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अध्याय चौदह: राजा चित्रकेतु का विलाप

6.14श्रीपरीक्षिदुवाचरजस्तमःस्वभावस्य ब्रह्मन्वृत्रस्थ पाप्मन: ।

नारायणे भगवति कथमासीहूढा मतिः ॥

१॥

श्री-परीक्षित्‌ उवाच--राजा परीक्षित ने पूछा; रज:--रजोगुण; तम:--तमोगुण; स्व-भावस्य--स्वभाव वाला; ब्रह्मनू-हेविद्वान ब्राह्मण; वृत्रस्थ--वृत्रासुर का; पाप्मन:--जो पापी था; नारायणे-- भगवान्‌ नारायण में; भगवति--श्री भगवान्‌;कथम्‌-किस प्रकार; आसीतू-- थी; हृढा--अत्यन्त हृढ़; मति:ः--चेतना, भक्ति |

राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा--हे विद्वान ब्राह्मण! रजो तथा तमो गुणों सेआविष्ट होने के कारण असुर सामान्यतः पापी होते हैं।

तो फिर वृत्रासुर भगवान्‌ नारायण केप्रति इतना परम प्रेम किस प्रकार प्राप्त कर सका ?

देवानां शुद्धसत्त्वानामृषीणां चामलात्मनाम्‌ ।

भक्तिर्मुकुन्दचरणे न प्रायेणोपजायते ॥

२॥

देवानाम्‌ू-देवताओं का; शुद्ध-सत्त्वानामू--जिनके मन विमल हैं; ऋषीणाम्‌--महान्‌ साधु पुरुषों के; च--तथा; अमल-आत्मनाम्‌--जिन्होंने अपने जन्म को पवित्र कर लिया है; भक्ति:-- भक्ति; मुकुन्द-चरणे--मुक्तिदायक भगवान्‌ मुकुन्द केचरण कमलों में; न--नहीं; प्रायेण--प्राय:; उपजायते--उपजती हैबढ़ती है

प्राय: सत्त्वमय देवता तथा भौतिक सुख-रूपी रज से निष्कलंक ऋषि अत्यन्त कठिनाईसे मुकुन्द के चरण-कमलों की शुद्ध भक्ति कर पाते हैं।

[तो फिर वृत्रासुर इतना बड़ा भक्तकिस प्रकार बन सका ?

रजोभि: समसड्ख्याता: पार्थिवैरिह जन्तवः ।

तेषां ये केचनेहन्ते श्रेयो वै मनुजादय: ॥

३॥

रजोभि:--कणों से; सम-सड्ख्याता:--समान संख्या में; पार्थिवै: -- पृथ्वी के; इहह--इस संसार में; जन्तव:--जीवात्माएँ;तेषाम्‌--उनकी; ये--जो; केचन-- कुछ; ईहन्ते--कार्य करते हैं; श्रेय:--धधार्मिक सिद्धान्तों के लिए; बै--निस्सन्देह;मनुज-आदय: --मनुष्य इत्यादि

इस भौतिक जगत में जीवात्माओं की संख्या उतनी ही है जितने कि धूल कण।

इनजीवात्माओं में से कुछ ही मनुष्य होते हैं और उनमें से कुछ ही धार्मिक नियमों के पालन मेंरुचि दिखलाते हैं।

प्रायो मुमुक्षवस्तेषां केचनैव द्विजोत्तम ।

मुमुक्षूणां सहस्त्रेषु कश्निन्मुच्येत सिध्यति ॥

४॥

प्रायः--प्रायः, लगभग सदा; मुमुक्षवः--मुक्ति के इच्छुक लोग; तेषामू--उनका; केचन--कुछ; एव--निस्सन्देह; द्विज-उत्तम-हे ब्राह्मण श्रेष्ठ; मुमुक्षूणाम्‌--मुक्ति पाने के इच्छुक लोगों का; सहस्त्रेषु--हजारों में से; कश्चित्‌--कोई एक;मुच्येत--वास्तव में मुक्ति लाभ करता है; सिध्यति--सिद्ध ( पूर्ण ) होता हैब्राह्मण- श्रेष्ठ

हे शुकदेव गोस्वामी! धार्मिक नियमों का पालन करने वाले अनेक मनुष्योंमें से कुछ ही भौतिक जगत से मुक्ति पाने क

े इच्छुक रहते हैं।

मुक्ति चाहने वाले हजारों में सेकिसी एक को वास्तव में मुक्ति-लाभ होता है और वह समाज, मित्रता, प्यार, देश, घर, स्त्रीतथा सन्‍्तान के प्रति अपनी आसक्ति का परित्याग कर पाता है।

ऐसे हजारों मुक्त पुरुषों में सेमुक्ति का वास्तविक अर्थ जानने वाला कोई विरला ही होता है।

मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायण: ।

सुदुर्लभ: प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने ॥

५॥

मुक्तानामू--मुक्त पुरुषों में से; अपि-- भी; सिद्धानाम्‌--सिद्ध पुरुषों में से; नारायण-परायण:--ऐसा मनुष्य जिसने यहनिष्कर्ष निकाला है कि नारायण हैं; सु-दुर्लभ:--अत्यन्त दुर्लभ है, कठिनाई से प्राप्त होता है; प्रशान्त--परम शान्त;आत्मा--जिसका मन; कोटिषु--करोड़ों में से; अपि-- भी; महा-मुने--हे परम साथु!

हे परम साधु! लाखों मुक्त तथा मुक्ति के ज्ञान में पूर्ण पुरुषों में से कोई एक भगवान्‌नारायण अथवा कृष्ण का भक्त हो सकता है।

ऐसे भक्त, जो परम शान्त हों, अत्यन्त दुर्लभहैं।

text:वृत्रस्तु स कथं पाप: सर्वलोकोपतापन: ।

इत्थं दढमति: कृष्ण आसीत्सड्ग्राम उल्बणे ॥

६॥

वृत्र:--वृत्रासुर; तु--लेकिन; सः--वह; कथम्‌--किस प्रकार; पाप:--( आसुरी शरीर प्राप्त करने में ) यद्यपि पापी; सर्व-लोक--तीनों लोकों का; उपतापन:--कष्ट का कारण; इत्थम्‌--ऐसा; हृढ-मति:--हढ़ बुर्द्धि; कृष्णे--कृष्ण में; आसीत्‌--था; सड्य़्ामे उल्बणे--युद्ध की ज्वाला में वृत्रासुर

युद्ध की धधकती ज्वाला में स्थित था और पापी असुर अन्यों को सदैव कष्ट तथा चिन्ता पहुँचाने के लिए कुख्यात था।

ऐसा असुर किस प्रकार इतना बड़ा कृष्ण भक्त हो सका?

सका अत्र नः संशयो भूयाञ्छोतुं कौतूहलं प्रभो ।

यः पौरुषेण समरे सहस्त्राक्षमतोषयत्‌ ॥

७॥

अत्र--इस सम्बन्ध में; न:ः--हमारा; संशय:--सन्देह; भूयान्‌ू-- अत्यधिक; श्रोतुम्‌--सुनने के लिए; कौतूहलम्‌--उत्कंठा,कुतूहल; प्रभो--हे प्रभो; यः--जो; पौरुषेण--पराक्रम से; समरे--युद्ध में ; सहस्त्र-अक्षम्‌--जिनके एक हजार नेत्र हैं,भगवान्‌ इन्द्र को; अतोषयत्‌--सन्तुष्ट किया, प्रसन्न कर लिया।

हे प्रभो, शुकदेव गोस्वामी! यद्यपि वृत्रासुर पापी असुर था, किन्तु उसने सर्वाधिक उन्नतक्षत्रिय का पराक्रम दिखाकर युद्ध में इन्द्र को प्रसन्न कर लिया।

ऐसा असुर भगवान्‌ कृष्णका महान्‌ भक्त क्योंकर हो सका ?

इन विरोधी बातों से मेरे मन में अत्यधिक सन्देह उत्पन्न होगया है, अतः मैं इस सम्बन्ध में आपसे सुनने के लिए अत्यधिक उत्सुक हूँ।

श्रीसूत उबाचपरीक्षितोथ सम्प्रश्नं भगवान्बादरायणि: ।

निशम्य श्रद्धानस्य प्रतिनन्द्य वचोब्रवीत्‌ ॥

८ ॥

श्री-सूतः उवाच-- श्री सूत गोस्वामी ने कहा; परीक्षित:--महाराज परीक्षित का; अथ--इस प्रकार; सम्प्रश्नम्‌-- श्रेष्ठ प्रश्न;भगवान्‌--अत्यन्त शक्तिशाली; बादरायणि: --व्यासदेव के पुत्र शुकदेव गोस्वामी; निशम्य--सुनकर; श्रदधानस्य-- अपनेश्रद्धालु शिष्य का; प्रतिनन्‍्द्य--अभिनन्दन करते हुए; वच:--शब्द; अब्रवीत्‌--बोले |

श्री सूत गोस्वामी ने कहा--महाराज परीक्षित के इस उत्तम प्रश्न को सुनकर परमशक्तिमान ऋषि शुकदेव गोस्वामी अपने शिष्य को अत्यन्त प्रेमपूर्वक उत्तर देने लगे।

श्रीशुक उबाचश्रुणुष्वावहितो राजन्नितिहासमिमं यथा ।

श्रुतं द्वैपायनमुखान्नारदाद्ेवलादपि ॥

९॥

श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; श्रृणुष्व--सुनो; अवहितः--अत्यन्त ध्यान से; राजन्‌--हे राजा;इतिहासम्‌--इतिहास को; इमम्‌ू--इस; यथा--जिस प्रकार; श्रुतम्‌--सुना हुआ; द्वैषायन--व्यासदेव के; मुखात्‌--मुँह से;नारदात्‌ू--नारद से; देवलात्‌ू--देवल ऋषि से; अपि-- भी

श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा--हे राजन्‌! मैं उस इतिहास को तुमसे कहूँगा जिसे मैंनेव्यासदेव, नारद तथा देवल के मुखों से सुना है।

इसे ध्यानपूर्वक सुनो।

आसीढ्राजा सार्वभौम: शूरसेनेषु वै नृप ।

चित्रकेतुरिति ख्यातो यस्यासीत्कामधुड्मही ॥

१०॥

आसीत्‌--था; राजा--एक राजा; सार्व-भौम:--चक्रवर्ती राजा; शूरसेनेषु--शूरसेन नामक देश में; बै--निस्सन्देह; नूप--है राजन; चित्रकेतु:--चित्रकेतु; इति--इस प्रकार; ख्यात:--विख्यात; यस्य--जिसकी; आसीत्‌-- थी; काम-धुक्‌--समस्त आवश्यकताओं को प्रदान करने वाली; मही--पृथ्वी |

हे राजा परीक्षित! शूरसेन प्रदेश में चित्रकेतु नाम का एक चक्रवर्ती राजा था।

उसकेराज्य में पृथ्वी से जीवन की समस्त आवश्यक वस्तुएँ उत्पन्न होती थीं।

तस्य भार्यासहस्त्राणां सहस्त्राणि दशाभवन्‌ ।

सान्तानिकश्चापि नूपो न लेभे तासु सन्‍्ततिम्‌ ॥

११॥

तस्थ--उसकी ( चित्रकेतु की ); भार्या--पत्तियों के; सहस्त्राणामू-हजारों; सहस्त्राणि-- हजार; दश--दस; अभवनू--थीं; सान्तानिक:--सन्तान उत्पन्न करने में समर्थ; च--तथा; अपि--यद्यपि; नृप:--राजा; न--नहीं; लेभे--प्राप्त किया;तासु--उनसे; सनन्‍्ततिम्‌-पुत्र |

राजा चित्रकेतु के एक करोड़ पत्नियाँ थीं और यद्यपि वह सन्‍्तान उत्पन्न करने में समर्थ था, किन्तु उनसे उसे कोई सन्तान प्राप्त नहीं हुई।

संयोगवश सभी पत्नियां बाँझ थीं।

रूपौदार्यवयोजन्मविद्यैश्वर्यश्रियादिभि: ।

सम्पन्नस्य गुण: सर्वैश्विन्ता बन्ध्यापतेरभूतू ॥

१२॥

रूप--सुन्दरता; औदार्य --उदारता; वय: --युवावस्था; जन्म--उच्चकुल में जन्म; विद्या--विद्या; ऐश्वर्य--ऐश्वर्य; अ्रिय-आदिभि:--सम्पत्ति आदि से; सम्पन्नस्य--युक्त; गुणै: --गुणों से; सर्वै:--समस्त; चिन्ता--चिन्ता; बन्ध्या-पते: --अनेकबाँझ पत्नियों के पति चित्रकेतु की; अभूत्‌-- थी |

इन करोड़ पत्तियों का पति चित्रकेतु अत्यन्त रूपवान उदार तथा तरुण था।

वह उच्चकुल में उत्पन्न हुआ था, उसे पूर्ण शिक्षा प्राप्त हुई थी और वह सम्पत्तिवान्‌ एवं ऐश्वर्यवान्‌ था।

फिर भी इन समस्त गुणों के होते हुए किन्तु कोई पुत्र न होने से वह अत्यन्त चिन्तायुक्त रहताथा।

न तस्य सम्पद:ः सर्वा महिष्यो वामलोचना: ।

सार्वभौमस्य भूश्वेयमभवन्प्रीतिहितव: ॥

१३॥

न--नहीं; तस्य--उसकी ( चित्रकेतु की ); सम्पद:--अपार ऐश्वर्य; सर्वा:--सभी; महिष्य:--रानियाँ; वाम-लोचना:--अत्यन्त आकर्षक नेत्रों वाली; सार्व-भौमस्थ--महाराज की; भू:--पृथ्वी; च--भी; इयम्‌--यह; अभवनू-- थे; प्रीति-हेतव:--प्रसन्नता के कारण

उनकी सभी रानियाँ सुमुखी एवं आकर्षक नेत्रों वाली थीं, फिर भी न तो उसका ऐश्वर्यतथा सैकड़ों-हजारों रानियाँ, न वे प्रदेश, जिनका वह सर्वोच्च स्वामी था, उसे प्रसन्न करसकते थे।

तस्यैकदा तु भवनमड़िरा भगवानृषि: ।

लोकाननुचरत्नेतानुपागच्छद्यहच्छया ॥

१४॥

तस्य--उसके ; एकदा--एक बार; तु--लेकिन; भवनम्‌--महल में; अड्भिरा:--अंगिरा; भगवान्‌-- अत्यन्त शक्तिशाली;ऋषि:--साथधु; लोकान्‌--लोकों में; अनुचरन्‌--चारों ओर घूमते हुए; एतान्‌--इन; उपागच्छत्‌-- आये; यहच्छया--अचानक

एक बार समस्त ब्रह्माण्ड में विचरण करते हुए अंगिरा नामक शक्तिशाली ऋषिअकस्मात्‌ अपनी शुभेच्छा से राजा चित्रकेतु के महल में पधारे।

तं॑ पूजयित्वा विधिवत्प्रत्युत्थानाईणादिभि: ।

कृतातिथ्यमुपासीदत्सुखासीनं समाहित: ॥

१५॥

तम्‌--उसको; पूजयित्वा--पूजा करके; विधि-वत्‌--उच्च अतिथियों के सत्कार के नियमों के अनुसार विधिपूर्वक;प्रत्युत्थान--सिंहासन से उठकर; अहण-आदिभि:--पूजा आदि के द्वारा; कृत-अतिथ्यम्‌--सत्कार किया जाकर;उपासीदत्‌--निकट आकर बैठ गया; सुख-आसीनम्‌--सुखपूर्वक विराजमान; समाहित:--मन तथा इन्द्रियों को वश मेंकरते हुए।

चित्रकेतु तुरन्त ही अपने सिंहासन से उठकर खड़ा हो गया और उनकी अर्चना की।

उसने जल तथा खाद्य सामग्री भेंट की और इस प्रकार अपने परम अतिथि के प्रति मेजवानका अपना कर्तव्य पूरा किया।

जब अंगिरा ऋषि सुखपूर्वक आसन ग्रहण कर चुके तो राजाअपने मन तथा इन्द्रियों को संयमित करके ऋषि के चरणों के निकट भूमि पर बैठ गया।

महर्षिस्तमुपासीनं प्रश्रयावनतं क्षितौ ।

प्रतिपूज्य महाराज समाभाष्येदमब्रवीत्‌ ॥

१६॥

महा-ऋषि:--परम साधु; तमू--उस ( राजा ) के; उपासीनम्‌--निकट बैठकर; प्रश्रय-अवनतम्‌--विनयवश सिर झुकाकर;क्षितौ--पृथ्वी पर; प्रतिपूज्य--साधुवाद देते हुए; महाराज--हे राजा परीक्षित; समाभाष्य--सम्बोधित करके; इृदम्‌--यह;अब्रवीत्‌ू--कहा |

हे राजा परीक्षित! जब चित्रकेतु विनीत भाव से नत होकर ऋषि के चरण-कमलों केनिकट बैठ गया तो ऋषि ने उसकी विनयशीलता तथा उनके आतिथ्य के लिए साधुवाददिया और उसे निम्नलिखित शब्दों से सम्बोधित किया।

अड़्रा उबाचअपि तेनामयं स्वस्ति प्रकृतीनां तथात्मन: ।

यथा प्रकृतिभिर्गुप्त: पुमात्राजा च सप्तभि: ॥

१७॥

अड्डिराः उवाच--ऋषि अंगिरा ने कहा; अपि--क्या; ते--तुमको; अनामयम्‌--स्वास्थ्य; स्वस्ति--कुशलता;प्रकृतीनामू-- अपनी राज्य-सामग्री का ( पार्षद तथा सामग्री ); तथा--और; आत्मन:--अपने शरीर, मन तथा आत्मा का;यथा--सहश; प्रकृतिभि:--प्रकृति के तत्त्वों से; गुप्त:--आरक्षित; पुमान्‌ू--जीवित प्राणी; राजा--राजा; च-- भी;सप्तभि:--सातसे |

ऋषि अंगिरा ने कहा--हे राजन्‌! आशा है कि तुम अपने शरीर तथा मन और अपनेराज्य-पार्षदों तथा सामग्री सहित कुशल से हो।

जब प्रकृति के सातों गुण [सम्पूर्ण भौतिकशक्ति ( माया ), अहंकार तथा इन्द्रियतृप्ति के पाँचों पदार्थ अपने-अपने क्रम में ठीक रहतेहैं, तो भौतिक तत्त्वों के भीतर जीवात्मा सुखी रहता है।

इन सात तत्त्वों के बिना कोई रहनहीं सकता।

इसी प्रकार राजा सात तत्त्वों द्वारा सदा आरक्षित रहता है।

ये तत्त्व हैं--उसकाउपदेशक (स्वामी या गुरु ), उसके मंत्री, उसका राज्य, उसका दुर्ग, उसका कोष, उसकेराज्याधिकार तथा उसके मित्र।

आत्मानं प्रकृतिष्वद्धा निधाय श्रेय आप्नुयात्‌ ।

राज्ञा तथा प्रकृतयो नरदेवाहिताधय: ॥

१८॥

आत्मानम्‌--स्वयं; प्रकृतिषु--इन सात राजसी तत्त्वों के अन्तर्गत; अद्धघा-प्रत्यक्षत:; निधाय--रखकर; श्रेय:--परमसुख; आप्नुयात्‌--प्राप्त कर सकता है; राज्ञा--राजा के द्वारा; तथा--उसी प्रकार, वैसे ही; प्रकृतयः--प्रकृतियाँ; नर-देव--हे राजन; आहित-अधय:--सम्पत्ति तथा अन्य वस्तुएँ भेंट करके

हे राजन, हे मानवता के ईश! जब राजा अपने पार्षदों पर प्रत्यक्षतः आश्रित रहता है औरउनके आदेशों का पालन करता है, तो वह सुखी रहता है।

इसी प्रकार जब पार्षद राजा कोभेंटें प्रदान करते हैं और उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं, तो वे भी सुखी रहते हैं।

अपि दाराः प्रजामात्या भृत्या: श्रेण्योथ मन्त्रिण: ।

पौरा जानपदा भूपा आत्मजा वशवर्तिन: ॥

१९॥

अपि--क्या; दारा:--पत्याँ; प्रजा--नागरिक जन; अमात्या: --( तथा ) सचिवगण; भृत्या:--सेवक; श्रेण्य: --व्यापारीजन; अथ--तथा; मन्त्रिण: --मन्त्री ( सलाहकार ); पौरा:--महल के वासी; जानपदा: --राज्यपाल; भूषा:--भूमिधर; आत्म-जा:--पुत्र; वश-वर्तिन: --पूरी तरह तुम्हारे वश में ॥

हे राजन! तुम्हारी पत्तियाँ, नागरिक, सचिव तथा सेवक एवं मसाले तथा तेल केविक्रेता व्यापारी तुम्हारे वश में तो हैं?

तुमने अपने मंत्रियों, महल के निवासियों( पुरवासियों ), अपने राज्यपालों, अपने पुत्रों तथा अन्य आश्रितों को अपने नियंत्रण में तोकर रखा है ?

यस्यात्मानुवशश्वैत्स्यात्सवें तद्कशगा इमे ।

लोकाः सपाला यच्छन्ति सर्वे बलिमतन्द्रिता: ॥

२०॥

यस्य--जिसका; आत्मा--मन; अनुवश: --वश में; चेत्‌--यदि; स्यात्‌--हो; सर्वे--समस्त; तत्‌ -वश-गा:--उसकेअधीन; इमे--ये; लोका:--विभिन्न लोक; स-पाला:--पालकों या राज्यपालों सहित; यच्छन्ति--अर्पण करते हैं; सर्वे--समस्त; बलिम्‌--भेंट; अतन्द्रिता:--आलस्य से मुक्त |

यदि राजा का मन अपने वश्ञ में रहता है, तो उसके समस्त पारिवारिक प्राणी एवं राज-अधिकारी उसके अधीन रहते हैं।

उसके प्रान्तपालक ( राज्यपाल ) समय पर अवरोध-रहितकर प्रस्तुत करते हैं, छोटे-छोटे सेवकों की तो कोई बात ही नहीं है।

आत्मन: प्रीयते नात्मा परत: स्वत एवं वा ।

लक्षयेउलब्धकामं त्वां चिन्तया शबलं मुखम्‌ ॥

२१॥

आत्मन:--तुम स्वयं; प्रीयते--सन्तुष्ट हो; न--नहीं; आत्मा--मन; परत:--अन्य कारणों से; स्वत:--अपने कारण; एव--निस्सन्देह; वा--अथवा; लक्षये--मैं देख सकता हूँ; अलब्ध-कामम्‌--अपेक्षित लक्ष्य को न प्राप्त करके; त्वाम्‌ू--तुमको;चिन्तया--चिन्ता के कारण; शबलमू--पीला; मुखम्‌--मुख, चेहरा।

हे राजा चित्रकेतु! मैं देख रहा हूँ कि तुम्हारा मन सन्तुष्ट नहीं है।

ऐसा लगता है तुम्हेंवांच्छित लक्ष्य प्राप्त नहीं हो पाया है।

यह स्वतः तुम्हिरे अपने कारण अथवा अन्य किसीकारण से ऐसा हुआ है ?

तुम्हारे पीले मुख से तुम्हारी गहरी चिन्ता झलकती है।

एवं विकल्पितो राजन्विदुषा मुनिनापि सः ।

प्रश्रयावनतो भ्याह प्रजाकामस्ततो मुनिम्‌ ॥

२२॥

एवम्‌--इस प्रकार; विकल्पित:--पूछे जाने पर; राजन्‌--हे राजा परीक्षित; विदुषघा--परम विद्वान; मुनिना--मुनि( दार्शनिक ) के द्वारा; अपि--यद्यपि; सः--उसत ( राजा चित्रकेतु ) ने; प्रश्रय-अवनत:--विनयवश झुककर; अभ्याह--उत्तर दिया; प्रजा-काम:--पुत्र की इच्छा से; तत:--तत्पश्चात्‌; मुनिमू--मुनि को

शुकदेव गोस्वामी ने कहा--हे राजा परीक्षित! यद्यपि महर्षि अंगिरा को सब कुछ ज्ञातथा फिर भी उन्होंने राजा से इस प्रकार पूछा।

अतः पुत्र के इच्छुक राजा चित्रकेतु अत्यन्तविनीत भाव से नीचे झुक गये और महर्षि से इस प्रकार बोले।

चित्रकेतुरुवाचभगवन्कि न विदितं तपोज्ञानसमाधिभि: ।

योगिनां ध्वस्तपापानां बहिरन्तः शरीरिषु ॥

२३॥

चित्रकेतु: उवाच--राजा चित्रकेतु ने उत्तर दिया; भगवन्‌--हे परम शक्तिशाली साधु; किमू--क्या; न--नहीं ; विदितम्‌--ज्ञात है; तप:--तपस्या; ज्ञान--ज्ञान; समाधिभि: --तथा समाधि से; योगिनाम्‌--महान्‌ योगियों या भक्तों द्वारा; ध्वस्त-पापानाम्‌--समस्त पापकर्मों से पूर्णतया विमुक्त; बहि:--बाहर से; अन्तः--भीतर से; शरीरिषु--बद्धजीवों में, जिनकेभौतिक देह हैं |

राजा चित्रकेतु ने कहा--हे महाप्रभु अंगिरा! तपस्या, ज्ञान तथा दिव्य समाधि से आपपापमय जीवन के समस्त बन्धनों से मुक्त हैं; अतः आप सिद्ध योगी के रूप में हम जैसेबद्धजीवों के अन्दर और बाहर की प्रत्येक बात को जान सकते हैं।

तथापि पृच्छतो ब्रूयां ब्रह्मन्नात्मनि चिन्तितम्‌ ।

भवतो विदुषश्चापि चोदितस्त्वदनुज्ञया ॥

२४॥

तथापि--तो भी; पृच्छत:--पूछने पर; ब्रूयामू--बोलने की आज्ञा दें; ब्रह्मनू--हे परम ब्राह्मण; आत्मनि--मन में;चिन्तितम्‌ू--चिन्ता; भवत:--आपको; विदुष: --सब कुछ जानने वाले, सर्वज्ञ; च--तथा; अपि--यद्यपि; चोदित: --प्रेरित होकर; त्वत्‌--आपकी; अनुज्ञया--आज्ञा से

हे परम आत्मन्‌! आप सब कुछ जानते हैं, तो भी आप मुझसे पूछ रहे हैं कि मैं चिन्ता सेपूर्ण क्‍यों हूँ।

अतः मैं आपकी आज्ञा के प्रत्युत्तर में कारण को प्रकट कर रहा हूँ।

लोकपालैरपि प्रार्थ्या: साम्राज्यैश्वर्यसम्पद: ।

न नन्दयन्त्यप्रज॑ मां क्षुत्तूटूकाममिवापरे ॥

२५॥

लोक-पालै:--बड़े-बड़े देवताओं द्वारा; अपि-- भी; प्रार्थ्या:--लालायित; साम्राज्य--बृहद्‌ राज्य; ऐश्वर्य--सांसारिकसम्पत्ति; सम्पद:--धन; न नन्दयन्ति--आनन्द नहीं प्रदान करते; अप्रजम्‌--पुत्र न होने से; माम्‌--मुझको; क्षुत्‌-- भूख;तृटू--प्यास; कामम्‌--विषय; इब--सहृश; अपरे--अन्य भोग्य वस्तुएँ

जिस प्रकार भूखा तथा प्यासा व्यक्ति फूल की मालाओं या चंदन-लेप जैसी बाह्य तृप्तिसे संतुष्ट नहीं होता, उसी प्रकार पुत्र न होने से मैं अपने साम्राज्य, ऐश्वर्य या सम्पदा से, जिनकेलिए बड़े-बड़े देवता भी लालायित रहते हैं, सन्तुष्ट नहीं हूँ।

ततः पाहि महाभाग पूर्व: सह गतं तमः ।

यथा तरेम दुष्पारं प्रजया तद्विधेहि नः ॥

२६॥

ततः:--अतः, इस कारण से; पाहि--मेरी रक्षा कीजिये; महा-भाग--हे परम साथु; पूर्व: सह--अपने पितरों समेत;गतम्‌--गया हुआ; तम:ः--अंधकार में; यथा--जिससे; तरेम--पार कर सकें; दुष्पारम्‌--पार करना अत्यन्त कठिन;प्रजया--पुत्र प्राप्ति करके; तत्‌--वह; विधेहि--कृपया करें; न:--हम सबों के लिए

अतः हे परम साधु! मेरी तथा मेरे पितरों की रक्षा कीजिये ( उबारिये ), क्योंकि मेरेसंतान न होने से वे नरक के अंधकार में धँसते जा रहे हैं।

कृपया कुछ ऐसा करें जिससे मुझेपुत्र प्राप्त हो, जो हम सबों को नारकीय दशाओं से उबार सके।

श्रीशुक उबाचइत्यर्थित: स भगवान्कृपालुर्ब्रह्मण: सुतः ।

अश्रपयित्वा चर त्वाष्ट्र त्वष्टारमयजद्ठविभु: ॥

२७॥

श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; अर्थित:--प्रार्थना किये जाने पर; सः--उस ( अंगिरा )ने; भगवान्‌--परम शक्तिमान; कृपालु:--अत्यन्त दयालु; ब्रह्मण:-- भगवान्‌ ब्रह्मा का; सुत:--पुत्र ( भगवान्‌ ब्रह्म के मनसे उत्पन्न ); श्रपयित्वा--पका कर; चरुम्‌--खीर का विशिष्ट पिण्ड, चरु; त्वाष्टमू-त्वष्टा नामक देवता के लिए;त्वष्टाम्‌--त्वष्टा की; अयजत्‌--अर्चना की; विभु:--परम साधु |

महाराज चित्रकेतु द्वारा प्रार्थना किये जाने पर भगवान्‌ ब्रह्मा के मन से उत्पन्न( मानसपुत्र ) अंगिरा ऋषि राजा के प्रति अत्यन्त दयाद्र हो उठे।

अपने अत्यन्त शक्तिशालीव्यक्तित्व के कारण ऋषि ने त्वष्टा नामक देवता को खीर का पिण्डदान करके यज्ञ सम्पन्नकिया।

ज्येष्ठा श्रेष्ठा च या राज्ञो महिषीणां च भारत ।

नाम्ना कृत्द्युतिस्तस्यै यज्ञोच्छिष्टमदादिदूवज: ॥

२८॥

ज्येष्ठा--ज्येष्ठ, सबसे बड़ी; श्रेष्ठा--परम गुणवती; च--तथा; या--जो; राज्:--राजा की; महिषीणाम्‌--समस्त रानियों में;च--भी; भारत--हे महाराज परीक्षित; नाम्ना--नामक; कृतद्युति:--कृतद्युति; तस्यै--उसको; यज्ञ--यज्ञ का;उच्छिष्टम्‌--अवशेष प्रसाद; अदात्‌--प्रदान किया; द्विज: --महान्‌ ऋषि ( अंगिरा ) ने

हे महाराज परीक्षित! अंगिरा ऋषि ने यज्ञ के अवशेष प्रसाद को चित्रकेतु की लाखोंरानियों में सबसे बड़ी तथा परम गुणवती रानी को प्रदान किया, जिसका नाम कृतद्युति था।

अथाह नृपतिं राजन्भवितैकस्तवात्मज: ।

हर्षशोकप्रदस्तुभ्यमिति ब्रह्मसुतो ययौ ॥

२९॥

अथ--तत्पश्चात्‌; आह--कहा; नृपतिम्‌--राजा को; राजन्‌--हे राजा चित्रकेतु; भविता--होगा; एक:--एक; तव--तुम्हारे; आत्मज: --पुत्र; हर्ष -शोक--प्रसन्नता तथा दुख; प्रद:ः--प्रदान करने वाला; तुभ्यम्‌--तुमको; इति--इस प्रकार;ब्रह्म-सुत:-- भगवान्‌ ब्रह्मा के पुत्र, अंगिरा ऋषि; ययौ--चले गये।

तत्पश्चात्‌ ऋषि ने राजा से कहा--'हे राजन्‌! अब तुम्हारे एक पुत्र होगा जो हर्ष तथाशोक दोनों का कारण बनेगा।

ऐसा कहकर चित्रकेतु के उत्तर की प्रतीक्षा न करके ऋषिचले गये।

सापि तत्प्राशनादेव चित्रकेतोरधारयत्‌ ।

गर्भ कृतद्युतिर्देवी कृत्तिकाग्नेरिवात्मजम्‌ ॥

३०॥

सा--वह ( रानी ); अपि--भी; तत्‌-प्राशनात्‌ू--यज्ञ के अवशेष प्रसाद को खाने से; एब--निस्सन्देह; चित्रकेतो:--चित्रकेतु से; अधारयत्‌-- धारण किया; गर्भम्‌--गर्भ; कृतद्युति:--रानी कृतद्युति ने; देवी--देवी; कृत्तिका--कृत्तिका;अग्ने:--अग्नि से; इब--के समान; आत्म-जमू--पुत्र।

अंगिरा द्वारा सम्पन्न यज्ञ के अवशेष को खाकर कृत्द्युति ने चित्रकेतु के वीर्य से उसप्रकार गर्भ धारण किया जिस प्रकार कृत्तिकादेवी ने अग्नि से भगवान्‌ शिव का वीर्य प्राप्तकरके स्कन्द ( कार्तिकेय ) नामक पुत्र को गर्भ में धारण किया था।

तस्या अनुदिनं गर्भ: शुक्लपक्ष इवोडुप: ।

ववृधे शूरसेनेशतेजसा शनकैर्नूप ॥

३१॥

तस्याः--उसका; अनुदिनम्‌-दिनोंदिन; गर्भ:--गर्भ; शुक्ल-पक्षे--शुक्लपक्ष में ( चन्द्रमा बढ़ता जाता है ); इब--सहश;उड्डप:--चन्द्रमा; ववृधे --क्रमश:ः बढ़ने लगा; शूरसेन-ईश--शूरसेन के राजा; तेजसा--वीर्य से; शनकै:--थोड़ा-थोड़ाकरके, क्रमशः; नृप--हे राजा परीक्षित!

हे राजा परीक्षित! शूरसेन के राजा महाराज चित्रकेतु के वीर्य से कृतद्युति का गर्भ उसीप्रकार क्रमशः बढ़ने लगा, जिस प्रकार शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा बढ़ता जाता है।

अथ काल उपावृत्ते कुमार: समजायत ।

जनयन्शूरसेनानां श्रृण्वतां परमां मुदम्‌ ॥

३२॥

अथ--त्पश्चात्‌; काले उपावृत्ते--कालक्रम से, समय आने पर; कुमार:--पुत्र ने; समजायत--जन्म लिया; जनयनू--जन्महोने का; शूरसेनानाम्‌ू--शूरसेन देश के निवासियों का; श्रुण्वताम्‌ू--सुनकर; परमाम्‌-- अत्यधिक; मुदम्‌--हर्ष आनन्द |

तदनन्तर समय आने पर राजा के पुत्र उत्पन्न हुआ।

इस समाचार को सुनकर शूरसेन देश के समस्त वासी अत्यधिक प्रसन्न हुए।

हष्टो राजा कुमारस्य स्नात: शुचिरलड्डू तः ।

वाचयित्वाशिषो विप्रै; कारयामास जातकम्‌ ॥

३३॥

हृष्ट:--अत्यधिक प्रसन्न; राजा--राजा चित्रकेतु; कुमारस्थ--नवजात पुत्र का; स्नात:--नहाकर; शुचि: --पवित्र होकर;अलछड्डू तः--आभूषणों से सुसज्जित होकर; वाचयित्वा--स्वस्तिवाचन कराकर; आशिष: --आशीर्वाद के शब्द; विप्रै:--विद्वान ब्राह्मणों से; कारयाम्‌ आस--सम्पन्न कराया; जातकम्‌--जातकर्म संस्कारराजा चित्रकेतु विशेष रूप से प्रसन्न थे।

स्नान करके, पवित्र होकर तथा आभूषणों सेसज्जित होकर उन्होंने विद्वान ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन और आशीर्वाद लेकर पुत्र काजातकर्म-संस्कार करवाया।

तेभ्यो हिरण्यं रजतं वासांस्याभरणानि च ।

ग्रामान्हयान्गजान्प्रादाद्धेनूनामर्बुदानि घटू ॥

३४॥

तेभ्य:--उन ( ब्राह्मणों ) को; हिरण्यम्‌--सोना; रजतम्‌--चाँदी; वासांसि--वस्त्र; आभरणानि--गहने, आभूषण; च--तथा; ग्रामानू--अनेक गाँव; हयान्‌ू--धघोड़े; गजान्‌--हाथी; प्रादात्‌--दान में दिया; धेनूनाम्‌--गायों का; अर्बुदानि--दसकरोड़; घटू--छह |

राजा ने इस अनुष्ठान में भाग लेने वाले समस्त ब्राह्मणों को दान में सोना, चाँदी, वस्त्र,आभूषण, गाँव, घोड़े, हाथी और साठ करोड़ गौएँ दीं।

ववर्ष कामानन्येषां पर्जन्य इव देहिनाम्‌ ।

धन्यं यशस्यमायुष्यं कुमारस्थ महामना: ॥

३५॥

ववर्ष--वर्षा की, दान में दिया; कामान्‌--मुँहमाँगी वस्तुएँ; अन्येषाम्‌--अन्यों की; पर्जन्य:--बादल; इब--सहश;देहिनामू--समस्त जीवात्माओं का; धन्यम्‌ू-ऐश्वर्य वृद्धि की आकांक्षा सहित; यशस्यम्‌--यश में वृद्धि; आयुष्यम्‌--तथाआयुवृद्धि; कुमारस्थ--नवजात शिशु की; महा-मना:--उदारचेता राजा चित्रकेतु ने।

जिस प्रकार बादल बिना पक्षपात के पृथ्वी पर वर्षा करता है, उसी तरह उदारचेता राजाचित्रकेतु ने अपने पुत्र के यश, ऐश्वर्य तथा आयु की वृद्धि के लिए सबों को मुँहमाँगी वस्तुएँ दीं।

कृच्छुलब्धेथ राजर्षेस्तनयेउनुदिनं पितु: ।

यथा निःस्वस्य कृच्छाप्ते धने स्नेहोउनन्‍्ववर्धत ॥

३६॥

कृच्छु--कठिनाई से; लब्धे--प्राप्त; अथ--तदनन्तर; राज-ऋषे: --पवित्र राजा चित्रकेतु का; तनये--पुत्र के लिए;अनुदिनम्‌--प्रतिदिन; पितु:--पिता का; यथा--जिस प्रकार; निःस्वस्य--निर्धन पुरुष का; कृच्छु-आप्ते-- अत्यन्तकठिनाई से प्राप्त; धने--धन के लिए; स्नेह: --स्नेह, प्यार; अन्ववर्धत--बढ़ता गया।

जिस प्रकार किसी निर्धन व्यक्ति को बड़ी कठिनाई से कुछ धन मिलता है, तो उसमेंप्रतिदिन उसकी आसक्ति बढ़ती जाती है, इसी प्रकार जब राजा चित्रकेतु को अत्यन्तकठिनाई से पुत्र की प्राप्ति हुई तो दिन प्रति दिन पुत्र के प्रति उसका स्नेह बढ़ता गया।

मातुस्त्वतितरां पुत्रे स्नेहो मोहसमुद्धवः ।

कृतद्युते: सपत्नीनां प्रजाकामज्वरोभवत्‌ ॥

३७॥

मातु:--माता का; तु-- भी; अतितराम्‌--अत्यधिक; पुत्रे--पुत्र के लिए; स्नेह:--वत्सलता; मोह--अविद्यावश;समुद्धव:--उत्पन्न; कृतद्युते:--कृतद्युति की; सपत्नीनाम्‌ू--सौतों का; प्रजा-काम--पुत्रेच्छा का; ज्वर:--ताप, ज्वर;अभवत्‌--था।

पिता की ही भाँति माँ का भी आकर्षण एवं स्नेह पुत्र के प्रति बढ़ता गया।

कृतद्युति केपुत्र को देख देख कर राजा की अन्य पत्नियाँ पुत्र की कामना से अत्यधिक श्षुब्ध रहने लगीं,मानो उन्हें उच्च ज्वर हो।

चित्रकेतोरतिप्रीतिर्यथा दारे प्रजावति ।

न तथान्येषु सझ्जज्ञे बालं लालयतोन्वहम्‌ ॥

३८॥

चित्रकेतो: --राजा चित्रकेतु का; अतिप्रीति:--अत्यधिक आकर्षण; यथा--जिस प्रकार; दारे--अपनी पतली में; प्रजा-वति--जिसने पुत्र को जन्म दिया हो, पुत्रवती; न--नहीं; तथा--उसी प्रकार; अन्येषु--अन्यों का; सज्ञज्ञे--उठा, उत्पन्नहुआ; बालम्‌--पुत्र को; लालयत:--लाड़-प्यार करते हुए; अन्वहम्‌--लगातार।

ज्यों-ज्यों राजा चित्रेकेतु अपने पुत्र का बड़ी सावधानी से लाड़-प्यार करने लगे त्यों-त्यों रानी कृत्द्युति के प्रति भी उनका प्रेम प्रगाढ़ होता गया और पुत्रहीन अन्य रानियों के प्रतिउनका प्रेम क्रमशः घटने लगा।

ताः पर्यतप्यन्नात्मानं गईयन्त्यो भ्यसूयया ।

आनपत्येन दुःखेन राज्ञश्चानादरेण च ॥

३९॥

ताः--वे ( पुत्रहीन रानियाँ ); पर्यतप्यन्‌--पश्चात्ताप करने लगीं; आत्मानम्‌--अपने आपको; गईयन्त्य:--धिक्कारती हुई;अभ्यसूयया--डाह से; आनपत्येन--पुत्रहीन होने के कारण; दुःखेन--दुख से; राज्:--राजा की; च--भी; अनादरेण--उपेक्षा के कारण; च--भी।

अन्य रानियाँ निपूती होने के कारण अत्यन्त अप्रसन्न थीं।

अपने प्रति राजा की उपेक्षा सेवे डाहवश अपने आपको धिक्कारने और पश्चात्ताप करने लगीं।

धिगप्रजां स्त्रियं पापां पत्युश्नागृहसम्मताम्‌ ।

सुप्रजाभि: सपत्नीभिर्दासीमिव तिरस्कृताम्‌ ॥

४०॥

धिक्‌-धिक्कार है; अप्रजाम्‌--पुत्रहीना; स्त्रियम्‌--स्त्री को; पापाम्‌--पाप कर्मों से पूर्ण; पत्यु;--पति के द्वारा; च-- भी;अ-गृह-सम्मताम्‌--जिसका घर में अनादर हो, अनाहत; सु-प्रजाभि:--पुत्रवती; सपत्नीभि: --सौतों के द्वारा; दासीम्‌--दासी, नौकरानी; इब--के समान; तिरस्कृताम्‌--तिरस्कृत, अनाहत |

जिस पत्नी के पुत्र नहीं होते वह घर में अपने पति द्वारा उपेक्षित रहती है और सौतों द्वारादासी के समान अनाहत होती है।

निश्चय ही ऐसी स्त्री अपने पापी जीवन के कारण सब तरहसे धिक्कारी जाती है।

दासीनां को नु सनन्‍्तापः स्वामिनः परिचर्यया ।

अभीक्ष्णं लब्धमानानां दास्या दासीव दुर्भगा: ॥

४१॥

दासीनाम्‌--दासियों का; कः--क्या; नु--निस्सन्देह; सन्ताप:--पश्चाताप, शोक; स्वामिन:--स्वामी की; परिचर्यया--सेवा करके; अभीक्ष्णम्‌--निरन्तर; लब्ध-मानानाम्‌--सम्मानित; दास्या: --दासी का; दासी इब--दासी के समान;दुर्भगा:--अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण, हतभाग्या

यहाँ तक कि जो दासियाँ अपने पति की निरन्तर सेवा करती हैं, वे भी अपने पति कासम्मान पाती रहती हैं, अतः उनको किसी बात के लिए पश्चाताप नहीं करना पड़ता।

किन्तुहमारी स्थिति तो दासी की दासियों के समान है, अतः हम सर्वाधिक हतभाग्या हैं।

एवं सन्दह्ममानानां सपत्या: पुत्रसम्पदा ।

राज्ञोअसम्मतवृत्तीनां विद्वेषो बलवानभूत्‌ ॥

४२॥

एवम्‌--इस प्रकार; सन्दह्ममानानाम्‌ू--शोक से निरन्तर जलती रहने वाली रानियों का; सपत्या:--कृतद्युति की सौतों का;पुत्र-सम्पदा--पुत्र रूपी सम्पत्ति के कारण; राज्ञ:--राजा के द्वारा; असम्मत-वृत्तीनामू--अधिक पक्षपात न किये जाने से;विद्वेष: --ईर्ष्या; बलवान्‌--प्रबल शक्तिशाली; अभूत्‌--हो गया

श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा--अपने पति द्वारा उपेक्षित होने तथा कृतद्युति कीगोद भरी हुई देखकर, सभी सौतें द्वेषघ से अधिकाधिक जलने लगीं।

विद्वेषनष्टमतय: स्त्रियो दारुणचेतस: ।

गरं ददुः कुमाराय दुर्मर्षा नृपतिं प्रति ॥

४३॥

विद्वेष-नष्ट-मतय: --द्वेष के कारण बुद्धि नष्ट हो जाने से; स्त्रियः--स्त्रियाँ; दारुण-चेतस:--कठोर हृदय वाली; गरम्‌--विष; ददुः--पिला दिया; कुमाराय--बालक को; दुर्मर्षा:--चिढ़कर; नृपतिम्‌--राजा के; प्रति--प्रति |

द्वेष बढ़ जाने से रानियों की मति मारी गईं।

अत्यधिक कठोर हृदय होने तथा राजा कीउपेक्षा को न सह सकने के कारण उन्होंने अन्त में बालक को विष खिला दिया।

कृतद्युतिरजानन्ती सपत्नीनामघं महत्‌ ।

सुप्त एवेति सद्धिन्त्य निरीक्ष्य व्यचरदगृहे ॥

४४॥

कृतद्युतिः--रानी कृतद्युति; अजानन्ती--न जानती हुई; सपत्नीनाम्‌ू--अपनी सौतों के; अघधम्‌--पाप-कृत्य; महत्‌--महान्‌,घोर; सुप्त:--सोया हुआ; एव--निस्सन्देह; इति--इस प्रकार; सद्धिन्त्य--सोचकर; निरीक्ष्य--देखकर; व्यचरत्‌--घूमतीरही; गृहे--घर में ।

अपनी सौतों द्वारा विष दिये जाने की घटना को न जानती हुई रानी कृतद्युति यहसोचकर कि उसका पुत्र गहरी निद्रा में सो रहा है घर में इधर-उधर विचरती रही।

उसे पता नचल पाया कि वह मर चुका है।

शयानं सुचिरं बालमुपधार्य मनीषिणी ।

पुत्रमानय मे भद्दे इति धात्रीमचोदयत्‌ ॥

४५॥

शयानम्‌--सोता हुआ; सु-चिरम्‌ू--दीर्घकाल से; बालमू--पुत्र को; उपधार्य--सोचकर; मनीषिणी --अत्यन्त बुद्धिमान,बुद्द्विमती; पुत्रमू--पुत्र; आनय--ले आओ; मे--मेंरे पास; भद्वे--हे सखी या कल्याणी; इति--इस प्रकार; धात्रीम्‌ू--धायको; अचोदयत्‌--आज्ञा दी

यह सोचकर कि उसका पुत्र बड़ी देर से सो रहा है--उस अत्यन्त बुद्धिमान रानीकृतद्युति ने धाय को आज्ञा दी, 'हे सखी! मेरे पुत्र को यहाँ ले आओ।

सा शयानमुपत्रज्य इृष्टा चोत्तारतोचनम्‌ ।

प्राणेन्द्रियात्मभिस्त्यक्त हतास्मीत्यपतद्भुवि ॥

४६॥

सा--वह ( दासी ); शयानम्‌--सोते हुए; उपब्रज्य--के पास जाकर; हृष्टा--देखकर; च-- भी; उत्तार-लोचनम्‌--ऊपरउलटी हुई आँखें ( जैसे मृत शरीर की होती हैं ); प्राण-इन्द्रिय-आत्मभि:--प्राण, इन्द्रियों तथा मन से; त्यक्तम्‌--छोड़ाहुआ; हता अस्मि--मैं मरी, मैं मारी गई; इति--इस प्रकार; अपतत्‌--गिर पड़ी; भुवि--पृथ्वी पर।

जब धाय उस सोते हुए बच्चे के पास पहुँची तो उसने देखा कि उसकी आँखें ऊपर कीओर उलट गई हैं, उसके शरीर में प्राण का कोई संचार नहीं है और उसकी समस्त इन्द्रियाँनिष्क्रिय हो गई हैं।

अतः वह समझ गई कि बालक मर चुका है।

यह देखकर वह तुरन्त चिल्ला उठी, 'हाय मैं मारी गई' और पृथ्वी पर गिर पड़ी।

तस्यास्तदाकर्णय भृशातुरं स्वरंघ्नन्त्या: कराभ्यामुर उच्चकैरपि ।

प्रविश्य राज्ञी त्वरयात्मजान्तिकंददर्श बाल सहसा मृतं सुतम्‌ ॥

४७॥

तस्या:--उस ( दासी ) का; तदा--उस समय; आकर्णर्य--सुनकर; भृूश-आतुरम्‌-- अत्यन्त कातर एवं क्षुब्ध; स्वर्मू--स्वर, आवाज; घ्नन्त्या:--पीट पीटकर; कराभ्याम्‌ू--दोनों हाथों से; उरः--छाती; उच्चकै:ः --तेजी से, जोर जोर से;अपि--भी; प्रविश्य--घुस कर; राज्ञी--रानी; त्वरया--जल्दी जल्दी; आत्मज-अन्तिकम्‌--अपने पुत्र के निकट; दरदर्श--देखा; बालमू्‌--पुत्र को; सहसा--अकस्मात्‌; मृतम्‌ू--मृत, मरा हुआ; सुतम्‌--पुत्र को ।

अत्यन्त विश्लुब्ध होकर वह धाय अपने दोनों हाथों से अपनी छाती पीटने लगी औरआर्तस्वर में जोर-जोर से चिल्‍लाने लगी।

उसकी तेज आवाज सुनकर रानी तुरन्त आ गई औरजब वह अपने पुत्र के पास पहुँची, तो देखा कि वह सहसा ही मर चुका है।

पपात भूमौ परिवृद्धया शुचा ।

मुमोह विश्रष्टशिरोरूहाम्बरा ॥

४८॥

पपात--गिर पड़ी; भूमौ--पृथ्वी पर; परिवृद्धया--अत्यधिक; शुचा--शोक के कारण; मुमोह--मूर्च्छित हो गई;विभ्रष्ट--बिखरे हुए; शिरोरूह--बाल, केश; अम्बरा--तथा वस्त्र

अगाध शोक के कारण रानी मूच्छित होकर पृथ्वी पर ऐसे गिर पड़ी कि उस के बालतथा वस्त्र बिखर गये ।

ततो नृपान्तःपुरवर्तिनो जनानराश्च नार्यश्व निशम्य रोदनम्‌ ।

आगत्य तुल्यव्यसना: सुदुःखितास्‌ताश्व व्यलीकं रुरुदु: कृतागसः ॥

४९॥

ततः--तत्पश्चात्‌; नृप--हे राजा; अन्तःपुर-वर्तिन:--रनिवास के सभी वासी; जना:--सभी व्यक्ति; नरा:--पुरुष; च--तथा; नार्य:--स्त्रियाँ; च--भी; निशम्य--सुनकर; रोदनम्‌ू--रोना; आगत्य--आकर; तुल्य-व्यसना:--समान रूप सेश़ संतप्त होकर; सु-दुःखिता:--अत्यधिक विलखती हुई; ताः--वे; च--तथा; व्यलीकम्‌--झूठमूठ, ढोंग करके; रुरुदु:--रोने लगीं; कृत-आगस: --अपराध करने ( विष देने ) वाली |

हे राजा परीक्षित! रानी का जोर-जोर से विलखना सुनकर, रनिवास के सभी स्त्री-पुरुषआ पहुँचे।

समान रूप से संतप्त होने के कारण रोने लगे।

जिन रानियों ने विष दिया था,अपने अपराध को भलीभाँति जानती हुई, वे भी झूठमूठ रोने का ढोंग करने लगीं।

श्र॒त्वा मृतं पुत्रमलक्षितान्तकंविनष्टदृष्टि: प्रपतन्स्खलन्पधि ।

स्नेहानुबन्धैधितया शुचा भूशंविमू्च्छितो<नुप्रकृतिद्विजै्वृत: ॥

५०॥

पपात बालस्थ स पादमूलेमृतस्य विस्त्रस्तशिरोरुहाम्बर: ।

दीर्घ श्वसन्बाष्पकलोपरोधतोनिरुद्धकण्ठो न शशाक भाषितुम्‌ ॥

५१॥

श्रुव्वा-- सुनकर; मृतम्‌--मरा हुआ; पुत्रम्‌ू--पुत्र को; अलक्षित-अन्तकम्‌--मृत्यु का कारण न ज्ञात होने से; विनष्ट-इृष्ट:--ठीक से देख न सकने से; प्रपतन्‌--लगातार गिरते पड़ते; स्खलन्‌--लुढ़कते हुए; पथि--मार्ग पर; स्नेह-अनुबन्ध--स्नेह के कारण; एधितया--अत्यधिक बढ़े हुए; शुचा--शोक से; भृूशम्‌--अत्यधिक; विमूर्च्छित:--मूर्च्छितहोकर; अनुप्रकृति:--अपने मंत्रियों तथा अन्य अधिकारियों के साथ; द्विजैः--विद्वान ब्राह्मणों से; वृत:--घिरे हुए;पपात--गिर पड़ा; बालस्य--लड़के के; सः--वह ( राजा ); पाद-मूले--पाँवों पर; मृतस्थ--मृत शरीर के; विस्त्रस्त--बिखरे हुए; शिरोरूह--बाल; अम्बर: --( तथा ) वस्त्र; दीर्घम्--लम्बी; श्रसन्‌-- ध्रास; बाष्प-कला-उपरोधत: --अश्रुपूरितहोकर चिल्लाने से; निरुद्ध-कण्ठ:--रुँधी हुई वाणी से; न--नहीं; शशाक--समर्थ था; भाषितुम्‌--बोलने में |

जब राजा चित्रकेतु ने सुना कि न जाने कैसे उसका पुत्र मर गया है, तो वह प्रायःअन्धासा हो गया।

पुत्र के प्रति अगाध स्नेह के कारण उसका विलाप जलती हुईं अग्नि केसमान बढ़ता गया और रास्ते भर वह भूमि पर लगातार गिरता-पड़ता तथा लुढ़कता हुआ उसमृत बालक को देखने गया।

अपने मंत्रियों तथा अन्य अधिकारियों एवं विद्वान ब्राह्मणों सेघिरा हुआ वह राजा वहाँ पहुँचा और उस बालक के चरणों पर अचेत होकर गिर पड़ा।

उसके बाल तथा वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गये।

जब दीर्घ श्वास लेते हुए राजा को होश आया तोउसके नेत्र आसुओं से भरे हुए थे और वह बोल नहीं पा रहा था।

पतिं निरीक्ष्योरुशुचार्पितं तदामृतं च बाल सुतमेकसन्ततिम्‌ ।

जनस्य राज्ञी प्रकृतेश्व हद्गुजंसती दधाना विललाप चित्रधा ॥

५२॥

पतिम्‌--पति को; निरीक्ष्य--देखकर; उरू--अत्यधिक; शुचच--शोक से; अर्पितम्‌--पीड़ित; तदा--उस समय; मृतम्‌--मृत; च--तथा; बालमू--बालक को; सुतम्‌--पुत्र; एक-सन्ततिम्‌--परिवार के एकलौते पुत्र को; जनस्य--वहाँ परएकत्रित समस्त पुरुषों का; राज्ञी--रानी; प्रकृतेः च--तथा अधिकारियों और मंत्रियों का; हत्‌-रुजम्‌--हृदय की पीड़ा;सती दधाना--बढ़ती हुई; विललाप--विलाप करने लगी; चित्रधा-- अनेक प्रकार से

जब रानी ने अपने पति राजा चित्रकेतु को अत्यधिक शोकाकुल और अपने एकलौतेपुत्र को मरा हुआ देखा तो वह अनेत प्रकार से शोक प्रकट करने लगी।

इससे रनिवास केसमस्त वासियों, मंत्रियों तथा समस्त ब्राह्मणों के हृदय की व्यथा बढ़ गई।

स्तनद्ढयं कुड्डू मपड्डूमण्डितंनिषिश्ञती साझझजनबाष्पबिन्दुभि: ।

विकीर्य केशान्विगलत्सत्रज: सुतंशुशोच चित्र कुररीव सुस्वरम्‌ ॥

५३॥

स्तन-द्वयम्‌-दोनों स्तन; कुड्डु म--कुंकुम चूर्ण से ( जिसे स्त्रियाँ अपने स्तनों पर मलती हैं ); पड्लू-- अंजन; मण्डितम्‌-सुशोभित; निषिशज्ञती--भिगोती हुई; स-अद्न--आँख के काजल से मिलकर; बाष्प--आँसुओं के; बिन्दुभि:--बूँदों से;विकीर्य--बिखर कर; केशान्‌--बाल; विगलत्‌--गिर रहा था; स्त्रज:--जिस पर पुष्प हार; सुतम्‌--अपने पुत्र के लिए;शुशोच--विलाप करने लगी; चित्रम्‌ू-भाँति-भाँति से; कुररी इब--कुररी पक्षी की तरह; सु-स्वरम्‌--अत्यन्त मधुर स्वरमें

रानी के सिर को सुशोभित करने वाली फूलों की माला गिर पड़ी और उसके बालबिखर गये।

उसके आँसुओं से नेत्रों में लगा अंजन धुल गया और कुंकुम चूर्ण से लेपितउसके स्तन भीग गये।

पुत्र की मृत्यु पर शोक करती हुई उस रानी का दारुण बिलाप कुररीपक्षी के आर्त स्वर की तरह लग रहा था।

अहो विधातस्त्वमतीव बालिशो यस्त्वात्मसूष्ठय्रप्रतिरूपमीहसे ।

परे नु जीवत्यपरस्य या मृति-विंपर्ययश्वेत्त्वमसि ध्रुव: पर: ॥

५४॥

अहो--ओह ( शोक में ); विधात:--हे विधाता, ईश्वर; त्वमू-तुम ( तू ); अतीव--अत्यन्त; बालिश: --मूर्ख; यः --जो;तु--निस्सन्देह; आत्म-सृष्टि-- अपनी स्वयं बनाई हुई सृष्टि के; अप्रतिरूपम्‌-- प्रतिकूल; ईहसे--कार्य करते तथा इच्छाकरते हैं; परे--पिता या अन्य बड़ा; नु--निस्सन्देह; जीवति--जीवित रहता है; अपरस्य--बाद में जन्म लेने वाले का;या--जो; मृतिः-- मृत्यु; विपर्यय:--विपरीत; चेत्‌ू--यदि; त्वमू--तुम; असि--हो; श्रुवः--निस्सन्देह; पर:--वैरी, शत्रु

हे विधाता, हे सृष्टिकर्ता! तू निश्चय ही अपने सृष्टि-कार्य में अनुभव-हीन है क्योंकि पिताके रहते हुए तूने उसके पुत्र की मृत्यु होने दी और इस तरह से अपनी ही सृष्टि के नियमों केविपरीत कार्य किया है।

यदि तू नियमभंग करने पर ही तुला है, तो तू निश्चय ही समस्तजीवात्माओं का शत्रु है और निर्दयी है।

न हि क्रमश्रेदिह मृत्युजन्मनो:शरीरिणामस्तु तदात्मकर्मभि: ।

यः स्नेहपाशो निजसर्गवृद्धयेस्वयं कृतस्ते तमिमं विवृश्चसि ॥

५५॥

न--नहीं; हि--निस्सन्देह; क्रम:--तिथिक्रम; चेत्‌ू--यदि; इह--इस भौतिक जगत में; मृत्यु--मृत्यु; जन्मनो: --तथा जन्मका; शरीरिणाम्‌ू--बद्धजावों का जिन्होंने देह धारण करना स्वीकार किया है; अस्तु--हो; तत्‌ू--वह; आत्म-कर्मभि:--अपने अपने कर्मों के फलों के द्वारा; यः--जो; स्नेह-पाश:--स्नेह बन्धन; निज-सर्ग--अपनी सृष्टि; वृद्धये--बढ़ाने केलिए; स्वयम्‌--अपने आप; कृत:--बनाई हुई; ते--तुम्हारे द्वारा; तम्‌--उसे; इमम्‌--यह; विवृश्चसि--तुम काट रहे हो

हे ईश्वर! आप यह कह सकते हैं कि ऐसा कोई नियम नहीं है कि पुत्र के जीवनकाल मेंही पिता की मृत्यु हो और पिता के जीवन काल में ही पुत्र उत्पन्न हो, क्योंकि प्रत्येक व्यक्तिअपने कर्मों के अनुसार जीता और मरता है।

फिर भी, यदि कर्म इतना प्रबल है कि जन्म तथामृत्यु उसी पर निर्भर करते हों तो फिर नियन्ता या ईश्वर की आवश्यकता नहीं है ?

पुनः यदि तूकहे कि नियन्‍ता की आवश्यकता इसलिए है, क्‍योंकि माया में कार्य करने की शक्ति नहींहोती, तो कोई यह भी तो कह सकता है कि यदि कर्म के द्वारा तेरे बनाये हुए स्नेह-बंधनटूटते हैं, तो कोई भी संतान को स्नेहपूर्वक नहीं पालेगा वरन्‌ सभी लोग अपनी संतानों कीनिर्दयता से उपेक्षा करने लगेंगे।

चूँकि तूने स्नेह के उन बंधनों को काटा है, जिसके वशीभूतहोकर माता-पिता अपनी सन्‍्तान का पालन-पोषण करने के लिए विवजश्ञ हो जाते हैं,इसलिए तू अनुभवहीन एवं बुद्धिहीन प्रतीत होता है।

त्वं तात नाहसि च मां कृपणामनाथांत्यक्तुं विचक्ष्व पितरं तव शोकतप्तम्‌ ।

अज्भस्तरेम भवताप्रजदुस्तरं यद्‌ध्वान्तं न याह्यकरुणेन यमेन दूरम्‌ ॥

५६॥

त्वमू--तुम्हें; तात--हे पुत्र; न--नहीं; अहसि-- चाहिए; च--तथा; मामू--मुझ; कृपणाम्‌-- अत्यन्त दीन को;अनाथाम्‌--रक्षकविहीन, अनाथ को; त्यक्तुमू--छोड़ना; विचक्ष्व--देखो; पितरम्‌--पिता को; तब--तुम्हारे; शोक-तप्तमू--शोक संतप्त; अज्ञ:ः--सरलतापूर्वक; तरेम--हम पार कर सकते हैं; भवता--तुम्हारे द्वारा; अप्रज-दुस्तरम्‌--बिनापुत्र के पार करना दुष्कर; यत्‌--जो; ध्वान्तम्‌--अंधकार का राज्य; न याहि--दूर मत जाओ; अकरुणेन--निर्दय, क्रूर;यमेन--यमराज के साथ; दूरमू-दूर।

प्यारे बेटे! मैं असहाय एवं अत्यधिक शोकाकुल हूँ?

तुम्हें मेगा साथ नहीं छोड़नाचाहिए।

तुम अपने शोकाकुल पिता की ओर तो देखो।

हम ( दोनों ) असहाय हैं क्योंकि पुत्रके बिना हमें घोर नरक में यातनाएँ सहनी पड़ेंगी।

तुम्हीं एकमात्र सहारा हो जिसके बल परहम इस अंधकारमय प्रदेश से उबर सकते हैं; अतः मेरी प्रार्थना है कि तुम निर्दयी यमराज केसाथ और आगे न जाओ।

उत्तिष्ठ तात त इमे शिशवो वयस्या-स्त्वामाह्यन्ति नृपनन्दन संविहर्तुम्‌ ।

सुप्तश्चिर हाशनया च भवान्परीतोभुड्छ्ष्व स्तनं पिब शुच्चो हर न: स्वकानाम्‌ ॥

५७॥

उत्तिष्ठ--उठो; तात--मेरे प्यारे बेटे; ते--वे; इमे--ये सब; शिशव:--बालक; वयस्या:--साथी, संगी; त्वाम्‌ू--तुमको;आह्नयन्ति--बुला रहे हैं; नृप-नन्दन--हे राजपुत्र; संविहर्तुमू--तुम्हारे साथ खेलने के लिए; सुप्त:ः--तुम सोये हुए हो;चिरम्‌--देर से; हि--निस्सन्देह; अशनया-- भूख से; च-- भी; भवान्‌ू--आप; परीत: --परास्त; भुड्छ्व--खाओ;स्तनम्‌ू--( अपनी माँ के ) स्तनों को; पिब--पियो; शुच्चः--शोक; हर--हरो, दूर करो; नः--हमारा; स्वकानाम्‌--सम्बन्धियों के ।

प्यारे बेटे! तुम बहुत देर से सो रहे हो।

अब उठ जाओ।

तुम्हारे संगी तुम्हें खेलने के लिएबुला रहे हैं।

चूँकि तुम्हें बहुत भूख लगी होगी इसलिए उठो, मेरे स्तनों से दूध पिओ औरहमारा शोक दूर करो।

नाहं तनूज दहशे हतमड़ला तेमुग्धस्मितं मुदितवीक्षणमाननाब्जम्‌ ।

कि वा गतो स्यपुनरन्वयमन्यलोक॑नीतोघृणेन न श्रूणोमि कला गिरस्ते ॥

५८ ॥

न--नहीं; अहम्‌--मैंने; तनू -ज--( मेरे शरीर से उत्पन्न ) मेरे प्यारे पुत्र; दहशे--देखा; हत-मड्ला--हतभाग्य होने से; ते--तुम्हारा; मुग्ध-स्मितम्‌-मनोहर हँसी से युक्त; मुदित-वीक्षणम्‌--बन्द नेत्रों से; आनन-अब्जम्‌ू--कमल तुल्य मुख; किवबा--अथवा; गत:--चले गये; असि--हो; अ-पुन:-अन्वयम्‌--जहां से फिर कोई नहीं लौटता; अन्य-लोकम्‌--अन्यलोक अथवा यमलोक को; नीतः--ले जाये जाकर; अघृणेन--क्रूर यमराज द्वारा; न--नहीं; श्रुणोमि--सुनती हूँ;कला: --अ त्यन्त मधुर; गिर:--तोतली बोली; ते--तुम्हारी

प्रिय पुत्र! मैं सचमुच अभागिनी हूँ क्योंकि मैं अब तुम्हारे मुख पर मन्द हँसी नहीं देखसकती हूं।

तुमने सदा के लिए आँखें बन्द कर ली हैं; अतः मैं इस निष्कर्ष पर पहुँची हूँ कितुम इस लोक से दूसरे लोक में ले जाये गये हो जहाँ से तुम लौट नहीं पाओगे।

बेटे! मैंतुम्हारी मममोहक वाणी अब और आगे नहीं सुन सकती हूँ।

श्रीशुक उबाचविलप्न्त्या मृतं पुत्रमिति चित्रविलापनै: ।

चित्रकेतुर्भुशं तप्तो मुक्तकण्ठो रुरोद ह ॥

५९॥

श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी बोले; विलपन्त्या--विलाप करती पत्नी के साथ; मृतम्‌--मृत; पुत्रमू--पुत्र केलिए; इति--इस प्रकार; चित्र-विलापनै:--अनेक प्रकार से विलाप करते हुए; चित्रकेतु:--राजा चित्रकेतु; भृूशम्‌--अत्यधिक; तप्त:--व्याकुल; मुक्त-कण्ठ: --फूट-फूट कर; रुरोद--रोने लगा; ह--निस्सन्देह |

श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा--इस प्रकार अपने प्रिय पुत्र के लिए विलाप करतीहुई अपनी पत्नी के साथ ही राजा चित्रकेतु भी अत्यन्त शोक से संतप्त होकर फूट-फूट कररोने लगा।

तयोर्विलपतो: सर्वे दम्पत्योस्तदनुब्रता: ।

रुरुदुः सम नरा नार्य: सर्वमासीदचेतनम्‌ ॥

६०॥

तयो:--उन दोनों के; विलपतो:--विलाप करते हुए; सर्वे--सभी; दम्‌-पत्यो:--अपनी पत्नी सहित राजा; तत्‌-अनुब्रता:--उनके अनुयायी; रुरुदु:--जोर-जोर से रोने लगे; स्म--निस्सन्देह; नरा:--पुरुष; नार्य:--नारियाँ, स्त्रियाँ;सर्वम्‌--समस्त राज्य; आसीतू्‌--हो गया; अचेतनम्‌--अचेत सा

राजा तथा रानी को विलाप करते देखकर उनके समस्त अनुयायी स्त्री तथा पुरुष भी रोनेलगे।

इस आकस्मिक घटना से राज्य-भर के सभी नागरिक अचेत-से हो गये।

एवं कश्मलमापन्न॑ नष्टसंज़्मनायकम्‌ ।

ज्ञात्वाड्रिरा नाम ऋषिराजगाम सनारदः ॥

६१॥

एवम्‌--इस प्रकार; कश्मलम्‌--वेदना; आपन्नम्‌--प्राप्त करके; नष्ट--गत, रहित; संज्ञमम्‌--चेतना; अनायकम्‌--- असहाय;ज्ञात्वा--जानकर; अध्डिराः--अंगिरा; नाम--नामक; ऋषि: --साधु पुरुष; आजगाम--आ गये; स-नारद:--नारद मुनि केसाथ।

जब ऋषि अंगिरा ने समझ लिया कि राजा शोक-समुद्र में मृत-प्राय हो चुका है, तो वेनारद ऋषि के साथ वहाँ गये।

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