← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 6 की सूची
अध्याय चार: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान को अर्पित की गई हंस-गुह्य प्रार्थनाएँ
6.4श्रीराजोबाच देवासुरनृणां सर्गो नागानां मृगपक्षिणाम् ।
सामासिकस्त्वया प्रोक्तो यस्तु स्वायम्भुवेउन्तरे ॥
१॥
तस्यैव व्यासमिच्छामि ज्ञातुं ते भगवन्यथा ।
अनुसर्ग यया शक्त्या ससर्ज भगवान्पर: ॥
२॥
श्री-राजा उबाच--राजा ने कहा; देव-असुर-नृणाम्ू--देवताओं तथा मनुष्यों की; सर्ग:--सृष्टि; नागानाम्--नागों ( सर्पजैसे जीव ) के; मृग-पक्षिणाम्-पशुओं तथा पक्षियों के; सामासिक:--संक्षेप में; त्वया--तुम्हारे द्वारा; प्रोक्त:--वर्णित;यः--जो; तु--किन्तु; स्वायम्भुवे--स्वायम्भुव मनु की; अन्तरे-- अवधि में; तस्थ--उसके; एव--निस्सन्देह; व्यासम्--विस्तृत वर्णन; इच्छामि--चाहता हूँ; ज्ञातुमू--जानने के लिए; ते--तुमसे; भगवन्--हे प्रभु; यथा--साथ ही; अनुसर्गम्--गौण सृष्टि; यया--जिस; शक्त्या--शक्ति से; ससर्ज--उत्पन्न किया; भगवान्-- भगवान् से; पर:--दिव्य |
वर प्राप्त राजा ने शुकदेव गोस्वामी से कहा : हे प्रभु! देवता, असुर, मनुष्य, नाग, पशुतथा पक्षी स्वायम्भुव मनु के शासन काल में उत्पन्न किये गये थे।
आपने इस सृष्टि के विषयमें संक्षेप में ( तृतीय स्कन्ध में ) कहा है।
अब मैं इसके विषय में विस्तार से जानना चाहता हूँ।
मैं भगवान् की उस शक्ति के विषय में भी जानना चाहता हूँ जिससे उन्होंने गौण सृष्टि की।
श्रीसूत उबाचइति सम्प्रश्नमाकर्ण्य राजर्षे्बादरायणि: ।
प्रतिनन्द्य महायोगी जगाद मुनिसत्तमा: ॥
३॥
श्री-सूतः उवाच--सूत गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; सम्प्रश्नम्--जिज्ञासा; आकर्ण्य--सुनकर; राजर्षे:--राजापरीक्षित की; बादरायणि: --शुकदेव गोस्वामी ने; प्रतिनन्द्य-- प्रशंसा करके; महा-योगी--महान् योगी; जगाद--उत्तरदिया; मुनि-सत्तमा:-हे मुनियों में श्रेष्ठ
सूत गोस्वामी ने कहा : हे ( नैमिषारण्य में एकत्र ) महामुनियो! जब महान् योगी शुकदेवगोस्वामी ने राजा परीक्षित की जिज्ञासा सुनी तो उन्होंने उसकी प्रशंसा की और इस प्रकारउत्तर दिया।
श्रीशुक उवाचयदा प्रचेतस: पुत्रा दश प्राचीनबर्हिष: ।
अन्तःसमुद्रादुन्मग्ना दहशुर्गा द्रुमैरवृताम् ॥
४॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; यदा--जब; प्रचेतस:--प्रचेताओं ने; पुत्रा:--पुत्र; दश--दस;प्राचीनबर्हिष: --राजा प्राचीन बर्हि के; अन्तः-समुद्रात्--समुद्र के भीतर से; उन्मग्ना:--बाहर आये; दहशु: --उन्होंने देखा;गाम्--सम्पूर्णलोक को; द्रुमै: वृतामू--वृक्षों से आवृत |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब प्राचीनबर्हि के दसों पुत्र उस जल से बाहर निकले जिसमें वे तपस्या कर रहे थे तो उन्होंने देखा कि संसार की समूची सतह वृक्षों से ढक गई है।
ब्रुमेभ्य: क्रुध्यमानास्ते तपोदीपितमन्यव: ।
मुखतो वायुमग्नि च ससृजुस्तद्दधिधक्षया ॥
५॥
द्रुमेभ्य: --वृक्षों से; क्रुध्यमाना: --अत्यन्त क्रुद्ध होकर; ते--वे ( प्राचीनबर्हि के दसों पुत्र ); तपः-दीपित-मन्यव:--दीर्घतपस्या के कारण जिनका क्रोध बढ़ गया था; मुखतः--मुख से; वायुम्ू--वायु; अग्निमू--आग; च--तथा; ससूजु:--उन्होंने उत्पन्न किया; तत्ू--उन जंगलों को; दिधक्षया--जला डालने की इच्छा से |
जल में दीर्घकाल तक तपस्या करने के कारण प्रचेतागण वृक्षों पर अत्यधिक क्रुद्ध थे।
उन्हें जलाकर भस्म करने की इच्छा से उन्होंने अपने मुखों से वायु तथा अग्नि उत्पन्न की ।
ताभ्यां निर्दह्ममानांस्तानुपलभ्य कुरूद्वह ।
राजोबाच महान्सोमो मन्युं प्रशमयत्रिव ॥
६॥
ताभ्याम्--वायु तथा अग्नि द्वारा; निर्दह्ममानान्ू--जलाये गये; तान्ू--उन ( वृक्षों ) को; उपलभ्य--देखकर; कुरूद्ठह-हेमहाराज परीक्षित; राजा--जंगलों के राजा; उवाच--कहा; महान्--महान्; सोम:--चन्द्रमा का अधिष्ठाता देव, सोमदेव ने;मन्युम्ू-क्रोध को; प्रशमयन्--शान्त करते हुए; इब--सहृश
हे राजा परीक्षित! जब वृक्षों के राजा तथा चन्द्रमा के अधिष्ठाता देव सोम ने अग्नि तथावायु को समस्त वृक्षों को जलाकर राख करते देखा तो उसे अपार दया आई, क्योंकि वहसमस्त वनस्पतियों तथा वृक्षों का पालनकर्ता है।
प्रचेताओं के क्रोध को शान्त करने के लिएसोम इस प्रकार बोला।
न द्रुमेभ्यो महाभागा दीनेभ्यो द्रोग्धुमईथ ।
विवर्धयिषवो यूय॑ प्रजानां पतय: स्मृता: ॥
७॥
न--नहीं; द्रुमेभ्य:--वृक्षों को; महा-भागा:--हे परम भाग्यशाली; दीनेभ्य:--अत्यन्त गरीबों; द्रोग्धुमू--जलाकर भस्मकरने के लिए; अर्हथ--तुम्हें चाहिए; विवर्धयिषव: --वृद्धि लाने के लिए इच्छुक; यूयम्--तुम सब; प्रजानामू--सारे जीवोंका, जिन्होंने तुम्हारी शरण ले रखी है; पतय:--स्वामी या रक्षक; स्मृता: --के रूप में ज्ञात |
हे भाग्यवान् महाशयों! तुम लोगों को चाहिए कि इन बेचारे वृक्षों को जलाकर भस्म न करो।
तुम लोगों का कर्तव्य नागरिकों ( प्रजा ) के लिए समस्त समृद्द्धि की कामना करनातथा उनके रक्षकों के रूप में कार्य करना है।
अहो प्रजापतिपतिर्भगवान्हरिरव्यय: ।
वनस्पतीनोषधी श्र ससर्जोर्जमिषं विभु: ॥
८॥
अहो--हाय; प्रजापति-पति: --जीवों के स्वामियों का स्वामी; भगवान् हरि:-- भगवान् हरि; अव्यय:--अविनाशी;वनस्पतीन्--वृक्षों को; ओषधी: --जड़ी बूटियों को; च--तथा; ससर्ज--उत्पन्न किया; ऊर्जम्--स्फूर्तिदायी; इषम्--भोजन; विभु:--परम पुरुष ने |
भगवान् श्री हरि सारे जीवों के स्वामी हैं जिनमें ब्रह्मा जैसे सारे प्रजापति सम्मिलित हैं।
चूँकि वे सर्वव्यापक तथा अविनाशी प्रभु हैं, अतः उन्होंने अन्य जीवों के लिए खाद्य वस्तुओंके रूप में इन सारे वृक्षों तथा शाकों को उत्पन्न किया है।
अन्न चराणामचरा हापदः पादचारिणाम् ।
अहस्ता हस्तयुक्तानां द्विपदां च चतुष्पद: ॥
९॥
अन्नम्ू--भोजन; चराणाम्--चलने वालों या पंखों वालों का; अचरा:--न चलने वालों ( फलों-फूलों ) का; हि--निस्सन्देह; अपद:--बिना पैर वाले जीव यथा घास; पाद-चारिणाम्--पैरों पर चलने वाले पशुओं, यथा गौवों तथा भेसोंके; अहस्ता:--बिना हाथ वाले पशु; हस्त-युक्तानाम्-हाथों से युक्त पशुओं यथा बाघ आदि का; द्वि-पदाम्--दो पैरोंवाले मनुष्यों का; च--तथा; चतु:-पदः--चार पैरों वाले हिरण जैसे पशु |
प्रकृति की व्यवस्था के द्वारा फलों तथा फूलों को कीड़ों तथा पक्षियों का भोजन मानाजाता है; घास तथा अन्य बिना पैर वाले जीव गायों तथा भेसों जैसे चौपायों के भोजन केलिए हैं।
वे पशु, जो अपने अगले पैरों को हाथों की तरह काम में नहीं ला सकते पंजों वालेबाघों जैसे पशुओं के भोजन हैं तथा हिरन एवं बकरे जैसे चौपाये जानवर तथा खाद्यान्न भीमनुष्यों के भोजन के निमित्त होते हैं।
यूयं च पित्रान्वादिष्टा देवदेवेन चानघा: ।
प्रजासर्गाय हि कथ वृक्षात्रिर्दग्धुमहथ ॥
१०॥
यूयम्--तुम सब; च--भी; पित्रा--अपने पिता द्वारा; अन्वादिष्टा:--आदेश दिये गये; देव-देवेन--स्वामियों के भी स्वामीभगवान् द्वारा; च-- भी; अनघा: --हे निष्पाप; प्रजा-सर्गाय--सन्तान उत्पन्न करने के लिए; हि--निस्सन्देह; कथम्--कैसे;वृक्षान्ू--वृक्षों को; निर्दग्धुमू--जलाकर भस्म करने के लिए; अर्हथ--समर्थ हैं
हे शुद्ध हृदयवाले! तुम्हारे पिता प्राचीनबर्हि तथा भगवान् ने तुम सबों को प्रजा उत्पन्नकरने का आदेश दिया है।
अतः तुम लोग इन वृक्षों तथा वनस्पतियों को किस तरह जलाकरभस्म कर सकते हो जिनकी आवश्यकता तुम्हारी प्रजा तथा तुम्हारे वंशजों के पालन के लिएपड़ेगी ?
आतिष्ठत सतां मार्ग कोपं यच्छत दीपितम् ।
पित्रा पितामहेनापि जुष्टं व: प्रपितामहै: ॥
११॥
आतिष्ठत--पालन करो; सताम् मार्गम्-महापुरुषों के मार्ग का; कोपम्--क्रोध; यच्छत--दमन करो; दीपितम्--जो अबजाग्रत है; पित्रा--पिता द्वारा; पितामहेन अपि--तथा पितामह द्वारा; जुष्टम्--सम्पन्न; व: --तुम्हारा; प्रपितामहै: --तुम्हारेपरदादाओं द्वारा
तुम्हारे पिता, पितामह तथा परदादाओं ने जिस अच्छाई के मार्ग का अनुसरण किया था,वह प्रजा के पालन करने का था जिसमें मनुष्य, पशु तथा वृक्ष सम्मिलित हैं।
तुम लोगों कोउसी मार्ग का पालन करना चाहिए व्यर्थ का क्रोध तुम्हारे कर्तव्य के विरुद्ध है।
अतएव मेरीप्रार्थना है कि तुम लोग अपने क्रोध को नियंत्रित करो।
तोकानां पितरौ बन्धू हृशः पक्ष्म स्त्रिया: पति: ।
पति: प्रजानां भिश्चूणां गृह्मज्ञानां बुध: सुहत् ॥
१२॥
तोकानाम्--बच्चों का; पितरौ--माता-पिता; बन्धू--मित्र; हश:--आँख की; पक्ष्म--पलक; स्त्रिया:--स्त्रियों का;पति:--पति; पति: --रक्षक; प्रजानाम्--प्रजा का; भिक्षूणाम्ू--भिखारियों का; गृही--गृहस्थ का; अज्ञानाम्ू--अज्ञानियोंका; बुध: --विद्वान; सु-हत्-
-मित्रपिता तथा माता जिस तरह अपनी सनन््तानों के मित्र और पालनकर्ता होते हैं, जिस तरहपलक आँख की रक्षा करती है, पति जिस तरह पत्नी का भर्त्ता तथा रक्षक होता है, जिसतरह गृहस्थ भिखारियों का अन्नदाता तथा रक्षक होता है तथा जिस तरह विद्वान अज्ञानी कामित्र होता है, उसी तरह राजा अपनी प्रजा का रक्षक तथा जीवनदाता होता है।
वृक्ष भी राजाकी प्रजा होते हैं, अतएव उन्हें भी संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए।
अन्तर्देहिषु भूतानामात्मास्ते हरिरी श्वर: ।
सर्व तद्धिष्ण्यमीक्षध्वमेवं वस्तोषितो हासौ ॥
१३॥
अन्त: देहेषु--शरीरों ( हृदयों ) के भीतर; भूतानामू--सारे जीवों के; आत्मा--परमात्मा; आस्ते--निवास करता है; हरि:ः--भगवान्; ईश्वर: -- स्वामी या निदेशक; सर्वम्--समस्त; तत्-धिष्ण्यम्--उसका आवास स्थान; ईक्षध्वम्--देखने का प्रयासकरते हैं; एवम्--इस प्रकार; व:--तुमसे; तोषित:--तुष्ट; हि--निस्सन्देह; असौ-- भगवान् |
भगवान् सारे जीवों के हृदय में परमात्मा रूप में स्थित हैं, चाहे वे चर हों या अचर।
इनमेंमनुष्य, पक्षी, पशु, वृक्ष तथा सारे जीव सम्मिलित हैं।
इसलिए तुम लोगों को प्रत्येक शरीरको भगवान् का वासस्थान या मन्दिर मानना चाहिए।
इस दृष्टिकोण से तुम लोग भगवान् कोतुष्ठ कर सकोगे।
तुम लोगों को क्रोध में आकर वृक्षों रूपों में स्थित इन जीवों का वध नहींकरना चाहिए।
यः समुत्पतितं देह आकाशान्मन्युमुल्बणम् ।
आत्मजिज्ञासया यच्छेत्स गुणानतिवर्तते ॥
१४॥
यः--जो कोई ; समुत्पतितम्--सहसा जाग्रत हुआ; देहे--शरीर में; आकाशात्-- आकाश से; मन्युम्ू--क्रोध; उल्बणम् --शक्तिशाली; आत्म-जिज्ञासया--आध्यात्मिक या आत्म-साक्षात्कार के प्रति पूछताछ से; यच्छेत्--दमन करता है; सः--वह व्यक्ति; गुणान्ू-- भौतिक प्रकृति के गुणों को; अतिवर्तते--लाँघ जाता है
जो व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार की जिज्ञासा करता है और इस तरह अपने शक्तिशालीक्रोध को--जो शरीर में सहसा जाग्रत हो जाता है, मानों आकाश से गिरा हो उसे दबाता है,वह भौतिक प्रकृति के गुणों को लाँघ जाता है।
अलं दबः्धेर्द्रमैर्दीनी: खिलानां शिवमस्तु व: ।
वार्क्षी छोषा बरा कन्या पतीत्वे प्रतिगृह्मयताम्ू ॥
१५॥
अलम्--पर्याप्त; दग्धै: --जल रहे; द्वुमै: --वृश्षों द्वारा; दीनै:ः--बेचारे; खिलानाम्--शेष वृक्षों का; शिवम्--सर्व सौभाग्य;अस्तु--हो; व:--तुम लोगों का; वारक्षी--वृक्षों से पालित; हि--निस्सन्देह; एघा--यह; वरा--रूचि; कन्या--कन्या,पुत्री; पत्नीत्वे--पत्नी के रूप में; प्रतिगृह्मताम्--स्वीकार करो।
अब इन बेचारे वृक्षों को जलाने की आवश्यकता नहीं है।
जो वृश्ष शेष हैं उन्हें सुखपूर्वक रहने दें।
निस्सन्देह, तुम लोगों को भी सुखी रहना चाहिए।
यहाँ पर एक सुयोग्यसुन्दर लड़की है, जिसका नाम मारिषा है और जिसका पालन-पोषण इन वृक्षों ने अपनी पुत्रीके रूप में किया है।
तुम लोग इस सुन्दर लड़की को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करसकते हो।
इत्यामन्त्र्य वरारोहां कन्यामाप्सरसीं नृप ।
सोमो राजा ययौ दत्त्वा ते धर्मेणोपयेमिरे ॥
१६॥
इति--इस प्रकार; आमन््य--सम्बोधित करके; वर-आरोहाम्--उठे सुन्दर कूल्हों वाली; कनन््याम्--कन्या को;आप्सरसीम्--अप्सरा से उत्पन्न; नृप--हे राजा; सोम:--चन्द्रमा का अधिष्ठाता सोम देव ने; राजा--राजा; ययौ--दे दिया;दत्त्वा--देकर; ते--वे; धर्मेण-- धार्मिक सिद्धान्तों के अनुसार; उपयेमिरे--ब्याही गई।
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे राजन! प्रचेताओं को तुष्ठट करने के बाद चन्द्रमा केराजा सोम ने प्रम्लोचा अप्सरा से उत्पन्न सुन्दर कन्या उन्हें प्रदान की।
प्रचेताओं ने प्रम्लोचाकी कन्या का स्वागत किया।
उसके उठे हुए नितम्ब अतीव सुन्दर थे।
उन्होंने धार्मिक पद्धतिके अनुसार उसके साथ विवाह कर लिया।
तेभ्यस्तस्यां समभवद्दक्ष: प्राचेतस: किल ।
यस्य प्रजाविसगेण लोका आपूरितास्त्रय: ॥
१७॥
तेभ्य:--सारे प्रचेताओं से; तस्थाम्--उसमें; समभवत्--उत्पन्न हुआ; दक्ष:--दक्ष, सन्तान उत्पन्न करने में दक्ष; प्राचेतस:--प्रचेताओं का पुत्र; किल--निस्सन्देह; यस्य--जिसका; प्रजा-विसगगेंण--जीवों की उत्पत्ति द्वारा; लोका:--जगत;आपूरिता:--पूरित; त्रयः--तीनों
उस लड़की के गर्भ से प्रचेताओं ने दक्ष नामक एक पुत्र उत्पन्न किया जिसने तीनों लोकोंको जीवों से भर दिया।
यथा ससर्ज भूतानि दक्षो दुहितृबत्सल: ।
रेतसा मनसा चैव तन्ममावहितः श्रुणु ॥
१८॥
यथा--जिस तरह; ससर्ज--उत्पन्न किया; भूतानि--जीवों को; दक्ष:--दक्ष ने; दुहितृ-वत्सल:--अपनी पुत्रियों के प्रतिअतीव स्नेहिल; रेतसा--वीर्य से; मनसा--मन से; च--भी; एव--निस्सन्देह; तत्--वह; मम--मुझसे; अवहित:--सावधान होकर; श्रुणु--सुनो
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : कृपया अत्यन्त ध्यानपूर्वक मुझसे सुनें कि किस तरहप्रजापति दक्ष ने, जो अपनी पुत्रियों के प्रति अति स्नेहिल थे, अपने वीर्य से तथा मन सेविभिन्न प्रकार के जीवों को उत्पन्न किया।
मनसैवासूजत्पूर्व प्रजापतिरिमा: प्रजा: ।
देवासुरमनुष्यादीन्रभ:स्थलजलौकस: ॥
१९॥
मनसा--मन से; एव--निस्सन्देह; असृजत्---उत्पन्न किया; पूर्वम्-प्रारम्भ में; प्रजापति:--प्रजापति ( दक्ष ) ने; इमा:--इन; प्रजा:--जीवों; देव--देवताओं; असुर--असुरों; मनुष्य-आदीन्--मनुष्यों इत्यादि को; नभ:--आकाश में; स्थल--भूमि पर; जल--अथवा जल के भीतर; ओकस:ः--जिनके निवास हैं।
प्रजापति दक्ष ने सर्वप्रथम अपने मन से सभी तरह के देवताओं, असुरों, मनुष्यों,पक्षियों, पशुओं, जलचरों इत्यादि को उत्पन्न किया।
तमबूंहितमालोक्य प्रजासर्ग प्रजापति: ।
विन्ध्यपादानुपब्रज्य सोचरदुष्करं तप:ः ॥
२०॥
तम्--उसको; अबूंहितम्--न बढ़ते हुए; आलोक्य--देखकर; प्रजा-सर्गम्--जीवों की सृष्टि; प्रजापति:--जीवों के जनकदक्ष; विन्ध्य-पादान्--विन्ध्याचल पर्वत के निकट; उपक्रज्य--जाकर; सः--उसने; अचरत्--सम्पन्न किया; दुष्करम्--अत्यन्त कठिन; तप:ः--तपस्या |
किन्तु जब प्रजापति दक्ष ने देखा कि वे ठीक से सभी प्रकार के जीवों को उत्पन्न नहींकर पा रहे हैं, तो वे विन्ध्याचल पर्वतश्रेणी के निकट एक पर्वत पर गये और वहाँ पर उन्होंनेअत्यन्त कठिन तपस्या की।
तत्राधमर्षणं नाम तीर्थ पापहरं परम् ।
उपस्पृश्यानुसबनं तपसातोषयद्धरिम् ॥
२१॥
तत्र--वहाँ पर; अधघमर्षणम्-- अघमर्षण; नाम--नामक; तीर्थम्--पतवित्र स्थान; पाप-हरम्--सारे पापफलों को विनष्टकरने के लिए उपयुक्त; परम्--सर्व श्रेष्ठ; उपस्पृश्य--आचमन तथा स्नान करके; अनुसवनम्--नियमित रूप से; तपसा--तपस्या द्वारा; अतोषयत्--प्रसन्न किया; हरिम्-- भगवान् को
उस पर्वत के निकट अघमर्षण नामक एक तीर्थस्थल था।
वहाँ पर प्रजापति दक्ष ने सारेकर्मकाण्ड सम्पन्न किये और भगवान् हरि को प्रसन्न करने के लिए महान् तपस्या में संलग्नहोकर उन्हें संतुष्ट किया।
अस्तौषीद्धंसगुह्ेन भगवन्तमधोक्षजम् ।
तुभ्यं तदभिधास्यामि कस्यातुष्यद्यथा हरि: ॥
२२॥
अस्तौषीतू--तुष्ट किया; हंस-गुहोन--हंसगुहा नामक प्रसिद्ध स्तुतियों से; भगवन्तम्-- भगवान्; अधोक्षजम्--इन्द्रियों कीपहुँच से परे; तुभ्यम्--तुमको; तत्ू--वह; अभिधास्थामि--बतलाऊँगा; कस्य--प्रजापति दक्ष से; अतुष्यत्--तुष्ट हो गया;यथा--जिस तरह; हरि:ः--भगवान् |
हे राजन्! अब मैं आपसे हंसगुहा नामक स्तुतियों की पूरी व्याख्या करूँगा जिन्हें दक्ष नेभगवान् को अर्पित किया और मैं बताऊँगा कि किस तरह उन स्तुतियों से भगवान् उन परप्रसन्न हुए।
श्रीप्रजापतिरुवाचनमः परायावितथानुभूतयेगुणत्रयाभासनिमित्तबन्धवे ।
अदष्ट धाम्ने गुणतत्त्वबुद्धिभि-निवृत्तमानाय दधे स्वयम्भुवे ॥
२३॥
श्री-प्रजापति: उबाच--प्रजापति दक्ष ने कहा; नम:--सादर नमस्कार; पराय--परब्रह्मै को; अवितथ--सही; अनुभूतये--उसको, जिसकी आध्यात्मिक शक्ति उसकी अनुभूति कराती है; गुण-त्रय--प्रकृति के तीनों गुणों का; आभास--प्रकटहोने वाले जीवों का; निमित्त--तथा भौतिक शक्ति का; बन्धवे--नियन्ता को; अद्ृष्ट-धाम्ने--जो अपने धाम में देखे नहींजाते; गुण-तत्त्व-बुद्धिभि:--बद्धजीवों द्वारा
जिनकी मन्द बुद्धि बताती है कि असली सत्य प्रकृति के तीन गुणों कीअभिव्यक्ति में पाया जाता है; निवृत्त-गानाय--जो सारे भौतिक मापों तथा गणनाओं को पार कर चुका हो; दधे--अर्पितकरता हूँ; स्वयम्भुवे--परमे श्वर, बिना कारण के प्रकट होने वाले भगवान् को |
प्रजापित दक्ष ने कहा : भगवान् माया तथा उससे उत्पन्न शारीरिक कोटियों से परे हैं।
उनमें अचूक ज्ञान तथा परम इच्छा-शक्ति रहती है और वे जीवों तथा माया के नियन्ता हैं।
जिन बद्धात्माओं ने इस भौतिक जगत को सर्वस्व समझ रखा है वे उन्हें नहीं देख सकते,क्योंकि वे व्यावहारिक ज्ञान के प्रमाण से परे हैं।
वे स्वतः प्रकट तथा आत्म-तुष्ट हैं।
वे किसीकारण द्वारा उत्पन्न नहीं किये जाते।
मैं उन्हें सादर नमस्कार करता हूँ।
न यस्य सख्यं पुरुषो वैति सख्यु:सखा वसन्संवसत: पुरेउस्मिन् ।
गुणो यथा गुणिनो व्यक्तदृष्टे-स्तस्मै महेशाय नमस्करोमि ॥
२४॥
न--नहीं; यस्य--जिसका; सख्यम्--मैत्री भाव; पुरुष: -- जीव; अवैति--जानता है; सख्यु:--परम मित्र का; सखा--मित्र; वसन्--रहते हुए; संवसतः--साथ रहने वाले के; पुरे--शरीर में; अस्मिन्ू--यह; गुण:--इन्द्रिय अनुभूति का विषय;यथा--जिस तरह; गुणिन: --उसी इन्द्रिय का; व्यक्त-दृष्ट:--जो भौतिक जगत का निरीक्षण करता है; तस्मै--उस; महा-ईशाय--परम नियन्ता को; नमस्करोमि--मैं नमस्कार करता हूँ।
जिस तरह इन्द्रियविषय ( रूप, स्वाद, स्पर्श, गन्ध तथा ध्वनि ) यह नहीं समझ सकते कि इन्द्रियाँ उनकी अनुभूति किस तरह करती हैं, उसी तरह बद्ध-आत्मा यद्यपि अपने शरीरमें परमात्मा के साथ-साथ निवास करता है, यह नहीं समझ सकता कि भौतिक सृष्टि केस्वामी परम आध्यात्मिक पुरुष किस तरह उसकी इन्द्रियों को निर्देश देते हैं।
मैं उन परमपुरुष को सादर नमस्कार करता हूँ जो परम नियन्ता हैं।
देहोसवोक्षा मनवो भूतमात्रा-मात्मानमन्यं च विदु: परं यत् ।
सर्व पुमान्वेद गुणांश्व तज्ज्ञोन वेद सर्वज्ञमनन्तमीडे ॥
२५॥
देह:--यह शरीर; असव: --प्राण वायु; अक्षा: --विभिन्न इन्द्रियाँ; मनव: --मन, ज्ञान, बुद्धि तथा अहंकार; भूत-मात्राम्ू--पाँच स्थूल तत्त्व तथा पाँच इन्द्रिय-विषय ( रूप, स्वाद, ध्वनि इत्यादि ); आत्मानम्--अपने आप; अन्यम्-- अन्य; च--तथा; विदुः--जानते हैं; परम्--परे; यत्--जो; सर्वम्--हर वस्तु; पुमान्ू--जीव; वेद--जानता है; गुणान्--प्रकृति केगुणों को; च--तथा; तत्-ज्ञ:--उन वस्तुओं को जानने वाला; न--नहीं; वेद--जानता है; सर्व-ज्ञम्--सर्वज्ञ को;अनन्तमू-- असीम; ईडे--मैं सादर नमस्कार करता हूँ।
केवल पदार्थ होने के कारण शरीर, प्राण वायु, बाह्य तथा आन्तरिक इन्द्रियाँ, पाँचस्थूल तत्त्व तथा सूक्ष्म इन्द्रियविषय ( रूप, स्वाद, गन्ध, ध्वनि तथा स्पर्श ) अपने स्वभावको, अन्य इन्द्रियों के स्वभाव को या उनके नियन्ताओं के स्वभाव को नहीं जान पाते हैं।
किन्तु जीव अपने आध्यात्मिक स्वभाव के कारण अपने शरीर, प्राणवायु, इन्द्रियों, तत्त्वोंतथा इन्द्रियविषयों को जान सकता है और वह तीन गुणों को भी, जो उनके मूल में होते हैं,जान सकता है।
इतने पर भी, यद्यपि जीव उनसे पूर्णतया भिज्ञ होता है, किन्तु वह परम पुरुषको, जो सर्वज्ञ तथा असीम है, देख पाने में अक्षम रहता है।
इसलिए मैं उन्हें सादर नमस्कारकरता हूँ।
यदोपरामो मनसो नामरूप-रूपस्य दृष्टस्मृतिसम्प्रमोषात् ।
य ईयते केवलया स्वसंस्थयाहंसाय तस्मै शुचिसदाने नम: ॥
२६॥
यदा--जब समाधि में; उपराम:--पूर्ण विराम; मनसः--मन का; नाम-रूप--भौतिक नाम तथा रूप; रूपस्य--उसकाजिससे वे प्रकट होते हैं; दृष्ट-- भौतिक दृष्टि का; स्मृति--तथा स्मरण का; सम्प्रमोषात्--विनाश के कारण; यः--जो( भगवान् ); ईयते--अनुभव किया जाता है; केवलया--आध्यात्मिक; स्व-संस्थया--अपने आदि रूप से; हंसाय--परमविशुद्ध को; तस्मै--उस; शुच्चि-सदाने--जो आध्यात्मिक अस्तित्व की शुद्ध अवस्था में ही अनुभव किया जाता है; नम:--मैं सादर नमस्कार करता हूँ।
जब मनुष्य की चेतना स्थूल तथा सूक्ष्म भौतिक जगत के कल्मष से पूरी तरह शुद्ध होजाती है और कार्य करने तथा स्वण देखने की अवस्थाओं से विचलित नहीं होती तथा जबमन सुषुप्ति अर्थात् गहरी नीद में लीन नहीं होता तो वह समाधि के पद को प्राप्त होता है।
तबउसकी भौतिक दृष्टि तथा मन की स्मृतियाँ, जो नामों तथा रूपों को प्रकट करती हैं, विनष्टहो जाती हैं।
केवल ऐसी ही समाधि में भगवान् प्रकट होते हैं।
अतः हम उन भगवान् कोनमस्कार करते हैं, जो उस अकलुषित दिव्य अवस्था में देखे जाते हैं।
मनीषिणोन्तईदि सन्निवेशितंस्वशक्तिभिर्नवशिश्र त्रिवृद्धिः ।
वह्निं यथा दारुणि पाञ्जदश्यंमनीषया निष्कर्षन्ति गूढम् ॥
२७॥
स वे ममाशेषविशेषमायानिषेधनिर्वाणसुखानुभूतिः ।
स सर्वनामा स च विश्वरूप:प्रसीदतामनिरुक्तात्मशक्ति: ॥
२८॥
मनीषिण:--महान् विद्वान ब्राह्मण जो अनुष्ठानों तथा यज्ञों को सम्पन्न करे; अन्त:-हदि--हृदय के भीतर; सन्निवेशितम्--स्थित होते हुए; स्व-शक्तिभि:--अपनी आध्यात्मिक शक्तियों से; नवभि:--नौ भिन्न-भिन्न भौतिक शक्तियों से भी( प्रकृति, पूर्ण भौतिक शक्ति, अहंकार, मन तथा पाँच इन्द्रिय विषय ); च--और ( पांच स्थूल भौतिक तत्त्वों तथा दसकार्येन्द्रिय एवं ज्ञानेन्द्रिय ); त्रिवृद्धि:ः--प्रकृति के तीनों भौतिक गुणों द्वारा; वहिम्--अग्नि; यथा--जिस तरह; दारुणि--काष्ठ के भीतर; पात्नदश्यम्--सामिधेनि मंत्र नामक पन्द्रह मंत्रों के उच्चारण से उत्पन्न; मनीषया--शुद्ध बुद्धि द्वारा;निष्कर्षन्ति--निचोड़ते हैं; गूढम्--यद्यपि प्रकट न करते हुए; सः-- भगवान्; बै--निस्सन्देह; मम--मेरे प्रति; अशेष--समस्त; विशेष--किस्में; माया--माया की; निषेध--निषेध विधि द्वारा; निर्वाण--मुक्ति का; सुख-अनुभूति: --जो दिव्यआनन्द द्वारा अनुभव किया जाता है; सः--भगवान्; सर्व-नामा--सभी नामों का स्रोत; सः--वह, भगवान्; च-- भी;विश्व-रूप:--ब्रह्माण्ड का विराट रूप; प्रसीदताम्ू--दयालु हो; अनिरुक्त--अचिन्त्य; आत्म-शक्ति:--समस्त आध्यात्मिकशक्तियों का आगार।
जिस तरह कर्मकाण्ड तथा यज्ञ करने में निपुण प्रकांड विद्वान ब्राह्मण पन्द्रह सामिधेनीमंत्रों का उच्चारण करके काष्ठ के भीतर सुप्त अग्नि को बाहर निकाल सकते हैं और इसतरह वैदिक मंत्रों की दक्षता को सिद्ध करते हैं, उसी तरह जो लोग कृष्णभावनामृत मेंवस्तुतः बढ़े-चढ़े होते हैं--दूसरे शब्दों में, जो कृष्णभावनाभावित होते हैं--वे परमात्मा कोढूँढ सकते हैं, जो अपनी आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा हृदय के भीतर स्थित रहते हैं।
हृदयप्रकृति के तीनों गुणों से तथा नौ भौतिक तत्त्वों ( प्रकृति, कुल भौतिक शक्ति, अहंकार, मनतथा इन्द्रिय तृप्ति के पाँचों विषय) एवं पाँच भौतिक तत्त्वों तथा दस इन्द्रियों द्वाराआच्छादित रहता है।
ये सत्ताईस तत्त्व मिलकर भगवान् की बहिरंगा शक्ति का निर्माण करतेहैं।
बड़े बड़े योगी भगवान् का ध्यान करते हैं, जो परमात्मा रूप में हृदय के भीतर स्थित हैं।
वह परमात्मा मुझ पर प्रसन्न हों।
जब कोई भौतिक जीवन की असंख्य विविधताओं से मुक्तिके लिए उत्सुक होता है, तो परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
वस्तुतः उसे ऐसी मुक्ति तबमिलती है जब वह भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में लग जाता है और अपनी सेवा प्रवृत्ति केकारण भगवान् का साक्षात्कार करता है।
भगवान् को उन अनेक आध्यात्मिक नामों सेसम्बोधित किया जा सकता है, जो भौतिक इन्द्रियों के लिए अकल्पनीय हैं।
वे भगवान् मुझपर कब प्रसन्न होंगे?
यद्यन्निरुक्त वचसा निरूपितं॑धियाक्षभिर्वा मनसोत यस्य ।
मा भूत्स्वरूपं गुणरूपं हि तत्तत्स वै गुणापायविसर्गलक्षण: ॥
२९॥
यत् यत्--जो भी; निरुक्तमू--कथित; वचसा--शब्दों से; निरूपितम्--सुनिश्चित; धिया--तथाकथित ध्यान या बुद्धि से;अक्षभि:--इन्द्रियों से; वा--अथवा; मनसा--मन से; उत--निश्चय ही; यस्य--जिसका; मा भूतू--नहीं हो सकता; स्व-रूपम्ू--भगवान् का वास्तविक रूप; गुण-रूपम्--तीनों गुणों से युक्त; हि--निस्सन्देह; तत् तत्ू--वह; सः--वहभगवान्; वै--निस्सन्देह; गुण-अपाय--तीन गुणों से बनी हुई हर वस्तु के संहार का कारण; विसर्ग--तथा सृष्टि;लक्षण:--के रूप में प्रकट
भौतिक ध्वनियों द्वारा व्यक्त, भौतिक बुद्धि द्वारा सुनिश्चित तथा भौतिक इन्द्रियों द्वाराअनुभव की गई अथवा भौतिक मन के भीतर गढ़ी गई कोई भी वस्तु भौतिक प्रकृति केगुणों के प्रभाव के अतिरिक्त कुछ नहीं होती, इसलिए भगवान् के असली स्वभाव से उसकाकिसी तरह का सम्बन्ध नहीं होता।
परमेश्वर इस भौतिक जगत की सृष्टि के परे हैं, क्योंकि वेभौतिक गुणों तथा सृष्टि के स्त्रोत हैं।
सभी कारणों के कारण होते हुए, वे सृष्टि के पूर्व तथासृष्टि के पश्चात् विद्यमान रहते हैं।
मैं उन्हें सादर प्रणाम करना चाहता हूँ।
यस्मिन्यतो येन च यस्य यस्मैयद्यो यथा कुरुते कार्यते च ।
परावरेषां परम॑ प्राक्प्रसिद्धंतद्ढह्यम तद्धेतुरनन्यदेकम् ॥
३०॥
यस्मिनू--जिसमें ( भगवान् या परम धाम में ); यत:ः--जिससे ( हर वस्तु उदभूत है ); येन--जिसके द्वारा ( हर वस्तु निर्मितहै ); च--भी; यस्य--जिसकी ( हर वस्तु है ); यस्मै--जिसको ( हर वस्तु अर्पित की जाती है ); यत्--जो; यः--जो;यथा--जिस तरह; कुरुते--सम्पन्न करता है; कार्यते--कराया जाता है; च-- भी; पर-अवरेषामू-- भौतिक तथाआध्यात्मिक दोनों जगतों में; परमम्--परम; प्राकु--उद्गम; प्रसिद्धमू--हर एक को भलीभाँति ज्ञात; तत्ू--वह; ब्रह्म--परब्रह्म; तत् हेतु:--समस्त कारणों के कारण; अनन्यत्--अन्य कारण न होते हुए; एकम्--अद्वितीय |
परब्रह्म कृष्ण प्रत्येक वस्तु के परम आश्रय तथा उद्गम हैं।
हर कार्य उन्हीं के द्वारा कियाजाता है, हर वस्तु उन्हीं की है और हर वस्तु उन्हीं को अर्पित की जाती है।
वे ही परम लक्ष्य हैंऔर चाहे वे स्वयं कार्य करते हों या अन्यों से कराते हों, वे परम कर्ता हैं।
वैसे उच्च तथानिम्न अनेक कारण हैं, किन्तु समस्त कारणों के कारण होने से वे परब्रह्म कहलाते हैं, जोसमस्त कार्यकलापों के पहले से विद्यमान थे।
वे अद्वितीय हैं और उनका कोई अन्य कारणनहीं है।
मैं उनको सादर प्रणाम करता हूँ।
यच्छक्तयो वदतां वादिनां वैविवादसंवादभुवो भवन्ति ।
कुर्वन्ति चैषां मुहुरात्ममोहंतस्मै नमोनन्तगुणाय भूम्ने ॥
३१॥
यत्-शक्तय:--जिसकी नाना शक्तियाँ; वदताम्--विभिन्न दर्शनों को बताने वाली; वादिनाम्ू--वक्ताओं के; वै--निस्सन्देह; विवाद--तर्क का; संवाद--तथा रजामन्दी, विचार ऐक्य; भुव:--कारण; भवन्ति--हैं; कुर्वन्ति--उत्पन्न करतेहैं; च--तथा; एषाम्--उनके ( सिद्धान्तवादियों के ); मुहुः--निरन्तर; आत्म-मोहम्ू--आत्मा के अस्तित्व के विषय मेंमोह; तस्मै--उसको; नम:--मेरा सादर नमस्कार; अनन्त--असीम; गुणाय--दिव्य गुणों वाले; भूम्ने--सर्वव्यापक प्रभु |
मैं उन सर्वव्यापक भगवान् को सादर नमस्कार करता हूँ जो अनन्त दिव्य गुणों से युक्तहैं।
वे विभिन्न मतों का प्रसार करने वाले समस्त दार्शनिकों के हृदय के भीतर से कार्य करतेहुए उनसे उनकी ही आत्मा को भुलवाते हैं, कभी उनमें परस्पर मतैक्य कराते हैं, तो कभीमत भिन्नता कराते हैं।
इस तरह वे इस भौतिक जगत में ऐसी स्थिति उत्पन्न करते हैं जिसमें वेकिसी भी दार्शनिक निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाते।
मैं उन्हें नमस्कार करता हूँ।
अस्तीति नास्तीति च वस्तुनिष्ठयो-रकस्थयोभिन्नविरुद्धधर्मणो: ।
अवेक्षितं किज्लन योगसाड्ख्ययो:सम॑ पर हानुकूलं बृहत्तत् ॥
३२॥
अस्ति--है; इति--इस प्रकार; न--नहीं; अस्ति-- है; इति--इस प्रकार; च--तथा; वस्तु-निष्ठयो:--परम कारण के ज्ञानका अनुयायी; एक-स्थयो: --एक ही विषय, ब्रह्म को स्थापित करने से युक्त; भिन्न--अलग दिखाते हुए; विरुद्ध-धर्मणो:--तथा विरोधी; अवेक्षितम्-- अनुभूत किया; किज्लन--वह जो कुछ; योग-साड्ख्ययो:--योग तथा सांख्य-दर्शनका; समम्ू--समान; परम्--दिव्य; हि--निस्सन्देह; अनुकूलम्--निवास स्थान; बृहत् तत्ू--वह परम कारण ।
संसार मे दो वर्ग हैं--आस्तिक तथा नास्तिक।
परमात्मा को मानने वाला आस्तिकसम्पूर्ण योग में आध्यात्मिक कारण को पाता है।
किन्तु भौतिक तत्त्वों का मात्र विश्लेषणकरने वाला सांख्यधर्मी निर्विशेषवाद के निष्कर्ष को प्राप्त होता है और परम कारण को, चाहे वह भगवान् हो, परमात्मा हो या ब्रह्म ही क्यों न हो, स्वीकार नहीं करता।
उल्टे, बहभौतिक प्रकृति के व्यर्थ बाह्य कार्यो में व्यस्त रहता है।
किन्तु अन्ततोगत्वा दोनों वर्ग एकपरम सत्य की स्थापना करते हैं, क्योंकि विरोधी कथन करते हुए भी उनका लक्ष्य एक हीपरम कारण होता है।
वे दोनों ही जिस एक परब्रह्म के पास पहुँचते हैं उन्हें मैं सादर नमस्कारकरता हूँ।
योजनुग्रहार्थ भजतां पादमूल-मनामरूपो भगवाननन्तः ।
नामानि रूपाणि च जन्मकर्मभि-भेजे स मह्ंं परम: प्रसीदतु ॥
३३॥
यः--जो ( भगवान् ); अनुग्रह-अर्थम्-- अपनी अहैतुकी कृपा दिखाने के लिए; भजताम्--उन भक्तों को जो सदैव भक्तिकरते हैं; पाद-मूलम्--उनके दिव्य चरणकमलों को; अनाम--किसी भौतिक नाम के बिना; रूप:--या भौतिक रूप;भगवान्-- भगवान्; अनन्तः--असीम, सर्वव्यापक तथा नित्य विद्यमान; नामानि--दिव्य नाम; रूपाणि--दिव्य रूप; च--भी; जन्म-कर्मभि: --दिव्य जन्म तथा कार्यों के साथ; भेजे--प्रकट करता है; सः--वह; महाम्--मुझ पर; परम:--परम;प्रसीदतु--कृपालु हों
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् जो कि अचिन्त्य रूप से ऐश्वर्यवान् हैं, जो सारे भौतिक नामों,रूपों तथा लीलाओं से रहित हैं तथा जो सर्वव्यापक हैं, उन भक्तों पर विशेषरूप से कृपालु रहते हैं, जो उनके चरणकमलों की पूजा करते हैं।
इस तरह वे विभिन्न लीलाओं सहित दिव्यरूपों तथा नामों को प्रकट करते हैं।
ऐसे भगवान्, जो सच्चिदानन्द विग्रह हैं, मुझ पर कृपालुहों।
यः प्राकृतैर्ज्ञानपथेर्जनानांयथाशयं देहगतो विभाति ।
यथानिल: पार्थिवमाश्नितो गुणंस ईश्वरो मे कुरुतां मनोरथम् ॥
३४॥
यः--जो; प्राकृतैः--निम्न श्रेणी के; ज्ञान-पथैः--पूजा के मार्गों द्वारा; जनानाम्ू--जीवों के; यथा-आशयमू--इच्छा केअनुसार; देह-गत:--हृदय के भीतर स्थित; विभाति--प्रकट होता है; यथा--जिस तरह; अनिल: --वायु; पार्थिवम्--पृथ्वी का; आश्रित:--प्राप्त करते हुए; गुणम्--गुण ( गंध तथा रंग इत्यादि ); सः--वह; ईश्वर: -- भगवान्; मे--मेरा;कुरुताम्--पूरा करे; मनोरथम्--( भक्ति के लिए ) इच्छा
जिस तरह वायु भौतिक तत्त्वों के विविध गुण यथा फूल की गंध या वायु में धूल केमिश्रण से उत्पन्न विभिन्न रंग अपने साथ ले जाती है, उसी तरह भगवान् मनुष्य की इच्छाओंके अनुसार पूजा की निम्नतर प्रणालियों के माध्यम से प्रकट होते हैं, यद्यपि वे देवताओं केरूप में प्रकट होते हैं, अपने आदि रूप में नहीं।
तो इन अन्य रूपों का क्या लाभ है?
ऐसेआदि भगवान् मेरी इच्छाएँ परिपूर्ण करें।
श्रीशुक उवाचइति स्तुतः संस्तुवतः स तस्मिन्नधमर्षणे ।
प्रादुरासीत्कुरु श्रेष्ठ भगवान्भक्तवत्सल: ॥
३५॥
कृतपादः सुपर्णासे प्रलम्बाष्टमहाभुज: ।
चक्रशट्डासिचर्मेषुधनु:पाशगदाधर: ॥
३६॥
पीतवासा घनश्याम:ः प्रसन्नवदनेक्षण: ।
वनमालानिवीताज़ो लसच्छीवत्सकौस्तुभ: ॥
३७॥
महाकिरीटकटकः स्फुरन्मकरकुण्डल: ।
काा्च्यद्भुलीयवलयनूपुराड्रदभूषित: ॥
३८॥
त्रैलोक्यमोहनं रूप॑ बिश्रत्त्रिभुवने श्वर: ।
वबृतो नारदनन्दाद्यैः पार्षद: सुरयूथपै: ।
स्तूयमानोनुगायद्धि: सिद्धगन्धर्वचारणै: ॥
३९॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; स्तुत:--प्रशंसित होकर; संस्तुवत:--स्तुति कर रहेदक्ष का; सः--वह भगवान्; तस्मिन्ू--उस; अघमर्षणे-- अघमर्षण नामक पवित्र स्थान पर; प्रादुरासीत्ू--प्रकट हुआ;कुरु-श्रेष्ठ-हे कुरुवंश में सर्वश्रेष्ठ; भगवान्ू-- भगवान्; भक्त-वत्सल:--अपने भक्तों के प्रति अत्यन्त दयालु; कृत-पाद:--जिसके चरणकमल रखे थे; सुपर्ण-अंसे--उनके वाहन गरुड़ के कंधे पर; प्रलम्ब--अत्यन्त लम्बे; अष्ट-महा-भुज:--आठ बलशाली भुजाओं वाले; चक्र--चक्र; शद्बगु--शंख; असि--तलवार; चर्म--ढाल; इषु--बाण; धनु:--धनुष; पाश--रस्सी; गदा--गदा; धर:--धारण किये; पीत-वासा:--पीताम्बर सहित; घन-श्याम:--जिनेक शरीर कावर्ण गहरे नीले-काले रंग का था; प्रसन्न--अत्यन्त प्रसन्न; वदन--जिसका मुख; ईक्षण:---तथा चितवन; बन-माला--जंगली फूलों की माला से; निवीत-अड्भ:--जिसका शरीर गले से पाँव तक सजा हुआ था; लसत्--चमकता हुआ;श्रीवत्स-कौस्तुभ:--कौस्तुभ मणि तथा श्रीवत्स चिह्न; महा-किरीट--विशाल मुकुट का; कटकः--वृत्त, मंडल;स्फुरत्ू-चमकता हुआ; मकर-कुण्डल:--मकर की आकृति के कान के कुण्डल; काञ्ञी --पेटी सहित; अड्डुलीय--अंगूठी; वलय--कंगन; नूपुर--पायल; अड्भद--बिजावट; भूषित:--सुसज्जित; त्रै-लोक्य-मोहनम्--तीनों लोकों कोमोहित करने वाला; रूपमू--उनका शारीरिक स्वरूप; बिभ्रतू--चमकता हुआ; त्रि-भुवन--तीनों लोकों का; ईश्वर: --परमेश्वर; वृत:--घिरा हुआ; नारद--नारद इत्यादि बड़े बड़े भक्तों से; नन्द-आद्यै:--तथा नन्द इत्यादि; पार्षदैः--नित्यसंगियों से; सुर-यूथपै:--तथा देवताओं के प्रधानों द्वारा; स्तूयमान:--स्तुति किये जाने पर; अनुगायद्धि:--उनके पीछे पीछेगाते हुए; सिद्ध-गन्धर्व-चारणै: --सिद्धों, गन्धर्वो तथा चारणों द्वारा
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : अपने भक्तों के प्रति अत्यधिक स्नेहिल भगवान् हरि दक्षद्वारा की गई स्तुतियों से अत्यधिक प्रसन्न हुए, अतः वे अघमर्षण नामक पवित्र स्थान पर प्रकट हुए।
हे श्रेष्ठ कुरुबंशी महाराज परीक्षित! भगवान् के चरणकमल उनके वाहन गरुड़के कंधों पर रखे थे और वे अपनी आठ लम्बी बलिष्ठ अतीव सुन्दर भुजाओं सहित प्रकटहुए।
अपने हाथों में वे चक्र, शंख, तलवार, ढाल, बाण, धनुष, रस्सी तथा गदा धारण कियेथे-प्रत्येक हाथ में अलग-अलग हथियार थे और सबके सब चमचमा रहे थे।
उनके वस्त्रपीले थे और उनके शरीर का रंग गहरा नीला था।
उनकी आँखें तथा मुख अतीव मनोहर थेऔर उनके गले से लेकर पाँवों तक फूलों की लम्बी माला लटक रही थी।
उनका वक्षस्थलकौस्तुभ मणि तथा श्रीवत्स चिह्न से सुशोभित था।
उनके सिर पर विशाल गोल मुकुट थाऔर उनके कान मछलियों के सहृश कुण्डलों से सुशोभित थे।
ये सारे आभूषण असाधारणरूप से सुन्दर थे।
भगवान् अपनी कमर में सोने की पेटी, बाहों में बिजावट, अंगुलियों मेंअँगूठियाँ तथा पाँवों में पायल पहने थे।
इस तरह विविध आभूषणों से सुशोभित भगवान्हरि, जो तीनों लोकों के जीवों को आकर्षित करने वाले हैं, पुरुषोत्तम कहलाते हैं।
उनकेसाथ नारद, नन्द जैसे महान् भक्त तथा स्वर्ग के राजा इन्द्र इत्यादि प्रमुख देवता एवं उच्चतरलोकों यथा सिद्धलोक, गन्धर्वलोक तथा चारणलोक के निवासी थे।
भगवान् के दोनों ओरतथा उनके पीछे भी स्थित ये भक्त निरन्तर उनकी स्तुतियाँ कर रहे थे।
रूप॑ तन्महदाश्चर्य विचक्ष्यागतसाध्वसः ।
ननाम दण्डवद्धूमौ प्रहष्टात्मा प्रजापति: ॥
४०॥
रूपम्ू--दिव्य रूप; ततू--वह; महत्-आश्चर्यम्--अत्यधिक आश्चर्यजनक; विचक्ष्य--देखकर; आगत-साध्वस: --प्रारम्भमें भयभीत हुआ; ननाम--नमस्कार किया; दण्ड-वत्--डण्डे की तरह; भूमौ-- भूमि पर; प्रहष्ट-आत्मा--शरीर, मन तथाआत्मा से प्रसन्न होकर; प्रजापति:--दक्ष नामक प्रजापति ने।
भगवान् के उस अद्भुत तथा तेजवान स्वरूप को देखकर प्रजापति दक्ष पहले तो कुछभयभीत हुए, किन्तु बाद में भगवान् को देखकर अतीव प्रसन्न हुए और उन्हें नमस्कार करनेके लिए भूमि पर दण्डवत् गिर पड़े।
न किञ्ञनोदीरयितुमशकत्तीब्रया मुदा ।
आपूरितमनोद्दारैहदिन्य इव निझरै: ॥
४१॥
न--नहीं; किज्लन--कोई वस्तु; उदीरयितुमू--कहने के लिए; अशकत्--समर्थ था; तीब्रया--अत्यधिक; मुदा--सुख;आपूरित--भरा हुआ; मनः-द्वारै: --इन्द्रियों के द्वारा; हृदिन्य:--नदियों; इब--सहश; निझरैः--पर्वत से मूसलाधार वर्षाद्वारा
जिस तरह पर्वत से प्रवाहित होने वाले जल से नदियाँ भर जाती हैं उसी तरह दक्ष कीसारी इन्द्रियाँ प्रसन्नता से पूरित हो गईं।
अत्यधिक सुख के कारण दक्ष कुछ भी नहीं कहसके, अपितु भूमि पर पड़े रहे।
तं तथावनतं भक्त प्रजाकामं प्रजापतिम् ।
चित्तज्ञ: सर्वभूतानामिदमाह जनार्दन: ॥
४२॥
तम्--उस ( प्रजापति दक्ष ); तथा--उस तरह से; अवनतम्--अपने सामने नमित; भक्तम्-महान् भक्त को; प्रजा-कामम्--जनसंख्या बढ़ाने का इच्छुक; प्रजापतिम्--प्रजापति ( दक्ष ) को; चित्त-ज्ञ:--हदय की बात समझने वाला; सर्व-भूतानाम्--सारे जीवों के; इदम्--यह; आह--कहा; जनार्दन:-- भगवान् ने
जो हर एक की इच्छाओं को पूरा कर सकतेहैं।
यद्यपि प्रजापति दक्ष कुछ भी नहीं कह सके, किन्तु हर एक के हृदय की बात जाननेवाले भगवान् ने जब अपने भक्त को इस प्रकार से नमित तथा जनसंख्या बढ़ाने की इच्छा सेयुक्त देखा तो उन्होंने उसे इस प्रकार से सम्बोधित किया।
श्रीभगवानुवाचप्राचेतस महाभाग संसिद्धस्तपसा भवान् ।
यच्छुद्धया मत्परया मयि भावं परं गत: ॥
४३॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; प्राचेतस--हे प्राचेतस; महा-भाग--हे परम भाग्यशाली; संसिद्ध:ः--सिद्धि प्राप्त;तपसा--तुम्हारी तपस्या से; भवान्ू--आप; यत्--क्योंकि; श्रद्धबा--अतीव श्रद्धा से; मत्-परया--जिसका लक्ष्य मैं हूँ;मयि--मुझमें; भावम्-- भाव, आनन्द; परम्ू--परम; गतः--प्राप्त |
भगवान् ने कहा : हे परम भाग्यशाली प्राचेतस! तुमने मुझ पर अपनी महती श्रद्धा केकारण परम भक्तिमय भाव को प्राप्त किया है।
निस्सन्देह, तुम्हारी महती भक्ति के साथ-साथ तुम्हारी तपस्या के कारण तुम्हारा जीवन अब सफल है।
तुमने पूर्ण सिद्धि प्राप्त कर लीहै।
प्रीतोहं ते प्रजानाथ यत्तेउस्योह्रृंहणं तपः ।
ममैष कामो भूतानां यद्भूयासुर्विभूतय: ॥
४४॥
प्रीत:--अत्यधिक प्रसन्न; अहम्--मैं; ते--तुमसे; प्रजा-नाथ--हे प्रजापति; यत्--क्योंकि; ते--तुम्हारा; अस्य--इसभौतिक जगत का; उद्दृंहणम्--वृद्धि करते हुए; तप:ः--तपस्या; मम--मेरी; एब: --यह; काम:--इच्छा; भूतानाम्--जीवोंका; यत्--जो; भूयासु: --हो; विभूतयः--सभी प्रकार से उन्नति।
हे प्रजापति दक्ष! तुमने संसार के कल्याण तथा वृद्द्धि के लिए घोर तपस्या की है।
मेरी भी यही इच्छा है कि इस जगत में हरेक प्राणी सुखी हो।
इसलिए मैं तुमसे अत्यधिक प्रसन्नहूँ, क्योंकि तुम सम्पूर्ण जगत के कल्याण की मेरी इच्छा को पूरी करने का प्रयत्न कर रहेहो।
ब्रह्म भवो भवन्तश्न मनवो विबुधेश्वरा: ।
विभूतयो मम होता भूतानां भूतिहेतव: ॥
४५॥
ब्रह्मा--ब्रह्मा; भव: --शिव; भवन्त:ः--तुम सारे प्रजापति; च--तथा; मनव:--सारे मनु; विबुध-ईश्वरा:--विभिन्न देवता( यथा सूर्य, चन्द्र, शुक्र, मगंल तथा बृहस्पति जो संसार के कल्याण हेतु विभिन्न कार्यों का भार सँभालते हैं ); विभूतय: --शक्ति का विस्तार; मम--मेरा; हि--निस्सन्देह; एता:--ये, इन सब; भूतानाम्--सारे जीवों का; भूति--कल्याण के;हेतव:--कारण।
ब्रह्मा, शिव, मनुगण, उच्च लोकों के अन्य सारे देवता तथा जनसंख्या बढ़ाने वाले तुमसारे प्रजापति सारे जीवों के लाभार्थ कार्य कर रहे हो।
इस तरह मेरी तटस्था शक्ति के अंशरूप तुम सभी मेरे विभिन्न गुणों के अवतार हो।
तपो मे हृदयं ब्रह्मांस्तनुर्विद्या क्रियाकृति: ।
अड्भनि क्रतवो जाता धर्म आत्मासव: सुरा: ॥
४६॥
तपः--मन का नियंत्रण, योग तथा ध्यान जैसी तपस्याएँ; मे--मेरा; हृदयम्--हृदय; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; तनु: --शरीर;विद्या--वैदिक शास्त्रों से प्राप्त ज्ञान; क्रिया--आध्यात्मिक कार्य; आकृति:--स्वरूप; अज्ञनि--शरीर के अंग; क्रतव:--बैदिक वाड्मय में उल्लिखित कर्मकाण्ड तथा यज्ञ; जाता:--पूर्ण किये गये; धर्म:--कर्मकाण्ड सम्पन्न करने के लिएधार्मिक सिद्धान्त; आत्मा--मेरी आत्मा; असव:ः--प्राणवायु; सुरा:--देवता जो भौतिक जगत के विभिन्न विभागों में मेरेआदेशों को लागू करते हैं।
हे ब्राह्मण! ध्यान रूप में तपस्या ही मेरा हृदय है, स्तुतियों तथा मंत्रों के रूप में वैदिकज्ञान ही मेरा शरीर है और आध्यात्मिक कार्य तथा आनन्दानुभूतियां ही मेरा वास्तविक स्वरूपहै।
उचित रीति से सम्पन्न हुए कर्मकाण्ड तथा यज्ञ मेरे शरीर के विविध अंग हैं; पुण्य याआध्यात्मिक कार्यों से उत्पन्न अदृश्य सौभाग्य मेरा मन है और विविध विभागों में मेरे आदेशोंको लागू करने वाले देवता मेरे जीवन तथा आत्मा हैं।
अहमेवासमेवाग्रे नान्यत्किज्ञान्तरं बहिः ।
संज्ञानमात्रमव्यक्तं प्रसुप्तमिव विश्वतः ॥
४७॥
अहमू-मैं, भगवान्; एव--एकमात्र; आसम्-- था; एब--निश्चय ही; अग्रे--प्रारम्भ में, सृष्टि से पूर्व; न--नहीं; अन्यत्--अन्य; किज्ञ--कुछ भी; अन्तरम्ू--मेरे अतिरिक्त; बहि:--बाहरी (चूँकि विराट जगत आध्यात्मिक जगत से बाहर हैइसलिए जब भौतिक जगत न था, तो आध्यात्मिक जगत विद्यमान था ); संज्ञान-मात्रमू--केवल जीव की चेतना;अव्यक्तम्ू--अप्रकट; प्रसुप्तम्--सुप्त; इब--सहृश; विश्वत: --सर्वत्रइस विराट जगत की सृष्टि के पूर्व
अकेला मैं अपनी विशिष्ट आध्यात्मिक शक्तियों केसाथ विद्यमान था।
तब चेतना प्रकट नहीं हुई थी, जिस तरह नींद के समय मनुष्य की चेतनाअप्रकट रहती है।
मय्यनन्तगुणेउनन्ते गुणतो गुणविग्रहः ।
यदासीत्तत एवाद्य: स्वयम्भू: समभूदज: ॥
४८॥
मयि--मुझमें; अनन्त-गुणे-- असीम शक्ति से युक्त; अनन्ते--असीम; गुणत:--माया नामक मेरी शक्ति से; गुण-विग्रह:--ब्रह्माण्ड जो कि प्रकृति के गुणों का परिणाम है; यदा--जब; आसीत्--जगत में आया; ततः--उसमें; एब--निस्सन्देह; आद्य:--प्रथम जीव; स्वयम्भू: --ब्रह्मा; समभूत्--उत्पन्न हुआ; अज:--यद्यपि भौतिक माता से नहीं |
मैं असीम शक्ति का आगार हूँ, इसलिए मैं अनन्त या सर्वव्यापक के नाम से प्रसिद्ध हूँ।
मेरी भौतिक शक्ति से मेरे भीतर विराट जगत प्रकट हुआ और इस विराट जगत में मुख्य जीवब्रह्मा प्रकट हुए जो तुम लोगों के स्त्रोत हैं और वे किसी भौतिक माता से नहीं जन्मे हैं।
स बै यदा महादेवो मम वीर्योपबृंहितः ।
मेने खिलमिवात्मानमुद्यतः स्वर्गकर्मणि ॥
४९॥
अथ मेभिहितो देवस्तपोतप्यत दारुणम् ।
नव विश्वसूजो युष्मान्येनादावसृजद्विभु: ॥
५०॥
सः--वह ( ब्रह्मा ); बै--निस्सन्देह; यदा--जब; महा-देव: --समस्त देवताओं के प्रधान; मम--मेरा; वीर्य-उपबृंहित:--शक्ति से वर्धित हुआ; मेने--सोचा; खिलम्--अशक्त; इब--मानो; आत्मानमू्-- स्वयं; उद्यतः--प्रयलशील; स्वर्ग-कर्मणि--विश्व-प्रपंचों की सृष्टि में; अथ--उस समय; मे--मेरे द्वारा; अभिहित: --सलाह दिया गया; देव:--उस ब्रह्मा ने;तपः--तपस्या; अतप्यत--सम्पन्न की; दारुणम्--अत्यन्त कठिन; नव--नौ; विश्व-सृज:--ब्रह्माण्ड की रचना करने केलिए महत्त्वपूर्ण व्यक्ति; युष्मान्ू--तुम सभी; येन--जिसके द्वारा; आदौ-प्रारम्भ में; असृजत्--उत्पन्न किया; विभु:--महान्।
जब ब्रह्माण्ड के मुख्य देवता ब्रह्मा ( स्वयंभू ) मेरी शक्ति के द्वारा प्रेरणा पाकर सृजनकरने का प्रयास कर रहे थे तो उन्होंने अपने को असमर्थ पाया।
इसलिए मैंने उन्हें सलाह दीऔर मेरे आदेशों के अनुसार उन्होंने कठिन तपस्या की।
इस तपस्या के कारण सृजन केकार्यो में अपनी सहायता के लिए उन्होंने तुम समेत नौ महापुरुषों को उत्पन्न किया।
एषा पदञ्जजनस्याड् दुहिता वै प्रजापते: ।
असिकक्नी नाम पतीत्वे प्रजेश प्रतिगृह्मयताम्ू ॥
५१॥
एषा--यह; पञ्ञजनस्य--पञ्ञजन की; अड्ग--हे पुत्र; दुहिता--पुत्री; बै--निस्सन्देह; प्रजापते:-- अन्य प्रजापति; असिक्नीनाम--असिक्नी नामक; पत्नीत्वे--अपनी पत्नी के रूप में; प्रजेश--हे प्रजापति; प्रतिगृह्मताम्--स्वीकार करो।
हे पुत्र दक्ष! प्रजापति पञ्ञजन के असिक्नी नामक पुत्री है, जिसे मैं तुम्हें प्रदान करता हूँजिससे तुम उसे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर सको।
मिथुनव्यवायथर्मस्त्व॑ प्रजासर्गमिमं पुनः ।
मिथुनव्यवायधर्मिण्यां भूरिशो भावयिष्यसि ॥
५२॥
मिथुन--पुरुष तथा स्त्री का; व्यवाय--संभोग; धर्म: --जो धार्मिक कृत्य द्वारा स्वीकार करता है; त्वमू--तुम; प्रजा-सर्गम्--जीवों की सृष्टि; इमम्ू--यह; पुनः--फिर; मिथुन--स्त्री तथा पुरुष के संयोग का; व्यवाय-धर्मिण्याम्--संभोग केधार्मिक कृत्य के अनुसार; भूरिश:--अनेक बार; भावयिष्यसि--तुम उत्पन्न करोगे।
अब पुरुष तथा स्त्री रूप में यौन जीवन में संयुक्त हो जाओ और इस तरह संभोग द्वारातुम इस कन्या के गर्भ से जनसंख्या की वृद्धि करने के लिए सैकड़ों सनन््तानें उत्पन्न करसकोगे।
त्वत्तोधस्तात्प्रजा: सर्वा मिथुनी भूय मायया ।
मदीयया भविष्यन्ति हरिष्यन्ति च मे बलिम् ॥
५३॥
त्वत्त:--तुम; अधस्तात्--बाद में; प्रजा:--जीव; सर्वा: --सारे; मिथुनी-भूय--यौन जीवन वाले; मायया--माया द्वारा दीगई सुविधाओं या प्रभाव के कारण; मदीयया--मेरा; भविष्यन्ति--हो जायेंगे; हरिष्यन्ति--वे प्रदान करेंगे; च-- भी; मे--मेरे प्रति; बलिम्-- भेंटें ॥
जब तुम हजारों सन््तानों को जन्म दे चुकोगे, तो वे भी मेरी माया द्वारा मोहित की जातीरहेंगी और तुम्हारी ही तरह संभोग में संलग्न होंगी।
किन्तु तुम पर और उन पर मेरी कृपा केकारण, वे भी मुझे भक्ति की भेंटें प्रदान कर सकेंगे।
श्रीशुक उबाचइत्युक्त्वा मिषतस्तस्य भगवान्विश्वभावन: ।
स्वप्नोपलब्धार्थ इव तत्रैवान्तर्दधे हरि: ॥
५४॥
श्री-शुक:ः उबाच--शुकदेव गोस्वामी कहने लगे; इति--इस प्रकार; उक्त्वा--कहकर; मिषत: तस्य--जब वह ( दक्ष )स्वयं देख रहा था; भगवानू-- भगवान्; विश्व-भावन:--विश्व के मामलों को उत्पन्न करने वाले; स्वप्न-उपलब्ध-अर्थ:--स्वण में प्राप्त वस्तु; इब--सहश; तत्र--वहाँ; एव--निश्चय ही; अन्तर्दधे--अन्तर्धान हो गए; हरिः-- भगवान् हरि।
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : जब सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्त्रष्टा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हरि प्रजापति दक्ष के सामने इस तरह बोल चुके तो बे तुरन्त अन्तर्धान हो गये, मानो वे स्वप्नमें अनुभव की गई कोई वस्तु रहे हों।
