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अध्याय अठारह: दिति ने राजा इंद्र को मारने की प्रतिज्ञा की
6.18श्रीशुक उबाचपृश्निस्तु पत्नी सवितु: सावित्रीं व्याहतिं त्रयीम् ।
अग्निहोत्रं पशुं सोम॑ चातुर्मास्यं महामखान् ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; पृश्नि:--पृश्टिन; तु--तब; पत्नी -- भार्या; सवितु:--सविता की;सावित्रीम्--सावित्री; व्याह॒तिम्--व्याहति; त्रयीम्--त्रयी; अग्निहोत्रमू--अग्निहोत्र; पशुम्--पशु; सोमम्ू--सोम;चातुर्मास्थम्-चातुर्मास्थ; महा-मखान्--पाँचों महायज्ञ |
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा--पृश्नि, जो अदिति के बारह पुत्रों में से पाँचवें पुत्रसविता की पत्नी थी, तीन पुत्रियाँ सावित्री, व्याह॒ति तथा त्रयी और अग्निहोत्र, पशु, सोम,चार्तुमास्य तथा पंच महायज्ञ नामक पुत्र उत्पन्न हुए।
सिद्धिभंगस्य भार्याड्र महिमान॑ विभुं प्रभुम् ।
आशिषं च वरारोहां कन्यां प्रासूत सुब्रताम् ॥
२॥
सिद्धिः:--सिद्धि; भगस्य--भग की; भार्या--पली; अड्ग--हे राजा; महिमानम्--महिमा; विभुम्--विभु; प्रभुम्-प्रभु;आशिषम्--आशीष; च--तथा; वरारोहाम्--अत्यन्त सुन्दरी; कन्याम्--पुत्री को; प्रासूत--जन्म दिया; सु-ब्रताम्--सदाचारिणी।
है राजन्! अदिति के छठे पुत्र भग की पत्नी का नाम सिद्धि था जिसके महिमा, विभुतथा प्रभु नामक तीन पुत्र तथा आशीष नामक एक अत्यन्त सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई।
धातु: कुहू: सिनीवाली राका चानुमतिस्तथा ।
सायं दर्शमथ प्रातः पूर्णमासमनुक्रमात् ॥
३॥
अग्नीन्पुरीष्यानाध्त्त क्रियायां समनन्तरः ।
चर्षणी वरुणस्यासीद्यस्यां जातो भृगु: पुनः ॥
४॥
धातु:ः--धाता के; कुहूः--कुहू; सिनीवाली--सिनीवाली; राका--राका; च--तथा; अनुमति:-- अनुमति; तथा-- भी;सायम्--सायम; दर्शम्-दर्श; अथ-- भी; प्रातः --प्रात:; पूर्णमासम्--पूर्णमास; अनुक्रमात्-- क्रमश: ; अग्नीन्--अग्निदेव; पुरीष्यान्ू--पुरीष्य नामक; आधत्त--जन्म दिया; क्रियायाम्ू--क्रिया से; समनन्तर:--अगला पुत्र विधाता;चर्षणी--चर्षणी; वरुणस्थय--वरुण का; आसीत् --था; यस्याम्--जिसमें; जात:--जन्म लिया; भृगुः-- भूगु ने; पुन:--फिर
अदिति के सातवें पुत्र धाता के चार पत्नियाँ थीं जिनके नाम थे कुह्दू, सिनीवाली, राकातथा अनुमति।
इन चारों से क्रमशः सायम्, दर्श, प्रातः तथा पूर्णमास नामक चार पुत्र हुए।
अदिति के आठवें पुत्र विधाता की पत्नी का नाम क्रिया था जिससे पुरीष्य नामक पाँच पुत्रउत्पन्न हुए।
अदिति के नवें पुत्र वरूण की पत्नी चर्षणी थी जिसके गर्भ से ब्रह्मा के पुत्र भूगुने फिर जन्म लिया।
वाल्मीकिश्न महायोगी वल्मीकादभवत्किल ।
अगस्त्यश्व वसिष्ठश्च मित्रावरूणयोरृषी ॥
५॥
वाल्मीकि: --वाल्मीकि; च--तथा; महा-योगी--परम योगी; वलल््मीकात्--बाँबी से; अभवत्--जन्म लिया; किल--निस्सन्देह; अगस्त्य:--अगस्त्य; च--तथा; वसिष्ठ:--वशिष्ठ; च-- भी; मित्रा-वरुणयो:--मित्र तथा वरुण दोनों के;ऋषी--दो ऋषि
वरुण के वीर्य से परम योगी वाल्मीकि ने बाँबी से जन्म लिया।
भूगु तथा वाल्मीकिवरुण के विशिष्ट पुत्र थे, जबकि अगस्त्य तथा वसिष्ठ ऋषि वरुण तथा मित्र ( अदिति केदसवें पुत्र ) के संयुक्त पुत्र थे।
रेत: सिषिचतु: कुम्भे उर्वश्या: सन्निधौ द्रुतम् ।
रेवत्यां मित्र उत्सर्गमरिष्टे पिप्पलं व्यधात् ॥
६॥
रेत:--वीर्य; सिषिचतु:--स्खलित; कुम्भे-ड़े में; उर्वश्या:--उर्वशी का; सन्निधौ--उपस्थिति में; द्रतम्--उड़कर;रेबत्यामू-रेवती में; मित्र:--मित्र; उत्सर्गम्--उत्सर्गम्; अरिष्टम्--अरिष्ट; पिप्पलम्ू--पिप्पल; व्यधात्--जन्म लिया
स्वर्ग-सुन्दरी उर्वशी को देखकर मित्र तथा वरुण दोनों का वीर्य स्खलित हो गया जिसेउन्होंने एक मिट्टी के पात्र में रख दिया।
बाद में इसी पात्र से अगस्त्य तथा वसिष्ठ नामक दोपुत्र उत्पन्न हुए।
ये मित्र तथा वरुण के संयुक्त ( उभयनिष्ट ) पुत्र हैं।
मित्र को अपनी पत्नीरेबती से तीन पुत्र उत्पन्न हुए जिनके नाम उत्सर्ग, अरिष्ट तथा पिप्पल थे।
पौलोम्यामिन्द्र आध्त्त त्रीन्पुत्रानिति नः श्रुतम् ।
जयन्तमृषभं तात तृतीय मीदुषं प्रभु; ॥
७॥
पौलोम्याम्--पौलोमी ( शच्ची देवी ) ने; इन्द्र:--इन््ध ने; आधत्त--उत्पन्न किया; त्रीन्ू--तीन; पुत्रान्--पुत्र; इति--इसप्रकार; नः--हमोरे द्वारा; श्रुतम्--सुना हुआ; जयन्तमू--जयन्त; ऋषभम्--ऋषभ; तात--हे राजन; तृतीयम्--तीसरा;मीढुषम्--मीदुष; प्रभुः--राजा |
हे राजा परीक्षित! अदिति के ग्यारहवें पुत्र एवं स्वर्गलोक के राजा इन्द्र की पत्नी पौलोमीके गर्भ से जयन्त, ऋषभ तथा मीढुष नामक तीन पुत्र उत्पन्न हुए।
ऐसा हमने सुना है।
उरुक्रमस्थ देवस्य मायावामनरूपिण: ।
कीतीं पत्यां बृहच्छूलोकस्तस्यासन्सौभगादय: ॥
८॥
उरुक़मस्य--उरुक़म की; देवस्य-- भगवान् की; माया--अन्तरंगा शक्ति से; वामन-रूपिण: --वामन के रूप में; की्तों --कीर्ति से; पत्याम्-- अपनी पली; बृहच्छूलोक:--बृहत्टहलोक; तस्य--उसके; आसन्ू-- थे; सौभग-आदय:--सौभग आदिपुत्र |
अनेक शक्तियों वाले पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अपनी शक्ति से बौने ( वामन ) के रूप मेंप्रकट हुए जो अदिति के बारहवें पुत्र उरुक्रम कहलाते हैं।
उनकी पत्नी कीर्ति के गर्भ सेबृहत्तलोक नामक एक पुत्र ने जन्म लिया जिसके सौभग इत्यादि कई पुत्र हुए।
तत्कर्मगुणवीर्याणि काश्यपस्य महात्मन: ।
पश्चाद्वक्ष्यामहेउदित्यां यथेवावततार ह ॥
९॥
तत्--उसका; कर्म--कर्म; गुण--गुण; वीर्याणि--तथा शक्ति; काश्यपस्थ--कश्यप के पुत्र के; महा-आत्मन:--परमआत्मा; पश्चात्--बाद में; वक्ष्यामहे -- मैं वर्णन करूँगा; अदित्याम्--अदिति से; यथा--कैसे; एव--निश्चय ही;अवततार--अवतार लिया; ह--निस्सन्देह |
बाद में ( आठवें स्कंध में ) मैं यह वर्णन करूँगा कि किस प्रकार उरुक्रम अर्थात्भगवान् वामनदेव परम साधु कश्यप के पुत्र के रूप में प्रकट हुए और किस प्रकार तीनोंलोकों को अपने पगों से नाप लिया।
मैं उनके अपूर्व कर्मों, गुणों, शक्ति तथा अदिति के गर्भसे जन्म ग्रहण करने के सम्बन्ध में वर्णन करूँगा।
अथ कश्यपदायादान्दैतेयान्कीर्तयामि ते ।
यत्र भागवत: श्रीमान्प्रहादो बलिरेवच ॥
१०॥
अथ--अब; कश्यप-दायादान्--कश्यप के पुत्रों का; दैतेयान्--दिति से उत्पन्न; कीर्तवामि--वर्णन करूँगा; ते--तुमसे;यत्र--जहाँ; भागवत:--परम भक्त; श्री-मान्ू--यशस्वी; प्रह्मदः--प्रह्मद; बलि:--बलि; एव--निश्चय ही; च-- भी ।
अब मैं दिति के उन पुत्रों का वर्णन करूँगा जो कश्यप के द्वारा उत्पन्न किये गये किन्तुजो असुर बने।
इस असुर वंश में परम भक्त प्रह्मद महाराज तथा बलि महाराज प्रकट हुए।
असुरों को दैत्य कहा जाता है क्योंकि वे दिति के गर्भ से उत्पन्न हुए थे।
दितेद्वाविव दायादौ दैत्यदानववन्दितौ ।
हिरण्यकशिपुर्नाम हिरण्याक्षश्व॒ कीर्तितोी ॥
११॥
दितेः--दिति के; द्वौ--दो; एव--निश्चय ही; दायादौ--पुत्र; दैत्य-दानव--दैत्यों तथा दानवों के द्वारा; वन्दितौ--पूजित;हिरण्यकशिपु:--हिरण्यकशिपु; नाम--नामक; हिरण्याक्ष: --हिरण्याक्ष; च-- भी; कीर्तितौ--विख्यात |
सर्वप्रथम दिति के गर्भ से हिरण्यकशिपु तथा हिरण्याक्ष नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए।
येदोनों अत्यन्त शक्तिशाली थे और दैत्यों तथा दानवों द्वारा पूजित थे।
हिरण्यकशिपोर्भार्या कयाधुर्नाम दानवी ।
जम्भस्य तनया सा तु सुषुवे चतुर: सुतान् ॥
१२॥
संहादं प्रागनुह्ादं हादं प्रह्मदमेव च ।
तत्स्वसा सिंहिका नाम राहुं विप्रचितोग्रहीत् ॥
१३॥
हिरण्यकशिपो: --हिरण्यकशिपु की; भार्या--पत्नी; कयाधु: --कयाधु; नाम--नामक; दानवी--दनु की संतान;जम्भस्य--जम्भ की; तनया--पुत्री; सा--उसने; तु--निस्सन्देह; सुषुवे--जन्म दिया; चतुरः--चार; सुतान्--पुत्रों को;संहादम्--संह्ाद; प्राकु-पहले; अनुह्ादम्--अनुह्ाद; हादम्--हाद; प्रह्नदम्--प्रह्द; एब-- भी; च--तथा; तत्-स्वसा--उसकी बहन; सिंहिका--सिंहिका; नाम--नाम की; राहुम्--राहु को; विप्रचित:--विप्रचित से; अग्रहीत्--प्राप्तकिया।
हिरण्यकशिपु की पत्नी कयाधु नाम से विख्यात थी।
वह जम्भ की पुत्री एवं दनु कीवंशज थी।
उसके एक एक करके चार पुत्र हुए जिनके नाम संह्वाद, अनुहाद, ह्ाद तथाप्रह्मद थे।
इन चारों भाइयों की बहन का नाम सिंहिका था।
उसने विप्रचित नामक असुर सेब्याह करके राहु नामक असुर को जन्म दिया।
शिरोहरद्यस्य हरिश्चक्रेण पिबतोमृतम् ।
संहादस्य कृतिर्भार्यासूत पञ्नजनं तत: ॥
१४॥
शिरः--शीश; अहरत्--काट लिया; यस्य--जिसका; हरि: -- हरि ने; चक्रेण--चक्र से; पिबत:--पीते हुए; अमृतम्--अमृत; संहादस्य--संहाद की; कृति:--कृति; भार्या--पत्नी ने; असूत--जन्म दिया; पञ्ञजनम्--पंचजन; तत: --उससेजब राहु वेश बदलकर देवताओं के बीच में अमृत पी रहा था, तो भगवान् हरि ने उसकासिर काट लिया।
संह्वाद की पत्नी का नाम कृति था।
इन दोनों के संयोग से कृति के पंचजननाम का एक पुत्र उत्पन्न हुआ।
हादस्य धमनिर्भा्यासूत वातापिमिल्वलम् ।
योगस्त्याय त्वतिथये पेचे वातापिमिल्वल: ॥
१५॥
हादस्य--हाद की; धमनि:--धमनि; भार्या--पत्नी; असूत--जन्म दिया; वातापिमू--वातापि; इल्वलम्ू--इल्वल को;यः--जो; अगस्त्याय--अगस्त्य के लिए; तु--लेकिन; अतिथये--अपने अतिथि; पेचे--पकाया; वातापिम्--वातापिको; इल्वल:--इल्वल ने।
ह्ाद की पत्नी का नाम धमनि था।
उसने वातापि तथा इल्वल नामक दो पुत्रों को जन्मदिया।
जब अगस्त्य मुनि इल्बल के अतिथि बने तो उसने वातापि को, जो मेढे के रूप में था,पकाकर भोजन करवाया।
अनुह्वादस्य सूर्यायां बाष्कलो महिषस्तथा ।
विरोचनस्तु प्राह्मादिद्देव्यां तस्याभवद्ठलि: ॥
१६॥
अनुहादस्य--अनुहाद की; सूर्यायाम्--सूर्या से; बाष्कल: --बाष्कल; महिष:--महिष; तथा-- और; विरोचन: --विरोचन;तु--निस्सन्देह; प्राह्मदि: -- प्रह्मद का पुत्र; देव्यामू--उसकी पत्नी से; तस्थ--उसके; अभवत्--हुआ; बलि:--बलि |
अनुह्ाद की पत्नी सूर्या थी।
उसने बाष्कल तथा महिष नामक दो पुत्रों को जन्म दिया।
प्रहाद के विरोचन नामक एक पुत्र हुआ जिसकी पत्नी से बलि महाराज ने जन्म लिया।
बाण-्येष्ठं पुत्रशतमशनायां ततोभवत् ।
तस्यानुभावं सुश्लोक्यं पश्चादेवाभिधास्यते ॥
१७॥
बाण--्येष्ठम्--सबसे बड़ा बाण; पुत्र-शतम्--एक सौ पुत्र; अशनायाम्--अशना से; तत:--उससे; अभवत्--हुए;तस्य--उसके ; अनुभावम्--चरित्र, महिमा; सु-श्लोक्यम्--प्रशंसनीय; पश्चात्--बाद में ; एब--निश्चय ही;अभिधास्यते--वर्णन किया जायेगा |
इसके पश्चात् अशना की कोख से महाराज बलि को एक सौ पुत्र प्राप्त हुए जिनमें राजाबाण ज्येष्ठ था।
बलि महाराज का चरित्र ( महिमा ) अत्यन्त प्रशंसनीय है और उनका वर्णनआगे ( आठवें स्कंध में ) होगा।
बाण आशश्य गिरिशं लेभे तद्गणमुख्यताम् ।
यत्पाश्वें भगवानास्ते ह्ाद्यापि पुरपालक: ॥
१८॥
बाण:--बाण ने; आराध्य--पूजा करके; गिरिशम्--शिवजी की; लेभे--प्राप्त किया; तत्ू--उसका ( भगवान् शिव );गण-मुख्यताम्--प्रमुख पार्षदों में से एक का पद; यत्-पार्थ्वे--जिसके निकट; भगवान्-- भगवान् शिव; आस्ते--रहताहै; हि--जिसके कारण; अद्यू--अब; अपि--भी; पुर-पालकः --राजधानी का रक्षक ।
चूँकि राजा बाण शिवजी का उपासक था, अतः वह उनके सर्वश्रेष्ठ पार्षदों ( गणों ) मेंसे एक बन गया।
आज भी शिवजी राजा बाण की राजधानी की रक्षा करते हैं और सदैवउसके निकट खड़े रहते हैं।
मरुतश्न दितेः पुत्राश्चत्वारिंशन्नवाधिका: ।
त आसचन्नप्रजा: सर्वे नीता इन्द्रेण सात्मतामू ॥
१९॥
मरुत:--मरुत गण; च--तथा; दिते:--दिति के; पुत्रा:--पुत्र; चत्वारिंशत्--चालीस; नव-अधिका: --तथा नौ; ते--वे;आसनू--थे; अप्रजा: --निःसन्तान; सर्वे--सभी; नीता: -- लाये गये; इन्द्रेण--इन्द्र के द्वारा; स-आत्मताम्--देवताओं केपद को
दिति के गर्भ से उनचास मरुतदेव भी उत्पन्न हुए।
इनमें से किसी के सन्तान नहीं हुई।
यद्यपि दिति ने उन्हें जन्मा था किन्तु इन्द्र ने उन्हें देव-पद प्रदान किया।
श्रीराजोबाचकथं त आसुरं भावमपोहात्पत्तिकं गुरो ।
इन्द्रेण प्रापिता: सात्म्यं कि तत्साधु कृतं हि तै; ॥
२०॥
श्री-राजा उबाच--राजा परीक्षित ने कहा; कथम्--क्योंकर; ते--वे; आसुरम्-- आसुरी; भावम्--वृत्ति; अपोह्म --त्यागकर; औत्पत्तिकम्--जन्म के कारण; गुरो--हे प्रभो; इन्द्रेण--इन्द्र के द्वारा; प्रापिता:--बदले गए; स-आत्म्यम्ू--देवताओं को; किमू--क्या; तत्--अत:; साधु--पुण्यकर्म; कृतम्--सम्पन्न किये गये; हि--निस्सन्देह; तैः--उनके द्वारा
राजा परीक्षित ने पूछा--हे प्रभो! जन्म के कारण वे उनचासों मरुत आसुरी वृत्ति से परिपूर्ण रहे होंगे तो फिर स्वर्ग के राजा इन्द्र ने उन्हें देवता क्यों बनाया?
क्या उन्होंने कोईपुण्यकर्म या अनुष्ठान किए थे?
इमे श्रद्धते ब्रह्मन्नघयो हि मया सह ।
इमे अ्रहधते ब्रह्मन्नपयो हि मया सह ।
परिज्ञानाय भगवंस्तन्नो व्याख्यातुमहसि ॥
२१॥
इमे--ये; श्रहदध्यते--उत्सुक हैं; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; ऋषय:--साधुजन; हि--निस्सन्देह; मया सह--मेंरे साथ; परिज्ञानाय--जानने के लिए; भगवनू--हे महात्मन्; तत्--अतः ; नः--हमको; व्याख्यातुम् अहसि--कृपा करके बताएँ।
हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! मैं तथा यहाँ पर उपस्थित सभी साधुजन इसे जानने के लिए परम उत्सुकहैं।
अतः हे महात्मन्! हमसे इसका कारण बताएँ।
श्रीसूत उबाचतद्ठिष्णुरातस्थ स बादरायणि-वंचो निशम्याहतमल्पमर्थवत् ।
सभाजयन्सन्निभृतेन चेतसाजगाद सत्रायण सर्वदर्शन: ॥
२२॥
श्री-सूतः उवाच-- श्री सूत गोस्वामी ने कहा; तत्--वे; विष्णुरातस्य--महाराज परीक्षित का; सः--उस; बादरायणि: --शुकदेव गोस्वामी ने; वच:--शब्द; निशम्य--सुनकर; आहतम्--आदरपूर्ण; अल्पम्--संक्षिप्त; अर्थ-वत्--सप्रयोजन;सभाजयन् सन्-प्रशंसा करते हुए; निभृतेन चेतसा--अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक; जगाद--उत्तर दिया; सत्रायण--हे शौनक;सर्व-दर्शन:--सर्वज्ञातासर्वदर्शी श्री सूत गोस्वामी ने कहा--हे महर्षि शौनक! महाराजा परीक्षित को सविनय एवं संक्षेपमें आवश्यक विषयों पर बोलते हुए सुनकर सर्वज्ञाता शुकदेव गोस्वामी ने उनके प्रयत्नों कीप्रशंसा की और इस प्रकार उत्तर दिया।
श्रीशुक उबाचहतपुत्रा दितिः शक्रपार्ण्णिग्राहेण विष्णुना ।
मन्युना शोकदीप्तेन ज्वलन्ती पर्यचिन्तयत् ॥
२३॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; हत-पुत्रा--जिसके पुत्रों का वध किया जा चुका था; दिति:--दिति ने;शक्र-पार्णिण-ग्राहेण--जो इन्द्र की सहायता कर रहा था; विष्णुना-- भगवान् विष्णु के द्वारा; मन्युना--क्रो धपूर्वक; शोक-दीप्तेन--शोक से उद्दीप्त; ज्वलन्ती--जलते हुए; पर्यचिन्तवत्--सोचा |
श्री शुकदेव गोस्वामी बोले--इन्द्र की सहायता करने मात्र के लिए भगवान् विष्णु नेहिरण्यकशिपु तथा हिरण्याक्ष नामक दोनों भाइयों का वध कर दिया।
उनके मारे जाने सेउनकी माता दिति शोक तथा क्रोध से परिपूर्ण होकर इस प्रकार सोचने लगी।
कदा नु भ्रातृहन्तारमिन्द्रियाराममुल्बणम् ।
अक्लन्नहदयं पापं घातयित्वा शये सुखम् ॥
२४॥
कदा--कब; नु--निस्सन्देह; भ्रातृ-हन्तारम्--बन्धुओं को मारने वाला; इन्द्रिय-आरामम्--इन्द्रियतृप्ति का अत्यधिकइच्छुक; उल्बणम्--क्रूर; अक्लिन्न-हदयम्--कठोर हृदय; पापम्--पापी; घातयित्वा--मरवाकर; शये--दम लूँगी;सुखम्--सुखपूर्वक |
अत्यन्त इन्द्रियलोलुप भगवान् इन्द्र ने हिरण्यकशिपु तथा हिरण्याक्ष इन दोनों भाइयों कावध भगवान् विष्णु के माध्यम से किया है।
अतः वह क्रूर, कठोर हृदय एवं पापी है।
मैं कब उसे मारकर शान्तचित्त होकर दम ले सकूँगी ?
कृमिविड्भस्मसंज्ञासीद्यस्येशाभिहितस्य च ।
भूतश्रुक्तत्कृते स्वार्थ कि वेद निरयो यत: ॥
२५॥
कृमि--कीड़े; विट्ू--विष्ठा, मल; भस्म--राख; संज्ञा--नाम; आसीत्--होता है; यस्य--जिस ( शरीर ) का; ईश-अभिहितस्य--राजा कहलाने पर भी; च--भी; भूत-ध्रुकू--अन्यों को पीड़ा पहुँचाने वाला; तत्-कृते--उसके लिए; स्व-अर्थम्-स्वार्थ के लिए; किम् वेद--क्या वह जानता है; निरय:--नरक में यातना; यत:--जिससे।
समस्त राजाओं तथा महान् नायकों के शरीर मृत्यु के पश्चात् कीड़ों, विष्ठा अथवा राखमें परिणत हो जाएंगे।
यदि कोई ऐसे शरीर की रक्षा के लिए ईर्ष्यावश अन्यों का बध करताहै, तो क्या वह जीवन के वास्तविक हित को जानता है?
निश्चय ही वह नहीं जानता क्योंकिअन्य जीवों के प्रति ईर्ष्या करने से वह अवश्य ही नरक को जाता है।
आशासानस्य तसयेदं श्रुवमुन्नद्धचेतस: ।
मदशोषक इन्द्रस्य भूयाद्येन सुतो हि मे ॥
२६॥
आशासानस्य--सोचते हुए; तस्थ--उसका; इृदम्--यह ( शरीर ); ध्रुवम्-शाश्वत; उन्नद्ध-चेतस:--जिसका मन वश मेंनहीं है; मद-शोषक:--प्रमत्तता को दूर करने वाला; इन्द्रस्य--इन्द्र की; भूयात्--हो सकता है कि; येन--जिससे; सुतः--पुत्र; हि--निश्चय ही; मे--मेरा
दिति ने विचार किया: कि इन्द्र अपने शरीर को शाश्वत समझ कर अनियंत्रित हो गयाहै।
अतः मैं ऐसा पुत्र चाहूँगी जो इन्द्र की उन्मत्तता को दूर कर दे।
इसके लिए मैं कुछ न कुछउपाय करती हूँ।
इति भावेन सा भर्तुराचचारासकृत्प्रियम् ।
शुश्रूषयानुरागेण प्रश्रयेण दमेन च ॥
२७॥
भक््त्या परमया राजन्मनोज्ञैर्वल्गुभाषितै: ।
मनो जग्राह भावज्ञा सस्मितापाडुवीक्षणै: ॥
२८॥
इति--इस प्रकार; भावेन--विचार से; सा--उसने; भर्तु:--पति का; आचचार--सम्पन्न किया; असकृत्--निरन्तर;प्रियम्ू--प्रिय कार्य; शुश्रूषधा--सेवा से; अनुरागेण --प्रेम से; प्रश्रयेण--विनम्रता से; दमेन-- आत्म-संयम से; च-- भी;भक्त्या-- भक्ति से; परमया--महान्; राजनू--हे राजन्; मनोज्लैः--मनोहर; वल्गु-भाषितै:ः--मीठे वचनों से; मनः--उसकामन; जग्राह-- अपने वश में कर लिया; भाव-ज्ञा--उसकी प्रकृति को जानने वाली; स-स्मित--मुस्कान से पूर्ण; अपाड़-वीक्षणै:--तिरछी चितवन से
इस प्रकार सोचती हुई ( इन्द्र को मारने के लिए एक ऐसे पुत्र की इच्छा से ) दितिनिरन्तर अपने पति कश्यप को अपने मोहक आचरण से प्रसन्न रखने लगी।
हे राजन्! दितिकश्यप की सभी आज्ञाओं का अत्यन्त निष्ठा से पालन करती रही।
वह सेवा, प्रेम, विनयतथा आत्म-संयम एवं अपनी मृदुल वाणी से और अपनी मन्द हँसी और बाँकी चितवन सेकश्यप के मन को आकृष्ट करते हुए उसने उन्हें अपने वश में कर लिया।
एवं स्त्रिया जडीभूतो विद्वानपि मनोज्ञया ।
बाढमित्याह विवशो न तच्चित्रं हि योषिति ॥
२९॥
एवम्--इस प्रकार से; स्त्रिया--स्त्री द्वारा; जडीभूत:--मंत्रमुग्ध; विद्वानू--विद्वान; अपि--भी; मनोज्ञया--अत्यन्त दक्ष;बाढम्--तथास्तु, स्वीकार है; इति--इस प्रकार; आह--कहा; विवश:--उसके वश में; न--नहीं; तत्--वह; चित्रम्--आश्चर्यजनक; हि--निस्सन्देह; योषिति--स्त्रियों के मामले में।
यद्यपि कश्यप मुनि एक विद्वान पुरुष थे, किन्तु वे दिति के बनावटी व्यवहार से मोहितहो गये जिससे वे उसके वश में आ गये।
अतः उन्होंने अपनी पत्नी को विश्वास दिलाया कि वेउसकी इच्छाओं की पूर्ति करेंगे।
पति द्वारा ऐसा वचन तनिक भी आश्चर्यजनक नहीं है।
विलोक्यैकान्तभूतानि भूतान्यादौ प्रजापति: ।
स्त्रियं चक्रे स्वदेहार्थ यया पुंसां मतिईता ॥
३०॥
विलोक्य--देखकर; एकान्त-भूतानि--विरक्त; भूतानि--जीवात्माएँ; आदौ--प्रारम्भ में; प्रजापति: -- भगवान् ब्रह्मा;स्त्रियम्--स्त्री; चक्रे --उत्पन्न किया; स्व-देह--अपने शरीर से; अर्धम्--आधा; यया--जिससे; पुंसाम्--मनुष्यों का;मति:--मन; हता--हर लिया गया।
सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्माण्ड की जीवात्माओं के पिता ब्रह्माजी ने देखा कि समस्तजीवात्मा विरक्त हो रहे हैं।
अतः उन्होंने जनसंख्या बढ़ाने के उद्देश्य से पुरुष के आधे अंग सेस्त्री की रचना की क्योंकि स्त्री का आचरण मनुष्य के मन को हर लेता है।
एवं शुश्रूषितस्तात भगवान्कश्यपः स्त्रिया ।
प्रहस्य परमप्रीतो दितिमाहाभिनन्द्य च ॥
३१॥
एवम्--इस प्रकार; शुश्रूषित:--सेवा किये जाने पर; तात--हे प्रिय; भगवान्--परम शक्तिमान; कश्यप: --कश्यप मुनिने; स्त्रिया--स्त्री के द्वारा; प्रहस्थ--हँसकर; परम-प्रीत:--अत्यन्त प्रसन्न होकर; दितिमू--दिति से; आह--कहा;अभिनन्द्य--स्वीकृति देते हुए; च-- भी
है प्रिय! अपनी पत्नी दिति के विनम्र आचरण से अत्यधिक प्रसन्न होकर परमशक्तिशाली साधु पुरुष कश्यप हँस पड़े और इस प्रकार बोले।
श्रीकश्यप उबाचवर वरय वामोरु प्रीतस्तेडहमनिन्दिते ।
स्त्रिया भर्तरि सुप्रीते कः काम इह चागम: ॥
३२॥
श्री-कश्यप: उवाच--कश्यप मुनि ने कहा; वरमू--वर, आशीर्वाद; वरय--माँगो; वामोरु--हे सुन्दरी; प्रीत:--प्रसन्न;ते--तुमसे; अहम्--मैं; अनिन्दिते--हे अनिन््द्य स्त्री; स्त्रिया:--स्त्री के लिए; भर्तरि--जब उसका पति; सु-प्रीते--प्रसन्नहो; क:--क्या; काम: --इच्छा; इह-- यहाँ; च--तथा; अगम:--प्राप्त करना कठिन ।
कश्यप मुनि ने कहा--हे अनिन््द्य सुन्दरी! मैं तुम्हारे आचरण से परम प्रसन्न हूँ, अतः तुमचाहे जो भी वर माँग सकती हो।
यदि पति प्रसन्न हो तो चाहे इस लोक की या अन्य लोककी वह कौन सी इच्छा है, जो पूरी न हो सके ?
पतिरेव हि नारीणां दैवतं परम स्मृतम् ।
पतिरेव हि नारीणां दैवतं परम स्मृतम् ।
मानस: सर्वभूतानां वासुदेव: भ्रिय: पति: ॥
३३॥
स एव देवतालिड्लैनामरूपविकल्पितै: ।
इज्यते भगवान्पुम्भिः स्त्रीभिश्चव पतिरूपधृक् ॥
३४॥
'पति:--पति; एव--निस्सन्देह; हि--निश्चय ही; नारीणाम्--स्त्रियों की; दैवतम्--देवता; परमम्--परम, सर्व श्रेष्ठ;स्मृतम्ू--माना जाता है; मानस:--हृदय में स्थित; सर्व-भूतानाम्--समस्त जीवात्माओं के; वासुदेव: --वासुदेव; थ्रिय:--सौभाग्य की देवी का; पति:--पति; सः--वह; एव--निश्चय ही; देवता-लिड्लैः--देवताओं के स्वरूपों से; नाम--नाम;रूप--स्वरूप; विकल्पितैः: --कल्पित; इज्यते--पूजा जाता है; भगवान्-- श्रीभगवान्; पुम्भि: --मनुष्यों के द्वारा;स्त्रीभि:--स्त्रियों के द्वारा; च-- भी; पति-रूप-धृक् --पति के रूप में |
पति ही स्त्रियों के लिए परम देवता होता है।
लक्ष्मीपति भगवान् वासुदेव सबों के हृदयमें स्थित हैं और सकाम भक्तों द्वारा विभिन्न नामों तथा देव-रूपों में पूजे जाते हैं।
इसी प्रकारपति भगवान् के रूप में पत्नी के लिए पूजा की वस्तु है।
तस्मात्पतिब्रता नार्य: श्रेयस्कामा: सुमध्यमे ।
यजन्तेनन्यभावेन पतिमात्मानमी श्वरम् ॥
३५॥
तस्मातू--अतः ; पति-ब्रता:--पति-परायण: ; नार्य:--स्त्रियाँ; श्रेय:-कामा:--कल्याण चाहने वाले; सु-मध्यमे--हेतन्वंगी; यजन्ते--पूजा करते हैं; अनन्य-भावेन--भक्तिपूर्वक; पतिम्ू--पति को; आत्मानम्--परमात्मा; ईश्वरम्ू--श्रीभगवान् के प्रतिनिधि को |
हे सुन्दर शरीर वाली, तन््वंगी प्रिये! कर्तव्यनिष्ठा पली को सदाचारिणी और अपने पतिकी आज्ञाकारिणी होना चाहिए।
उसे अपने पति की पूजा वासुदेव के प्रतिनिधि के रूप मेंभक्तिपूर्वक करनी चाहिए।
सोउहं त्वयार्चितो भद्दे ईहग्भावेन भक्तित: ।
तं ते सम्पादये काममसतीनां सुदुर्लभम् ॥
३६॥
सः--ऐसा व्यक्ति; अहम्--मैं; त्वया--तुम्हारे द्वारा; अर्चित:--पूजित; भद्रे--हे कल्याणी; ईहक्-भावेन--इस प्रकार से;भक्तित:--भक्तिपूर्वक; तम्--उस; ते--तुम्हारी; सम्पादये--पूरी करूँगा; कामम्ू--इच्छा को; असतीनाम्ू--असतियों केलिए; सु-दुर्लभम्ू--अप्राप्य
हे कल्याणी! तुमने मुझे श्रीभगवान् का प्रतिनिधि मानकर अत्यन्त भक्तिपूर्वक मेरी पूजाकी है, अतः मैं तुम्हारी इच्छाओं को पूरा करके तुम्हें पुरस्कृत करूँगा, जो किसी अ-सतीपली के लिए दुर्लभ है।
दितिरुवाचबरदो यदि मे ब्रह्मन्पुत्रमिन्द्रहणं वृणे ।
अमृत्युं मृतपुत्राहं येन मे घातितो सुतो ॥
३७॥
दिति: उबाच--दिति ने कहा; वर-दः--वरदान देने वाला; यदि--यदि; मे--मुझको; ब्रह्मनू--हे परम आत्मन्; पुत्रम्--पुत्र की; इन्द्र-हणम्--इन्द्र का वध करने वाला; वृणे--याचना करती हूँ; अमृत्युमू-- अमर; मृत-पुत्रा--जिसके पुत्र मरचुके हैं; अहम्-मैं; येन--जिसके द्वारा; मे--मेंरे; घातितौ--मारे गये; सुतौ--दो पुत्र
दितिने उत्तर दिया--हे पतिदेव! हे महात्मन्! मैं अपने दो पुत्र खो चुकी हूँ।
यदि आपमुझे वर देना चाहते हैं, तो मैं ऐसा अमर पुत्र चाहूँगी जो इन्द्र का वध कर सके।
मैं इसलिएयह प्रार्थना कर रही हूँ क्योंकि इन्द्र ने विष्णु की सहायता से मेरे दो पुत्रों, हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकशिपु, का वध किया है।
निशम्य तद्बचो विप्रो विमना: पर्यतप्यत ।
अहो अधर्म: सुमहानद्य मे समुपस्थितः ॥
३८॥
निशम्य--सुनकर; तत्-वच:--उसके शब्द; विप्र:--ब्राह्मण; विमना:--खिन्न; पर्यतप्यत--पछताने लगा; अहो--ओह;अधर्म: --अधर्म; सु-महान्--अत्यन्त महान्; अद्यू--आज; मे--मुझ पर; समुपस्थित:--आ गया है।
दिति की प्रार्थना सुनकर कश्यप मुनि अत्यधिक उद्विग्न हो गये।
वे पश्चाताप करने लगे,'हाय, अब मेरे समक्ष इन्द्र को वध करने के अपवित्र कार्य का संकट आया है।
अहो अर्थेन्द्रियारामो योषिन्मय्येह मायया ।
गृहीतचेता: कृपण: पतिष्ये नरके श्रुवम् ॥
३९॥
अहो--ओह; अर्थ-इन्द्रिय-आराम:-- भौतिक सुख में अत्यधिक लिप्त; योषित्-मय्या--स्त्री के रूप में; हह--यहाँ;मायया--माया के द्वारा; गृहीत-चेता:--मेरा मोहित मन; कृपण:--कंजूस, निष्ठुर; पतिष्ये--मैं जा गिरूँगा; नरके--नरकमें; शुवम्--निश्चय ही।
कश्यप मुनि ने सोचा, ओह! मैं अब भौतिक सुख के प्रति अत्यधिक आसक्त हो चुकाहूँ।
अत: इस अवसर का लाभ उठाकर मेरा मन श्रीभगवान् की माया द्वारा स्त्री ( अपनीपत्नी ) के रूप में आकृष्ट हुआ है।
अतः मैं अत्यन्त नीच हूँ और अवश्य ही नरक में जागिरूँगा।
कोठउतिक्रमो<नुवर्तन्त्या: स्वभावमिह योषित: ।
धिड्मां बताबुध॑ स्वार्थे यद॒हं त्वजितेन्द्रिय:ः ॥
४०॥
कः--क्या; अतिक्रम:--पाप ( दोष ); अनुवर्तन्त्या:--अनुसरण करते हुए; स्व-भावम्--उसकी प्रकृति; इह--यहाँ;योषित:--स्त्री का; धिकू-धिक्कार है; मामू--मुझको; बत--हाय, ओह; अबुधम्-- अपरिचित; स्व-अर्थे-- अपने लाभके हेतु; यत्ू--क्योंकि; अहम्--मैं; तु--निस्सन्देह; अजित-इन्द्रियः:--अपनी इन्द्रियों को वश में करने में अशक्त |
मेरी इस पतली ने उस साधन का सहारा लिया है, जो उसकी प्रकृति का अनुगामी है,अतः उसको दोष नहीं दिया जा सकता।
किन्तु मैं तो पुरुष हूं।
सारा दोष तो मेरा है क्योंकिमैं तनिक भी जान न पाया कि मेरी भलाई किसमें है क्योंकि मैं अपनी इन्द्रियों को वश मेंनहीं रख सका।
शरत्पद्ोत्सवं वकत्रं वचश्च श्रवणामृतम् ।
हृदयं क्षुरधाराभे स्त्रीणां को वेद चेष्टितम् ॥
४१॥
शरत्--शरद ऋतु में; पदा--कमल-पुष्प; उत्सवम्--फूलते हुए; वक्त्रमू--मुख; वच:--शब्द; च-- भी; श्रवण--कानके लिए; अमृतम्--सुख देने वाले; हृदयम्--हृदय; क्षुर-धारा--छुरे की धार; आभम्--सहश; स्त्रीणाम्--स्त्रियों के;कः--कौन; वेद--जानता है; चेष्टितम्--चरित्र को |
स्त्री का मुख शरदकालीन खिले हुए कमल-पुष्प के समान आकर्षक तथा सुन्दर होताहै।
उसके शब्द अत्यन्त मधुर और कानों को प्रिय लगने वाले होते हैं, किन्तु यदि उसके हृदयका अध्ययन किया जाये, तो पता चलेगा कि वह छुरे की धार के समान अत्यन्त पैना है।
भला ऐसा कौन है, जो स्त्री के कार्यकलापों को जान सके ?
न हि कश्रित्प्रियः सत्रीणामझसा स्वाशिषात्मनाम् ।
पतिं पुत्र भ्रातरं वा घ्नन्त्यर्थ घातयन्ति च ॥
४२॥
न--नहीं; हि--निश्चय ही; कश्चित्--कोई; प्रिय:--प्रिय; स्त्रीणाम्--स्त्रियों का; अज्ञसा--वास्तव में; स्व-आशिषा--अपने स्वार्थ के लिए; आत्मनाम्--सर्वाधिक प्रिय; पतिम्--पति को; पुत्रम्--पुत्र को; भ्रातरम्-- भाई को; वा--अथवा;घ्नन्ति--मार डालती हैं; अर्थ--अपने स्वार्थ के लिए; घातयन्ति--वध करवाती हैं; च-- भी
अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए स्त्रियाँ मनुष्यों के साथ ऐसा व्यवहार करती हैं मानो वेउनकी सर्वाधिक प्रिय हों, किन्तु वास्तव में उनका कोई प्रिय नहीं होता।
स्त्रियों को अतिसाधु स्वभाव का माना जाता है, किन्तु अपने स्वार्थ के लिए वे अपने पति, पुत्र या भाई कीभी हत्या कर सकती हैं या दूसरों से करा सकती हैं।
प्रतिश्रुतं ददामीति वचस्तन्न मृषा भवेत् ।
वर्ध॑ नाहति चेन्द्रोडपि तत्रेदमुपकल्पते ॥
४३॥
प्रतिश्रुभ्--वचन दिया गया; ददामि--दूँगा; इति--इस प्रकार; वच:ः--कथन; तत्ू--वह; न--नहीं ; मृषा--झूठा;भवेत्--हो सकता है; वधम्--हत्या; न--नहीं; अर्हति--उपयुक्त है; च--तथा; इन्द्र: --इन्द्र; अपि-- भी; तत्र--उस प्रसंगमें; इदम्--यह; उपकल्पते--उपयुक्त है
मैंने उसे एक वर देने का वचन दिया है, जिसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता,लेकिन इन्द्र वध किये जाने योग्य नहीं है।
इस स्थिति में मैने जो उपाय ( हल ) सोचा है, वहउपयुक्त है।
इति सन्ञिन्त्य भगवान्मारीच: कुरुनन्दन ।
उवाच किझ्ञित्कुपित आत्मानं च विगहयन् ॥
४४॥
इति--इस प्रकार; सद्धिन्त्य--सोचकर; भगवान्--शक्तिमान; मारीच:--कश्यप मुनि; कुरु-नन्दन--हे कुरुवंशी;उवाच--बोला; किश्ञित्ू--कुछ-कुछ; कुपित: --क्रुद्ध; आत्मानम्-- अपने आप को; च--भी; विगर्हयन्ू-धिक्कारते हुए
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा--इस प्रकार विचारते हुए कश्यप मुनि कुछ-कुछ क्रुद्ध होगये।
हे कुरुवंशी महाराज परीक्षित! वे अपने आपको धिक्कारते हुए दिति से इस प्रकार बोले।
श्रीकश्यप उबाचपुत्रस्ते भविता भद्रे इन्द्रहादेवबान्धवः ।
संवत्सरं ब्रतमिदं यद्यजझ्लो धारयिष्यसि ॥
४५॥
श्री-कश्यप: उबाच--कश्यप मुनि ने कहा; पुत्र: --पुत्र; ते--तुम्हारा; भविता--होगा; भद्रे--हे कल्याणी; इन्द्र-हा--इन्द्रका वध करने वाला, अथवा इन्द्र का अनुयायी; अदेव-बान्धव:--असुरों का मित्र ( अथवा देव-बान्धव: --देवताओं कामित्र ); संवत्सरम्--एक वर्ष तक; ब्रतम्--त्रत को; इदम्--इस; यदि--यदि; अज्ञः--उचित रीति से; धारयिष्यसि--पालन करोगी।
कश्यप मुनि ने कहा, हे कल्याणी! यदि तुम अपने इस ब्रत के सम्बन्ध में मेरे उपदेशोंका कम से कम एक वर्ष तक पालन करोगी तो तुम्हें निश्चित रूप से पुत्र प्राप्त होगा जो इन्द्रका वध करने में सक्षम होगा।
किन्तु यदि तुम वैष्णव नियमों का पालन करने वाले इस ब्रत से तनिक भी विचलित होगी तो तुम्हें जो पुत्र प्राप्त होगा वह इन्द्र का अनुयायी होगा।
दितिरुवाचधारयिष्ये ब्रतं ब्रह्मन्ब्रूहि कार्याणि यानि मे ।
यानि चेह निषिद्धानि न ब्रतं घ्नन्ति यान्युत ॥
४६॥
दितिः उवाच--दिति ने कहा; धारयिष्ये--अंगीकार करूँगी; व्रतम्--ब्रत; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; ब्रूहि--कृपया कहें;कार्याणि--करणीय; यानि--जो सब; मे--मुझसे; यानि--जो सब; च--तथा; इह--यहाँ; निषिद्धानि-- वर्जित; न--नहीं; ब्रतम्--ब्रत; घ्नन्ति--तोड़ते हैं; यानि--जो सब; उत-- भी
दिति ने उत्तर दिया--हे ब्राह्मण! मैं आपके परामर्श को स्वीकार करती हूँ।
मैं व्रत कापालन करूँगी।
अब मुझे बतावें कि मुझे क्या करना है, क्या नहीं करना है और किस प्रकारयह ब्रत भंग नहीं हो सकेगा ?
कृपा करके यह सब स्पष्ट बताए।
श्रीकश्यप उबाचन हिंस्याद्धृूतजातानि न शपेन्नानृतं बदेत् ।
न छिन्द्यानच्नखरोमाणि न स्पृशेद्यदमड्रलम् ॥
४७॥
श्री-कश्यप: उवाच--कश्यप मुनि ने कहा; न हिंस्थात्ू--हिंसा न करे; भूत-जातानि--जीवात्माओं की; न शपेत्--शाप नदे; न--नहीं; अनृतम्--झूठ; वदेत्--बोले; न छिन्द्यातू--न काटे; नख-रोमाणि--नाखून तथा रोएँ; न स्पृशेत्ू-स्पर्श नकरे; यत्ू--जो; अमड्रलमू-- अशुभ
कश्यप मुनि ने कहा, हे प्रिये! इस व्रत का पालन करते समय न तो उग्र बने, न ही किसीको कष्ट पहुँचाए।
न तो किसी को शाप दे, न असत्य भाषण करे।
न तो अपने नाखून तथाबाल काटे और न हड्डियों तथा खोपड़ी जैसी अशुद्ध वस्तुओं का स्पर्श करे।
नाप्सु स्नायान्न कुप्येत न सम्भाषेत दुर्जनै: ।
न वसीताधौतवास: स्त्रजं च विधृतां क्वचित् ॥
४८ ॥
न--नहीं; अप्सु--जल में; स्नायातू--नहाए; न कुप्येत--न क्रोध करे; न सम्भाषेत--न बोले; दुर्जनै:--बुरे लोगों से; नवसीत--न धारण करे; अधौत-वास: --बिना धुले कपड़े; सत्रजम्ू--फूलों की माला; च--तथा; विधृताम्--पहनी हुई;क्वचित्--कभी |
कश्यप मुनि ने आगे कहा--हे कल्याणी! नहाते समय पानी में कभी न घुसे, कभीक्रोध न करे और न दुष्ट लोगों से कभी बोले या संगति करे।
कभी भी बिना धुले वस्त्र नपहने और पहले धारण की गई माला को कभी न पहने।
नोच्छिष्ठटं चण्डिकान्नं च सामिषं वृषलाहतम् ।
भुड्जीतोदक्यया दृष्ट पिबेन्नाज्ललिना त्वप: ॥
४९॥
न--नहीं; उच्छिष्टम्--जूठा भोजन; चण्डिका-अन्नमू--देवी काली को चढ़ाया गया भोजन; च--तथा; स-आमिषम्--मांस से युक्त; वृषल-आहतम्--शूद्र द्वारा लाया हुआ; भुञ्लीत--खाए; उदक्यया--रजस्वला स्त्री द्वारा; दृष्टमू--देखा गया;पिबेत् न--नहीं पिये; अज्ललिना--दोनों हाथों की अँजुली द्वारा; तु--भी; अप:--जल |
कभी भी जूठा भोजन न खायें, देवी काली (दुर्गा) को चढ़ाया हुआ प्रसाद न खायेंऔर मांस या मछली से मिश्रित कोई भी वस्तु न खायें।
शूद्र द्वारा लाई गई या शूद्र द्वारा स्पर्शकी गईं अथवा रजस्वला स्त्री द्वारा देखी गई किसी भी सामग्री को न खायें।
अंजली से पानीन पियें।
नोच्छिष्टास्पृष्टसलिला सम्ध्यायां मुक्तमूर्थजा ।
अनचितासंयतवाक्नासंबीता बहिश्नरेत् ॥
५०॥
न--नहीं; उच्छिष्टा --जूठा; अस्पृष्ट-सलिला--बिना धोये; सन्ध्यायाम्ू--सायंकाल; मुक्त-मूर्थजा--बाल खोले हुए;अनर्चिता--आभूषण रहित; असंयत-वाक्--वाणी के संयम बिना; न--नहीं; असंवीता--बिना ओढ़े; बहि:--बाहर;चरेत्--जाए।
भोजन करने के पश्चात् तुम्हें मुँह, हाथ तथा पाँव धोये बिना बाहर सड़क पर नहीं जाना चाहिए तुम्हें न तो शाम को या बाल खोले हुए और न आभूषणों से सज्जित हुए बिना बाहरजाना चाहिए।
जब तक वाणी का संयम न हो और शरीर ठीक से ढका न हो तब तक तुम्हेंघर से बाहर नहीं जाना चाहिए।
नाधौतपादाप्रयता नार्द्रपादा उदक्शिरा: ।
शयीत नापराड्नान्यैर्न नग्ना न च सन्ध्ययो: ॥
५१॥
न--नहीं; अधौत-पादा--बिना धुले पाँव; अप्रयता--बिना शुद्ध हुए; न--नहीं; अर्द्र-पादा-- भीगे पाँव; उदक् -शिरा:--उत्तर की ओर सिर करके; शयीत--सोए; न--नहीं; अपराक्-- पश्चिम की ओर सिर करके; न--नहीं; अन्यै:--अन्यस्त्रियों के साथ; न--नहीं; नग्ना--निर्वस्त्र होकर; न--नहीं; च--तथा; सन्ध्ययो:--सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय ।
तुम्हें न तो दोनों पाँव धोये बिना या शुद्ध हुए बिना, न ही गीले पाँव अथवा अपना सिरपश्चिम या उतर करके सोना चाहिए सूर्योदय अथवा सूर्यास्त के समय, निर्वस्त्र होकर तथाअन्य स्त्रियों के साथ नहीं लेटना चाहिए।
धौतवासा शुचिर्नित्यं सर्वमड्जलसंयुता ।
पूजयेत्प्रातराशात्प्राग्गोविप्राउ्श्रयमच्युतम् ॥
५२॥
धौत-वासा--थुले वस्त्र पहन कर; शुचि:--शुद्ध होकर; नित्यम्--सदैव; सर्व-मड़ल--समस्त शुभ सामग्रियों सहित;संयुता--सज्जित होकर; पूजयेत्ू--पूजा करनी चाहिए; प्रातः-आशातू् प्राकु-कलेवा के पूर्व; गो-विप्रानू--गायों तथाब्राह्मणों; भ्रियम्ू--सम्पत्ति की देवी; अच्युतम्-- श्री भगवान् को ।
मनुष्य को चाहिए कि धुला वस्त्र पहन कर, सदैव शुद्ध रहकर तथा हल्दी, चंदन और अन्य मांगलिक सामग्रियों से अलंकृत होकर कलेवा करने के पूर्व गायों, ब्राह्मणों, ऐश्वर्य कीदेवी ( लक्ष्मी ) तथा श्रीभगवान् की पूजा करे।
स्त्रियो वीरवर्तीश्षार्चेत्स्रग्गन्धबलिमण्डनै: ।
पतिं चार्च्योपतिष्ठेत ध्यायेत्कोष्ठगतं च तम् ॥
५३॥
स्त्रियः:--स्त्रियाँ; वीर-वती:--पति तथा पुत्रों से सम्पन्न; च--तथा; अर्चेतू-पूजन करना चाहिए; सत्रक्-पुष्प मालाओंसे; गन्ध--चन्दन; बलि--भेंट; मण्डनै:--तथा आभूषणों से; पतिम्ू--पति की; च--तथा; आर्च्य--पूजा करके;उपतिष्ठेत--स्तुति करना चाहिए; ध्यायेत्ू-- ध्यान करनी चाहिए; कोष्ठट-गतम्--गर्भ में रहकर; च-- भी; तमू--उसको |
इस ब्रत का पालन करने वाली स्त्री को चाहिए कि वह पुष्प माला, चन्दन, आभूषणतथा अन्य सामग्रियों से पुत्रवती तथा सौभाग्यवती स्त्रियों की पूजा करे।
गर्भवती स्त्री कोअपने पति की पूजा करके उसकी स्तुति करनी चाहिए।
उसे उसका ध्यान यह सोचकर करनाचाहिए कि वह उसके गर्भ में स्थित है।
सांवत्सरं पुंसवनं ब्रतमेतदविप्लुतम् ।
धारयिष्यसि चेत्तुभ्यं शक्रहा भविता सुत: ॥
५४॥
सांवत्सरम्--एक वर्ष तक; पुंसवनम्--पुंसवन नामक; ब्रतम्-ब्रत; एतत्--यह; अविप्लुतम्--तोड़े बिना, अतिक्रमणकिये बिना; धारयिष्यसि--करोगी; चेत्--यदि; तुभ्यम्--तुम्हारे; शक्र -हा--इन्द्र का वधकर्ता; भविता--होगा; सुतः--पुत्र |
कश्यप मुनि ने आगे कहा--यदि तुम श्रद्धापूर्वक कम से कम एक वर्ष तक इस ब्रत मेंलगी रहकर इस पुंसवन अनुष्ठान को करोगी तो तुम्हारे एक पुत्र उत्पन्न होगा जो इन्द्र का वधकरेगा।
किन्तु यदि इस ब्रत को करने में कुछ भी त्रुटि रह गई तो तुम्हारा पुत्र इन्द्र का मित्रबन जाएगा।
बाढमित्यभ्युपेत्याथ दिती राजन्महामना: ।
कश्यपादगर्भमाधत्त ब्रतं चाझ्लो दधार सा ॥
५५॥
बाढम्--तथास्तु; इति--इस प्रकार; अभ्युपेत्य--स्वीकार करके; अथ--तब; दिति: --दिति ने; राजन्ू--हे राजा; महा-मना:--हर्षित; कश्यपात्ू--कश्यप से; गर्भम्--वीर्य; आधत्त--प्राप्त करके; ब्रतम्-ब्रत; च--तथा; अज्भञ:--ठीक से;दधार--पालन किया; सा--उसने |
हे राजा परीक्षित! कश्यप की पत्नी दिति ने पुंसतन नामक शुद्धिकर्त्नीं विधि को करनाअंगीकार कर लिया।
उसने कहा, 'हाँ, मैं आपके उपदेशानुसार सब कुछ करूँगी।
वहअत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक कश्यप का वीर्य धारण कर गर्भवती हुईं और श्रद्धापूर्वक व्रत कापालन करती रही।
मातृष्वसुरभिप्रायमिन्द्र आज्ञाय मानद ।
शुश्रूषणेनाश्रमस्थां दितिं पर्यचरत्कवि: ॥
५६॥
मातृ-स्वसु: --अपनी माता की बहन ( मौसी ) का; अभिप्रायम्--मन्तव्य; इन्द्र:--इन्द्र; आज्ञाय--समझकर; मान-द--सबों को सम्मान देने वाले, हे राजा परीक्षित; शुश्रूषणेन--सेवा से; आश्रम-स्थाम्-- आश्रम में रहने वाली; दितिम्--दिति;पर्यचरत्--परिचर्या की गई; कवि:--अपना स्वार्थ देखकर।
सबों का सम्मान करने वाले हे राजा! इन्द्र ने दिति का मन्तव्य जान लिया, अतः वहअपना स्वार्थ साधने की युक्ति सोचने लगा।
इस तर्क का अनुसरण करते हुए कि आत्म-रक्षाप्रकृति का प्रथम नियम है, उसने दिति की प्रतिज्ञा को भंग करना चाहा।
अतः वहआश्रमवासिनी अपनी मौसी दिति की सेवा करने लगा।
नित्यं वनात्सुमनस: फलमूलसमित्कुशान् ।
पत्राद्डु रमृदोपश्च काले काल उपाहरत् ॥
५७॥
नित्यमू-- प्रतिदिन; वनात्ू--वन से; सुमनस:--फूल; फल--फल; मूल--जड़ें; समित्--यज्ञ के लिए समिधा ( लकड़ी );कुशान्--तथा कुश; पत्र--पत्तियाँ; अब्डु र--कलियाँ; मृदः--तथा मिट्टी; अप:--जल; च--भी; काले काले--उचितसमय पर; उपाहरत्--ले आने लगा।
इन्द्र प्रतेदिन जंगल से फूल, फल, कंद तथा यज्ञ के लिए समिधा लाकर अपनी मौसीकी सेवा करने लगा।
वह उचित समय पर कुश, पत्तियाँ, कलियाँ, मिट्टी तथा जल भी लेआता था।
एवं तस्या ब्रतस्थाया ब्रतच्छिद्रं हरिनृप ।
प्रेप्सु; पर्यचरज्जिहो मृगहेव मृगाकृति: ॥
५८ ॥
एवम्--इस प्रकार; तस्या:--उस ( दिति ) का; ब्रत-स्थाया:-- श्रद्धापूर्वक अपना व्रत का पालन करने वाली; ब्रत-छिद्गरमू--ब्रत पालन करने में त्रुटि ( कमी ); हरिः--इन्द्र; नृप--हे राजन; प्रेप्सु:--ढूँढने की इच्छा से; पर्यचरत्--सेवा कीगई; जिहा: --छलपूर्ण; मृग-हा--बहेलिया; इब--सहृश; मृग-आकृति:--हिरन के रूप में |
है राजा परीक्षित! जिस प्रकार बहेलिया हिरन को मारने के लिए हिरन की खाल पहनकर छदावेष धारण करता है उसी प्रकार से इन्द्र, हृदय से दिति पुत्रों का शत्रु किन्तु बाहर सेमित्र बनकर अत्यन्त श्रद्धापूर्वक दिति की सेवा करने लगा।
इन्द्र का मन्तव्य दिति के ब्रत केअनुष्ठान में त्रुटि निकालकर उसे धोखा देना था, किन्तु साथ ही वह नहीं चाहता था कि कोई उसे पहचान सके इसलिए वह अत्यन्त सतर्कता के साथ उसकी सेवा करने लगा।
नाध्यगच्छद्व्रतच्छिद्रं तत्परोथ महीपते ।
चिन्तां तीव्रां गत: शक्रः केन मे स्याच्छिवं त्विह ॥
५९॥
न--नहीं; अध्यगच्छत्--पा सका; ब्रत-छिद्गरम्-व्रत पालन में त्रुटि; तत्-पर: --उसमें व्यस्त; अथ--तत्पश्चात्; मही-पते--हे विश्व के स्वामी; चिन्ताम्ू--चिन्ता को; तीव्राम्ू--तीत्र; गत: --प्राप्त; शक्र:--इन्द्र; केन--किस प्रकार; मे--मेरा; स्थातू--हो सकता है; शिवम्--शुभ; तु--तब; इह--यहाँ
हे विश्वेश्वर! जब इन्द्र को कोई त्रुटि न मिली तो उसने सोचा, अब मेरा कल्याण कैसेहो ?
इस प्रकार वह गहरी चिन्ता में डूब गया।
एकदा सा तु सन्ध्यायामुच्छिष्ठा ब्रतकर्शिता ।
अस्पृष्ठवार्यधौताड्प्रि: सुष्वाप विधिमोहिता ॥
६०॥
एकदा--एक बार; सा--वह; तु--लेकिन; सन्ध्यायाम्--संध्या समय; उच्छिष्टा-- भोजन के तुरन्त बाद; ब्रत--ब्रत से;कर्शिता--दुर्बल तथा अशक्त; अस्पृष्ट--बिना आचमन लिए; वारि--जल; अधौत--बिना धोये; अद्भप्रि:--अपने पाँव;सुष्वाप--सोने के लिए गई; विधि--दैववश; मोहिता--मोहित होकर
कठोरता से ब्रत का पालन करते रहने से अत्यन्त क्षीण एवं अशक्त हो जाने सेदुर्भाग्यवश दिति ने भोजन के पश्चात् मुँह, हाथ तथा पाँव धोने में लापरवाही बरती औरसन्ध्या में ही सो गई।
लब्ध्वा तदन्तरं शक्रो निद्रापहतचेतस: ।
दितेः प्रविष्ट उदर योगेशो योगमायया ॥
६१॥
लब्ध्वा--पाकर; तत्-अन्तरम्ू--तत्पश्चात्; शक्र: --इन्द्र; निद्रा--नींद से; अपहत-चेतस:--अचेत; दितेः--दिति के;प्रविष्ट:--घुस गया; उदरम्--गर्भ में; योग-ईश:--योग के स्वामी, योगेश्वर; योग--योग-सिद्धियों की; मायया--शक्तिसे
इस त्रुटि को पाकर समस्त योगशक्तियों ( योग सिद्धियाँ यथा अणिमा, लघिमा ) कास्वामी इन्द्र घोर निद्रा में अचेत दिति के गर्भ में प्रविष्ट हो गया।
चकर्त सप्तधा गर्भ वज़ेण कनकप्रभम् ।
रुदन्तं सप्तथैकैक मा रोदीरिति तान्पुन: ॥
६२॥
चकर्त--काट दिया; सप्त-धा--सात खंडों में; गर्भभू--गर्भ को; वज्जेण-- अपने वज़ से; कनक--स्वर्ण की; प्रभम्--ज्योति वाले; रुदन््तम्--रोते हुए; सप्त-धा--सात खंडों में; एक-एकम्-प्रत्येकों; मा रोदी:--मत रोओ; इति--इसप्रकार; तानू--उनको; पुन:--फिर।
दिति के गर्भ में प्रविष्ट होकर इन्द्र ने अपने बज्ञ से चमकते हुए सोने के समान गर्भ( भ्रूण ) को सात खण्डों में काट डाला।
सात स्थानों में सात विभिन्न जीव रोने लगे।
इन्द्र ने'मत रो' ऐसा कहकर प्रत्येक को पुनः सातखण्डों में काट डाला।
तमूचु: पाट्यमानास्ते सर्वे प्राज्ञलयो नूप ।
कि न इन्द्र जिघांससि भ्रातरो मरूतस्तव ॥
६३॥
तम्--उसकी; ऊचु:--कहा; पाट्यमाना:--संतप्त होकर; ते--वे; सर्वे--समस्त; प्राज्ललय:--हाथ जोड़े; नृप--हे राजा;किमू--क््यों; न:--हमको; इन्द्र--हे इन्द्र; जिघांससि--मारना चाहते हो; भ्रातर:-- भाइयों को; मरूत:--मरूद्गण;तब--तुम्हारेअत्यन्त संतप्त होकर
हाथ जोड़कर उन्होंने इन्द्र से कहा--'हे राजन! हे इन्द्र! हम तुम्हारे भाई मरुद्गण हैं।
तुम हमें क्यों मार रहे हो ?
'मा भेष्ट भ्रातरो मह्मं यूयमित्याह कौशिक: ।
अनन्यभावान्पार्षदानात्मनो मरुतां गणान् ॥
६४॥
मा भैष्ट-- मत डरो; भ्रातर: -- भाई; महाम्--मेरे; यूयम्--तुम सब; इति--इस प्रकार; आह--कहा; कौशिक: --इन््द्र;अनन्य-भावान्-भक्तिपूर्ण; पार्षदान्-- अनुयायीगण; आत्मन:--अपने; मरुताम् गणान्--मरूदगणों से
जब इन्द्र ने देखा कि वे वास्तव में उसके भक्त-अनुयायी हैं, तो उसने उनसे कहा कियदि तुम सचमुच मेरे भाई हो तो तुम्हें मुझसे डरने की कोई आवश्यकता नहीं है।
न ममार दितेगर्भ: श्रीनिवासानुकम्पया ।
बहुधा कुलिशश्षुण्णो द्रौण्यस्त्रेण यथा भवान् ॥
६५॥
न--नहीं; ममार--मरा; दितेः--दिति का; गर्भ:--गर्भ ( भ्रूण ); श्रीनिवास--लक्ष्मी के निवास स्थान, भगवान् विष्णु के;अनुकम्पया--अनुग्रह से; बहु-धा--अनेक खण्डों में; कुलिश--वज़ से; क्षुणण:--कटा हुआ; द्रौणि--अश्वत्थामा के;अस्त्रेण--अस्त्र से; यथा--जिस प्रकार; भवान्ू--आप |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा, हे राजा परीक्षित! आप अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से जला दियेगये थे, किन्तु जब श्रीकृष्ण आपकी माता के गर्भ में प्रविष्ट हुए तो आप बच गए।
इसीप्रकार यद्यपि इन्द्र ने एक गर्भ को वज् द्वारा उनचास खण्डों में काट डाला था, किन्तु वेसभी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के अनुग्रह से बच गये।
सकृदिष्ठादिपुरुषं पुरुषो याति साम्यताम् ।
संवत्सरं किद्धिदूनं दित्या यद्धरिरचित: ॥
६६॥
सजूरिन्द्रेण पञ्ञाशद्देवास्ते मरूतोभवन् ।
व्यपोह्य मातृदोषं ते हरिणा सोमपा: कृता: ॥
६७॥
सकृत्--एक बार; इष्ठा--पूजा करके; आदि-पुरुषम्--आदि पुरुष को; पुरुष: --एक व्यक्ति; याति--जाता है;साम्यताम्ू-- भगवान् जैसा शरीर धारण किये हुए; संवत्सरम्--एक वर्ष; किल्जित् ऊनम्--कुछ कम; दित्या--दिति केद्वारा; यत्-- क्योंकि; हरिः-- भगवान् हरि; अर्चित:--पूजित; सजू:--के साथ; इन्द्रेण--इन्द्र; पञ्चाशत्--पचास; देवा:--देवता; ते--वे; मरुत: --मरुद्गण; अभवन्--हुए; व्यपोह्म--हटाकर; मातृ-दोषम्--अपनी माता का दोष; ते--वे;हरिणा-- भगवान् हरि द्वारा; सोम-पा:--सोमरस पीने वाले; कृता:--बनाये गये थे।
यदि कोई पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की पूजा एक बार भी करता है, तो वह बैकुण्ठ मेप्रवेश करने का अधिकारी हो जाता है तथा भगवान् विष्णु के रूप को प्राप्त करता है।
संकल्पपूर्वक कड़ाई से नियमों का पालन करते हुए दिति ने लगभग एक वर्ष तक भगवान्विष्णु की पूजा की।
आध्यात्मिक जीवन की इस शक्ति के कारण उनचास मरुद्रगण पैदाहुए।
यद्यपि मरुद्रगण दिति के गर्भ से पैदा हुए, किन्तु परम भगवान् की कृपा से वे देवताओंकी बराबरी पर आ गये, यह कैसा आश्चर्य है?
दितिरुत्थाय ददशे कुमाराननलप्रभान् ।
इन्द्रेण सहितान्देवी पर्यतुष्यदनिन्दिता ॥
६८॥
दिति:--दिति ने; उत्थाय--उठकर; ददशे --देखा; कुमारान्ू--बालकों को; अनल-प्रभान्--अग्नि के समान तेजस्वी;इन्द्रेण सहितानू--इन्द्र के साथ; देवी--देवी; पर्यतुष्यत्--प्रसन्न थी; अनिन्दिता--शुद्ध हुई |
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की पूजा करने से दिति पूर्णतया शुद्ध हो गई थी।
जब वहबिस्तर से उठी तो उसने इन्द् समेत अपने उनचास पुत्रों को देखा।
ये उनचासों पुत्र अग्नि केसमान तेजवान थे और इन्द्र के मित्र थे अतः वह अतीव प्रसन्न थी।
अथेन्द्रमाह ताताहमादित्यानां भयावहम् ।
अपत्यमिच्छन्त्यचरं ब्रतमेतत्सुदुष्करम् ॥
६९॥
अथ--तदनन्तर; इन्द्रमू--इन्द्र से; आह--बोली; तात--प्यारे बेटे; अहम्--मैं; आदित्यानाम्-- आदित्यों से; भय-आवहमू-- भयभीत करने वाली; अपत्यम्--पुत्र; इच्छन््ती--इच्छा करती हुई; अचरम्--पालन किया; ब्रतम्--ब्रत;एतत्--यह; सु-दुष्करम्--जो कर पाना अत्यन्त कठिन है।
तदनन्तर, दिति ने इन्द्र से कहा--हे पुत्र! मैं इस कठोर व्रत का इसलिए पालन कर रही थी कि तुम बारहों आदित्यों को मारने के लिए एक पुत्र प्राप्त कर सकूँ।
एक: सद्डूल्पितः पुत्र: सप्त सप्ताभवन््कथम् ।
यदि ते विदितं पुत्र सत्यं कथय मा मृषा ॥
७०॥
एक:--एक; सड्जूल्पित:--प्रार्थना की थी; पुत्र:--पुत्र; सप्त सप्त--उनचास; अभवनू--हो गये; कथम्--किस प्रकार;यदि--यदि; ते--तुम्हारे द्वारा; विदितमू--ज्ञात; पुत्र--हे पुत्र!; सत्यम्ू--सच सच; कथय--कहो; मा--मत ( बोलना );मृषा--झूठ |
मैंने केवल एक पुत्र के लिए प्रार्थना की थी, किन्तु मैं देखती हूँ कि ये तो उनचास हैं।
यह किस तरह सम्भव हो सका ?
मेरे पुत्र इन्द्र! यदि तुम जानते हो तो मुझसे सच सच कहो।
झूठ बोलने का प्रयास मत करना।
इन्द्र उबाचअम्ब तेहं व्यवसितमुपधार्यागतोउन्तिकम् ।
लब्धान्तरोच्छिदं गर्भमर्थबुद्धिर्न धर्महक् ॥
७१॥
इन्द्र: उबाच--इन्द्र ने कहा; अम्ब--हे माता; ते--तुम्हारा; अहम्--मैं; व्यवसितम्--ब्रत; उपधार्य--समझकर; आगत:--आया; अन्तिकम्--पास ही; लब्ध--पाकर; अन्तर:--त्रुटि, दोष; अच्छिदम्--मैंने काट दिया; गर्भम्ू--गर्भ; अर्थ-बुद्धिः--स्वार्थवश; न--नहीं; धर्म-हक्-- धर्म-दृष्टि वाला
इन्द्र ने उत्तर दिया--हे माता! स्वार्थ से अंधा होने के कारण मैंने धर्म से मुँह मोड़ लियाथा।
जब मुझे ज्ञात हुआ कि आप आध्यात्मिक जीवन का महान् व्रत धारण कर रही हैं, तो मैंउसमें कोई त्रुटि निकालना चाहता था।
और जब मुझे त्रुटि मिल गईं तो मैं आपके गर्भ मेंप्रविष्ट हो गया और मैंने गर्भ को खंड खंड कर दिया।
कृत्तो मे सप्तधा गर्भ आसन्सप्त कुमारका: ।
तेडपि चैकैकशो वृकणा: सप्तधा नापि मप्निरि ॥
७२॥
कृत्त:--काटा गया; मे--मेरे द्वारा; सप्त-धा--सात खण्डों में; गर्भ:--गर्भ ( भ्रूण )) आसन्--हो गया; सप्त--सात;कुमारका:--शिशु; ते--वे; अपि--यद्यपि; च-- भी; एक-एकशः-- प्रत्येक; वृक्णा:--काटे गये; सप्त-धा--सप्तखण्डों में; न--नहीं; अपि---अब तक; मम्निरे--मरे।
सर्वप्रथम मैंने गर्भस्थ शिशु को सात खण्डों में काट डाला जिससे सात शिशु बन गये।
तब फिर मैंने प्रत्येक शिशु के भी सात सात खण्ड कर दिये।
किन्तु परमेश्वर के अनुग्रह सेइनमें से कोई भी मरा नहीं।
ततस्तत्परमाश्चर्य वीक्ष्य व्यवसितं मया ।
महापुरुषपूजाया: सिद्धिः काप्यानुषड्धिणी ॥
७३॥
ततः--तब; तत्--वह; परम-आश्चर्यम्-महान् आश्चर्य; वीक्ष्--देखकर; व्यवसितम्--यह निश्चय किया गया; मया--मेरे द्वारा; महा-पुरुष-- भगवान् विष्णु की; पूजाया:--पूजा का; सिर्द्ध:--फल; कापि--कुछ; आनुषड्धिणी --आनुसंगिक, गौण।
हे माता! जब मैंने देखा कि उनचासों पुत्र जीवित हैं, तो निश्चित ही मुझे आश्चर्य हुआ।
मुझे विश्वास हो गया कि यह आपके द्वारा विष्णु-उपासना के लिए की गई नियमितभक्तिपूर्ण सेवा का ही आनुषंगिक फल है।
आराधनं भगवत ईहमाना निराशिष: ।
ये तु नेच्छन्त्यपि परं ते स्वार्थकुशला: स्मृता: ॥
७४॥
आराधनम्--उपासना; भगवत:-- श्री भगवान् की; ईहमाना: -- वांछित; निराशिष: -- भौतिक इच्छाओं से रहित, निष्काम;ये--जो; तु--निस्सन्देह; न इच्छन्ति--कामना नहीं करते; अपि-- भी; परम्-- मुक्ति; ते--वे; स्व-अर्थ--अपने हित में;कुशला:--कुशल, दक्ष; स्मृता:--माने हुए |
यद्यपि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की उपासना में ही निरत रहने वालों को भगवान् सेकिसी भी प्रकार की भौतिक इच्छा, यहाँ तक कि मुक्ति की भी कामना नहीं रहती, तो भीभगवान् कृष्ण उनकी समस्त कामनाओं को परिपूर्ण करते हैं।
आश्ध्यात्पप्रदं देवं स्वात्मानं जगदी श्वरम् ।
को वृणीत गुणस्पर्श बुध: स्यान्नरकेडपि यत् ॥
७५॥
आराध्य--उपासना के बाद; आत्म-प्रदम्--जो अपने आपको अर्पित करता है; देवम्-- भगवान् को; स्व-आत्मानम्--परम-प्रिय; जगत्-ईश्वरम्--ब्रह्माण्ड के स्वामी को; कः--क्या; वृणीत--चुनेगा; गुण-स्पर्शम्--भौतिक सुख; बुध:--बुद्धिमान मनुष्य; स्थात्--है; नरके --नरक में; अपि--भी; यत्--जो |
समस्त आकांक्षाओं का अन्तिम लक्ष्य भगवान् का दास बनना है।
यदि कोई बुद्धिमानमनुष्य अपने भक्तों को आत्मसमर्पित करने वाले परम प्रिय भगवान् की सेवा करता है, तोवह भौतिक सुख की कामना कैसे कर सकता है, जो नरक में भी प्राप्य है ?
तदिदं मम दौर्जन्यं बालिशस्य महीयसि ।
क्षन्तुमहसि मातस्त्वं दिष्ठद्या गर्भो मृतोत्थित: ॥
७६॥
तत्--वह; इृदम्--यह; मम--मुझ ; दौर्जन्यम्--कुकृत्य; बालिशस्य--मूर्ख का; महीयसि-हे श्रेष्ठ स्त्री; क्षन्तुम् अहसि--कृपा करके क्षमा करें; मात:--हे माता; त्वम्ू-तुम; दिष्टया--सौभाग्य से; गर्भ:--गर्भस्थ शिशु; मृत--मारा हुआ;उत्थित:--जीवित हो उठा ।
हे माता, हे महीयसी! मैं मूर्ख हूँ।
मैंने जो भी पाप किये हैं उसके लिए आप मुझे क्षमाप्रदान करें।
आपके उनचासों पुत्र बिना किसी क्षति के आपकी भक्ति के कारण ही उत्पन्नहुए हैं।
मैंने शत्रु होने के नाते उनको खण्ड खण्ड कर दिया था, किन्तु आपकी परम भक्तिके कारण वे मरे नहीं।
श्रीशुक उबाचइन्द्रस्तयाभ्यनुज्ञातः शुद्धभावेन तुष्टया ।
मरुद्धिः सह तां नत्वा जगाम त्रिदिवं प्रभु; ॥
७७॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इन्द्र:--इन्द्र; तया--उस ( दिति ) से; अभ्यनुज्ञात:--अनुमति पाकर;शुद्ध-भावेन--शुद्ध आचरण से; तुष्टया--संतुष्ट होकर; मरुद्धि: सह--मरुतों के साथ; तामू--उसको; नत्वा--नमस्कारकरके; जगाम--चला गया; त्रि-दिवम्--स्वर्गलोक को; प्रभु:-- भगवान् |
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा--दिति इन्द्र के इस उत्तम आचरण से अत्यन्त प्रसन्नहुई।
तब इन्द्र ने अपनी मौसी को अत्यन्त आदरपूर्वक प्रणाम किया और उसकी आज्ञा सेअपने मरुद्गण भाइयों सहित स्वर्गलोक को चला गया।
एवं ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
मड्ल॑ मरुतां जन्म कि भूयः कथयामि ते ॥
७८॥
एवम्--इस प्रकार; ते--तुमको; सर्वम्--सब कुछ; आख्यातम्--कह सुनाया; यत्--जो; माम्--मुझसे; त्वम्--तुमने;परिपृच्छसि--पूछा; मड्गलम्--शुभ, कल्याणकारी; मरुताम्--मरुतों का; जन्म--उत्पत्ति; किमू--क्या; भूय:--आगे;कथयामि--कहूँगा; ते--तुम से |
हे राजा परीक्षित! मैंने यथासम्भव तुम्हारे द्वारा पूछे गये प्रश्नों, विशेष रूप से मरुतों केइस शुद्ध मंगलकारी वर्णन, का उत्तर दिया।
अब तुम आगे जो पूछना चाहते हो पूछो, मैं उसेभी विस्तार से बताऊँगा।
