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अध्याय छह: भगवान ऋषभदेव की गतिविधियाँ

5.6राजोबाचन नूनं भगव आत्मारामाणां योगसमीरितज्ञानावभर्जितकर्मबीजानामैश्वर्याणि पुनः क्लेशदानिभवितुमईन्ति यहच्छयोपगतानि ॥

१॥

राजा उवाच--राजा परीक्षित ने पूछा; न--नहीं; नूनम्‌--निस्सन्देह; भगव:--हे सर्वशक्तिमान शुकदेव गोस्वामी;आत्मारामाणाम्‌--भक्ति में रत विशुद्ध भक्तों का; योग-समीरित--योग साधना से प्राप्त; ज्ञान--ज्ञान से; अवभर्जित--दग्ध;कर्म-बीजानाम्‌--कर्मरूपी बीजों का; ऐश्वर्याणि--योग शक्तियों से; पुन:--फिर; क्लेशदानि--क्लेश के कारण; भवितुम्‌ू--होने में; अर्हन्ति--समर्थ हैं; यहच्छया--स्वतः, स्वयं ही; उपगतानि--प्राप्त हो जाती हैं।

राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा--हे भगवन्‌, जो पूर्णरूपेण विमल हृदय हैं उन्हेंभक्तियोग से ज्ञान प्राप्त होता है और सकाम कर्म के प्रति आसक्ति जलकर राख हो जाती है।

ऐसेव्यक्तियों में योग शक्तियाँ स्वतः उत्पन्न होती हैं।

इनसे किसी प्रकार का क्लेश नहीं पहुँचता, तोफिर ऋषभदेव ने उनकी उपेक्षा क्यों की ?

ऋषिरुवाचसत्यमुक्त किन्त्विह वा एके न मनसोउद्धा विश्रम्भभनवस्थानस्य शठकिरात इव सड्डभच्छन्ते ॥

२॥

ऋषि: उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; सत्यम्‌--सत्य वचन; उक्तम्‌--कहा गया; किन्तु--लेकिन; इह--इस संसार में;वा--अथवा; एके --कुछ; न--नहीं; मनस: --मन का; अद्धा- प्रत्यक्ष, साक्षात्‌; विश्रम्भम्‌-विश्वासपात्र; अनवस्थानस्य--अस्थिर होकर; शठ--अत्यन्त चालाक; किरात:--बहेलिया; इव--सहश; सड़च्छन्ते--हो जाते हैं।

श्रील शुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया--हे राजन, तुमने बिल्कुल सत्य कहा है।

किन्तु जिसप्रकार चालाक बहेलिया पशुओं को पकड़ने के बाद उन पर विश्वास नहीं करता, क्योंकि वेभाग सकते हैं।

उसी प्रकार महापुरुष अपने मन पर भरोसा नहीं करते।

दरअसल, वे सदाजागरूक रहते हुए मन की गति पर नजर रखे रहते हैं।

तथा चोक्तम्‌--न कुर्यात्कर्हिचित्सख्यं मनसि ह्ानवस्थिते ।

यद्विश्रम्भाच्चिराच्चीर्ण चस्कन्द तप ऐश्वरम्‌ ॥

३॥

तथा--इस प्रकार; च--और; उक्तम्‌--कहा गया है; न--कदापि नहीं; कुर्यात्‌--करना चाहिए; कर्हिचित्‌ू--किसी समय याकिसी से; सख्यम्‌--मित्रता; मनसि--मन से; हि--निश्चय ही; अनवस्थिते--चंचल; यत्‌--जिसमें; विश्रम्भात्‌-- अत्यधिकविश्वास करने से; चिरात्‌ू--दीर्घ काल तक; चीर्णम्‌--अभ्यास की गई; चस्कन्द--विचलित हो गयी; तपः--तपस्या; ऐ श्वरम्‌--शिव तथा सौभरि जैसे महापुरुषों की।

सभी विद्वानों ने अपने-अपने मत व्यक्त किये हैं।

मन स्वभाव से अत्यन्त चंचल है।

मनुष्यको चाहिए कि वे इससे मित्रता न करे।

यदि हम मन पर पूर्ण विश्वास करते हैं, तो यह किसीक्षण धोखा दे सकता है।

यहाँ तक कि शिवजी श्रीकृष्ण के मोहिनी रूप को देखकर उत्तेजित होउठे और सौभरि मुनि भी योग की सिद्धावस्था से च्युत हो गये।

नित्यं ददाति कामस्य चिछिद्रं तमनु येडरयः ।

योगिनः कृतमैत्रस्य पत्युर्जायेव पुंश्चली ॥

४॥

नित्यमू--सदा; ददाति--देता है; कामस्थ--विषय की; छिद्रम्‌ू--सुविधा; तम्‌--वह ( विषय ); अनु--पीछा करता हुआ; ये--जो; अरयः--शत्रुजन; योगिन:--आध्यत्मिक जिवन में प्रगति की इच्छा करनेवाला अथवा योगियों का; कृत-मैत्रस्थ--मन मेंविश्वास करके; पत्यु:--पति का; जाया इब--पत्नी के समान; पुंश्वली--व्यभिचारिणीजार पुरुषों के बहकावे में आने वालीस्त्री ?

व्यभिचारिणी स्त्री जार पुरुषों के बहकावे में आसानी से आकर कभी कभी अपने पति काउनसे बध करवा देती है।

यदि योगी अपने मन के ऊपर संयम नहीं रखता और उसे अवसर(छूट ) प्रदान करता है, तो उसका मन एक प्रकार से काम, क्रोध तथा लोभ जैसे शत्रुओं कोप्रश्रय देगा है, जो निश्चय ही योगी को मार डालेंगे।

कामो मन्युर्मदो लोभ: शोकमोहभयादय: ।

कर्मबन्धश्न यन्मूल: स्वीकुर्यात्को नु तद्दुध: ॥

५॥

'कामः--विषय ; मन्यु;--क्रो ध; मदः--घमंड; लोभ:--लालच; शोक --पश्चात्ताप; मोह--मोह; भय--_डर; आदय:--ये सभी;कर्म-बन्ध: --सकाम कर्म के लिए बन्धन स्वरूप; च--तथा; यत्‌-मूल:--जिसका कारण; स्वीकुर्यात्‌-- स्वीकार करेगा;कः--कौन; नु--निस्संदेह; तत्‌--वह मन; बुध:--यदि बुद्धिमान है।

काम, क्रोध, मद, लोभ, पश्चाताप, मोह तथा भय का मूल कारण तो मन ही है।

ये सारेमिल कर कर्म-बन्धन की रचना करते हैं।

भला कौन बुद्धिमान मन पर विश्वास कर सकेगा ?

अथेवमखिललोकपालललामोपि विलक्षणैर्जडवदवधूतवेषभाषाचरितैरविलक्षितभगवत्प्रभावो योगिनांसाम्परायविधिमनुशिक्षयन्स्वकलेवरं जिहासुरात्मन्यात्मानमसंव्यवहितमनर्थान्तरभावेनान्वी क्षमाणउपरतानुवृत्तिरुपरराम ॥

६॥

अथ-तत्पश्चात्‌; एवम्‌--इस प्रकार से; अखिल-लोक-पाल-ललाम:--इस ब्रह्माण्ड के समस्त राजाओं के प्रमुख; अपि--यद्यपि; विलक्षणै:--विभिन्न; जड-वत्‌--जड़-सदृश ( मूढ़ के समान ); अवधूत-वेष- भाषा-चरितै:-- अवधूत के वेष, उसकीभाषा तथा आचरण से; अविलक्षित-भगवत्‌-प्रभाव:-- भगवान्‌ के ऐश्वर्य को छिपाते हुए ( अपने को सामान्य पुरुष की तरहरखते हुए ); योगिनामू--योगियों का; साम्पराय-विधिम्‌--इस देह के त्याग की विधि; अनुशिक्षयन्‌--सिखाते हुए; स्व-कलेवरम्‌--अपने शरीर को जो किंचित्मात्र भौतिक नहीं था; जिहासु:--सामान्य मनुष्य की भाँति त्यागने की इच्छा से;आत्मनि--आदिपुरुष वासुदेव में; आत्मानम्‌--अपने आप, भगवान्‌ विष्णु के ' आवेश-अवतार ' होने से ऋषभदेव स्वयं को;असंव्यवहितम्‌ू--माया के व्यवधान के बिना; अनर्थ-अन्तर-भावेन--विष्णुपद में स्वयं; अन्वीक्षमाण:-- सदैव देखते हुए;उपरत-अनुवृत्ति:--ऐसा दिखा रहे थे मानो अपना भौतिक शरीर त्याग रहे हों; उपरराम--राजा के रूप में इस लोक की लीलाएँछोड़ दीं?

भगवान्‌ ऋषभदेव इस ब्रह्माण्ड के समस्त राजाओं में प्रमुख थे, किन्तु अवधूत का भेष तथाउसकी भाषा स्वीकार करके वे इस प्रकार आचरण कर रहे थे मानो जड़ तथा बद्ध जीव हों।

'फलतः कोई उनके ईश्वरीय ऐश्वर्य को नहीं देख सका।

उन्होंने योगियों को देह त्यागने की विधिसिखाने के लिए ही ऐसा आचरण किया; तो भी वे वासुदेव कृष्ण के अंश रूप बने रहे।

इसदशा में रहते हुए उन्होंने इस संसार में भगवान्‌ ऋषभदेव के रूप में की गईं लीलाओं को त्यागदिया।

यदि कोई ऋषभदेव के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए इस सूक्ष्म देह को त्याग सकताहै, तो उसे पुनः भौतिक देह नहीं धारण करनी पड़ती।

तस्य ह वा एवं मुक्तलिड्रस्य भगवत ऋषभस्य योगमायावासनया देह इमां जगतीमभिमानाभासेनसड्क्रममाण: कोड्डवेड्डकुटकान्दक्षिणकर्णाटकान्देशान्यदच्छयोपगत: कुटकाचलोपवन आस्यकृताश्मकवल उन्माद इव मुक्तमूर्थजोसंवीत एवं विचचार, ॥

७॥

तस्य--उस ( भगवान्‌ ऋषभदेव ) का; ह वा--मानो; एवम्‌--इस प्रकार; मुक्त-लिड्डस्य--जिसका स्थूल व सूक्ष्म शरीरों केसाथ तादात्म्य नहीं है; भगवत:-- भगवान का; ऋषभस्य--ऋषभदेव का; योग-माया-वासनया-- भगवान्‌ की लीलाओं हेतुयोगमाया की प्राप्ति से; देह:--देह; इमाम--यह; जगतीम्‌--पृथ्वी; अभिमान-आभासेन--यह देह भौतिक तत्त्वों से निर्मित है,इस प्रकार के आभास से; सड्क्रममाण:-- भ्रमण करते हुए; कोड्जू-वेड्ड-कुटकान्‌--कोंक, वेंक तथा कुटक; दक्षिण--दक्षिणभारत में; कर्णाटकानू--कर्नाट राज्य में; देशान्‌--समस्त देशों; यहच्छया-- अपनी इच्छा से; उपगतः--पहुँचे; कुटकाचल-उपवने--कुटकाचल के निकटस्थ जंगल में; आस्य--मुँह के भीतर; कृत-अश्म-कवल:--मुँह में पत्थर भर कर; उन्मादः इब--पागल के समान; मुक्त-मूर्थज: --मुक्त ( बिखरे ) केशों से युक्त; असंबीत:--नग्न; एब--ही; विचचार-- भ्रमण करने लगे?

वास्तव में भगवान्‌ ऋषभदेव के कोई भौतिक शरीर न था, किन्तु योगमाया से वे अपनेशरीर को भौतिक मान रहे थे।

अतः सामान्य मनुष्य की भाँति आचरण करके उन्होंने वैसीमानसिकता का त्याग किया।

वे संसार भर में घूमने लगे।

घूमते-घूमते वे दक्षिण भारत केकर्णाट प्रदेश में पहुँचे जहाँ के रास्ते में कोंक, वेंक तथा कुटक पड़े।

इस दिशा में घूमने कीउनकी कोई योजना न थी, किन्तु कुटकाचल के निकट उन्होंने एक जंगल मे प्रवेश किया।

उन्होंने अपने मुँह में पत्थर के टुकड़े भर लिए और जंगल में नग्न तथा बाल बिखेरे पागल कीभाँति घूमने लगे।

अथ समीरवेगविधूतवेणुविकर्षणजातोग्रदावानलस्तद्वनमालेलिहान: सह तेन ददाह ॥

८॥

अथ--तत्पश्चात्‌; समीर-वेग--वायु के झोंके से; विधूत--झकझोरे हुए; वेणु--बाँसों की; विकर्षण--रगड़ से; जात--उत्पन्नहुईं; उग्र--प्रबल; दाव-अनलः: --दावाग्नि; तत्‌--उस; वनम्‌--कुटकाचल के निकट के जंगल को; आलेलिहान:--चारों ओरसे भक्षण करती; सह--संग; तेन--वह शरीर; ददाह--जल कर राख हो गया।

जब वे भटक रहे थे तो प्रबल दावाग्नि लग गई।

यह अग्नि वायु से झकझोरे गये बाँसों कीरगड़ से उत्पन्न हुई थी।

इस अग्नि में कुटकाचल का पूरा जंगल तथा ऋषभदेव का शरीरभस्मसात्‌ हो गए।

यस्य किलानुचरितमुपाकर्णय्य कोड्डूवेड्डकुटकानां राजाईन्नामोपशिक्ष्य कलावधर्म उत्कृष्यमाणेभवितव्येन विमोहितः स्वधर्मपथमकुतो भयमपहाय कुपथपाखण्डमसमझ्जसं निजमनीषया मन्दःसम्प्रवर्तयिष्यते ॥

९॥

यस्य--जिस ( भगवान्‌ ऋषभदेव ) का; किल अनुचरितम्‌ू--परमहंस के रूप में लीलाएँ, वर्णाश्रम सिद्धान्त के नियमों से परे;उपाकर्ण्य--सुन कर; कोड्ड-वेड्ग-कुटकानाम्‌-कोंक, वेंक तथा कुटक का; राजा--राजा; अहत्‌-नाम--जिसका नाम अहत्‌( अब जैन कहलाता है ) था; उपशिक्ष्य--परमहंस रूप में भगवान्‌ ऋषभदेव के कार्यों का अनुकरण करके; कलौ--इसकलियुग में; अधर्मे उत्कृष्ममाणे--अधर्म की वृद्धि के कारण; भवितव्येन-- भावी द्वारा; विमोहित:--मोहित; स्व-धर्म-पथम्‌--धर्म-पथ; अकुतः-भयम्‌--समस्त प्रकार के भयों से मुक्त; अपहाय--त्याग कर ( यथा स्वच्छता, सत्यभाषण, इन्द्रियनिग्रह,सादगी, धर्माचरण, ज्ञान का सद्प्रयोग ); कु-पथ-पाखण्डम्‌--नास्तिकता का बुरा ( उल्टा ) मार्ग; असमझसम्‌ू--वेदविरुद्ध,अनुचित; निज-मनीषया--अपने मस्तिष्क से; मन्दः--मूढ़; सम्प्रवर्तयिष्यते-- प्रचार करेगा, चलायेगा।

शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को आगे बताया कि हे राजन, कोंक, बेंक तथाकुटक के राजा ने, जिसका नाम अर्हत्‌ था, ऋषभदेव के कार्य-कलापों के विषय में सुना औरउसने ऋषभदेव के नियमों का अनुकरण करते हुए एक नवीन धर्म-पद्धति चला दी।

पापमयकर्मो के इस युग, कलियुग, का लाभ उठाकर मोहवश राजा अर्हत ने बाधारहित वैदिक नियमोंको छोड़ दिया और वेदविरुद्ध एक नवीन धर्म-पद्धति गढ़ ली।

यही जैन धर्म का शुभारम्भ था।

अन्य अनेक तथाकथित धर्मों ने इस नास्तिकवाद को ग्रहण किया।

येन ह वाव कलौ मनुजापसदा देवमायामोहिता: स्वविधिनियोगशौचचारित्रविहीना देवहेलनान्यपब्रतानिनिजनिजेच्छया गृह्ञाना अस्नानानाचमनाशौचकेशोल्लुञ्लननादीनि कलिनाधर्मबहुलेनोपहतधियोब्रह्मत्राह्णयज्ञपुरुषलोकविदूषका: प्रायेण भविष्यन्ति, ॥

१०॥

येन--जिस छढ्म धार्मिक प्रकृति से; ह वाव--निश्चय ही; कलौ--इस कलियुग में; मनुज-अपसदा: --अत्यन्त नीच व्यक्ति; देव-माया-मोहिता:-- भगवान्‌ की बहिरंगा शक्ति द्वारा मोहग्रस्त, शक्ति या माया से मोहित; स्व-विधि-नियोग-शौच-चारित्र-विहीना:--अपने कर्तव्यों के अनुसार निर्मित विधानों, स्वच्छता तथा चरित्र से विहीन ( शास्त्र विहित आचारों तथा शौच सेरहित ); देव-हेलनानि-- भगवान्‌ के प्रति तिरस्कार; अपब्रतानि--अपवित्र व्रत, पाखंड; निज-निज-इच्छया-- अपनी अपनीरुचि के अनुसार; गृह्नाना: --स्वीकार करते हुए; अस्नान-अनाचमन-अशौच-केश-उल्लुञ्लनन-आदीनि--गढ़े हुए धार्मिक नियमयथा अस्नान ( न नहाना ), मुख न धोना, अशुद्ध रहना तथा केश नुचवाना; कलिना--कलियुग के प्रभाव से; अधर्म-बहुलेन--अधर्म की बहुलता वाले; उपहत-धिय:ः--जिसका अन्तःकरण विनष्ट हो गया है, बुद्द्धिहीन; ब्रह्म-ब्राह्मण-यज्ञ-पुरुष-लोक-विदूषका:--वेद, ब्राह्मण, यज्ञ, भगवान्‌ तथा भक्तों की निन्‍्दा करने वाले; प्रायेण--प्राय:; भविष्यन्ति--हों गे?

अधम तथा परमेश्वर की माया से मोहित व्यक्ति मूल वर्णाश्रम धर्म तथा उसके नियमों कापरित्याग कर देंगे।

वे नित्य तीन बार स्नान करना और ईश्वर की आराधना करना छोड़ देंगे।

वेशौच तथा परमेश्वर को त्याग कर अटपटे नियमों को ग्रहण करेंगे।

नियमित स्नान न करनेअथवा अपना मुख न धोने से वे सदा गंदे रहेंगे और अपने केश नुचवाएँगे।

ढोंग धर्म काअनुसरण करते हुए वे फूलेंगे, फलेंगे।

इस कलिकाल में लोग अधार्मिक पद्धतियों की ओरअधिक उन्मुख होंगे।

फलस्वरूप वे वेद, वेदों के अनुयायी ब्राह्मणों, भगवान्‌ तथा अनेक भक्तोंका उपहास करेंगे।

ते च ह्ार्वाक्तनया निजलोकयात्रयान्धपरम्परया श्रस्तास्तमस्यन्धे स्वयमेव प्रपतिष्यन्ति, ॥

११॥

ते--वे लोग जो वेदों का अनुसरण नहीं करते; च--तथा; हि--निश्चय ही; अर्वाक्तनया--वैदिक धर्म के शाश्वत नियमों सेविचलित होकर; निज-लोक-यात्रया--स्वेच्छाकृत प्रवृत्ति से; अन्ध-परम्परया--अन्धे अज्ञानी पुरुषों की परम्परा से;आश्वस्ता:--प्रोत्साहित होकर; तमसि--अज्ञान के अंधकार में; अन्धे--अंधापन; स्वयम्‌ एब-- अपने आप; प्रपतिष्यन्ति--गिरेंगे?

अधम लोग अपने अज्ञानवश वैदिक नियमों से हटकर चलने वाली धार्मिक प्रणाली कासूत्रपात करते हैं।

वे अपने मानसिक ढोंगों के कारण स्वयं ही घोर अंधकार में गिरते हैं।

अयमवतारो रजसोपप्लुतकैवल्योपशिक्षणार्थ: ॥

१२॥

अयम्‌ अवतार:--यह अवतार ( भगवान्‌ ऋषभदेव ); रजसा--रजोगुण से; उपप्लुत-- भरा हुआ; कैवल्य-उपशिक्षण-अर्थ:--लोगों को मुक्ति मार्ग की शिक्षा देने के उद्देश्य से।

इस कलियुग में लोग रजो तथा तमो गुणों से भरे हुए हैं।

भगवान्‌ ऋषभदेव ने इन लोगों कोमाया के चंगुल से छुड़ाने के लिए ही अवतार लिया था।

तस्यानुगुणानएलोकान्गायन्ति--अहो भुव: सप्तसमुद्रवत्याद्वीपेषु वर्षेष्वधिपुण्यमेतत्‌ ।

गायन्ति यत्रत्यजना मुरारेःकर्माणि भद्राण्यवतारवन्ति ॥

१३॥

तस्य--उसके ( ऋषभदेव के ); अनुगुणानू--मुक्ति के उपदेशों के अनुसार; श्लोकान्‌ू--श्लोक; गायन्ति--गाते हैं, जप करते हैं;अहो--ओह; भुव:--इस पृथ्वी लोक का; सप्त-समुद्र-वत्या:--सात समुद्रों वाले; द्वीपेषु--द्वीपों में से; वर्षषु -- भूभागों में से;अधिपुण्यम्‌ू--अन्य किसी द्वीप से अधिक पवित्र; एतत्‌--यह ( भारत-वर्ष ); गायन्ति--गायन करते हैं; यत्रत्य-जना:--इसभूभाग के लोग; मुरारे:-- भगवान्‌ मुरारी के; कर्माणि--कार्यो का; भद्गराणि--शुभ; अवतारवन्ति--अनेक अवतारों में?

यथा ऋषभदेव विद्वानजन भगवान्‌ ऋषभदेव के दिव्य गुणों का जाप इस प्रकार करते हैं--' ओह! इसपृथ्वीलोक में सात समुद्र तथा अनेक द्वीप और वर्ष हैं जिनमें से भारतवर्ष सबसे अधिक पवित्रहै।

भारतवर्ष के लोग भगवान्‌ के कार्यकलापों का, ऋषभदेव तथा अन्य अनेक अवतारों केरूप में, गुणगान करने के अभ्यस्त हैं।

ये सारे कार्य मानवता के कल्याण हेतु अत्यन्त शुभ हैं।

अहो नु वंशो यशसावदातःप्रैयव्नतो यत्र पुमान्पुराण: ।

कृतावतारः पुरुष: स आद्य-श्वचार धर्म यदकर्महेतुम्‌ू ॥

१४॥

अहो--ओह; नु--निस्संदेह; वंश:--वंश; यशसा--चतुर्दिक ख्याति से; अवदात:--अत्यन्त विमल; प्रैयव्रतः--राजा प्रियत्रतका; यत्र--जिसमें; पुमानू-- परम पुरुष; पुराण:--आदि; कृत-अवतार:-- अवतार लेकर; पुरुष:-- भगवान्‌; सः --उसने;आद्यः--आदि-पुरुष; चचार--आचरण किया; धर्मम्‌-धार्मिक नियम; यत्‌--जिससे; अकर्म-हेतुमू-कर्मो के अन्त काकारण?

ओह! भला मैं प्रियत्रत के वंश के सम्बन्ध में क्या कहूँ जो इतना विमल तथा अत्यन्तविख्यात है।

इसी वंश में परम पुरुष भगवान्‌ ने अवतार लिया और कर्मफलों से मुक्त करने वालेधार्मिक नियमों का आचरण किया।

को न्वस्य काष्ठामपरो नुगच्छे-न्मनोरथेनाप्यभवस्य योगी ।

यो योगमाया:ः स्पृहयत्युदस्ताहासत्तया येन कृतप्रयत्ना: ॥

१५॥

कः--कौन; नु--निस्संदेह; अस्य-- भगवान्‌ ऋषभदेव का; काष्ठाम्‌--आदर्श; अपरः--अन्य; अनुगच्छेत्‌-- अनुगमन करसकता है; मनः-रथेन--मन से; अपि-- भी; अभवस्यथ-- अजन्मा का; योगी--योगी; य:--जो; योग-माया: --योग सिद्धि;स्पृहयति--स्पृहा करता है, कामना करता है; उदस्ता:--ऋषभदेव द्वारा परित्यक्त; हि--ही; असत्तया--अपूर्ण होने से, असत्‌ से;येन--जिसके द्वारा ( ऋषभदेव द्वारा ); कृत-प्रयत्ता:--यद्यपि सेवा करने के लिए इच्छुक |

'भला ऐसा कौन योगी है जो अपने मन से भी भगवान्‌ ऋषभदेव के आदर्शों का पालन कर सके ? उन्होंने उन समस्त योग-सिद्ध्रियों का तिरस्कार कर दिया था जिसके लिए अन्य योगीलालायित रहते हैं।

भला ऐसा कौन योगी है जो भगवान्‌ ऋषभदेव की समता कर सके ?

इति ह सम सकलवेदलोकदेवब्राह्मणगवां परमगुरोर्भगवत ऋषभाख्यस्य विशुद्धाचरितमीरितं पुंसांसमस्तदुश्चरिताभिहरणं परममहामड्रलायनमिदमनुश्रद्धयोपचितयानु श्रुणोत्या श्राववति वावहितो भगवतितस्मिन्वासुदेव एकान्ततो भक्तिरनयोरपि समनुवर्तते ॥

१६॥

इति--इस प्रकार; ह स्म--निस्संदेह; सकल--सम्पूर्ण; वेद--ज्ञान का; लोक--जनता का; देव--देवताओं का; ब्राह्मण--समस्त ब्राह्मणों का; गवाम्‌ू--गायों का; परम--परम; गुरोः--गुरु, स्वामी; भगवत:--भगवान्‌ का; ऋषभ-आख्यस्य--जिसका नाम ऋषभ था; विशुद्ध-शुद्ध; आचरितम्‌ू--कार्यकलाप; ईरितम्‌--अब व्याख्या किया गया; पुंसाम्‌-प्रत्येकजीवात्मा का; समस्त--सम्पूर्ण ; दुश्चरित--पाप कर्म; अभिहरणम्‌--विनाश करते हुए; परम--अग्रणी; महा--महान्‌; मड़ल--कल्याण का; अयनम्‌--वास, शरण, घर; इदम्‌--यह; अनुश्रद्धया-- श्रद्धा से; उपचितया--बढ़ती हुई; अनुश्वूणोति--अधिकारी से सुनता है; आश्राववति--दूसरे से कहता है; वा--अथवा; अवहित:ः--सावधान होकर; भगवति-- भगवान्‌ में;तस्मिन्‌ू--उस; वासुदेवे--वासुदेव, श्रीकृष्ण में; एक-अन्ततः--एकान्त भाव से; भक्ति: -- भक्ति; अनयो:--श्रोता तथा वक्तादोनों समूहों का; अपि--निश्चय ही; समनुवर्तते--वास्तव में प्रारम्भ होती है।

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा, 'ऋषभदेव समस्त वैदिक ज्ञान, मनुष्यों, देवताओं, गायोंतथा ब्राह्मणों के स्वामी हैं।

मैं पहले ही उनके विशुद्ध, दिव्य कार्य-कलापों का विस्तार से वर्णनकर चुका हूँ जिनसे समस्त जीवात्माओं के पापकर्म मिट जाएँगे।

भगवान्‌ ऋषभदेव कीलीलाओं का यह वर्णन समस्त मंगल वस्तुओं का आगार है।

जो भी आचार्यों का अनुसरणकरते हुए इन्हें ध्यान से सुनता या कहता है उसे निश्चय ही भगवान्‌ वासुदेव के चरणकमलों कीशुद्ध भक्ति प्राप्त होगी।

' यस्यामेव कवय आत्मानमविरतं विविधवृजिनसंसारपरितापोपतप्यमानमनुसवनं स्नापयन्तस्तयैव परयानिर्व॒त्या ह्यापवर्गमात्यन्तिकं परमपुरुषार्थमपि स्वयमासादितं नो एवाद्रियन्ते भगवदीयत्वेनैव'परिसमाप्तसर्वार्था: ॥

१७॥

यस्याम्‌ एब--जिसमें ( कृष्णभावनामृत अथवा भक्ति के अमृत में ); कवय:--पण्डित जन, आध्यात्मिक जीवन का दार्शनिक;आत्मानम्‌--आत्म, स्वयं; अविरतम्‌--निरन्तर; विविध-- अनेक; वृजिन--पापपूर्ण; संसार-- भौतिक संसार में; परिताप--दुखोंसे; उपतप्यमानम्‌--तपे हुए, दुखी; अनुसवनम्‌--निरन्तर; स्नापयन्त:ः --स्नान करते हुए; तया--उससे; एब--निश्चय ही;परया--महान्‌; निर्व॒त्या--प्रसन्नतापूर्वक; हि--ही; अपवर्गम्‌--मुक्ति; आत्यन्तिकम्‌--बिना अवरोध के, निरन्तर; परम-पुरुष-अर्थम्‌--मानवी सफलताओं में सर्वश्रेष्ठ; अपि--यद्यपि; स्वयम्‌--स्वयं; आसादितमू--प्राप्त; नो--नहीं; एव--निश्चय ही;आद्वियन्ते--प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं; भगवदीयत्वेन एव-- भगवान्‌ से सम्बन्ध होने के कारण; परिसमाप्त-सर्व-अर्था: --जिनकी समस्त भौतिक कामनाओं का अन्त हो चुका है।

भक्त जन भौतिक संसार के विभिन्न संकटों से मुक्त होने के लिए निरन्तर भक्ति-सरिता मेंस्नान करते रहते हैं।

इससे उन्हें परम आनन्द प्राप्त होता है और साक्षात्‌ मुक्ति उनकी सेवा करनेआती है।

तो भी वे उस सेवा को स्वीकार नहीं करते, भले ही भगवान्‌ स्वयं क्‍यों न सेवा के लिएतत्पर हों।

भक्तों के लिए मुक्ति महत्त्वहीन है, क्योंकि ईश्वर की दिव्य प्रेमाभक्ति प्राप्त हो जाने परउनकी प्रत्येक आकांक्षा पूरी हो गई होती है और वे समस्त भौतिक कामनाओं से ऊपर उठ चुकेहोते हैं।

राजन्पतिर्गुरुरलं भवतां यदूनांदेव प्रियः कुलपति: क्व च किड्डरो व: ।

अस्त्वेवमड़ भगवान्भजतां मुकुन्दोमुक्ति ददाति कर्हिचित्स्म न भक्तियोगम्‌ ॥

१८॥

राजनू--हे राजन; पति:--पालक; गुरुः--गुरु; अलमू--निश्चय ही; भवताम्‌--आपका; यदूनाम्‌ू--यदुवंश का; दैवम्‌--आरशध्य श्रीविग्रह; प्रियः--अत्यन्त प्रिय मित्र; कुल-पति:--वंश का स्वामी; क्व च--यहाँ तक कि कभी-कभी; किड्डर: --सेवक; वः--तुम सबका ( पांडवों का ); अस्तु--हो; एवम्‌--इस प्रकार; अड्ग--हे राजा; भगवान्‌-- भगवान्‌; भजताम्‌--सेवामें रत भक्तों का; मुकुन्दः--भगवान्‌; मुक्तिम्‌--मुक्ति; ददाति--देता है; कर्हिचित्‌ू--किसी भी समय; स्म--निस्सन्देह; न--नहीं; भक्ति-योगम्‌-प्रेमा भक्ति |

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा--हे राजन, परम पुरुष मुकुन्द सभी पांडवों तथा यदुवंशियोंके वास्तविक पालक हैं।

वे तुम्हारे गुरु, आराध्य अर्चाविग्रह, मित्र तथा तुम्हारे कर्मों के निदेशकहैं।

यही नहीं, वे कभी-कभी दूत या सेवक के रूप में भी तुम्हारे परिवार की सेवा करते हैं।

इसका अर्थ यह हुआ कि वे सामान्य सेवकों की तरह कार्य करते हैं।

जो ईश्वर की सेवा में लगेरहकर प्रिय पात्र बनना चाहते हैं उन्हें मुक्ति सरलता से मिल जाती है, किन्तु वे अपनी प्रत्यक्ष सेवाकरने का अवसर बहुत उनसे कम ही प्रदान करते हैं।

नित्यानुभूतनिजलाभनिवृत्ततृष्ण:श्रेयस्थतद्गरचचनया चिरसुप्तबुद्धे: ।

लोकस्य यः करुणयाभयमात्मलोकम्‌आख्थान्नमो भगवते ऋषभाय तस्मै ॥

१९॥

नित्य-अनुभूत--अपने वास्तविक रूप के प्रति सदैव जागरूक होने के कारण; निज-लाभ-निवृत्त-तृष्ण:--अपने में पूर्ण होनेके कारण, कामनारहित; श्रेयसि--जीवन के वास्तविक कल्याण में; अ-तत्‌-रचनया--देह को आत्मा मानकर भौतिक क्षेत्र में कर्मो का प्रसार करके; चिर--दीर्घकाल तक; सुप्त--सोया हुआ; बुद्धेः--जिसकी बुद्धि; लोकस्य--लोगों का; यः--जो( भगवान्‌ ऋषभदेव ); करुणया--अहैतुकी कृपा से; अभयम्‌--निर्भय; आत्म-लोकम्‌--आत्म-स्वरूप; आख्यात्‌--उपदेशदिया; नमः --नमस्कार है; भगवते-- भगवान्‌; ऋषभाय--ऋषभदेव को; तस्मै-- उस |

भगवान्‌ ऋषभदेव को अपने वास्तविक स्वरूप का बोध था, अतः वे आत्म-तुष्ट थे औरउन्हें किसी बाह्म तुष्टि की आकांक्षा नहीं रह गई थी।

अपने में पूर्ण होने के कारण उन्हें किसीसफलता की स्पूहा नहीं थी।

जो वृथा ही देहात्मबुद्धि में लगे रहते हैं और भौतिकता का परिवेशतैयार करते हैं, वे अपने वास्तविक हित को नहीं पहचानते।

भगवान्‌ ऋषभदेव ने अहैतुकीकृपावश वास्तविक आत्मबुद्धि तथा जीवन लक्ष्य की शिक्षा दी।

अतः हम उन भगवान्‌ ऋषभदेवको नमस्कार करते हैं।

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