← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 6 की सूची

अध्याय तीन: यमराज अपने दूतों को निर्देश देते हैं

6.3श्रीराजोबाचनिशम्य देव: स्वभटोपवर्णितंप्रत्याह कि तानपि धर्मराज: ।

एवं हताज्ञो विहतान्मुरारे-नैदेशिकैर्यस्थ वशे जनोउयम्‌ ॥

१॥

श्री-राजा उवाच--राजा ने कहा; निशम्य--सुनकर; देव: --यमराज; स्व-भट--अपने सेवकों का; उपवर्णितम्‌--कथन;प्रत्याह--उत्तर दिया; किमू--क्या; तानू--उनको; अपि-- भी; धर्म-राज:--यमराज, जो मृत्यु के अधीक्षक तथा धार्मिकएवं अधार्मिक कार्यों के निर्णायक हैं; एवम्‌--इस प्रकार; हत-आज्ञ:--जिनका आदेश व्यर्थ हो चुका था; विहतान्‌ू--जोपराजित किये गये थे; मुरारे: नेदेशिकैः --मुरारी अर्थात्‌ कृष्ण के दूतों द्वारा; यस्थ--जिसके ; वशे--अधीन; जन: अयमू--संसार के सारे लोग

राजा परीक्षित ने कहा : हे प्रभु, हे शुकदेव गोस्वामी! यमराज सारे जीवों के धार्मिकतथा अधार्मिक कार्यो के नियंत्रक हैं, लेकिन उनका आदेश व्यर्थ कर दिया गया है।

जबउनके सेवकों अर्थात्‌ यमदूतों ने उनसे विष्णुदूतों द्वारा अपनी पराजय की जानकारी दीजिन्होंने उन्हें अजामिल को बन्दी बनाने से रोका था, तो यमराज ने क्या उत्तर दिया ?

यमस्य देवस्य न दण्डभड्ःकुतश्चनर्षे श्रुतपूर्व आसीत्‌ ।

एतनन्‍्मुने वृश्चति लोकसंशयंन हि त्वदन्य इति मे विनिश्चितम्‌ ॥

२॥

यमस्य--यमराज का; देवस्थ--न्याय के अधिकारी देवता; न--नहीं; दण्ड-भड़:--आदेश का तोड़ा जाना; कुतश्चन--कहीं से भी; ऋषे--हे ऋषि; श्रुत-पूर्व:--पहले सुना हुआ; आसीत्‌-- था; एतत्‌--यह; मुने--हे मुनि; वृश्चति--नष्ट करसकता है; लोक-संशयम्‌--लोगों का सन्देह; न--नहीं; हि--निस्सन्देह; त्वत्‌-अन्य:--आपके अतिरिक्त; इति--इसप्रकार; मे--मेरे द्वारा; विनिश्चितम्‌--निष्कर्ष को प्राप्त |

हे महर्षि! इसके पूर्व यह कहीं भी सुनाई नहीं पड़ा कि यमराज के आदेश का उल्लंघनहुआ हो।

इसलिए मैं सोचता हूँ कि लोगों को इस पर सन्देह होगा जिसका उन्मूलन अन्यकोई नहीं, अपितु आप ही कर सकते हैं।

चूँकि ऐसी मेरी दृढ़ धारणा है, इसलिए कृपा करकेइन घटनाओं के कारणों की व्याख्या करें।

श्रीशुक उवाचभगवत्पुरुषै राजन्याम्या: प्रतिहतोद्यमा: ।

पतिं विज्ञापयामासुर्यमं संयमनीपतिम्‌ ॥

३॥

श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; भगवत्-पुरुषै:-- भगवान्‌ के आज्ञापालकों या विष्णुदूतों द्वारा; राजन्‌ू--हेराजन्‌; याम्या:--यमराज के दूत; प्रतिहत-उद्यमा:--जिनके प्रयास व्यर्थ हुए; पतिम्‌--अपने स्वामी; विज्ञापयाम्‌ आसु:--सूचित किया; यमम्‌--यमराज को; संयमनी-पतिम्‌--संयमनी पुरी के स्वामी |

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया: हे राजन्‌! जब यमराज के दूत विष्णुदूतों द्वारा चकरादिये गये और पराजित कर दिये गये तो वे अपने स्वामी संयमनीपुरी के नियंत्रक तथा पापीपुरुषों के स्वामी यमराज के पास इस घटना को बताने पहुँचे।

यमदूता ऊचु:कति सन्‍्तीह शास्तारो जीवलोकस्य वै प्रभो ।

त्रैविध्यं कुर्वतः कर्म फलाभिव्यक्तिहेतवः ॥

४॥

यमदूता: ऊचु:--यमराज के दूतों ने कहा; कति--कितने; सन्ति--हैं; इहह--इस जगत में; शास्तार:--नियंत्रक याशासक; जीव-लोकस्य--इस भौतिक जगत के; बै--निस्सन्देह; प्रभो--हे स्वामी; त्रै-विध्यम्‌--प्रकृति के तीन गुणों केअधीन; कुर्वतः--करते हुए; कर्म--कर्म; फल--फलों की; अभिव्यक्ति-- अभिव्यक्ति के; हेतव:--कारण।

यमदूतों ने कहा : हे प्रभु! इस भौतिक जगत में कितने नियंत्रक या शासक हैं ?

प्रकृतिके तीन गुणों ( सतो, रजो तथा तमो गुणों ) के अधीन सम्पन्न कर्मों के विविध फलों कोप्रकट करने के लिए कितने कारण उत्तरदायी हैं ?

यदि स्युर्बहवो लोके शास्तारो दण्डधारिण: ।

कस्य स्यातां न वा कस्य मृत्युश्नामृतमेव वा ॥

५॥

यदि--यदि; स्यु:--हैं; बहव:--अनेक; लोके --इस जगत में; शास्तार: --शासक या नियंत्रक; दण्ड-धारिण:--पापीलोगों को दण्ड देने वाले; कस्य--किसका; स्याताम्‌ू--हो सकता है; न--नहीं; वा--अथवा; कस्य--किसका; मृत्यु: --कष्ट या दुख; च--तथा; अमृतमू--सुख; एब--निश्चय ही; वा--अथवायदि

इस ब्रह्माण्ड में अनेक शासक तथा न्यायकर्ता हैं, जो दण्ड तथा पुरस्कार के विषयमें मतभेद रखते हों, तो उनके विरोधी कार्य एक दूसरे को प्रभावहीन कर देंगे और न तोकोई दण्डित होगा न पुरस्कृत होगा।

अन्यथा, यदि उनके विरोधी कार्य एक दूसरे कोप्रभावहीन नहीं कर पाते तो हर एक को दण्ड तथा परस्कार दोनों ही देने होंगे।

किन्तु शास्तृबहुत्वे स्याह्नहूनामिह कर्मिणाम्‌ ।

शास्तृत्वमुपचारो हि यथा मण्डलवर्तिनाम्‌ ॥

६॥

किन्तु--लेकिन; शास्तृ--राज्यपालकों या निर्णायकों का; बहुत्वे--विविधता में; स्थातू--हो सकता है; बहूनाम्‌--अनेकोंका; इह--इस जगत में; कर्मिणाम्‌ू--कर्म करने वाले पुरुषों का; शास्तृत्वम्‌ू--विभागीय व्यवस्था; उपचार:--प्रशासन;हि--निस्सन्देह; यथा--जिस तरह; मण्डल-वर्तिनाम्‌ू--विभागीय अध्यक्षों का

यमदूतों ने आगे कहा : चूँकि कर्मी अनेक हैं, अतएवं उनके न्याय करने वाले निर्णायकया शासक भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, किन्तु जिस तरह एक केन्द्रीय सप्राट विभिन्न विभागीय शासकों को नियंत्रित करता है, उसी तरह सारे निर्णायकों के मार्गदर्शन हेतु एक परमनियन्ता होना चाहिए।

अतस्त्वमेको भूतानां सेश्वराणामधी श्वर: ।

शास्ता दण्डधरो नृणां शुभाशुभविवेचन: ॥

७॥

अतः--अत:; त्वम्‌ू--तुम; एक:--एक; भूतानाम्‌--सारे जीवों के; स-ईश्वराणाम्‌--सारे देवताओं सहित; अधी श्वर:--परम स्वामी; शास्ता--परम शासक; दण्ड-धरः--दण्ड का परम प्रशासक; नृणाम्‌--मानव समाज का; शुभ-अशुभ-विवेचन:--जो शुभ तथा अशुभ में भेदभाव करता है।

परम निर्णायक तो एक होना चाहिए, अनेक नहीं।

हम तो यही समझते थे कि आप परमनिर्णायक हैं और आपका देवताओं पर भी अधिकार है।

हमारी यह धारणा थी कि आप सारेजीवों के स्वामी हैं, जो सारे मनुष्यों के शुभ तथा अशुभ कर्मों में भेदभाव करते हैं।

तस्य ते विहितो दण्डो न लोके वर्ततेधुना ।

चतुर्भिरद्धुतेः सिद्धैराज्ञा ते विप्रलम्भिता ॥

८॥

तस्य--प्रभाव का; ते-- आपको; विहित:--नियत; दण्ड:--दण्ड; न--नहीं; लोके--इस जगत में ; वर्तते--विद्यमान है;अधुना--अब; चतुर्भि:--चार; अद्भुतै:--अतीव अद्भुत; सिद्धैः--सिद्ध पुरुषों द्वारा; आज्ञा--आदेश; ते--तुम्हारा;विप्रलम्भिता--उल्लंघन किया हुआ।

किन्तु अब हम देखते हैं कि आपके अधिकार के अन्तर्गत नियत किया हुआ दण्डप्रभावी नहीं है, क्योंकि चार अद्भुत सिद्ध पुरुषों द्वारा आपके आदेश का उल्लंघन कियाजा चुका है।

नीयमानं तवादेशादस्माभिर्यातनागृहान्‌ ।

व्यामोचयन्पातकिनं छित्त्वा पाशान्प्रसहा ते ॥

९॥

नीयमानम्‌--लाया जा रहा; तव आदेशात्‌--आपके आदेश से; अस्माभि:--हमारे द्वारा; यातना-गृहान्‌ू--यातना के कक्षोंया नरक लोकों को; व्यामोचयन्‌--छुड़ाते हुए; पातकिनम्‌--पापी अजामिल को; छित्त्वा--काटकर; पाशान्‌--रस्सियोंको; प्रसह्या--बलपूर्वक; ते--वे |

हम आपके आदेशानुसार महान्‌ पापी अजामिल को नरक की ओर ला रहे थे, तभीसिद्धलोक के उन सुन्दर पुरुषों ने बलपूर्वक उन रस्सियों की गाँठों को काट दिया जिनसे हमउसे बन्दी बनाये हुए थे।

तांस्‍्ते वेदितुमिच्छामो यदि नो मन्यसे क्षमम्‌ ।

नारायणेत्यभिहिते मा भेरित्याययुर्द्तमू ॥

१०॥

तान्‌--उनके विषय में; ते--आप से; वेदितुम्‌ू--जानने के लिए; इच्छाम:--हम चाहते हैं; यदि--यदि; न:--हमारे लिए;मन्यसे--आप सोचते हैं; क्षमम्‌--उपयुक्त; नारायण--नारायण; इति--इस प्रकार; अभिहिते--उच्चारण किया गया;मा--नहीं; भे: -- डरो; इति--इस प्रकार; आययु:--वे आये; द्रतम्‌--बहुत शीघ्र |

ज्योंही पापी अजामिल ने नारायण नाम का उच्चारण किया, ये चारों सुन्दर व्यक्ति तुरन्त वहाँ आ गये और यह कहकर उसे पुनः आश्वस्त किया, 'डरो मत।

मत डरो।

हम आपसेउनके विषय में जानना चाहते हैं।

यदि आप यह सोचते हैं कि हम उनके विषय में जान सकतेहैं, तो कृपा करके बताइये कि वे कौन हैं।

श्रीबादरायणिरुवाचइति देव: स आपृष्ट: प्रजासंयमनो यम: ।

प्रीत: स्वदूतान्प्रत्याह स्मरन्पादाम्बुजं हरे: ॥

११॥

श्री-बादरायणि: उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; देव: --देवता; सः--वह; आपृष्ट: --पूछे जाने पर;प्रजा-संयमन: यम:--यमराज, जो जीवों पर नियंत्रण रखते हैं; प्रीत:--प्रसन्न होकर; स्व-दूतान्‌ू--अपने सेवकों को;प्रत्याह--उत्तर दिया; स्मरन्‌--स्मरण करते हुए; पाद-अम्बुजमू--चरणकमलों को; हरे: -- भगवान्‌ हरि के

श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार पूछे जाने पर जीवों के परम नियन्ता यमराजअपने दूतों से नारायण का पवित्र नाम सुनकर उन पर परम प्रसन्न हुए।

उन्होंने भगवान्‌ केचरणकमलों का स्मरण किया और उत्तर देना शुरू किया।

यम उवाचपरो मदन्यो जगतस्तस्थुषश्चओतं प्रोतं॑ पटवद्य॒त्र विश्वम्‌ ।

यदंशतोस्य स्थितिजन्मनाशानस्योतवद्यस्थ वशे च लोक: ॥

१२॥

यम: उवाच--यमराज ने उत्तर दिया; पर: -- श्रेष्ठ; मत्‌--मुझसे; अन्य:--दूसरा; जगत:ः--समस्त चर वस्तुओं का;तस्थुष:--अचर वस्तुओं का; च--तथा; ओतम्‌--चौड़ाई में, आर-पार; प्रोतम्‌--लम्बाई में; पटवत्‌--बुने हुए वस्त्र कीभाँति; यत्र--जिसमें; विश्वम्‌--विराट जगत; यत्‌--जिसका; अंशत:--आंशिक विस्तार से; अस्य--इस ब्रह्माण्ड का;स्थिति--पालन; जन्म--सृजन; नाशा:--तथा संहार; नसि--नाक में; ओत-वत्‌--रस्सी की तरह; यस्य--जिसका;वशे--वश में; च--तथा; लोकः--सारी सृष्टि

यमराज ने कहा : मेरे प्रिय सेवको! तुम लोगों ने मुझे सर्वोच्च स्वीकार किया है, किन्तुमैं वास्तव में हूँ नहीं।

मेरे ऊपर तथा इन्द्र एवं चन्द्र समेत अन्य सारे देवताओं के ऊपर एकपरम स्वामी तथा नियन्ता हैं।

उनके आंशिक स्वरूप ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव हैं, जो ब्रह्माण्डके सृष्टि पालन एवं संहार के भार को संभालते हैं।

वे उन दो धागों के तुल्य हैं, जो बुने हुएवस्त्र की लम्बाई तथा चौड़ाई या ताने-बाने का निर्माण करते हैं।

सम्पूर्ण जगत उनके द्वाराउसी तरह नियंत्रित होता है, जिस तरह एक बैल अपने नाक की रस्सी द्वारा नियंत्रित होता है।

यो नामभिर्वाचि जन॑ निजायांबध्नाति तन्त्रयामिव दामभिर्गा: ।

यस्मै बलिं त इमे नामकर्म-निबन्धबद्धाश्रकिता वहन्ति ॥

१३॥

यः--जो; नामभि: --विभिन्न नामों से; वाचि--वैदिक भाषा में; जनम्‌--सारे लोगों को; निजायाम्‌--जो स्वयं उनसेउद्भूत है; बध्नाति--बाँधता है; तन्त्यामू--रस्सी को; इब--सहश; दामभि:--रस्सी से; गा: --बैल; यस्मै--जिसको;बलिम्‌ू--कर की छोटी सी भेंट; ते--वे सभी; इमे--इन; नाम-कर्म--नामों तथा विभिन्न कार्यों का; निबन्ध--कृतज्ञतासे; बद्धा:--बँधा हुआ; चकिता:-- भयभीत; वहन्ति--ढोते हैं |

जिस तरह बैलगाड़ी का चालक अपने बैलों को वश में करने के लिए उनके नथुनों सेनिकालकर रस्सियाँ ( नाथ ) बाँध देता है उसी तरह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ सारे व्यक्तियोंको वेदों में कहे अपने वचनों रूपी रस्सियों ( नाथ ) के द्वारा बाँधते हैं, जो मानव समाज केविभिन्न वर्णो के नामों तथा कार्यो ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र ) को निर्धारित करते हैं।

इन वर्णों के लोग भयवश परम भगवान्‌ की पूजा अपने-अपने कर्मों के अनुसार भेंटें अर्पित करते हुए करते हैं।

अहं महेन्द्रो निरृतिः प्रचेता:सोमोग्निरीश: पवनो विरिज्धि: ।

आदित्यविश्वे वसवोथ साध्यामरुद्गणा रुद्रगणा: ससिद्धा: ॥

१४॥

अन्ये च ये विश्वसृजो मरेशाभृग्वादयोस्पृष्टरजस्तमस्का: ।

यस्थेहितं न विदुः स्पृष्टमाया:सत्त्वप्रधाना अपि कि ततोउन्ये ॥

१५॥

अहम्‌ू--मैं, यमराज; महेन्द्र: --इन्द्र, स्वर्ग का राजा; निरृति:ः--निर्क्रति; प्रचेता:--जल का नियन्ता, वरुण; सोम:--चन्द्रमा; अग्नि:--अग्नि; ईश:--शिव; पवन: --पवनदेव; विरिज्ञि:--ब्रह्मा; आदित्य--सूर्य; विश्वे--विश्वासु; वसव:--आठों बसु; अथ-भी; साध्या:--देवतागण; मरुत्‌ -गणा:--वायु के स्वामी; रुद्र-गणा:--शिव के अंश; स-सिद्धा:--सिद्ध लोक के निवासियों सहित; अन्ये--अन्य; च--तथा; ये--जो; विश्व-सृज:--मरीचि तथा विश्व मामलों के अन्यस्त्रष्ठा; अमर-ईशा: --बृहस्पति जैसे देवता; भूगु-आदय:-- भूगु इत्यादि ऋषिगण; अस्पृष्ट-- अकलुषित; रज:-तमस्का: --प्रकृति के निम्नतर गुणों ( रजोगुण तथा तमोगुण ) द्वारा; यस्थ--जिसका; ईहितम्‌-कार्य; न विदुः: --नहीं जानते; स्पृष्ट-माया:--माया द्वारा मोहित; सत्त्व-प्रधाना: --मुख्यरूप से सतोगुणी; अपि--यद्यपि; किम्‌--क्या कहा जाये; तत:--उनकी अपेक्षा; अन्ये-- अन्य

मैं यमराज, स्वर्ग का राजा इन्द्र, निर्रति, वरुण, चन्द्र, अग्नि, शिव, पवन, ब्रह्मा, सूर्य,विश्वासु, आठों वरुण, साध्यगण, मरुतगण, सिद्धगण; तथा मरीचि एवं अन्य ऋषिगण जोब्रह्माण्ड के विभागीय कार्यकर्ताओं को चलाने में लगे रहते हैं, बृहस्पति इत्यादि सर्वोत्तमदेवतागण तथा भूगु आदि मुनिगण--ये सभी प्रकृति के दो निम्न गुणों--रजो तथा तमोगुणके प्रभाव से निश्चित रूप से मुक्त होते हैं।

फिर भी, यद्यपि हम सतोगुणी हैं, तो भी हम पूर्णपुरुषोत्तम भगवान्‌ के कार्यों को नहीं समझ सकते।

तो फिर दूसरों के विषय में क्‍या कहाजाये जो मोह के अधीन होने से ईश्वर को जानने के लिए केवल मानसिक ऊहापोह करतेहों?

यं वै न गोभिर्मनसासुभिर्वाहृदा गिरा वासुभूतो विचक्षते ।

आत्मानमन्तईदि सन्तमात्मनांचक्षुर्यथेवाकृतयस्ततः परम्‌ ॥

१६॥

यम्‌--जिसको; वै--निस्सन्देह; न--नहीं; गोभि: --इन्द्रियों द्वारा; मनसा--मन से; असुभि:--प्राण वायु द्वारा; वा--अथवा; हृदा--विचारों से; गिरा--शब्दों से; वा--अथवा; असु-भूत: --जीव; विचक्षते--देखते या जानते हैं;आत्मानम्‌--परमात्मा को; अन्त:-हृदि--हृदय के भीतर; सन्तम्‌--विद्यमान; आत्मनामू--जीवों के; चक्षु:--नेत्र; यथा--जिस तरह; एब--निस्सन्देह; आकृतय:--शरीर के विभिन्न अंग; तत:--उनकी तुलना में; परम्‌--उच्चतर |

जिस तरह शरीर के विभिन्न अंग आँखों को नहीं देख सकते, उसी तरह सारे जीवपरमेश्वर को नहीं देख सकते जो हर एक के हृदय में परमात्मा के रूप में स्थित रहते हैं।

न तोइन्द्रियों से, न मन से, न प्राणवायु से, न हृदय के अन्दर के विचारों से, न ही शब्दों की ध्वनिसे जीवात्माएँ परमेश्वर की असली स्थिति को निश्चित कर सकते हैं।

तस्यात्मतन्त्रस्थ हरेरधीशितुःपरस्य मायाधिपतेर्महात्मन: ।

प्रायेण दूता इह वै मनोहरा-अ्वरन्ति तद्गूपगुणस्वभावा: ॥

१७॥

तस्य--उसका; आत्म-तन्त्रस्थ--आत्मनिर्भर, किसी अन्य व्यक्ति पर आश्नित नहीं; हरेः--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ का;अधीशितु: -- प्रत्येक वस्तु का स्वामी; परस्यथ--ब्रह्मा का; माया-अधिपते:--माया के स्वामी; महा-आत्मन:--सर्व श्रेष्ठचेतन आत्मा; प्रायेण-- प्राय: ; दूता:--दूत; इह--इस जगत में; बै--निस्सन्देह; मनोहरा:--बर्ताव तथा शारीरिक स्वरूप मेंसुहावना; चरन्ति--चलते फिरते हैं; तत्‌--उसका; रूप--शारीरिक रूप वाला; गुण--दिव्य गुण; स्वभावा:--तथास्वभाव।

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ आत्म-निर्भर तथा पूरी तरह स्वतंत्र हैं।

वे माया समेत हर एक केस्वामी हैं।

वे रूप, गुण तथा स्वभाव से युक्त हैं और इसी तरह उनके आदेशपालक, अर्थात्‌वैष्णव, जो अत्यन्त सुन्दर होते हैं, उन्हीं जैसे ही शारीरिक स्वरूप दिव्य गुण तथा दिव्यस्वभाव से युक्त होते हैं।

वे इस जगत में पूर्ण स्वतंत्रता के साथ सदैव विचरण करते हैं।

भूतानि विष्णो: सुरपूजितानिदुर्दर्शलिड्रानि महाद्भुतानि ।

रक्षन्ति तद्धक्तिमतः परेभ्योमत्तश्च मर्त्यानथ सर्वतश्च ॥

१८॥

भूतानि--जीव या सेवक; विष्णो: --विष्णु के; सुर-पूजितानि--देवताओं द्वारा पूजित; दुर्दर्शशलिड्ञानि--सरलता से नदिखने वाले रूपों वाले; महा-अद्भुतानि--अत्यन्त अद्भुत; रक्षन्ति--वे रक्षा करते हैं; तत्‌-भक्ति-मतः-- भगवान्‌ के भक्त;परेभ्य:--अन्यों से, जो शत्रुता रखते हैं; मत्त:--मुझ ( यमराज ) से तथा मेरे दूतों से; च--तथा; मर्त्यानू--मनुष्यों को;अथ--इस प्रकार; सर्वतः--हर वस्तु से; च--तथा।

भगवान्‌ विष्णु के दूत, जिनकी पूजा देवता भी किया करते हैं, विष्णु जैसे ही अद्भुतशारीरिक लक्षणों से युक्त होते हैं और विरले ही दिखाई देते हैं।

ये विष्णुदूत भगवद्भक्तों कीरक्षा उनके शत्रुओं, ईर्ष्यालु व्यक्तियों और मेरे अधिकार क्षेत्र के साथ ही साथ प्राकृतिकउत्पातों से भी करते हैं।

धर्म तु साक्षाद्धगवत्प्रणीतंन वै विदुरृषयो नापि देवा: ।

न सिद्धमुख्या असुरा मनुष्या:कुतो नु विद्याधरचारणादय: ॥

१९॥

धर्ममू--असली धार्मिक सिद्धान्त या धर्म के प्रामाणिक नियम; तु--लेकिन; साक्षात्‌--प्रत्यक्षत:; भगवत्‌--पूर्ण पुरुषोत्तमभगवान्‌ द्वारा; प्रणीतम्‌ू--निर्मित; न--नहीं; वै--निस्सन्देह; विदु:--वे जानते हैं; ऋषय: -- भूगु जैसे महान्‌ ऋषि; न--नहीं; अपि-- भी; देवा:--देवता; न--नहीं; सिद्ध-मुख्या:--सिद्धलोक के मुख्य नेता; असुरा:--असुरगण; मनुष्या:--भूलोंक के निवासी; कुतः--कहाँ; नु--निस्सन्देह; विद्याधर--विद्याधर नामक कनिष्ठ देवता; चारण--उन लोकों केनिवासी जहाँ के लोग स्वभाव से महान्‌ संगीतकार होते हैं; आदय:--इत्यादि |

असली धार्मिक सिद्धान्तों का निर्माण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ द्वारा किया जाता है।

पूर्णतया सतोगुणी महान्‌ ऋषि तक भी, जो सर्वोच्च लोकों में स्थान पाये हुए हैं, वे भीअसली धार्मिक सिद्धान्तों को सुनिश्चित नहीं कर सकते, न ही देवतागण, न सिद्धलोक केनामक ही कर सकते हैं, तो असुरों, सामान्य मनुष्यों, विद्याधरों तथा चारणों की कौन कहे ?

स्वयम्भू्नारद: शम्भु: कुमार: कपिलो मनु: ।

प्रह्दो जनको भीष्मो बलिवैंयासकिर्वयम्‌ ॥

२०॥

द्वादशैते विजानीमो धर्म भागवतं भटा: ।

गुह्यं विशुद्धं दुर्बोध॑ य॑ ज्ञात्वामृतमश्नुते ॥

२१॥

स्वयम्भू:--ब्रह्मा; नारद:--महान्‌ सन्त नारद; शम्भु:--शिवजी; कुमार: --चार कुमार; कपिल:--कपिल; मनु:--स्वायम्भुव मनु; प्रह्मादः--प्रह्दाद महाराज; जनक:--जनक महाराज; भीष्म:--भीष्म पितामह; बलि:--बलि महाराज;वैयासकि:--व्यासदेव के पुत्र शुकदेव; वयम्‌--हम; द्वादश--बारह; एते--ये; विजानीम:--जानते हैं; धर्मम्‌ू--असलीधार्मिक सिद्धान्तों को; भागवतम्‌--जो यह शिक्षा देता है कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ से किस तरह प्रेम किया जाये;भटा:-हे सेवको; गुहाम्‌--अत्यन्त गोपनीय; विशुद्धमू-- अलौकिक, भौतिक गुणों से दूषित नहीं; दुर्बोधम्‌--आसानी सेसमझ में न आने वाला; यम्‌--जिसको; ज्ञात्वा--जानकर; अमृतम्‌--शा श्रवत जीवन; अश्नुते-- भोग करता है

ब्रह्मजी, भगवान्‌ नारद, शिवजी, चार कुमार, भगवान्‌ कपिल ( देवहूति के पुत्र ),स्वायंभुव मनु, प्रह्दाद महाराज, जनक महाराज, भीष्म पितामह, बलि महाराज, शुकदेवगोस्वामी तथा मैं असली धर्म के सिद्धान्त को जानने वाले हैं।

हे सेबको! यह अलौकिकधार्मिक सिद्धान्त, जो भागवत धर्म या परम भगवान्‌ की शरणागति तथा भगवत्प्रेम कहलाताहै, प्रकृति के तीनों गुणों से अकलुषित है।

यह अत्यन्त गोपनीय है और सामान्य मनुष्य केलिए दुर्बोध है, किन्तु संयोगवश यदि कोई भाग्यवान्‌ इसे समझ लेता है, तो वह तुरन्त मुक्तहो जाता है और इस तरह भगवद्धाम लौट जाता है।

एतावानेव लोके स्मिन्पुंसां धर्म: पर: स्मृतः ।

भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभि: ॥

२२॥

एतावान्‌--इतना; एव--निस्सन्देह; लोके अस्मिन्‌ू--इस भौतिक जगत में; पुंसामू--जीवों का; धर्म:--धार्मिक सिद्धान्त;पर:--दिव्य; स्मृत:--मान्यता प्राप्त; भक्ति-योग:--भक्तियोग या भक्तिमय सेवा; भगवति--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ केप्रति ( देवताओं के प्रति नहीं ); तत्‌--उसका; नाम--पवित्र नाम का; ग्रहण-आदिभि:--कीर्तन इत्यादि |

भगवान्‌ के नाम के कीर्तन से प्रारम्भ होने वाली भक्ति ही मानव-समाज में जीव केलिए परम धार्मिक सिद्धान्त है।

नामोच्चारणमाहात्म्यं हरे: पश्यत पुत्रका: ।

अजामिलोपि येनैव मृत्युपाशादमुच्यत ॥

२३॥

नाम--पवित्र नाम के; उच्चारण--उच्चारण का; माहात्म्यम्‌--उच्च स्थान; हरेः--परम ईश्वर का; पश्यत--जरा देखो;पुत्रका:--हे मेरे पुत्रवत्‌ सेवको; अजामिल: अपि--अजामिल ( जो महापापी था ) भी; येन--जिसके कीर्तन से; एव--निश्चय ही; मृत्यु-पाशात्‌--मृत्यु की रस्सियों से; अमुच्यत--छूट गया

हे मेरे पुत्रवत्‌ सेवको! जरा देखो न, भगवजन्नाम का कीर्तन कितना महिमायुक्त है! परमपापी अजामिल ने यह न जानते हुए कि वह भगवान्‌ के पवित्र नाम का उच्चारण कर रहा है,केवल अपने पुत्र को पुकारने के लिए नारायण नाम का उच्चारण किया।

फिर भी भगवान्‌के पवित्र नाम का उच्चारण करने से उसने नारायण का स्मरण किया और इस तरह से वहतुरन्त मृत्यु के पाश से बचा लिया गया।

एतावतालमघनिहरणाय पुंसांसड्डीर्तन॑ं भगवतो गुणकर्मनाम्नाम्‌ ।

विक्रुश्य पुत्रमघवान्यदजामिलोपिनारायणेति प्रियमाण इयाय मुक्तिम्‌ ॥

२४॥

एतावता--इतने से; अलम्‌--पर्याप्त; अध-निर्हरणाय--पापकर्मो के फलों को दूर करने के लिए; पुंसाम्‌--मनुष्यों का;सड्डलीर्तनम्‌--सामूहिक कीर्तन; भगवतः--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ के; गुण--अलौकिक गुणों का; कर्म-नाम्नामू--तथाउनके कार्यों एवं लीलाओं के अनुसार उनके नामों का; विक्रुश्य--अपराधरहित, क्रन्दन; पुत्रमू--अपने पुत्र से; अधवान्‌ू--पापी; यत्‌--चूँकि; अजामिल: अपि--अजामिल तक ने; नारायण--भगवान्‌ का नाम, नारायण; इति--इस प्रकार;प्रियमाण:--मरणासत्न; इयाय--प्राप्त की; मुक्तिमू--मुक्ति।

अतएव यह समझ लेना चाहिए कि मनुष्य भगवान्‌ के पवित्र नाम का और उनके गुणोंतथा कार्यों का कीर्तन करने से समस्त पाप फलों से सरलता से छुटकारा पा जाता है।

पापफलों से छुटकारा पाने के लिए इसी एकमात्र विधि की संस्तुति की जाती है।

यदि कोई अशुद्ध उच्चारण द्वारा भी भगवान्‌ के नाम का कीर्तन करता है, तो उसे भवबन्धन सेछुटकारा मिल जायेगा, किन्तु यदि वह अपराधरहित होकर कीर्तन करे।

उदहारणार्थ,अजामिल अत्यन्त पापी था, किन्तु मरते समय उसने पवित्र नाम का उच्चारण किया औरयद्यपि वह अपने पुत्र को पुकार रहा था, किन्तु उसे पूर्ण मुक्ति प्राप्त हुई, क्योंकि उसनेनारायण के नाम का स्मरण किया।

प्रायेण वेद तदिदं न महाजनोयंदेव्या विमोहितमतिर्बत माययालम्‌ ।

त्रय्यां जडीकृतमतिर्मधुपुष्पितायांवबैतानिके महति कर्मणि युज्यमान: ॥

२५॥

प्रायेण--लगभग सदा; वेद--जानो; तत्‌--वह; इृदम्‌--यह; न--नहीं; महाजन:--स्वायंभुव मनु, शम्भु तथा इनकेअतिरिक्त अन्य महापुरुष; अयम्‌--यह; देव्या--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ की शक्ति द्वारा; विमोहित-मतिः--जिसकी बुद्धिमोहग्रस्त है; बत--निस्सन्देह; मायया--माया द्वारा; अलमू--अत्यधिक; त्रय्याम्‌--तीन वेदों में; जडी-कृत-मति: --जिसकी बुद्धि जड़ हो चुकी है; मधु-पुष्पितायामू-कर्मकाण्ड के फलों का वर्णन करने वाली अलंकारमयी बैदिक भाषामें; वैतानिके--वेदवर्णित अनुष्ठानों में; महति--अति महान्‌; कर्मणि--सकाम कर्म में; युज्यमान:--लगे हुए

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ की माया द्वारा मोहग्रस्त होने के कारण याज्ञवल्क्य, जैमिनितथा अन्य शास्त्रप्रणेता भी बारह महाजनों की गुह्य धार्मिक प्रणाली को नहीं जान सकते।

वेभक्ति करने या हरे कृष्ण मंत्र का कीर्तन करने के दिव्य महत्त्व को नहीं समझ सकते।

चूँकिउनके मन वेदों--विशेषतया यजुर्वेद, सामवेद तथा ऋग्वेद में उल्लिखित कर्मकाण्डों केप्रति आकृष्ट रहते हैं, इसलिए उनकी बुद्धि जड़ हो गई है।

इस तरह वे उन कर्मकाण्डों केलिए सामग्री एकत्र करने में व्यस्त रहते हैं, जो केवल नश्वर लाभ देने वाले हैं--यथा भौतिकसुख के लिए स्वर्गलोक जाना।

वे संकीर्तन आन्दोलन के प्रति आकृष्ट नहीं होते बल्कि वेश़ धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष में रुचि लेते हैं।

एवं विमृश्य सुधियो भगवत्यनन्तेसर्वात्मना विदधते खलु भावयोगम्‌ ।

ते मे न दण्डमर्हन्त्यथ यद्यमीषांस्यात्पातकं तद॒पि हन्त्युरुगायवाद: ॥

२६॥

एवम्‌--इस प्रकार; विमृश्य--विचार करके ; सु-धिय:--वे जिनकी बुद्द्धि प्रखर है; भगवति--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ में;अनन्ते--असीम; सर्व-आत्मना--प्राणप्रण से; विद्धते--ग्रहण करते हैं; खलु--निस्सन्देह; भाव-योगम्‌--भक्तिमय सेवाकी विधि; ते--ऐसे लोग; मे--मेरा; न--नहीं; दण्डम्‌--दण्ड के; अर्हन्ति--योग्य हैं; अथ--इसलिए; यदि--यदि;अमीषाम्‌--उनका; स्यात्‌ू--है; पातकम्‌--कोई पाप कर्म; तत्‌ू--वह; अपि-- भी; हन्ति--नष्ट करता है; उरुगाय-वाद:--परमेश्वर के नाम का कीर्तन

अतः इन सभी बातों पर विचार करते हुए बुद्धिमान लोग हर एक के हृदय में स्थित तथासमस्त शुभ गुणों की खान भगवान्‌ के पवित्र नाम के कीर्तन की भक्ति को अपनाकर सारीसमस्याओं को हल करने का निर्णय करते हैं।

ऐसे लोग दण्ड देने के मेरे अधिकार क्षेत्र मेंनहीं आते।

सामान्यतया वे कभी कोई पापकर्म नहीं करते, किन्तु यदि वे भूलवश यामोहवश कभी कोई पापकर्म करते भी हैं, तो वे पापफलों से बचा लिये जाते हैं, क्योंकि वेसदैव हरे कृष्ण मंत्र का कीर्तन करते हैं।

ते देवसिद्धपरिगीतपवित्रगाथाये साधवः समहशो भगवत्प्रपन्ना: ।

तान्नोपसीदत हरेर्गदयाभिगुप्तान्‌नैषां वयं न च वयः प्रभवाम दण्डे ॥

२७॥

ते--वे; देव--देवताओं; सिद्ध--तथा सिद्धलोक के वासियों द्वारा; परिगीत--गाई गयी; पवित्र-गाथा: --शुद्ध कथाएँ;ये--जो; साधव:--भक्तजन; समहशः --समानदर्शी ; भगवत्‌-प्रपन्ना:--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ के शरणागत; तानू--उनको; न--नहीं; उपसीदत--पास जाना चाहिए; हरे: --पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ के; गदया--गदा से; अभिगुप्तान्‌--पूरी तरह सुरक्षित; न--नहीं; एषामू--इनका; वयम्‌--हम; न च--तथा नहीं; वयः--असीम काल; प्रभवाम--समर्थ हैं;दण्डे--दण्ड देने में

मेरे प्रिय सेवको! ऐसे भक्तों के पास मत जाना, क्‍योंकि वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ केचरणकमलों में पूरी तरह शरणागत हो चुके होते हैं।

वे समदर्शी होते हैं और उनकी गाथाएँदेवताओं तथा सिद्धलोक के निवासियों द्वारा गाई जाती हैं।

तुम लोग उनके निकट भी मतजाना।

वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ की गदा द्वारा सदैव रक्षित रहते हैं, इसलिए ब्रह्मा तथा मैंऔर काल भी उन्हें दण्ड देने में समर्थ नहीं हैं।

तानानयध्वमसतो विमुखान्मुकुन्द-पादारविन्दमकरन्दरसादजस्त्रम्‌ ॥

निष्किद्ञनैः परमहंसकुलैरसड्ै-जुष्टादगृहे निरयवर्त्मनि बद्धतृष्णान्‌ ॥

२८॥

तान्‌ू--उनको; आनयध्वम्‌--मेरे सामने लाओ; असत:--अभक्त ( जिन्होंने कृष्णभावनामृत नहीं स्वीकार किया );विमुखान्‌--जो विमुख हैं; मुकुन्द--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ मुकुन्द के; पाद-अरविन्द--चरणकमलों के; मकरन्द--मधुसे; रसात्‌ू--स्वाद से; अजस्त्रमू--निरन्तर; निष्किज्जनै:--भौतिक आसक्ति से पूर्णतया मुक्त पुरुषों द्वारा; परमहंस-कुलैः --परम सम्मानित व्यक्ति परमहंसों द्वारा; असड्रैः--भौतिक आसक्ति से रहित; जुष्टात्‌ू--जो भोगा जाता है, भोग्य; गृहे--गृहस्थ जीवन में; निरय-वर्त्मनि--नरक ले जाने का रास्ता; बद्ध-तृष्णान्‌ू--जिनकी इच्छाएँ बद्ध हैं |

परमहंस सम्माननीय पुरुष होते हैं, जिन्हें भौतिक भोग में कोई रुचि नहीं है तथा जोभगवान्‌ के चरणकमलों का मधु-पान करते हैं।

मेरे सेवको! मेरे पास ऐसे व्यक्तियों को हीदण्डित किये जाने के लिए लाओ जो उस मधु के आस्वादन से विमुख हैं, जो परमहंसों कीसंगति नहीं करते तथा जो गृहस्थ जीवन एवं सांसारिक भोग में लिप्त हैं, क्योंकि ये नरक लेजाने वाले रास्ते हैं।

जिह्ला न वक्ति भगवद्गुणनामधेयंचेतश्व न स्मरति तच्चरणारविन्दम्‌ ।

कृष्णाय नो नमति यच्छिर एकदापितानानयध्वमसतोकृतविष्णुकृत्यान्‌ू ॥

२९॥

जिह्ला--जीभ; न--नहीं; वक्ति--कीर्तन करती है; भगवत्‌--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ के; गुण--अलौकिक गुण; नाम--तथा पवित्र नाम का; धेयम्‌--प्रदान करते हुए; चेत:--हृदय; च-- भी; न--नहीं; स्मरति--स्मरण करता है; तत्‌--उसके;चरण-अरविन्दमू--चरणकमलों को; कृष्णाय-- भगवान्‌ कृष्ण को, मन्दिर में उनके अर्चाविग्रह के माध्यम से; नो--नहीं;नमति--झुकता है; यत्‌--जिसका; शिर:--सिर; एकदा अपि--एक बार भी; तानू--उनको; आनयध्वम्‌--मेरे समक्ष लेआओ; असतः: --अभक्तों को; अकृत--न करने वाले; विष्णु-कृत्यानू-- भगवान्‌ विष्णु के प्रति कर्तव्य

हे मेरे प्यार सेवको! तुम लोग केवल उन्हीं पापी पुरुषों को मेरे पास लाना जिनकी जीभकृष्ण के नाम तथा गुणों का कीर्तन नहीं करती, जिनके हृदय कृष्ण के चरणकमलों काएक बार भी स्मरण नहीं करते तथा जिनके सिर एक बार भी कृष्ण के समक्ष नहीं झुकते।

मेरे पास उन लोगों को भेजना जो विष्णु के प्रति अपने उन कर्तव्यों को पूरा नहीं करते जोमानव जीवन के एकमात्र कर्तव्य हैं।

ऐसे सभी मूर्खो तथा धूर्तों को मेरे पास लाना।

तद्क्षम्यतां स भगवान्पुरुष: पुराणोनारायण: स्वपुरुषैर्यदसत्कृतं नः ।

स्वानामहो न विदुषां रचिताझलीनांक्षान्तिर्गरीयसि नमः पुरुषाय भूम्ने ॥

३०॥

तत्‌--वह; क्षम्यताम्‌-- क्षमा करने योग्य; सः--वह; भगवान्‌--परम पुरुषोत्तम भगवान्‌; पुरुष: --परम पुरुषोत्तम;पुराण:--सबसे प्राचीन; नारायण:--नारायण; स्व-पुरुषै: -- अपने सेवकों द्वारा; यत्‌--जो; असत्‌--ढिठाई; कृतम्‌--सम्पन्न; न:ः--हमारा; स्वानामू--हमारे ही लोगों का; अहो--हाय; न विदुषाम्‌--न जानते हुए; रचित-अज्जलीनाम्‌--आपसेक्षमा माँगने के लिए हाथ जोड़े हुए; क्षान्तिः--क्षमाशीलता; गरीयसि--महिमामयी है; नम:--नमस्कार; पुरुषाय--पुरुषको; भूम्ने--परम तथा सर्वव्यापक[

तब यमराज स्वयं को तथा अपने सेवकों को अपराधी मानते हुए, भगवान्‌ सेक्षमायाचना करते हुए इस प्रकार बोले हे प्रभु! मेरे सेवकों ने निश्चित रूप से अजामिल जैसेवैष्णव को बन्दी बनाकर महान्‌ अपराध किया है।

हे नारायण, हे परम एवं पुरातन पुरुषोत्तम! आप हमें क्षमा कर दें।

अपने अज्ञान के कारण हम अजामिल को आपके सेवकके रूप में नहीं पहचान सके और इस तरह हमने निश्चित रूप से महान्‌ अपराध किया है।

अतएव हम हाथ जोड़ कर आपसे क्षमा माँगते हैं।

हे प्रभु! आप अत्यन्त दयालु हैं औरसदगुणों से सदैव पूर्ण रहते हैं।

कृपया हमें क्षमा कर दें।

हम आपको सादर नमस्कार करतेहैं।

तस्माल्सड्डीर्तनं विष्णोर्जगन्मड्रलमंहसाम्‌ ।

महतामपि कौरव्य विद्धबैकान्तिकनिष्कृतम्‌ ॥

३१॥

तस्मात्‌--इसलिए; सड्लीर्तनम्‌--पवित्र नाम का सामूहिक कीर्तन; विष्णो: --भगवान्‌ विष्णु के; जगत्‌-मड्रलम्‌ू--इसभौतिक जगत के भीतर सर्वाधिक शुभ कार्य; अंहसाम्‌--पापकर्मों के लिए; महताम्‌ अपि--महान्‌ होते हुए भी; कौरव्य--हे कुरुवंश के वंशज; विद्धि--समझो; ऐकान्तिक--चरम; निष्कृतम्‌-प्रायश्ित्त |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन्‌! भगवन्नाम का कीर्तन बड़े से बड़े पापों के फलोंको भी उन्मूलित करने में सक्षम है।

इसलिए सड्भीर्तन आन्दोलन का कीर्तन सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें सबसे शुभ कार्य है।

कृपया इसे समझने का प्रयास करें जिससे अन्य लोग इसेगम्भीरतापूर्वक ग्रहण कर सकें ।

श्रण्वतां गृणतां वीर्याण्युद्यामानि हरेमुहु: ।

यथा सुजातया भक्त्या शुद्धब्रेन्नात्मा ब्रतादिभि: ॥

३२॥

श्रण्वताम्‌--सुनने वालों; गृणताम्‌--तथा कीर्तन करने वालों के; वीर्याणि-- अद्भुत कार्य; उद्यमानि--पाप का निवारणकरने में सक्षम; हरे:--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ के; मुहुः--सदैव; यथा--जिस प्रकार; सु-जातया--आसानी से समक्षलाया गया; भक्त्या-भक्ति द्वारा; शुद्धबेत्‌ू-शुद्ध किया जा सकता है; न--नहीं; आत्मा--हृदय तथा आत्मा; ब्रत-आदिभि:--कर्मकाण्ड करने से

जो व्यक्ति भगवन्नाम का निरन्तर श्रवण तथा कीर्तन करता है और भगवान्‌ के कार्योंका श्रवण तथा कीर्तन करता है, वह बहुत ही आसानी से शुद्ध भक्ति पद को प्राप्त करसकता है, जो उसके हृदय के मैल को शुद्ध करने वाला है।

केवल ब्रत रखने तथा वैदिककर्मकाण्ड करने से ऐसी शुद्धि प्राप्त नहीं की जा सकती।

कृष्णाड्प्रिपद्ममधुलिण्न पुनर्विसूष्ट -मायागुणेषु रमते वृजिनावहेषु ।

अन्यस्तु कामहत आत्मरज: प्रमार्ट -मीहेत कर्म यत एवं रज: पुनः स्यात्‌ ॥

३३॥

कृष्ण-अद्ध्रि-पद्य--कृष्ण के चरणकमलों का; मधु--शहद; लिटू--चाटने वाला; न--नहीं; पुनः--फिर; विसृष्ट--पहले से विरक्त; माया-गुणेषु-- प्रकृति के भौतिक गुणों में; रमते--आनन्द लेना चाहता है; वृजिन-अवहेषु--दुखदायी;अन्य: --दूसरा; तु--फिर भी; काम-हतः--काम द्वारा विमोहित; आत्म-रज:--हृदय की पापपूर्ण छूत; प्रमा्टमू--स्वच्छकरने के लिए; ईहेत--सम्पन्न करता है; कर्म--कार्य; यतः--जिसके बाद; एव--निस्सन्देह; रज:--पापपूर्ण कर्म;पुन:--फिर; स्यथात्‌--प्रकट होते हैं।

जो भक्तगण भगवान्‌ कृष्ण के चरणकमलों के मधु को जो भक्तगण सदैव चाटते रहतेहैं, वे उन भौतिक कर्मों की तनिक भी चिन्ता नहीं करते जो प्रकृति के तीन गुणों के अधीनसम्पन्न किये जाते हैं और जो केवल दुःखदायी होते हैं।

दरअसल, भौतिक कर्मों में वापसआने के लिए भक्तगण कभी भी कृष्ण के चरणकमलों को नहीं छोड़ते।

किन्तु अन्य लोग,जो भगवान्‌ के चरणकमलों की सेवा की उपेक्षा करने तथा कामेच्छाओं से विमोहित होने से वैदिक कर्मकाण्डों में लिप्त रहते हैं, कभी-कभी प्रायश्चित्त के कर्म करते हैं।

फिर भीअपूर्णरूप से शुद्ध होने से वे पुन:-पुनः पापकर्मो में लौट आते हैं।

इत्थं स्वभर्तृगदितं भगवन्महित्वंसंस्मृत्य विस्मितधियो यमकिड्डूरास्ते ।

नैवाच्युता श्रयजनं प्रतिशड्भमानाद्रष्ठे च बिभ्यति ततः प्रभूति सम राजन्‌ ॥

३४॥

इत्थम्‌--ऐसी शक्ति का; स्व-भर्तू-गदितम्‌--अपने स्वामी ( यमराज ) द्वारा बतलाया गया; भगवत्‌-महित्वम्‌--पूर्णपुरुषोत्तम भगवान्‌ तथा उनके नाम, यश, रूप तथा गुणों की अद्वितीय महिमा; संस्मृत्य--स्मरण करके; विस्मित-धिय: --जिनके मन विस्मित; यम-किड्जरा:--यमराज के सारे सेवक; ते--वे; न--नहीं; एव--निस्सन्देह; अच्युत-आश्रय-जनम्‌--अच्युत अर्थात्‌ कृष्ण के चरणकमलों पर शरण प्राप्त व्यक्ति; प्रतिशड्रमाना:--सदैव भयभीत; द्रष्टम्‌--देखने केलिए; च--तथा; बिभ्यति-- भयभीत हैं; ततः प्रभूति--तब से प्रारम्भ करके; स्म--निस्सन्देह; राजन्‌ू--हे राजन्‌ |

अपने स्वामी के मुख से भगवान्‌ की अद्वितीय महिमा तथा उनके नाम, यश तथा गुणोंके विषय में सुनकर यमदूत आश्चर्यचकित रह गये।

तब से, जैसे ही वे किसी भक्त को देखतेहैं, तो वे उससे डरते हैं और उसकी ओर फिर से देखने का साहस नहीं करते।

इतिहासमिमं गुह्ं भगवान्कुम्भसम्भव: ।

कथयामास मलय आसीनो हरिमर्चयन्‌ ॥

३५॥

इतिहासम्‌--इतिहास; इमम्‌--यह; गुह्मम्‌--अत्यन्त गोपनीय; भगवान्‌--अत्यन्त शक्तिशाली; कुम्भ-सम्भव:--अगस्त्यमुनि, कुम्भ के पुत्र; कथयाम्‌ आस--बतलाया; मलये--मलय पर्वत में; आसीन:--निवास करते हुए; हरिम्‌ अर्चयन्‌--भगवान्‌ की पूजा करते हुए।

जब कुम्भ के पुत्र अगस्त्य मुनि मलय पर्वत पर निवास कर रहे थे और पूर्ण पुरुषोत्तमभगवान्‌ की पूजा कर रहे थे तो मैं उनके पास गया और उन्होंने मुझे यह गुह्य इतिहासबतलाया।

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