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अध्याय दस: देवताओं और वृत्रासुर के बीच युद्ध
6.10श्रीबादरायणिरुवाचइन्द्रमेवं समादिश्य भगवान्विश्वभावन: ।
पश्यतामनिमेषाणां तत्रैवान्तर्दधे हरिः ॥
१॥
श्री-बादरायणि: उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इन्द्रम्ू--इन्द्र को; एवम्--इस प्रकार; समादिश्य--उपदेश देकर;भगवान्--श्रीभगवान्; विश्व-भावन: --समस्त विश्व का आदि कारण; पश्यताम् अनिमेषाणाम्--देवताओं द्वारा टकटकीलगाकर देखे जाने पर; तत्र--वहीं पर; एब--निस्सन्देह; अन्तर्दधे--अन्तर्धान हो गये; हरिः-- भगवान् |
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा--इस प्रकार इन्द्र को आदेश देकर भगवान् हरि, जो दृश्यजगत के कारणस्वरूप हैं, देवताओं के देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये।
तथाभियाचितो देवैरृषिराथर्वणो महान् ।
मोदमान उवाचेदं प्रहसन्निव भारत ॥
२॥
तथा--इस प्रकार; अभियाचित:--माँगे जाने पर; देवै:ः--देवताओं के द्वारा; ऋषि:--परम साधु पुरुष; आथर्वण: --अर्थर्वा के पुत्र, दधीचि ने; महान्--महापुरुष; मोदमान: --प्रसन्न होकर; उवाच--कहा; इृदम्--यह; प्रहसन्--हँसते हुए;इब--कुछ-कुछ; भारत--हे महाराज परीक्षित!
हे राजा परीक्षित! भगवान् की आज्ञानुसार देवतागण अथर्वा के पुत्र दधीचि के पासपहुँचे।
वे अत्यन्त उदार थे और जब देवताओं ने उनसे शरीर देने के लिए प्रार्थना की तो वेतुरन्त तैयार से हो गये।
किन्तु उनसे धार्मिक उपदेश सुनने के उद्देश्य से वे हँसे और विनोद मेंइस प्रकार बोले।
अपि वृन्दारका यूयं न जानीथ शरीरिणाम् ।
संस्थायां यस्त्वभिद्रोहो दुःसहश्चेतनापह: ॥
३॥
अपि--यद्यपि; वृन्दारका:--देवताओ; यूयम्--तुम सब; न जानीथ--नहीं जानते; शरीरिणाम्--शरीरधारियों की;संस्थायाम्--मृत्यु के समय या शरीर त्यागते समय; य:--जो; तु--तब; अभिद्रोह: --तीक्ष्ण वेदना; दुःसह:--असहा;चेतन--चेतना; अपह:--चली जाती है
है देवताओ! मृत्यु के समय तीक्ष्ण असह्ा वेदना के कारण समस्त देहधारी जीवात्माओंकी चेतना जाती रहती है।
क्या तुम्हें इस वेदना का पता नहीं है ?
जिजीविषूणां जीवानामात्मा प्रेष्ठ इहेप्सितः ।
क उत्सहेत तं दातुं भिक्षमाणाय विष्णवे ॥
४॥
जिजीविषूणाम्--जीवित रहने के इच्छुक; जीवानाम्--समस्त जीवात्माओं का; आत्मा--शरीर; प्रेष्ठ:--अत्यन्त प्रिय;इह--यहाँ; ईप्सित:--इच्छित; कः--कौन; उत्सहेत--सह सकता है; तमू--उस शरीर को; दातुम्-देने के लिए;भिक्षमाणाय--माँगने के लिए; विष्णवे-- भगवान् विष्णु को भी |
इस भौतिक जगत में प्रत्येक जीवात्मा को अपना शरीर अत्यन्त प्रिय है।
अपने शरीर कोअक्षुण्ण बनाये रखने के संघर्ष में वह सभी प्रकार से, यहाँ तक कि अपना सर्वस्व न्यौछावरकरके, बचाये रखने का प्रयत्त करता है।
अतः ऐसा कौन है, जो अपना शरीर किसी अन्यको दान देना चाहेगा, भले ही भगवान् विष्णु क्यों न माँगें ?
तात्पर्य : कहा गया है-- आत्मान॑ सर्वतो रक्षेत् तो धर्म तो धनम--मनुष्य को सब प्रकार से श्रीदेवा ऊचुःकि नु तहुस्त्यजं ब्रह्मन्पुंसां भूतानुकम्पिनाम् ।
भवद्विधानां महतां पुण्यश्लोकेड्यकर्मणाम् ॥
५॥
श्री-देवा: ऊचु;--देवताओं ने कहा; किमू--क्या; नु--निस्सन्देह; तत्ू--वह; दुस्त्यजम्--छोड़ना कठिन; ब्रह्मनू-हे पूज्यब्राह्मण; पुंसामू--मनुष्यों का; भूत-अनुकम्पिनाम्--जीवात्माओं के दुखों के प्रति अत्यन्त सहानुभूत लोग; भवत्-विधानाम्--आप जैसे; महताम्--महान्; पुण्य-श्लोक-ईड्य-कर्मणाम्--जिनके पुण्यकार्यों की सभी विद्वान प्रशंसा करतेहैं।
देवताओं ने उत्तर दिया--हे ब्रह्मन्! आप जैसे पवित्र तथा प्रशंसनीय कार्यों वाले पुरुषसभी व्यक्तियों पर परम दयालु एवं वत्सल होते हैं।
ऐसी पवित्र आत्माएँ परोपकार के लिएक्या नहीं दे सकतीं ?
वे सब कुछ, यहाँ तक कि अपना शरीर भी, दे सकती हैं।
नून॑ स्वार्थपरो लोको न वेद परसड्ड्टम् ।
यदि वेद न याचेत नेति नाह यदी श्वर: ॥
६॥
नूनम्ू--निश्चय ही; स्व-अर्थ-पर:--इस अथवा अगले जीवन में मात्र इन्द्रिय तृप्ति में रुचि रखने वाला; लोक:--सामान्यभौतिकतावादी व्यक्ति; न--नहीं; वेद--जानते हैं; पर-सड्डूटम्--अन्यों का कष्ट; यदि--यदि; बेद--जानते हैं; न--नहीं;याचेत--माँगें; न--नहीं; इति--इस प्रकार; न आह--कहता नहीं; यत्--चूँकि; ईश्वर: --दान देने में समर्थ।
जो नितान्त स्वार्थी होते हैं, वे अन्यों की पीड़ा को सोचे बिना उनसे कुछ याचना करतेहैं।
किन्तु यदि याचक दाता की कठिनाई को जान ले तो वह कोई वस्तु न माँगे।
इसी प्रकारजो दान दे सकता हैं वह याचक ( भिखारी ) की कठिनाई नहीं समझता अन्यथा जो कुछ भीवह माँगे वह उसे देने से इनकार नहीं करेगा।
श्रीऋषिरुवाचधर्म वः श्रोतुकामेन यूय॑ मे प्रत्युदाहता: ।
एष व: प्रियमात्मानं त्यजन्तं सन्त्यजाम्यहम् ॥
७॥
श्री-ऋषि: उवाच--महर्षि दधीचि ने कहा; धर्मम्--धर्म की बातें; व:--तुमसे; श्रोतु-कामेन--सुनने की इच्छा से;यूयम्--तुम; मे-- मुझसे; प्रत्युदाहता:--विपरीत उत्तर पाकर; एब: --यह; व: --तुम्हारे लिए; प्रियम्--प्रिय; आत्मानम्--शरीर; त्यजन्तमू--आज या कल मुझे छोड़ कर; सन्त्यजामि--छोड़ता हूँ; अहम्-मैं
परमसाधु दधीचि ने कहा--मैने तुम लोगों से धर्म की बातें सुनने के लिए ही तुम्हारेमांगने पर अपना शरीर देने से इनकार कर दिया है।
अब, यद्यपि मुझे अपना शरीर अत्यन्तप्रिय है, तो भी तुम लोगों के कल्याण के लिए मैं इसको छोड़ दूँगा, क्योंकि मैं जानता हूँ कियह आज नहीं तो कल अवश्य मुझे छोड़ देगा।
योडश्रुवेणात्मना नाथा न धर्म न यशः पुमान् ।
ईहेत भूतदयया स शोच्य: स्थावरैरपि ॥
८॥
यः--जो कोई ; अश्लुवेण-- अस्थायी; आत्मना--शरीर से; नाथा: --हे देवो; न--नहीं; धर्मम्-- धार्मिक नियम; न--नहीं;यश: -कीर्ति; पुमानू--मनुष्य; ईहेत--के लिए प्रयत्त करता है; भूत-दयया--जीवों के लिए दया से; सः--वह मनुष्य;शोच्य:--शोचनीय; स्थावरै:--जड़ जीवों के द्वारा; अपि-- भी |
हे देवो! जो न तो दुखी प्राणियों पर दया दिखाता है और न धार्मिक नियमों या अक्षुण्णकीर्ति के महान् कार्यों के लिए अपने नश्वर शरीर की बलि कर सकता है, वह निश्चय ही जड़प्राणियों तक के द्वारा धिक्कारा जाता है।
एतावानव्ययो धर्म: पुण्यश्लोकैरुपासित: ।
यो भूतशोकहर्षा भ्यामात्मा शोचति हृष्यति ॥
९॥
एतावानू--इतने; अव्यय:--अविनाशी; धर्म:--धार्मिक नियम; पुण्य-श्लोकै:--अत्यन्त पवित्र कहे जाने वाले प्रसिद्धपुरुषों द्वारा; उपासित:--मान्य; य:--जो; भूत--जीवों का; शोक --दुख से; हर्षाभ्याम्ू--तथा सुखसे; आत्मा--मन;शोचति--पश्चात्ताप करता है; हृष्यति-- प्रसन्न होता है।
यदि कोई मनुष्य दूसरे जीवों के दुख से दुखी होता है और उनके सुख को देखकर प्रसन्नहोता है, तो पवित्र तथा परोपकारी महापुरुषों द्वारा ऐसे पुरुष के धर्म को अविनाशी मानागया है।
अहो दैन्यमहो कष्ट पारक्यैः क्षणभड्डुरै ।
यन्नोपकुर्यादस्वार्थर्मर्त्य: स्वज्ञातिविग्रहै: ॥
१०॥
अहो--ओह; दैन्यम्-दीन स्थिति; अहो--ओह; कष्टम्-कोरे कष्ट; पारक्यै:--जो मृत्यु के बाद कुत्ते तथा गीदड़ों केद्वारा भक्ष्य हैं; क्षण-भद्गरैः--किसी भी क्षण नष्ट होने वाला; यत्--क्योंकि; न--नहीं; उपकुर्यात्ू--काम आएगा; अ-स्व-अर्थ: --अपने हित के लिए नहीं; मर्त्य:--जीवात्मा जिसकी मृत्यु ध्रुव है; स्व--अपनी सम्पत्ति; ज्ञाति--परिजनों तथामित्रों; विग्रहैः--तथा अपने शरीर से।
यह शरीर, जिसे मृत्यु के पश्चात् कुत्ते तथा गीदड़ खा जायेंगे, मेरे अपने किसी काम कानहीं है।
यह कुछ काल तक ही काम आने वाला है और किसी भी क्षण नष्ट हो सकता है।
यह शरीर तथा इसके सभी कुट॒म्बी तथा सम्पत्ति परोपकार में लगने चाहिए, अन्यथा वे सबदुख एवं विपत्ति के कारण बनेंगे।
श्रीबादरायणिरुवाचएवं कृतव्यवसितो दध्यड्ड्थर्वणस्तनुम् ।
परे भगवति ब्रह्मण्यात्मानं सन्नयज़्हौ ॥
११॥
श्री-बादरायणि: उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; कृत-व्यवसित:--निश्चय करके कि क्याकरना है ( देवों को शरीर देना है ); दध्यड्---दधीचि मुनि; आथर्वण: --अथर्वा का पुत्र; तनुमू--शरीर को; परे--परम;भगवति-- भगवान् को; ब्रह्मणि--परब्रह्म को; आत्मानम्--स्वत:, आत्मा; सन्नयन्-- भेंट करके; जहौ--त्याग दिया।
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा--इस प्रकार अर्थवा के पुत्र दधीचि मुनि ने देवताओं कीसेवा के लिए अपना शरीर त्यागने का निश्चय किया।
उन्होंने अपने आप ( आत्मा ) को पूर्णपुरुषोत्तम भगवान् के चरणारविन्द में रख कर पंचभूत से निर्मित अपने स्थूल शरीर को त्यागदिया।
यताक्षासुमनोबुद्धिस्तत्त्वहग्ध्वस्तबन्धन: ।
आस्थित: परमं योगं न देहं बुबुधे गतम् ॥
१२॥
यत--वश में; अक्ष--इन्द्रियाँ; असु--प्राणवायु; मन: --मन; बुद्धि:--बुद्धि; तत्त्त-हक्--तत्त्वों एवं भौतिक तथाआत्मशक्तियों का ज्ञाता; ध्वस्त-बन्धन:--बन्धन से मुक्त; आस्थित: --स्थित होकर; परमम्--परम; योगम्-- ध्यान,समाधि को; न--नहीं; देहम्-- भौतिक शरीर को; बुबुधे--देखा; गतमू--निकला हुआ।
दधीचि मुनि ने अपनी इन्द्रियों, प्राण, मन तथा बुद्धि को संयमित किया और समाधि मेंलीन हो गये।
इस प्रकार उनके समस्त भव-बन्धन छिन्न हो गये।
वे यह नहीं देख सकते थेकि उनका भौतिक शरीर किस प्रकार आत्मा से पृथक् हो गया।
अथेन्द्रो वज्रमुद्यम्य निर्मितं विश्वकर्मणा ।
मुने: शक्तिभिरुत्सिक्तो भगवत्तेजसान्वित: ॥
१३॥
वबृतो देवगणै: सर्वैर्गजेन्द्रोपर्यशो भत ।
स्तूयमानो मुनिगणैस्त्रैलोक्यं हर्षयन्निव ॥
१४॥
अथ-- त्पश्चात्; इन्द्र: --स्वर्ग का राजा; वज़्म्--वज्ञ को; उद्यम्य--हृढ़तापूर्वक लेकर; निर्मितम्--बनाया हुआ;विश्वकर्मणा--विश्वकर्मा द्वारा; मुने:--दधीचि मुनि की; शक्तिभि:--शक्ति से; उत्सिक्त:--सिक्त होकर; भगवत्--श्रीभगवान् की; तेजसा--आध्यात्मिक शक्ति से; अन्वित:--प्रदत्त; वृत:--घिरे हुए; देव-गणै:-- अन्य देवताओं से;सर्वै:--समस्त; गजेन्द्र--अपने हाथी के; उपरि--पीठ पर; अशोभत--चमकने लगा; स्तूयमान:--स्तुति किया जाकर;मुनि-गणै: --मुनियों के द्वारा; त्रै-लोक्यम््--तीनों लोकों को; हर्षयन्--प्रसन्न करते हुए; इब--मानो
तत्पश्चात् राजा इन्द्र ने विश्वकर्मा द्वारा दधीचि की अस्थियों से निर्मित वज्ञ कोहढ़तापूर्वक धारण किया।
दधीचि मुनि की परम शक्ति से आविष्ट एवं श्रीभगवान् के तेज सेप्रकाशित होकर इन्द्र अपने वाहन ऐराबत की पीठ पर सवार हुआ।
उसे समस्त देवता घेरे हुएथे और सभी मुनिगण उसकी प्रशंसा कर रहे थे।
इस तरह जब वह वृत्रासुर का वध करने के लिए सवार होकर चला तो वह अत्यन्त सुशोभित हो रहा था और तीनों लोकों को भा रहाथा।
वृत्रमभ्यद्रवच्छबत्रुमसुरानीकयूथपै: ।
पर्यस्तमोजसा राजन्क्रुद्धो रुद्र इबान्तकम् ॥
१५॥
वृत्रमू--वृत्रासुर पर; अभ्यद्रवत्-- आक्रमण किया; शत्रुम्-शत्रु; असुर-अनीक-यूथपै: -- असुरों के सैनिकों केसेनापतियों द्वारा; पर्यस्तम्ू--घिरा हुआ; ओजसा--अत्यन्त वेग से; राजनू--हे राजन्; कुद्ध:ः--क्रोधित होकर; रूद्र: --भगवान् शिव का अवतार; इब--सहृश; अन्तकम्--अन्तक अथवा यमराज
हे राजा परीक्षित! जिस प्रकार रूद्र अत्यन्त क्रुद्ध होकर पहले समय में अन्तक( यमराज ) को मारने के लिए उसकी ओर दौड़े थे, उसी प्रकार इन्द्र ने अत्यन्त क्रुद्ध होकरबड़े ही वेग से आसुरी सेना के नायकों से घिरे वृत्रासुर पर धावा बोल दिया।
ततः सुराणामसुरै रण: परमदारुण: ।
त्रेतामुखे नर्मदायामभवत्प्रथमे युगे ॥
१६॥
ततः--तदनन्तर; सुराणाम्ू--देवताओं का; असुरैः--असुरों के साथ; रण:--महान् युद्ध; परम-दारुण: --अत्यन्तभयानक; त्रेता-मुखे--त्रेतायुग के प्रारम्भ में; नर्मदायाम्--नर्मदा नदी के तट पर; अभवत्--हुआ; प्रथमे--प्रथम; युगे--कल्प में।
तत्पश्चात् सत्ययुग के अन्त तथा त्रेतायुग के प्रारम्भ में नर्मदा नदी के तट पर देवों तथाअसुरों के मध्य घमासान युद्ध हुआ।
रुद्रैवसुभिरादित्यैरश्चिभ्यां पितृवह्निभि: ।
मरुद्धिर॒भुभिः साध्यैर्विश्वेदेवैर्मरुत्पतिमू ॥
१७॥
हृष्ठा वज्धरं श॒क्रं रोचमानं स्वया थ्रिया ।
नामृष्यन्नसुरा राजन्मृथे वृत्रपुर:सरा: ॥
१८ ॥
रुद्रै:--रुद्रों के द्वारा; वसुभि:--वसुओं के द्वारा; आदित्यै:--आदित्यों के द्वारा; अश्विभ्याम्--अश्विनी कुमारों के द्वारा;पितृ--पितरों से; वह्िभि:--वह्नियों के द्वारा; मरुद्धिः--मरुतों के द्वारा; ऋभुभि: --ऋभुओं के द्वारा; साध्यै:--साध्यों केद्वारा; विश्वे-देवै:--विश्वदेवों के द्वारा; मरुत्-पतिम्--स्वर्ग के राजा इन्द्र को; दृष्टा--देखकर; वज्भ-धरम्--वज्ञ धारणकिये; शक्रम्--इन्द्र का अन्य नाम; रोचमानम्--चमकते हुए; स्वया--अपने आप से; थ्रिया--ऐश्वर्य; न--नहीं;अमृष्यनू--सहा, सहनीय; असुरा:--सभी असुर; राजन्--हे राजा; मृथे--युद्ध में; वृत्र-पुरःसरा: --वृत्रासुर के नेतृत्व में |
हे राजन्! जब वृत्रासुर को आगे करके सभी असुर युद्धभूमि में आये तो उन्होंने देखा किराजा इन्द्र बज़ धारण किये हुए है और रूद्रों, बसुओं, आदित्यों, अश्वनी-कुमारों, पितरों,वह्लियों, मरुतों, ऋभुओं, साध्यों तथा विश्वदेवों से घिरा हुआ है और इस प्रकार से देदीप्यमानहै कि उसका तेज असुरों के लिए असहा था।
नमुचि: शम्बरोनर्वा द्विमूर्धा ऋषभोउसुर: ।
हयग्रीव: शड्जू शिरा विप्रचित्तिययोमुख: ॥
१९॥
पुलोमा वृषपर्वा च प्रहेतिहतिरुत्कल: ।
दैतेया दानवा यक्षा रक्षांसि च सहस्त्रश: ॥
२०॥
सुमालिमालिप्रमुखा: कार्तस्वरपरिच्छदा: ।
प्रतिषिध्येन्द्रसेनाग्रं मृत्योरपि दुरासदम् ॥
२१॥
अभ्यर्दयन्नसम्भ्रान्ता: सिंहनादेन दुर्मदा: ।
गदाभिः परिधैर्बाणै: प्रासमुद्गरतोमरै: ॥
२२॥
नमुचि:--नमुचि; शम्बर: --शम्बर; अनर्वा--अनर्वा ; द्विमूर्धा--द्विमूर्धा; ऋषभ: --ऋषभ; असुरः--असुर; हयग्रीव:--हयग्रीव; शद्भु शिरा:--शंकुशिरा; विप्रचित्ति:--विप्रचित्ति; अयोमुख: --अयोमुख; पुलोमा--पुलोमा; वृषपर्वा--वृषपर्वा;च-भी; प्रहेति:--प्रहेति; हेतिः --हेति; उत्तल:--उत्कल; दैतेया: --दैत्यगण; दानवा:--दानवगण; यक्षा:--यक्षगण;रक्षांसि--राक्षस; च--तथा; सहस्त्रश:--हजारों में; सुमालि-मालि-प्रमुखा: --सुमालि तथा मालि आदि अन्य; कार्तस्वर--सोने के; परिच्छदा:--आशभूषणों से युक्त; प्रतिषिध्य--पीछे रहकर; इन्द्र-सेना-अग्रम्ू--इन्द्र की सेना के आगे; मृत्यो: --मृत्यु के लिए; अपि-- भी; दुरासदम्--पहुँचना कठिन; अभ्यर्दयन्--सताये हुए; असम्भ्रान्ता:--डर रहित; सिंह-नादेन--सिंह की सी गर्जना से; दुर्मदा:-- भयानक; गदाभि:--गदा से; परिधै:--लौहगदा से; बाणै:--बाणों से; प्रास-मुद्गर-तोमरैः--कँटीले प्रक्षेपास्त्रों
मुगदर तथा भालों से सैकड़ों हजारों असुरों, यक्षों, राक्षसों ( मनुष्य-भक्षकों ) तथा सुमालि, मालि आदिअन्यों ने राजा इन्द्र की सेनाओं को रोका जिन्हें साक्षात् काल भी नहीं जीत सकता था।
असुरों में नमुचि, शम्बर, अनर्वा, द्विमूर्धा, ऋषभ, असुर, हयग्रीव, शंकु-शिरा, विप्रचित्ति,अयोमुख, पुलोमा, वृषपर्वा, प्रहेति, हेति तथा उत्कल सम्मिलित थे।
ये अजेय असुरस्वर्णाभूषणों से भूषित होकर सिंह के समान निर्भीक होकर घोर नाद कर रहे थे और गदा,परिघ, बाण, प्रास, मुद्गर तथा तोमर जैसे हथियारों से देवताओं को पीड़ा पहुँचा रहे थे।
शूलै: परश्रथे: खड़्गै: शतघ्नीभिर्भुशुण्डिभि: ।
सर्वतोवाकिरन्शस्त्रैरस्त्रैश्व विबुधर्षभान् ॥
२३॥
शूलै:--बर्छो से; परश्रधैः --फरसों से; खड्गैः--तलवारों से; शतघ्नीभि:--शतघ्नियों से; भुशुण्डिभि:-- भुशुण्डियों से;सर्वतः--चारों ओर; अवाकिरन्--तितर-बितर करके; शस्त्र: --शस्त्रों से; अस्त्रै:--बाणों से; च--तथा; विबुध-ऋषभान्--देवताओं के प्रमुख ।
बछों, त्रिशूलों, फरसों, तलवारों तथा शतघ्नी एवं भुशुण्डी जैसे अन्य हथियारों सेसुसज्जित होकर असुरों ने विभिन्न दिशाओं से आक्रमण कर दिया और देवताओं की सेना केसमस्त नायकों को तितर-बितर कर दिया।
न तेडदृश्यन्त सज्छन्नाः शरजालै: समन्ततः ।
पुझ्ननुपुड्डुपतितैज्योतीषीव नभोघनै: ॥
२४॥
न--नहीं; ते--वे ( देवता ); अहृश्यन्त--देखे गये; सउछन्ना:--पूर्णतया आच्छादित; शर-जालै:--बाणों के जाल से;समन्ततः:--चारों ओर; पुद्छ-अनुपुद्ड-एक के बाद एक तीर; पतितै:--गिरने से; ज्योत्ीषि इब-- आकाश में तारों केसमान; नभः-घनै:--घने बादलों के द्वारा।
जिस प्रकार घने बादलों के आकाश में छा जाने के बाद तारे नहीं दिखाई पड़ते उसीप्रकार एक के बाद एक गिरने वाले बाणों के जाल से पूर्णतया आच्छादित हो जाने सेदेवतागण दिखाई नहीं पड़ रहे थे।
न ते शस्त्रास्त्रवर्षोघा ह्यासेदु: सुरसैनिकान् ।
छिन्ना: सिद्धपथे देवैलघुहस्तै: सहस्त्रधा ॥
२५॥
न--नहीं; ते--वे; शस्त्र-अस्त्र-वर्ष-ओघा:--बाणों तथा अन्य हथियारों की वर्षा; हि--निस्सन्देह; आसेदु:--पहुँची; सुर-सैनिकान्--देवताओं की सेना; छिन्ना: --कटी हुई; सिद्ध-पथे--आकाश में; देवै: --देवताओं के द्वारा; लघु-हस्तैः--तेजीसे चलते हाथों द्वारा, लाघव से; सहस्त्रधा--हजारों खण्डों में |
देवताओं की सेना को मारने के लिए हथियारों तथा बाणों के द्वारा की गई वर्षा उन तकनहीं पहुँच पाई, क्योंकि उन्होंने अपने हस्तलाघव से आकाश में इन हथियारों को काटकरखण्ड-खण्ड कर दिया।
अथ क्षीणास्त्रशस्त्रौा गिरिश्रुड्रद्रमोपलै: ।
अभ्यवर्षन्सुरबलं चिच्छिदुस्तां श्र पूर्ववत् ॥
२६॥
अथ--त्पश्चात्; क्षीण--अत्यन्त दुर्बल; अस्त्र--मंत्र द्वारा छोड़े गये बाणों का; शस्त्र--तथा हथियार; ओघा:--समूह;गिरि--पर्वत की; श्रूक़ु--चोटी से; द्रुम--वृक्षों से; उपलैः--तथा पत्थरों से; अभ्यवर्षन्--वर्षा करते हुए; सुर-बलम्--देवताओं के सैनिक; चिच्छिदु:--खण्ड खण्ड कर दिया; तान्ू--उनको; च--तथा; पूर्व-वत्--पहले की तरह।
जब असुरों के हथियार तथा मंत्र चुक गये, तो उन्होंने देवताओं पर पर्वतों के शिखर,वृक्ष तथा पत्थर बरसाना प्रारम्भ कर दिया।
किन्तु देवता इतने प्रभावशाली तथा दक्ष थे किउन्होंने पूर्ववत् इन सभी हथियारों को आकाश में खण्ड-खण्ड कर दिया।
तानक्षतान्स्वस्तिमतो निशाम्य शस्त्रास्त्रपूगैरथ वृत्रनाथा: ।
द्रुमैर्टषद्धिर्विविधाद्िश्रुड्ेरविज्षतांस्तत्रसुरिद्धसैनिकान् ॥
२७॥
तान्--उनको ( देवों के सैनिकों को ); अक्षतान्--बिना चोट के; स्वस्ति-मत:--अत्यन्त स्वस्थ; निशाम्य--देखकर;शस्त्र-अस्त्र-पूगै:--हथियारों तथा मंत्रों के समूहों द्वारा; अथ--तत्पश्चात्; वृत्र-नाथा:--वृत्रासुर के अधीन सैनिक; ह्रुमैः --वृक्षों से; हृषद्धिः--पत्थरों से; विविध-- अनेक; अद्वि--पर्वतों के; श्रृद्ढी:--शिखरों द्वारा; अविक्षतानू--बिना घायल;तत्रसु:-- भयभीत हो गये; इन्द्र-सेनिकान्--राजा इन्द्र के सैनिक |
जब वृत्रासुर द्वारा आदेशित असुर सैनिकों ने देखा कि इन्द्र के सैनिक अनेक शस्त्रास्त्रोंके समूह से, यहाँ तक कि वृक्षों, पत्थरों तथा पर्वत-श्रुगों के द्वारा भी घायल नहीं हो सके हैंऔर अक्षत बने हुए हैं, तो असुरगण अत्यन्त भयभीत हुए।
सर्वे प्रयासा अभवन्विमोघा:कृताः कृता देवगणेषु दैत्यै: ।
कृष्णानुकूलेषु यथा महत्सुध्षुद्रे: प्रयुक्ता ऊषती रूक्षवाच: ॥
२८॥
सर्वे--समस्त; प्रयासा:--प्रयल; अभवनू--हो गये; विमोघा:--निष्फल; कृता:--किया हुआ; कृता:--पुनः किया गया;देव-गणेषु--देवताओं में; दैत्यैः--असुरों द्वारा; कृष्ण-अनुकूलेषु--जो श्रीकृष्ण द्वारा सदैव रक्षित हैं; यथा--जिस प्रकार;महत्सु--वैष्णवों को; क्षुद्रैः--तुच्छ मनुष्यों द्वारा; प्रयुक्ता:--प्रयुक्त; ऊषती:--प्रतिकूल; रूक्ष--कठोर; वाच:--शब्द |
जब तुच्छ लोग सन्त पुरुषों पर झूठे, क्रुद्ध आरोप लगाने के लिए दुर्वचनों का व्यवहारकरते हैं, तो निरर्थक वचनों से महापुरुष विचलित नहीं होते।
इसी प्रकार श्रीकृष्ण द्वारासुरक्षित देवताओं के विरुद्ध किये जाने वाले असुरों के सभी प्रयास निष्फल हो रहे थे।
ते स्वप्रयासं वितथ॑ निरीक्ष्यहरावभक्ता हतयुद्धदर्पा: ।
पलायनायाजिमुखे विसृज्यपतिं मनस्ते दधुरात्तसारा: ॥
२९॥
ते--वे ( असुर ); स्व-प्रयासम्--अपने प्रयत्नों से; वितथम्--निष्फल; निरीक्ष्य--देखकर; हरौ अभक्ता:--जो श्रीभगवान्के भक्त नहीं हैं, असुर; हत--पराजित; युद्ध-दर्पा:--लड़ने में उनका घमंड; पलायनाय--युद्धभूमि से भगने के लिए;आजि-मुखे--युद्ध के प्रारम्भ में; विसृज्य--एक ओर छोड़कर; पतिम्ू--अपने सेनानायक, वृत्रासुर को; मन:--उनकेमन; ते--वे सब; दधु:--दिया; आत्त-सारा:--शौर्य-विहीन |
जब श्रीभगवान् कृष्ण के अभक्त असुरों ने देखा कि उनके सारे प्रयास निष्फल हो गये हैं, तो युद्ध करने का उनका सारा घमंड जाता रहा।
उन्होंने अपने नायक को युद्ध शुरू होनेके समय ही छोड़कर वहाँ से भागने का निश्चय कर लिया, क्योंकि उनके शत्रुओं ने उनकासारा शौर्य छीन लिया था।
वृत्रोउसुरांस्ताननुगान्मनस्वीप्रधावत: प्रेक्ष्य बभाष एतत् ।
पलायित॑ प्रेक्ष्य बल॑ च भग्नंभयेन तीब्रेण विहस्य वीर: ॥
३०॥
वृत्र:--वृत्रासुर, असुरों का सेनानायक; असुरान्--सभी असुरों को; तान्ू--उन; अनुगान्--उसके अनुयायियों को;मनस्वी--विशाल हृदय वाला; प्रधावत:--भागते हुए; प्रेक्ष्य--देखकर; बभाष--बोला; एतत्--यह; पलायितम्-- भागतेहुए; प्रेक्ष्ष--देखकर; बलम्--सेना को; च--तथा; भग्नमू--टूटा हुआ; भयेन-- भय से; तीव्रेण--तीव्र; विहस्थ--हँसकर; वीर:--बहादुर।
अपनी सेना को क्षत-विक्षत तथा समस्त असुरों को, यहाँ तक कि जो परमवीर कहलातेथे, अत्यन्त भय के कारण युद्धभूमि से भागते देखकर सचमुच विशाल हृदय वाला बहादुरवृत्रासुर हँसा और इन शब्दों में बोला।
कालोपपपन्नां रुचिरां मनस्विनांजगाद वाचं पुरुषप्रवीर: ।
हे विप्रचित्ते नमुचे पुलोमन्मयानर्वज्छम्बर मे श्रुणुध्वम् ॥
३१॥
काल-उपपन्नाम्ू--काल तथा परिस्थिति के अनुकूल; रुचिराम्--अत्यन्त सुन्दर; मनस्विनाम्ू--महान्, विशाल हृदय वालेपुरुषों के; जगाद--बोला; वाचम्--शब्द; पुरुष-प्रवीर: --वीरों का वीर, वृत्रासुर; हे--ेरे; विप्रचित्ते--विप्रचित्ति;नमुचे--हे नमुचि; पुलोमन्--हे पुलोमा; मय--हे मय; अनर्वन्--हे अनर्वा; शम्बर--हे शम्बर; मे--मुझसे; श्रृणुध्वम्--कृपया सुनो ।
अपनी स्थिति तथा काल और परिस्थितियों के अनुसार वीरशिरोमणि बृत्रासुर ने ऐसेवचन कहे जो विचारवान् पुरुषों द्वारा प्रशंसा के योग्य थे।
उसने असुर-वीरों को बुलाया,'हे विप्रच्चित्ति, हे नमुचि, हे पुलोमा, हे मय, हे अनर्वा तथा शम्बर! भागो नहीं, मेरी बात तोसुन लो।
'जातस्य मृत्युर्धुव एवं सर्वतःप्रतिक्रिया यस्य न चेह क्लृप्ता ।
लोको यशश्चाथ ततो यदि ह्ामुंको नाम मृत्युं न वृणीत युक्तम् ॥
३२॥
जातस्य--जिसने जन्म लिया है ( समस्त जीव ) उनकी; मृत्युः--मृत्यु:; श्रुवः--अनिवार्य; एब--निस्सन्देह; सर्वत:ः--संसारमें सर्वत्र; प्रतिक्रिया--बचने का उपाय, काट; यस्य--जिसका; न--नहीं; च-- भी; इह--इस संसार में; क्लछ॒प्ता--बनायागया; लोक:--स्वर्गलोक; यश:--कीर्ति; च--तथा; अथ--तब; ततः -- उससे; यदि--यदि; हि--निस्सन्देह; अमुम्--वह; कः--कौन; नाम--निस्सन्देह; मृत्युम्--मृत्यु; न--नहीं; वृणीत--स्वीकार करेगा; युक्तम्-- अनुकूल |
वृत्रासुर ने कहा--इस संसार में जन्मे सभी जीवों को मरना है।
निश्चित ही, इस संसार मेंकोई भी मृत्यु से बचने के किसी उपाय को नहीं ढूँढ सका है।
विधाता तक ने इससे बचनेका कोई उपाय नहीं बताया।
ऐसी परिस्थितियों में जब कि मृत्यु अपरिहार्य है और यदिस्वर्गलोक की प्राप्ति हो रही हो और उपयुक्त मृत्यु के कारण सदैव यश तथा कीर्ति बनी रहेतो भला कौन पुरुष होगा जो ऐसी यशस्वी मृत्यु को स्वीकार नहीं करेगा ?
द्वौ सम्मताविह मृत्यू दुरापौयद्वह्मसन्धारणया जितासु: ॥
कलेवरं योगरतो विजह्माद्यदग्रणीवीरशयेडनिवृत्त: ॥
३३॥
द्वौ--दो; सम्मतौ--( शास्त्रों तथा महापुरुषों द्वारा ) सम्मत; इह--इस संसार में; मृत्यू--मृत्युएँ; दुरापौ--अत्यन्त दुर्लभ;यत्--जो; ब्रह्म-सन्धारणया--ब्रह्म, परमात्मा या परब्रह्म कृष्ण में ध्यानमग्न होकर; जित-असु: --मन तथा इन्द्रयों को वशमें करके; कलेवरम्--शरीर को; योग-रत:--योग-साधना में लीन; विजह्यात्--त्याग सकता है; यत्--जो; अग्रणी :--आगे चलकर, पथ-पदर्शक बनकर; वीर-शये--युद्धभूमि में ; अनिवृत्त:--पीठ न दिखाकर |
यशस्वी मृत्यु को वरण करने के दो उपाय हैं और वे दोनों अत्यन्त दुर्लभ हैं।
पहला है,योग-साधना, विशेष रूप से भक्तियोग के द्वारा मरना जिसमें मनुष्य मन तथा प्राण को वशमें करके पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के चिन्तन में लीन होकर मृत्यु को प्राप्त होता है।
दूसरा हैयुद्धभूमि में सेना का नेतृत्व करते हुए तथा कभी पीठ न दिखाते हुए मर जाना।
शास्त्र में इनदो प्रकार की मृत्युओं को यशस्वी कहा गया है।
