← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 6 की सूची
अध्याय एक: अजामिल के जीवन का इतिहास
6.1श्रीपरीक्षिदुवाचनिवृत्तिमार्ग: कथित आदौ भगवता यथा ।क्रमयोगोपलब्धेन ब्रह्मणा यदसंसृति: ॥ १॥
श्री-परीक्षित् उबाच--महाराज परीक्षित ने कहा; निवृत्ति-मार्ग:--मुक्ति का मार्ग; कथित:--वर्णन किया गया; आदौ--प्रारम्भ में; भगवता--आपके द्वारा; यथा-- भलीभभाँति; क्रम--क्रमश:; योग-उपलब्धेन--योग विधि द्वारा प्राप्त;ब्रह्मणा--ब्रह्मा के साथ ( ब्रहालोक पहुँचने के बाद ); यत्--जिस विधि से; असंसृति:--जन्म तथा मृत्यु के चक्र काअन्त)
महाराज परीक्षित ने कहा : हे प्रभु! हे शुकदेव गोस्वामी, आप पहले ही ( द्वितीय स्कन्धमें) मुक्ति-मार्ग ( निवृत्ति मार्ग ) का वर्णन कर चुके हैं।
उस मार्ग का अनुसरण करने सेमनुष्य निश्चित रूप से क्रमशः सर्वोच्च लोक अर्थात् ब्रहलोक तक ऊपर उठ जाता है, जहाँसे वह ब्रह्म के साथ-साथ आध्यात्मिक जगत ( वैकुण्ठ ) जाता है। इस तरह भौतिक जगतमें जन्म-मृत्यु का चक्र समाप्त हो जाता है।
प्रवृत्तिलक्षणश्वैव त्रैगुण्यविषयो मुने ।योसावलीनप्रकृतेर्गुणसर्ग: पुनः पुनः ॥
२॥
प्रवृत्ति--झुकाव से; लक्षण:--लक्षित; च-- भी; एव--निस्सन्देह; त्रै-गुण्य--प्रकृति के तीनों गुण; विषय:--विषयों केरूप में; मुने--हे मुनि; यः--जो; असौ--वह; अलीन-प्रकृते: --जो माया के पाश से मुक्त नहीं हो पाता उसका; गुण-सर्ग:--जिसमें भौतिक शरीरों की सृष्टि होती है; पुनः पुन:--बारम्बार।
हे मुनि शुकदेव गोस्वामी! जब तक जीव प्रकृति के भौतिक गुणों के संक्रमण से मुक्तनहीं हो लेता, वह विभिन्न प्रकार के शरीर प्राप्त करता है जिनमें वह आनन्द या कष्ट पाता हैऔर शरीर के अनुसार उसमें विविध अभिरुचियाँ होती हैं।
इन अभिरुचियों का अनुसरणकरने से वह प्रवृत्ति मार्ग से होकर गुजरता है, जिससे वह स्वर्गलोक तक ऊपर जा सकता है,जैसा कि आप पहले ( तृतीय स्कन्ध में ) वर्णन कर चुके हैं।
अधर्मलक्षणा नाना नरकाश्चानुवर्णिता: ।
मन्वन्तरश्व व्याख्यात आद्यः स्वायम्भुवो यतः ॥
३॥
अधर्म-लक्षणा: --अपवित्र कार्यो के लक्षणों से युक्त; नाना--विविध; नरका: --नरक; च--भी; अनुवर्णिता: --वर्णितकिये गये; मनु-अन्तर: --मनुओं का परिवर्तन ( ब्रह्म के एक दिन में १४ मनु होते हैं )।
च-- भी; व्याख्यात:--वर्णन कियेगये; आद्य:--आदि; स्वायम्भुव:ः--ब्रह्माजी के पुत्र; यत:ः--जिसमें |
आपने नारकीय जीवन की उन विविध योनियों का भी वर्णन ( पंचम स्कन्ध के अन्तमें ) किया हैजो पाप कार्यों से फलित हैं और आपने प्रथम मन्वन्तर का वर्णन ( चतुर्थस्कन्ध में ) किया है, जिसकी अध्यक्षता ब्रह्मा के पुत्र स्वायम्भुव मनु ने की थी।
प्रियव्रतोत्तानपदोर्वशस्तच्चरितानि च ।
द्वीपवर्षसमुद्राद्विनद्युद्यानवनस्पतीन् ॥
४॥
धरामण्डलसंस्थानं भागलक्षणमानत: ।
ज्योतिषां विवराणां च यथेदमसूजद्विभु: ॥
५॥
प्रियत्रत--प्रियत्रत का; उत्तानपदो:--तथा उत्तानपाद का; वंश:--कुल; तत्-चरितानि--उनके गुण; च-- भी; द्वीप--विभिन्न लोक; वर्ष--भूभाग; समुद्र--सागर; अद्वि--पर्वत; नदी--नदियाँ; उद्यान--बाग-बगीचे; वनस्पतीन्ू--तथा वृक्ष;धरा-मण्डल--पृथ्वी; संस्थानम्--स्थिति को; भाग--विभागों के अनुसार; लक्षण--विभिन्न लक्षण; मानतः --तथा मापें;ज्योतिषाम्--सूर्य तथा अन्य प्रकाशपिंडों का; विवराणाम्--निम्नलोकों का; च--तथा; यथा--जिस तरह; इृदम्--यह;असृजत्--उत्पन्न किया; विभुः--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने।
हे प्रभु! आपने राजा प्रियत्रत तथा राजा उत्तानपाद के कुलों तथा गुणों का वर्णन कियाहै।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने इस भौतिक जगत की रचना विविध ब्रह्माण्डों, लोकों, ग्रहोंतथा नक्षत्रों, विविध भूभागों, समुद्रों, नदियों, उद्यानों तथा वृक्षों से की जिनके लक्षण भिन्न-भिन्न हैं।
ये इस धरालोक, आकाश के प्रकाशपिंडों तथा अधोलोकों में विभाजित हैं।
आपनेइन लोकों का तथा इनमें रहने वाले जीवों का बहुत ही स्पष्ट वर्णन किया है।
अधुनेह महाभाग यथैव नरकान्नरः ।
नानोग्रयातनान्नेयात्तन्मे व्याख्यातुमहसि ॥
६॥
अधुना--सम्प्रति; हह--इस भौतिक जगत में; महा-भाग--हे महान् ऐ श्वर्यवान् तथा भाग्यशाली शुकदेव गोस्वामी;यथा--जिससे; एव--निस्सन्देह; नरकान्--नारकीय स्थितियाँ जिनमें अधर्मियों को रखा जाता है; नर: --मनुष्य; नाना--अनेक प्रकार के; उग्र-- भयावह; यातनान्ू--यातनाओं या कष्टों को; न ईयात्--नहीं भोगें; तत्--वह; मे--मुझसे;व्याख्यातुम् अहसि--कृपा करके वर्णन करें |
है परम भाग्यशाली तथा ऐश्वर्यवान् शुकदेव गोस्वामी! अब आप कृपा करके मुझेबतलायें कि मनुष्यों को किस तरह उन नारकीय स्थितियों में प्रवेश करने से बचाया जासकता है जिनमें उन्हें भीषण यातनाएँ सहनी पड़ती हैं।
श्रीशुक उबाचन चेदिहैवापचितिं यथांहस:ःकृतस्य कुर्यान्मनउक्तपाणिभि: ।
ध्रुवं स वै प्रेत्य नरकानुपैतिये कीर्तिता मे भवतस्तिग्मयातना: ॥
७॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा; न--नहीं; चेत्--यदि; इह--इस जीवन में; एब--निश्चय ही;अपचितिम्-प्रतिकार, प्रायश्चित्त; यथा-- भलीभाँति; अंहसः कृतस्य--जब मनुष्य पापकर्म कर चुका होता है; कुर्यात्--करता है; मन:--मन से; उक्त--शब्दों से; पाणिभि:--तथा इन्द्रियों से; ध्रुवम्--निश्चित रूप से; सः--वह व्यक्ति; बै--निस्सन्देह; प्रेत्य--मृत्यु के बाद; नरकान्--नाना प्रकार की नारकीय स्थितियाँ; उपैति--प्राप्त करता है; ये--जो;कीर्तिता:--पहले ही वर्णित की जा चुकी हैं; मे--मेरे द्वारा; भवतः--तुमसे; तिग्म-यातना:--जिनमें अति भीषण कष्ट है |
शुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया-हे राजन्! यदि मनुष्य अपनी अगली मृत्यु के पूर्व इसजन्म में अपने मन, वचन तथा शरीर से किये गये पाप कर्मों का मनुसंहिता तथा अन्यधर्मशास्त्रों के विवरण के अनुसार समुचित प्रायश्चित्त द्वारा निगाकरण नहीं कर लेता है, तोवह मृत्यु के बाद अवश्य ही नरकलोकों में प्रविष्ट होगा और भीषण कष्ट उठायेगा, जैसा किमैं आपसे पहले ही कह चुका हूँ।
तस्मात्पुरैवाश्विह पापनिष्कृतौयतेत मृत्योरविपद्यतात्मना ।
दोषस्य हृष्ठा गुरुलाघवं यथाभिषक्लिकित्सेत रुजां निदानवित् ॥
८॥
तस्मातू--इसलिए; पुरा--पहले; एव--निस्सन्देह; आशु--तुरन््त; इह--इस जीवन में; पाप-निष्कृता--पापकर्मो के फलसे मुक्त बनने के लिए; यतेत--प्रयत्न करे; मृत्यो:--मृत्यु; अविपद्यत--रोग तथा वृद्धावस्था से सताया हुआ नहीं;आत्मना--शरीर से; दोषस्थ--पापकर्मो का; हृष्ठा--अनुमान करके; गुरु-लाघवम्-- भारीपन या हल््कापन; यथा--जिसतरह; भिषक्--वैद्य; चिकित्सेत--उपचार करेगा; रुजामू--रोग का निदान-वित्--निदान में निपुण
अतः अगली मृत्यु आने के पूर्व, जब तक मनुष्य का शरीर पर्याप्त सशक्त है, उसे शास्त्रोंके अनुसार प्रायश्चित्त की विधि तुरन्त अपनानी चाहिए; अन्यथा समय की क्षति होगी औरउसके पापों का फल बढ़ता जायेगा।
जिस तरह एक कुशल वैद्य रोग का निदान और उपचार उसकी गम्भीरता के अनुसार करता है, उसी तरह मनुष्य को अपने पापों की गहनता केअनुसार प्रायश्चित्त करना चाहिए।
श्रीराजोबाचइृष्टश्रुताभ्यां यत्पापं जानन्नप्यात्मनोहितम् ।
करोति भूयो विवश: प्रायश्चित्तमथो कथम् ॥
९॥
श्री-राजा उबाच--परीक्षित महाराज ने उत्तर दिया; दृष्ट--देखने से; श्रुताभ्याम्-शास्त्रों या विधि ग्रन्थों से सुनने से भी;यत्--चूँकि; पापम्--पापपूर्ण, अपराध पूर्ण कार्य; जानन्--जानते हुए; अपि--यद्यपि; आत्मन:--स्वयं का; अहितम्--हानिकर; करोति--करता है; भूय:--पुनः पुनः; विवश:--अपने को नियंत्रित करने में अक्षम; प्रायश्चित्तम्-प्रायश्ित्त;अथो--इसलिए; कथम्--क्या लाभ।
महाराज परीक्षित ने कहा कि मनुष्य को जानना चाहिए कि पापकर्म उसके लिएहानिकर है, क्योंकि वह वस्तुतः यह देखता है कि अपराधी सरकार द्वारा दण्डित कियाजाता है और सामान्य लोगों के द्वारा दुत्कारा जाता है।
और वह शास्त्रों तथा विद्वान पंडितों सेसुनता भी रहता है कि पापकर्म करने से मनुष्य अगले जीवन में नारकीय अवस्था में फेंकदिया जाता है।
फिर भी ऐसा ज्ञान होते हुए मनुष्य को प्रायश्चित्त करने के बावजूद बारम्बारपाप करने के लिए बाध्य होना पड़ता है।
अतः ऐसे प्रायश्चित्त का क्या महत्त्व ?
क्वचित्रिवर्ततेभद्गात्क्वचिच्चरति तत्पुन: ।
प्रायश्चित्तमथोपार्थ मनन््ये कुझ्ओरशौचवत् ॥
१०॥
क्वचित्--कभी-कभी; निवर्तते--बन्द कर देता है; अभद्रात्--पापकर्मों से; क्वचित्--क भी; चरति--करता है; तत्--वह ( पापकर्म ); पुन: --फिर; प्रायश्चित्तम्-प्रायश्चित्त की विधि; अथो--इसलिए; अपार्थम्-्यर्थ; मन्ये--मानता हूँ;कुझर-शौचवत्--हाथी के स्नान की ही तरह।
कभी-कभी ऐसा व्यक्ति, जो पापकर्म न करने के प्रति अत्यधिक सतर्क रहता है पुनःपापमय जीवन के फेर में आ जाता है।
इसलिए मैं बारम्बार पाप करने तथा प्रायश्चित्त करनेकी इस विधि को निरर्थक मानता हूँ।
यह तो हाथी के स्नान करने जैसा है, क्योंकि हाथीपूर्ण स्नान करके अपने को स्वच्छ बनाता है, किन्तु स्थल पर वापस आते ही अपने सिर तथाशरीर पर धूल डाल लेता है।
श्रीबादरायणिरुवाचकर्मणा कर्मनिर्हारो न ह्यात्यन्तिक इष्यते ।
अविद्वदधिकारित्वाप्परायश्ित्तं विमर्शनम् ॥
११॥
श्री-बादरायणि: उबाच--व्यासपुत्र शुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया; कर्मणा--कर्म से; कर्म-निर्हार:ः --सकाम कर्मों कानिराकरण; न--नहीं; हि--निस्सन्देह; आत्यन्तिक:--अन्तिम; इष्यते--सम्भव होता है; अविद्वत्-अधिकारित्वातू--ज्ञानहुए बिना; प्रायश्चित्तमू--असली प्रायश्चित्त; विमर्शनम्--वेदान्त का पूर्ण ज्ञान।
वेदव्यास-पुत्र शुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया : हे राजन्! चूँकि अपवित्र कर्मों कोनिष्प्रभावित करने के उद्देश्य से किये गये कर्म भी सकाम होते हैं, अतएव वे मनुष्य कोसकाम कर्म करने की प्रवृत्ति से छुटकारा नहीं दिला सकते।
जो व्यक्ति अपने को प्रायश्ित्त के विधि-विधानों के अधीन बना लेते हैं, वे तनिक भी बुद्धिमान नहीं हैं।
अपितु, वे सभीतमोगुण में होते हैं।
जब तक मनुष्य तमोगुण से मुक्त नहीं हो जाता, तब तक एक कर्म कादूसरे से निराकरण करने का प्रयास करना निरर्थक है, क्योंकि इससे मनुष्य की इच्छाओं काउन्मूलन नहीं होगा।
इस तरह ऊपर से पवित्र लगने वाला व्यक्ति निस्सन्देह पाप पूर्ण कर्मकरने के लिए उन्मुख होगा।
अतएवं असली प्रायश्चित्त तो पूर्ण ज्ञान अर्थात् वेदान्त में प्रबुद्धहोना है, जिससे मनुष्य परम सत्य भगवान् को समझता है।
नाएनतः पथ्यमेवान्नं व्याधयोडभिभवन्ति हि ।
एवं नियमकृद्राजन्शनै: क्षेमाय कल्पते ॥
१२॥
न--नहीं; अश्नत:ः--खाने वाला; पथ्यम्--उपयुक्त; एबव--निस्सन्देह; अन्नमू--भोजन; व्याधय:--विभिन्न प्रकार के रोग;अभिभवन्ति--घेर लेते हैं; हि--निस्सन्देह; एवम्--इसी प्रकार; नियम-कृत्--नियमों का पालन करने वाला; राजन्--हेराजा; शनैः: --धीरे-धीरे; क्षेमाय--कल्याण के हेतु; कल्पते--स्वस्थ हो जाता है।
हे राजन्! यदि रुग्ण व्यक्ति वैद्य द्वारा बताया गया शुद्ध अदूषित अन्न खाता है, तो वहधीरे-धीरे अच्छा हो जाता है और तब रोग का संक्रमण उसे छू तक नहीं पाता।
इसी तरहयदि कोई ज्ञान के विधि-विधानों का पालन करता है, तो वह धीरे-धीरे भौतिक कल्मष सेमोक्ष की ओर प्रगति करता है।
तपसा ब्रह्मचर्यण शमेन च दमेन च ।
त्यागेन सत्यशौचाभ्यां यमेन नियमेन वा ॥
१३॥
देहवाग्बुद्धिजं धीरा धर्मज्ञा: श्रद्धयान्विता: ।
क्षिपन्त्यघं महदपि वेणुगुल्ममिवानल: ॥
१४॥
तपसा--तपस्या या भौतिक भोग का स्वेच्छा से तिरस्कार द्वारा; ब्रह्मचर्येण--ब्रह्मचर्य द्वारा; शमेन--मन को वश में करनेसे; च--तथा; दमेन--इन्द्रियों को पूरी तरह वश में करने से; च-- भी; त्यागेन--स्वेच्छा से उत्तम कार्यो के लिए दान देनेसे; सत्य--सत्यता से; शौचाभ्यामू--तथा अपने आपको भीतर-बाहर से स्वच्छ रखने के विधानों का पालन करने से;यमेन--शाप देने तथा अहिंसा से बचने से; नियमेन-- भगवान् के नाम का नियमित कीर्तन करने से; वा--तथा; देह-वाक्-बुद्धि-जम्ू--शरीर, वाणी तथा बुद्धि के द्वारा सम्पन्न; धीरा:--धीर लोग; धर्म-ज्ञाः--धार्मिक सिद्धान्तों के ज्ञान सेपूरित; श्रद्धया अन्विता:-- श्रद्धा से युक्त; क्षिपन्ति--नष्ट करते हैं; अधम्--सभी प्रकार के पापकर्मों को; महत् अपि--यद्यपि अति महान् तथा निन्दनीय; वेणु-गुल्मम्--बाँस के वृक्ष के नीचे की सूखी लतर; इब--सहृश; अनलः--अग्निमन को
एकाग्र करने के लिए मनुष्य को ब्रह्मचर्य जीवन बिताना चाहिए औरअध:ःपतित नहीं होना चाहिए।
उसे इन्द्रिय-भोग को स्वेच्छा से त्यागने की तपस्या करनीचाहिए।
तब उसे मन तथा इन्द्रियों को वश में करना चाहिए, दान देना चाहिए, सत्यक्रती,स्वच्छ तथा अहिंसक होना चाहिए, विधि-विधानों का पालन करना चाहिए और नियमपूर्वकभगवजन्नाम का कीर्तन करना चाहिए।
इस तरह धार्मिक सिद्धान्तों को जानने वाला धीर तथाश्रद्धावान् व्यक्ति अपने शरीर, वचन तथा मन से किये गये सारे पापों से अस्थायी रूप सेशुद्ध हो जाता है।
ये पाप बाँस के पेड़ के नीचे की लतरों की सूखी पत्तियों के समान हैं,जिन्हें अग्नि द्वारा जलाया जा सकता है, यद्यपि उनकी जड़ें अवसर पाते ही फिर से उगने केलिए शेष बची रहती हैं।
केचित्केवलया भक््त्या वासुदेवपरायणा: ।
अघं धुन्वन्ति कार्त्स्येन नीहारमिव भास्कर: ॥
१५॥
केचित्--कुछ लोग; केवलया भकत्या--शुद्ध भक्ति के द्वारा; वासुदेव--सर्वव्यापक पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण केप्रति; परायणा:--पूर्णतया आसक्त ( तपस्या, ज्ञान के अनुशीलन या पुण्यकर्मों पर आश्नित रहे बिना ऐसी सेवा के प्रति );अघम्--सभी प्रकार के पापपूर्ण फल; धुन्वन्ति--विनष्ट करते हैं; कार्त्स्येन--पूर्णतया ( इसकी ) सम्भावना के बिना किपापपूर्ण इच्छाएँ पुनर्जीवित होंगी; नीहारम्--कुहरा; इब--सहृश; भास्कर: --सूर्य |
कोई विरला व्यक्ति ही, जिसने कृष्ण की पूर्ण शुद्ध भक्ति को स्वीकार कर लिया है, उनपापपूर्ण कार्यों के खरपतवार को समूल नष्ट कर सकता है जिनके पुनरुज्जीवित होने कीकोई सम्भावना नहीं रहती।
वह भक्तियोग सम्पन्न करके इसे कर सकता है, जिस तरह सूर्यअपनी किरणों से कुहरे को तुरन्त उड़ा देता है।
न तथा ह्यघवान्राजन्पूयेत तपआदिभि: ।
यथा कृष्णार्पितप्राणस्तत्पुरुषनिषेवया ॥
१६॥
न--नहीं; तथा--उसी तरह; हि--निश्चय ही; अध-वान्--पापकर्मों से पूर्ण मनुष्य; राजन्ू--हे राजा; पूयेत--पतवित्र होसकता है; तपः-आदिभि: --तपस्या, ब्रह्मचर्य तथा अन्य संस्कारों को सम्पन्न करने से; यथा--जिस तरह; कृष्ण-अर्पित-प्राण:-- भक्त जिसका जीवन कृष्णभावनाभावित हो; तत्-पुरुष-निषेवया--कृष्ण के प्रतिनिधि की सेवा में अपना जीवनलगाने से
हे राजन्! यदि पापी व्यक्ति भगवान् के प्रामाणिक भक्त की सेवा में लग जाता है औरइस तरह यह सीख लेता है कि अपना जीवन किस तरह कृष्ण के चरणकमलों में समर्पितकरना चाहिए तो वह पूर्णतया शुद्ध हो सकता है।
तपस्या, ब्रह्मचर्य तथा मेरे द्वारा पहलेवर्णित प्रायश्चित्त के अन्य साधनों को सम्पन्न करने मात्र से वह पापी शुद्ध नहीं बन सकता।
सश्नीचीनो हाय॑ं लोके पन्था: क्षेमोडकुतोभयः ।
सुशीला: साधवो यत्र नारायणपरायणा: ॥
१७॥
सक्नीचीन:--उपयुक्त; हि--निश्चय ही; अयम्--यह; लोके--संसार में; पन्था:--मार्ग ; क्षेम:--मंगलमय, शुभ; अकुतः-भय: --निर्भय; सु-शीला:--अच्छे आचरण वाले; साधव:--साथधु पुरुष; यत्र--जहाँ; नारायण-परायणा: -- जिन्होंनेनारायण के मार्ग अर्थात् भक्ति को अपना सर्वस्व मान लिया है
सुशील तथा सर्वोत्तम गुणों से युक्त शुद्ध भक्तों के द्वारा पालन किया जाने वाला मार्गनिश्चय ही इस भौतिक जगत का सबसे मंगलमय मार्ग है।
यह भय से रहित है और शास्त्रोंद्वारा प्रमाणित है।
प्रायश्चित्तानि चीर्णानि नारायणपराड्मुखम् ।
न निष्पुनन्ति राजेन्द्र सुराकुम्भमिवापगा: ॥
१८॥
प्रायश्चित्तानि--प्रायश्चित्त की विधियाँ; चीर्णानि--अच्छे ढंग से सम्पन्न; नारायण-पराड्सुखम्--अभक्त; न निष्पुनन्ति--पवित्र नहीं कर सकतीं; राजेन्द्र--हे राजन; सुरा-कुम्भम्--शराब से भरा पात्र; इब--सदृश; आप-गा:--नदियों का जल।
हे राजन्! जिस तरह सुरा से सने हुए पात्र को अनेक नदियों के जल से धोने पर भी शुद्धनहीं किया जा सकता, उसी तरह अभक्तों को प्रायश्चित्त की विधियों से शुद्ध नहीं बनाया जासकता, भले ही वे उन्हें बहुत अच्छी तरह से सम्पन्न क्यों न करें।
सकृन्मनः कृष्णपदारविन्दयोर्निवेशितं तद्गुणरागि यैरिह ।
नते यम॑ पाशभृतश्न तद्धटान्स्वष्लेषपि पश्यन्ति हि चीर्णनिष्कृता: ॥
१९॥
सकृत्--केवल एक बार; मन:--मन; कृष्ण-पद-अरविन्दयो:--कृष्ण के दो चरणकमलों के प्रति; निवेशितम्--पूर्णशरणागत; तत्--कृष्ण का; गुण-रागि--जो गुण, नाम, यश तथा साज-सामग्री के प्रति कुछ-कुछ अनुरक्त रहता है;यैः--जिनके द्वारा; हह--इस जगत में; न--नहीं; ते--ऐसे पुरुष; यमम्--मृत्यु के अधिष्ठाता यमराज को; पाश-भूत:--( पापी पुरुषों को पकड़ने के लिए ) रस्सी ( पाश ) रखने वाले; च--तथा; तत्--उसके; भटानू--आदेश वाहकों या दूतोंको; स्वप्ने अपि--स्वपष्न में भी; पश्यन्ति--देखते हैं; हि--निस्सन्देह; चीर्ण-निष्कृता:--सही प्रायश्चित्त करने वाले |
यद्यपि जिन पुरुषों ने कृष्ण का पूर्ण साक्षात्कार नहीं किया है, तो भी यदि एक बार भीउनके चरणकमलों की पूर्णरूपेण शरण ग्रहण कर ली है और जो उनके नाम, रूप, गुणोंतथा लीलाओं से आकृष्ट हो चुके हैं, वे सारे पापकर्मों से पूर्णतया मुक्त हो जाते हैं, क्योंकिइस तरह उन्होंने प्रायश्चित्त की सही विधि को स्वीकार किया है।
ऐसे शरणागत व्यक्तियों कोयमराज या उनके दूत, जो कि पापी को बाँधने के लिए रस्सियाँ लिए रहते हैं, स्वप्न में भीदिखाई नहीं पड़ते।
अन्न चोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
दूतानां विष्णुयमयो: संवादस्तं निबोध मे ॥
२०॥
अत्र--इस सम्बन्ध में; च-- भी; उदाहरन्ति--उदाहरण देते हैं; इमम्ू--यह; इतिहासमू--( अजामिल का ) इतिहास;पुरातनम्--अत्यन्त प्राचीन; दूतानाम्--दूतों का; विष्णु-- भगवान् विष्णु के; यमयो:--तथा यमराज के; संवाद: --बातचीत; तमू--उसको; निबोध--समझने का प्रयास करो; मे--मुझसे
इस सम्बन्ध में विद्वान जन तथा सन्त पुरुष एक अत्यन्त प्राचीन ऐतिहासिक घटना कावर्णन करते हैं जिसमें भगवान् विष्णु तथा यमराज के दूतों के बीच संवाद हआ था।
कृपाकरके इसे मुझसे सुनिये।
कान्यकुब्जे द्विज: कश्चिद्दासीपतिरजामिल: ।
नाम्ना नष्टसदाचारो दास्या: संसर्गदूषितः ॥
२१॥
कान्य-कुब्जे--कान्यकुब्ज नगर में ( कानपुर के निकट का नगर कन्नौज ); द्विज:--ब्राह्मण; कश्चित्--कोई; दासी-पति:--निम्न श्रेणी की स्त्री या वेश्या का पति; अजामिल:--अजामिल; नाम्ना--नामक; नष्ट-सत् -आचार: --जो अपनेसारे ब्राह्मण-गुणों को खो चुका था; दास्या:--दासी या वेश्या की; संसर्ग-दूषित:--संगति से दूषित।
कान्यकुब्ज नामक नगर में अजामिल नाम का एक ब्राह्मण था, जिसने एक वेश्या दासीसे विवाह करके उस निम्न श्रेणी की स्त्री की संगति के कारण अपने सारे ब्राह्मण-गुण खोदिये।
बन्द्यक्षे: केतवैश्वौयर्गर्हितां वृत्तिमास्थितः ।
बिश्चत्कुटुम्बमशुचिर्यातयामास देहिन: ॥
२२॥
बन्दी-अक्षे:--व्यर्थ ही बन्दी बनाकर; कैतवै: --जुआ खेलने या पासा फेंकने में धोखा देकर; चौर्य:--चोरी करके;गर्हिताम्ू--निन्दनीय; वृत्तिमू-पेशों में; आस्थित:--जिसने अपना रखा है ( वेश्या की संगति के कारण ); बिभ्रतू--पालनकरते हुए; कुटुम्बम्--आश्रित पतली तथा बच्चों को; अशुचि:--अत्यन्त पापी होने से; यातयाम् आस--कष्ट पहुँचाता था;देहिन:--अन्य जीवों को
यह पतित ब्राह्मण अजामिल अन्यों को बन्दी बनाकर उन्हें जुए में धोखा देकर या सीधेउन्हें लूट कर कष्ट पहुँचाता था।
इस तरह से वह अपनी जीविका चलाता था और अपनीपत्नी तथा बच्चों का भरण-पोषण करता था।
एवं निवसतस्तस्य लालयानस्य तत्सुतान् ।
कालोउत्यगान्महान्राजन्नष्टाशीत्यायुष: समा: ॥
२३॥
एवम्--इस तरह से; निवसतः --रहते हुए; तस्थ--उस ( अजामिल ) के; लालयानस्य--पालन-पोषण का; तत्--उस( शूद्राणी ) के; सुतान्--पुत्रों को; काल:--समय; अत्यगात्--बीत गया; महान्--पर्याप्त; राजन्ू--हे राजा;अष्टाशीत्या--अट्टासी; आयुष: --आयु के; समा: --वर्ष |
हे राजन्! इस तरह अनेक पुत्रों वाले अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए घृणास्पदपापपूर्ण कार्यो में अपना जीवन बिताते हुए उसके जीवन के अट्टासी वर्ष बीत गये।
तस्य प्रवयस: पुत्रा दश तेषां तु योडवमः ।
बालो नारायणो नाम्ना पित्रोश्व दयितो भूशम् ॥
२४॥
तस्य--उस ( अजामिल ) का; प्रववसः--अत्यन्त वृद्ध; पुत्रा:--पुत्र; दश--दस; तेषाम्--उनमें से; तु--लेकिन; यः--एक जो; अवम:--सबसे छोटा; बाल:--बालक; नारायण:--नारायण; नाम्ना--नाम वाला; पित्रो:--माता-पिता का;च--तथा; दयित:--प्रिय; भूशम्-- अत्यधिक |
उस वृद्ध अजामिल के दस पुत्र थे, जिनमें से सबसे छोटे का नाम नारायण था।
चूँकिनारायण सबसे छोटा पुत्र था, अतः स्वाभाविक है कि वह अपने पिता तथा माता दोनों काही अत्यन्त लाड़ला था।
स बद्धहदयस्तस्मिन्नभभके कलभाषिणि ।
निरीक्षमाणस्तल्लीलां मुमुदे जरठो भूशम् ॥
२५॥
सः--वह; बद्ध-हृदय:--अत्यधिक लिप्त; तस्मिनू--उस; अर्भके--छोटे बच्चे के प्रति; कल-भाषिणि--तोतली भाषा मेंबोलने वाला; निरीक्षमाण:--देखते हुए; तत्--उसकी; लीलाम्--क्रीड़ाएँ ( यथा चलना तथा पिता से बातें करना );मुमुदे--आनन्द लेता; जरठ:--वृद्ध व्यक्ति; भूशम्-- अत्यधिक
बालक की तोतली भाषा तथा लड़खड़ाती चाल से वृद्ध अजामिल उसके प्रतिअत्यधिक अनुरक्त था।
वह उस बालक की देखरेख करता तथा उसकी क्रीड़ाओं का आनन्दलेता।
भुज्जान: प्रपिबन्खादन्बालकं स्नेहयन्त्रित: ।
भोजयन्पाययन्मूढो न वेदागतमन्तकम् ॥
२६॥
भुझ्जान:--खाते समय; प्रपिबन्--पीते हुए; खादन्--चबाते हुए; बालकम्--बालक को; स्नेह-यन्त्रित:--स्नेह द्वारा बँधाहुआ; भोजयन्--खिलाते हुए; पाययन्--पीने के लिए कुछ देते हुए; मूढ:--मूर्ख व्यक्ति; न--नहीं; वेद--जान पाया;आगतम्--आ गयी है; अन्तकम्--मृत्यु
जब अजामिल भोजन करता तो वह बालक को खाने के लिए पुकारता और जब वहकुछ पीता तो उसे भी पीने के लिए बुलाता।
उस बालक की देखरेख करने तथा उसका नामपुकारने में सदा लगा रहकर अजामिल यह न समझ पाया कि उसका समय अब समाप्त होचुका है और मृत्यु उसके सिर पर है।
स एवं वर्तमानोज्ञो मृत्युकाल उपस्थिते ।
मतिं चकार तनये बाले नारायणाहयये ॥
२७॥
सः--वह अजामिल; एवम्--इस प्रकार; वर्तमान: --जीवित; अज्ञ:--मूर्ख ; मृत्यु-काले--जब मृत्यु का समय;उपस्थिते--आ गया; मतिम् चकार--अपना मन एकाग्र किया; तनये--अपने पुत्र पर; बाले--बालक; नारायण-आह्ये--जिसका नाम नारायण था।
जब मूर्ख अजामिल की मृत्यु का समय आ गया तो वह एकमात्र अपने पुत्र नारायण केविषय में सोचने लगा।
स पाशहस्तांस्त्रीन्दट्ठा पुरुषानतिदारुणान् ।
वक्रतुण्डानूर्ध्वरोम्ण आत्मानं नेतुमागतान् ॥
२८ ॥
दूरे क्रीडनकासक्त पुत्रं नारायणाहयम् ।
प्लावितेन स्वरेणोच्चैराजुहावाकुलेन्द्रियः ॥
२९॥
सः--वह व्यक्ति ( अजामिल ); पाश-हस्तान्ू--उनके हाथों में रस्सियाँ लिए; त्रीन्ू--तीन; दृष्टा-- देखकर; पुरुषान्--पुरुषों को; अति-दारुणान्--अत्यन्त भयावह सूरत वाले; वक़्-तुण्डान्ू--टेढ़े मुखों वाले; ऊर्ध्व-रोग्ण:--खड़े रोमों वाले;आत्मानम्--स्वयं को; नेतुमू--ले जाने के लिए; आगतान्--आये हुए; दूरे-- थोड़ी दूरी पर; क्रीडनक-आसक्तम्--खेलमें लगे; पुत्रम्ू--पुत्र को; नारायण-आह्॒यम्--नारायण नाम के; प्लावितेन--अश्रुपूर्ण नेत्रों से; स्वरेण--वाणी से;उच्चै:--अत्यन्त ऊँची; आजुहाव--पुकारा; आकुल-इन्द्रियः--चिन्ता से पूरित होकर
तब अजामिल ने तीन भयावह व्यक्तियों को देखा जिनके शरीर वक्र, भयानक औरमुख टेढ़े थे तथा शरीर पर रोम खड़े हुए थे।
वे अपने हाथों में रस्सियाँ लिए हुए उसे यमराजके धाम ले जाने के लिए आये थे।
जब उसने उन्हें देखा तो वह अत्यधिक विमोहित था औरकुछ दूर पर खेल रहे अपने बच्चे के प्रति आसक्ति के कारण अजामिल उसका नाम लेकरजोर- जोर से पुकारने लगा।
इस तरह अपनी आँखों में आँसू भरे हुए किसी तरह से उसनेनारायण के पवित्र नाम का उच्चारण किया।
निशम्य प्रियमाणस्य मुखतो हरिकीर्तनम् ।
भर्तुर्नाम महाराज पार्षदा: सहसापतन् ॥
३०॥
निशम्य--सुनकर; प्रियमाणस्थ--मरणासत्न व्यक्ति के; मुखत:--मुख से; हरि-कीर्तनम्--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् केपवित्र नाम का कीर्तन; भर्तु: नाम--अपने स्वामी का पवित्र नाम; महा-राज--हे राजा; पार्षदा: --विष्णु के दूत; सहसा--तुरन्त; आपतन्--आ गये।
हे राजन्! जब विष्णुदूतों ने मरणासन्न अजामिल के मुख से अपने स्वामी के पवित्र नामको सुना, जिसने निश्चित ही पूर्ण उद्विग्नता में निरपराध भाव से उच्चारण किया था, तो वेतुरन्त वहाँ आ गये।
विकर्षतोन्तईदयाद्यासीपतिमजामिलम् ।
यमप्रेष्यान्विष्णुदूता वारयामासुरोजसा ॥
३१॥
विकर्षतः--छीनते हुए; अन्तः हृदयात्ू--हदय के भीतर से; दासी-पतिम्--वेश्या के पति; अजामिलम्-- अजामिल को;यम-प्रेष्यान्--यमराज के दूतों को; विष्णु-दूताः --विष्णु के दूतों ने; वारयाम् आसु:--मना किया; ओजसा--गूंजतीवाणी में
यमराज के दूत वेश्यापति अजामिल के हृदय के भीतर से आत्मा को खींच रहे थे,किन्तु भगवान् विष्णु के दूतों ने गूंजती वाणी में उन्हें ऐसा करने से मना किया।
जिसमें उसे अगले शरीर में रहना है।
ऊचुर्निषेधितास्तांस्ते वैवस्वतपुर:सरा: ।
के यूय॑ प्रतिषेद्धारो धर्मराजस्य शासनम् ॥
३२॥
ऊचु:--उत्तर दिया; निषेधिता:--मना किये जाने पर; तान्--विष्णुदूतों को; ते--वे; वैवस्वत--यमराज के; पुर: -सरा:--सहायक या दूत; के--कौन; यूयम्ू--तुम सब; प्रतिषेद्-धार:--कौन विरोध कर रहे हो; धर्म-राजस्य--धर्म के राजा,यमराज का; शासनमू्--राज्य अधिकार क्षेत्र
जब सूर्य के पुत्र यमराज के दूतों को इस प्रकार मना किया गया तो उन्होंने कहा,'महाशय! आप कौन हैं जिन्होंने यमराज के अधिकार-क्षेत्र को ललकारने की धृष्टता कीहै?
कस्य वा कुत आयाता: कस्मादस्य निषेधथ ।
किं देवा उपदेवा या यूय॑ कि सिद्धसत्तमा: ॥
३३॥
कस्य--किसके सेवक; वा--अथवा; कुतः--कहाँ से; आयाता:--तुम आये हो; कस्मात्--किस कारण से; अस्य--इसअजामिल का ( ले जाना ); निषेधथ--हम मना कर रहे हैं; किम्--क्या; देवा: --देवता; उपदेवा:--तथा उपदेवता; या:--जो; यूयम्--तुम सभी; किम्--क्या; सिद्ध-सत्-तमाः--सिद्धों या शुद्ध भक्तों में सर्व श्रेष्ठ |
महाशयो! तुम किसके सेवक हो, कहाँ से आये हो और अजामिल का शरीर छूने से हमेंक्यों मना कर रहे हो ?
क्या तुम लोग स्वर्गलोक के देवता हो, उपदेवता हो या कि सर्वश्रेष्ठभक्तों में से कोई हो ?
सर्वे पद्यपलाशाक्षा: पीतकौशेयवासस: ।
किरीटिन: कुण्डलिनो लसत्पुष्करमालिन: ॥
३४॥
सर्वे च नूलवयस: सर्वे चारुचतुर्भुजा: ।
धनुर्निषड्ञासिगदाशड्डुचक्राम्बुजश्रिय: ॥
३५॥
दिशो वितिमिरालोका: कुर्वन्तः स्वेन तेजसा ।
किमर्थ धर्मपालस्य किड्डूरान्नो निषिधथ ॥
३६॥
सर्वे--आप सभी; पद्य-पलाश-अक्षा:--कमल के फूल की पंखड़ियों जैसी आँखों वाले; पीत--पीला; कौशेय--रेशमी;वाससः:--वस्त्र पहने हुए; किरीटिन:--मुकुट पहने; कुण्डलिन:--कान में कुंडल पहने; लसत्--चमचमाते; पुष्कर-मालिन:--कमल की माला पहने; सर्वे--आप सभी; च--भी; नूल-वयस:--अत्यन्त तरुण; सर्वे--आप सभी; चारु--अत्यन्त सुन्दर; चतु:-भुजा:--चार भुजाओं वाले; धनु:--धनुष; निषड़--तरकस; असि--तलवार; गदा-गदा; शद्बु--शंख; चक्र--चक्र; अम्बुज--कमल का फूल; श्रिय:--से सुशोभित; दिश:--सारी दिशाएँ; वितिमिर--अंधकाररहित;आलोका:--असामान्य प्रकाश; कुर्वन्त:--प्रकट करते हुए; स्वेन--अपने; तेजसा--तेज से; किम् अर्थम्--क्या प्रयोजनहै; धर्म-पालस्य--धर्म के पालनकर्ता यमराज के; किड्जूरान्ू--सेवकों को; न:--हम; निषेधथ--मना कर रहे हो |
यमदूतों ने कहा: आप सभी की आँखें कमल के फूल की पंखडियों के समान हैं।
पीला रेशमी वस्त्र पहने, कमल की मालाओं से सुसज्जित तथा अपने सिरों में अत्यन्तआकर्षक मुकुट पहने एवं अपने कानों में कुंडल धारण किये तुम सभी नवयौवन से पूर्णप्रतीत हो रहे हो।
आप सभी की चार लम्बी भुजाएँ धनुष तथा तरकस, तलवार, गदा, शंख,चक्र तथा कमल के फूलों से अलंकृत हैं।
आपके तेज ने इस स्थान के अंधकार को अपनेअसामान्य प्रकाश से भगा दिया है।
तो महोदय आप हमें क्यों रोक रहे हैं ?
श्रीशुक उवाचइत्युक्ते यमदूतैस्ते वासुदेवोक्तकारिण: ।
ताय्प्रत्यूचु: प्रहस्येदं मेघनि्ठांदया गिरा ॥
३७॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; उक्ते--कहे जाने पर; यमदूतै: --यमदूतों के द्वारा;ते--वे; वासुदेव-उक्त-कारिण: --भगवान् वासुदेव के आदेशों को पूरा करने के लिए सदैव सन्नद्ध रहने वाले ( भगवान्विष्णु के निजी संगी जिन्हें सालोक्य मुक्ति प्राप्त हो चुकी है ); तान्ू--उनको; प्रत्यूचु:--उत्तर दिया; प्रहस्य--हँसकर;इदम्--यह; मेघ-निर्हादया--गरजने वाले बादल के समान गूँजती; गिरा--वाणी से।
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : यमराज के दूतों द्वारा इस प्रकार सम्बोधित किये जानेपर वासुदेव के सेवक मुसकाये और उन्होंने गर्जना करते हुए बादलों की ध्वनि जैसी गम्भीरवाणी में निम्नलिखित शब्द कहे।
निर्णायक के सेवक होने का दावा करने वाले यमदूत धार्मिक कर्म के सिद्धान्तों से परिचित नहींहैं।
अत: यह सोचकर विष्णुदूत हँसने लगे, 'ये लोग यह क्या बकवास कर रहे हैं ?
यदि ये लोग सचमुच यमराज के सेवक हैं, तो इन्हें यह जानना चाहिए था कि अजामिल उनके द्वारा ले जायेजाने के लिए उपयुक्त पात्र नहीं है।
'श्रीविष्णुदूता ऊचुःयूयं वै धर्मराजस्य यदि निर्देशकारिण: ।
ब्रूत धर्मस्य नस्तत्त्वं यच्चाधर्मस्य लक्षणम् ॥
३८॥
श्री-विष्णुदूता: ऊचु:-- भगवान् विष्णु के अहोभाग्य दूतों ने कहा; यूयम्--तुम सभी; बै--निस्सन्देह; धर्म-राजस्य-- धर्मके ज्ञाता यमराज के; यदि--यदि; निर्देश-कारिण:--आज्ञापालक; ब्रूत--तो कहो; धर्मस्य--धार्मिक सिद्धान्तों का;नः--हमसे; तत्त्वम्-सत्य; यत्--जो; च--भी; अधर्मस्य--अधार्मिक कार्यो का; लक्षणम्ू--लक्षण।
अहोभाग्य विष्णुदूतों ने कहा : यदि तुम लोग सचमुच ही यमराज के सेवक हो तो तुम्हेंहमसे धार्मिक सिद्धान्तों के अर्थ तथा अधर्म के लक्षणों की व्याख्या करनी चाहिए।
कथ्॑ स्विद्ध्रयते दण्ड: कि वास्य स्थानमीप्सितम् ।
दण्ड्या: कि कारिण: सर्वे आहो स्वित्कतिचिन्रणाम् ॥
३९॥
कथम् स्वितू--किस साधन से; श्चियते--लगाया जाता है; दण्ड:--दण्ड; किम्--क्या; वा--अथवा; अस्य--इसका;स्थानम्--स्थान; ईप्सितम्ू--वांछित; दण्ड्या:--दण्डनीय; किम्-- क्या; कारिण:--सकाम कर्मी; सर्वे--समस्त; आहोस्वितू--अथवा कि; कतिचित्--कुछ; नृणाम्--मनुष्यों का |
दूसरों को दण्ड देने की विधि क्या है?
दण्ड के वास्तविक पात्र कौन हैं ?
क्या सकामकर्मों में लगे सारे कर्मी दण्डनीय हैं या उनमें से केवल कुछ ही हैं ?
यमदूता ऊचु:वबेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्यय: ।
वबेदो नारायण: साक्षात्स्वयम्भूरिति शुश्रुम ॥
४०॥
यमदूता: ऊचु:--यमदूतों ने कहा; वेद--चारों वेदों ( साम, यजु, ऋण तथा अथर्व ) से; प्रणिहित:--स्वीकृत, संस्तुत;धर्म:--धार्मिक सिद्धान्त; हि--निस्सन्देह; अधर्म:--अधार्मिक सिद्धान्त; ततू-विपर्यय:--उसके विपरीत ( जो वैदिकआदेशों द्वारा समर्थित नहीं है ); वेद:--ज्ञान के ग्रन्थ, वेद; नारायण: साक्षात्- प्रत्यक्ष पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ( नारायणके शब्द होने से ); स्वयम्-भू: --स्वतः जन्मा, आत्मनिर्भर ( नारायण की श्वास से प्रकट होने वाला तथा अन्य किसी से नसीखा हुआ ); इति--इस प्रकार; शुश्रुम--हमने सुना है।
यमदूतों ने उत्तर दिया: जो वेदों द्वारा संस्तुत है, वही धर्म है और इसका विलोम अधर्महै।
वेद साक्षात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, नारायण हैं और स्वयं उत्पन्न हुए हैं।
हमने यमराजसे यह सुना है।
येन स्वधाम्न्यमी भावा रजःसत्त्वतमोमया: ।
गुणनामक्रियारूपैर्विभाव्यन्ते यथातथम् ॥
४१॥
येन--जिस ( नारायण ) के द्वारा; स्व-धाम्नि--यद्यपि अपने स्थान अर्थात् आध्यात्मिक जगत में; अमी--ये सब; भावा:--अभिव्यक्तियाँ; रज:-सत्त्व-तम:-मया:-- भौतिक प्रकृति के तीन गुणों ( सतो, रजो तथा तमो ) द्वारा उत्पन्न; गुण--गुण;नाम--नाम; क्रिया--कार्यकलाप; रूपै:--तथा रूपों से; विभाव्यन्ते--विविध रूप में प्रकट हैं; यथा-तथम्--सही सही समस्त कारणों के परम कारण रूप नारायण आध्यात्मिक जगत में अपने धाम में स्थितहैं
तथापि वे भौतिक प्रकृति के तीन गुणों--सत्त्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुण--के अनुसारसम्पूर्ण विराट जगत का नियंत्रण करते हैं।
इस तरह विभिन्न जीवों को भिन्न-भिन्न गुण, नाम( यथा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ), वर्णाश्रम धर्म के अनुसार कार्य तथा रूप प्रदान किये जातेहैं।
नारायण सम्पूर्ण विराट जगत के कारणस्वरूप है।
सूर्योउग्नि: खं मरुद्देव: सोम: सन्ध्याहनी दिशः ।
क॑ कुः स्वयं धर्म इति होते देह्यस्य साक्षिण: ॥
४२॥
सूर्य:--सूर्यदेव; अग्नि:-- अग्नि; खम्--आकाश; मरुत्--वायु; देव: --देवता; सोम:--चन्द्रमा; सन्ध्या--सायंकाल;अहनी--दिन तथा रात; दिश:--दिशाएँ; कम्--जल; कुः-- पृथ्वी; स्वयम्--स्वयं; धर्म:--यमराज या परमात्मा; इति--इस प्रकार; हि--निस्सन्देह; एते--ये सभी; दैह्यस्थ--जीव के भौतिक तत्त्वों के शरीर में; साक्षिण:--साक्षी, गवाह।
सूर्य, अग्नि, आकाश, वायु, देवगण, चन्द्रमा, संध्या, दिन, रात, दिशाएँ, जल, स्थलतथा स्वयं परमात्मा--ये सभी जीव के कार्यों के साक्षी हैं।
एतैरधर्मो विज्ञातः स्थानं दण्डस्य युज्यते ।
सर्वे कर्मानुरोधेन दण्डमर्हन्ति कारिण: ॥
४३॥
एतै:--इन सबों ( सूर्य इत्यादि साक्षियों ) के द्वारा; अधर्म:--विधि विधानों से विचलन; विज्ञात:--ज्ञात है; स्थानम्--उचित स्थान; दण्डस्य--दंड का; युज्यते--के रूप में स्वीकार किया जाता है; सर्वे--समस्त; कर्म-अनुरोधेन-- सम्पन्नकार्यों पर विचार करते हुए; दण्डम्ू--दण्ड; अ्ईन्ति--योग्यता रखते हैं; कारिण:--पापकर्म करने वाले।
दण्ड के पात्र वे हैं जिसकी पुष्टि इन अनेक साक्षियों ने की है कि वे निर्दिष्ट नियमितकार्यों से विचलित हुए हैं।
सकाम कर्मों में लगा हुआ प्रत्येक व्यक्ति अपने पापकर्मों केअनुसार दण्ड दिये जाने के लिए उपयुक्त होता है।
सम्भवन्ति हि भद्राणि विपरीतानि चानघा: ।
कारिणां गुणसझ्लेउस्ति देहवान्न ह्कर्मकृत् ॥
४४॥
सम्भवन्ति--हैं; हि--निस्सन्देह; भद्राणि--शुभ, पवित्र कार्य; विपरीतानि--बिल्कुल उल्टे ( अशुभ, पापकर्म ); च--भी;अनघा:--हे पापरहित वैकुण्ठवासियों; कारिणाम्--सकाम कर्मियों का; गुण-सड्डभ:--प्रकृति के तीन गुणों का कल्मष;अस्ति-- है; देह-वान्--इस भौतिक शरीर को स्वीकार करने वाला, देहधारी; न--नहीं; हि--निस्सन्देह; अकर्म-कृत्--कर्म किये बिना।
हे वैकुण्ठवासियों! तुम लोग निष्पाप हो, किन्तु इस भौतिक जगत के भीतर रहने वालेसारे वासी कर्मी हैं, चाहे वे शुभ कर्म कर रहे हों या अशुभ।
ये दोनों प्रकार के कर्म उनकेलिए सम्भव हैं, क्योंकि वे प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा कलुषित रहते हैं और उन्हें तदनुसारकर्म करना पड़ता है।
जिसने भी भौतिक शरीर अपनाया है, वह निष्क्रिय नहीं हो सकताऔर प्रकृति के तीन गुणों के अधीन कर्म करने वाले के लिए पापकर्म से बच पाना असम्भवहै।
इसलिए इस जगत के सारे जीव दण्डनीय हैं।
येन यावान्यथाधर्मो धर्मो वेह समीहित: ।
स एव तत्फलं भुड्डे तथा तावदमुत्र वै ॥
४५॥
येन--जिस व्यक्ति द्वारा; यावान्ू--जिस हद तक; यथा--जिस रीति से; अधर्म:--अधार्मिक कार्य; धर्म:--धार्मिक कार्य;वा--अथवा; इह--इस जीवन में; समीहित:--सम्पन्न हुए; सः--वह व्यक्ति; एब--निस्सन्देह; तत्-फलम्--उसका विशेषफल; भुड्ढे --आनन्द लेता है या कष्ट उठाता है; तथा--उसी तरह से; तावत्--उसी हद तक; अमुत्र--अगले जीवन में;बै--निस्सन्देह
इस जीवन में अपने धार्मिक या अधार्मिक कार्यों की मात्रा के अनुपात में मनुष्य अपनेअगले जीवन में अपने कर्म के अनुरूप फलों का भोग करता है या कष्ट उठाता है।
यथेह देवप्रवरास्त्रविध्यमुपलभ्यते ।
भूतेषु गुणवैचित्र्यात्तथान्यत्रानुमीयते ॥
४६॥
यथा--जिस तरह; इह--इस जीवन में; देव-प्रवरा:--हे देवताओं में श्रेष्ठ; त्रै-विध्यम्--तीन प्रकार के गुण; उपलभ्यते--प्राप्त किये जाते हैं; भूतेषु--सारे जीवों के मध्य; गुण-बैचित्रयात्--तीन गुणों के द्वारा कल्मष की विविधता के कारण;तथा--उसी तरह; अन्यत्र--अन्य स्थानों में; अनुमीयते-- अनुमान लगा लिया जाता है।
हे देवश्रेष्ठो! हम विभिन्न प्रकार के तीन जीवन देखते हैं, जो प्रकृति के तीन गुणों केकल्मष के कारण हैं।
इस तरह जीव शान्त, अशान्त तथा मूर्ख; सुखी, दुःखी या इन दोनों केबीच; तथा धार्मिक, अधार्मिक या अर्धधार्मिक जाने जाते हैं।
हम यह निष्कर्ष निकाल सकतेहैं कि अगले जीवन में ये तीन प्रकार की प्रकृतियाँ इसी प्रकार से कर्म करेंगी।
वर्तमानोन्ययो: कालो गुणाभिज्ञापको यथा ।
एवं जन्मान्ययोरेतद्धर्माधर्मनिदर्शनम् ॥
४७॥
वर्तमान:--वर्तमान; अन्ययो:-- भूत तथा भविष्य का; काल: --समय; गुण-अभिज्ञापक:--गुणों को प्रकट कराते हुए;यथा--जिस तरह; एवम्--इस प्रकार; जन्म--जन्म; अन्ययो: -- भूत तथा भावी जन्मों का; एतत्--यह; धर्म--धार्मिकसिद्धान्त; अधर्म--अधार्मिक सिद्धान्त; निदर्शनम्--सूचित करते हुए।
जिस तरह वर्तमान वसन््त काल भूत तथा भविष्य काल के वसन्त कालों को सूचितकरता है, उसी तरह सुख, दुःख या दोनों से मिश्रित यह जीवन मनुष्य के भूत तथा भावीजीवनों के धार्मिक तथा अधार्मिक कार्यों के विषय में साक्ष्य प्रस्तुत करता है।
मनसैव पुरे देव: पूर्वरूपं विपश्यति ।
अनुमीमांसतेपूर्व मनसा भगवानज: ॥
४८॥
मनसा--मन से; एव--निस्सन्देह; पुरे-- अपने धाम में या परमात्मा रूप में प्रत्येक के हृदय में; देव:--यमराज देव( दिव्यातीत देवः, जो सदैव तेजोमय तथा दीप्त रहे वह देवता कहलाता है ); पूर्व-रूपम्--विगत धार्मिक या अधार्मिकस्थिति; विपश्यति--पूरी तरह देखते भालते हैं; अनुमीमांसते--वह विचार करता है; अपूर्वम्-- भावी स्थिति; मनसा--अपने मन से; भगवान्--जो सर्वशक्तिमान है; अज:--ब्रह्म के ही समान
सर्वशक्तिमान यमराज ब्रह्माजी के ही समान हैं, क्योंकि जब वे अपने निजी धाम यापरमात्मा की भांति हर एक के हृदय में स्थित होते हैं, वे मन के द्वारा जीव के विगत कार्योका अवलोकन करते हैं और यह समझ जाते हैं कि जीव अगले जीवन में किस तरह कर्मकरेगा।
यथाज्ञस्तमसा युक्त उपास्ते व्यक्तमेव हि ।
न वेद पूर्वमपरं नष्टजन्मस्मृतिस्तथा ॥
४९॥
यथा--जिस तरह; अज्ञ:--मूर्ख जीव; तमसा--निद्रा में; युक्त:--लगा हुआ; उपास्ते--के अनुसार कार्य करता है;व्यक्तम्-स्वण में प्रकट शरीर; एब--निश्चय ही; हि--निस्सन्देह; न वेद--नहीं जानता; पूर्वम्ू--विगत शरीर; अपरमू--अगला शरीर; नष्ट--नष्ट; जन्म-स्मृति:ः--जन्म लेने का स्मरण; तथा--उसी प्रकार |
जिस तरह सोया हुआ व्यक्ति अपने स्वण में प्रकट हुए शरीर के अनुसार कार्य करता हैऔर उसे स्वयं मान लेता है उसी तरह मनुष्य अपने वर्तमान शरीर से अपनी पहचान बनाता है,जिसे उसने अपने विगत धार्मिक या अधार्मिक कार्यों के कारण प्राप्त किया है और वहअपने विगत या भावी जीवनों को जान पाने में असमर्थ रहता है।
पञ्ञभिः कुरुते स्वार्थान्पञ्ञ वेदाथ पञ्ञभि: ।
एकस्तु षोडशेन त्रीन्स्वयं सप्तदशोएनुते ॥
५०॥
पशञ्नभि:--पाँच कर्मेन्द्रियों ( वाणी, बाहें, पांव, गुदा तथा जननांग ) से; कुरुते--करता है; स्व-अर्थान्--अपनी इच्छितरुचियाँ; पश्च--पाँच इन्द्रियविषय ( ध्वनि, रूप, स्पर्श, गन्ध तथा स्वाद ); वेद--जानता है; अथ--इस प्रकार; पशञ्चभि:--पाँच ज्ञान की ( सुनना, देखना, सूँघना, आस्वादन करना तथा अनुभव करना ) इन्द्रियों के द्वारा; एक:--एक; तु--लेकिन;घोडशेन--इन पन्द्रहों तथा मन, सोलह के द्वारा; त्रीन्--अनुभव की तीन कोटियाँ ( सुख, दुख तथा दोनों का मिश्रण );स्वयम्--वह, स्वयं जीव; सप्तदश:--सत्रहवीं वस्तु; अश्नुते-- भोग करता है।
पाँच ज्ञानेन्द्रियों, पाँच कर्मेन्द्रियों तथा पाँच इन्द्रियविषयों के ऊपर मन होता है, जोसोलहवाँ तत्त्व है।
मन के ऊपर सत्तरहवाँ तत्त्व आत्मा स्वयं जीव है, जो अन्य सोलह केसहयोग से अकेले भौतिक जगत का भोग करता है।
जीव तीन प्रकार की स्थितियों का भोगकरता है, यथा सुख दुःख तथा मिश्रित सुख-दुःख।
तो वह अज्ञान के सागर से उबार लिया जाता है।
तदेतत्वोडशकलं लिड्ं शक्तित्रयं महत् ।
धत्तेनुसंसूतिं पुंसि हर्षशोकभयार्तिदाम् ॥
५१॥
तत्--इसलिए; एतत्--यह; षघोडश-कलम्--सोलह अंशों से बना ( यथा दस इन्द्रियाँ, मन तथा पाँच इन्द्रिय-विषय );लिड्डम्ू--सूक्ष्म शरीर; शक्ति-त्रयम्--प्रकृति के तीन गुणों का प्रभाव; महत्--दुर्लध्य; धत्ते--देता है; अनुसंसूतिम्--विभिन्न प्रकार के शरीरों में निरन्तर भ्रमण तथा देहान्तरण; पुंसि--जीव में; हर्ष--हर्ष, शोक--शोक; भय--भय;आर्ति--कष्ठट; दाम्-देने वाला।
सूक्ष्म शरीर सोलह अंगों से समन्वित होता है--पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच इन्द्रियतृप्ति के विषय तथा मन।
यह सूक्ष्म शरीर प्रकृति के तीन गुणों का प्रभाव है।
यहदुर्लघ्य प्रबल इच्छाओं से बना हुआ है, अतएवं यह जीव को मनुष्य-जीवन, पशु-जीवनतथा देवता-जीवन में एक शरीर से दूसरे में देहान्तरण कराता है।
जब जीव को देवता काशरीर प्राप्त होता है, तो वह निश्चित रूप से हर्षित होता है; जब उसे मनुष्य शरीर प्राप्त होताहै, तो वह शोक करता है और जब उसे पशु-शरीर मिलता है, तो वह सदैव भयभीत रहताहै।
किन्तु सभी स्थितियों में वह वस्तुतः दुःखी रहता है।
उसकी यह दुःखित अवस्था संसतिया भौतिक जीवन में देहान्तरण कहलाती है।
देहाज्ञोअजितषड्वर्गो नेच्छन्कर्माणि कार्यते ।
कोशकार इवात्मानं कर्मणाच्छाद्य मुह्ाति ॥
५२॥
देही--देहधारी आत्मा; अज्ञ:--पूर्णज्ञान से रहित; अजित-षटू-वर्ग:--जिसने अनुभवेन्द्रियों तथा मन को वश में नहींकिया; न इच्छन्ू--न चाहते हुए; कर्माणि-- भौतिक लाभ के लिए कर्म; कार्यते--करवाया जाता है; कोशकार:--रेशमका कीड़ा; इब--सहश; आत्मानमू्--स्वयं; कर्मणा--सकाम कर्मो से; आच्छाद्य--आवृत करके; मुहाति--मोहित होजाता है
अपनी इन्द्रियों तथा मन को वश में करने में अक्षम मूर्ख देहधारी जीव अपनी इच्छाओंके विरुद्ध प्रकृति के गुणों के प्रभाव के अनुसार कर्म करने के लिए बाध्य होता है।
वह उसरेशम के कीड़े के समान है, जो अपनी लार का प्रयोग बाह्य कोश बनाने के लिए करता है और फिर उसी में बँध जाता है, जिसमें से बाहर निकल पाने की कोई सम्भावना नहीं रहती।
जीव अपने ही सकाम कर्मों के जाल में अपने को बन्दी कर लेता है और तब अपने कोछुड़ाने का कोई उपाय नहीं ढूँढ़ पाता।
इस तरह वह सदैव मोहग्रस्त रहता है और बारम्बारमरता रहता है।
नहि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्मवश: कर्म गुणै: स्वाभाविकैर्बलात् ॥
५३॥
न--नहीं; हि--निस्सन्देह; कश्चित्--कोई; क्षणम् अपि--एक क्षण के लिए भी; जातु--किसी भी समय; तिष्ठति--रहताहै; अकर्म-कृत्ू--कुछ भी न करते हुए; कार्यते--करवाया जाता है; हि--निस्सन्देह; अवश: --स्वत:; कर्म--सकामकर्म; गुणैः--प्रकृति के गुणों द्वारा; स्वाभाविकै:--पिछले जन्मों में अपनी ही प्रवृत्तियों से उत्पन्न; बलात्--बलपूर्वक
एक भी जीव बिना कार्य किये क्षणभर भी नहीं रह सकता।
उसे प्रकृति के तीन गुणोंके अनुसार अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति द्वारा कर्म करना ही पड़ता है, क्योंकि यह स्वाभाविकप्रवृत्ति उसे एक विशेष ढंग से कार्य करने के लिए बाध्य करती है।
लब्ध्वा निमित्तमव्यक्तं व्यक्ताव्यक्त भवत्युत ।
यथायोनि यथाबीजं स्वभावेन बलीयसा ॥
५४॥
लब्ध्वा-प्राप्त करके; निमित्तमू--कारण; अव्यक्तम्ू--अदहृश्य, अथवा पुरुष को अज्ञात; व्यक्त-अव्यक्तम्-व्यक्त तथाअव्यक्त या स्थूल शरीर तथा सूक्ष्म शरीर; भवति--उत्पन्न होता है; उत--निश्चय ही; यथा-योनि--माता के ही सहश; यथा-बीजम्-पिता के ही सहश; स्व-भावेन--स्वाभाविक प्रवृत्ति द्वारा; बलीयसा--जो अत्यन्त शक्तिशाली है।
सजीव प्राणी जो भी सकाम कर्म करता है, वे चाहे पवित्र हों या अपवित्र, वे उसकीइच्छाओं की पूर्ति के अदृश्य कारण होते हैं।
यह अदृश्य कारण ही जीव के विभिन्न शरीरोंकी जड़ है।
जीव अपनी उत्कट इच्छा के कारण किसी विशेष परिवार में जन्म लेता है औरऐसा शरीर प्राप्त करता है, जो या तो उसकी या उसके पिता माता जैसा होता है।
स्थूल तथासूक्ष्म शरीर उसकी इच्छा के अनुसार उत्पन्न होते हैं।
ह तर तर तर कु न् एष प्रकृतिसड्रेन पुरुषस्थ विपर्यय: ।
आसीत्स एव न चिरादीशसझ़ट्ठिलीयते ॥
५५॥
एष:--यह; प्रकृति-सड्रेन-- भौतिक प्रकृति के साथ संगति होने से; पुरुषस्य--जीव का; विपर्यय:--विस्मृति की स्थितिया विषम स्थिति; आसीत्ू--आ गई; सः--वह स्थिति; एव--निस्सन्देह; न--नहीं; चिरातू--दीर्घ काल तक; ईश-सड्भात्ू--परम ई श्वर ( परमेश्वर ) की संगति से; विलीयते--समाप्त हो जाती है।
चूँकि जीव की संगति भौतिक प्रकृति से रहती है, अतएव वह बड़ी विषम स्थिति मेंहोता है, किन्तु यदि उसे मनुष्य जीवन में यह शिक्षा दी जाती है कि किस तरह पूर्ण पुरुषोत्तमभगवान् या उनके भक्त की संगति की जाये तो इस स्थिति पर काबू पाया जा सकता है।
अयं हि श्रुतसम्पन्न: शीलवृत्तगुणालय: ।
धृतब्रतो मृदुर्दान्तः सत्यवाड्मन्त्रविच्छुचि: ॥
५६॥
गुर्वग्न्यतिथिवृद्धानां शुश्रूषुरनहड्डू तः ।
सर्वभूतसुहत्साधुर्मितवागनसूयक: ॥
५७॥
अयमू--यह व्यक्ति ( अजामिल नामक ); हि--निस्सन्देह; श्रुत-सम्पन्न:--वैदिक ज्ञान में सुशिक्षित; शील--अच्छे चरित्र;वृत्त--अच्छे चाल-चलन; गुण--तथा अच्छे गुण का; आलय:--आगार; धृत-ब्रतः--बैदिक आदेशों को सम्पन्न करने मेंहढ़; मृदु:ः--अत्यन्त विनीत; दान्त:--मन तथा इन्द्रियों को पूरी तरह वश में करने वाला; सत्य-वाक्--सदैव सत्यत्रती;मन्त्र-वित्ू--वैदिक मंत्रों के उच्चारण की विधि को जानने वाला; शुचि: --सदैव अत्यन्त स्वच्छ; गुरु--गुरु; अग्नि--अग्नि; अतिथि--अतिथ्ि; वृद्धानामू-तथा घर के बड़े बूढ़ों का; शुश्रूषु;--आदरपूर्वक सेवा में लगा रहने वाला;अनहड्डू त:--गर्व या झूठी प्रतिष्ठा से रहित; सर्व-भूत-सुहृत्--सारे जीवों का मित्र; साधु;:--अच्छे स्वभाव वाला ( उसकेअरित्र में कोई दोष नहीं निकाल सका ); मित-वाक्ू--बात करते समय यह ध्यान रखने वाला कि व्यर्थ न बोला जाये;अनसूयकः --ईर्ष्यारहित
प्रारम्भ में अजामिल नामक उस ब्राह्मण ने सारे वैदिक ग्रन्थों का अध्ययन किया था।
वह अच्छे चरित्र, अच्छे चाल-चलन तथा अच्छे गुणों का आगार था।
वह सारे वैदिकआदेशों को सम्पन्न करने में दृढ़ था, वह अत्यन्त मृदु तथा सुशील था और अपने मन तथाइन्द्रियों को वश में रखता था।
यही नहीं, वह सदा सच बोलता था, वह जानता था किवैदिक मंत्रों का उच्चारण करना होता है तथा वह अत्यन्त शुद्ध भी था।
अजामिल अपनेगुरु, अग्निदेव, अतिथियों तथा घर के वृद्धजनों का अतीव आदर करता था।
निस्सन्देह वहझूठी प्रतिष्ठा से मुक्त था।
वह सरल, सभी जीवों के प्रति उपकार करने वाला तथा शिष्ट था।
वह न तो व्यर्थ की बातें करता था, न किसी से ईर्ष्या करता था।
एकदासौ वनं यात: पितृसन्देशकृद्दिवज: ।
आदाय तत आवृत्त: फलपुष्पसमित्कुशान् ॥
५८॥
ददर्श कामिनं कन्धिच्छूद्रं सह भुजिष्यया ।
पीत्वा च मधु मैरेयं मदाघूर्णितनेत्रया ॥
५९॥
मत्तया विश्लथन्नीव्या व्यपेतं निरपत्रपम् ।
क्रीडन्तमनुगायन्तं हसन्तमनयान्तिके ॥
६०॥
एकदा--एक बार; असौ--यह अजामिल; वनम् यात:--जंगल में गया; पितृ--अपने पिता का; सन्देश-- आदेश; कृत्--पूरा करने के लिए; द्विज:--ब्राह्मण; आदाय--एकत्र करके; तत:--उस जंगल से; आवृत्त:--लौटते हुए; फल-पुष्प--'फल फूल; समित्-कुशान्--समित तथा कुश नामक दो प्रकार के तृण; दर्दर्श--देखा; कामिनम्-- अत्यन्त कामी;कझख्ित्ू-किसी; शूद्रमू-चतुर्थ वर्ण का व्यक्ति, शूद्र; सह--साथ; भुजिष्यया--सामान्य दासी या वेश्या के; पीत्वा--पीकर; च-- भी; मधु --अमृत; मैरेयम्--सोम पुष्पों से बना; मद--नशे से; आधूर्णित--घुमाती हुई; नेत्रया--अपनीआँखें; मत्तया--मदमत्त; विश्लथत्-नीव्या--शिथिल वस्त्रों वाली; व्यपेतम्--सही आचरण से गिरी हुई; निरपत्रपम्--जनता के मत के भय से रहित; क्रीडन्तम्-- भोग में लगी; अनुगायन्तम्-गाते हुए; हसन्तम्-हँसते हुए; अनया--उसकेसाथ; अन्तिके--पास ही
एक बार यह ब्राह्मण अजामिल अपने पिता का आदेश पालन करते हुए जंगल से फल,'फूल तथा समित् और कुश नामक दो प्रकार की घासें लाने जंगल गया।
घर वापस आतेसमय उसे एक अत्यन्त कामुक, चतुर्थ वर्ण का व्यक्ति शूद्र मिला जो निर्लज्ज होकर एकवेश्या का आलिगंन तथा चुम्बन कर रहा था।
यह शूद्र इस तरह हँसते, गाते हुए आनन्द लेरहा था मानो यही उचित आचरण हो।
यह शूद्र तथा वेश्या दोनों ही सुरापान किये हुए थे।
वेश्या की आँखें नशे से घूम रही थीं और उसके वस्त्र शिथिल पड़ गये थे।
अजामिल ने उन्हेंऐसी दशा में देखा।
इृष्टा तां कामलिप्तेन बाहुना परिरम्भिताम् ।
जगाम हच्छयवशं सहसैव विमोहित: ॥
६१॥
इृष्ठा--देखकर; ताम्--उस ( वेश्या ) को; काम-लिप्तेन--कामेच्छाओं को उद्दीप्त करने के लिए हल्दी लगाये हुए;बाहुना--बाँह से; परिरम्भितामू-- आलिंगित; जगाम--चला गया; हत्-शय--हृदय के भीतर कामेच्छाओं का; वशम्--वशीभूत; सहसा--एकाएक; एव--निस्सन्देह; विमोहित:--मोहित हुआ।
यह शूद्र हल्दी के चूर्ण से अपनी बाहें चमकाए हुए था और उस वेश्या का आलिंगनकर रहा था।
जब अजामिल ने उसे देखा तो उसके हृदय में सुप्त कामेच्छाएँ जाग्रत हो उठींऔर वह सम्मोहित होकर उनके वश में हो लिया।
स्तम्भयन्नात्मनात्मानं यावत्सत्त्वं यथा श्रुतम् ।
न शशाक समाधातुं मनो मदनवेपितम् ॥
६२॥
स्तम्भयन्ू--वश में करने का प्रयास करते हुए; आत्मना--बुद्धि से; आत्मानम्--मन को; यावत् सत्त्वम्--यथासम्भवउसके लिए; यथा-श्रुतम्--आदेश का ( ब्रह्मचर्य का, स्त्री को देखने तक का ) स्मरण करके; न--नहीं; शशाक--समर्थथा; समाधातुम्--रोक पाने के लिए; मन:--मन; मदन-वेपितम्--कामदेव या कामेच्छाओं द्वारा चलायमान।
उसने धैर्यपूर्वक स्त्री को न देखने के शास्त्रों के आदेश स्मरण करने का यथासम्भवप्रयास किया।
इस ज्ञान तथा अपनी बुद्धि के बल पर उसने अपनी कामेच्छाओं को वश मेंकरने का प्रयास किया, किन्तु अपने भीतर कामदेव का वेग होने से वह अपने मन को साध न सका।
तन्निमित्तस्मरव्याजग्रहग्रस्तो विचेतन: ।
तामेव मनसा ध्यायन्स्वधर्माद्विराम ह ॥
६३॥
ततू-निमित्त--उसे देखने से उत्पन्न; स्मर-व्याज--उसके विषय में लगातार सोचते रहने का लाभ उठाकर; ग्रह- ग्रस्त: --ग्रहण द्वारा पकड़ा हुआ; विचेतन:--अपनी असली स्थिति को पूरी तरह भूलकर; तामू--उसको; एव--निश्चय ही;मनसा--मन से; ध्यायन्-ध्यान करते हुए; स्व-धर्मात्-ब्राह्मण द्वारा सम्पन्न किये जाने वाले अनुष्ठानों को; विरराम ह--उसने पूरी तरह बन्द कर दिया।
जिस तरह सूर्य तथा चन्द्रमा एक श्षुद्र ग्रह द्वारा ग्रसित हो जाते हैं, उसी तरह उस ब्राह्मणने अपना सारा उत्तम ज्ञान खो दिया।
इस स्थिति का लाभ उठाकर वह सदैव उस वेश्या केविषय में सोचता रहता और थोड़े समय बाद ही उसने उसे अपने घर में नौकरानी के रूप मेंरख लिया तथा ब्राह्मण के सारे अनुष्ठानों का परित्याग कर दिया।
तामेव तोषयामास पित्र्येणार्थन यावता ।
ग्राम्यैर्मनोरमै: काम: प्रसीदेत यथा तथा ॥
६४॥
ताम्ू--उसको ( वेश्या को ); एब--निस्सन्देह; तोषयाम् आस--उसने प्रसन्न करने का प्रयास किया; पित्येण-- अपने पिताकी गाढ़ी कमाई से प्राप्त; अर्थन-- धन से; यावता--यथासम्भव; ग्राम्यै: -- भौतिक; मन: -रमैः --उसके मन को सुहावनालगने वाले; कामै:--इन्द्रिय भोग के लिए उपहारों द्वारा; प्रसीदेत--उसे तुष्ट करना होगा; यथा--जिससे; तथा--उस तरहसे
इस तरह अजामिल अपने पिता से उत्तराधिकार में प्राप्त जो भी धन था उसे अपनेविविध उपहारों द्वारा उस वेश्या को तुष्ट करने में खर्च करने लगा, जिससे वह उससे प्रसन्नबनी रहे।
उसने उस वेश्या को तुष्ट करने के लिए अपने सारे ब्राह्मण-कर्म भी छोड़ दिये।
विप्रां स्वभार्यामप्रौढां कुले महति लम्भिताम् ।
विससर्जाचिरात्पाप: स्वैरिण्यापाड्भविद्धधी: ॥
६५॥
विप्राम्--ब्राह्मण की पुत्री; स्व-भार्यामू--अपनी पत्नी को; अप्रौढाम्ू--अधिक आयु वाली नहीं ( युवती ); कुले--परिवारसे; महति--अतीव सम्माननीय; लम्भिताम्--विवाहिता; विससर्ज--त्याग दिया; अचिरातू--तुरन्त ही; पाप:--पापी होनेसे; स्वैरिण्या--वेश्या की; अपाडु-विद्ध-धी: --कामयुक्त चितवन से बिधी हुई उसकी बुद्धि
चूँकि उसकी बुद्धि वेश्या की कामपूर्ण चितवन से बिंध चुकी थी, अतः शिकार हुआब्राह्मण अजामिल उसकी संगति में पापकर्म करने लगा।
उसने अपनी अति सुन्दर तरुण पत्नीतक का साथ छोड़ दिया जो अति सम्मानित ब्राह्मण कुल से आई थी।
यतस्ततश्लोपनिन्ये न््यायतोन्यायतो धनम् ।
बभारास्या: कुटुम्बिन्या: कुटुम्बं मन्द्धीरयम् ॥
६६॥
यतः तत:ः--जहाँ भी और जैसे भी सम्भव; च--तथा; उपनिन्ये--उसे मिला; न्यायत:--उचित रीति से; अन्यायत: --अनुचित रीति से; धनम्--धन; बभार--भरण-पोषण किया; अस्या:--उसके; कुटुम्-बिन्या:--अनेक पुत्रियों तथा पुत्रोंवाला; कुट॒म्बम्--परिवार; मन्द-धी:--समस्त बुद्धि से रहित; अयम्--इस व्यक्ति ( अजामिल ) ने
यद्यपि वह ब्राह्मण कुल में उत्पन्न था किन्तु वेश्या की संगति के कारण बुद्धि से विहीनउस धूर्त ने जैसे-तैसे करके धन कमाया चाहे वह उचित रीति उसको वेश्या के पुत्रों तथा पुत्रियों के भरण-पोषण में लगाया।
यदसौ शास्त्रमुल्लड्घ्य स्वैरचार्यतिगर्हित: ।
अवर्तत चिरं कालमघायुरशुचिर्मलात् ॥
६७॥
यत्--चूँकि; असौ--यह ब्राह्मण; शास्त्रम् उल्लड्घ्य--शास्त्र के नियमों का उल्लंघन करके; स्वैर-चारी--मनमाने ढंग सेकार्य करते हुए; अति-गर्हित:--अत्यधिक निन्दनीय; अवर्तत--बिताया; चिरम् कालम्--दीर्घकाल; अघ-आयु:--जिसका जीवन पापकर्मो से पूर्ण था; अशुच्ि:--अस्वच्छ; मलात्ू--गंदगी के कारण।
इस ब्राह्मण ने पवित्र शास्त्रों के विधि-विधानों का उल्लंघन करके, अपव्यय करने तथावेश्या द्वारा बनाया भोजन करने में बड़े ही अनुत्तरदायित्त्व पूर्ण ढंग से अपनी दीर्घ आयुबिताई।
इसीलिए वह पापों से पूर्ण है।
वह अस्वच्छ है और निषिद्ध कर्मो में लिप्त रहता है।
तत एन दण्डपाणे: सकाशं कृतकिल्बिषम् ।
नेष्यामोकृतनिर्वेशं यत्र दण्डेन शुद्धयति ॥
६८ ॥
ततः--इसलिए; एनम्ू--उसको; दण्ड-पाणे: --यमराज के, जिसे दण्ड देने का अधिकार है; सकाशम्--समक्ष; कृत-किल्बिषम्--जिसने नियमित रूप से सारे पापकर्म किये हैं; नेष्याम:--हम ले जायेंगे; अकृत-निर्वेशम्--जिसने प्रायश्चित्तनहीं किया हो; यत्र--जहाँ; दण्डेन--दण्ड द्वारा; शुद्धयति--शुद्ध बना दिया जायेगा।
इस अजामिल ने कोई प्रायश्चित्त नहीं किया।
अत: उसके पापी जीवन के कारण हम इसेदण्ड देने के लिए यमराज के समक्ष ले जायेंगे।
वहाँ यह अपने पापकर्मों की मात्रा केअनुसार दण्डित होगा और इस तरह शुद्ध बनाया जायेगा।
