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अध्याय नौ: जड भरत का सर्वोच्च चरित्र

5.9श्रीशुक उबाचअथ कस्यचिदि्द््‌वजवरस्याड्िरःप्रवरस्यशमदमतप:ःस्वाध्यायाध्ययनत्यागसन्तोषतितिक्षाप्र श्रयविद्यानसूयात्मज्ञानानन्दयुक्तस्यात्मसद॒श श्रुत(शी लाचाररूपौदार्यगुणा नव सोदर्या अड्गजा बभूवुर्मिथुनं च यवीयस्यां भार्यायाम्यस्तु तत्र पुमांस्तं परमभागवतराजर्षिप्रवरं भरतमुत्सृष्टमृगशरीरं चरमशरीरेण विप्रत्वं गतमाहु: ॥

१-२॥

श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा; अथ--तत्पश्चात्‌: कस्यचित्‌--किसी; द्विज-वरस्य--ब्राह्मण के; अड्डिर:-प्रवरस्थ--आंगिरा गोत्र के; शम--मन का नियंत्रण; दम--इन्द्रियों का नियंत्रण ( दमन ); तप:--तपस्या; स्वाध्याय-- वैदिकसाहित्य का पठन; अध्ययन--- अध्ययन; त्याग--त्याग; सन्‍्तोष--सन्तोष; तितिक्षा--सहिष्णुता; प्रश्रय--विनय; विद्या--ज्ञान;अनसूय--ईष्यारहित; आत्म-ज्ञान-आनन्द--आत्म-साक्षात्कार में प्रसन्न; युक्तस्य--गुणसम्पन्न; आत्म-सहश--तथा अपने हीसमान; श्रुत--विद्या में; शील--चरित्र में; आचार--आचरण में; रूप--सुन्दरता में; औदार्य--उदारता में; गुणा:--समस्तगुणोंवाला; नव स-उदर्या:--एकही गर्भ से उत्पन्न नौ भ्राता, नौ सहोदर; अड़-जा:--पुत्र; बभूवु:--उत्पन्न हुए; मिथुनम्‌--जुड़वाँभाई तथा बहन; च--तथा; यवीयस्याम्‌--सबसे छोटी; भार्यायाम्‌--स्त्री से; यः--जो; तु--लेकिन; तत्र--वहाँ; पुमानू--पुरुष( लड़का ); तम्‌--उसको; परम-भागवतम्‌--परम भक्त; राज-ऋषि--राजर्षि; प्रवरम्‌-- अत्यन्त सम्मानित; भरतम्‌--महाराजभरत को; उत्सृष्ट--त्याग कर; मृग-शरीरम्‌--मृग का शरीर; चरम-शरीरेण --- अन्तिम शरीर से; विप्रत्वम्‌-ब्राह्मणत्व; गतमू--प्राप्त किया; आहुः--उनका कथन है।

श्रील शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा, हे राजन, मृग शरीर त्याग कर भरत महाराज ने एकविशुद्ध ब्राह्मण के कुल में जन्म लिया।

वह ब्राह्मण अंगिरा गोत्र से सम्बन्धित था और ब्राह्मण केसमस्त गुणों से सम्पन्न था।

वह अपने मन तथा इन्द्रियों को वश में करने वाला तथा वैदिक एवंअन्य पूरक साहित्यों का ज्ञाता था।

वह दानी, संतुष्ट, सहनशील, विनम्र, पंडित तथा किसी से नईर्ष्या करने वाला था।

वह स्वरूपसिद्ध एवं ईश्वर की सेवा में तत्पर रहने वाला था।

वह सदैवसमाधि में रहता था।

उसकी पहली पत्नी से उसी के समान योग्य नौ पुत्र हुए और दूसरी पत्नी सेजुड़वाँ भाई-बहन पैदा हुए जिनमें से लड़का सर्वोच्च भक्त तथा राजर्षियों में अग्रणी भरतमहाराज के नाम से विख्यात हुआ।

तो यह कथा है उसके मृग शरीर को त्याग कर पुनः जन्म लेनेकी।

तत्रापि स्वजनसझ्भच्च भृशमुद्दिजमानो भगवतःकर्मबन्धविध्वंसनश्रवणस्मरणगुणविवरणचरणारविन्दयुगलं मनसा विद्धदात्मन: प्रतिघातमाशड्डूमानोभगवदनुग्रहेणानुस्मृतस्वपूर्वजन्मावलिरात्मानमुन्मत्तजडान्धबधिरस्वरूपेण दर्शयामास लोकस्य ॥

३॥

तत्र अपि--उस ब्राह्मण जन्म में भी; स्व-जन-सड्भात्‌ू--अपने मित्रों तथा परिजनों की संगति से; च--तथा; भृशम्‌--अत्यधिक;उद्विजमान:--सदैव भयभीत रहते हुए कि कहीं पुनः भ्रष्ट न हो जाये; भगवतः -- श्री भगवान्‌ का; कर्म-बन्ध--कर्म-फलों काबन्धन; विध्वंसन--विनष्ट करने वाले; श्रवण--सुनना; स्मरण--याद करना; गुण-विवरण-- भगवान्‌ के गुणों का वर्णनसुनना; चरण-अरविन्द--चरणकमल; युगलम्‌--दोनों; मनसा--मन से; विद्धत्‌--सदैव ध्यान धरते हुए; आत्मन:--अपनीआत्मा का; प्रतिघातम्‌--भक्ति मार्ग में बाधा; आशड्डूमान: --सदैव सशंकित; भगवत््‌-अनुग्रहेण-- श्रीभगवान्‌ के अनुग्रह से;अनुस्मृत--स्मरण करते हुए; स्व-पूर्व--अपने पहिले; जन्म-आवलि:--जन्मों की श्रृंखला; आत्मानम्‌--स्वयं; उन्मत्त--पागल;जड--कुन्द, पत्थर तुल्य; अन्ध-- अंधा; बधिर--बहरा; स्वरूपेण--स्वरूप के कारण; दर्शयाम्‌ आस--प्रदर्शित किया, प्रकटकिया; लोकस्य--सामान्य जनता को |

भगवत्कृपा से भरत महाराज को अपने पूर्वजन्म की घटनाएँ स्मरण थीं।

यद्यपि उन्हें ब्राह्मणका शरीर प्राप्त हुआ था, किन्तु वे अपने स्वजनों तथा मित्रों से, जो भक्त नहीं थे, अत्यन्तभयभीत थे।

वे ऐसी संगति से सदैव सतर्क रहते, क्योंकि उन्हें भय था कि कहीं पुनः पथच्युत नहो जाँय।

फलत:ः वे जनता के समक्ष उन्मत्त ( पागल ), जड़, अंधे तथा बहरे के रूप में प्रकटहोते रहे जिससे दूसरे लोग उनसे बात करने की चेष्टा न करें।

इस प्रकार उन्होंने कुसंगति से अपनेको बचाए रखा।

वे अपने अन्तःकरण में सदा भगवान्‌ के चरणकमल का ध्यान धरते और उनकेगुणों का जप करते रहते जो मनुष्य को कर्म-बन्धन से बचाने वाला है।

इस प्रकार उन्होंने अपनेको अभक्त संगियों के आक्रमण से बचाए रखा।

तस्यापि ह वा आत्मजस्य विप्र: पृत्रस्नेहानुबद्धमना आसमावर्तनात्संस्कारान्यथोपदेशं विदधान उपनीतस्यच पुनः शौचाचमनादीन्कर्मनियमाननभिप्रेतानपि समशिक्षयदनुशिष्टेन हि भाव्यं पितु: पुत्रेणेति, ॥

४॥

तस्य--उस; अपि ह वा--निश्चय ही; आत्म-जस्य--अपने पुत्र का; विप्र:--जड़ भरत के ब्राह्मण पिता ( विक्षिप्त भरत ); पुत्र-स्नेह-अनुबद्ध-मना: --पुत्र प्रेम के कारण मन बँध जाने से; आ-सम-आवर्तनात्‌ू--ब्रह्मचर्य आश्रम के समाप्त होने तक;संस्कारान्‌ू--संस्कारों को; यथा-उपदेशम्‌--शास्त्रों में वर्णित विधि के अनुसार; विदधान:--करते हुए; उपनीतस्थ--जिसकाउपनयन संस्कार हो, उसका; च--तथा; पुनः--फिर; शौच-आचमन-आदीनू--स्वच्छता-मुख, हाथ, पाँव धोने इत्यादि काअभ्यास; कर्म-नियमान्‌--कर्म के विधि-विधान; अनभिप्रेतानू अपि--जड़ भरत के न चाहने पर भी; समशिक्षयत्‌--शिक्षा दी;अनुशिष्टेन--विधि-विधानों का पालन करना सिखाया; हि--निश्चय ही; भाव्यम्‌--हो; पितु:ः--पिता से; पुत्रेण--पुत्र; इति--इस प्रकार?

ब्राह्मण पिता का मन अपने पुत्र जड़ भरत ( भरत महाराज ) के प्रति सदैव स्नेह से पूरितरहता था।

उससे सदा अनुरक्त रहते थे।

क्योंकि जड़ भरत गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के लिएअयोग्य थे, अतः ब्रह्मचर्य आश्रम की समाप्ति तक ही उनके संस्कार पूरे हुए।

यद्यपि जड़ भरतअपने पिता की शिक्षाओं को मानने में आनाकानी करते तो भी उस ब्राह्मण ने यह सोचकर किपिता का कर्तव्य है कि अपने पुत्र को शिक्षा दे, जड़ भरत को स्वच्छ रहने तथा प्रक्षालन करनेकी शिक्षा दी।

स चापि तदु ह पितृसन्निधावेवासश्रीचीनमिव सम करोति छन्दांस्यध्यापयिष्यन्सह व्याहृतिभि:सप्रणवशिरस्त्रिपदीं सावित्री ग्रैष्पवासन्तिकान्मासानधीयानमप्यसमवेतरूपं ग्राहयामास ॥

५॥

सः--वह ( जड़ भरत ); च--भी; अपि--निस्संदेह; तत्‌ उह--जो कुछ उसका पिता शिक्षा देता; पितृ-सन्निधौ--अपने पिताकी उपस्थिति में, पिता के सामने; एब--ही; असश्नीचीनम्‌ इब--मानो उसने कुछ नहीं समझा, असत्य; सम करोति--करता था;छन्दांसि अध्यापयिष्यन्‌ू--चातुर्मास में अथवा श्रावण मास से शुरू करके वेद मंत्रों की शिक्षा देने का इच्छुक; सह--साथ-साथ;व्याहतिभि:--स्वर्गलोक ( भू: भुव: स्व: ) के नामों का उच्चारण; स-प्रणव-शिर:--ओकार से प्रारम्भ करके; त्रि-पदीम्‌--तीन पदों वाले; सावित्रीम्‌--गायत्री मंत्र; ग्रैष्प-वासन्तिकान्‌ मासान्‌ू--चैत्र से ( १५ मई से ) प्रारम्भ होने वाले चार मास; अधीयानम्‌अपि--अध्ययन करते रहने पर भी; असमवेत-रूपम्‌--अपूर्ण रूप में; ग्राहयाम्‌ आस--जो सिखला दिया, अभ्यास करा दिया।

अपने पिता द्वारा वैदिक ज्ञान की समुचित शिक्षा दिये जाने पर भी जड़ भरत उनके समक्षमूर्ख ( जड़ ) की भाँति आचरण करते।

वे ऐसा आचरण इसलिए करते जिससे उनके पिता यहसमझें कि वे शिक्षा के अयोग्य हैं और इस प्रकार उसे आगे शिक्षा देना बन्द कर दें।

वे सर्वथाविपरीत आचरण करते।

यद्यपि शौच के बाद हाथ धोने को कहा जाता, किन्तु वे उन्हें उसकेपहले ही धो लेते।

तो भी उनके पिता उन्हें बसनन्‍्त तथा ग्रीष्म काल में वैदिक शिक्षा देना चाहतेथे।

उन्होंने उसे ओंकार तथा व्याहति के साथ-साथ गायत्री मंत्र सिखाने का यत्न किया, किन्तुचार मास बीत जाने पर भी वे उसे सिखाने में सफल न हो सके।

एवं स्वतनुज आत्मन्यनुरागावेशितचित्तःशौचाध्ययनब्रतनियमगुर्वनलशुश्रूषणाद्यौपकुर्वाणककर्माण्यनभियुक्तान्यपि समनुशिष्टिनभाव्यमित्यसदाग्रह: पुत्रमनुशास्य स्वयं तावदनधिगतमनोरथ: कालेनाप्रमत्तेन स्वयं गृह एव प्रमत्तउपसंहतः ॥

६॥

एवम्‌--इस प्रकार; स्व--निज; तनु-जे--पुत्र जड़ भरत में; आत्मनि--जिसे वे आत्मवत्‌ मानते थे; अनुराग-आवेशित-चित्त: --अपने पुत्र के प्रेम में अनुरक्त ब्राह्मण; शौच--पतवित्रता, स्वच्छता; अध्ययन--वैदिक साहित्य का अध्ययन; ब्रत--समस्त ब्रतोंका पालन; नियम--विधि-विधान; गुरु--गुरु का; अनल--अग्नि का; शुश्रूषण-आदि--सेवा इत्यादि; औपकुर्वाणक --ब्रह्मचर्य आश्रम के; कर्माणि--समस्त कर्म; अनभियुक्तानि अपि--पुत्र के न चाहने पर भी; समनुशिष्टेन--पूर्णतया शिक्षितहोकर; भाव्यम्‌--हो; इति--इस प्रकार; असतू-आग्रह: --अग्राह्म मूर्खता वाले; पुत्रमू--पुत्र को; अनुशास्य--शिक्षा देकर;स्वयम्‌--स्वयं; तावत्‌--उस तरह; अनधिगत-मनोरथ:--अपनी आकांक्षाएँ पूरी न होने से; कालेन--काल के प्रभाव से;अप्रमत्तेन--जो भुलक्कड़ नहीं है; स्वयम्‌--साक्षात्‌; गृहे-- अपने घर में; एव--निश्चय ही; प्रमत्त:--बुरी तरह से आसक्त;उपसंहतः--मृत्यु हो गई, मर गया।

जड़ भरत का ब्राह्मण पिता अपने पुत्र को अपनी आत्मा तथा हृदय के समान मानता, अतःवह उससे अत्यधिक अनुरक्त था।

उसने अपने पुत्र को सुशिक्षित बनाना चाहा और अपने इसअसफल प्रयास में उसने अपने पुत्र को ब्रह्मचर्य के विधि-विधान सिखाने प्रारम्भ किये, जिनमेंवैदिक अनुष्ठान, शौच, वेदाध्ययन, कर्मकाण्ड, गुरु की सेवा, अग्नि यज्ञ करने की विधिसम्मिलित थे।

उसने इस प्रकार से अपने पुत्र को शिक्षा देने का भरसक प्रयत्न किया, किन्तु वहअसफल रहा।

उसने अपने अन्तःकरण में यह आशा बाँध रखी थी कि उसका पुत्र विद्वान होगा,किन्तु उसके सारे प्रयत्न निष्फल रहे।

प्रत्येक प्राणी की भाँति यह ब्राह्मण भी अपने घर के प्रतिआसक्त था और वह यह भूल ही गया था कि एक दिन उसे मरना है।

किन्तु मृत्यु कभी भूलती नहीं।

वह उचित समय पर प्रकट हुई और उसे उठा ले गई।

अथ यवीयसी द्विजसती स्वगर्भजातं मिथुनं सपत्न्या उपन्यस्य स्वयमनुसंस्थया पतिलोकमगातू ॥

७॥

अथ--तत्पश्चात्‌; यवीयसी--सबसे छोटी; द्विज-सती--ब्राह्मण की पत्नी; स्व-गर्भ-जातम्‌--अपने गर्भ से उत्पन्न; मिथुनम्‌--जुड़वाँ बच्चे; सपत्यै-- अपनी सौत को; उपन्यस्थ--सौंप कर; स्वयम्‌-- स्वयं; अनुसंस्थया--अपने पति का अनुगमन करतीहुई; पति-लोकम्‌--पतिलोक को; अगातू--चली गई।

तत्पश्चात्‌ ब्राह्मण की छोटी पत्नी अपने जुड़वाँ बच्चों--एक लड़का तथा एक लड़की--कोअपनी बड़ी सौत को सौंप कर अपनी इच्छा से अपने पति के साथ मर कर पतिलोक चली गई।

पितर्युपरते भ्रातर एनमतत्प्रभावविदस्त्रय्यां विद्यायामेव पर्यवसितमतयो न परविद्यायां जडमतिरितिभ्रातुरनुशासननिर्बन्धान्ष्यवृत्सन्त, ॥

८॥

पितरि उपरते--पिता की मृत्यु के पश्चात्‌; भ्रातरः--सौतेले भाइयों ने; एनमू--इस जड़ भरत को; अ-तत्‌-प्रभाव-विदः --उसकीमहानता को समझे बिना; त्रय्याम्‌-तीनों वेदों के; विद्यायामू--कर्मकाण्ड सम्बन्धी ज्ञान में; एब--निस्सन्देह; पर्यवसित--स्थिर; मतयः--जिनके मन; न--नहीं; पर-विद्यायाम्‌--भक्ति के दिव्य ज्ञान में; जड-मति:--अत्यन्त मन्द बुद्धि; इति--इसप्रकार; भ्रातु:--अपने भाई ( जड़ भरत ) को; अनुशासन-निर्बन्धात्‌-पढ़ाने का प्रयत्ल; न्यवृत्सन्त--छोड़ दिया ?

पिता की मृत्यु के बाद जड़ भरत के नौ सौतेले भाइयों ने उसे जड़ तथा बुद्धि-हीन समझकरउसको पूर्ण शिक्षा प्रदान करने के उनके पिता का प्रयत्न छोड़ दिया।

जड़ भरत के ये भाई तीनोंवेदों--ऋग्‌, साम यथा यजुर्वेद में पारंगत थे, जो सकाम कर्म को अत्यधिक प्रोत्साहन देते हैं।

किन्तु वे नवों भाई ईश्वर की भक्तिमयसेवा से तनिक भी परिचित न थे।

फलस्वरूप वे जड़ भरतकी सिद्ध अवस्था को नहीं समझ सके।

सच प्राकृतैद्धिपदपशुभिरुन्मत्तजडबधिरमूकेत्यभिभाष्यमाणो यदा तदनुरूपाणि प्रभाषते कर्माणि चकार्यमाण: परेच्छया करोति विष्टितो वेतनतो वा याच्जया यहच्छया वोपसादितमल्पं बहु मृष्टे कदन्नंवाभ्यवहरति पर नेन्द्रियप्रीतिनिमित्तम्‌, नित्यनिवृत्तनिमित्तस्वसिद्धविशुद्धानुभवानन्दस्वात्मलाभाधिगम:सुखदुःखयोदईनद्वनिमित्तयोरसम्भावितदेहाभिमान: शीतोष्णवातवर्षेषु वृष इवानावृताड़ु: पीन: संहननाडुःस्थण्डिलसंवेशनानुन्मर्दनामज्जनरजसा महामणिरिवानभिव्यक्तब्रह्मवर्चस:कुपटावृतकटिरूपवीतेनोरुमषिणा द्विजातिरिति ब्रह्मबन्धुरिति संज्ञयातज्ज़्जनावमतो विचचार, ॥

९-१०॥

सः च--वह भी; प्राकृतैः--सामान्य जनों द्वारा जिनकी पहुँच आत्मतत्त्व तक नहीं है; द्वि-पद-पशुभि:--जो दो पैरों वाले पशुओंसे कम नहीं है; उन्मत्त--पागल; जड--मन्द; बधिर--बहरा; मूक --गूँगा; इति--इस प्रकार; अभिभाष्यमाण: --सम्बोधितकिये जाने पर; यदा--जब; तत्‌-अनुरूपाणि -- उनका उत्तर देने के लिए उपयुक्त शब्द; प्रभाषते--बोलता था; कर्माणि--कर्म;च--भी; कार्यमाण: --कराते हुए; पर-इच्छया--अन्यों की आज्ञा से; करोति--किया करता था; विष्टित:--बल प्रयोग से,बेगार; वेतनतः--अथवा मजदूरी से; वा--अथवा; याच्जया-- भीख माँगने से; यहच्छया-- अपनी इच्छानुसार; वा--अथवा;उपसादितमू--प्राप्त; अल्पम्‌--अत्यल्प मात्रा; बहु--बहुत सा; मृष्टम्‌--सुस्वादु; कत्‌-अन्नम्‌ू--बासी, स्वादहीन भोजन; वा--अथवा; अभ्यवहरति--खा लेता था; परमू--केवल; न--नहीं ; इन्द्रिय-प्रीति-निमित्तम्‌--इन्द्रियों की तृप्ति हेतु; नित्य--शाश्वत;निवृत्त--त्याग दिया; निमित्त--सकाम कर्म; स्व-सिद्ध--स्वतः सिद्ध; विशुद्ध-दिव्य; अनुभव-आनन्द--आनन्दपूर्ण अनुभव;स्व-आत्म-लाभ-अधिगम: --जिसे आत्रजज्ञान प्राप्त हो गया हो; सुख-दुःखयो:--सुख तथा दुख दोनों में; द्वन्द्न-निमित्तयो: --द्वैतके कारणों में; असम्भावित-देह-अभिमान:--देह से भिन्न; शीत--जाड़े में; उष्ण-- ग्रीष्म में; वात--हवा में; वर्षेषु--वर्षा में;वृष:--साँड़; इब--सहृश; अनावृत-अड्डभ४--नंगी देह; पीन: --हृष्ट-पुष्ट; संहनन-अड्भः--गठित अंग; स्थण्डिल-संवेशन-- पृथ्वीपर पड़े रहने से; अनुन्मर्दन--बिना मालिश के; अमजजन--बिना नहाये; रजसा-- धूलि से; महा-मणि:--बहुमूल्य मणि; इब--सहश; अनभिव्यक्त--अप्रकट; ब्रह्म-वर्चसः --ब्रह्म-तेज; कु-पट-आवृत--गन्दे वस्त्र से ढका; कटि:ः--जिसकी कमर;उपवीतेन--यज्ञोपवीत से; उरू-मषिणा--धूल के कारण अत्यन्त मलिन ( काला ); द्वि-जाति:--ब्राह्मण कुल में उत्पन्न; इति--इस प्रकार, ( घृणा के कारण कहते हुए ); ब्रह्म-बन्धु;--ब्रह्म बन्धु; इति--इस प्रकार; संज्ञया--ऐसे नामों से; अ-तत्‌ू-ज्ञ-जन--उन व्यक्तियों द्वारा जो उसकी स्थिति से अपरिचित थे; अवमतः--अनाहत होकर; विचचार--विचरण करता था।

नीच पुरुष पशुओं के तुल्य होते हैं।

अन्तर इतना ही है कि पशुओं के चार पैर होते हैं औरऐसे मनुष्यों के केवल दो।

ऐसे दो पैर वाले पाशविक पुरुष जड़ भरत को पागल, मन्द बुद्धि,बहरा तथा गूँगा कहते थे।

वे उसके साथ दुर्व्यवहार करते और जड़ भरत बहरे, अंधे या जड़पागल की भाँति आचरण करता।

न तो वह कभी प्रतिवाद करता, न ही उन्हें आश्वस्त करने काप्रयलल करता कि वह ऐसा नहीं है।

यदि कोई उससे कुछ कराना चाहता तो वह उनकी इच्छा केअनुसार कार्य करता।

उसे भिक्षा या मजदूरी से अथवा अपने आप जो भी भोजन मिलता--चाहेवह थोड़ा हो, स्वादु, बासी या अस्वादु--उसे ग्रहण करता और खाता।

वह इन्द्रिय-तृप्ति के लिएकभी कुछ नहीं खाता था, क्योंकि वह पहले से उस देहात्म-बुद्धि से मुक्त हो गया था, जिसकेवशीभूत होकर स्वादिष्ट या बेस्वाद भोजन किया जाता है।

वह भक्ति की दिव्य भावना से पूर्णथा, फलत:ः देहात्म-बुद्धि से उठने वाले द्वन्द्ठों से सर्वथा अप्रभावित रहता था।

वास्तव में उसकाशरीर साँड़ के समान बलिषप्ठ था और उसके अंग-प्रत्यंग हृष्ट-पुष्ट थे।

उसे न तो सर्दी-गर्मी याबयार-वर्षा की परवाह थी और न ही कभी वह अपने शरीर को ढकता था।

वह जमीन पर लेटारहता।

वह अपने शरीर में न तो कभी तेल लगाता, न ही कभी स्नान करता था।

शरीर मलिनहोने के कारण उसका ब्रह्मतेज तथा ज्ञान उसी प्रकार ढके हुए थे जिस प्रकार धूल जमने सेकिसी मूल्यवान मणि का तेज छिप जाता है।

उसने केवल एक गन्दा कौपीन और एक यज्ञोपवीतपहन रखा था जो काला पड़ गया था।

यह जानते हुए भी कि वह ब्राह्मण कुल में उत्पन्न है, लोगउसे ब्रह्मबन्धु तथा अन्य नामों से पुकारते थे।

इस प्रकार भौतिकतावादी लोगों द्वारा अपमानितएवं उपेक्षित होकर वह इधर-उधर घूमता रहता था।

तात्पर्य : श्रील नरोत्तरदास ठाकुर का गीत है-- देह-स्मृति नाहि यार, संसारबंधन काहाँ तार ।

जिसेअपने शरीर-पालन की इच्छा न रहे, अथवा जो अपने शरीर को ढंग से रखने का इच्छुक न हो और जोकिसी भी परिस्थिति में संतुष्ट रहे वह या तो पागल होगा या फिर मुक्त।

वास्तव में जड़भरत के रूप मेंजन्म लेकर भरत महाराज भौतिक हुंद्वों से सर्वथा मुक्त थे।

वे परमहंस थे, अत: उन्हें शारीरिक सुख की चिन्ता न थी।

यदा तु परत आहारं कर्मवेतनत ईहमान: स्वभ्रातृभिरपि केदारकर्मणि निरूपितस्तदपि करोति किन्तु नसमं विषम न्यूनमधिकमिति वेदकणपिण्याकफलीकरणकुल्माषस्थालीपुरीषादीन्यप्यमृतवदभ्यवहरति ॥

११॥

यदा--जब; तु-- लेकिन; परत:--अन्यों से; आहारम्‌ू-- भोजन; कर्म-वेतनतः--काम करने के बदले मजदूरी; ईहमान:--पालते देखकर; स्व- भ्रातृभि: अपि--अपने सौतेले भाइयों तक से; केदार-कर्मणि--खेत में काम करने तथा कृषिकार्य देखनेमें; निरूपित:--लगा हुआ; तत्‌ अपि--उस समय भी; करोति--वह करता था; किन्तु--लेकिन; न--नहीं; समम्‌--समतल;विषमम्‌--विषम, ऊबड़-खाबड़; न्यूनम्‌ू--कम; अधिकम्‌---अधिक उठी हुई; इति--इस प्रकार; वेद--जानता था; कण--धान के टूटे दाने, कना; पिण्याक--खली; फली-करण--धान की भूसी; कुल्माष--घुन-लगा अन्न; स्थाली-पुरीष-आदीनि--बर्तन में लगा जला चावल आदि; अपि--भी; अमृत-वत्‌--अमृत के समान; अभ्यवहरति--खा लेता था।

जड़ भरत केवल भोजन के लिए काम करता था।

उसके सौतेले भाइयों ने इसका लाभउठाकर उसे कुछ भोजन के बदले खेत में काम करने में लगा दिया, किन्तु उसे खेत में ठीक सेकाम करने की विधि ज्ञात न थी।

उसे यह ज्ञात न था कि कहाँ मिट्टी डाली जाये अथवा कहाँभूमि को समतल या ऊँचा-नीचा रखा जाये।

उसके भाई उसे टूटे चावल ( कना ), खली, धानकी भूसी, घुना अनाज तथा रसोई के बर्तनों की जली हुई खुरचन दिया करते थे, किन्तु वह इनसबको प्रसन्नतापूर्वक अमृत के समान स्वीकार कर लेता था।

उसे किसी प्रकार की शिकायत नरहती और वह इन सब चीजों को प्रसन्नतापूर्वक खा लेता था।

अथ कदाचित्कश्चिद्दषलपतिर्भद्रकाल्यै पुरुषपशुमालभतापत्यकामः ॥

१२॥

अथ-त्पश्चात्‌: कदाचित्‌--किसी समय; कश्चित्‌--कोई; वृषल-पति:--अन्यों की सम्पत्ति लूटने वाले शूद्रों का सरदार;भद्ग-काल्यै-- भद्रकाली नामक देवी को; पुरुष-पशुम्‌--मनुष्य के रूप में पशु की; आलभत--बलि देने लगा; अपत्य-'कामः--पुत्र का इच्छुक?

इसी समय, पुत्र की कामना से, डाकुओं का एक सरदार जो शूद्र कुल का था, किसी पशु-तुल्य जड़ मनुष्य की भद्गरकाली पर बलि चढ़ाकर उपासना करना चाहता था।

तस्य ह दैवमुक्तस्य पशो: पदवीं तदनुचरा: परिधावन्तो निशि निशीथसमये तमसावृतायामनधिगतपशवआकस्मिकेन विधिना केदारान्वीरासनेन मृगवराहादिभ्य: संरक्षमाणमड्धिर:प्रवरसुतमपश्यन्‌, ॥

१३॥

तस्य--उस सरदार का; ह--निश्चय ही; दैव-मुक्तस्य--संयोग्यवश बच जाने से; पशो: --नर-पशु का; पदवीम्‌--मार्ग ; तत्‌-अनुचरा:--उसके अनुयायी; परिधावन्त:--इधर-उधर ढूँढने के लिए दौड़ते हुए; निशि--रात्रि में; निशीथ-समये-- अर्द्ध॑रात्रि में;तमसा आवृतायाम्‌--अंधेरे से ढका हुआ; अनधिगत-पशव:--नर-पशु न पकड़ सकने से; आकस्मिकेन विधिना--दैवयोग सेअकस्मात्‌; केदारान्‌ू--खेतों में; वीर-आसनेन--ऊँचे स्थान पर बने आसन से; मृग-वराह-आदिभ्य:--मृग, जंगली सुअर आदिसे; संरक्षमाणम्‌--रक्षा करता हुआ; अड्डिर:-प्रवर-सुतम्‌--अंगिरा गोत्र वाले ब्राह्मण पुत्र को; अपश्यन्‌ू-देखा |

डाकुओं के सरदार ने बलि के लिए एक नर-पशु पकड़ा, किन्तु वह बचकर निकल भागाऔर सरदार ने अपने सेवकों को उसे ढूँढने के लिए आज्ञा दी।

वे विभिन्न दिशाओं में दोड़ै किन्तुउसे ढूंढ न सके।

अर्द्धरात्रि के गहन अंधकार में इधर-उधर घूमते हुए, वे एक धान के खेत मेंपहुँचे जहाँ उन्होंने अंगिरा वंश के एक ब्राह्मणकुमार ( जड़भरत ) को देखा जो एक ऊँचे स्थानपर बैठ कर मृग तथा जंगली सुअरों से खेत की रखवाली कर रहा था।

अथ त एनमनवद्यलक्षणमवमृश्य भर्तृकर्मनिष्पत्ति मन्यमाना बद्ध्वा रशनया चण्डिकागृहमुपनिन्युर्मुदाविकसितवदनाः: ॥

१४॥

अथ--तत्पश्चात्‌; ते--वे ( सरदार के सेवक ); एनम्--इस ( जड़ भरत ); अनवद्य-लक्षणम्‌--मन्द पशु के से लक्षणों वालाक्योंकि उसका शरीर साँड़ जैसा मोटा था और वह बहरा तथा गूँगा था; अवमृश्य--पहचान कर; भर्तु-कर्म-निष्पत्तिम्‌ू-- अपनेस्वामी के कार्य की सिद्धि; मन्यमाना:--मानते हुए, समझकर; बद्ध्वा--बाँधकर; रशनया--रस्सियों से; चण्डिका-गृहम्‌--देवी काली के मन्दिर में; उपनिन्यु:--ले आये; मुदा--परम प्रसन्नतापूर्वक; विकसित-वदना: --प्रसन्नमुख |

डाकू सरदार के सेवकों तथा अनुचरों ने नर-पशु के लक्षणों सें युक्त जड़ भरत को अत्यन्तउपयुक्त समझ कर उसे बलि के लिए अत्युत्तम पाया।

अतः प्रसन्नता के मारे उनके मुख चमकनेलगे, उन्होंने उसे रस्सियों से बाँध लिया और देवी काली के मन्दिर में ले आये।

अथ पणयस्तं स्वविधिनाभिषिच्याहतेन वाससाच्छाद्य भूषणालेपस्त्क्तिलकादिभिरुपस्कृतं भुक्तवन्तंधूपदीपमाल्यलाजकिसलयाड्लू रफलोपहारोपेतया वैशससंस्थया महता गीतस्तुतिमृदड्पणवघोषेण चपुरुषपशुं भद्गकाल्या: पुरत उपवेशयामासु:, ॥

१५॥

अथ--तदनन्तर; पणय: --डाकू के समस्त अनुचरों ने; तमू--उसको ( जड़ भरत को ); स्व-विधिना--अपने विधि-विधानों केअनुसार; अभिषिच्य--नहलाकर; अहतेन--नये; वाससा--वस्त्र से; आच्छाद्य--ढक कर; भूषण--गहने; आलेप--चन्दन सेलेपकर; सत्रकू--पुष्प माला; तिलक-आदिभि:--तिलक आदि से; उपस्कृतम्‌-पूर्णतया सजाकर; भुक्तवन्तम्‌-- भोजन कराकर; धूप--सुंगधित द्रव्य; दीप--दीपक; माल्य--माला; लाज--लावा; किसलय-अह्डु र--नये पत्ते तथा अंकुर; फल--फल;उपहार--अन्य सामग्री; उपेतया--पूर्णतया सज्जित; वैशस-संस्थया--बलि के लिए पूरी तैयारी; महता--अत्यधिक; गीत-स्तुति--गाना तथा प्रार्थना का; मृदड़--मृदंग; पणव--तुरही की; घोषेण-- ध्वनि से; च-- भी; पुरुष-पशुम्‌--नर-पशु को;भद्ग-काल्या: --देवी काली के; पुरत:--ठीक सामने; उपवेशयाम्‌ आसु: --बैठा दिया।

इसके पश्चात्‌ चोरों ने नर-पशु बलि की काल्पनिक पद्धति के अनुसार जड़ भरत कोनहलाया, नये वस्त्र पहनाए, पशु के अनुकूल आभूषणों से अलंकृत किया, उसके शरीर परसुगन्धित लेप किया तथा तिलक, चन्दन एवं हार से सुसज्जित किया।

उसे अच्छी तरह भोजनकराने के बाद वे उसे देवी काली के समक्ष ले आये और देवी को धूप, दीप, माला, खील, पत्ते,अंकुर, फल तथा फूल की भेंट चढ़ाई।

इस प्रकार उन्होंने नर-पशु का वध करने के पूर्व गीत,स्तुति द्वारा एवं मृदंग तथा तुरही आदि बजाकर देवी की पूजा की।

इसके पश्चात्‌ जड़ भरत कोमूर्ति के समक्ष बैठा दिया।

अथ वृषलराजपणि: पुरुषपशोरसृगासवेन देवीं भद्गकालींयक्ष्यमाणस्तदभिमन्त्रितमसिमतिकरालनिशितमुपाददे ॥

१६॥

अथ--तदनन्तर; वृषल-राज-पणि:--डाकुओं के सरदार का पुरोहित; पुरुष-पशो:--बलि के लिए लाये गये पशु तुल्य नर( जड़ भरत ) का; असृकू-आसवेन--रक्त के आसव से; देवीम्‌--अर्चाविग्रह को; भद्र-कालीम्‌--देवी काली; यक्ष्यमाण: --बलि देने का इच्छुक; तत्‌-अभिमन्त्रितम्‌-- भद्गकाली के मंत्र से पवित्र की गयी; असिमू--तलवार, खड़्ग; अति-कराल--अत्यन्त भयानक; निशितम्‌--अत्यन्त पैनी; उपाददे--हाथ में ली ।

उस समय, पुरोहित के रूप में कार्य कर रहा एक चोर भद्गरकाली को पीने के लिए नर-पशुजड़-भरत का रक्त-आसव चढ़ाने के लिए तत्पर था।

अतः उसने अत्यन्त भयावनी तथा पैनीतलवार निकाली और भद्गरकाली के मंत्र से अभि मंत्रित करके जड़ भरत को मारने के लिए उसेउठाया।

इति तेषां वृषलानां रजस्तमःप्रकृतीनां धनमदरजउत्सिक्तमनसां भगवत्कलावीरकुलं कदर्थीकृत्योत्पथेनस्वैरं विहरतां हिंसाविहाराणां कर्मातिदारुणं यद्गह्मभूतस्य साक्षाद्रह्मर्षिसुतस्य निर्वरस्य सर्वभूतसुहृदःसूनायामप्यननुमतमालम्भनं तदुपलभ्य ब्रह्मतेजसातिदुर्विषहेण दन्दह्ममानेन वपुषा सहसोच्चचाट सैवदेवी भद्रकाली ॥

१७॥

इति--इस प्रकार; तेषाम्‌ू--उन; वृषलानाम्‌--शूद्रों का जिनसे समस्त धार्मिक नियम नष्ट होते हैं; रज:--रजोगुण; तम:--तमोगुण; प्रकृतीनाम्‌ू--गुणों वाले; धन-मद--सम्पत्ति के कारण उत्पन्न गर्व; रज:--काम द्वारा; उत्सिक्त--फूला हुआ, उन्मत्त;मनसाम्‌--जिनके मन; भगवत्‌-कला-- श्रीभगवान्‌ के अंश का विस्तार, अंशस्वरूप; वीर-कुलम्‌-महान्‌ पुरुषों ( ब्राह्मणों )का कुल ( समूह ); कत्‌-अर्थी-कृत्य--अनादर करके; उत्पथेन--कुमार्ग से; स्वैरम्‌--स्वेच्छा से; विहरताम्‌--आगे बढ़ रहे;हिंसा-विहाराणाम्‌--जिनका कार्य अन्यों पर हिंसा करना है; कर्म--कर्म, कार्य; अति-दारुणम्‌ू--अत्यन्त भयावह; यत्‌--जो;ब्रह्म-भूतस्य--ब्राह्मण कुल में उत्पन्न स्वरूपसिद्ध व्यक्ति; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; ब्रह-ऋषि-सुतस्य--ब्रह्म-ऋषि के पुत्र का;निर्वरस्थ--वैरविहीन का; सर्व-भूत-सुहृद:ः--सबों का शुभचिन्तक; सूनायाम्‌ू--अन्तिम क्षण में; अपि--यद्यपि; अननुमतम्‌--अविहित; आलम्भनम्‌--ई श्रर की इच्छा के विपरीत; तत्‌--वह; उपलभ्य--देखकर; ब्रह्म-तेजसा--दिव्य आनन्द के तेज से;अति-दुर्विषहेण-- अत्यन्त प्रखर अतः असहा; दन्दह्ममानेन--ज्वलित; वपुषा--शरीर से; सहसा--एकाएक; उच्चचाट--मूर्तिको विदीर्ण करके ; सा--वह ( देवी ); एब--निस्संदेह; देवी--देवी; भद्र-काली-- भद्रकाली ।

जिन चोर-उचक्ों ने देवी काली के पूजन का प्रबन्ध कर रखा था वे अत्यन्त नीच थे औररजो तथा तमो गुणों से आबद्ध थे।

वे धनवान बनने की कामना से ओतप्रोत थे, अतः उन्होंनेवेदों के आदेशों का तिरस्कार किया।

यहाँ तक कि वे ब्राह्मण कुल में उत्पन्न स्वरूपसिद्धजीवात्मा जड़ भरत का वध करने के लिए उद्यत थे।

द्वेषवश वे उन्हें देवी काली के समक्ष बलिचढ़ाने के लिए लाये थे।

ऐसे व्यक्ति सदैव ईर्ष्यालु कार्यो में रत रहते हैं, इसीलिए वे जड़ भरत को मारने का दुस्साहस कर सके।

जड़ भरत समस्त जीवों के परम मित्र थे।

वे किसी के भी शत्रुन थे और सदैव पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ के ध्यान में मग्न रहते थे।

उनका जन्म उत्तम ब्राह्मणकुल में हुआ था, अतः यदि वे किसी के शत्रु होते अथवा आक्रामक होते तो भी उनका वधवर्जित था।

किसी भी दशा में जड़ भरत को वध किये जाने का कोई औचित्य न था, अतः यहभद्रकाली से सहन नहीं हो सका।

वे तुरन्त समझ गईं कि ये पापी डाकू ईश्वर के एक परम भक्तका वध करने वाले हैं।

अतः सहसा मूर्ति का शरीर विदीर्ण हो गया और साक्षात्‌ देवी कालीप्रकट हुईं।

उनका शरीर प्रखर एवं असह्य तेज से जल रहा था।

भृशममर्षरोषावेशरभसविलसितश्रुकुटिविटपकुटिलदंष्टारुणेक्षणाटोपातिभयानकव दना हन्तुकामेवेदंमहाटहासमतिसंरम्भेण विमुझ्जन्ती तत उत्पत्य पापीयसां दुष्टानां तेनेवासिना विवृक्णशीर्ष्णागलात्सवन्तमसृगासवमत्युष्णं सह गणेन निपीयातिपानमदविहलोच्चैस्तरां स्वपार्षदै: सह जगौ ननर्त चविजहार च शिरःकन्दुकलीलया, ॥

१८॥

भूशम्‌--अत्यधिक; अमर्ष--पापों के कारण अत्यन्त असहनशीलता; रोष--क्रोध; आवेश--डूबे रहने से; रभस-विलसित--चढ़ी हुई; भ्रु-कुटि-- भौंहें; विटप--शाखाएँ; कुटिल--टेढ़ी; दंष्ट--बड़े दाँत ( दाढ़ें )) अरूण-ईक्षण--लाल लाल नेत्र;आटोप--विक्षोभ से; अति--अत्यधिक; भयानक--डरावना; वदना--मुख वाली; हन्तु-कामा--संहार करने की इच्छुक;इब--मानो; इृदम्‌--यह ब्रह्माण्ड; महा-अट्ट-हासम्‌ू--अत्यन्त डरावनी हँसी; अति--अत्यधिक; संरम्भेण--क्रो ध के कारण;विमुश्जन्ती --छोड़ती हुई; ततः--उस बलि बेदी से; उत्पत्य--उछल कर; पापीयसाम्‌ू--समस्त पापी; दुष्टानाम्‌--दुष्टों का; तेनएवं असिना--उसी तलवार से; विवृकण--छितन्न; शीर्ष्णामू--सिर; गलातू्‌-गर्दन से; स्त्रवन्तम्‌--बहते हुए; असृक्‌ू-आसवम्‌--रक्त रूपी मादक द्रव ( आसव ); अति-उष्णम्‌-- अत्यन्त गरम; सह--समेत; गणेन--अपने गणों के; निपीय--पीते हुए; अति-'पान--अत्यधिक पीने से; मद--नशे के; विहला--वश में आये हुए; उच्चैः-तराम्‌-- अत्यन्त उच्च स्वर से; स्व-पार्षदैः--अपनेगणों के; सह--साथ; जगौ--गाया; ननर्त--नाचा; च-- भी; विजहार--खेल किया; च--भी; शिर:-कन्दुक--सिरों को गेंदके समान प्रयुक्त करते हुए; लीलया--खेल में |

किए गये अत्याचारों को न सहन कर सकने के कारण क्रुद्ध देवी काली ने अपनी आँखेंचमकायी और उनके कराल वक्र दाँत ( दाढ़ें ) दिखाए।

उनकी लाल-लाल आँखें दहकने लगींऔर उनकी आकृति डरावनी हो गई।

उन्होंने अत्यन्त भयावना रूप धारण कर लिया मानो समस्तसृष्टि का संहार करने को उद्यत हों।

वे बलिवेदी से तेजी से कूदीं और तुरन्त ही उन चोर-उचक्ोंके सिर उसी तलवार से काट लिये जिससे वे जड़ भरत का वध करने जा रहे थे।

फिर छिन्न सिरोंवाले उन उच्चकों-चोरों के गले से निकलने वाले तप्त रक्त को पीने लगीं मानो मदिरा ( आसव )पान कर रही हों।

दरअसल उन्होंने अपने गणों के सहित, जिनमें डाइनें तथा चुड़ैलें थीं, उसआसव का पान किया और फिर प्रमत्त होकर वे सब उच्च स्वर से गाने तथा नाचने लगीं मानोसमस्त ब्रह्माण्ड का संहार कर डालेंगी।

उसी समय वे उनके सिरों को गेंद के समान उछाल-उछाल कर खेलने लगीं।

एवमेव खलु महदभिचारातिक्रमः कार्त्स्येनात्मने फलति ॥

१९॥

एवम्‌ एव--इस प्रकार; खलु--निस्संदेह; महत्‌--महापुरुषों के साथ; अभिचार--ईर्ष्या के रूप में; अति-क्रम:--अपराध कीसीमा; कार्त्स्येन--सदैव; आत्मने--अपने ही ऊपर; फलति--प्रतिफलित होता है, पड़ता है।

जब कोई ईर्ष्यालु व्यक्ति किसी महापुरुष के समक्ष कोई अपराध करता है, तो उसे सदैवउपर्युक्त विधि से दंडित होना पड़ता है।

न वा एतद्विष्णुदत्त महदद्भुतं यदसम्भ्रम: स्वशिरए्छेदन आपतितेडपिविमुक्तदेहाद्यात्मभावसुदृढहदय ग्रन्थीनां सर्वसत्त्वसुहृदात्मनां निर्वराणांसाक्षाद्धशवतानिमिषारिवरायुधेना प्रमत्तेन तैस्तैर्भावै: परिरक्ष्यमाणानां तत्पादमूलमकुतश्रिद्धयमुपसूतानांभागवतपरमहंसानाम्‌ ॥

२०॥

न--नहीं; वा--अथवा; एतत्‌--यह; विष्णु-दत्त--हे भगवान्‌ विष्णु द्वारा रक्षित, महाराज परीक्षित; महत्‌--महान; अद्भुतम्‌--आश्चर्य; यत्‌ू--जो; असम्भ्रम: --व्याकुलता का अभाव; स्व-शिरः-छेदने-- अपना सिर काटे जाते समय; आपतिते--आ पड़नेपर; अपि--यद्यपि; विमुक्त--पूर्णतया मुक्त; देह-आदि-आत्म-भाव--जीवन का मिथ्या देहात्म भाव; सु-हृढ--सुदृढ़; हृदय-ग्रन्थीनामू--हृदय-ग्रन्थि वालों का; सर्व-सत्त्व-सुहृत्‌-आत्मनाम्‌--अपने मन में सबों का कल्याण चाहने वाले व्यक्तियों का;निर्वरणाम्‌--जिनके एक भी शत्रु नहीं हैं, उनका; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; भगवता-- श्री भगवान्‌ द्वारा; अनिमिष--तत्काल; अरि-वर-शम्त्रों में श्रेष्ठ सुदर्शन चक्र; आयुधेन--आयुधधारी द्वारा; अप्रमत्तेन--कभी क्षुब्ध न होने वाला; तैः तैः--उन उन;भावै:-- श्री भगवान्‌ के रूपों से; परिरक्ष्यमाणानाम्‌--रक्षित पुरुषों का; तत्‌-पाद-मूलम्‌-- श्रीभगवान्‌ के चरणकमल में;अकुतश्चितू--कहीं से भी नहीं; भयम्‌--डर, भय; उपसृतानाम्‌--शरणागतों का; भागवत--ई श्वर के भक्तों का; परम-हंसानामू--परमहंसों का, मुक्त पुरुषों का।

तब शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित से कहा--हे विष्णुदत्त, आत्मा को शरीर सेपृथक्‌ मानने वाले, अजेय हृदय-ग्रंथि से मुक्त, समस्त जीवों के कल्याण कार्य में निरन्तरअनुरक्त तथा दूसरों का अहित न सोचने वाले व्यक्ति चक्रधारी तथा असुरों के लिए परम कालएवं भक्तों के रक्षक श्रीभगवान्‌ द्वारा सदैव संरक्षित होते हैं।

भक्त सदैव भगवान्‌ के चरणकमलकी शरण ग्रहण करते हैं।

फलत: सिर कटने का अवसर आने पर भी वे सदैव अश्षुब्ध रहते हैं।

यह उनके लिए तनिक भी विस्मयकारी नहीं होता है।

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