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अध्याय ग्यारह: वृत्रासुर के दिव्य गुण

6.11श्रीशुक उवाचत एवं शंसतो धर्म वच: पत्युरचेतस: ।

नैवागृह्नन्त सम्भ्रान्ताः पलायनपरा नूप ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; ते--वे; एवम्‌--इस प्रकार; शंसत:--प्रशंसा करते; धर्मम्‌--धर्म केनियम को; वच: --शब्द; पत्यु:--अपने स्वामी के; अचेतस: --अत्यन्त विचलित मन से; न--नहीं; एव--निस्सन्देह;अगृहन्त--स्वीकार किया; सम्भ्रान्ता:-- भयभीत; पलायन-परा: -- भागने को उद्यत; नृप--हे राजन

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा--हे राजन्‌! असुरों के प्रधान सेनानायक वृत्रासुर ने अपनेसेनानायकों को धर्म के नियमों का उपदेश दिया, किन्तु वे कायर तथा भगोड़े सेनानायकभय से इतने विचलित हो चुके थे कि उन्होंने उसके वचनों को नहीं माना।

विशीर्यमाणां पृतनामासुरीमसुरर्षभ: ।

कालानुकूलैस्त्रिदशै: काल्यमानामनाथवत्‌ ॥

२॥

इृष्टातप्यत सड्क्रुद्ध इन्द्रशत्रुरमर्पित: ।

तान्निवार्यौजसा राजन्निर्भत्स्येदमुवाच ह ॥

३॥

विशीर्यमाणाम्‌--छिन्न-भिन्न; पृतनाम्‌ू--सेना को; आसुरीम्‌--असुरों की; असुर-ऋषभ:--असुरों में श्रेष्ठ, वृत्रासु; काल-अनुकूलै:--समय के अनुसार परिस्थितियों का पालन करते हुए; त्रिदशै:--देवताओं के द्वारा; काल्यमानामू--पीछा कियेगये; अनाथ-वत्‌--असुरक्षित की तरह; दृष्टा--देखकर; अतप्यत--दुखी हुआ; सड्क्रुद्ध:--अत्यन्त क्रुद्ध होकर; इन्द्र-शत्रु;--इन्द्र का वैरी, वृत्रासुर; अमर्षित:--न सह सकने से; तान्‌ू--उन ( देवताओं ) को; निवार्य--रोक कर; ओजसा--अत्यन्त बलपूर्वक से; राजन्‌ू--हे राजा परीक्षित; निर्भरत्स्य--डॉँटकर; इृदम्‌--यह; उवाच--कहा; ह--निस्सन्देह

हे राजा परीक्षित! समय द्वारा प्रदत्त अनुकूल अवसर का लाभ उठाकर देवताओं नेअसुरों की सेना पर पीछे से आक्रमण कर दिया और असुर सैनिकों को खदेड़कर इधर-उधरबिखेर दिया, मानो उनकी सेना में कोई नायक ही न हो।

अपने सैनिकों की दयनीय दशा कोदेखकर असुरश्रेष्ठ वृत्रासुर जिसे इन्द्रशत्रु कहा जाता था, अत्यन्त दुखी हुआ।

ऐसी पराजय नसह सकने के कारण उसने देवताओं को रोका और बलपूर्वक डाँटते हुए क्रुद्धभाव से इसप्रकार कहा।

किं व उच्चरितर्मातुर्धावद्धधि: पृष्ठतो हतेः ।

न हि भीतवध: एलाध्यो न स्वर्ग्य: शूरमानिनाम्‌ ॥

४॥

किम्‌--क्या लाभ; वः--तुम्हारे लिए; उच्चरितैः --मल-मूत्र के समान; मातु:--माता का; धावद्धिः-- भागते हुए;पृष्ठतः:--पीछे से; हतैः--मारा; न--नहीं; हि--निश्चय ही; भीत-वध:-- भयभीत पुरुष का वध; एलाघ्य:--प्रशंसनीय;न--न तो; स्वर्ग्य:--स्वर्गलोक की प्राप्ति; शूर-मानिनाम्‌--शूर वीरों का

है देवताओ! इन असुर सौनिकों का जन्म वृथा ही हुआ।

निस्सन्देह, ये अपनी माताओंके शरीर से मलमूत्र के समान आये हैं।

ऐसे शत्रुओं को, जो डर के मारे भाग रहे हैं, पीछे सेमारने में क्या लाभ होगा?

अपने को वीर कहलाने वाले को चाहिए कि वह अपनी मृत्यु सेभयभीत शत्रु का वध न करे।

ऐसा वध न तो प्रशंसनीय है, न ही इससे किसी को स्वर्ग कीप्राप्ति होती है।

यदि व: प्रधने श्रद्धा सारं वा क्षुल्लका हृदि ।

अग्रे तिष्ठत मात्र मे न चेद्ग्राम्यसुखे स्पृह्ा ॥

५॥

यदि--यदि; व:--तुम सबका; प्रधने--युद्ध में; श्रद्धा--विश्वास; सारम्‌-- धैर्य; वा--अथवा; क्षुल्लका:--हे नीचो;हृदि--हृदय में; अग्रे--सामने; तिष्ठत--जरा ठहरो; मात्रमू--एक क्षण के लिए; मे--मेरे; न--नहीं; चेत्‌ू--यदि; ग्राम्य-सुखे--इन्द्रियतृप्ति में; स्पृहा-- आकांक्षा

हे तुच्छ देवो! यदि तुम्हें अपनी वीरता में सचमुच विश्वास है, यदि तुम्हारे अन्तस्थल मेंधैर्य है और यदि तुम इन्द्रियतृप्ति के कामी नहीं हो, तो क्षण भर मेरे समक्ष ठहरो।

एवं सुरगणान्क्रुद्धो भीषयन्वपुषा रिपून्‌ ।

व्यनदत्सुमहाप्राणो येन लोका विचेतस: ॥

६॥

एवम्‌--इस प्रकार; सुर-गणान्‌--देवतागण को; क्रुद्ध:--अत्यन्त क्रुद्ध होकर; भीषयन्‌--डरावने; वपुषा-- अपने शरीरसे; रिपूनू--अपने शत्रुओं को; व्यनदत्‌--गरजा; सु-महा-प्राण:--परम बलवान्‌ वृत्रासुर; येन--जिससे; लोका:--सभीलोग; विचेतस:--अचेत, बेहोश

शुकदेव गोस्वामी ने कहा--अति क्रुद्ध एवं अत्यन्त शक्तिशाली वीर वृत्रासुर देवताओंको अपने बलिष्ठ एवं गठित शरीर से भयभीत करने लगा।

जब उसने जोर से गर्जना की तोलगभग सारे जीव अचेत हो गये।

तेन देवगणा: सर्वे वृत्रविस्फोटनेन वे ।

निपेतुर्मूर्च्छिता भूमौ यथेवाशनिना हता: ॥

७॥

तेन--उससे; देव-गणा:--देवता; सर्वे--समस्त; वृत्र-विस्फोटनेन--वृत्रासुर की भयानक गर्जना से; बै--निस्सन्देह;निपेतु:--गिर पड़े; मूर्च्छिता:--मूर्च्छित होकर; भूमौ--पृथ्वी पर; यथा--जिस प्रकार; एब--निस्सन्देह; अशनिना--वज्ञसे; हता:--मारे गये

जब समस्त देवताओं ने वृत्रासुर की सिंह जैसी भयानक गर्जना सुनी तो वे मूर्च्छितहोकर पृथ्वी पर गिर पड़े, मानो उन पर वज्ञपात हुआ हो।

मर्मर्द पदभ्यां सुरसैन्यमातुरंनिमीलिताक्ष॑ रणरड्डदुर्मद: ।

गां कम्पयत्रुद्यतशूल ओजसानालं वन॑ यूथपतिर्यथोन्मद: ॥

८॥

ममर्द--कुचल दिया; पद्भ्याम्‌--अपने पैरों से; सुर-सैन्यम्‌--देवताओं की सेना को; आतुरम्‌-- अत्यन्त भयभीत;निमीलित-अक्षम्‌--बन्द नेत्रों वाले; रण-रड्ड-दुर्मद:--युद्धभूमि में अजेय; गाम्‌--पृथ्वी मंडल को; कम्पयन्‌--हिलातेहुए; उद्यत-शूलः--अपना त्रिशूल लेकर; ओजसा--अपने बल से; नालम्‌ू--नरकट के; वनम्‌--जंगल; यूथ-पति:--हाथी; यथा--जिस प्रकार; उन्मद:--पगलाया |

ज्योंही देवताओं ने डर के मारे अपनी आँखें बन्द कर लीं, वृत्रासुर ने अपना त्रिशूल उठाकरके और अपने बल से पृथ्वी को दहलाते हुए युद्धभूमि में देवताओं को अपने पैरों के तलेउसी प्रकार रौंद डाला जिस प्रकार पागल हाथी नरकट के वन को रौंद डालता है।

विलोक्य तं वज्ञधरोत्यमर्षित:स्वशत्रवेभिद्रवते महागदाम्‌ ।

चिक्षेप तामापततीं सुदुःसहांजग्राह वामेन करेण लीलया ॥

९॥

विलोक्य--देखकर; तम्‌--उस ( वृत्रासुर ) को; वज्ञर-धर:--वज् धारण किये हुए ( राजा इन्द्र ) ने; अति--अत्यधिक;अमर्षित:--क्रुद्ध; स्व-- अपने; शत्रवे --शत्रु के प्रति; अभिद्रवते--दौड़ते हुए; महा-गदाम्‌--अत्यन्त शक्तिशाली गदा;चिक्षेप--फेंका; तामू--उस ( गदा ) को; आपततीम्‌--अपनी ओर आती; सु-दुःसहाम्‌--सामना करना कठिन; जग्राह--पकड़ लिया; वामेन-- अपने बाएँ; करेण--हाथ से; लीलया--आसानी से

वृत्रासुर की करतूत देखकर स्वर्ग का राजा इन्द्र अधीर हो उठा और उस पर अपनी एकगदा फेंकी, जिसको रोकपाना अत्यन्त दुष्कर था।

फिर भी ज्योंही वह गदा उसकी ओरपहुँची, वृत्रासुर ने उसे अपने बाएँ हाथ से सरलतापूर्वक पकड़ लिया।

स इन्द्रशत्रु: कुपितो भूशं तयामहेन्द्रवाहं गदयोरुविक्रमः ।

जघान कुम्भस्थल उन्नदन्मृधेतत्कर्म सर्वे समपूजयन्रूप ॥

१०॥

सः--वह; इन्द्र-शत्रु;--वृत्रासुर; कुपित:--क्रुद्ध; भूशम्‌-- अत्यधिक; तया--उससे; महेन्द्र-वाहम्‌--इन्द्र का वाहन जोहाथी है; गदया--गदा से; उरू-विक्रम:--अपने बल के लिए विख्यात; जघान--मारा; कुम्भ-स्थले--सिर पर; उन्नदन्‌--चिग्घाड़ करता हुआ; मृथे--युद्ध में; तत्‌ कर्म--वह कार्य ( इन्द्र के हाथी के सिर पर वार ); सर्वे--सभी सैनिक दोनोंपक्षों के समपूजयन्‌--प्रशंसा की; नृप--हे राजा परीक्षित!

हे राजा परीक्षित! इन्द्र के शत्रु, पराक्रमी वृत्रासुर ने उस गदा से क्रोधपूर्वक इन्द्र के हाथीके सिर पर जोर से प्रहार किया जिससे वह युद्धभूमि में चिग्घाड़ने लगा।

इस वीरता पूर्णकार्य के लिए दोनों पक्षों के सैनिकों ने उसकी प्रशंसा की।

ऐरावतो वृत्रगदाभिमृष्टोविघूर्णितोउद्रवि: कुलिशाहतो यथा ।

अपासरद्धिन्नमुखः सहेन्द्रोमुझ्नन्नसृक्सप्तधनुर्भशार्त: ॥

११॥

ऐराबत: --राजा इन्द्र का हाथी, ऐरावत; वृत्र-गदा-अभिमृष्ट:--वृत्रासुर की गदा के आघात से; विघूर्णित: --चकराकर;अद्विः--पर्वत; कुलिश--वबज़ से; आहत: -- प्रताड़ित; यथा--जिस प्रकार; अपासरत्‌--पीछे हट गया; भिन्न-मुख: --मुँहटूट जाने से; सह-इन्द्र:--इन्द्र सहित; मुझ्ननू--उगलते हुए; असृक्‌--रक्त; सप्त-धनु:--सात बाणों के तुल्य दूरी ( लगभगचौदह गज ); भूश--अत्यधिक; आर्त:--व्याकुल।

वृत्रासुर की गदा के आघात से ऐरावत हाथी वज़न के द्वारा ताड़ित पर्वत के समान, तीत्रवेदना का अनुभव करता हुआ तथा अपने टूटे मुँह से रक्त उगलता हुआ चौदह गज पीछेछिटक गया।

भारी वेदना के कारण वह पीठ पर बैठे इन्द्र के समेत भूमि पर गिर पड़ा।

न सन्नवाहाय विषण्णचेतसेप्रायुड्र भूय: स गदां महात्मा ।

इन्द्रोडमृतस्यन्दिकराभिमर्शवीतव्यथक्षतवाहोवतस्थे ॥

१२॥

न--नहीं; सन्न-- थकित; वाहाय--अपने वाहन के हेतु; विषण्ण-चेतसे--अपने चित्त में अत्यन्त खिन्न; प्रायुड् --चलाया;भूय:--पुनः; सः--उस ( वृत्रासुर ) ने; गदाम्‌--गदा; महा-आत्मा--वह महापुरुष ( इन्द्र को खिन्न देखकर उस पर गदा नचलाने वाला ); इन्द्र:--इन्द्र; अमृत-स्यन्दि-कर--अमृत उत्पन्न करने वाले अपने हाथ के; अभिमर्श--स्पर्श से; वीत--मुक्त; व्यध--पीड़ा से; क्षत--तथा घाव; वाह:--जिसका वाहन हाथी; अवतस्थे--वहाँ आ खड़ा हुआ

जब उसने देखा कि इन्द्र-वाहन हाथी थका हुआ एवं घायल है और उसे इस तरह आहत हुआ देखकर इन्द्र स्वयं खिन्न है, तो वह महापुरुष वृत्रासुर धर्म के नियमों का पालन करतेहुए इन्द्र पर अपनी गदा से पुनः प्रहार करने से हिचका।

इस अवसर का लाभ उठाकर इन्द्र नेअपने अमृतवर्षी हाथ से हाथी को छू दिया जिससे उस पशु की पीड़ा जाती रही और उसकेघाव ठीक हो गये।

तब हाथी तथा इन्द्र दोनों चुपचाप खड़े हो गए।

स तं नृपेन्द्राहवकाम्यया रिपुंवज़ायुध॑ भ्रातृहणं विलोक्य ।

स्मरंश्व तत्कर्म नृशंसमंहःशोकेन मोहेन हसझगाद ॥

१३॥

सः--वह ( वृत्रासुर ); तम्‌--उस ( इन्द्र ) को; नूप-इन्द्र--हे राजा परीक्षित; आहव-काम्यया--युद्ध की इच्छा से; रिपुम्‌--शत्रु को; वज्ञ-आयुधम्‌--जिसका हथियार वज् ( दधीचि की अस्थियों से निर्मित ) था; भ्रातृ-डहणम्‌--अपने भाई का वधकरने वाले; विलोक्य--देखकर; स्मरन्‌--स्मरण करके; च--तथा; तत्‌-कर्म--उसके कार्य; नृ-शंसम्‌--क्रूर; अंह:--बड़ा पाप; शोकेन--शोक से; मोहेन--मोहवश; हसन्‌--हँसता हुआ; जगाद--कहने लगा |

हे राजन्‌! जब महा भट्ट वृत्रासुर ने अपने शत्रु तथा अपने भाई के हत्यारे इन्द्र को अपनेसमश्ष लड़ने के लिए हाथ में बज्न लिए हुए देखा तो उसे स्मरण हो आया कि इन्द्र ने किसक्रूरता के साथ उसके भाई का वध किया था।

इन्द्र के पापकर्मों को सोचते हुए वह शोकतथा विस्मृति से पागल हो उठा।

व्यंग्य से हँसते हुए उसने इस प्रकार कहा।

श्रीवृत्र उबाचदिष्ठदय्या भवान्मे समवस्थितो रिपु-र्यो ब्रह्महा गुरुहा भ्रातृह्ा च ।

दिष्टद्यानुणोउद्याहमसत्तम त्वयामच्छूलनिर्भिन्नदषद्धूदाचिरात्‌ ॥

१४॥

श्री-वृत्र: उवाच--महान्‌ वीर वृत्रासुर ने कहा; दिछ्या--सौभाग्य से; भवान्‌ू-- आप; मे--मेरे; समवस्थित:--( समक्ष )स्थित; रिपु:--मेरा शत्रु; यः--जो; ब्रह्म-हा--ब्राह्मण का वध करने वाला; गुरु-हा--अपने गुरु का वध करने वाला;भ्रातृ-हा--मेरे भाई का वध करने वाला; च-- भी; दिष्टयया--सौभाग्य से; अनृण: --उऋण ( भाई के ); अद्य--आज;अहम्‌-मैं; असत्‌-तम--हे परम घृणित; त्वया--तुम्हारे द्वारा; मत्‌-शूल-मेरे त्रिशूल से; निर्भिन्न-- भेदे जाकर; दृषत्‌--पत्थर की तरह; हृदा--जिसका हृदय; अचिरात्‌--तुरन्त |

श्रीवृत्रासुर ने कहा : वह जिसने ब्राह्मण की हत्या की है, वह जिसने अपने गुरु का वधकिया है, वह जिसने मेरे भाई की हत्या की है, इस समय सौभाग्यवश मेरे शत्रु के रूप में मेरेसामने खड़ा हुआ है।

अरे नीच! जब मैं तुम्हारे पत्थर-सह॒श हृदय को अपने त्रिशूल से भेदडालूँगा तब मैं अपने भाई के ऋण से उऋण हो सकूँगा।

यो नोग्रजस्यात्मविदो द्विजाते-गुरोरपापस्य च दीक्षितस्य ।

विश्रभ्य खड्गेन शिरांस्यवृश्चत्‌पशोरिवाकरुण: स्वर्गकाम: ॥

१५॥

यः--जो; न:ः--हमारे; अग्र-जस्य--बड़े भाई का; आत्म-विद:--जिसे आत्म-साक्षात्कार हो चुका है, स्वरूपसिद्ध; द्वि-जाते: --सुपात्र ब्राह्मण; गुरो:--तुम्हारा गुरु; अपापस्थ--समस्त पापकर्मो से मुक्त; च--भी; दीक्षितस्य--यज्ञ की दीक्षादेने वाले के रूप में नियुक्त; विश्रभ्य--विश्वासपूर्वक; खड्गेन-- अपनी तलवार से; शिरांसि--सिर; अवृश्चत्‌--काटलिया; पशो:--पशु का; इब--सहृश; अकरुण: --निर्दय; स्वर्ग-काम: --स्वर्ग लोक की इच्छा करने वाले |

तुमने स्वर्ग में निवास करते रहने के उद्देश्य से मेरे बड़े भाई का, जो स्वरूपसिद्ध( आत्मवेत्ता ), निष्पाप एवं सुपात्र ब्राह्मण था, जिसे तुमने अपना मुख्य पुरोहित नियुक्त कियाथा, वध कर दिया है।

वह तुम्हारा गुरु था और यद्यपि तुमने अपना यज्ञ कराने का सारा भारउस पर छोड़ रखा था, किन्तु बाद में अत्यन्त क्रूरता के साथ उसके सिर को शरीर से उसीप्रकार छिन्न कर दिया जिस प्रकार कोई पशु की हत्या कर दे।

श्रीह्लीदयाकीर्तिभिरुज्झितं त्वांस्वकर्मणा पुरुषादैश्च गहाम्‌ ।

कृच्छेण मच्छूलविभिन्नदेह-मस्पृष्टवह्निं समदन्ति गृश्रा: ॥

१६॥

श्री--ऐश्वर्य या सौन्दर्य; ही --लज्जा; दया--दया; कीर्तिभि:ः--तथा कीर्ति से; उज्झितम्‌--विहीन होकर; त्वाम्‌ू--तुम;स्व-कर्मणा--अपने कर्मों से; पुरुष-अदैः --राक्षसों ( मनुष्य भक्षी ) के द्वारा; च--तथा; गहा॑म्‌--निनन्‍्दनीय; कृच्छेण--कठिनाई से; मत्‌-शूल--मेंरे त्रिशूल से; विभिन्न--बिंध कर; देहम्‌--तुम्हारा शरीर; अस्पृष्ट-वह्िम्‌-- अग्नि द्वारा न छुआजाकर; समदन्ति--खा जायेंगे; गृक्षा:--गीधओआरे

इन्द्र! तुम सभी प्रकार की लज्जा, दया, कीर्ति तथा ऐश्वर्य से विहीन हो।

अपनेसकाम कर्मों के फल से इन सदगुणों से रहित होकर तुम राक्षसों के द्वारा भी निन्दनीय हो।

अब मैं तुम्हारे शरीर को अपने त्रिशूल से बेध डालूँगा और जब तुम घोर कष्ट से मरोगे तोअग्नि भी तुम्हारा स्पर्श नहीं करेगी, केवल गीध तुम्हारे शरीर को खायेंगे।

अन्येजनु ये त्वेह नृशंसमज्ञायदुद्यतास्त्रा: प्रहरन्ति महाम्‌ ।

तैर्भूतनाथान्सगणान्निशातत्रिशूलनिर्भिन्नगलैर्यजामि ॥

१७॥

अन्ये--अन्य लोग; अनु--अनुमान करते हैं; ये--जो; त्वा--तुम; इह--इस सम्बध में; नू-शंसम्‌--अत्यन्त क्रूर; अज्ञा:--जो मेरे शौर्य से परिचित नहीं हैं; यत्‌--यदि; उद्यत-अस्त्रा:--अपनी तलावारें उठाये हुए; प्रहरन्ति-- आक्रमण करते हैं;महाम्‌--मुझको; तैः--उनसे; भूत-नाथान्‌--भूतों के स्वामियों को, यथा भेरव; स-गणान्‌--अपने गणों सहित; निशात--तेज किया हुआ; त्रि-शूल--त्रिशूल से; निर्भिन्न--बेधा हुआ या भिन्न किया हुआ; गलै: --गर्दनों वाले; यजामि--बलिदूँगा।

तुम स्वभाव से क्रूर हो।

यदि अन्य देवता मेरे शौर्य से अपरिचित रह कर तुम्हारे अनुयायीबनकर अपने उठे हुए हथियारों से मुझ पर आक्रमण करते हैं, तो मैं अपने इस तीक्ष्ण त्रिशूलसे उनके सिर काट लूँगा और उन सिरों को भेरव तथा उनके गणों सहित अन्य भूतों केनायकों को बलि चढ़ाऊँगा।

अथो हरे मे कुलिशेन वीरहर्ता प्रमथ्यैव शिरो यदीह ।

तत्रानृणो भूतबलिं विधायमनस्विनां पादरजः प्रपत्स्ये ॥

१८॥

अथो--अन्यथा; हरे--हे इन्द्र; मे--मेरे; कुलिशेन--अपने वज् से; वीर--हे वीर; हर्ता--काट लो; प्रमथ्य--मेरी सेना कोनष्ट करके; एव--निश्चय ही; शिर:--सिर; यदि--यदि; इह--इस युद्ध में; तत्र--उस दशा में; अनृूण:--उऋण; भूत-बलिम्‌--समस्त जीवात्माओं के लिए भेंट; विधाय--व्यवस्था करके; मनस्विनाम्‌--नारद मुनि जैसे परम साधुओं की;पाद-रज:--चरणकमलों की धूलि; प्रपत्स्े--प्राप्त करूँगा |

किन्तु यदि तुम इस युद्ध में अपने वज्ञ से मेरा सर काट लेते हो और मेरे सैनिकों को मारडालते हो तो हे इन्द्र, हे महान्‌ वीर! मैं अपने शरीर को अन्य जीवात्माओं ( यथा सियारों तथागीधों ) को भेंट करने में अति प्रसन्न हूँगा।

इस कारण मैं अपने कर्मबन्धन के फलों से छूटजाऊँगा और यह मेरा अहोभाग्य होगा कि मैं नारद मुनि जैसे परम भक्तों के चरणकमलों कीधूलि प्राप्त करूँगा।

सुरेश कस्मान्न हिनोषि वजनपुरः स्थिते वैरिणि मय्यमोघम्‌ ।

मा संशयिष्ठा न गदेव वज्रःस्थान्निष्फल: कृपणार्थेव याच्ञा ॥

१९॥

सुर-ईश-हे देवों के राजा; कस्मात्‌ू-क्यों; न--नहीं; हिनोषि--छोड़ते; वज़म्‌--वज्; पुरः स्थिते--तुम्हारे समक्ष खड़ाहुआ; वैरिणि--तुम्हारा शत्रु; मयि--मुझ पर; अमोघम्‌--न चूकने वाला ( वज् ); मा--मत; संशयिष्ठा:--सन्देह करो;न--नहीं; गदा इब--गदा के समान; वज्ञ:--वज़; स्यथात्‌ू--हो सकता है; निष्फल:--बेकार; कृपण--कंजूस व्यक्ति से;अर्था--धन के लिए; इव--सहृश; याच्ञा--याचना।

हे स्वर्ग के राजा इन्द्र! तुम अपने समक्ष खड़े अपने शत्रु मुझ पर अपना वज्र क्‍यों नहींछोड़ते ?

यद्यपि गदा द्वारा मुझ पर किया गया तुम्हारा प्रहार निश्चय ही उसी प्रकार निष्फल होगया था, जिस प्रकार कंजूस से धन की याचना निष्फल होती है, किन्तु तुम्हारे द्वारा धारणकिया गया यह वज्र निष्फल नहीं होगा।

तुम्हें इस विषय में तनिक भी सन्देह नहीं करनाचाहिए।

नन्वेष वज्स्तव शक्र तेजसाहरेर्दधीचेस्तपसा च तेजित: ।

तेनैव शत्रुं जहि विष्णुयन्त्रितोयतो हरिरविजय: श्रीर्गुणास्ततः ॥

२०॥

ननु--निश्चय ही; एष:--यह; वज्ः --वज़; तव--तुम्हारा; शक्र--हे इन्द्र; तेजसा--तेज से; हरेः-- भगवान्‌ विष्णु के;दधीचे:--दधीचि की; तपसा--तपस्या से; च--तथा; तेजित:--शक्तिसम्पन्न; तेन--उससे; एव--निश्चय ही; शत्रुम्‌--अपने शत्रु को; जहि--मारो; विष्णु-यन्त्रित:-- भगवान्‌ विष्णु द्वारा आदेशित; यतः--जहाँ कहीं भी; हरिः-- भगवान्‌विष्णु; विजय:--विजय; श्री: --ऐश्वर्य; गुणा:--अन्य सद्‌गुण; तत:--वहाँ |

हे स्वर्ग के राजा इन्द्र! तुमने जिस वज्र को मुझे मारने के लिए धारण किया है, वहभगवान्‌ विष्णु के तेज तथा दधीचि की तपस्या-शक्ति से समन्वित है।

चूँकि तुम यहाँभगवान्‌ विष्णु की आज्ञा से मुझे मारने आये हो अत: इसमें अब कोई सन्‍्देह नहीं कि तुम्हारेवज् के छूटने से मैं मारा जाऊँगा।

भगवान्‌ विष्णु तुम्हारा साथ दे रहे हैं, अतः विजय, ऐश्वर्यतथा समस्त सदगुण निश्चय ही तुम्हारे साथ हैं।

विजय तो वृत्रासुर की होनी थी, इन्द्र की नहीं।

अहं समाधाय मनो यथाह नःसट्डूर्षणस्तच्चरणारविन्दे ।

त्वद्बज़रंहोलुलितग्राम्यपाशोगतिं मुनेर्याम्यपविद्धलोक: ॥

२१॥

अहम्‌-मैंने; समाधाय--स्थिर करके; मन: --मन; यथा--जिस प्रकार; आह--कहा; नः--हमारा; सड्डूर्षण:-- भगवान्‌संकर्षण; ततू-चरण-अरविन्दे--उनके चरण कमलों पर; त्वत्‌-वज्--तुम्हारे बज़ को; रंह:--वेग से; लुलित--विच्छेदित;ग्राम्य-- भौतिक आसक्ति; पाश:--फन्दा; गतिम्‌--गन्तव्य; मुनेः --नारद मुनि तथा अन्य भक्तों का; यामि--प्राप्त करूँगा;अपविद्ध-त्याग कर; लोक:--यह संसार जहाँ सभी प्रकार की नश्वर वस्तुओं की कामना की जाती है।

तुम्हारे वज़ के वेग से मैं भौतिक बन्धन से मुक्त हो जाऊँगा और यह शरीर तथा भौतिक'कामनाओं वाला यह संसार त्याग दूँगा।

मैं भगवान्‌ संकर्षण के चरणकमलों पर अपने मनको स्थिर करके नारद मुनि जैसे महामुनियों के गन्तव्य को प्राप्त कर सकूँगा जैसा किभगवान्‌ संकर्षण ने कहा है।

रखते हैं और कभी भी भगवान्‌ के धाम लौट जाने के इच्छुक नहीं रहते।

पुंसां किलैकान्तधियां स्वकानांया: सम्पदो दिवि भूमौ रसायाम्‌ ।

न राति यददवेष उद्देग आधि-मंद: कलिवर्यसनं सम्प्रयास: ॥

२२॥

पुंसामू--मनुष्यों को; किल--निश्चय ही; एकान्त-धियाम्‌-- आध्यात्मिक चेतना में उन्नत; स्वकानाम्‌-- श्री भगवान्‌ केअपने; या:--जो; सम्पद: --ऐश्वर्य; दिवि--स्वर्गलोक में; भूमौ--मध्यलोक में; रसायाम्‌ू--तथा अध: लोकों में; न--नहीं; राति-- प्रदान करता है; यत्‌--जिससे; द्वेष:--द्वेष, ईर्ष्या; उद्देग:--चिन्ता; आधि:--मानसिक क्षोभ; मदः--घमंड;कलि:--कलह; व्यसनम्‌--हानि के कारण उत्पन्न दुख; सम्प्रयास: --महान्‌ प्रयत |

श्रीभगवान्‌ के चरणारविन्द में जो व्यक्ति पूर्णतया समर्पित होते हैं और निरन्तर उनकेचरणारविन्द का चिन्तन करते हैं, उन्हें भगवान्‌ अपने पार्षदों या सेवकों के रूप में स्वीकारकर लेते हैं।

भगवान्‌ ऐसे सेवकों को उच्च, मध्य तथा निम्न लोकों का आकर्षक ऐश्वर्यप्रदान नहीं करते, क्योंकि जब उन्हें इन लोकों में से किसी एक की भी प्राप्ति हो जाती है, तोउससे शत्रुता, चिन्ता, मानसिक क्षोभ, अभिमान तथा कलह की वृद्धि होती है।

इस प्रकारमनुष्य को अपनी सम्पत्ति को बढ़ाने और उसको बनाये रखने में काफी प्रयास करना पड़ताहै और जब सम्पत्ति की क्षति हो जाती है, तो उसे भारी दुख होता है।

अऔैवर्गिकायासविघातमस्मत्‌ -पतिर्विधत्ते पुरुषस्य शक्र ।

ततो<नुमेयो भगवत्प्रसादोयो दुर्लभोडकिद्ञनगोचरो उन्यै: ॥

२३॥

त्रै-वर्गिक--तीन उद्देश्यों के लिए जो धर्म, अर्थ तथा काम हैं; आयास--प्रयत्त; विघातम्‌--विनाश; अस्मत्‌--हमारा;पति:--भगवान्‌; विधत्ते--करता है; पुरुषस्थ--भक्त का; शक्र--हे इन्द्र; ततः--जिससे; अनुमेय: --यह अनुभव लगायाजाता है; भगवत्‌-प्रसाद:-- श्री भगवान्‌ की विशेष कृपा; यः--जो; दुर्लभ:--प्राप्त करना अत्यन्त कठिन; अकिञ्ञन-गोचरः--शुद्ध भक्तों की पहुँच में; अन्यैः--दूसरों के द्वारा, जो भौतिक सुख चाहते हैं।

हमारे भगवान्‌ अपने भक्तों को धर्म, अर्थ तथा काम ( इन्द्रिय-तृप्ति ) के लिए वृथाप्रयास करने के प्रति वर्जित करते हैं।

हे इन्द्र! इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है किभगवान्‌ कितने दयालु हैं।

ऐसी कृपा केवल शुद्ध भक्तों को प्राप्य है, भौतिक लाभ चाहनेवाले व्यक्तियों को नहीं।

अहं हरे तव पादैकमूल-दासानुदासो भवितास्मि भूयः ।

मनः स्मरेतासुपतेग्ुणांस्तेगृणीत वाक्र्म करोतु कायः ॥

२४॥

अहम्‌; हरे--हे भगवन्‌; तव--तुम्हारे ( आपके ); पाद-एक-मूल--जिसकी एकमात्र शरण भगवत-चरणकमल है;दास-अनुदास:--आपके दास का भी दास; भवितास्मि--होऊँगा; भूयः--पुन:; मन: --मेरा मन; स्मरेत--स्मरण करे;असु-पते:--मेरे जीवन के स्वामी का; गुणान्‌ू--गुण समूह; ते--आपका; गृणीत--जप करें; वाक्‌--मेरे शब्द; कर्म--आपकी सेवा के लिए कार्य; करोतु--करे; काय:--मेरा शरीर।

है भगवन्‌! कया मैं पुन आपका दासानुदास बन सकूँगा जो आपके ही चरमकमल कीशरण लेते हैं ?

हे मेरे जीवनाधार! कया मैं आपके दासों का दास बन सकूँगा जिससे मेरा मनसदैव आपके दिव्य गुणों को स्मरण करता रहे, मेरी वाणी नित्य आपके गुणों का गानकरती रहे और मेरा शरीर आपकी प्रेम-भक्ति में निरन्तर लगा रहे?

न नाकपृष्ठे न च पारमेष्ठयंन सार्वभौम॑ न रसाधिपत्यम्‌ ।

न योगसिद्धीरपुनर्भव॑ं वासमझस त्वा विरहय्य काड्झे ॥

२५॥

न--नहीं; नाक-पृष्ठम्‌--स्वर्गलोक या ध्रुवलोक; न--न तो; च-- भी; पारमेष्ठयम्‌--जिस लोक में ब्रह्मा रहते हैं; न--नतो; सार्व-भौमम्‌--समस्त पृथ्वी लोकों पर एकाधिपत्य; न--नहीं; रसा-आधिपत्यम्‌--अधोलोकों का स्वामित्व; न--नहीं; योग-सिद्धी:--आठ प्रकार की यौगिक शक्तियाँ ( अणिमा, लघिमा, महिमा इत्यादि ) ; अपुन:-भवम्‌--पुनर्जन्म सेछुटकारा; वा--अथवा; समझजस--हे समस्त अवसरों के स्त्रोत; त्वा--तुम से; विरहय्य--से पृथक्‌ किया हुआ; काइक्षे--कामना करता हूँ।

हे समस्त सौभाग्य के स्त्रोत भगवान्‌! मुझे न तो श्रुवलोक में, न स्वर्ग में अथवाब्रह्मलोक में सुख भोगने की इच्छा है और न ही मैं समस्त भू-लोकों अथवा अधःलोकों कासर्वोच्च अधिपति बनना चाहता हूँ।

मैं योग शक्तियों का स्वामी भी नहीं बनना चाहता, न हीआपके चरणकमलों को त्याग कर मोक्ष की कामना करता हूँ।

अजातपक्षा इव मातरं खगा:स्तन्यं यथा वत्सतरा: श्षुधार्ता: ।

प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णामनो रविन्दाक्ष दिहक्षते त्वाम्‌ू ॥

२६॥

अजात-पक्षा:--जिनके अभी तक पंख नहीं उगे; इब--सद्ृश; मातरम्‌--माता; खगा: --छोटे पक्षी; स्तन्यम्‌ू--स्तन कादूध; यथा--जिस प्रकार; वत्सतरा:--बछड़े; क्षुध्‌-आर्ता:-- भूख से पीड़ित; प्रियम्‌--प्रिय या पति; प्रिया--पत्नी याप्रेमिका; इब--सहश; व्युषितम्‌--प्रवासी, घर से दूर; विषण्णा--दुखी; मन:ः--मेरा मन; अरविन्द-अक्ष--हे कमल नेत्रवाले; दिद्दक्षेते--देखना चाहता है; त्वाम्‌ू--तुमको

है कमलनयन भगवान्‌! जैसे पक्षियों के पंखविहीन बच्चे अपनी माँ के लौटने तथाखिलाये जाने की प्रतीक्षा करते रहते हैं, जैसे रस्सियों से बँधे छोटे-छोटे बछड़े गाय दुहे जानेकी प्रतीक्षा करते रहते हैं जिससे उन्हें अपनी माताओं का दूध पीने को मिले या जैसेवियोगिनी पत्नी घर से दूर बसे अपने प्रवासी पति के लौटने तथा सभी प्रकार से तुष्ट कियेजाने के लिए लालायित रहती है, उसी प्रकार मैं आपकी प्रत्यक्ष सेवा करने के अवसर पानेके लिए सदैव उत्कण्ठित रहता हूँ।

ममोत्तमश्लोकजनेषु सख्यंसंसारचक्रे भ्रमतः स्वकर्मभि: ।

त्वन्माययात्मात्मजदारगेहेष्व्‌आसक्तचित्तस्य न नाथ भूयात्‌ ॥

२७॥

मम--मेरा; उत्तम-श्लोक-जनेषु-- भक्तों में से, जो श्रीभगवान्‌ के प्रति आसक्त हैं; सख्यम्‌--मित्रता; संसार-चक्रे --जन्म-मरण के चक्कर में; भ्रमत:--घूमता हुआ; स्व-कर्मभि:--अपने ही कर्मो के फल से; त्वत्‌ू-मायया--आपकी माया से;आत्म--शरीर; आत्म-ज--सनन्‍्तान; दार--पतली; गेहेषु--तथा घर में; आसक्त--लिप्त; चित्तस्य--जिसका मन; न--नहीं;नाथ--हे भगवान्‌; भूयात्‌--हो |

हे भगवान्‌, हे स्वामी! मैं अपने सकाम कर्मों के फलस्वरूप इस पूरे भौतिक जगत मेंघूम रहा हूँ और मैं आपके पवित्र तथा प्रबुद्ध भक्तों की संगति की ही खोज कर रहा हूँ।

आपकी बहिरंगा शक्ति अर्थात्‌ माया के प्रभाव से अपने शरीर, पत्नी, सन्‍्तान तथा घर केप्रति मेरी आसक्ति बनी हुई है, किन्तु मैं अब और अधिक आसक्त नहीं बने रहना चाहता।

मेरा मन, मेरी चेतना तथा मेरा सर्वस्व आपके ही प्रति आसक्त रहे।

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