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अध्याय बारह: वृत्रासुर की गौरवशाली मृत्यु
6.12एवं जिहासुर्न॑प देहमाजौमृत्युं वर विजयान्मन्यमान: ।
शूलंप्रगृह्माभ्यपतत्सुरेनद्रंयथा महापुरुषं कैटभोप्सु ॥
१॥
श्री-ऋषि: उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; जिहासु:--त्यागने के लिए उत्सुक; नृप--हे राजापरीक्षित; देहम्ू--शरीर; आजौ--युद्ध में; मृत्युम्ू--मृत्यु; वरम्-- श्रेष्ठ; विजयात्--विजय से; मन्यमान: --सोचते हुए;शूलम्-त्रिशूल; प्रगृह्य--लेकर; अभ्यपतत्-- आक्रमण कर दिया; सुर-इन्द्रम्ू--स्वर्ग के राजा इन्द्र पर; यथा--जिसप्रकार; महा-पुरुषम्-- श्री भगवान् पर; कैटभ: --कैटभ नामक असुर ने; अप्सु--जब सारा ब्रह्माण्ड जलमग्न था
शुकदेव गोस्वामी ने कहा--अपना शरीर छोड़ने की इच्छा से बृत्रासुर ने विजय कीअपेक्षा युद्ध में अपनी मृत्यु को श्रेयस्कर समझा।
हे राजा परीक्षित! उसने अत्यन्त बलपूर्वकअपना त्रिशूल उठाया और बड़े वेग से स्वर्ग के राजा पर उसी प्रकार से आक्रमण किया जिसप्रकार ब्रह्माण्ड के जलमग्न होने पर कैटभ ने श्रीभगवान् पर बड़े ही बल से आक्रमण कियाथा।
ततो युगान्ताग्निकठोरजिह्न-माविध्य शूलं तरसासुरेन्द्र: ।
क्षिप्त्वा महेन्द्राय विनद्य वीरोहतोसि पापेति रुषा जगाद ॥
२॥
ततः--तत्पश्चात्; युग-अन्त-अग्नि-- प्रत्येक कल्पान्त की अग्नि के समान; कठोर--तीखी; जिह्म्--नोकों वाली;आविध्य--घुमाकर; शूलम्--त्रिशूल को; तरसा--वेग से; असुर-इन्द्र:--असुरों में परम वीर, वृत्रासुर; क्षिप्त्वा--'फेंककर; महा-इन्द्राय--राजा इन्द्र पर; विनद्य--गरजकर; वीर:--महान् वीर ( वृत्रासुर ); हतः--मरा हुआ; असि--तुमहो; पाप--हे पापी; इति--इस प्रकार; रुषा--अत्यन्त क्रोध से; जगाद--चिल्लाया।
तब असुरों में महान् वीर वृत्रासुर ने कल्पान्त ( प्रलय ) की धधकती अग्नि की लपटों केसमान तीखी नोकों वाले त्रिशूल को अत्यन्त क्रोध एवं वेग से इन्द्र पर चला दिया।
उसनेगरजकर कहा, 'आरे पापी, मैं तेरा वध किये देता हूँ।
'ख आपतत्तद्विचलद्ग्रहोल्कव-च्रिरीक्ष्य दुष्प्रेन््यमजातविक्लव: ।
वज्जेण वज्जी शतपर्वणाच्छिनद्भुजं च तस्योरगराजभोगम् ॥
३॥
खे--आकाश में; आपतत्--उसकी ओर उड़ कर; तत्--वह त्रिशूल; विचलत्--चक्कर लगाता हुआ; ग्रह-उल्क-वत्--गिरते तारे के समान; निरीक्ष्य--देखकर; दुष्प्रेक्ष्ममू--न देखा जा सकने वाला; अजात-विक्लव:-- भयभीत न होकर;वज्ेण--वज् से; वज्जी--वज़ को धारण करने वाला इन्द्र; शत-पर्वणा--एक सौ गाँठों ( जोड़ों ) वाला; आच्छिनत्--काटलिया; भुजमू--बाँह; च--तथा; तस्य--उस ( वृत्रासुर ) का; उरग-राज--महान् सर्प वासुकि का; भोगम्--शरीर कीतरह
आकाश में उड़ता हुआ वृत्रासुर का त्रिशूल प्रकाशमान उल्का के समान था।
यद्यपि इसप्रज्बलित आयुध की ओर देख पाना कठिन था, किन्तु राजा इन्द्र ने निर्भोक होकर अपनेवज्र से उसके खण्ड-खण्ड कर दिये।
उसी समय उसने वृत्रासुर की एक भुजा काट ली, जोसर्पों के राजा वासुकि के शरीर के समान मोटी थी।
छिल्नैकबाहुः परिघेण वृत्रःसंरब्ध आसाद्य गृहीतवज्म् ।
हनौ तताडेन्द्रमथामरेभंवज्जं च हस्ताज््यपतन्मघोनः ॥
४॥
छिन्न--कटा हुआ; एक--एक; बाहु:--जिसकी भुजा; परिघेण--लौह के बने बल्लम ( परिघ ) से; वृत्र:--वृत्रासुर;संरब्ध:--अत्यन्त क्रुद्ध होकर; आसाद्य--पहुँचकर; गृहीत--पकड़ते हुए; वज़म्--वज् को; हनौ--ठोड़ी पर; तताड--प्रहार किया; इन्द्रमू--इन्द्रदेव पर; अथ-- भी; अमर-इभम्--उसका हाथी; वज़्म्--वज़; च--तथा; हस्तात्ू--हाथ से;न्यपतत्--गिर पड़ा; मघोन:ः--राजा इन्द्र के |
शरीर से एक भुजा के कट जाने पर भी वृत्रासुर क्रोधपूर्वक राजा इन्द्र के निकट पहुँचाऔर लोहे के बल्लम ( परिघ ) से उसकी ठोड़ी पर प्रहार किया।
उसने इन्द्र के हाथी पर भीप्रहार किया।
इससे इन्द्र के हाथ से उसका वज्ज गिर गया।
वृत्रस्य कर्मातिमहाद्भुतं तत्सुरासुराश्चारणसिद्धसड्जा: ।
अपूजयंस्तत्पुरुहूतसड्डू्टनिरीक्ष्य हा हेति विचुक्रुशुर्भशम् ॥
५॥
वृत्रस्थ--वृत्रासुर का; कर्म--कार्य; अति--अत्यन्त; महा--महान्; अद्भुतम्ू--अद्भुत, विस्मयजनक; तत्--वह; सुर--देवता; असुरा:--तथा सारे असुर; चारण--चारण; सिद्ध-सज्ञ:--तथा सिद्धों का समाज; अपूजयन्-- प्रशंसा कियागया; तत्--वह; पुरुहूत-सड्डूटम्--इन्द्र की संकट-पूर्ण दशा; निरीक्ष्य--देखकर; हा हा--हाय हाय; इति--इस प्रकार;विचुक्रुशु:--विलाप करने लगे; भूशम्--अत्यधिक |
विभिन्न लोकों के वासी, यथा देवता, असुर, चारण तथा सिद्ध, वृत्रासुर के कार्य कीप्रशंसा करने लगे, किन्तु जब उन्होंने देखा कि इन्द्र महान् संकट में है, तो वे 'हाय हाय'करके विलाप करने लगे।
इन्द्रो न वज्र॑ जगृहे विलज्जित-शच्युतं स्वहस्तादरिसन्निधौ पुनः ।
तमाह वृत्रो हर आत्तवज्नोजहि स्वशत्रुं न विषादकाल: ॥
६॥
इन्द्रः--राजा इन्द्र ने; न--नहीं; वज्ञम्--वज्; जगृहे-- धारण किया; विलज्जित:--लज्जित होकर; च्युतम्--गिरा हुआ;स्व-हस्तात्-- अपने हाथ से; अरि-सन्निधौ--अपने शत्रु के समक्ष; पुन:--फिर; तम्--उससे; आह--कहा; वृत्र:--वृत्रासुरने; हरे--हे इन्द्र; आत्त-वज्ञ:--अपना वज् उठाकर; जहि--मारो; स्व-शत्रुम्--अपने शत्रु को; न--नहीं; विषाद-काल:--विलाप करने का समय
शत्रु की उपस्थिति में अपने हाथ से वज्ञ गिर जाने पर इन्द्र एक प्रकार से पराजित होगया था और अत्यन्त लज्जित हुआ।
उसने पुनः अपना आयुध उठाने का दुस्साहस नहीं किया।
किन्तु वृत्रासुर ने उसे यह कहते हुए प्रोत्साहित किया, 'अपना वज्ञ उठा लो औरअपने शत्रु को मार दो।
यह भाग्य को कोसने का अवसर नहीं है।
'युयुत्सतां कुत्रचिदाततायिनांजय: सदैकत्र न वै परात्मनाम् ।
विनैकमुत्पत्तिलयस्थिती श्वरंसर्वज्ञमाद्यं पुरुष सनातनम् ॥
७॥
युयुत्सताम्--जो युद्ध के लिए उत्सुक हैं; कुत्रचितू--कभी-कभी; आततायिनाम्--आयुधों से लैस; जय:--विजय;सदा--सदैव; एकत्र--एक स्थान में; न--नहीं; बै--निस्सन्देह; पर-आत्मनामू--अधीन जीवात्माओं का, जो परमात्मा केनिर्देश में कार्य करती हैं; विना--के अतिरिक्त; एकम्--एक; उत्पत्ति--सृष्टि; लय--संहार; स्थिति--तथा पालन का;ईश्वरम्--नियन्ता; सर्व-ज्ञ़म्--जो सब कुछ ( भूत, वर्तमान, भविष्य ) जानता है; आद्यम्--आदि; पुरुषम्-- भोक्ता;सनातनम्--
नित्यवृत्रासुर ने आगे कहा--हे इन्द्र! आदि भोक्ता पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के अतिरिक्तकिसी की सदैव विजय होना निश्चित नहीं है।
वे ही उत्पत्ति, पालन और प्रलय के कारण हैंऔर सब कुछ जानने वाले हैं।
अधीन होने तथा भौतिक देहों को धारण करने के लिए बाध्यहोने के कारण युद्धप्रिय अधीनस्थ कभी विजयी होते हैं, तो कभी पराजित होते हैं।
लोका: सपाला यस्येमे श्रसन्ति विवशा वशे ।
द्विजा ड्व शिचा बद्धा: स काल इह कारणम् ॥
८ ॥
लोका:--विभिन्न लोक; स-पाला:--अपने प्रमुख लोकपाल या अधिपतियों सहित; यस्य--जिसका; इमे--ये सब;श्रसन्ति--जीते हैं; विवशा:--नितान्त आश्रित; वशे--वहश्न में; द्विजा:--पक्षी; इब--सहृश; शिचा--जाल के द्वारा;बद्धा:--बँधे हुए; सः--वह; काल:--काल, समय; इह--इसमें; कारणम्--कारण ।
समस्त लोकों के प्रमुख लोकपालों सहित, इस ब्रह्माण्ड के समस्त लोकों के समस्तजीव, पूर्णतः भगवान् के वश में हैं।
वे जाल में पकड़े गये उन पक्षियों के समान कार्य करतेहैं, जो स्वतंत्रतापूर्वक विचरण नहीं कर सकते।
ओज: सहो बल प्राणममृतं मृत्युमेव च ।
तमज्ञाय जनो हेतुमात्मानं मन््यते जडम् ॥
९॥
ओज: --इन्द्रियों का बल; सह:--मनोबल; बलम्--शरीर का बल; प्राणम्--जीवित अवस्था; अमृतम्-- अमरत्व;मृत्युम--मृत्यु; एव--निस्सन्देह; च-- भी; तम्ू--उस ( परमेश्वर ) को; अज्ञाय--बिना जाने; जन: --मूर्ख पुरुष; हेतुम्--कारण; आत्मानमू--शरीर; मन्यते--मानता है; जडम्--यद्यपि पत्थर की तरह।
हमारी इन्द्रियों का शौर्य, मानसिक शक्ति, दैहिक बल, जीवन शक्ति, अमरत्व एवं मृत्युसभी कुछ परम भगवान् की देखरेख के अधीन हैं।
इससे अनवगत मूर्ख लोग अपने जड़शरीर को ही अपने कार्यकलापों का कारण मानते हैं।
यथा दारुमयी नारी यथा पत्रमयो मृग: ।
एवं भूतानि मघवन्नीशतन्त्राणि विद्धधि भो; ॥
१०॥
यथा--जिस प्रकार; दारु-मयी--लकड़ी की बनी; नारी--स्त्री; यथा--जिस प्रकार; पत्र-मय: --पत्तियों से बना; मृग: --पशु; एवम्--इस प्रकार; भूतानि--सभी वस्तुएँ; मघवन्--हे राजा इन्द्र; ईश-- श्रीभगवान्; तन्त्राणि-- आश्रित रह कर;विद्द्धि--कृपया जानें; भो;--हे महाशय |
हे देवराज इन्द्र! जिस प्रकार काठ की पुतली जो स्त्री के समान प्रतीत होती है अथवाघास-फूस का बना हुआ पशु न तो हिल-डुल सकता है और न अपने आप नाच सकता है,वरन् उसे हाथ से चलाने वाले व्यक्ति पर पूरी तरह निर्भर रहता है, उसी प्रकार हम सभी परमनियन्ता पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की इच्छानुसार नाचते हैं।
कोई भी स्वतंत्र नहीं है।
पुरुष: प्रकृतिर्व्यक्तमात्मा भूतेन्द्रियाशया: ।
शबक्नुवन्त्यस्य सर्गादौ न विना यदनुग्रहात् ॥
११॥
पुरुष:--समस्त भौतिक शक्ति का जनक; प्रकृतिः--भौतिक शक्ति या भौतिक प्रकृति; व्यक्तम्--अभिव्यक्ति के सिद्धान्त( महत् तत्त्व ); आत्मा--मिथ्या अहंकार; भूत--पाँच भौतिक तत्त्व; इन्द्रिय--दस इन्द्रियाँ; आशया:--मन, बुद्धि तथाचेतना; शक्नुवन्ति--समर्थ हैं; अस्य--इस ब्रह्माण्ड के; सर्ग-आदौ--सृष्टि इत्यादि में; न--नहीं ; विना--रहित; यत् --जिसकी; अनुग्रहात्ू-कृपा से तीनों पुरुष--कारणोदकशायी विष्णु, गर्भोदकशायी विष्णु तथा क्षीरोदकशायीविष्णु--भौतिक प्रकृति, समग्र भौतिक शक्ति (महत् तत्त्व)
मिथ्या अहंकार, पाँचोंभौतिक तत्त्व, भौतिक इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि तथा चेतना, ये सब भगवान् के आदेश के बिनाभौतिक जगत की सृष्टि नहीं कर सकते।
अदिद्वानेवमात्मानं मन्यतेनीशमी श्वरम् ।
भूतेः सृजति भूतानि ग्रसते तानि तै: स्वयम् ॥
१२॥
अदिद्वानू--ज्ञानरहित, मूर्ख; एवम्--इस प्रकार; आत्मानम्--स्वयं; मन्यते--मानता है; अनीशम्--यद्यपि अन्यों पर पूर्णतःआश्रित; ई श्वरमू--परम नियन्ता के रूप में, स्वतंत्र; भूतेः--जीवात्माओं के द्वारा; सृजति--वह ( भगवान् ) उत्पन्न करता है;भूतानि--अन्य जीवों को; ग्रसते--लील लेता है; तानि--उनको; तैः--अन्य जीवों के द्वारा; स्वयम्-स्वयं।
ज्ञानरहित मूर्ख व्यक्ति पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को नहीं समझ सकता।
वह शाश्रत अधीनरहकर भी अपने आपको झूठे ही सर्वोच्च मानता है।
यदि कोई यह सोचे कि अपने पूर्वसकाम कर्मों के अनुसार उसका भौतिक शरीर उसके माता-पिता द्वारा उत्पन्न किया गया हैऔर उसी शरीर को दूसरा कोई विनष्ट कर देता है जैसे कि बाघ दूसरे पशु को निगल जाताहै, तो यह सही ज्ञान नहीं है।
श्रीभगवान् स्वयं सृष्टि करते हैं और अन्य जीवों के द्वारा जीवोंको निगलते रहते हैं।
आयु: श्री: कीर्तिरिश्वर्यमाशिष: पुरुषस्य या: ।
भवन्त्येव हि तत्काले यथानिच्छोर्विपर्यया: ॥
१३॥
आयु:--दीर्घजीविता; श्री:--ऐश्वर्य; कीर्ति:--यश; ऐश्वर्यम्--शक्ति; आशिष:--आशीर्वाद, वर; पुरुषस्य--जीवात्माका; या:--जो; भवन्ति--हो ते हैं; एव--निस्सन्देह; हि--निश्चय ही; तत्-काले--ठीक समय पर; यथा--जिस प्रकार;अनिच्छो:--न चाहने वाले का; विपर्यया: --विपरीत परिस्थितियाँ |
जिस प्रकार मरने की इच्छा न रखने पर भी मनुष्य को मृत्यु के समय अपनी आयु,ऐश्वर्य, यश तथा अन्य सब कुछ त्याग देना पड़ता है उसी प्रकार जब ईश्वर की कृपा होती है,तो विजय के नियत समय के अनुकूल होने पर ये सारी वस्तुएँ उसे मिल जाती हैं।
तस्मादकीर्तियशसोर्जयापजययोरपि ।
सम: स्यात्सुखदुःखाभ्यां मृत्युजीवितयोस्तथा ॥
१४॥
तस्मातू--अतः ( श्रीभगवान् की इच्छा पर पूर्णतया निर्भर होने के कारण ); अकीर्ति--अपयश का; यशसो:--तथा यश;जय--विजय का; अपजययो:--तथा पराजय; अपि-- भी; सम: --समान; स्थात्--हो; सुख-दुःखाभ्याम्--सुख तथादुख से; मृत्यु--मृत्यु; जीवितयो:---अथवा जीवित का; तथा--और।
चूँकि प्रत्येक वस्तु भगवान् की परम इच्छा पर निर्भर है, अतः मनुष्य को यश-अपयश,हार-जीत तथा जीवन-मृत्यु में निश्चित्त रह कर समभाव बनाये रखना चाहिए।
सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्नात्मनो गुणा: ।
तत्र साक्षिणमात्मानं यो वेद स न बध्यते ॥
१५॥
सत्त्वमू--सतोगुण; रज:--रजोगुण; तम:--तमोगुण; इति--इस प्रकार; प्रकृते:-- भौतिक प्रकृति के; न--नहीं;आत्मन:--आत्मा के; गुणा:--गुण; तत्र--ऐसी स्थिति में; साक्षिणम्--गवाह, साक्षी; आत्मानम्--आत्मा; यः--जोकोई; वेद--जानता है; सः--वह; न--नहीं ; बध्यते--बँधता है।
जो पुरुष यह जानता है कि सतो, रजो तथा तमो गुण--ये तीनों आत्मा के नहीं, वरन्भौतिक प्रकृति के गुण हैं और जो यह जानता है कि शुद्ध आत्मा इन गुणों के कर्मों तथाफलों का साक्षी मात्र है, उसे मुक्त पुरुष मानना चाहिए।
वह इन गुणों से नहीं बंधता।
पश्य मां निर्जितं शत्रु वृक्णायुधभुजं मृधे ।
घटमानं यथाशक्ति तव प्राणजिहीर्षया ॥
१६॥
पश्य--देखो; माम्--मुझको; निर्जितम्ू--पहले से पराजित; शत्रु--हे शत्रु; वृक्ण--काट डालो; आयुध--ेरा हथियार;भुजम्ू--तथा मेरी भुजा; मृधे--इस युद्ध में; घटमानम्--अब भी प्रयत्नशील; यथा-शक्ति--अपनी शक्ति के अनुसार;तब--तुम्हारा; प्राण--जीवन; जिहीर्षया--ले लेने की इच्छा से ॥
ओरे मेरे शत्रु! जरा मेरी ओर देख।
मैं पहले ही पराजित हो चुका हूँ, क्योंकि मेरा हथियारतथा मेरी भुजा पहले ही खंड-खंड हो चुके हैं।
तुमने मुझे पहले ही परास्त कर दिया है, तोभी मैं तुम्हें मारने की प्रबल इच्छा के कारण तुमसे लड़ने का भरसक प्रयत्न कर रहा हूँ।
ऐसी विषम परिस्थिति में भी मैं तनिक भी दुखी नहीं हूँ।
अतः तुम उदासीनता त्याग करकेयुद्ध जारी रखो।
प्राणग्लहोयं समर इृष्वक्षो वाहनासनः ।
अत्र न ज्ञायतेमुष्य जयोमुष्य पराजय: ॥
१७॥
प्राण-ग्लह:--प्राणों की बाजी; अयम्ू--यह; समर:--युद्ध; इषु-अक्ष:--तीर रूपी पाँसे; वाहन-आसनः: --हाथी तथाघोड़े जैसे वाहन चौसर हैं; अत्र--यहाँ ( इस जुएँ के खेल में ); न--नहीं; ज्ञायते--ज्ञात है; अमुष्य--उस एक की; जय: --विजय; अमुष्य--अमुक की; पराजय:--हार।
अरे मेरे शत्रु) इस युद्ध को द्यूतक्रीड़ा का खेल मानो जिसमें हमारे प्राणों की बाजी लगीहै, बाण पासे हैं और वाहक पशु चौसर हैं।
कोई नहीं जानता कि कौन हारेगा और कौनजीतेगा।
यह सब विधाता पर निर्भर है।
श्रीशुक उबाचइन्द्रो वृत्रवच: श्रुत्ता गतालीकमपूजयत् ।
गृहीतवज्ञ: प्रहसंस्तमाह गतविस्मयः ॥
१८॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इन्द्र:--राजा इन्द्र ने; वृत्र-वच:--वृत्रासुर के वचन; श्रुत्वा--सुनकर;गत-अलीकम्ू--द्वैतभाव से रहित; अपूजयत्--पूजा की; गृहीत-वज्ञ:--वज़ धारण किये हुए; प्रहसन्--हँसते हुए; तम्--वृत्रासुर से; आह--कहा; गत-विस्मय:--आश्चर्यरहित होकर |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा--वृत्रासुर के निष्कपट तथा निर्देशात्मकवचन सुनकर राजा इन्द्र ने उसकी प्रशंसा की और अपने वज्ञ को पुनः हाथ में धारणकर लिया।
इसके बाद बिना मोह या द्वैत-भाव से वह हँसा और वृत्रासुर से इस प्रकार बोला।
इन्द्र उबाचअहो दानव सिद्धोउसि यस्य ते मतिरीहशी ।
भक्त: सर्वात्मनात्मानं सुहृदं जगदी श्वरम् ॥
१९॥
इन्द्र: उबाच--इन्द्र ने कहा; अहो--ओह; दानव--हे असुर; सिद्ध: असि--तुम अब सिद्ध हो चुके हो; यस्य--जिसका;ते--तुम्हारी; मतिः--चेतना; ईहशी--इस प्रकार की; भक्त:--परम भक्त; सर्व-आत्मना--विचलित हुए बिना;आत्मानम्--परमात्मा को; सुहृदम्--परम मित्र; जगत्-ईश्वरम्-- श्रीभगवान् को |
इन्द्र ने कहा, हे असुरश्रेष्ठ! मैं देखता हूँ कि संकटमय स्थिति में होते हुए भी अपनेविवेक तथा भक्तियोग में निष्ठा के कारण तुम श्रीभगवान् के पूर्ण भक्त तथा जन-जन केमित्र हो।
भवानतार्षीन्मायां वै वैष्णवीं जनमोहिनीम् ।
यद्विहायासुरं भावं महापुरुषतां गत: ॥
२०॥
भवान्--आप; अतार्षीत्--पार कर चुके हो; मायाम्ू--माया को; बै--निस्सन्देह; वैष्णवीम्-- भगवान् विष्णु की; जन-मोहिनीम्--जनसमूह को मोहने वाली; यत्--क्योंकि; विहाय--त्याग कर; आसुरम्--असुरों का; भावम्--मानसिकता,भाव; महा-पुरुषताम्-महान् भक्त का पद; गत:--प्राप्त कर चुके हो।
तुमने भगवान् विष्णु की माया को पार कर लिया है और इस मुक्ति के कारण तुमनेआसुरी भाव का परित्याग करके महान् भक्त का पद प्राप्त कर लिया है।
खल्विदं महदाश्चर्य यद्रज:प्रकृतेस्तव ।
वबासुदेवे भगवति सत्त्वात्मनि हा मति: ॥
२१॥
खलु--निस्सन्देह; इदम्--यह; महत् आश्चर्यम्-महान् आश्चर्य; यत्--जो; रज:--रजोगुण से प्रभावित; प्रकृते:--जिसकास्वभाव; तब--तुम्हारा; वासुदेवे-- भगवान् श्रीकृष्ण में; भगवति--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्; सत्त्व-आत्मनि--शुद्धसतोगुण में स्थित; हढा--हढ़; मति:--चेतना
हे वृत्रासुर! असुर सामान्यतः रजोगुणी होते हैं, अतः यह कितना महान् आश्चर्य है।
कहाजायेगा कि असुर होकर भी तुमने भक्त-भाव ग्रहण करके अपने मन को पूर्ण पुरुषोत्तमभगवान् वासुदेव में स्थिर कर दिया है, जो सदैव शुद्ध सत्त्व में स्थित रहते हैं।
यस्य भक्तिर्भगवति हरौ नि: श्रेयसे श्वरे ।
विक्रीडतोमृताम्भोधौ कि क्षुद्रैे: खातकोदकै: ॥
२२॥
यस्य--जिसकी; भक्ति:--भक्ति; भगवति--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् में; हरौ--भगवान् हरि में; नि:श्रेयस-ई श्र --परममुक्ति के नियामक; विक्रीडत: --तैरते या खेलते हुए; अमृत-अम्भोधौ--अमृत के समुद्र में; किम्--क्या लाभ है;क्षुद्री:--छोटे; खातक-उदकै:--गटड्ढों के जल से
जो मनुष्य परम कल्याणकारी परमेश्वर हरि की भक्ति में स्थिर है, वह अमृत के समुद्र मेंतैरता है।
उसके लिए छोटे-छोटे गड्ढों के जल से क्या प्रयोजन ?
श्रीशुक उवाचइति ब्रुवाणावन्योन्यं धर्मजिज्ञासया नूप ।
युयुधाते महावीर्याविन्द्रवृत्री युधाम्पती ॥
२३॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; ब्रुवाणौ--बोलते हुए; अन्योन्यम्--परस्पर; धर्म-जिज्ञासया--परम धार्मिक नियम ( भक्तियोग ) जानने की इच्छा से; नृप--हे राजन्; युयुधाते--युद्ध किया; महा-वीयौं --दोनों वीर; इन्द्र--राजा इन्द्र; वृत्रौ--तथा वृत्रासुर ने; युधाम् पती--दोनों महान् सेनानायक ।
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा--वृत्रासुर तथा राजा इन्द्र ने युद्धभूमि में भी भक्तियोग केसम्बन्ध में बातें कीं और अपना कर्तव्य समझकर दोनों पुनः युद्ध में भिड़ गये।
हे राजन!दोनों ही बड़े योद्धा और समान रूप से शक्तिशाली थे।
आविध्य परिधं वृत्र: कार्ष्णायसमरिन्दम: ।
इन्द्राय प्राहिणोद्धोरं वामहस्तेन मारिष ॥
२४॥
आविध्य--घुमाकर; परिघम्--परिघ को; वृत्र:--वृत्रासुर ने; कार्ष्ण-अयसम्--लोहे का बना; अरिम् -दम:--अपने शत्रुको जीतने में सक्षम, शत्रुसदन; इन्द्राय--इन्द्र पर; प्राहिणोत्ू--फेंका; घोरम्--अत्यन्त भयानक; वाम-हस्तेन-- अपने बाएँहाथ से; मारिष--हे राजाओं में श्रेष्ठ, महाराज परीक्षित |
हे महाराज परीक्षित! अपने शत्रु को वश में करने में पूर्ण सक्षम वृत्रासुर ने अपना लोहेका परिघ उठाकर चारों ओर घुमाया और इन्द्र को लक्ष्य बनाकर अपने बाएँ हाथ से उस परफेंका।
स तु वृत्रस्थ परिघं करं च करभोपमम् ।
चिच्छेद युगपद्देवो वज़ेण शतपर्वणा ॥
२५॥
सः--उस ( राजा इन्द्र ) ने; तु--फिर भी; वृत्रस्थ--वृत्रासुर का; परिधम्--लोहे का परिघ; करम्--उसका हाथ; च--तथा; करभ-उपमम्-हाथी के सूँड़ के समान बली; चिच्छेद--खण्ड खण्ड कर दिया; युगपत्--एकसाथ; देव: --श्रीइन्द्र; वज़ेण--वज् से; शत-पर्वणा--एक सौ जोड़ों वाले
इन्द्र ने अपने शतपर्वन नामक वज्ञ से वृत्रासुर के परिघ तथा उसके बचे हुए हाथ कोएक साथ खण्ड-खण्ड कर डाला।
दोर्भ्यामुत्कृत्तमूलाभ्यां बभौ रक्तस्त्रवोउसुरः ।
छिन्नपक्षो यथा गोत्र: खादभ्रष्टो वज़िणा हतः ॥
२६॥
दोर्भ्याम्-दोनों भुजाओं से; उत्कृत्त-मूलाभ्यामू--जड़ से कटी हुई; बभौ--था; रक्त-स्त्रव:--तेजी से रक्त की धार बहने;असुरः--वृत्रासुर; छिन्न-पक्ष: --कटे पंखों वाला; यथा--जिस प्रकार; गोत्र:--पर्वत; खातू--आकाश से; भ्रष्ट: --गिरकर; वज़िणा--वज़्धारी इन्द्र के द्वारा; हतः--मारा हुआ
जड़ से दोनों भुजाएँ कट जाने से तेजी से रक्त बहने के कारण वृत्रासुर उड़ते हुए पर्वतके समान सुन्दर लग रहा था जिसके पंखों को इन्द्र ने खण्ड-खण्ड कर दिया हो।
महाप्राणो महावीर्यों महासर्प इव द्विपम्कृत्वाधरां हनुं भूमौ देत्यो दिव्युत्तरां हनुम् ।
नभोगम्भीरवक्हेण लेलिहोल्बणजिह्॒या ॥
२७॥
दंष्टाभि: कालकल्पाभिग्र॑सन्निव जगत्रयम् ।
अतिमात्रमहाकाय आश्षिपंस्तरसा गिरीन् ॥
२८॥
गिरिराट्पादचारीव पदभभ्यां निर्जरयन्महीम् ।
जग्रास स समासाद्य वज़िणं सहवाहनम् ॥
२९॥
महा-प्राण: --महान् शारीरिक शक्ति वाला; महा-वीर्य:--असामान्य शौर्य से सम्पन्न; महा-सर्प:--सबसे बड़ा साँप; इव--समान; द्विपम्--हाथी; कृत्वा--रखकर; अधराम्--निचले; हनुम्--जबड़ा; भूमौ-- भूमि पर; दैत्य:--असुर; दिवि--आकाश में; उत्तराम् हनुमू--ऊपरी जबड़ा; नभ:--आकाश के समान; गम्भीर--गहरा; वक्हेण-- अपने मुख से;लेलिह--साँप की तरह; उल्बण-- भयानक; जिह्ृ॒या--जीभ से; दंष्टाभि:--दाँतों से; काल-कल्पाभि:--काल अर्थात्मृत्यु के ही समान; ग्रसन्--लीलते हुए; इब--मानो; जगत्-त्रयम्-तीनों लोकों को; अति-मात्र--अत्युच्च; महा-काय:--जिसका विशाल शरीर; आक्षिपन्ू--हिलाते हुए; तरसा--वेग से; गिरीन्--पर्वतों को; गिरि-राट्--हिमालयपर्वत; पाद-चारी--पाँवों से चलते हुए; इब--मानो; पद्भ्याम्-- अपने पाँवों से; निर्जरयन्--कुचलते हुए; महीम्--भूपृष्ठको; जग्रास--निगल गया; स:-- वह; समासाद्य--पहुँच कर; वज़िणम्--वज्धारी इन्द्र को; सह-वाहनम्--उसके वाहनहाथी समेत।
वृत्रासुर अत्यन्त शक्तिशाली तथा वीर्यवान् था।
उसने अपने निचले जबड़े को भूमि परऔर ऊपरी जबड़े को आकाश में गड़ा दिया।
उसका मुख इतना गहरा हो गया मानो आकाशहो और उसकी जीभ बहुत बड़े सर्प के सहश लग रही थी।
अपने काल के समान करालदाँतों से वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को निगलने का प्रयास करता प्रतीत हुआ।
इस प्रकार विराट शरीर धारण करके उस महान् असुर वृत्रासुर ने पर्वतों तक को हिला दिया और अपने पाँवोंसे पृथ्वी की सतह को इस प्रकार मर्दित करने लगा मानो वह चलता हुआ साक्षात् हिमालयपर्वत हो।
वह इन्द्र के सामने आया और उसके वाहन ऐरावत समेत उसे इस प्रकार निगलगया मानो एक बड़े अजगर ने हाथी निगल लिया हो।
वृत्रग्रस्तं तमालोक्य सप्रजापतय: सुरा: ।
हा कष्टमिति निर्विण्णाश्चुक्रुशु: समहर्षय: ॥
३०॥
वृत्र-ग्रस्तम्--वृत्रासुर द्वारा निगला जाकर; तम्--उसको ( इन्द्र को )) आलोक्य--देखकर; स-प्रजापतय:--ब्रह्माजी समेतअन्य प्रजापतियों के साथ; सुरा:--सभी देवता; हा--हाय; कष्टम्--कितना कष्ट है; इति--इस प्रकार; निर्विण्णा:--अत्यन्त दुखी होकर; चुक़्ुशु:--विलाप करने लगे; स-महा-ऋषय:--महान् ऋषियों समेत |
जब देवताओं, ब्रह्मा समेत अन्य प्रजापतियों तथा अन्य बड़े-बड़े साधु पुरुषों ने देखाकि असुर ने इन्द्र को निगल लिया है, तो वे अत्यन्त दुखी हुए और ' हाय हाय 'कितनी बड़ीविपत्ति '! कह करके विलाप करने लगे।
निगीर्णो प्यसुरेन्द्रेण न ममारोदरं गत: ।
महापुरुषसन्नद्धो योगमायाबलेन च ॥
३१॥
निगीर्ण:--निगला जाकर; अपि--यद्यपि; असुर-इन्द्रेण-- असुरों में श्रेष्ठ, वृत्रासुर द्वारा; न--नहीं; ममार--मरा; उदरम्--उदर में; गतः--जाकर; महा-पुरुष--परमे श्रर नारायण के कवच से; सन्नद्ध:--सुरक्षित रहकर; योग-माया-बलेन--इन्द्रकी अपनी योगशक्ति से; च--भी |
इन्द्र के पास नारायण का जो सुरक्षा कवच था, वह स्वयं भगवान् नारायण से अभिन्नथा।
उस कवच के द्वारा तथा अपनी योगशक्ति से सुरक्षित होने पर राजा इन्द्र वृत्रासुर द्वारानिगले जाने पर भी उस असुर के उदर में मरा नहीं।
भित्त्वा वज्जेण तत्कुश्नि निष्क्रम्य बलभिद्ठिभु: ।
उच्चकर्त शिरः शत्रोर्गिरिश्रुड्डमिवौजसा ॥
३२॥
भित्त्वा--बेध कर; वज़ेण--वज् से; तत्-कुक्षिम्--वृत्रासुर के उदर को; निष्क्रम्य--बाहर आकर; बल-भित्--बल असुरको मारने वाला; विभु:--शक्तिशाली इन्द्र ने; उच्चकर्त--काट लिया; शिर:--सिर:; शत्रो:--शत्रु का; गिरि- श्रूड़म्ू--पर्वत की चोटी; इब--सहृ॒श; ओजसा--अत्यन्त वेग से |
अत्यन्त शक्तिशाली राजा इन्द्र ने अपने वज्ज के द्वारा वृत्रासुर का पेट फाड़ डाला औरबाहर निकल आया।
बल असुर के मारने वाले इन्द्र ने उसके तुरन्त बाद वृत्रासुर के पर्वत-श्रृंग जैसे ऊँचे सिर को काट लिया।
वज़स्तु तत्कन्धरमाशुवेग:कृन्तन्समन्तात्परिवर्तमानः ।
न्यपातयत्तावदहर्गणेनयो ज्योतिषामयने वार्त्रहत्ये ॥
३३॥
वज्ञ:--वज़; तु--लेकिन; तत्-कन्धरम््--उसकी गर्दन को; आशु-बेग: --यद्यपि अत्यन्त तेज; कृन्तन्--काटते हुए;समन्तात्ू--चारों ओर; परिवर्तमान:--घूमते हुए; न््यपातयत्--गिरा दिया; तावत्--बहुत से; अह:-गणेन--दिनों से; यः--जो; ज्योतिषाम्--सूर्य, चन्द्र जैसे नक्षत्रों का; अयने--विषुवत् रेखा के दोनों ओर जाने में; वार्त्र-हत्ये--वृत्रासुर के वध केलिए उपयुक्त समय पर।
यद्यपि वज्र वृत्रासुर की गर्दन के चारों ओर अत्यन्त वेग से घूम रहा था, किन्तु उसकेशरीर से सिर को विलग करने में पूरा एक वर्ष--३६० दिन--लग गया, जो सूर्य, चन्द्र तथाअन्य नक्षत्रों के उत्तरी तथा दक्षिणी यात्रा पूर्ण करने में लगने वाले समय के तुल्य है।
तबवृत्रासुर के वध का उपयुक्त समय ( योग ) उपस्थित होने पर उसका सिर पृथ्वी पर गिर पड़ा।
तदा च खे दुन्दुभयो विनेदु-गन्धर्वसिद्धा: समहर्षिसड्डा: ।
वार्त्रघ्नलिड्रैस्तमभिष्ठृवानामन्त्रैमुदा कुसुमैरभ्यवर्षन् ॥
३४॥
तदा--उस समय; च--भी; खे--आकाश के स्वर्गिक लोकों में; दुन्दुभय:--दुन्दुभी ( नगाड़े ); विनेदु:--बज उठे;गन्धर्व--गन्धर्व; सिद्धा:--तथा सिद्धगण; स-महर्षि-सज्ञ:--महर्षियों की सभा समेत; वार्त्र-घ्न-लिड्वैः--वृत्रासुर का वधकरने वाले के शौर्य का उत्सव मनाते हुए; तम्--उसको ( इन्द्र को ); अभिष्ठृवाना: --अभिनन्दन करते हुए; मन्त्रै:--विविधमंत्रों से; मुदा--प्रसन्नतापूर्वक; कुसुमैः--फूलों से; अभ्यवर्षन्ू--वर्षा की ।
वृत्रासुर के मारे जाने पर, गन्धर्वों तथा सिद्धों ने हर्षित होकर स्वर्गलोक में दुन्दुभियाँबजाईं।
उन्होंने वृत्रासुर के संहर्ता इन्द्र के शौर्य का वेद-स्त्रोत्रों से अभिनन्दन किया औरअत्यन्त प्रसन्न होकर उस पर फूलों की वर्षा की।
वृत्रस्य देहान्निष्क्रान्तमात्मज्योतिररिन्दम ।
पश्यतां सर्वदेवानामलोक॑ समपद्यत ॥
३५॥
वृत्रस्थ--वृत्रासुर के; देहात्ू--शरीर से; निष्क्रान्तम्--निकली हुई; आत्म-ज्योति:--आत्मा, जो ब्रह्म तेज के समानप्रकाशमान था; अरिम्-दम--शत्रुओं का दमन करने वाले हे राजा परीक्षित; पश्यताम्ू--देख रहे थे; सर्व-देवानामू--जबसभी देवता; अलोकम्--ब्रह्मतेज से पूरित, परम धाम; समपद्यत--प्राप्त किया |
हे शत्रुओं का दमन करने वाले राजा परीक्षित! तब वृत्रासुर के शरीर से सजीव ज्योतिनिकल कर बाहर आई और भगवान् के परम धाम को लौट गई।
सभी देवताओं के देखते-देखते वह भगवान् संकर्षण का संगी बनने के लिए दिव्य लोक में प्रविष्ट हुआ।
