← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 5 की सूची

अध्याय आठ: भरत महाराज के चरित्र का वर्णन

5.8श्रीशुक उवाचएकदा तु महानद्यां कृताभिषेकनैयमिकावश्यको ब्रह्माक्षरमभिगृणानो मुहूर्तत्रयमुदकान्त उपविवेश ॥

१॥

श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; एकदा--एक बार; तु--लेकिन; महा-नद्यामू--गण्डकी नामक महानदी में;कृत-अभिषेक-नैयमिक-अवश्यक :--नित्य नैमित्तिक तथा शौचादि कार्यों से निवृत्त होकर, स्नान करके ; ब्रह्म-अक्षरम्‌-- प्रणवमंत्र ( ३७ ) का; अभिगृणान:--जप करते हुए; मुहूर्त-त्रयम्‌--तीन मुहूर्त तक; उदक-अन्ते--नदी के तट पर; उपविवेश--बैठगये?

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा--हे राजन्‌! एक दिन प्रातःकालीन नित्य-नैमित्तिकशौचादि कृत्यों से निवृत्त होकर महाराज भरत कुछ क्षणों के लिए गण्डकी नदी के तट पर बैठकर ओगकार से प्रारम्भ होनेवाले अपने मंत्र का जप करने लगे।

तत्र तदा राजन्हरिणी पिपासया जलाशयाभ्याशमेकैवोपजगाम ॥

२॥

तत्र--नदी के तट पर; तदा--उस समय; राजन्‌--हे राजा; हरिणी--मृगी; पिपासया--प्यास के कारण; जलाशय-अभ्याशम्‌--नदी के निकट; एक--एक; एव--निश्चय ही; उपजगाम--आई ।

हे राजनू, जब महाराज भरत उस नदी के तट पर बैठे हुए थे उसी समय एक प्यासी हिरनीपानी पीने आई।

तया पेपीयमान उदके तावदेवाविदूरेण नदतो मृगपतेरुनत्नादो लोकभयड्भूर उदपतत्‌, ॥

३॥

तया--उस मृगी द्वारा; पेपीयमाने--अत्यन्त तृप्ति के साथ पिया गया; उदके--जल; तावत्‌ एब--ठीक उसी समय; अविदूरेण--अत्यन्त निकट; नदत:--गरजता हुआ; मृग-पते: --सिंह की; उन्नाद: --दहाड़; लोक-भयम्‌-कर--समस्त जीवों के लिए अत्यन्तडरावनी; उदपतत्‌--उठी |

जब वह हिरनी अगाध तृप्ति के साथ जल पी रही थी तो पास ही एक सिंह ने घोर गर्जनाकी।

यह समस्त जीवों के लिए डरावनी थी और इसे उस मृगी ने भी सुना।

तमुपश्रुत्य सा मृगवधू: प्रकृतिविक्लवा चकितनिरीक्षणा सुतरामपि हरिभयाभिनिवेशव्यग्रहदयापारिप्लवदृष्टिरगततृषा भयात्सहसैवोच्चक्राम ॥

४॥

तम्‌ उपश्रुत्य--उस दहाड़ को सुनकर; सा--वह; मृग-वधू:--मृगी; प्रकृति-विक्लवा--स्वभाव से अन्यों द्वारा मारे जाने सेभयभीत; चकित-निरी क्षणा--चकित नेत्रों वाली; सुतराम्‌ अपि--तुरन्त ही; हरि--सिंह के; भय--डर; अभिनिवेश-- आने से;व्यग्र-हदया--व्यग्र-चित्त वाली; पारिप्लव-दृष्टि:--चौकज्ने नेत्रों वाली; अग॒त-तृषा--अपनी प्यास बुझाये बिना; भयात्‌--डरसे; सहसा--अचानक; एव--ही; उच्चक्राम--नदी पार करने लगी।

मृगी स्वभाव से अन्यों द्वारा वध किये जाने से डर रही थी और लगातार शंकित दृष्टि से देखरही थी।

जब उसने सिंह की दहाड़ सुनी तो वह अत्यन्त उद्विग्न हो उठी।

चौकन्नी दृष्टि से इधर-उधर देख कर वह मृगी अभी जल पीकर पूर्णतया तृप्त भी नहीं हुई थी कि सहसा उसने नदी पारकरने के लिए छलाँग लगा दी।

तस्या उत्पतन्त्या अन्तर्वत्न्या उरभयावगलितो योनिनिर्गतो गर्भ: स्त्रोतसि निपपषात ॥

५॥

तस्या:--उसके; उत्पतन्त्या: --बलपूर्वक कूदने से; अन्तर्वल्या: --गर्भ होने से; उर-भय--अत्यन्त डर के कारण; अवगलित:--छिटक कर; योनि-निर्गतः--गर्भ से बाहर आकर; गर्भ:--गर्भस्थ शिशु; स्नोतसि--बहते जल में; निपषात--गिर गया।

मृगी गर्भिणी थी, अतः जब डर के मारे वह कूद पड़ी तो शिशु मृग उसके गर्भ से निकलकर नदी के बहते जल में गिर गया।

तत्प्रसवोत्सर्पणभयखेदातुरा स्वगणेन वियुज्यमाना कस्याश्ञिहर्या कृष्णसारसती निपपाताथ च ममार ॥

६॥

तत्‌ू-प्रसब--उसके ( मृग शावक ) असामयिक गिर जाने से; उत्सर्पण--नदी में छलांग लगाने से; भय--( तथा ) भय से;खेद--निर्बलता से; आतुरा--पीड़ित; स्व-गणेन--मृग-झुंड से; वियुज्यमाना--विलग हुई; कस्याश्चित्‌ू--किसी; दर्याम्‌-पर्वतकी गुफा में; कृष्ण-सारसती--कृष्ण मृग की पत्नी ( मृगी ); निपषात--गिर गई; अथ--अतः:; च--तथा; ममार--मर गई |

अपने झुंड से विलग होने तथा गर्भपात से त्रस्त्र हो जाने से वह कृष्णा-मृगी नदी को पारकरके अत्यन्त भयभीत हुई।

अतः एक गुफा में गिर कर वह तुरन्त मर गई।

त॑ त्वेणकुणकं कृपणं स्त्रोतसानूह्ममानमभिवीक्ष्यापविद्धं बन्धुरिवानुकम्पया राजर्षिभरत आदायमृतमातरमित्याश्रमपदमनयत्‌, ॥

७॥

तम्‌--उस; तु--लेकिन; एण-कुणकम्‌--मृग शावक ( हरिणी का बच्चा ) को; कृपणम्‌--बेचारे; सत्रोतसा--लहरों के द्वारा;अनूह्ममानम्‌--तैरता हुआ; अभिवीक्ष्य--देख कर; अपविद्धम्‌--आत्म-जन से विलग ( वियुक्त ); बन्धु: इब--मित्र की भाँति;अनुकम्पया--दयावश; राज-ऋषि: भरत:--परम सन्त तुल्य राजा भरत; आदाय--लाकर; मृत-मातरम्‌--मातृविहीन; इति--ऐसा सोचते हुए; आश्रम-पदम्‌--आश्रम में; अनयत्‌--ले गया।

नदी के तीर पर बैठे हुए महान्‌ राजा भरत ने अपनी माँ से बिछुड़े बच्चे को नदी में उतरातेदेखा।

यह देख कर उन्हें बड़ी दया आई।

उन्होंने विश्वासपात्र मित्र की भाँति उस नन्हेशावक कोलहरों से निकाल लिया और मातृहीन जान कर वे उसे अपने आश्रम में ले आये।

तस्य ह वा एणकुणकउच्चैरेतस्मिन्कृतनिजाभिमानस्याहरहस्तत्पोषणपालनलालनप्रीणनानुध्यानेनात्मनियमा: सहयमा:पुरुषपरिचर्यादय एकैकश: कतिपयेनाहर्गणेन वियुज्यमाना: किल सर्व एवोदवसन्‌ ॥

८॥

तस्य--राजा का; ह वा--निसन्देह; एण-कुणके --मृग शावक में; उच्चै;:--अत्यधिक; एतस्मिनू--इसमें; कृत-निज-अभिमानस्थ--जिसने मृगशावक को पुत्रवत्‌ स्वीकार किया; अह:-अहः-- प्रतिदिन; तत्‌-पोषण--उस छौने को पाल कर बड़ाकरना; पालन--संकटों से रक्षा; लालन--लाड़-प्यार; प्रीणन--पुचकारना; अनुध्यानेन--ऐसी आसक्ति से; आत्म-नियमा:--अपने शरीर की रक्षा हेतु किये गये कृत्य; सह-यमा:--यम अर्थात्‌ अहिंसा, सहनशीलता तथा सरलता से युक्त; पुरुष-परिचर्या-आदय:--भगवान्‌ की आराधना तथा अन्य कृत्य; एक-एकश:--एक-एक करके; कतिपयेन--कुछ ही; अह:-गणेन--दिनोंमें; वियुज्यमाना:--त्यागे जाकर; किल--निस्सन्देह; सर्वे--समस्त; एव--ही; उदवसनू--नष्ट हो गये |

धीरे-धीरे महाराज भरत उस मृग के प्रति अत्यन्त वत्सल होते गये।

वे घास खिला-खिलाकरउसका पालन करने लगे।

वे बाघ तथा अन्य हिंस्त्र पशुओं के आक्रमण से उसकी सुरक्षा के प्रति सदैव सतर्क रहते थे।

जब उसे खुजली होती तो वे सहलाते और उसे आरामदेह स्थिति में रखनेका प्रयल करते।

कभी-कभी प्रेमवश उसे चूमते भी थे।

इस प्रकार मृग के पालन पोषण मेंआसक्त हो जाने से महाराज भरत आध्यात्मिक जीवन के यम-नियम भूलते गये, यहाँ तक किधीरे-धीरे भगवान्‌ की आराधना भी भूल गये।

कुछ दिनों के बाद वे अपनी आध्यात्मिक उन्नतिके विषय में सब कुछ भूल गये।

अहो बतायं हरिणकुणक: कृपण ईंश्वररथचरणपरिभ्रमणरयेण स्वगणसुहद्वन्धु भ्य: परिवर्जित: शरणं चमोपसादितो मामेव मातापितरी भ्रातृज्ञातीन्यौथिकांश्रेवोपेयाय नान्‍्यं कञ्जन वेद मय्यतिविस्त्रब्धश्नात एवमया मत्परायणस्य पोषणपालनप्रीणनलालनमनसूयुनानुष्ठेयं शरण्योपेक्षादोषविदुषा ९॥

अहो बत--ओह; अयम्‌--यह; हरिण-कुणकः--मृग शावक; कृपण: -- असहाय; ईश्वर-रथ-चरण-परिभ्रमण-रयेण--भगवान्‌ के काल-चक्र के वेग से; स्व-गण--अपने झुंड; सुहृत्‌--तथा मित्रों; बन्धुभ्य:--स्वजनों से; परिवर्जित:--वियुक्त;शरणम्‌--शरण; च--तथा; मा--मेरी; उपसादितः --प्राप्त करके; माम्‌--मुझको; एव--ही; माता-पितरौ --माता-पिता;भ्रातृ-ज्ञातीन्‌ू--बन्धुओं तथा सम्बंधियों; यौधिकान्‌--झुंड से सम्बद्ध; च-- भी; एब--निश्चय ही; उपेयाय-- भूलकर, बिछुड़कर; न--नहीं; अन्यमू--अन्य कोई; कञ्लनन--कोई व्यक्ति; वेद--यह जानता है; मयि--मुझमें; अति--अत्यधिक; विस्त्रब्ध:--श्रद्धा रखने वाला; च--तथा; अतः एव--इसलिए; मया--मेरे द्वारा; मत्‌-परायणस्यथ--इस प्रकार मेरे आश्रित का; पोषण-पालन-प्रीणन-लालनम्‌--पोषण, पालन, संतुष्ट करना तथा दुलारना; अनसूयुना--अनसूया ( द्वेष ) रहित मैं; अनुष्ठेयम्‌--कियाजाने वाला; शरण्य--शरणागत; उपेक्षा --उपेक्षा; दोष-विदुषा--जो दोष जानता है।

महान्‌ राजा भरत सोचने लगे--अहो! बेचारा यह मृगशावक भगवान्‌ के प्रतिनिधि काल-चक्र के वेग से अपने सम्बन्धियों तथा मित्रों से विलग हो गया है और मेरी शरण में आया है।

यहअन्य किसी को न जानकर केवल मुझे अपना पिता, माता, भाई तथा स्वजन मानने लगा है।

मेरेही ऊपर इसकी निष्ठा है।

यह मेरे अतिरिक्त और किसी को नहीं जानता, अतः मुझे ईर्ष्यावश यहनहीं सोचना चाहिए कि इस मृग के कारण मेरा अकल्याण होगा।

मेरा कर्तव्य है कि मैं इसकालालन, पालन, रक्षण करूँ तथा इसे दुलारूँ-पुचकारूँ।

जब इसने मेरी शरण ग्रहण कर ली है,तो भला इसे मैं कैसे दुत्कारूँ ? यद्यपि इस मृग से मेरे आध्यात्मिक जीवन में व्यतिक्रम हो रहा है,किन्तु मैं अनुभव करता हूँ कि इस प्रकार से कोई असहाय व्यक्ति यदि शरणागत हो तो उसकीउपेक्षा नहीं की जा सकती।

तब तो यह बड़ा भारी दोष होगा।

नूनं ह्र्या: साधव उपशमशीला: कृपणसुहृद एवंविधार्थे स्वार्थानपि गुरुतरानुपेक्षन्ते ॥

१०॥

नूनम्‌--निस्संदेह; हि--निश्चय ही; आर्या:--परम सभ्य; साधव:--साधुजन; उपशम-शीला: --संन्यास लेने पर भी; कृपण-सुहृदः--असहायों के मित्र; एवं-विध-अर्थे--ऐसे नियमों का पालन करने के लिए; स्व-अर्थान्‌ अपि-- अपने स्वार्थों तक का;गुरु-तरानू--अत्यन्त महत्त्वपूर्ण; उपेक्षन्ते--उपेक्षा करते हैं।

भले ही कोई संन्यास ले चुका हो, किन्तु जो महान्‌ है, वह निश्चित रूप से दुखी जीवात्मा केप्रति दया का अनुभव करता है।

मनुष्य को चाहिए कि शरणागत की रक्षा के हेतु अपने बड़े सेबड़े स्वार्थ की परवाह न करे।

इति कृतानुषड़ आसनशयनाटनस्नानाशनादिषु सह मृगजहुना स्नेहानुबद्धहदय आसीतू ॥

११॥

इति--इस प्रकार; कृत-अनुषड्रः--आसक्ति बढ़ने से; आसन--बैठना; शयन--सोना ( नींद ); अटन--टहलना; स्नान--नहाना; आशन-आदिषु--खाने आदि में; सह मृग-जहुना--मृगछौने के साथ-साथ; स्नेह-अनुबद्ध--स्नेह से बँधा हुआ;हृदयः--हृदय वाला; आसीत्‌--हो गया।

मृग के प्रति आसक्ति बढ़ जाने से महाराज भरत उसी मृग के साथ लेटते, टहलते, स्नानकरते, यहाँ तक कि उसी के साथ खाना भी खाते।

इस प्रकार उनका हृदय मृग के स्नेह में बँधगया।

कुशकुसुमसमित्पलाशफलमूलोदकान्याहरिष्यमाणो वृकसालाबृकादिभ्यो भयमाशंसमानो यदा सहहरिणकुणकेन वन समाविशति ॥

१२॥

कुश--अनुष्ठानों में प्रयुक्त एक प्रकार की घास, कुश; कुसुम--फूल; समित्‌--समिधा, जलाने की लकड़ी; पलाश-पत्ते;'फल-मूल--फल तथा कन्द; उदकानि--( तथा ) जल; आहरिष्यमाण:--एकत्र करने की इच्छा होने पर; वृकसाला-बवृक--भेड़ियों तथा कुत्तों से; आदिभ्य:--तथा अन्य पशु यथा बाघ आदि से; भयम्‌-- भय, डर; आशंसमान:--आशंकित; यदा--जब; सह--साथ; हरिण-कुणकेन--मृग-छौना के; वनम्‌--जंगल में ; समाविशति--प्रवेश करता है?

जब महाराज भरत को कुश, फूल, लकड़ी, पत्ते, फल, कन्द तथा जल लाने के लिए जंगलमें जाना होता तो उन्हें भय बना रहता कि कुत्ते, सियार, बाघ तथा अन्य हिंस्त्र पशु आकर मृग कोमार न डालें।

अतः वे जंगल में जाते समय उसे अपने साथ-ले जाते।

पश्चिषु च मुग्धभावेन तत्र तत्र विषक्तमतिप्रणयभरहदय: कार्पण्यात्स्कन्धेनोद्ठहति एवमुत्सड्र उरसिचाधायोपलालयन्मुदं परमामवाप ॥

१३॥

पथिषु--वन मार्ग में; च-- भी; मुग्ध-भावेन--मृग के बचकाने आचरण से; तत्र तत्र--वहाँ वहाँ; विषक्त-मति-- अत्यधिकआकृष्ट मन वाला; प्रणय--प्रेम से; भर--पूरित; हृदयः--जिसका हृदय; कार्पण्यात्‌ू--स्नेह तथा प्रेम के कारण; स्कन्धेन--कंधे से; उद्ददति--ले जाता है; एवम्‌--इस प्रकार; उत्सड्रे--क भी-कभी गोद में; उरसि--सोते समय वक्षस्थल के ऊपर; च--भी; आधाय--ले कर; उपलालयनू--दुलारते हुए; मुदम्‌ू--सुख; परमाम्‌-- अत्यधिक; अवाप--अनुभव किया।

जंगल के मार्ग में वह मृग अपने चपल स्वभाव के कारण महाराज भरत को अत्यन्तआकर्षक लगता।

महाराज भरत उसे अपने कंधों में भी चढ़ा कर स्नेहवश दूर तक ले जाते।

उनका हृदय मृग-प्रेम से इतना पूरित था कि वे कभी उसे अपनी गोद में ले लेते, तो कभी सोतेसमय उसे अपनी छाती पर चढ़ाए रखते।

इस प्रकार उस पशु को दुलारते हुए उन्हें अत्यधिक सुखका अनुभव होता था।

क्रियायां निर्वर्यमानायामन्तरालेप्युत्थायोत्थाय यदैनमभिचक्षीत तहिं वाव स वर्षपतिः प्रकृतिस्थेनमनसा तस्मा आशिष आशास्ते स्वस्ति स्ताद्वत्स ते सर्वत इति ॥

१४॥

क्रियायाम्-ईश्वर की पूजा करने या नित्य-नैमित्तिक क्रियाएँ करने में; निर्वर्यमानायाम्‌--बिना समाप्त किये ही; अन्तराले--बीच-बीच में; अपि--यद्यपि; उत्थाय उत्थाय--उठ उठ कर; यदा--जब; एनम्‌--मृगछौना को; अभिचक्षीत--देख लियाकरते; तहिं वाव--उस समय; स:--वह; वर्ष-पति:--महाराज भरत; प्रकृति-स्थेन--प्रसन्न; मनसा-- अपने मन में; तस्मै--उसको; आशिष:ः आशास्ते--आशीर्वाद देते; स्वस्ति--कल्याण; स्तात्‌ू--हो; वत्स--हे मेरे मृग-शावक; ते--तुम्हारा; सर्वतः--सभी प्रकार से; इति--इस प्रकार?

जब महाराज भरत ईश्वर की आराधना में या अन्य अनुष्ठान में व्यस्त रहते तो अनुष्ठानों कोसमाप्त किए बिना बीच-बीच में ही वे उठ उठ जाते और देखने लगते कि मृग कहाँ है।

इसप्रकार जब वे यह देख लेते कि वह मृग सुखपूर्वक है, तब कहीं उनके मन तथा हृदय को सन्तोषहोता और तब वे उस मृग को यह कह कर आशीष देते, 'हे वत्स, तुम सभी प्रकार से सुखीरहो।

अन्यदा भृशमुद्विग्नमना नष्टद्रविण इव कृपण: सकरुणमतितर्षेणहरिणकुणकविरहविहलहदयसन्तापस्तमेवानुशोचन्किल कश्मलं महदभिरम्भित इति होवाच ॥

१५॥

अन्यदा--कभी कभी ( मृग छौने को न देखकर ); भृूशम्‌--अत्यधिक; उद्ठिग्ग-मना:--चिन्ताओं से युक्त मन; नष्ट-द्रविण: --जिसका धन लुट गया हो; इब--सहृश; कृपण:--कंजूस व्यक्ति; स-करुणम्‌--करुणापूर्वक; अति-तर्षेण --अत्यन्त चिन्ता से;हरिण-कुणक--ूृग छौने के; विरह--वियोग से; विहल--व्याकुल; हृदय--मन या हृदय में; सन्‍्ताप: --शोक; तम्‌--उन छौनेको; एव--केवल; अनुशोचन्‌--निरन्तर ध्यान करते; किल--निश्चय ही; कश्मलमू--मोह; महत्‌-- अत्यधिक; अभिरम्भित: --प्राप्त किया; इति--इस प्रकार; ह--निश्चय ही; उवाच--कहा।

कभी कभी भरत महाराज यदि उस मृग को न देखते तो उनका मन अत्यन्त व्याकुल होउठता।

उनकी स्थिति उस कंजूस व्यक्ति के समान हो जाती जिसे कुछ धन प्राप्त हुआ हो, किन्तुउसके खो जाने से वह अत्यन्त दुखी हो गया हो।

जब मृग चला जाता, तो उन्हें चिन्ता हो जातीऔर वियोग के कारण वे विलाप करने लगते।

इस प्रकार मोहग्रस्त होने पर वे निम्नलिखितप्रकार से कहते।

अपि बत स वै कृपण एणबालको मृतहरिणीसुतोहो ममानार्यस्य शठकिरातमतेरकृतसुकृतस्यकृतविस्त्रम्भ आत्पप्रत्ययेन तदविगणयन्सुजन इवागमिष्यति ॥

१६॥

अपि--निस्सन्देह; बत--अहो; सः--वह छौना; वै--निश्चय ही; कृपण:--दीन; एण-बालकः--मृगशावक; मृत-हरिणी-सुतः--मृत हरिणी का बच्चा; अहो--ओह; मम--मेरा; अनार्यस्य--अनार्य का, असभ्य आदिवासी; शठ--धोखेबाज का;किरात--अथवा असभ्य आदिवासी का; मते:ः --मन वाले; अकृत-सुकृतस्य--पुण्यहीन; कृत-विस्त्रम्भ:--विश्वास करते हुए;आत्म-प्रत्ययेन--मुझे अपने ही समान समझते हुए; तत्‌ अविगणयन्‌--इन सब बातों को सोचे बिना; सु-जन: इब--भद्गर पुरुषकी भाँति; अगमिष्यति--क्या वह फिर से लौटेगा ?

भरत महाराज सोचते--ओह! यह मृग अब असहाय है।

मैं अत्यन्त अभागा हूँ और मेरा मनचतुर शिकारी की भाँति है क्योंकि यह सदैव छल तथा निष्ठुरता से पूर्ण रहता है।

इस मृग ने मुझपर उसी प्रकार विश्वास किया है, जिस प्रकार एक भद्र पुरुष धूर्त मित्र के दुराचार को भूलकरउस पर विश्वास प्रकट करता है।

यद्यपि मैं अविश्वासी सिद्ध हो चुका हूँ, किन्तु क्या यह मृग मुझपर विश्वास करके पुनः लौट आएगा ?

अपि क्षेमेणास्मिन्ना भ्रमोपवने शष्पाणि चरन्तं देवगुप्तं द्रक्ष्यामि ॥

१७॥

अपि--हो सकता है कि; क्षेमेण--हिंस्त्र पशुओं के अभाव के कारण निर्भय होने से; अस्मिन्‌ू--इस; आश्रम-उपवने-- आश्रमके उद्यान में; शष्पाणि चरन्तम्‌--मुलायम घास चरते हुए; देव-गुप्तम्‌--देवताओं द्वारा रक्षित; द्रक्ष्यामि--क्या मैं देखूँगा ?

ओह! क्या ऐसा हो सकता है कि मैं इस पशु को देवताओं से रक्षित तथा हिंस्त्र पशुओं सेनिर्भय रूप में फिर देखूँ? क्या मैं उसे पुनः उद्यान में मुलायम घास चरते हुए देख सकूँगा ??

अपि च न वृकः सालावृकोन्यतमो वा नैकचर एकचरो वा भक्षयति ॥

१८॥

अपि च--अथवा; न--नहीं; वृक:--भेड़िया; साला-वृक:--कुत्ता; अन्यतम: -- अनेक में से कोई एक; वा--अथवा; न-एक-चरः--झुंड के झुंड विचरने वाले शूकर; एक-चर:--अकेला घूमने वाला व्याप्र; वा--अथवा; भक्षयति--( बेचारे पशु को )खा रहा है।

मुझे पता नहीं, किन्तु हो सकता है कि भेड़िये या कुत्ते अथवा झुंडों में रहने वाले सुअर याफिर अकेले घूमने वाले बाघ ने उस मृग को खा लिया हो।

निम्लोचति ह भगवान्सकलजगरक्ष्षेमोदयस्त्रय्यात्माद्यापि मम न मृगवधून्यास आगच्छति ॥

१९॥

निम्लोचति--डूब रहा है; ह--ओह; भगवान्‌--सूर्य के रूप में भगवान्‌; सकल-जगत्‌--समस्त ब्रह्माण्ड का; क्षेम-उदय:--कल्याण करने वाला; त्रयी-आत्मा--तीन वेदों से युक्त; अद्य अपि--अब भी; मम--मेरा; न--नहीं; मृग-वधू-न्यास:--मृगीकी धरोहर; आगच्छति--वापस आया है।

ओह! सूर्य के उदय होते ही सभी शुभ कार्य होने लगते हैं।

दुर्भाग्यवश, मेरे लिए ऐसा नहीं हो रहा है।

सूर्यदेव साक्षात्‌ वेद हैं, किन्तु मैं समस्त वैदिक नियमों से शून्य हूँ।

वे सूर्यदेव अबअस्त हो रहे हैं, तो भी वह बेचारा पशु, जिसने अपनी माता की मृत्यु होने पर मुझपर विश्वासकिया था, अभी तक नहीं लौटा है।

अपि स्विदकृतसुकृतमागत्य मां सुखयिष्यति हरिणराजकुमारोविविधरुचिरदर्शनीयनिजमृगदारकविनोदैरसन्तोष॑ स्वानामपनुदन्‌ ॥

२०॥

अपि स्वित्‌ू--क्या वह करेगा; अकृत-सुकृतम्‌-- जिसने कभी कोई पुण्य कार्य नहीं किया; आगत्य--वापस आकर; माम्‌--मुझको; सुखयिष्यति--आनन्दित करेगा; हरिण-राज-कुमार: --हिरण, जिसका पालन राजकुमार के समान हुआ; विविध--अनेक; रुचिर--मनोहर; दर्शनीय--देखने योग्य; निज--अपना; मृग-दारक--मृगशावक के उपयुक्त; विनोदैः--क्रीड़ाओं से;असन्तोषम्‌--असनन्‍्तोष; स्वानामू--स्वजनों का; अपनुदन्‌-दूर करते हुए।

वह मृग राजकुमार के तुल्य है।

वह कब लौटेगा? वह कब फिर अपनी मनोहर क्रीड़ाएँदिखायेगा ? वह कब मेरे आहत-हृदय को पुनः शान्त करेगा ? अवश्य ही मेरे पुण्य शेष नहीं हैं,अन्यथा अब तक वह मृग अवश्य लौट आया होता।

क््वेलिकायां मां मृषासमाधिनामीलितह॒शं प्रेमसंरम्भेण चकितचकित आगत्य पृषदपरुषविषाणाग्रेणलुठति ॥

२१॥

क््वेलिकायाम्‌--खेल में; माम्‌-- मुझको; मृषा--झूठ मूठ; समाधिना--समाधि से; आमीलित-हशम्‌--बन्द आँखों से; प्रेम-संरम्भेण--प्रेम के कारण उत्पन्न क्रोध से; चकित-चकितः--डर से; आगत्य--आकर; पृषत्‌--जल बिन्दुओं के समान;अपरुष--अत्यन्त नप्र; विषाण--सींगों के; अग्रेण-- अग्रभाग से, नोक से; लुठति--मेरा शरीर छूता है?

ओह! जब यह छोटा-सा हिरण, मेरे साथ खेलते हुए और मुझे आँखें बन्द करके झूठ-मूठध्यान करते देख कर, प्रेम से उत्पन्न क्रोध के कारण मेरे चारों ओर चक्कर लगाता और डरते हुएअपने मुलायम सींगों की नोकों से मुझे छूता, जो मुझे जल बिन्दुओं के समान प्रतीत होते।

आसादितहविषि बर्हिषि दूषिते मयोपालब्धो भीतभीत:ः सपद्युपरतरास ऋषिकुमारवदवहितकरणकलापआस्ते ॥

२२॥

आसादित--रख देता; हविषि--यज्ञ की सामग्री, हवि; बर्हिषि--कुश के ऊपर; दूषिते--अपवित्र होने पर; मया उपालब्ध: --मेरेद्वारा डाँटे जाने पर; भीत-भीतः--अत्यन्त डर से; सपदि--शीघ्र, तुरन्त; उपरत-रास:--अपना खेल बन्द करता हुआ; ऋषि-कुमारवत्‌--ऋषि के पुत्र या शिष्य के समान; अवहित--पूर्णतया रोका जाकर; करण-कलापः--समस्त इन्द्रियाँ; आस्ते--बैठजाता।

जब मैं यज्ञ की समस्त सामग्री को कुश पर रखता तो यह मृग खेल-खेल में कुश को अपनेदाँतों से छूकर अपवित्र कर देता।

जब मैं मृग को दूर हटा कर डाँटता-डपटता तो वह तुरन्त डरजाता और बिना हिले डुले बैठ जाता मानो ऋषि का पुत्र हो।

तब वह अपना खेल ( क्रीड़ा ) बन्दकर देता।

किं वा अरे आचरितं तपस्तपस्विन्यानया यदियमवनि:सविनयकृष्णसारतनयतनुतरसु भगशिवतमाखरखुरपदपड्धिभिद्रविणविधुरातुरस्यथ कृपणस्य ममद्रविणपदवीं सूचयन्त्यात्मानं च सर्वतः कृतकौतुकं द्विजानां स्वर्गापवर्गकामानां देवयजनं करोति ॥

२३॥

किम्‌ वा--क्या; अरे--ओह; आचरितम्‌--साधते हुए; तप:--तपस्या; तपस्विन्या--अत्यन्त भाग्यशाली के द्वारा; अनया--इसभूलोक पर; यत्‌--चूँकि; इयम्‌--यह; अवनि:--पृथ्वी; स-विनय--विनयपूर्वक; कृष्ण-सार-तनय--कृष्ण-मृग के शावकका; तनुतर--छोटे-छोटे; सुभग--सुन्दर; शिव-तम--अन्यन्त मंगलकारी; अखर-- मुलायम; खुर--खुरों के; पद-पड़ि भि:--पदचिह्लों की पंक्तियों से; द्रविण-विधुर-आतुरस्य--धन की हानि से अत्यन्त दुखी व्यक्ति का; कृपणस्य--अत्यन्त दुखी प्राणीका; मम-मेरे लिए; द्रविण-पदवीम्‌--उस धन को प्राप्त करने का मार्ग; सूचयन्ति--सूचित करते हुए; आत्मानम्‌--अपनाशरीर; च--तथा; सर्वतः--चारों दिशाओं में; कृत-कौतुकम्‌-- अलंकृत; द्विजानाम्‌ू--ब्राह्मणों का; स्वर्ग-अपवर्ग-कामानामू--स्वर्ग या मुक्ति की आकांक्षा करने वाले; देव-यजनमू--देवताओं के लिए किया जाने वाला यज्ञ-स्थल; करोति--करता है।

इस प्रकार एक पागल की भाँति बोलते हुए महाराज भरत उठे और बाहर निकल गए।

धरतीपर मृग के पदचिह्नें को देखकर उनकी प्रशंसा में अत्यन्त प्रेम से कहा, ' अरे अभागे भरत! इसपृथ्वी के तप की तुलना में तुम्हारे तप तुच्छ हैं, क्योंकि पृथ्वी की कठोर तपस्या से ही उस पर इसमृग के छोटे-छोटे, सुन्दर अत्यन्त कल्याणकारी तथा मुलायम पदचिह्न बने हुए हैं।

पदचिह्नों कीयह श्रेणी मृग-विछोह से दुखी मुझ जैसे व्यक्ति को दिखा रही है कि वह पशु इस जंगल सेहोकर किस प्रकार आगे गया है और मैं उस खोई हुई सम्पत्ति को किस तरह पुनः प्राप्त करसकता हूँ।

इन पदचिह्नों के कारण यह भूमि स्वर्ग या मुक्ति की इच्छा से देवताओं के हेतु यज्ञकरने वाले ब्राह्मणों के लिए उत्तम स्थान बन गई है।

अपि स्विदसौ भगवानुडुपतिरेनं मृगपतिभयान्मृतमातरं मृगबालकं स्वाश्रमपरिभ्रष्टमनुकम्पयाकृपणजनवत्सलः परिपाति ॥

२४॥

अपि स्वित्‌ू--कहीं ऐसा तो नहीं है; असौ--वह; भगवानू--सर्वशक्तिमान; उडु-पति:-- चन्द्रमा; एनमू--इस; मृग-पति-भयात्‌--सिंह के भय से; मृत-मातरम्‌--मातृविहीन; मृग-बालकम्‌--मृग शावक की; स्व-आश्रम-परिभ्रष्टमू--अपने आश्रम सेबिछुड़ कर; अनुकम्पया--दयावश; कृपण-जन-वत्सल:--( चन्द्रमा ) जो दुखी प्राणियों पर अत्यन्त सदय है; परिपाति--सुरक्षाकर रहा है।

भरत महाराज उन्मत्त पुरुष की भाँति बोलते रहे।

अपने सिर के ऊपर उदित चन्द्रमा में मृग केसहश काले धब्बों को देखकर उन्होंने कहा--कहीं दुखी मनुष्य पर दया करने वाले इस चन्द्रमाने यह जानते हुए कि मेरा मृग अपने घर से बिछुड़ गया है और मातृविहीन हो गया है, उस पर भीदया की हो? इस चन्द्रमा ने सिंह के अचानक आक्रमण से बचाने के लिए ही मृग को अपनेनिकट शरण दे दी हो।

कि वात्मजविश्लेषज्वरदवदहनशिखाभिरुपतप्यमानहदयस्थलनलिनीकं मामुपसृतमृगीतनयंशिशिरशान्तानुरागगुणितनिजवदनसलिलामृतमयगभस्तिभि: स्वधयतीति च ॥

२५॥

किम्‌ वा--अथवा ऐसा हो कि; आत्म-ज--पुत्र से; विश्लेष--वियोग के कारण; ज्वर--ताप; दव-दहन--दावाग्नि की;शिखाभि:--लपटों से; उपतप्यमान--ज्वलित; हृदय--हृदय; स्थल-नलिनीकम्‌--लाल कमल पुष्प के सहश; माम्‌--मुझको;उपसृत-मृगी-तनयम्‌--जिससे मृगछौना अत्यन्त हिला-मिला हुआ था; शिशिर-शान्त--अत्यन्त शीतल एवं शान्त; अनुराग--प्रेमवश; गुणित--प्रवहमान; निज-वदन-सलिल--अपने मुख का जल; अमृत-मय--अमृत के सहश उत्तम; ग्भस्तिभि:--चन्द्रमा की किरणों से; स्वधयति--मुझे आनन्द दे रहा है; इति--इस प्रकार; च--तथा?

चाँदनी को देखकर महाराज भरत उन्मत्त पुरुष की भाँति बोलते रहे।

उन्होंने कहा--यहमृगछौना इतना विनम्र घुलमिल गया था और मुझे इतना प्रिय था कि इसके वियोग से मुझे अपनेपुत्र जैसा वियोग हो रहा है।

इसके वियोग-ताप से मुझे दावाग्नि से जल जाने जैसा कष्ट हो रहाहै।

मेरा हृदय-स्थल कुमुदिनी जैसा जल रहा है।

मुझे इतना दुखी देखकर चन्द्रमा मेरे ऊपरचमकते हुए अमृत जैसी वर्षा कर रहा है मानो प्रखर ज्वर से पीड़ित व्यक्ति पर उसका मित्र जलछिड़क रहा हो।

इस प्रकार यह चन्द्रमा मुझे सुख देने वाला है।

एवमघटमानमनोरथाकुलहृदयो मृगदारकाभासेन स्वारब्धकर्मणा योगारम्भणतो विश्रेशितः सयोगतापसो भगवदाराधनलक्षणाच्च 'कथमितरथा जात्यन्तर एणकुणक आसड्रःसाक्षात्रिः श्रेयसप्रतिपक्षतया प्राक्परित्यक्तदुस्त्यजहदयाभिजातस्य तस्यैवमन्तरायविहतयोगारम्भणस्यराजर्षेर्भरतस्य तावन्मृगार्भकपोषणपालनप्रीणनलालनानुषड्रेणाविगणयत आत्मानमहिरिवाखुबिलंदुरतिक्रमः काल: करालरभस आपद्यत, ॥

२६॥

एवम्‌--इस प्रकार; अघटमान--दुर्लभ; मन:-रथ--इच्छाओं से जो मन के रथ के तुल्य हैं; आकुल--दुखी; हृदयः--जिसकाहृदय; मृग-दारक-आभासेन--मृग छौने के समान; स्व-आरब्ध-कर्मणा--अपने प्रारब्ध के बुरे कर्म-फलों से; योग-आरम्भणतः--योगानुष्ठान से; विश्रंशित: --च्युत; सः--वह ( महाराज भरत ); योग-तापस:--योग तथा तपस्या करता हुआ;भगवत्‌-आराधन-लक्षणात्‌-- श्रीभगवान्‌ की भक्ति सम्बन्धी क्रियाओं से; च--तथा; कथम्‌--किस प्रकार; इतरथा-- अन्य;जाति-अन्तरे--अन्य जातियोनि वाले; एण-कुणके--मृग छौने के शरीर के प्रति; आसड्डर:--अत्यधिक आसक्ति; साक्षात्‌--प्रत्यक्ष; निः श्रेयस--चरम जीवन-लक्ष्य प्राप्त करने के लिए; प्रतिपक्षतया--प्रतिरोध; प्राकु--पहले; परित्यक्त--छोड़ा हुआ;दुस्त्यज--यद्यपि त्याग करने में अत्यन्त कठिन; हृदय-अभिजातस्य--अपने हृदय से उत्पन्न अपने पुत्रों; तस्थ--उसका; एवम्‌--इस प्रकार; अन्तराय--उस प्रतिरोध ( विघ्न ) से; विहत--रोका जाकर; योग-आरम्भणस्य--जिसकी योग-साधना का पथ;राज-ऋषे:--राजर्षि; भरतस्य--महाराज भरत का; तावत्‌--तब तक; मृग-अर्भक--मृगछौना; पोषण-- भरण में ( दूध पिलानेमें )) पालन--सुरक्षा में; प्रीणन--प्रसन्न रखने में; लालन--दुलारने में; अनुषड्रेण --निरन्तर ध्यान करते रहने से;अविगणयत:--उपेक्षा करते हुए; आत्मानमू--अपनी आत्मा की; अहिः इब--सर्प के तुल्य; आखु-बिलम्‌--चूहे का बिल;दुरतिक्रम:--दुर्लध्य; काल:--मृत्यु; कराल-- भयानक; रभसः--गतिमान; आपद्यत--आ गया।

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा, हे राजन, इस प्रकार महाराज भरत दुर्दमनीय आकांक्षा सेअभिभूत हो गये जो मृग के रूप में प्रकट हुई।

अपने पूर्वकर्मों के फल के कारण वे योग, तपतथा भगवान्‌ की आराधना से च्युत हो गये।

यदि यह पूर्वकर्मों के कारण नहीं हुआ तो वेक्योंकर अपने पुत्र तथा परिवार को अपने आध्यात्मिक जीवन के पथ पर अवरोध समझ करत्याग देने के बाद भी मृग से इतना आकृष्ट होते ? वे मृग के लिए इतना दुर्दम्य स्नेह क्‍यों प्रकटकरते? यह निश्चय ही उनके पूर्वकर्म का फल था।

राजा मृग को सहलाने तथा उसके लालन-पालन में इतने व्यस्त रहते कि वे अपने आध्यात्मिक वृत्तियों से नीचे गिर गये।

कालान्तर में,दुल॑घ्य मृत्यु उनके समक्ष उपस्थित हो गई जिस प्रकार कोई विषधर सर्प चूहे के द्वारा निर्मित छिद्रमें चुपके से घुस जाता है।

तदानीमपि पार्श्वर्तिममात्मजमिवानुशोचन्तमभिवी क्षमाणो मृग एवाभिनिवेशितमना विसृज्य लोकमिमंसह मृगेण कलेवरं मृतमनु न मृतजन्मानुस्मृतिरितरवन्मृगशरीरमवाप ॥

२७॥

तदानीम्‌--उस समय; अपि--निस्संदेह; पार्श्ू-वर्तिनम्‌-- अपनी मृत्युशय्या के निकट; आत्म-जम्‌--अपने पुत्र; इब--सहृश;अनुशोचन्तम्‌--शोकातुर; अभिवीक्षमाण:--देखते हुए; मृगे--मृग में; एब--निश्चय ही; अभिनिवेशित-मना: --उसका मन उसीमें लगा हुआ; विसृज्य--त्याग कर; लोकम्‌--संसार को; इममू--इस; सह--साथ; मृगेण--मृग के; कलेवरम्‌--उसका शरीर;मृतमू--मरा हुआ; अनु--तत्पश्चात्‌; न--नहीं; मृत--विनष्ट; जन्म-अनुस्मृतिः --मृत्यु के पूर्व की घटना की याद; इतर-वत्‌--अन्यों की तरह; मृग-शरीरम्‌--मृग का शरीर; अवाप--प्राप्त किया।

राजा ने देखा कि उनकी मृत्यु के समय वह मृग उनके पास बैठा था मानो उनका पुत्र हो औरवह उनकी मृत्यु से शोकातुर था।

वास्तव में राजा का चित्त मृग के शरीर में रमा हुआ था, फलतःकृष्णभावनामृत से रहित मनुष्यों की भाँति उन्होंने यह संसार, मृग तथा अपना भौतिक शरीरत्याग दिया और मृग का शरीर प्राप्त किया।

किन्तु इससे एक लाभ हुआ।

यद्यपि उन्होंने मानवशरीर त्याग कर मृग का शरीर प्राप्त किया था, किन्तु उन्हें अपने पूर्व जीवन की घटनाएँ भूल नहीं पाईं थीं।

तत्रापि ह वा आत्मनो मृगत्वकारणं भगवदाराधनसमीहानुभावेनानुस्मृत्य भूशमनुतप्यमान आह ॥

२८॥

तत्र अपि--उस जम्म में; ह वा--निस्संदेह; आत्मन:--स्वयं का; मृगत्व-कारणम्‌--मृग शरीर स्वीकार करने का कारण;भगवत्‌-आराधन-समीहा-- भक्ति में पूर्व कर्मों के; अनुभावेन--परिणामस्वरूप; अनुस्मृत्य--स्मरण करके; भृशम्‌--सर्वदा;अनुतप्य-मान:--पश्चात्ताप करते हुए; आह--कहा।

मृग शरीर प्राप्त करने पर भी भरत महाराज अपने पूर्वजन्म की दृढ़ भक्ति के कारण उसशरीर को धारण करने का कारण जान गये थे।

अपने विगत तथा वर्तमान शरीर पर विचार करतेहुए वे अपने कृत्यों पर पश्चात्ताप करते हुए इस प्रकार बोले।

अहो कष्ट भ्रष्टोउहमात्मवतामनुपथाद्द्विमुक्तसमस्तसड़ुस्य विविक्तपुण्यारण्यशरणस्यात्मवत आत्मनिसर्वेषामात्मनां भगवति वासुदेवे तदनुअरवणमननसड्डीर्तनाराधनानुस्मरणाभियोगेनाशून्यसकलयामेनकालेन समावेशितं समाहित कार्त्स्येन मनस्तत्तु पुनर्ममाबुधस्यारान्मृगसुतमनु परिसुसत्राव ॥

२९॥

अहो कष्टमू--ओह, कितना कष्टमय जीवन है; भ्रष्ट:--पतित; अहमू--मैं ( हूँ ); आत्म-बताम्‌--सिद्धिप्राप्त महान्‌ भक्तों की;अनुपथात्‌--जीवन शैली से; यत्‌--जिससे; विमुक्त-समस्त-सड्डस्य--यद्यपि अपने सगे पुत्रों तथा घर का साथ त्यागे हुए;विविक्त--एकान्त; पुण्य-अरण्य--पवित्र वन की; शरणस्य--शरण लिए हुए के; आत्म-वतः--दिव्य पद को प्राप्त;आत्मनि--परमात्मा में; सर्वेषामू--समस्त; आत्मनामू--जीवात्माओं के; भगवति-- श्रीभगवान्‌ में; वासुदेवे-- भगवान्‌ वासुदेवमें; तत्‌ू--उसका; अनुश्रवण--निरन्तर सुनना; मनन--चिन्तन; सड्जीर्तन--जप; आराधन--पूजा, उपासना; अनुस्मरण--निरन्तरस्मरण करना; अभियोगेन--लीन रह कर; अशून्य--पूरित; सकल-यामेन--जिसमें सारे समय; कालेन--काल से;समावेशितम्‌--पूर्णतया प्रतिष्ठित; समाहितम्‌--स्थिर; कार्त्स्येन--पूर्णतया; मनः--चित्त; तत्‌ू--वह मन; तु--लेकिन; पुन:--फिर; मम--मुझ; अबुधस्य--अज्ञानी का; आरातू--दूरी से; मृग-सुतम्‌--मृगछौना; अनु--के पीछे, के वश में; परिसुस्नाव--च्युत हो गया।

मृग के शरीर में भरत महाराज पश्चात्ताप करने लगे--कैसा दुर्भाग्य है कि मैं स्वरूपसिद्धोंके पथ से गिर गया हूँ! आध्यात्मिक जीवन बिताने के लिए मैंने अपने पुत्रों, पत्ती तथा घर कापरित्याग किया और वन के एकान्त पवित्र स्थान में आश्रय लिया।

मैं आत्मसंयमी तथा स्वरूप-सिद्ध बना और पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ वासुदेव की भक्ति, श्रवण, चिन्तन, कीर्तन, पूजन तथास्मरण में निरन्तर लगा रहा।

मैं अपने प्रयत्न में सफल रहा, यहां तक कि मेरा मन सर्वदा भक्ति मेंडूबा रहता था।

किन्तु, अपनी मूर्खता के कारण मेरा मन पुनः आसक्त हो गया--इस बार मृग में।

अब मुझे मृग शरीर प्राप्त हुआ है और मैं अपनी भक्ति-साधना से बहुत नीचे गिर चुका हूँ।

इत्येवं निगूढनिर्वेदो विसृज्य मृर्गीं मातरं पुनर्भगवद््षेत्रमुपशमशीलमुनिगणदयितं शालग्रामंपुलस्त्यपुलहा श्रमं कालझ्जरात्प्रत्याजगाम ॥

३०॥

इति--इस प्रकार; एवम्‌--इस विधि से; निगूढ--छिपी; निर्वेद:--वैराग्य भावना; विसृज्य--त्याग कर; मृगीम्‌ू--मृगी को;मातरम्‌--अपनी माता; पुनः--फिर; भगवत्‌क्षेत्रम्‌ू--वह क्षेत्र जहाँ परमेश्वर पूजित हैं; उपशम-शील--सांसारिक आसक्तियों सेसर्वथा विरक्त; मुनि-गण-दबितम्‌--जो मुनियों को अत्यधिक प्रिय है; शालग्रामम्‌--शालग्राम नामक ग्राम; पुलस्त्य-पुलह-आश्रमम्‌--पुलस्त्य तथा पुलह जैसे ऋषियों के आश्रम को; कालझझरात्‌--कालंजर पर्वत से, जहाँ उसने मृगी के गर्भ से जन्मलिया था; प्रत्याजगाम--चला आया।

यद्यपि भरत महाराज को मृग शरीर प्राप्त हुआ था, किन्तु निरन्तर पश्चात्ताप करते रहने से वेसांसारिक वस्तुओं से पूर्णतः विरक्त हो गये थे।

उन्होंने ये बातें किसी को प्रकट नहीं होने दीं।

उन्होंने अपनी मृगी माता को अपने जन्मस्थान कालंजर पर्वत पर ही छोड़ दिया और स्वयंशालग्राम के बन में पुलस्त्य तथा पुलह के आश्रम में पुनः: चले आये।

तस्मिन्नपि काल प्रतीक्षमाण: सझ़च्च भृशमुद्विग्न आत्मसहचरः शुष्कपर्णतृणवीरु धा वर्तमानोमृगत्वनिमित्तावसानमेव गणयन्मृगशरीरं तीर्थोदकक्लिन्नमुत्ससर्ज ३१॥

तस्मिन्‌ अपि--उस आश्रम ( पुलह आश्रम ) में; कालम्‌--मृग शरीर में जीवन का अन्त; प्रतीक्षमाण:--सदैव प्रतीक्षा में रत;सड्भात्‌ू--संगति से; च--तथा; भूशम्‌--लगातार; उद्विग्न:--चिन्तापूर्ण; आत्म-सहचरः --परमात्मा को ही एकमात्र संगी मानकर( किसी को अकेले नहीं समझना चाहिए ); शुष्क-पर्ण-तृण-वीरुधा--केवल सूखी पत्तियाँ तथा बूटियाँ खाकर; वर्तमान: --( जीवित ) रहते हुए; मृगत्व-निमित्त--मृग शरीर धारण करने के कारण; अवसानम्‌--अन्त; एव--केवल; गणयन्‌--विचारकरते हुए; मृग-शरीरम्‌--मृग के शरीर को; तीर्थ-उदक-क्ललिन्नम्‌ू--उस तीर्थ स्थान के जल में स्नान करते हुए; उत्ससर्ज--त्यागदिया?

उस आश्रम में रहते हुए महाराज भरत अब कुसंगति का शिकार न होने के प्रति सतर्क रहनेलगे।

किसी को भी अपना विगत जीवन बताये बिना वे उस आश्रम में मात्र सूखी पत्तियाँ खाकररहते थे।

वास्तव में वे अकेले न थे क्योंकि उनके साथ परमात्मा जो थे।

इस प्रकार वे इस मृगशरीर के अन्त की प्रतीक्षा करते रहे।

अन्त में उस तीर्थस्थल में स्नान करते हुए उन्होंने वह शरीर छोड़ दिया।

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