← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 6 की सूची

अध्याय पंद्रह: संत नारद और अंगिरा राजा चित्रकेतु को निर्देश देते हैं

6.15श्रीशुक उबाचऊचतुर्मृतकोपान्ते पतितं मृतकोपमम्‌ ।

शोकाभिभूतं राजानं बोधयन्तौ सदुक्तिभि: ॥

१॥

श्री-शुक: उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; ऊचतु:--वे बोले; मृतक --मृत शरीर; उपान्ते--निकट; पतितम्‌--गिराहुआ; मृतक-उपमम्‌--शव के तुल्य; शोक-अभिभूतम्‌--शोक से अत्यधिक संतप्त; राजानम्‌--राजा को; बोधयन्तौ--उपदेश देकर; सत्-उक्तिभि:--उपदेशों सेजो क्षणिक नहीं वरन्‌ वास्तविक हैं।

श्री शुकदेव गोस्वामी बोले--जब राजा चित्रकेतु शोकग्रस्त होकर अपने पुत्र के शव केनिकट पड़े मृतप्राय हुए थे तो नारद तथा अंगिरा नामक दो महर्षियों ने उन्हें आध्यात्मिकचेतना के सम्बन्ध में इस प्रकार उपदेश दिया।

कोअयं स्यात्तव राजेन्द्र भवान्यमनुशोचति ।

त्वं चास्य कतमः सृष्ठौ पुरेदानीमत: परम्‌ ॥

२॥

कः--कौन; अयम्‌--यह; स्यात्‌ू--है; तव--तुम्हारे लिए; राज-इन्द्र--राजाओं में श्रेष्ठ भवानू--आप; यम्‌ू--जिसको;अनुशोचति--शोक कर रहे हो; त्वमू--तुम; च--और; अस्य--उसका ( शव का ); कतम:--कौन; सृष्टी--जन्म में;पुरा--गत; इृदानीम्‌--इस समय; अतः परमू--अतः

हे राजन्‌! जिस शव के लिए तुम शोक कर रहे हो उसका तुमसे और तुम्हारा उसके साथक्या सम्बन्ध है?

तुम कह सकते हो कि इस समय तुम पिता हो और वह पुत्र है, किन्तु क्यातुम सोचते हो कि यह सम्बन्ध पहले भी था?

क्या सचमुच अब भी यह सम्बन्ध है?

क्या यहभविष्य में भी बना रहेगा ?

यथा प्रयान्ति संयान्ति स्रोतोवेगेन बालुका: ।

संयुज्यन्ते वियुज्यन्ते तथा कालेन देहिन: ॥

३॥

यथा--जिस प्रकार; प्रयान्ति--विलग होते; संयान्ति--पास पास आते हैं; स्त्रोत:-वेगेन--लहरों के वेग से; बालुका: --बालू के सूक्ष्म कण; संयुज्यन्ते--परस्पर जुड़ते; वियुज्यन्ते--पृथक्‌ होते हैं; तथा--उसी प्रकार; कालेन--काल के द्वारा;देहिन:--देहधारी जीवात्माएँ |

हे राजन्‌! जिस प्रकार बालू के छोटे-छोटे कण लहरों के वेग से कभी एक दूसरे केनिकट आते हैं और कभी विलग हो जाते हैं, उसी प्रकार से देहधारी जीवात्माएँ काल के वेगसे कभी मिलती हैं, तो कभी बिछुड़ जाती हैं।

यथा धानासु वै धाना भवन्ति न भवन्ति च ।

एवं भूतानि भूतेषु चोदितानीशमायया ॥

४॥

यथा--जिस प्रकार; धानासु--धान के बीजों से; वै--निस्सन्देह; धाना:--अन्न; भवन्ति--उत्पन्न होते हैं; न--नहीं;भवन्ति--उत्पन्न होते हैं; च-- भी; एवम्‌--इस प्रकार; भूतानि--जीवात्माएँ; भूतेषु-- अन्य जीवों में; चोदितानि--बाध्य;ईश-मायया-- श्री भगवान्‌ की शक्ति के द्वारा

जब बीजों को धरती में बोया जाता है, तो वे कभी तो उगते हैं और कभी नहीं उगते।

कभी धरती उपजाऊ नहीं रहती जिससे बीजों का बोना निरर्थक हो जाता है।

इसी प्रकारपरमात्मा की शक्ति से बाध्य होने पर भावी पिता को कभी सनन्‍्तान की प्राप्ति होती है, तोकभी गर्भ ही नहीं रहता।

अतः मनुष्य को चाहिए कि वह माता-पिता जैसे बनावटी सम्बन्धके लिए शोक न करे, क्योंकि अन्ततः इसका नियंत्रण परमेश्वर के हाथों में रहता है।

वयं च त्वं च ये चेमे तुल्यकालाश्चराचरा: ।

जन्ममृत्योर्यथा पश्चात्प्राइनेवमधुनापि भो: ॥

५॥

वयम्‌--हम ( बड़े-बड़े साधु तथा मंत्री एवं राजा के अनुयायी ); च--तथा; त्वम्‌ू--तुम; च-- भी; ये--जो; च-- भी;इमे--ये; तुल्य-काला:--समकालीन; चर-अचरा:--समस्त स्थावर तथा जंगम; जन्म--जन्म; मृत्यो: --( तथा ) मृत्यु;यथा--जिस प्रकार; पश्चात्‌--बाद में; प्राकु--पहले; न--नहीं; एवम्‌--इस प्रकार; अधुना--इस समय; अपि--यद्यपि;भो:--हे राजन

हे राजन्‌! तुम तथा हम अर्थात्‌ तुम्हारे परामर्शदाता, पत्ियाँ एवं मंत्री और समस्त सम्पूर्णजगत में इस समय जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे सभी क्षणभंगुर हैं।

यह स्थिति न तोहमारे जन्म के पूर्व थी और न हमारी मृत्यु के पश्चात्‌ रहेगी।

अत: इस समय हमारी स्थितिक्षणिक ( अस्थायी ) है, यद्यपि वह मिथ्या नहीं है।

भूतैर्भूतानि भूतेश: सृजत्यवति हन्ति च ।

आत्मसूष्टैरस्वतन्त्रैरनपेक्षोपि बालवत्‌ ॥

६॥

भूतैः--कुछ जीवों से; भूतानि--अन्य जीवात्माओं को; भूत-ईश:ः--सबके स्वामी, श्रीभगवान्‌; सृजति--उत्पन्न करता है;अवति--पालन करता है; हन्ति--मारता है; च-- भी; आत्म-सूष्टे:--अपने द्वारा उत्पन्न; अस्वतन्त्रै:--पराधीन; अनपेक्ष:--( सृष्टि में ) न रुचि रखने से; अपि--यद्यपि; बाल-वत्‌--बालक के समान।

सबों के स्वामी तथा प्रत्येक वस्तु के मालिक पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ निश्चय ही क्षणिकहए्य जगत में तनिक भी रुचि नहीं रखते।

तो भी जिस प्रकार समुद्र के किनारे पर बैठा हुआबालक अनचाही किसी न किसी वस्तु (घरौंदा ) को बनाता है उसी प्रकार से भगवान्‌ प्रत्येक वस्तु को अपने वश में रखते हुए सृजन, पालन तथा संहार का कार्य करते रहते हैं।

वेपिता से पुत्र उत्पन्न कराकर सृष्टि करते हैं, प्रजा के कल्याण हेतु सरकार या राजा नियुक्तकरके पालन करते हैं तथा सर्प जैसे माध्यमों से संहार करते हैं।

सृजन, पालन तथासंहारकर्ता माध्यमों की कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं होती, किन्तु माया के सम्मोहन से वे अपनेको कर्त्ता, पालक तथा संहारक मान बैठते हैं।

देहेन देहिनो राजन्देहाहेहोडभिजायते ।

बीजादेव यथा बीजं देह्यर्थ इव शाश्वत: ॥

७॥

देहेन--शरीर से; देहिन:--शरीर ( माता के ) में; राजन्‌ू--हे राजन; देहात्‌--शरीर से ( माता के ); देह:--अन्य शरीर;अभिजायते--उत्पन्न होता है; बीजात्‌ू--एक बीज से; एव--निस्सन्देह; यथा--जिस प्रकार; बीजम्‌--अन्य बीज; देही--भौतिक शरीरधारी मनुष्य; अर्थ:--भौतिक तत्त्व; इब--सहृश; शाश्रत:--शा श्वत

हे राजन्‌! जिस प्रकार एक बीज से दूसरा बीज उत्पन्न होता है, उसी प्रकार एक शरीर(पिता के शरीर ) द्वारा अन्य ( माता के ) शरीर के माध्यम से एक तीसरा ( पुत्र का ) शरीरउत्पन्न होता है।

जैसे भौतिक शरीर के तत्त्व नित्य हैं, वैसे ही इन भौतिक तत्त्वों से प्रकट होनेवाली जीवात्मा भी नित्य है।

देहदेहिविभागोयमविवेककृतः पुरा ।

जातिव्यक्तिविभागोयं यथा वस्तुनि कल्पितः ॥

८॥

देह--इस शरीर का; देहि--तथा शरीर धारण करनेवाला; विभाग:--विभाजन; अयमू--यह; अविवेक--अविद्या से;कृतः--निर्मित; पुरा--अनादि काल से; जाति--वर्ण या जाति; व्यक्ति--तथा व्यक्ति का; विभाग:--विभाजन; अयमू--यह; यथा--जिस प्रकार; वस्तुनि--आदि वस्तु में; कल्पित:--कल्पना किया हुआ

राष्ट्रीयता तथा व्यक्तिगत सत्ता जैसे सामान्य तथा विशिष्ट विभाजन उन व्यक्तियों कीकल्पनाएँ हैं, जो उन्नत ज्ञानी नहीं हैं।

श्रीशुक उबाचएवमाश्चवासितो राजा चित्रकेतुद्धिजोक्तिभि: ।

विमृज्य पाणिना वक्त्रमाधिम्लानमभाषत ॥

९॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; आश्वासित:--आश्चवासन दिये जाने पर, समझाने -बुझाने पर; राजा--राजा; चित्रकेतु:--चित्रकेतु ने; द्विज-उक्तिभि: --( नारद तथा अंगिरा जैसे ) ब्राह्मणों के उपदेश से;विमृज्य--पोंछ कर; पाणिना--हाथ से; वकक्‍्त्रम्‌ू--मुख; आधि-म्लानमू--शोक के कारण मुरझझाया; अभाषत--बुद्धिमानीके साथ कहा

श्री शुकदेव गोस्वामी आगे बोले--नारद तथा अंगिरा द्वारा इस प्रकार समझाये-बुझायेजाने पर राजा चित्रकेतु को ज्ञान के कारण आशा बँधी।

राजा अपने हाथ से अपना मुरझायामुखमण्डल पोंछते हुए कहने लगा।

श्रीराजोबाचकौ युवां ज्ञानसम्पन्नौ महिष्ठी च महीयसाम्‌ ।

अवधूतेन वेषेण गूढाविह समागतौ ॥

१०॥

श्री-राजा उवाच--राजा चित्रकेतु बोला; कौ--कौन; युवाम्‌--तुम दोनों; ज्ञान-सम्पन्नौ--ज्ञान से पूर्ण; महिष्ठौ --सर्व श्रेष्ठ;च--भी; महीयसाम्‌--अन्य महापुरुषों में; अवधूतेन-- अवधूत के; वेषेण--वेष में; गूढौ--छिपे हुए; इह--इस स्थान पर;समागतौ--आये हुए।

राजा चित्रकेतु ने कहा--आप दोनों अपनी पहचान को छुपाए हुए अवधूत वेश में यहाँ आये हैं, किन्तु मैं देख रहा हूँ कि सभी पुरुषों में आप दोनों परम ज्ञानवान्‌ हैं।

आप सब कुछजानते हैं, अतः समस्त महापुरुषों से भी आप महान हैं।

चरन्ति हावनौ काम ब्राह्मणा भगवत्प्रिया: ।

माहशां ग्राम्यबुद्धीनां बोधायोन्मत्तलिड्रिन: ॥

११॥

चरन्ति--विचरण करते हैं; हि--निस्सन्देह; अवनौ--पृथ्वी पर; कामम्‌--इच्छानुसार; ब्राह्मणा: --ब्राह्मण; भगवत्‌-प्रिया:-- श्री भगवान्‌ के अत्यन्त प्रिय, वैष्णव भी; मा-हशाम्‌--मुझ जैसे; ग्राम्य-बुद्धीनामू-- क्षणिक भौतिक चेतना सेग्रस्त; बोधाय--उपदेश करने के लिए; उन्मत्त-लिड्डिन:--प्रमत्त का-सा वेष बनाये हुए |

श्रीकृष्ण के सर्वाधिक प्रिय सेवक, ब्राह्मणजन, जो वैष्णव पद को प्राप्त हैं, कभी-कभी अवधूतों जैसा वेष बना लेते हैं और हम जैसे भौतिकतावादियों को, जो इन्द्रियतृप्ति मेंसदेव आसक्त रहते हैं, लाभ पहुँचाने एवं उनकी अविद्या दूर करने के लिए अपनीइच्छानुसार भूमण्डल पर विचरण करते रहते हैं।

कुमारो नारद ऋभुरड्रिरा देवलोडसितः ।

अपान्तरतमा व्यासो मार्कण्डेयोथ गौतम: ॥

१२॥

वसिष्ठो भगवात्राम: कपिलो बादरायणि: ।

दुर्वासा याज्ञवल्क्यश्व जातुकर्णस्तथारुणि: ॥

१३॥

रोमशश्च्यवनो दत्त आसुरि: सपतझ्जलि: ।

ऋषिवेंदशिरा धौम्यो मुनि: पञ्णञशिखस्तथा ॥

१४॥

हिरण्यनाभ: कौशल्य: श्रुददेव ऋतध्वज: ।

एते परे च सिद्धेशा श्वरन्ति ज्ञान तव: ॥

१५॥

कुमार:--सनत्कुमार; नारद:--नारद मुनि; ऋभु: --ऋभु ; अद्धिरा:--अंगिरा; देवल:--देवल; असित:--असित;अपान्तरतमा:--अपान्तरतमा, व्यास का पहिले का नाम; व्यास:--व्यास; मार्कण्डेय:--मार्कण्डेय; अथ--तथा;गौतम:--गौतम; वसिष्ठ:--वसिष्ठ; भगवान्‌ राम:--परशुराम; कपिल: -- कपिल; बादरायणि: --शुकदेव गोस्वामी;दुर्वासा:--दुर्वासा; याज्ञवल्क्य:--याज्ञवाल्क्य; च--भी; जातुकर्ण:--जातुकर्ण; तथा-- और; अरुणि:--अरुणि;रोमश:--रोमश; च्यवन:--च्यवन; दत्त: --दत्तात्रेय; आसुरि: -- आसुरि; स-पतञ्जञलि:-- पतंजलि ऋषि समेत; ऋषि: --ऋषि; वेद-शिरा:--वेदों का प्रमुख; धौम्य:--धौम्य; मुनि:--मुनि; पञ्णञशिख:--पंचशिख; तथा-- और; हिरण्यनाभ: --हिरण्यनाभ; कौशल्य: --कौशल्य; श्रुतदेव:-- श्रुतदेव; ऋतध्वज: --ऋतध्वज; एते--ये सभी; परे--- अन्य; च--तथा;सिद्ध-ईशा: --योगे श्वर; चरन्ति--विचरण करते हैं; ज्ञान-हेतवः--अत्यन्त विद्वान पुरुष जो सारे संसार में उपदेश देते हैं।

हे महात्माओ! मैंने सुना है कि अविद्या से ग्रस्त मनुष्यों को ज्ञान का उपदेश देने के लिएभूमण्डल-भर में जो महापुरुष विचरण करते रहते हैं उनमें सनत्‌ कुमार, नारद, ऋशभु,अंगिरा, देवल, असित, अपान्तरतमा (व्यासदेव ), मार्कण्डेय, गौतम, वसिष्ठ, भगवान्‌परशुराम, कपिल, शुकदेव, दुर्वासा, याज्ञवल्क्य, जातुकर्ण तथा अरुणि हैं।

अन्यों के नामइस प्रकार हैं--रोमश, च्यवन, दत्तात्रेय, आसुरि, पतंजलि, वेदों के प्रधान परम साधु धौम्य,पंचशिख, हिरण्यनाभ, कौशल्य, श्रुतदेव तथा ऋतध्वज।

आप अवश्य ही इनमें से हैं।

तस्माद्ुवां ग्राम्यपशोर्मम मूढधिय: प्रभू ।

अन्धे तमसि मग्नस्य ज्ञानदीप उदीर्यताम्‌ ॥

१६॥

तस्मात्‌--अतः ; युवाम्‌--आप दोनों; ग्राम्य-पशो: --शूकर या कूकर जैसे पशु का; मम--मुझे; मूढ-धिय:--अत्यन्तमूर्ख; प्रभू--हे दोनों स्वामियो; अन्धे--गहरे; तमसि--अंधकार में; मग्नस्थ--मग्न रहने वाले का; ज्ञान-दीप:--ज्ञान काप्रकाश; उदीर्यताम्‌--प्रकाशित कीजिये।

चूंकि आप दोनों महापुरुष हैं, अतः मुझे वास्तविक ज्ञान देने में समर्थ हैं।

मैं अविद्या केअंधकार में डूबा रहने के कारण शूकर अथवा कूकर जैसे ग्राम्य पशु के समान मूढ़ हूँ।

अतःमुझे उबारने के लिए ज्ञान का दीपक प्रज्वलित करें।

श्रीअड़िरा उवाचअहं ते पुत्रकामस्य पुत्रदोस्म्यड्धिरा नृप ।

एप ब्रह्मससुतः साक्षान्नारदो भगवानृषिः ॥

१७॥

श्री-अड्वभिरा: उवाच--अंगिरा ऋषि बोले; अहम्‌--मैं; ते--तुमको; पुत्र-कामस्य--पुत्र की कामना करने वाले; पुत्र-दः--पुत्र देने वाला; अस्मि--हूँ; अड्भिरा:--अंगिरा ऋषि; नृप--हे राजन; एब:--यह; ब्रह्म-सुत:-- भगवान्‌ ब्रह्मा का पुत्र;साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; नारद:--नारद मुनि; भगवान्‌--अत्यन्त शक्तिमान; ऋषि:--साधु।

अंगिरा ने कहा--हे राजन्‌! जब तुमने पुत्र की कामना की थी तो मैं तुम्हारे पास आयाथा।

दरअसल वही अंगिरा ऋषि हूँ जिसने तुम्हें यह पुत्र दिया था।

ये जो तुम्हारे पास हैं,भगवान्‌ ब्रह्मा के प्रत्यक्ष पुत्र, महान्‌ ऋषि नारद हैं।

इत्थं त्वां पुत्रशोकेन मग्नं तमसि दुस्तरे ।

अतदर्हमनुस्मृत्य महापुरुषगोचरम्‌ ॥

१८॥

अनुग्रहाय भवत: प्राप्तावावामिह प्रभो ।

ब्रह्मण्यो भगवद्धक्तो नावासादितुमहसि ॥

१९॥

इत्थम्‌--इस प्रकार; त्वामू--तुमको; पुत्र-शोकेन--अपने पुत्र के शोक के कारण; मग्नम्‌ू--डूबे हुए; तमसि-- अंधकारमें; दुस्तरे--न पार कर सकने योग्य; अ-तत्‌-अर्हम्‌-तुम जैसे पुरुष के लिए उपयुक्त नहीं है; अनुस्मृत्य--स्मरण करने के;महा-पुरुष-- श्री भगवान्‌; गोचरम्‌--जो ज्ञानसम्पन्न हैं; अनुग्रहाय--अनुग्रह करने के लिए; भवत:--आपके ऊपर;प्राप्ती--आये हैं; आवाम्‌--हम दोनों; इह--इस स्थान पर; प्रभो--हे राजन्‌; ब्रह्मण्य:--जो परम सत्य को प्राप्त हैं;भगवत्‌-भक्त:-- श्रीभगवान्‌ का उच्च भक्त; न--नहीं; अवासादितुम्‌--शोक करने के; अ्हसि--योग्य हो

हे राजन! तुम पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ के परम भक्त हो।

किसी भौतिक वस्तु की हानिके लिए इस प्रकार शोक करना तुम्हारे लिए उपयुक्त नहीं है।

अत: हम दोनों तुम्हें इस मिथ्याशोक से उबारने के लिए आये हैं, जो आप के अविद्या के अंधकार में डूबे रहने के कारणउत्पन्न है।

जो आध्यात्मिक ज्ञान से सम्पन्न हैं उनके लिए इस प्रकार से भौतिक लाभ तथाहानि से प्रभावित होना बिल्कुल अवांछनीय है।

तदैव ते परं ज्ञानं ददामि गृहमागतः ।

ज्ञात्वान्याभिनिवेशं ते पुत्रमेव ददाम्यहम्‌ ॥

२०॥

तदा--तब; एव--निस्सन्देह; ते--तुमको; परम्‌ू--दिव्य; ज्ञानम्‌--ज्ञान; ददामि--दिया होता; गृहम्‌--तुम्हारे घर पर;आगतः --आया था; ज्ञात्वा--जानकर; अन्य-अभिनिवेशम्‌--अन्य बातों में उलझा हुआ; ते--तुम्हारा; पुत्रम्‌ू--पुत्र;एव--केवल; ददामि--दिया; अहम्‌-मैंने

जिस समय पहले-पहल मैं तुम्हारे घर आया था, उसी समय मैं तुम्हें परम दिव्य ज्ञानदेता, किन्तु जब मैंने देखा कि तुम्हारा मन भौतिक वस्तुओं में उलझा हुआ है, तो मैंने तुम्हेंकेवल एक पुत्र प्रदान किया जो तुम्हारे हर्ष और शोक का कारण बना।

अधुना पुत्रिणां तापो भवतैवानुभूयते ।

एवं दारा गृहा रायो विविधैश्वर्यसम्पदः ॥

२१॥

शब्दादयश्च विषयाश्चला राज्यविभूतय: ।

मही राज्यं बल॑ कोषो भृत्यामात्यसुहज्जना: ॥

२२॥

सर्वेडपि शूरसेनेमे शोकमोहभयार्तिदा: ।

गन्धर्वनगरप्रख्या: स्वप्नमायामनोरथा: ॥

२३॥

अधुना--इस समय; पुत्रिणाम्‌ू--पुत्रवानों को; ताप:--कष्ट; भवता--आपके द्वारा; एब--निस्सन्देह; अनुभूयते-- अनुभवकिया जाता है; एवम्‌--इस प्रकार; दारा:--सुपती; गृहा:--घर; राय:-- धन; विविध--नाना प्रकार के; ऐश्वर्य--ऐश्वर्य;सम्पदः--सम्पत्ति; शब्द-आदय: --शब्द इत्यादि; च--तथा; विषया: --इन्द्रियतृप्ति की वस्तुएँ; चला:--क्षणिक;राज्य--राज्य का; विभूतय:--ऐश्वर्य; मही--पृथ्वी; राज्यम्‌ू--राज्य; बलमू--बल; कोष: -- खजाना; भृत्य--नौकर;अमात्य--मंत्री; सुहृत्‌-जना:--मित्र; सर्वे--सभी; अपि--निस्सन्देह; शूरसेन--हे शूरसेन के राजा; इमे--ये; शोक--शोक का; मोह--मोह का; भय-- भय का; अर्ति--तथा दुख; दाः--देने वाले; गन्धर्व-नगर-प्रख्या:--गंधर्व नगर(जंगल के मध्य एक बड़ा महल ) की माया-६ृष्टि से प्रेरित; स्वप्न--स्वप्न; माया--माया; मनोरथा:--तथा कल्पनाएँ

हे राजन्‌! अब तुम्हें ऐसे व्यक्ति के कष्ट का वास्तविक अनुभव हो रहा है, जिसके पुत्रतथा पुत्रियाँ होती हैं।

हे सूरसेन देश के राजा! पत्नी, घर, राज्य का ऐश्वर्य, अन्य सम्पत्ति तथाइन्द्रिय अनुभूति के विषय--ये सब इस बात में एक-से हैं, कि वे अनित्य हैं।

राज्य, सैनिक,शक्ति, कोष, नौकर, मंत्री, मित्र तथा सम्बन्धी--ये सभी भय, मोह, शोक तथा दुख केकारण हैं।

ये गंधर्व-नगर की भाँति हैं, जिसे जंगल के बीच स्थित समझा जाता है, किन्तुजिसका अस्तित्व नहीं होता।

चूँकि ये सब वस्तुएँ अनित्य हैं, अतः ये मोह, स्वप्न तथामनोरथों से श्रेष्ठ नहीं हैं।

हृश्यमाना विनार्थेन न दृश्यन्ते मनोभवा: ।

कर्मभिर्ध्यायतो नानाकर्माणि मनसोभवन्‌ ॥

२४॥

हृश्यमाना: --देखे जाकर; विना--रहित, बिना; अर्थेन--वस्तु या सच्चाई; न--नहीं; दृश्यन्ते--देखे जाते हैं; मनोभवा:--मनोरथ; कर्मभि:--सकाम कर्म के द्वारा; ध्यायत:ः--चिन्तन करते हुए; नाना--विविध, अनेक; कर्माणि--सकाम कर्म;मनसः--मन से; अभवनू-प्रकट होते हैं।

स्त्री, संतान तथा सम्पत्ति जैसी दृश्य वस्तुएँ स्वप्न एवं मनोरथों के तुल्य हैं।

वास्तव मेंहम जो कुछ देखते हैं उसका स्थायी अस्तित्व नहीं होता है।

वे कभी दिखती हैं, तो कभीनहीं।

अपने पूर्वकर्मों के अनुसार हम मनोरथ का सृजन करते हैं और इन्हीं के कारण हमआगे कार्य करते हैं।

अयं हि देहिनो देहो द्र॒व्यज्ञानक्रियात्मक: ।

देहिनो विविधक्लेशसन्तापकृदुदाहत: ॥

२५॥

अयम्‌--यह; हि--निश्चय ही; देहिन:--जीवात्मा का; देह:--शरीर; द्रव्य-ज्ञान-क्रिया-आत्मक:--भौतिक तत्त्वों,ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों समेत; देहिन:--जीवात्मा का; विविध--नाना प्रकार का; क्लेश--कष्ट; सन्‍्ताप--तथा पीड़ाका; कृतू--कारण; उदाहत:--घोषित किया जाता है |

देहात्मबुद्धि के कारण जीवात्मा अपने शरीर में, जो भौतिक तत्त्वों, पाँच ज्ञानेन्द्रियों तथामन समेत पाँच कर्मेन्द्रियों का संपुंज है, मग्न रहता है।

मन के कारण जीवात्मा को तीनप्रकार के--अधिभौतिक, अधिदेविक तथा अध्यात्मिक-ताप सहने पड़ते हैं।

अतः यह शरीरसमस्त दुखों का मूल है।

तस्मात्स्वस्थेन मनसा विमृश्य गतिमात्मन: ।

दवैते ध्रुवार्थविश्रम्भं त्यजोपशममाविश ॥

२६॥

तस्मात्‌ू--अतः ; स्वस्थेन-- स्वस्थ, सतर्क; मनसा--मन से; विमृश्य--विचार करके; गतिम्‌--वास्तविक स्थिति;आत्मन:--अपनी; द्वैते--द्वैत में; शुव--स्थायी; अर्थ--वस्तु; विश्रम्भम्‌--विश्वास; त्यज--छोड़ दो; उपशमम्‌--शान्तिपूर्ण स्थिति; आविश--ग्रहण करो

अतः हे चित्रकेतु! आत्मा की स्थिति पर ठीक से विचार करो अर्थात्‌ यह समझने काप्रयत्त करो कि तुम कौन हो--शरीर, मन, या आत्मा?

यह विचार करो कि तुम कहाँ सेआये हो, यह शरीर छोड़कर कहाँ जाओगे और तुम भौतिक शोक के वश में क्यों हो ?

इसप्रकार तुम अपनी वास्तविक स्थिति जानने का यत्न करो, तभी तुम अनावश्यक आसक्ति सेछुटकारा पा सकोगे।

तब तुम इस विश्वास का भी परित्याग कर सकोगे कि यह भौतिक जगत या अन्य कोई वस्तु जिसका श्रीकृष्ण की सेवा से सीधा सम्बन्ध नहीं है, शाश्वत है।

इस तरह तुम्हें शान्ति प्राप्ति हो सकेगी।

श्रीनारद उवाचएतां मन्त्रोपनिषदं प्रतीच्छ प्रयतो मम ।

यां धारयन्सप्तरात्राद्द्रष्टा सड्डर्षणं विभुम्‌ ॥

२७॥

श्री-नारद:ः उवाच-- श्री नारद मुनि ने कहा; एताम्‌--यह; मन्त्र-उपनिषदम्‌--मंत्र के रूप में उपनिषद्‌ जिससे जीवन काउच्चादर्श प्राप्त किया जा सकता है; प्रतीच्छ--स्वीकार करो; प्रयतः--सावधानीपूर्वक ( मृत पुत्र का दाह संस्कार करने केपश्चात्‌ ); मम--मुझसे; याम्‌ू--जो; धारयन्‌--स्वीकार करके; सप्त-रात्रातू-सात रात्रियों के बाद; द्रष्टा--तुम देखोगे;सड्डर्षणम्‌--संकर्षण, श्रीभगवान्‌; विभुम्‌-- भगवान्‌ को |

नारद मुनि ने आगे कहा--हे राजन! तुम एकाग्रचित्त होकर मुझसे अत्यन्त शुभ मंत्रग्रहण करो।

इसे स्वीकार कर लेने के बाद सात रातों में ही तुम साक्षात्‌ भगवान्‌ का दर्शनकर सकोगे।

यत्पादमूलमुपसृत्य नरेन्द्र पूर्वशर्वादयो भ्रममिमं द्वितयं विसृज्य ।

सद्यस्तदीयमतुलानधिकं महित्वंप्रापुर्भवानपि परं न चिरादुपैति ॥

२८ ॥

यत्‌-पाद-मूलम्‌--जिनके ( भगवान्‌ संकर्षण के ) चरणकमल; उपसृत्य--शरण लेकर; नर-इन्द्र--हे राजन्‌; पूर्वे--प्राचीन काल में; शर्ब-आदय: -- भगवान्‌ महादेव जैसे बड़े-बड़े देवता; भ्रमम्‌--मोह; इमम्‌--यह; द्वितयम्‌--द्वैत भाव;विसृज्य--त्याग कर; सद्यः--तुरन्‍्त; तदीयम्‌--उसका; अतुल--अद्वितीय; अनधिकम्‌--अलंघ्य; महित्वमू--यश;प्रापु:--प्राप्त किया; भवान्‌--आप; अपि-- भी; परमू--परम धाम; न--नहीं; चिरातू--बहुत काल बाद; उपैति--प्राप्तकर लोगे

हे राजन! प्राचीनकाल में भगवान्‌ शिव तथा अन्य देवताओं ने संकर्षण के चरणारविन्दकी शरण ली थी।

इस प्रकार वे द्वैत-मोह से तुरन्त मुक्त हो गये और उन्होंने आध्यात्मिकजीवन में अद्वितीय तथा अलंघ्य यश प्राप्त किया।

तुम शीघ्र ठीक वैसा ही पद प्राप्त करोगे।

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