← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 6 की सूची

अध्याय सत्रह: माता पार्वती चित्रकेतु को श्राप देती हैं

6.17श्रीशुक उबाचयतश्चान्तर्हितो नन्तस्तस्यै कृत्वा दिशे नमः ।

विद्याधरकश्रित्रकेतुश्नचचार गगने चर: ॥

१॥

श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; यत:--जिस ( दिशा ); च--तथा; अन्तर्हित:--अन्तर्धान; अनन्त:--भगवान्‌ अनन्त; तस्यै--उसको; कृत्वा--करके; दिशे--दिशा में; नम:ः--नमस्कार; विद्याधर: --विद्याधर लोक का राजा;चित्रकेतु:--चित्रकेतु; चचार--यात्रा की; गगने--बाह्य अन्तरिक्ष में; चर:--चल |

श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा--जिस दिशा में भगवान्‌ अनन्त अन्तर्धान हुए थे उसदिशा की ओर नमस्कार करके, राजा चित्रकेतु विद्याधरों का अगुवा बनकर बाह्य अन्तरिक्षमें यात्रा करने लगा।

स लक्षं वर्षलक्षाणामव्याहतबलेन्द्रिय: ।

स्तूयमानो महायोगी मुनिभिः सिद्धचारणै: ॥

२॥

कुलाचलेन्द्रद्रोणीषु नानासड्डूल्पसिद्धिषु ।

रेमे विद्याधरस्त्रीभिर्गापयन्हरिमी ध्रम्‌ ॥

३॥

सः--वह ( चित्रकेतु ); लक्षम्‌--एक लाख; वर्ष--वर्ष; लक्षाणाम्‌--एक लाख का; अव्याहत--बाधारहित; बल-इन्द्रियः:--जिसकी इन्द्रियों का बल तथा शक्ति; स्तूयमान:--प्रशंसित होकर; महा-योगी--परम योगी; मुनिभि:--मुनियोंद्वारा; सिद्ध-चारणै:--सिद्धों तथा चारणों से; कुलाचलेन्द्र-द्रोणीषु--कुलाचलेन्द्र अथवा सुमेरु पर्वत की घाटियों में;नाना-सड्जुल्प-सिद्धिषु--जहाँ समस्त प्रकार की योग शक्तियाँ सिद्ध हो जाती हैं; रेमे--भोग किया; विद्याधर-स्त्रीभि: --विद्याधर लोक की स्त्रियों के साथ; गापयन्‌-- प्रशंसा करती हुई; हरिम्‌-- भगवान्‌, हरि; ईश्वरम्‌--नियन्ता की |

महान्‌ साधुओं तथा मुनियों एवं सिद्धलोक तथा चारणलोक के वासियों द्वारा प्रशंसित,सर्वाधिक शक्तिशाली योगी चित्रकेतु लाखों वर्षो तक जीवन का आनन्द भोगता हुआविचरता रहा।

शारीरिक शक्ति तथा इन्द्रियों के क्षीण हुए बिना वह सुमेरु पर्वत की घाटियोंमें घूमता रहा वहाँ जो विभिन्न प्रकार की योग-शक्तियों की सिद्धि का स्थान है।

उसनेभगवान्‌ हरि की महिमा का जप करते हुए विद्याधटलोक की रमणियों के साथ जीवन काआनन्द उठाया।

एकदा स विमानेन विष्णुदत्तेन भास्वता ।

गिरिशं दहशे गच्छन्परीतं सिद्धचारणै: ॥

४॥

आलिड्ग्याड्डीकृतां देवीं बाहुना मुनिसंसदि ।

उवाच देव्या: श्रृण्वन्त्या जहासोच्चैस्तदन्तिके ॥

५॥

एकदा--एक बार; सः--उस ( राजा चित्रकेतु ) ने; विमानेन--विमान से; विष्णु-दत्तेन-- भगवान्‌ विष्णु द्वारा प्रदत्त;भास्वता--देदीप्यमान्‌ू, तेजोमय; गिरिशम्‌--भगवान्‌ शिव को; दहृशे--देखा; गच्छन्‌--जाते हुए; परीतम्‌-घिरे हुए;सिद्ध--सिद्धलोक के वासियों से; चारणै:--तथा चारणलोक के वासियों से; आलिड्ग्य--आलिंगन करते हुए;अड्डीकृताम्‌--अपनी गोद में बैठाये हुए; देवीम्‌-- अपनी पार्वती को; बाहुना--अपने हाथ से; मुनि-संसदि--अनेक बड़े-बड़े साधुओं की उपस्थिति में; उबाच--वह बोला; देव्या:--जब देवी पार्वती; श्रृण्वन्त्या:--सुन रही थीं; जहास--वहहँसा; उच्चैः--अत्यन्त तेजी से; तद्‌ू-अन्तिके--पास में |

एक बार जब राजा चित्रकेतु भगवान्‌ विष्णु द्वारा प्रदत्त अत्यन्त तेजोमय विमान परबैठकर बाह्य अन्तरिक्ष में यात्रा कर रहा था, तो उन्होंने भगवान्‌ शिव को सिद्धों एवं चारणोंसे घिरा हुआ देखा।

शिवजी महामुनियों की सभा में बैठे थे और देवी पार्वती को अपनी गोदमें बैठाकर अपने हाथ से उनका आलिंगन कर रहे थे।

राजा चित्रकेतु पार्वती के निकटजाकर तेजी से हँसे और कहने लगे।

चित्रकेतुरुवाचएष लोकगुरुः साक्षाद्धर्म वक्ता शरीरिणाम्‌ ।

आस्ते मुख्य: सभायां वै मिथुनीभूय भार्यया ॥

६॥

चित्रकेतु: उबाच--चित्रकेतु ने कहा; एष:--यह; लोक-गुरु:--वैदिक शिक्षाओं को मानने वाले लोगों के गुरु;साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; धर्मम्‌--धर्म का; वक्ता--बोलने वाला; शरीरिणाम्‌--देहधारी समस्त जीवात्माओं के; आस्ते--बैठानाहै; मुख्य:--प्रधान, मुखिया; सभायाम्‌--सभा में; बै--निस्सन्देह; मिथुनी-भूय--आलिंगन करते हुए; भार्यया--अपनीपतली के साथ

चित्रकेतु ने कहा--शिवजी समस्त जगत के गुरु हैं और भौतिक देहधारी जीवात्माओं मेंसर्वश्रेष्ठ हैं।

वे ही धर्मपद्धति के व्याख्याता हैं, तो भी यह कितना आश्चर्यजनक है कि वे बड़ेबड़े सन्त पुरुषों की सभा के बीच अपनी पत्नी पार्वती का आलिंगन कर रहे हैं! जटाधरस्तीव्रतपा ब्रह्मवादिसभापति: ।

अड्डजीकृत्य स्त्रियं चास्ते गतह्ली: प्राकृतो यथा ॥

७॥

जटा-धर:--जटा धारण करने वाले; तीव्र-तपा:--कठिन तपस्या के कारण सिद्ध; ब्रह्म-वादि--वैदिक नियमों के कट्टरअनुयायी का; सभा-पति:ः--अध्यक्ष, सभापति; अड्डीकृत्य--आलिंगन करके; स्त्रियम्‌--स्त्री को; च--तथा; आस्ते--बैठा है; गत-ही:--निर्लज्ज; प्राकृतः--प्रकृति द्वारा बद्ध पुरुष; यथा--जिस प्रकार |

जटाधरी शिवजी ने निस्सन्देह कठिन तपस्या की है।

वे वैदिक नियमों के कट्टरअनुयायियों की सभा के अध्यक्ष हैं।

किन्तु तो भी वे साधु पुरुषों के मध्य अपनी गोद मेंअपनी पत्नी को लेकर विराजमान हैं और सामान्य निर्लज्ज व्यक्ति की भाँति उसका आलिंगनकर रहे हैं।

प्रायश: प्राकृताश्रापि स्त्रियं रहसि बिभ्रति ।

अयं महाव्रतधरो बिभर्ति सदसि स्त्रियम्‌ ॥

८॥

प्रायशः--सामान्यतः ; प्राकृताः--बद्धजीव; च-- भी; अपि--यद्यपि; स्त्रियमू--स्त्री को; रहसि--निर्जन स्थान में;बिभ्रति--आलिंगन करता है; अयम्‌--यह ( शिवजी ); महा-ब्रत-धर:--महान्‌ ब्रतों तथा तपस्याओं का स्वामी; बिभर्ति--भोग कर रहा है; सदसि--महान्‌ पुरुषों की सभा में; स्त्रियमू--अपनी पत्नी का।

प्रायः सामान्य पुरुष एकान्त में ही अपनी पत्नियों का आलिंगन और भोग करते हैं।

यहकितना आश्चर्यजनक है कि इतने बड़े तपस्वी महादेव परम साधुओं की सभा के बीच अपनीपत्नी का सबों के समक्ष आलिंगन कर रहे हैं! श्रीशुक उवाचभगवानपि तच्छ॒त्वा प्रहस्यागाधधीर्नूप ।

तृष्णीं बभूव सदसि सभ्याश्च तदनुव्रता: ॥

९॥

श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; भगवान्‌-- भगवान्‌ शिव; अपि-- भी; तत्‌--वह; श्रुत्वा--सुनकर;प्रहस्थ--हँसकर; अगाधधी: --अगाध बुद्धि वाला; नूप--हे राजा; तृष्णीम्‌--चुप; बभूव--हो गया; सदसि--सभा में;सभ्या:--सारे सदस्यों ने; च--तथा; तत्‌-अनुव्रता:-- भगवान्‌ शिव का अनुसरण किया ( चुप रहे )।

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा--हे राजा! चित्रकेतु के वचन सुनकर परम बलशाली, अगाध ज्ञानवान्‌ देवाधिदेव शिव केवल हँस दिये और चुप रहे।

सभा के समस्तसदस्यों ने भी उन्हीं का अनुकरण किया और कुछ नहीं कहा।

इत्यतद्वीर्यविदुषि ब्रुवाणे बह्ह॒शोभनम्‌ ।

रुषाह देवी धृष्टाय निर्जितात्माभिमानिने ॥

१०॥

इति--इस प्रकार; अ-तत्‌-वीर्य-विदुषि--शिव के शौर्य को न जानने के कारण चित्रकेतु ने; ब्रुवाणे--कहा; बहु-अशोभनम्‌--अत्यन्त अशोभनीय बातें उच्चपदीय शिव की आलोचना; रुषा--क्रोध से; आह--कहा; देवी--देवी पार्वती;धृष्टाय--निर्लज्ज चित्रकेतु से; निर्जित-आत्म--जिसने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया है; अभिमानिने--अपने आपकोमानते हुए।

शिवजी तथा पार्वती के शौर्य ( वीर्य ) को न जानते हुए राजा चित्रकेतु ने उनकी तीखीआलोचना की।

उसके बचन तनिक भी अच्छे लगने वाले न थे, अतः अत्यन्त क्रुद्ध देवीपार्वती चित्रकेतु से, जो अपने को इन्द्रियों के नियंत्रण में शिवजी से श्रेष्ठ समझ रहा था, इसप्रकार बोलीं ।

श्रीपार्वत्युवाचअयं किमधुना लोके शास्ता दण्डधर: प्रभु: ।

अस्मद्विधानां दुष्टानां निर्लज्ञानां च विप्रकृत्‌ ॥

११॥

श्री-पार्वती उवाच--देवी पार्वती ने कहा; अयम्‌--यह; किम्‌--क्या; अधुना--अब; लोके--संसार में; शास्ता--परमनियन्ता; दण्ड-धर:--दण्ड देने वाला; प्रभु:ः--स्वामी; अस्मत्‌-विधानाम्‌--इन जैसे व्यक्तियों का; दुष्टानामू--अपराधी;निर्लजञानाम्‌ू--निर्लज्जों का; च--तथा; विप्रकृत्‌--नियंत्रण रखने वाला रोकने वाला

देवी पार्वती ने कहा--ओह, क्या हम जैसे निर्लज्ज व्यक्तियों को दण्ड देने के लिए इसनेदण्डधारी का पद ले लिया है?

क्‍या इसे शासक नियुक्त किया गया है?

क्या यही सबों काएकमात्र स्वामी है ?

न वेद धर्म किल पदायोनि-न॑ ब्रह्मपुत्रा भूगुनारदाद्या: ।

न वै कुमार: कपिलो मनुश्नये नो निषेधन्त्यतिवर्तिनं हरमू ॥

१२॥

न--नहीं; वेद--जानता है; धर्मम्‌-धर्म को; किल--निस्सन्देह; पद्य-योनि:-- भगवान्‌ ब्रह्मा; न--न तो; ब्रह्म-पुत्रा:--भगवान्‌ ब्रह्म के पुत्र; भूगु-- भूगु; नारद-- नारद; आद्या: --इत्यादि; न--न तो; बै--निस्सन्देह; कुमार: --चारों अश्विनीकुमार; कपिल: -- भगवान्‌ कपिल; मनु:--स्वयं मनु; च--तथा; ये--जो; नो--नहीं; निषेधन्ति--रोक लगाते हैं; अति-वर्तिनम्‌--नियमों तथा आदेशों के परे; हरम्‌-- भगवान्‌ शिव को।

अहो! ऐसा प्रतीत होता है कि न तो कमल-पुष्प से जन्म लेने वाले ब्रह्मा, न भूगु तथा नारद जैसे महामुनि अथवा सनत कुमार आदि चारों कुमार ही धर्म के नियमों को जानते हैं।

मनु तथा कपिल भी उन नियमों को भूल चुके हैं।

मैं सोचती हूँ कि इसलिए उन्होंने कभीशिवजी को इस प्रकार अनुचित ढंग से आचरण करने के लिए नहीं टोका।

एषामनुध्येयपदाब्जयुग्मंजगदगुरुं मड्भलमड्रलं स्वयम्‌ ।

यः क्षत्रबन्धु: परिभूय सूरीन्‌प्रशास्ति धृष्टस्तदयं हि दण्ड्य: ॥

१३॥

एषाम्‌--इन सबों में ( महापुरुषों ) में; अनुध्येय-- ध्यान करने योग्य; पद-अब्ज-युग्मम्‌--जिनके दो चरणकमल; जगत्‌ू-गुरुम्‌ू--सारे विश्व का गुरु; मड्रल-मड्गलम्‌--साक्षात्‌ सर्वश्रेष्ठ धार्मिक नियम; स्वयम्‌--स्वयं; यः--जो; क्षत्र-बन्धु ;--क्षत्रियों में सबसे निकृष्ठ; परिभूय--मात देकर; सूरीन्‌--देवतागण ( यथा ब्रह्मा तथा अन्य ); प्रशास्ति--दण्ड देता है;धृष्ट:--ढीठ ने; तत्‌--अत:; अयम्‌--यह व्यक्ति; हि--निस्सन्देह; दण्ड्यः--दण्डनीय है।

यह चित्रकेतु में घोर निकृष्ट है क्योंकि इसने उन शिवजी का तिरस्कार करके ब्रह्मा तथाअन्य देवताओं को मात कर दिया है, जो उनके चरणकमलों पर बैठकर सदैव ध्यान धरतेरहते हैं।

भगवान्‌ शिव साक्षात्‌ धर्म तथा समस्त जगत के गुरु हैं अतः चित्रकेतु दण्डनीय है।

नायमर्हति वैकुण्ठपादमूलोपसर्पणम्‌ ।

सम्भावितमति: स्तब्ध: साधुभि: पर्युपासितम्‌ ॥

१४॥

न--नहीं; अयम्‌--यह व्यक्ति; अ्हति--के योग्य है; बैकुण्ठ-पाद-मूल-उपसर्पणम्‌-- भगवान्‌ विष्णु के चरणकमल कीशरण प्राप्त करने का; सम्भावित-मति:--अपने को अत्यन्त पूज्य समझकर; स्तब्ध:--घमंडी; साधुभि:--बड़े बड़े सन्तपुरुषों के द्वारा; पर्युपासितम्‌--पूजनीय |

यह व्यक्ति ऐसा सोचकर अपनी सफलता से फूला हुआ है कि मैं ही सर्वश्रेष्ठ हूँ।

यहव्यक्ति भगवान्‌ विष्णु के उन चरणकमलों के निकट, जिनकी उपासना सभी साधु पुरुषकरते हैं, जाने के योग्य ही नहीं है क्योंकि यह अपने को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण समझ करघमंडी बन गया है।

अतः पापीयसीं योनिमासुरीं याहि दुर्मते ।

यथेह भूयो महतां न कर्ता पुत्र किल्बिषम्‌ ॥

१५॥

अतः --इसलिए; पापीयसीम्‌--अत्यन्त पापपूर्ण; योनिमू--योनि को; आसुरीम्‌--आसुरी; याहि--जाओ; दुर्मते--हे दुर्मति( कुबुद्धि ); यथा--जिससे; इह--इस संसार में; भूयः --फिर; महताम्‌--महान्‌ पुरुष को; न--नहीं; कर्ता--करोगे;पुत्र--हे पुत्र; किल्बिषम्‌--कोई पाप

ऐ मेरे दुर्बुद्धि बेटे! अब तुम असुरों के निम्न तथा पापी परिवार में जन्म ग्रहण करोजिससे तुम पुनः इस संसार में महान्‌ सन्त पुरुषों के प्रति ऐसा पाप न कर सको।

श्रीशुक उबाचएवं शप्तश्नित्रकेतुर्विमानादवरुह्म सः ।

प्रसादयामास सत्तीं मूर्ध्ना नप्रेण भारत ॥

१६॥

श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुक देव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; शप्त:--शापित; चित्रकेतु:--राजा चित्रकेतु;विमानात्‌ू--विमान से; अवरुह्म--उतर कर; सः--वह; प्रसादयाम्‌ आस--परम प्रसन्न हुआ; सतीम्‌--पार्वती को; मूर्ध्ना--शिर से; नप्रेण--नीचे झुक कर; भारत--हे राजा परीक्षित।

श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा--हे राजा परीक्षित! पार्वती द्वारा शाप दिये जाने परचित्रकेतु अपने विमान से नीचे उतरा, उनके समक्ष विनप्रतापूर्वक नतमस्तक हुआ और उसनेउन्हें पूर्णरूपेण प्रसन्न कर दिया।

चित्रकेतुरुवाचप्रतिगृह्ञामि ते शापमात्मनोञ्जलिनाम्बिके ।

देवैर्म्त्याय यत्प्रोक्त पूर्वदिष्टे हि तस्य तत्‌ ॥

१७॥

चित्रकेतु: उवाच--राजा चित्रकेतु ने कहा; प्रतिगृह्ञामि-- अंगीकार करता हूँ; ते--तुम्हारा; शापम्‌--शाप; आत्मन: --अपने; अज्ञलिना--बद्ध हाथों से; अम्बिके--हे माता; देवै:--देवताओं द्वारा; मर्त्याय--मनुष्य को; यत्‌--जो; प्रोक्तम्‌--नियत; पूर्व-दिष्टम्‌--पूर्वकर्मों के अनुसार पहले से निश्चित; हि--निस्सन्देह; तस्य--उसका; तत्‌--वह ।

चित्रकेतु ने कहा--हे माता! मैं अपने हाथ जोड़ कर आपका शाप स्वीकार करता हूँ।

मुझे शाप की परवाह नहीं है, क्योंकि मनुष्य के पूर्वकर्मों के अनुसार ही देवताओं द्वारा सुखया दुख प्रदान किये जाते हैं।

संसारचक्र एतस्मिझ्जन्तुरज्ञानममोहितः ।

भ्राम्यन्सुखं च दुःखं च भुड़ढे सर्वत्र सर्वदा ॥

१८॥

संसार-चक्रे --इस संसार रूपी पहिए में; एतस्मिन्‌ू--यह; जन्तुः--जीवात्मा; अज्ञान-मोहित:--अज्ञान के कारण मोहग्रस्त;भ्राम्यनू--घूमता हुआ; सुखम्‌--सुख; च--तथा; दुःखम्‌--दुख; च--भी; भुड़े --भोगता है; सर्वत्र--सभी जगह;सर्वदा--सदैव |

अज्ञान से मोहग्रस्त होकर यह जीवात्मा इस संसार रूपी जंगल में भटकता रहता है औरहर जगह तथा हर समय अपने पूर्वकर्मों के फलस्वरूप सुख तथा दुख पाता रहता है ( अतःहे माता! इस घटना के लिए न आप दोषी हैं न मैं )।

नैवात्मा न परश्रापि कर्ता स्यात्सुखदुःखयो: ।

कर्तारें मन्यतेउत्राज्ञ आत्मानं परमेव च ॥

१९॥

न--नहीं; एव--निस्सन्देह; आत्मा--आत्मा; न--न तो; पर:--दूसरा ( शत्रु या मित्र ); च-- भी; अपि--निस्सन्देह;कर्ता--करने वाला; स्थात्‌--हो सकता है; सुख-दुःखयो:--सुख तथा दुख का; कर्तारम्‌--करनेवाला; मन्यते--मानताहै; अब्र--इस सम्बन्ध में; अज्ञ:--मूर्ख; आत्मानम्‌ू--अपने आपको; परम्‌ू-- अन्य; एब--निस्सन्देह; च-- भी |

इस संसार में न तो स्वयं जीवात्मा और न पराये ( मित्र तथा शत्रु ) ही भौतिक सुख तथादुख के कारण हैं।

केवल अज्ञानतावश जीवात्मा यह सोचता है कि वह तथा पराये लोगइसके कारणस्वरूप हैं।

गुणप्रवाह एतस्मिन्क: शाप: को न्वनुग्रह: ।

कः स्वर्गो नरकः को वा किं सुखं दुःखमेव वा ॥

२०॥

गुण-प्रवाहे-- प्रकृति के गुणों की धारा में; एतस्मिन्‌ू--यह; कः--क्‍्या; शाप:--शाप; क:-- क्या; नु--निस्सन्देह;अनुग्रह:--कृपा; क:--क्या; स्वर्ग:--सफ्वर्गलोक के पद तक पहुँचना; नरक:--नरक; कः--क्या; वा--अथवा; किम्‌--क्या; सुखम्‌--सुख; दुःखम्‌--दुख; एव--निस्सन्देह; वा--अथवा

यह संसार सतत प्रवाहमान्‌ नदी की तरंगों के समान है, अतः इसमें क्या शाप और क्‍याअनुग्रह ?

क्‍या स्वर्गलोक और क्‍या नरकलोक ?

क्‍या सुख और क्‍या वास्तविक दुख?

निरन्तर प्रवाहित होते रहने के कारण तरंगें कोई शाश्वत प्रभाव नहीं छोड़तीं।

एक: सृजति भूतानि भगवानात्ममायया ।

एषां बन्ध॑ च मोक्ष च सुखं दुःखं च निष्कल: ॥

२१॥

एक:ः--एक; सृजति--उत्पन्न करता है; भूतानि--विभिन्न प्रकार की जीवात्माओं को; भगवानू-- श्री भगवान्‌; आत्म-मायया--आत्म स्वरूप शक्तियों से; एघाम्‌ू--समस्त बद्धजीवों का; बन्धम्‌--बद्ध जीवन; च--तथा; मोक्षम्‌--मुक्तजीवन; च-- भी; सुखम्‌-- सुख; दुःखम्‌--दुख; च--तथा; निष्कलः--भौतिक गुणों से अप्रभावित |

श्रीभगवान्‌ एक हैं।

वे भौतिक जगत की स्थितियों से प्रभावित हुए बिना आत्मस्वरूपशक्ति से समस्त जीवों की सृष्टि करते हैं।

माया से दूषित होकर जीवात्मा अविद्या को प्राप्त होता है और अनेक प्रकार के बन्धनों में जा पड़ता है।

कभी-कभी ज्ञान के कारण जीवात्माको मुक्ति दी जाती है।

सत्व तथा रजो गुणों के कारण उसे सुख तथा दुख मिलते हैं।

न तस्य कश्चिदयितः प्रतीपोन ज्ञातिबन्धुर्न परो न च स्व: ।

समसस्‍्य सर्वत्र निरज्धनस्यसुखे न राग: कुत एवं रोष: ॥

२२॥

न--नहीं; तस्य--उस ( परमेश्वर ) का; कश्चित्‌--कोई; दयितः--प्रिय; प्रतीप:--अप्रिय; न--नहीं; ज्ञाति--परिजन;बन्धु:--मित्र; न--नहीं; पर: --पराया; न--नहीं; च--भी; स्व: -- अपना; समस्य--समानधर्मा; सर्वत्र--सभी जगह;निरज्नस्य-प्रकृति द्वारा अप्रभावित; सुखे--सुख में; न--नहीं; राग:--आसक्ति; कुतः--कहाँ से; एव--निस्सन्देह;रोष:--क्रोध

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ समस्त जीवों को एकसमान देखते हैं; अतः न तो कोई उनकाअत्यन्त प्रिय है, न कोई शत्रु; न तो उनका कोई मित्र है न कोई परिजन।

इस भौतिक जगतसे अनासक्त होने के कारण उन्हें तथाकथित सुख के लिए न तो कोई स्नेह है, न दुख के लिए किसी प्रकार की घृणा।

सुख तथा दुख सापेक्ष हैं।

भगवान्‌ सदैव प्रसन्न रहने वाले हैं,अतः उनके लिए दुख का कोई अर्थ नहीं है।

तथापि तच्छक्तिविसर्ग एषांसुखाय दुःखाय हिताहिताय ।

बन्धाय मोक्षाय च मृत्युजन्मनो:शरीरिणां संसृतयेडबकल्पते ॥

२३॥

तथापि--तो भी; तत्‌-शक्ति--ईश्वर की शक्ति का; विसर्ग:--सृष्टि; एघामू--इन सबों ( बद्धजीवों ) का; सुखाय--सुखके लिए; दुःखाय--दुख के लिए; हित-अहिताय--लाभ तथा हानि के लिए; बन्धाय--बन्धन के लिए; मोक्षाय--मुक्तिके लिए; च- भी; मृत्यु--मृत्यु; जन्मनो:--तथा जन्म का; शरीरिणाम्‌ू--समस्त देहधारियों का; संसृतये-- आवागमन केलिए; अवकल्पते--कर्म करता है।

यद्यपि परमेश्वर कर्म के अनुसार प्राप्त होने वाले हमारे सुख दुख से अनासक्त हैं औरकोई भी उनका शत्रु या मित्र नहीं है, तो भी वे अपनी भौतिक शक्ति ( माया ) के द्वारा शुभतथा अशुभ कर्मों की उत्पत्ति करते हैं।

इस प्रकार भौतिक जीवन को चालू रखने के लिए वेसुख-दुख, लाभ-हानि, बन्धन-मोश्ष, जन्म-मृत्यु की सृष्टि करते हैं।

अथ प्रसादये न त्वां शापमोक्षाय भामिनि ।

यन्मन्यसे हासाधूक्त मम तत्क्षम्यतां सति ॥

२४॥

अथ--अत:; प्रसादये--प्रसन्न करने का प्रयत्त कर रहा हूँ; न--नहीं; त्वामू--तुमको; शाप-मोक्षाय--शाप से मुक्ति पानेके लिए; भामिनि--हे छुद्धा; यत्‌--जो; मन्यसे--तुम मान लो; हि--निस्सन्देह; असाधु-उतक्तम्‌-- अनुचित बात; मम--मेरी; तत्‌--वह; क्षम्यताम्‌-- क्षमा करें; सति--हे सती !हे माता! आप अब वृथा ही क्रुद्ध हैं।

चूँकि मेरे समस्त सुख-दुख मेरे पूर्वकर्मों के द्वारासुनिश्चित हैं, अतः मैं न तो क्षमा-प्रार्थी हूँ और न आपके शाप से मुक्त होना चाहता हूँ।

यद्यपि मैंने जो कुछ कहा है अनुचित नहीं है, किन्तु जो कुछ आप अनुचित समझती होंउसके लिए क्षमा करें।

श्रीशुक उवाचइति प्रसाद्य गिरिशौ चित्रकेतुररिन्दम ।

जगाम स्वविमानेन पश्यतो: स्मयतोस्तयो: ॥

२५॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; प्रसाद्य--प्रसन्न करके; गिरिशौ--भगवान्‌ शिव तथाउनकी पत्नी पार्वती को; चित्रकेतु:--राजा चित्रकेतु; अरिम्‌-दम--शत्रुओं को दमन करने में समर्थ हे राजा परीक्षित;जगाम--चला गया; स्व-विमानेन--अपने विमान द्वारा; पश्यतो:--देखते देखते; स्मयतो: --हँसते हुए; तयो: -- भगवान्‌शिव तथा पार्वती दोनों के |

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा--हे शत्रुओं को दमन करने वाले राजा परीक्षित!शिवजी तथा पार्वती को प्रसन्न करने के बाद चित्रकेतु अपने विमान पर बैठ गये और उनकेदेखते-देखते प्रस्थान कर गये।

जब शिवजी तथा पार्वती ने देखा कि शापित होने पर भीचित्रकेतु निर्भय था, तो वे उसके आचरण पर विस्मित होकर हँस पड़े।

ततस्तु भगवान्रुद्रो रुद्राणीमिदमत्रवीत्‌ ।

देवर्षिदैत्यसिद्धानां पार्षदानां च श्रूण्वताम्‌ ॥

२६॥

ततः--तत्पश्चात्‌; तु--तब; भगवानू--सर्वशक्तिमान; रुद्र:-- भगवान्‌ शिव ने; रुद्राणीमू--अपनी पत्नी पार्वती से; इदम्‌--यह; अब्नवीत्‌--कहा; देवर्षि-- जबकि परम साधु नारद; दैत्य--असुरों ; सिद्धानाम्‌ू--तथा योगशक्ति में पटु सिद्धलोक केवासियों के; पार्षदानाम्‌ू--अपने निजी सहयोगियों के; च--भी; श्रुण्वताम्‌--सुन रहे थे |

तत्पश्चात्‌ परमसाधु नारद, असुरों, सिद्धलोक के वासियों तथा अपने व्यक्तिगतसहयोगियों के समक्ष सर्वशक्तिमान भगवान्‌ शिव अपनी पत्नी पार्वती से बोले और वे सबसुनते रहे।

श्रीरुद्र उवाचइृष्टवत्यसि सुश्रोणि हरेरद्भधुतकर्मण: ।

माहात्म्य॑ भृत्यभृत्यानां निःस्पूहाणां महात्मनाम्‌ ॥

२७॥

श्री-रुद्र: उवाच--शिवजी ने कहा; दृष्टबती असि--क्या तुमने देखा; सु-श्रोणि--हे सुन्दरी पार्वती; हरेः-- श्री भगवान्‌ के;अद्भुत-कर्मण: --विस्मयपूर्ण कार्य; माहात्म्यम्‌--महानता; भृत्य-भृत्यानामू--दासानुदासों की; निःस्पृहाणाम्‌--इन्द्रियतृप्ति की आकांक्षा से रहित; महात्मनाम्‌-महान्‌ पुरुषों का |

शिवजी ने कहा--हे सुन्दरी! तुमने वैष्णवों की महानता देख ली?

श्रीभगवान्‌ हरि केदासानुदास होकर वे महान्‌ पुरुष होते हैं और किसी प्रकार के सांसारिक सुख में रुचि नहींरखते।

नारायणपरा: सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति ।

स्वर्गापवर्गनरकेेष्वपि तुल्यार्थदर्शिन: ॥

२८ ॥

नारायण-परा:--जो केवल नारायण की सेवा में रुचि रखते हैं, शुद्ध भक्त; सर्वे--समस्त; न--नहीं; कुतश्चन--कहीं भी;बिभ्यति--ड रते हैं; स्वर्ग--स्वर्ग लोक; अपवर्ग--मुक्ति; नरकेषु--तथा नरक में; अपि--भी; तुल्य--समान; अर्थ--महत्त्व; दर्शिन:--देखने वाले |

पूरी तरह से भगवान्‌ नारायण की सेवा में लीन रहने वाले भक्तजन जीवन की किसी भीअवस्था से भयभीत नहीं होते।

उनके लिए स्वर्ग, मुक्ति तथा नरक एकसमान हैं क्योंकि ऐसेभक्त ईश्वर की सेवा में ही रुचि रखते हैं।

देहिनां देहसंयोगाद्द्वन्द्दानी श्रलीलया ।

सुखं दु:खं मृतिर्जन्म शापो३नुग्रह एव च ॥

२९॥

देहिनामू--देहधारी व्यक्तियों का; देह-संयोगात्‌-- भौतिक देह के सम्पर्क से; द्वन्द्दानि--द्वैत भावनाएँ; ई श्वर-लीलया--ईश्वर की परम इच्छा से; सुखम्‌--सुख; दुःखम्‌--दुख; मृतिः --मृत्यु; जन्म--जन्म; शाप: --शाप; अनुग्रह:--कृपा;एव--निश्चय ही; च--तथा |

परमेश्वर की बहिरंगा शक्ति के कार्यों के कारण जीवात्माएँ भौतिक देह के सम्पर्क मेंबद्ध हैं।

सुख तथा दुख, जन्म तथा मृत्यु, शाप तथा अनुग्रह के द्वैतभाव संसार के सम्पर्क केसहज गौण फल हैं।

अविवेककृतः पुंसो हार्थभेद इवात्मनि ।

गुणदोषविकल्पश्च भिदेव स्त्रजिवत्कृत: ॥

३०॥

अविवेक-कृतः--अज्ञानता में किया गया; पुंसः--जीवात्मा का; हि--निस्सन्देह; अर्थ-भेद:--महत्त्व का अन्तर; इब-केसहश; आत्मनि--अपने आप में; गुण-दोष--गुण तथा दोष का; विकल्प:--कल्पना; च--तथा; भित्‌-- अन्तर; एव--निश्चय ही; स्रजि--माला में; बत्‌--सहृश; कृत:--बनी हुई |

जिस प्रकार मनुष्य फूलमाला को सर्प समझ बैठता है अथवा स्वप्न में सुख तथा दुखका अनुभव करता है उसी प्रकार भौतिक संसार में सुविचार के अभाव में हम सुख तथा दुखमें एक को अच्छा तथा दूसरे को बुरा समझ कर विभेद करते हैं।

वासुदेवे भगवति भक्तिमुद्दहतां नृणाम्‌ ।

ज्ञानवैराग्यवीर्याणां न हि कश्चिद्व्यपाअ्रयः ॥

३१॥

वासुदेवे-- भगवान्‌ वासुदेव, कृष्ण में; भगवति-- भगवान्‌; भक्तिम्‌-भक्ति में प्रेम तथा श्रद्धा; उद्दहतामू-- धारण करनेवालों के लिए; नृणाम्‌--मनुष्यों का; ज्ञान-वैराग्य--वास्तविक ज्ञान तथा विरक्ति का; वीर्याणाम्‌ू--शक्तिमान; न--नहीं;हि--निस्सन्देह; कश्चित्‌ू--कुछ भी; व्यपाश्रय:--शरण के रूप में ।

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ वासुदेव कृष्ण की भक्ति में अनुरक्त व्यक्ति स्वभावत: परमज्ञानी तथा इस संसार से विरक्त रहने वाले होते हैं।

अतः ऐसे भक्त न तो इस संसार केतथाकथित सुख में न ही तथाकथित दुख में कोई रुचि रखते हैं।

नाहं विरिज्ञो न कुमारनारदौन ब्रह्मपुत्रा मुनयः सुरेशा: ।

विदाम यस्येहितमंशकांशकान तत्स्वरूपं पृथगीशमानिन: ॥

३२॥

न--नहीं; अहम्‌--मैं ( शिव ); विरिज्ञः--ब्रह्मा जी; न--नहीं; कुमार--अश्विनीकुमार; नारदौ--देवर्षि नारद; न--नहीं;ब्रह्म-पुत्रा:-- भगवान्‌ ब्रह्मा के पुत्र; मुन॒य:ः--परम साधु पुरुष; सुर-ईशा:--समस्त देवता; विदाम--जानते हैं; यस्य--जिसका; ईहितमू--गतिविधि; अंशक-अंशका:--अंशों के भी अंश; न--नहीं; तत्‌--उसका; स्व-रूपम्‌ू--वास्तविकव्यक्तित्व; पृथक्‌--भिन्न; ईश--राजा; मानिन:--मान बैठे हैं

नतो मैं ( शिव ), न ब्रह्मा या अश्विनीकुमार, न ही नारद या ब्रह्म के अन्य साधु-पुत्रऔर न देवता ही परमेश्वर की लीलाओं को तथा उनके स्वरूप को समझ सकते हैं।

भगवान्‌के अंश होते हुए भी हम अपने को स्वतंत्र तथा पृथक्‌ शासक ( नियन्ता ) मान बैठते हैंजिससे हम उनके स्वरूप को नहीं समझ सकते।

न हास्यास्ति प्रियः कश्रिन्नाप्रिय: स्व: परोडपि वा ।

आत्मत्वात्सर्वभूतानां सर्वभूतप्रियो हरि: ॥

३३॥

न--नहीं; हि--निस्सन्देह; अस्य--ईश्वर का; अस्ति-- है; प्रिय:--अत्यन्त प्यारा; कश्चित्‌ू--कोई; न--नहीं; अप्रिय:--जोप्रिय न हो; स्व:--अपना; पर:--पराया; अपि-- भी; वा--या; आत्मत्वात्‌ू-आत्मा की भी आत्मा होने से; सर्व-भूतानाम--सभी जीवात्माओं का; सर्व-भूत--सभी जीवात्माओं के लिए; प्रियः--अत्यधिक प्रिय; हरि:--भगवान्‌ हरिभगवान्‌ को न कोई अति प्रिय है और न कोई अप्रिय।

उनके न तो कोई स्वजन है औरन कोई पराया है।

वे वास्तव में समस्त जीवों के आत्मा के आत्मा हैं।

इस प्रकार वे समस्तजीवों के कल्याणकारी मित्र तथा उन सबों के अत्यन्त प्रिय हैं।

तस्य चायं महाभागश्रित्रकेतु: प्रियोइनुग: ।

सर्वत्र समहक्शान्तो ह्ाहं चैवाच्युतप्रियः ॥

३४॥

तस्मान्न विस्मय: कार्य: पुरुषेषु महात्मसु ।

महापुरुषभक्तेषु शान्तेषु समदर्शिषु ॥

३५॥

तस्य--उस (ईश्वर ) का; च--तथा; अयम्‌--यह; महा-भाग:--परम भाग्यशाली; चित्रकेतु:--राजा चित्रकेतु; प्रिय:--प्यारा; अनुग: --आज्ञापालक सेवक; सर्वत्र--सभी जगह; सम-हक्‌--समान दृष्टि; शान्त:--अत्यन्त शांत; हि--निस्सन्देह;अहम्‌-मैं; च-- भी; एब--निश्चय ही; अच्युत-प्रिय:--कभी न चूकने वाले भगवान्‌ कृष्ण को प्रिय; तस्मात्‌ू--अतः;न--नहीं; विस्मय:--आश्चर्य; कार्य: --करणीय, कार्य; पुरुषेषु--पुरुषों में से; महा-आत्मसु--जो महात्मा है; महा-पुरुष-भक्तेषु--भगवान्‌ विष्णु के भक्त; शान्तेषु--शान्त; सम-दर्शिषु--सम-दर्शियों में, सबको समान मानने वाले

यह परम उदार चित्रकेतु ईश्वर का प्रिय भक्त है।

यह सभी जीवों का समदर्शी है औरआसक्ति तथा घृणा से मुक्त है।

इसी प्रकार मैं भी भगवान्‌ नारायण का परम प्रिय हूँ, अतःनारायण के उच्च भक्तों की गतिविधियों को देखकर चकित नहीं होना चाहिए क्योंकि वेआसक्ति तथा द्वेष से मुक्त रहते हैं।

वे सदैव शान्‍्त रहते हैं और समदर्शा होते हैं।

श्रीशुक उवाचइति श्रुत्वा भगवत: शिवस्योमाभिभाषितम्‌ ।

बभूव शान्तधी राजन्देवी विगतविस्मया ॥

३६॥

श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; श्रुत्वा--सुनकर; भगवत:--अत्यन्त शक्तिमान देवता;शिवस्य--शिव का; उमा--पार्वती; अभिभाषितम्‌-- भाषण; बभूब--हो गई; शान्त-धी: --अत्यन्त शान्त; राजन्‌ू--हेराजा परीक्षित; देवी--देवी; विगत-विस्मया--आश्चर्य से मुक्त |

श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा, हे राजन्‌! अपने पति से यह संभाषण सुनकर देवी उमा(शिव की पत्नी ) को राजा चित्रकेतु के व्यवहार पर जो विस्मय उत्पन्न हुआ था वह जातारहा और उनकी बुद्धि स्थिर हो गई।

इति भागवतो देव्या: प्रतिशप्तुमलन्तम: ।

मूर्धश्ना स जगृहे शापमेतावत्साधुलक्षणम्‌ ॥

३७॥

इति--इस प्रकार; भागवत:--परम भक्त; देव्या:--देवी पार्वती का; प्रतिशप्तुमू--बदले में शाप देने; अलन्तम: --समर्थ ;मूर्ध्न--सिर से; सः--वह ( चित्रकेतु ); जगृहे--स्वीकार किया; शापम्‌--शाप; एतावत्‌--इतना बड़ा; साधु-लक्षणम्‌--भक्त के लक्षण

महान्‌ भक्त चित्रकेतु इतना शक्तिमान था कि यदि वह चाहता तो पलट कर ( बदले में )माता पार्वती को शाप दे देता, किन्तु ऐसा न करके उसने नप्रता से शाप को स्वीकार कियाऔर शिवजी तथा उनकी पली के सम्मुख अपना शिर झुकाया।

इसे वैष्णव का आदर्शआचरण समझना चाहिए ।

जज्ने त्वष्टृर्दक्षिणाग्नौ दानवीं योनिमाश्रित: ।

वृत्र इत्यभिविख्यातो ज्ञानविज्ञानसंयुत: ॥

३८॥

जज्ञे--उत्पन्न हुआ; त्वष्ठः --त्वष्टा नामक ब्राह्मण का; दक्षिण-अग्नौ--दक्षिणाग्नि नामक यज्ञ की अग्नि में; दानवीम्‌--आसुरी; योनिमू--योनि; आश्रित:--शरणागत; वृत्र:--वृत्र; इति--इस प्रकार; अभिविख्यात:--विख्यात; ज्ञान-विज्ञान-संयुतः--जीवन के दिव्य ज्ञान तथा व्यावहारिक ज्ञान से युक्त |

माता दुर्गा ( भवानी, शिवजी की पत्नी ) से शापित होकर उसी चित्रकेतु ने आसुरी योनिमें जन्म लिया।

वह त्वष्टा द्वारा किये गये यज्ञ से असुर के रूप में प्रकट हुआ, यद्यपि वहदिव्य ज्ञान और उसके व्यावहारिक उपयोग में अभी भी परिपूर्ण था और इस प्रकार वहवृत्रासुर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।

वृत्रस्यासुरजाते श्व कारणं भगवन्मते: ॥

३९॥

एतत्‌--यह; ते--तुमको; सर्वम्‌--सब कुछ; आख्यातम्‌--बता दिया; यत्‌--जो; माम्‌-- मुझसे; त्वम्‌--तुमने;परिपृच्छसि--पूछा था; वृत्रस्थ--वृत्रासुर का; असुर-जाते: --असुर योनि में उत्पन्न; च--तथा; कारणम्‌--कारण;भगवत्‌-मते: --कृष्णभावना में उन्नत बुद्धि का |

हे राजा परीक्षित! तुमने मुझसे पूछा था कि परम भक्त वृत्रासुर ने असुर वंश में किसप्रकार जन्म लिया; अतः मैंने तुम्हें उसके विषय में सब कुछ बताने का प्रयास किया है।

इतिहासमिमं पुण्यं चित्रकेतोर्महात्मन: ।

माहात्म्य॑ विष्णुभक्तानां श्रुत्वा बन्धाद्विमुच्यते ॥

४०॥

इतिहासम्‌--इतिहास; इमम्‌--यह; पुण्यम्‌--परम पवित्र; चित्रकेतो:--चित्रकेतु का; महा-आत्मन:--परम भक्त;माहात्म्यमम्‌-महिमायुक्त; विष्णु-भक्तानाम्‌ू--विष्णु के भक्तों का; श्रुत्वा--सुनकर; बन्धात्‌--जीवन के बन्धन से;विमुच्यते--मुक्त हो जाता है।

चित्रकेतु महान्‌ भक्त ( महात्मा ) था।

यदि कोई मनुष्य किसी शुद्ध भक्त से चित्रकेतु केइस इतिहास को सुने तो श्रोता भी इस संसार में अपने बद्ध जीवन से मुक्त हो जाता है।

य एतत्प्रातरुत्थाय श्रद्धया वाग्यत: पठेत्‌ ।

इतिहासं हरिं स्मृत्वा स याति परमां गतिम्‌ ॥

४१॥

यः--जो भी व्यक्ति; एतत्‌--यह; प्रात:ः--प्रातःकाल; उत्थाय--उठकर, जगकर; श्रद्धया--श्रद्धापूर्वक; वाक्‌ू-यत:--मनतथा वाणी को वश में करके; पठेत्‌-पढ़े ; इतिहासमू--इतिहास; हरिम्‌--पर मे श्वर; स्मृत्वा--स्मरण करके; सः--वहव्यक्ति; याति--जाता है; परमाम्‌ गतिम्‌-- भगवान्‌ के धाम कोजो व्यक्ति प्रातःकाल उठकर अपने मन तथा वाणी को वश में रखकर तथा श्रीभगवान्‌का स्मरण करके चित्रकेतु का यह इतिहास पढ़ता है, वह बिना कठिनाई के भगवान्‌ केधाम को चला जाता है।

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