की थी।
हर्य्रों नेइस रूपक को इस प्रकार समझा नित्य काल बहुत ही तीक्ष्णता से गति करता है, मानो छुरोंतथा बचज्ों से बना हुआ हो।
यह काल अबाध रूप से तथा पूर्णतया स्वतंत्र होकर सारे जगतके कार्यो का संचालन करता है।
यदि मनुष्य नित्य काल तत्त्व का अध्ययन करने का प्रयासनहीं करता तो वह क्षणिक भौतिक कार्यों को करने से क्या लाभ प्राप्त कर सकता है?
शास्त्रस्य पितुरादेशं यो न वेद निवर्तकम् ।
कथं तदनुरूपाय गुणविस्प्रम्भ्युपक्रमेत् ॥
२०॥
शास्त्रस्य--शास्त्रों का; पितु:--पिता का; आदेशम्-- आदेश; य:ः--जो कोई; न--नहीं; वेद--समझता है; निवर्तकम्--जो जीवन की भौतिक शैली का अन्त कर देता है; कथम्--कैसे; तत्-अनुरूपाय--शास्त्रों के आदेश का पालन करने केलिए; गुण-विस्त्रम्भी-- प्रकृति के तीन गुणों में फँसा व्यक्ति; उपक्रमेत्--सन्तति उत्पन्न करने के काम में लग सकता है।
[ नारद मुनि ने पूछा था कि मनुष्य किस तरह अज्ञानवश अपने ही पिता की आज्ञा काउल्लंघन कर सकता है।
हर्यश्रों ने इस प्रश्न का अर्थ समझ लिया था मनुष्य को शास्त्र केमूल आदेशों को स्वीकार करना चाहिए।
वैदिक सभ्यता के अनुसार मनुष्य को द्वितीय जन्मके चिहृमरूप में यज्ञोपवीत ( जनेऊ ) प्रदान किया जाता है।
वह प्रामाणिक गुरु से शास्त्रों केआदेश प्राप्त कर चुकने के फलस्वरूप दूसरा जन्म पाता है।
इसलिए शास्त्र असली पिता है।
सारे शास्त्रों का आदेश है कि मनुष्य अपने जीवन की भौतिक शैली को समाप्त कर दे।
यदिवह पिता अर्थात् शास्त्रों के आदेशों का उद्देश्य नहीं समझता तो वह अज्ञानी है।
जो पिताअपने पुत्र को भौतिक कार्यों में लगाये रखने का प्रयल करता है, उसके वचन पिता केअसली आदेश नहीं होते।
इति व्यवसिता राजन्हर्यश्रा एकचेतस: ।
प्रययुस्तं परिक्रम्य पन््थानमनिवर्तनम् ॥
२१॥
इति--इस प्रकार; व्यवसिता:--नारद मुनि के उपदेशों से पूर्णतया आश्वस्त हुए; राजन्ू--हे राजन्; हर्यश्वा: --प्रजापति दक्षके पुत्र; एक-चेतस:--सभी एकमत होने से; प्रययु:--विदा ली; तम्--नारदमुनि को; परिक्रम्य--प्रदक्षिणा करके;पन्थानम्ू--पथ पर; अनिवर्तनम्--जिससे इस भौतिक जगत में फिर से कोई वापस नहीं आता।
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे राजन्! नारद मुनि के उपदेशों को सुनने के बादप्रजापति दक्ष के पुत्र हर्यश्वों को पूरी तरह से समझ में आ गया।
उन सबों ने उनके उपदेशों मेंविश्वास किया और वे एक ही निष्कर्ष पर पहुँचे।
उन्हें अपना गुरु स्वीकार कर लेने पर उन्होंनेउस महामुनि की प्रदक्षिणा की और उस पथ का अनुसरण किया जिससे कोई इस जगत मेंफिर नहीं लौटता।
स्वरब्रह्मणि निर्भातहषीकेशपदाम्बुजे ।
अखण्डं चित्तमावेश्य लोकाननुचरन्मुनि: ॥
२२॥
स्वर-ब्रह्मणि-- आध्यात्मिक ध्वनि में; निर्भात--मन के समक्ष स्पष्ट रूप से रखते हुए; हषीकेश-- भगवान् कृष्ण का, जोकि इन्द्रियों के स्वामी हैं; पदाम्बुजे--चरणकमलों पर; अखण्डम्--अटूट; चित्तम्ू--चेतना; आवेश्य--लगाकर;लोकानू--सारे लोकों; अनुचरत्--चारों ओर यात्रा की; मुनि:--नारदमुनि ने |
संगीत यंत्रों में सात स्वरों--ष, ऋ, गा, म, प, ध तथा नि का प्रयोग किया जाता है,किन्तु ये सातों स्वर मूलतः सामवेद से आये।
महामुनि नारद भगवान् की लीलाओं का वर्णनकरते हुए ध्वनियाँ करते हैं।
ऐसी दिव्य ध्वनियों यथा हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरेहरे।
हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे, से वे अपने मन को भगवान् के चरणकमलों परस्थिर करते हैं।
इस तरह वे इन्द्रियों के स्वामी हषीकेश का प्रत्यक्ष दर्शन करते हैं।
हर्यश्रों काउद्धार करने के बाद नारद मुनि ने अपने मन को भगवान् के चरणकमलों में सदा स्थिर रखतेहुए सारे लोकों में अपनी यात्रा जारी रखी।
नाशं निशम्य पुत्राणां नारदाच्छीलशालिनाम् ।
अन्वतप्यत कः शोचन्सुप्रजस्त्व॑ं शुच्चां पदम् ॥
२३॥
नाशम्--हानि; निशम्य--सुनकर; पुत्राणाम्--अपने पुत्रों की; नारदात्ू--नारद से; शील-शालिनाम्--सुशील व्यक्तियों मेंसर्वश्रेष्ठ; अन्वतप्पत--सहन किया; क:--प्रजापति दक्ष; शोचन्--शोक करते हुए; सु-प्रजस्त्वम्--दस हजार सुशील पुत्रोंवाला; शुच्याम्--शोक का; पदम्--स्थान
प्रजापति दक्ष के पुत्र हर्यश्व अत्यन्त सुशील, सुसंस्कृत पुत्र थे, किन्तु दुर्भाग्यवश नारदमुनि के उपदेशों से वे अपने पिता के आदेश से विपथ हो गये।
जब दक्ष ने यह समाचारसुना, जिसे उन तक नारद मुनि लाये थे, तो वे पश्चाताप करने लगे।
यद्यपि वे ऐसे उत्तम पुत्रोंश़ के पिता थे, किन्तु वे सब उनके हाथ से निकल चुके थे।
निश्चय ही यह शोचनीय था।
स भूयः पाञ्जजन्यायामजेन परिसान्त्वित: ।
पुत्रानजनयहक्षः सवलाश्चान्सहस्त्रिण: ॥
२४॥
सः--प्रजापति दक्ष:; भूय:--पुनः ; पाद्जजन्यायामू-- अपनी पत्नी अस्किनी या पाञ्जजनी के गर्भ से; अजेन--ब्रह्मा द्वारा;परिसान्त्वित:--सान्त्वना दिये जाने पर; पुत्रानू--पुत्रों को; अजनयत्--उत्पन्न किया; दक्ष:--प्रजापति दक्ष ने;सवलाश्चान्ू--सवलाश्रों के नामवाले; सहस्त्रिणप:--एक हजार।
जब प्रजापति दक्ष अपने खोये हुए पुत्रों के लिए शोक कर रहे थे तो ब्रह्मा ने उपदेशदेकर उन्हें सान्वना दी और उसके बाद दक्ष ने अपनी पत्नी पाज्जजनी के गर्भ से एक हजारसनन््तानें और उत्पन्न कीं।
इस बार के उनके पुत्र सवलाश्व कहलाये।
ते च पित्रा समादिष्टा: प्रजासगें ध्ृतब्रता: ।
नारायणसरो जम्मुर्यत्र सिद्धाः स्वपूर्वजा: ॥
२५॥
ते--ये पुत्र ( सबलाश्व ); च--तथा; पित्रा--अपने पिता द्वारा; समादिष्टा:--आदेश दिये गये; प्रजा-सर्गे--सन्तति याजनसंख्या बढ़ाने में; धृत-ब्रता:--ब्रत स्वीकार किया; नारायण-सर:--नारायण सरस नामक पवित्र झील; जग्मु:--गये;यत्र--जहाँ; सिद्धा:--पूरा किया; स्व-पूर्व-जा:--उनके बड़े भाई जो पहले वहाँ गये थे।
सन्तानें उत्पन्न करने के अपने पिता के आदेशानुसार पुत्रों की यह दूसरी टोली भीनारायण सरस नामक उस स्थान पर गई, जहाँ उनके भाइयों ने इसके पूर्व नारद के उपदेशोंका पालन करते हुए सिद्धि प्राप्त की थी।
तपस्या का महान् व्रत लेकर सवलाश्व उस पवित्र स्थान पर रहने लगे।
तदुपस्पर्शनादेव विनिर्धूतमलाशया: ।
जपन्तो ब्रह्म परम॑ तेपुस्तत्र महत्तप: ॥
२६॥
तत्--उस तीर्थस्थान के; उपस्पर्शनात्ू--जल में नियमित स्नान करने से; एब--निस्सन्देह; विनिर्धूत--पूर्णतया शुद्ध हुए;मल-आशया:--हदय के भीतर की सारी धूल से; जपन्त:--कीर्तन करते या गुनगुनाते हुए; ब्रह्म-- ॐ से शुरु होने वाले मंत्र ( यथा ॐ तद् विष्णो: परम पदं सदा पश्यन्ति सूरय: ); परमम्--चरम लक्ष्य; तेपु:--सम्पन्न किया; तत्र--वहाँ;महत्--महान्; तपः--तपस्या |
नारायण सरस पर पुत्रों की दूसरी टोली ने पहली टोली की ही तरह तपस्या की।
उन्होंनेपवित्र जल में स्नान किया और इसके स्पर्श से उनके हृदयों की सारी मलिन भौतिक इच्छाएँदूर हो गईं।
उन्होंने ॐकार से प्रारम्भ होने वाले मंत्रों का मन में जप किया और कठिनतपस्याएं की।
अब्भक्षा: कतिचिन्मासान्कतिचिद्वायुभोजना: ।
आराधयन्मन्त्रमिममभ्यस्यन्त इडस्पतिम् ॥
२७॥
नमो नारायणाय पुरुषाय महात्मने ।
विशुद्धसत्त्वधिष्ण्याय महाहंसाय धीमहि ॥
२८॥
अपू-भक्षा:--केवल जल पीते हुए; कतिचित् मासान्ू--कुछ महीनों तक; कतिचित्--कुछ; वायु-भोजना: --वायु खातेहुए अथवा केवल श्वास लेते हुए; आराधयन्--पूजा की; मन्त्रम् इममू--इस मंत्र का, जो नारायण से अभिन्न है;अभ्यस्यन्तः:--अभ्यास करते हुए; इड:-पतिम्--सभी मंत्रों के स्वामी, भगवान् विष्णु को; ३४»-हे प्रभु; नम:ः--सादरनमस्कार; नारायणाय--नारायण को; पुरुषाय--परम पुरुष को; महा-आत्मने --उच्च परमात्मा; विशुद्ध-सत्त्व-धिष्ण्याय--सदैव दिव्य धाम में स्थित रहने वाले; महा-हंसाय--महान् हंस के समान भगवान् को; धीमहि--हम सदैवअर्पित करते हैं
प्रजापति दक्ष के पुत्रों ने कुछ महीनों तक केवल जल पिया और वायु खायी।
इस तरहमहान् तपस्या करते हुए उन्होंने इस मंत्र का जाप किया, 'हम उन भगवान् नारायण कोनमस्कार करते हैं, जो सदैव अपने दिव्य धाम में स्थित रहते हैं।
चूँकि वे परम पुरुष( परमहंस ) हैं, अतएवं हम उन्हें सादर नमस्कार करते हैं।
'इति तानपि राजेन्द्र प्रजासर्गधियो मुनि: ।
उपेत्य नारद: प्राह वाच: कूटानि पूर्ववत् ॥
२९॥
इति--इस प्रकार; तान्--उनको ( प्रजापति दक्ष के पुत्र सवलाश्वों को ); अपि-- भी; राजेन्द्र--हे राजा परीक्षित; प्रजा-सर्ग-धिय: --जो इस विचार के थे कि सन््तान उत्पन्न करना सबसे महत्त्वपूर्ण कर्तव्य है; मुनि:--महान् ऋषि; उपेत्य--पासजाकर; नारद:--नारद ने; प्राह--कहा; वाच:--शब्द; कूटानि--गूढ़ पहेली जैसे; पूर्व-वत्--पहले की ही तरह
हे राजा परीक्षित! नारदमुनि प्रजापति दक्ष के उन पुत्रों के पास पहुँचे जो सन््तान उत्पन्नकरने के लिए तपस्या में लगे हुए थे और उनसे उसी तरह के गूढ़ शब्द कहे जैसे उनके ज्येष्ठभाइयों से कहे थे।
दाक्षायणा: संश्रुणुत गदतो निगम मम ।
अन्विच्छतानुपदवीं भ्रातृणां भ्रातृवत्सला: ॥
३०॥
दाक्षायणा: --हे प्रजापित दक्ष के पुत्रो; संश्रूणुत-- ध्यानपूर्वक सुनो; गदत: --जो मैं कह रहा हूँ; निगमम्--उपदेश; मम--मेरा; अन्विच्छत-- अनुगमन करो; अनुपदवीम्--मार्ग ; भ्रातृणाम्-- अपने भाइयों का; भ्रातृ-वत्सला:--हे अपने भाइयों केपरम वत्सल।
हे दक्षपुत्रो! मेरे उपदेशरूपी वचनों को ध्यानपूर्वक सुनो।
तुम सभी अपने ज्येष्ठ भाइयों,हर्यश्वों, के प्रति अति वत्सल हो।
अतएव तुम्हें उनके मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।
भ्रातृणां प्रायणं भ्राता योउनुतिष्ठति धर्मवित् ।
स पुण्यबन्धु: पुरुषो मरुद्धि: सह मोदते ॥
३१॥
भ्रातृणाम्--ज्येष्ठ भाइयों का; प्रायणम्--मार्ग; भ्राता--आज्ञाकारी भाई; यः--जो; अनुतिष्ठति--अनुगमन करता है; धर्म-वित्--धार्मिक सिद्धान्तों का ज्ञाता; सः--वह; पुण्य-बन्धु: --अत्यधिक पवित्र; पुरुष:--पुरुष; मरुद्धि:--वायु केदेवताओं के; सह--साथ; मोदते--जीवन का आनन्द भोगता हैं |
धर्म के नियमों से अवगत भाई अपने ज्येष्ठ भाइयों के पदचिन्हों का अनुगमन करता है।
अत्यधिक बढ़े-चढ़े होने से ऐसा पवित्र भाई मरुत जैसे देवताओं की संगति करने तथाआनन्द भोगने का अवसर प्राप्त करता है, जो सभी प्रकार से अपने भाइयों के प्रति स्नेहिलहै।
एतावदुकक््त्वा प्रययौ नारदोमोघदर्शन:ः ।
तेडपि चान्वगमन्मार्ग भ्रातृणामेव मारिष ॥
३२॥
एतावत्--इतना; उक््त्वा--कहकर; प्रययौ--उस स्थान से चले गये; नारद: --नारद मुनि; अमोघ-दर्शन:--जिनकीचितवन सर्वमंगलमय है; ते--वे; अपि-- भी; च--तथा; अन्वगमन्-- अनुगमन किया; मार्गम्-मार्ग का; भ्रातृणाम्--अपने पहले वाले भाइयों का; एव--निस्सन्देह; मारिष--हे महान् आर्य राजा
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे आर्यों में सर्व अग्रणी! नारदमुनि, जिनकी कृपादृष्टिकभी व्यर्थ नहीं जाती, प्रजापति दक्ष के पुत्रों से इतना कहकर अपनी योजना के अनुसारवहाँ से विदा हो गये।
दक्ष के पुत्रों ने अपने बड़े भाइयों का अनुसरण किया।
सन्तानें उत्पन्नकरने का प्रयास न करके वे कृष्णभावनामृत में लग गये।
सश्नीचीनं प्रतीचीनं परस्यानुप्थ गता: ।
नाद्मपि ते निवर्तन्ते पश्चिमा यामिनीरिव ॥
३३॥
सश्चीचीनम्--पूर्णतया सही; प्रतीचीनम्--सर्वोच्च लक्ष्य, भक्ति, की लक्षित जीवन शैली अपनाने से प्राप्य; परस्य--भगवान् का; अनुपथम्--मार्ग; गता: --ग्रहण करके; न--नहीं; अद्य अपि--आज तक भी; ते--वे ( प्रजापति दक्ष केपुत्र ); निवर्तन्ते--वापस आये हैं; पश्चिमा:--पश्चिमी ( जो बीत चुके हैं ); यामिनी:--रातें; इब--सहशसवला
श्रों ने सही मार्ग अपनाया जो भक्ति को प्राप्त करने के निमित्त जीवन-शैली द्वाराप्राप्प है या भगवान् की कृपा से प्राप्य है।
वे रात्रियों की तरह पश्चिम की ओर गये हैं, किन्तुअभी तक वापस नहीं आये हैं।
एतस्मिन्काल उत्पातान्बहून्पश्यन्प्रजापति: ।
पूर्ववन्नारदकृतं पुत्रनाशमुपा श्रुणोत् ॥
३४॥
एतस्मिनू--इस; काले--समय में; उत्पातान्ू--उत्पात; बहूनू--अनेक; पश्यन्ू--देखकर; प्रजापति: --प्रजापति दक्ष ने;पूर्व-बत्--पहले की तरह; नारद--नारद मुनि द्वारा; कृतम्ू--किया हुआ; पुत्र-नाशम्--अपने पुत्रों की क्षति;उपाश्रणोत्--सुना
इस समय प्रजापति दक्ष ने अनेक अपशकुन देखे और विविध स्त्रोतों से सुना कि उनकेपुत्रों की दूसरी टोली, सबलाश्ों, ने नारद मुनि के उपदेशों के अनुसार अपने ज्येष्ठ भाइयों के ही मार्ग का अनुसरण किया है।
चुक्रोध नारदायासौ पुत्रशोकविमूर्च्छित: ।
देवर्षिमुपलभ्याह रोषाद्विस्फुरिताधर: ॥
३५॥
चुक्रोध--अत्यन्त क्रुद्ध हुआ; नारदाय--नारदमुनि पर; असौ--वह ( दक्ष ); पुत्र-शोक --अपने पुत्रों की क्षति के शोक केकारण; विमूर्च्छित: --प्राय: अचेत; देवर्षिम्--देवर्षि नारद को; उपलभ्य--देखकर; आह--कहा; रोषात्-महान् क्रोधवश; विस्फुरित--काँपते हुए; अधर:--होठों वाला।
जब दक्ष ने सुना कि सवलाश्ो ने भी भक्ति में संलग्न होने के लिए इस जगत को छोड़दिया है, तो वे नारद पर क्रुद्ध हुए और शोक के कारण वे अचेतप्राय हो गये।
जब दक्ष कीनारद से भेंट हुई तो क्रोध से दक्ष के होंठ काँपने लगे और वे इस प्रकार बोले।
श्रीदक्ष उवाचअहो असाधो साधूनां साधुलिड्रेन नस्त्वया ।
असाध्वकार्यर्भकाणां भिक्षोर्मार्ग: प्रदर्शित: ॥
३६॥
श्री-दक्ष: उवाच--प्रजापति दक्ष ने कहा; अहो असाधो--हे अत्यन्त बेईमान अभक्त; साधूनाम्--भक्तों तथा महामुनियों केसमाज का; साधु-लिड्रेन--सन्त पुरुषों का वेश धारण किये; न:--हमको; त्वया--तुम्हारे द्वारा; असाधु--बेईमानी;अकारि--की गई है; अर्भकाणाम्--अनुभवहीन बेचारे बालकों को; भिक्षो: मार्ग:--भिखारी या भिक्षुक संन्यासी कामार्ग; प्रदर्शित:--दिखाया गया।
प्रजापति दक्ष ने कहा : हाय नारदमुनि! तुम सन्त पुरुष का वेश धारण करते हो, किन्तुतुम वास्तव में सन्त हो नहीं।
यद्यपि अब मैं गृहस्थ जीवन में हूँ, किन्तु मैं सन्तपुरुष हूँ।
तुमनेमेरे पुत्रों को संन्यास का मार्ग दिखाकर मेरे साथ निन्दनीय अन्याय किया है।
ऋणैस्त्रिभिरमुक्तानाममीमांसितकर्मणाम् ।
विघात: श्रेयस: पाप लोकयोरुभयो: कृत: ॥
३७॥
ऋणै: --कर्जे से; त्रिभि:ः--तीन; अमुक्तानाम्--ऐसे पुरुषों का जो मुक्त नहीं हैं; अमीमांसित--विचार न करते हुए;कर्मणाम्-कर्तव्य-पथ; विघात:--नष्ट कर देते हैं; श्रेयस:--सौभाग्य-पथ का; पाप--हे परम पापी ( नारद मुनि );लोकयो:--लोकों का; उभयो: --दोनों; कृत:--किया हुआ
प्रजापति दक्ष ने कहा : मेरे पुत्र अपने तीन ऋणों से मुक्त भी नहीं हुए थे।
दरअसल,उन्होंने ठीक से अपने कर्तव्यों पर विचार भी नहीं किया था।
रे नारदमुनि! रे साक्षात्पापकर्म! तुमने इस जगत में उनके सौभाग्य की प्रगति में बाधा डाली है और दूसरी बात यहकि अभी भी वे सन्त पुरुषों, देवताओं तथा अपने पिता के ऋणी हैं।
एवं त्वं निरनुक्रोशो बालानां मतिभिद्धरे: ।
पार्षदमध्ये चरसि यशोहा निरपत्रप: ॥
३८ ॥
एवम्--इस प्रकार; त्वम्--तुम ( नारद ); निरनुक्रोश:--दयाविहीन; बालानामू-- अबोध, अनुभवहीन बालकों का; मति-भित्--चेतना को दूषित करते हुए; हरेः--भगवान् के; पार्षद-मध्ये--निजी संगियों के बीच; चरसि--विचरण करते हुए;यशः:-हा-- भगवान् को बदनाम करने वाले; निरपत्रप:--निर्लज्ज ( यद्यपि तुम नहीं जानते कि तुम कया कर रहे हो, किन्तुतुम पापकर्म कर रहे हो )।
प्रजापति दक्ष ने आगे कहा : इस तरह अन्य जीवों के प्रति हिंसा करके भी अपने कोभगवान् विष्णु का पार्षद कहते हुए तुम भगवान् को बदनाम कर रहे हो।
तुमने व्यर्थ हीअबोध बालकों में संन्यास की प्रवृत्ति उत्पन्न की, इसलिए तुम निर्लज्ज निर्दयी हो।
तुमभगवान् के निजी संगियों के साथ किस तरह विचरण कर सकते हो ?
ननु भागवता नित्यं भूतानुग्रहकातरा: ।
ऋते त्वां सौहद्नं वै वैरड्रडरमवैरिणाम् ॥
३९॥
ननु--अब; भागवता:-- भगवद्भक्त; नित्यम्-शा श्वत रूप से; भूत-अनुग्रह-कातरा:--पतित बद्धजीवों को वर देने केलिए अतीव उत्सुक; ऋते--सिवाय; त्वाम्--तुम्हारे; सौहद-घ्नम्--मैत्री तोड़ने वाले ( अतएव भागवतों में गिनती कियेजाने के अयोग्य ); बै--निस्सन्देह; वैरम्-करम्--तुम शत्रुता उत्पन्न करते हो; अवैरिणाम्--जो शत्रु नहीं हैं ऐसे पुरुषों केप्रति।
तुम्हें छोड़कर अन्य सारे भगवद्भक्त बद्धजीवों के प्रति अत्यन्त दयालु हैं और दूसरों कोलाभ पहुँचाने के इच्छुक रहते हैं।
यद्यपि तुम भक्त का वेश धारण करते हो, किन्तु तुम उन लोगों के साथ शत्रुता उत्पन्न करते हो जो तुम्हारे शत्रु नहीं हैं, या तुम मित्रों के बीच मैत्रीतोड़ते हो और शत्रुता उत्पन्न करते हो।
क्या इन गर्हित कार्यों को करते हुए अपने को भक्तकहने से लज्जित नहीं होते ?
नेत्थं पुंसां विराग: स्यात्त्तया केवलिना मृषा ।
मन्यसे यद्युपशमं स्नेहपाशनिकृन्तनम् ॥
४०॥
न--नहीं; इत्थम्--इस तरह से; पुंसामू--पुरुषों का; विराग:--वैराग्य; स्थात्ू--सम्भव है; त्ववा--तुम्हारे द्वारा; केवलिनामृषा--मिथ्या ज्ञान वाला; मन्यसे--मैं सोचता हूँ; यदि--यदि; उपशमम्-- भौतिक भोग का वैराग्य; स्नेह-पाश--स्नेह केबन्धन; निकृन्तनम्--काटते हुए
प्रजापति दक्ष ने आगे कहा : यदि तुम यह सोचते हो कि वैराग्य की भावना जाग्रत करदेने से ही मनुष्य भौतिक जगत से विरक्त हो जायेगा तो मैं कहूँगा कि पूर्णज्ञान के जाग्रत हुएबिना तुम्हारी तरह केवल वेश बदलने से सम्भवतया वैराग्य नहीं उत्पन्न किया जा सकता।
नानुभूय न जानाति पुमान्विषयती क्ष्णताम् ।
निर्विद्यते स्वयं तस्मान्न तथा भिन्नधी: परैः ॥
४१॥
न--नहीं; अनुभूय--अनुभव करके; न--नहीं; जानाति--जानता है; पुमान्ू--पुरुष; विषय-ती क्ष्णताम्-- भौतिक भोगकी तीक्ष्णता; निर्विद्यते--कट जाता है; स्वयम्--स्वयं; तस्मात्--उससे; न तथा--उस तरह का नहीं; भिन्न-धी:--बदलीहुई बुद्धि वाला; परैः--अन्यों द्वारा
निस्सन्देह भौतिक भोग ही सभी दुखों का कारण है, किन्तु कोई इसे तब तक नहीं छोड़ पाता जब तक वह स्वयं यह अनुभव नहीं कर लेता कि यह कितना कष्टप्रद हैं।
इसलिए मनुष्य को तथाकथित भौतिक भोग में रहने देना चाहिए, साथ ही साथ उसे इसमिथ्या भौतिक सुख के कष्ट का अनुभव करने के ज्ञान में प्रगति करते रहने देना चाहिए।
तब अन्यों की सहायता के बिना ही वह भौतिक भोग को घृणित पायेगा।
जिनके मन अन्योंद्वारा परिवर्तित किये जाते हैं, वे उतने विरक्त नहीं होते जितने कि निजी अनुभव वाले व्यक्ति।
यन्नस्त्वं कर्मसन्धानां साधूनां गृहमेधिनाम् ।
कृतवानसि दुर्मर्ष विप्रियं तब मर्षितम् ॥
४२॥
यत्--जो; न:--हमारे लिए; त्वम्--तुम; कर्म-सन्धानाम्--जो वैदिक आदेशों के अनुसार सकाम कर्मकाण्डों का हृढ़तासे पालन करता है; साधूनाम्--जो ईमानदार हैं ( क्योंकि हम उच्च सामाजिक स्तर तथा शारीरिक सुविधाओं कीईमानदरीपूर्वक खोज करते हैं ); गृह-मेधिनाम्--यद्यपि पत्नी तथा बच्चों के साथ रह रहे; कृतवान् असि--उत्पन्न किया है;दुर्मर्षमू-- असहा; विप्रियम्ू--गलत; तब--तुम्हारा; मर्षितम्-- क्षमा किया हुआ।
यद्यपि मैं अपनी पत्नी तथा बच्चों के साथ गृहस्थ जीवन में रहता हूँ, किन्तु मैं पापफलोंसे रहित जीवन का आनन्द भोगने के लिए सकाम कर्म में लगकर वैदिक आदेशों काईमानदारी के साथ पालन करता हूँ।
मैंने सभी प्रकार के यज्ञ सम्पन्न किये हैं जिनमें देवयज्ञ,ऋषियज्ञ, पितृयज्ञ तथा नृयज्ञ सम्मिलित हैं।
चूँकि ये यज्ञ ब्रत कहलाते हैं इसलिए मैं गृहत्रतकहलाता हूँ।
दुर्भाग्यवश तुमने मेरे पुत्रों को अकारण ही वैराग्य के मार्ग में गुमराह करकेमुझे अत्यधिक दुख पहुँचाया है।
इसे एक बार तो सहन किया जा सकता है।
तन्तुकृन्तन यन्नस्त्वमभद्रमचर: पुनः ।
तस्माल्लोकेषु ते मूढ न भवेद्भ्रमत: पदम् ॥
४३॥
तन्तु-कृन्तन--हे शैतान, जिसने निर्दयतापूर्वक मेरे पुत्रों को मुझसे विलग कर दिया है; यत्--जो; नः--हमको; त्वमू--तुम; अभद्रमू--अशभु वस्तु; अचर:--किया है; पुनः--फिर से; तस्मात्ू--इसलिए; लोकेषु--ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत सभीलोकों में; ते--तुम्हारा; मूढ--रे धूर्त, जो यही नहीं जानता कि कैसे व्यवहार करना चाहिए; न--नहीं; भवेत्--हो सकताहै; भ्रमत:-- भ्रमण करने वाले; पदम्-- धाम, घर।
तुमने मेरे पुत्रों को मुझसे एक बार विलग कराया और अब पुनः तुमने वही अशुभ कार्यकिया है।
अतः तुम धूर्त हो जो यह नहीं जानता कि अन्यों के साथ किस तरह व्यवहार करनाचाहिए।
भले ही तुम ब्रह्माण्ड भर में भ्रमण करते रहते हो, किन्तु मैं शाप देता हूँ कि तुम्हाराकहीं भी निवासस्थान न हो।
श्रीशुक उवाचप्रतिजग्राह तद्बवाढ॑ नारद: साधुसम्मत: ।
एतावान्साधुवादो हि तितिक्षेतेश्वर: स्वयम् ॥
४४॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; प्रतिजग्राह--स्वीकार किया; तत्--वह; बाढम्--तथास्तु; नारद: --नारदमुनि; साधु-सम्मतः --जो माने हुए साधु हैं; एतावान्--इतना; साधु-वाद:--साधु पुरुष के अनुकूल; हि--निस्सन्देह;तितिक्षेत--वह सहन कर सके; ईश्वर:--यद्यपि प्रजापति दक्ष को शाप देने में समर्थ; स्वयम्--स्वयं।
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन्! चूँकि नारद मुनि माने हुए साधु पुरुष हैं, अतःजब प्रजापति दक्ष ने उन्हें शाप दिया तो उन्होंने उत्तर दिया तद् बाढ्मू---' ठीक, तुमने जो भीकहा है उत्तम है।
मैं इस शाप को स्वीकार करता हूँ।
वे चाहते तो उलट कर प्रजापति दक्षको शाप दे सकते थे, किन्तु उन्होंने कोई कार्यवाही नहीं की, क्योंकि वे सहिष्णु तथा दयालुसाधु हैं।
