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अध्याय पाँच: भगवान ऋषभदेव की अपने पुत्रों को शिक्षाएँ
5.5ऋषभ उबाचनाय॑ देहो देहभाजां नूलोकेकष्टान्कामानईते विड्भुजां ये ।
तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वंशुद्धबरेद्यस्माह्ह्मसौख्य॑ त्वनन्तम् ॥
१॥
ऋषभ: उवाच-- भगवान् ऋषभ ने कहा; न--नहीं; अयम्--यह; देह: --शरीर; देह-भाजाम्-- समस्त देहधारियों का; नू-लोके--इस संसार में; कष्टान्--कष्टकारक; कामान्--इन्द्रियतृप्ति, विषय; अरईते--चाहिए; विट्-भुजाम्--विष्ठा खाने वालोंका; ये--जो; तपः--तपस्या; दिव्यम्--दिव्य; पुत्रका: --हे पुत्रो; येन--जिसके द्वारा; सत्त्म्--हृदय; शुद्धग्रेत्--पवित्र होताहै; यस्मात्--जिससे; ब्रह्म-सौख्यम्ू-- आध्यात्मिक आनन्द; तु--निश्चय ही; अनन्तम्--अनन्त।
भगवान् ऋषभदेव ने अपने पुत्रों से कहा--हे पुत्रो, इस संसार के समस्त देहधारियों में जिसेमनुष्य देह प्राप्त हुईं है उसे इन्द्रियतृप्ति के लिए ही दिन-रात कठिन श्रम नहीं करना चाहिएक्योंकि ऐसा तो मल खाने वाले कूकर-सूकर भी कर लेते हैं।
मनुष्य को चाहिए कि भक्ति कादिव्य पद प्राप्त करने के लिए वह अपने को तपस्या में लगाये।
ऐसा करने से उसका हृदय शुद्धहो जाता है और जब वह इस पद को प्राप्त कर लेता है, तो उसे शाश्वत जीवन का आनन्द मिलताहै, जो भौतिक आनंद से परे है और अनवरत चलने वाला है।
महत्सेवां द्वारमाहुर्विमुक्ते-स्तमोद्वारं योषितां सड्भिसड्रम् ।
महान्तस्ते समचित्ता: प्रशान्ताविमन्यव: सुहृदः साधवो ये ॥
२॥
महत्-सेवाम्-- आध्यात्मिक रूप से उन्नत व्यक्ति जिन्हें महात्मा कहा जाता है, उन की सेवा; द्वारम्-मार्ग; आहुः--कहते हैं;विमुक्ते:--मुक्ति का; तमः-द्वारमू--नारकीय अंधकारमय जीवन का मार्ग; योषिताम्--स्त्रियों की; सड्धि--साथियों की;सड्डम्--संगति, साथ; महान्त:--महात्मा; ते--वे; सम-चित्ता:--सब प्राणियों को समभाव से देखने वाले; प्रशान्ता:--अत्यन्तशान्त, ब्रह्म या भगवान् में लीन; विमन््यव:--क्रोधहीन; सुहृदः --प्रत्येक प्राणी के शुभचिन्तक; साधव:--अनिंद्य आचरण वालेयोग्य भक्त; ये--जो?
आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत महापुरुषों की सेवा करके ही मनुष्य भव-बन्धन से मुक्ति का मार्गप्राप्त कर सकता है।
ये महापुरुष निर्विशेषवादी तथा भक्त होते हैं।
ईश्वर से तदाकार होने अथवाभगवान् का संग प्राप्त करने के इच्छुक प्रत्येक मनुष्य को महात्माओं की सेवा करनी चाहिए।
ऐसे कर्मों में रुचि न रखने वाले लोग, जो स्त्री तथा मैथुन प्रेमी व्यक्तियों की संगति करते हैंउनके लिए नरक का द्वार खुला रहता है।
महात्मा समभाव वाले होते हैं।
वे एक जीवात्मा तथादूसरे में कोई अन्तर नहीं देखते।
वे अत्यन्त शान्त होते हैं और भक्ति में पूर्णतया लीन रहते हैं।
वेक्रोधरहित होते हैं और सभी के कल्याण के लिए कार्य करते हैं।
वे कोई निंद्य आचरण नहीं करते।
ऐसे व्यक्ति महात्मा कहलाते हैं।
ये वा मयीशे कृतसौहदार्थाजनेषु देहम्भरवार्तिकेषु ।
गृहेषु जायात्मजरातिमत्सुन प्रीतियुक्ता यावदर्थाश्च लोके ॥
३॥
ये--जो; वा--अथवा; मयि--मुझ; ईशे-- भगवान् में; कृत-सौहद-अर्था: -- प्रेम बढ़ाने के लिए उत्सुक ( दास्य, सख्य,वात्सल्य या माधुर्य भाव में ); जनेषु--व्यक्तियों में; देहम्भर-वार्तिकेषु--जो शरीर का केवल निर्वाह करना चाहते हैं, जिन्हें मोक्षकी कामना नहीं है; गृहेषु--घर में; जाया-- पत्नी; आत्म-ज--बच्चे, सन््तान; राति--धन या मित्र; मत्सु--से युक्त; न--नहीं;प्रीति-युक्ता:--अत्यन्त आसक्त; यावत्-अर्था:--जितना आवश्यक है उतना ही धन संग्रह करके रहने वाले; च--तथा; लोके--इस भौतिक जगत में।
जो लोग कृष्णचेतना को पुनरुजीवित करने तथा अपना ईश्वर-प्रेम बढ़ाने के इच्छुक हैं, वेऐसा कुछ नहीं करना चाहते जो श्रीकृष्ण से सम्बन्धित न हो।
वे उन लोगों से मेलजोल नहींबढ़ाते जो अपने शरीर-पालन, भोजन, शयन, मैथुन तथा स्वरक्षा में व्यस्त रहते हैं।
वे गृहस्थ होतेहुए भी अपने घरबार के प्रति आसक्त नहीं होते।
वे पत्नी, सन्तान, मित्र अथवा धन में भी आसक्तनहीं होते, किन्तु उसके साथ ही वे अपने कर्तव्यों के प्रति अन्यमनस्क नहीं रहते।
ऐसे पुरुष अपनेजीवन-निर्वाह के लिए जितना धन चाहिए उतना ही संग्रह करते हैं।
नूनं प्रमत्त: कुरुते विकर्मयदिन्द्रियप्रीतय आपृणोति ।
न साधु मन््ये यत आत्मनोय-मसन्नपि क्लेशद आस देह: ॥
४॥
नूनम्--निस्संदेह; प्रमत्त:--मदान्ध; कुरुते--करता है; विकर्म--शास्त्रों में वर्जित पापकर्म; यत्--जब; इन्द्रिय-प्रीतये--इन्द्रियतृष्ति के लिए; आपृणोति--प्रवृत्त होता है; न--नहीं; साधु--अच्छा, उपयुक्त; मन््ये--मानता हूँ; यत:ः--जिससे;आत्मन:--आत्मा का; अयम्--यह; असनू-- क्षण-भंगुर; अपि--यद्यपि; क्लेश-दः--कष्टदायक; आस--सम्भव हो सका;देह:--शरीर।
जब मनुष्य इन्द्रियतृप्ति को ही जीवन का लक्ष्य मान बैठता है, तो वह भौतिक रहन-सहन केपीछे प्रमत्त होकर सभी प्रकार के पापकर्मों में प्रवृत्त होता है।
वह नहीं जानता कि अपने विगतपापकर्मों के ही कारण उसे यह क्षणभंगुर शरीर प्राप्त हुआ है, जो दुखों की खान है।
वास्तव मेंजीवात्मा को भौतिक देह नहीं मिलनी चाहिए थी, किन्तु इन्द्रियतृप्ति के लिए ऐसा हुआ है।
अतःमैं मानता हूँ कि बुद्धिमान प्राणी के लिए यह शोभा नहीं देता कि वह पुनः इन्द्रियतृप्ति के कार्योंमें प्रवृत्त हो, जिससे एक के बाद दूसरा शरीर उसे प्राप्त होता रहता है।
'पराभवस्तावदबोधजातोयावन्न जिज्ञासत आत्मतत्त्वम् ।
यावत्तक्रियास्तावदिदं मनो वैकर्मात्मकं येन शरीरबन्ध: ॥
५॥
पराभव:--हार, कष्ट; तावत्--तब तक; अबोध-जात:--अज्ञान से उत्पन्न; यावत्--जब तक; न--नहीं; जिज्ञासते--जिज्ञासाकरता है; आत्म-तत्त्वम्--आत्मा विषयक सत्य; यावत्--जब तक; क्रिया:--कर्म; तावत्ू--तब तक; इृदम्--यह; मन:--मन;वै--निस्सन्देह; कर्म-आत्मकम्-- कर्मों में व्यस्त; येन--जिसके द्वारा; शरीर-बन्ध: -- भौतिक शरीर का बन्धन, देह बन्धन।
जब तक जीव को आत्म-तत्त्व की जिज्ञासा नहीं होती तब तक उसे अज्ञानजन्य कष्ट भोगनेपड़ते हैं और उसकी पराजय होती रहती है।
कर्म का फल पाप अथवा पुण्य कुछ भी हो सकताहै।
यदि मनुष्य किसी कर्म में व्यस्त रहता है, तो उसका मन सकाम कर्म में रँगा हुआ कहा जाताहै।
जब तक मन अशुद्ध रहता है, चेतना अस्पष्ट रहती है और जब तक मनुष्य सकाम कर्मों मेंलगा रहता है, तब तक उसे देह धारण करनी पड़ती है।
एवं मनः कर्मवशं प्रयुड्ठेअविद्ययात्मन्युपधीयमाने ।
प्रीतिर्न यावन्मयि वासुदेवेन मुच्यते देहयोगेन तावत् ॥
६॥
एवम्--इस प्रकार; मन:--मन; कर्म-वशम्--कर्म के वशीभूत; प्रयुड़े --कार्य करता है; अविद्यया--अविद्या अथवा अज्ञानसे; आत्मनि--जब जीवात्मा; उपधीयमाने--ढका रहता है; प्रीति:--प्रेम; न--नहीं; यावत्--जब तक; मयि--मुझ; वासुदेवे--वासुदेव अथवा कृष्ण में; न--नहीं; मुच्यते--छुटकारा पाता है; देह-योगेन--देह के सम्पर्क से; तावत्--तब तक |
जब जीवात्मा तमोगुण से आच्छादित रहता है, तो वह न तो आत्मा को और न परम-आत्माको समझता है और उसका मन सकाम कर्म के वशीभूत रहता है।
अतः जब तक उसकी मुझबासुदेव में प्रीति नहीं होती, तब तक उसे देह-बन्धन को स्वीकार करने से छुटकारा नहीं मिलपाता।
यदा न पश्यत्ययथा गुणेहांस्वार्थे प्रमत्त: सहसा विपश्चित् ।
गतस्मृतिर्विन्दति तत्र तापान्आसाद्य मैथुन्यमगारमज्ञ: ॥
७॥
यदा--जब; न--नहीं; पश्यति--देखता है; अथथा--- अनावश्यक; गुण-ईहाम्--इन्द्रियतुष्टि की चेष्टा; स्व-अर्थे--आत्म-हितमें; प्रमत्त:--पागल; सहसा--शीघ्र ही; विपश्चित्ू-- ज्ञानी भी; गत-स्मृति:--स्मृति खोकर; विन्दति--पाता है; तत्र--वहाँ;तापान्--क्लेश; आसाद्य--पाकर; मैथुन्यम्ू-- मैथुन आश्रित; अगारम्-घर; अज्ञ:--अज्ञानवश |
भले कोई कितना ही विद्वान तथा चतुर क्यों न हो, यदि वह यह नहीं समझ पाता किइन्द्रियतृप्ति के लिए की जाने वाली चेष्टाएँ व्यर्थ ही समय की बरबादी है, तो वह पागल है।
वहआत्म-हित को भूलकर इस संसार में विषयवासना-प्रधान तथा समस्त भौतिक क्लेशों के आगारअपने घर में आसक्त रहकर प्रसन्न रहना चाहता है।
इस प्रकार मनुष्य मूर्ख पशु के ही तुल्य होताहै।
पुंसः स्त्रिया मिथुनीभावमेतंतयोर्मिथो हृदयग्रन्थिमाहु: ।
अतो गृहक्षेत्रसुताप्तवित्तैर्जनस्य मोहोयमहं ममेति ॥
८॥
पुंस:--पुरुष ( नर ) का; स्त्रिया: --स्त्री का; मिथुनी-भावम्--कामभोग वासनापूर्ण-जीवन के लिए आकर्षण; एतम्--यह;तयो:--उन दोनों का; मिथ: --परस्पर; हृदय-ग्रन्थिमू--हृदयों की गाँठ; आहुः--कहते हैं; अतः--तत्पश्चात्; गृह--घर; क्षेत्र--खेत; सुत--पुत्र; आप्त--सम्बन्धी, स्वजन; वित्तै:--( तथा ) धन से; जनस्य--जीवात्मा का; मोह: --मोह; अयम्--यह;अहमू--ैं; मम--मेरा; इति--इस प्रकार?
स्त्री तथा पुरुष के मध्य का आकर्षण भौतिक अस्तित्व का मूल नियम है।
इस भ्रांत धारणाके कारण स्त्री तथा पुरुष के हृदय परस्पर जुड़े रहते हैं।
इसी के फलस्वरूप मनुष्य अपने शरीर,घर, सनन््तान, स्वजन तथा धन के प्रति आकृष्ट होता है।
इस प्रकार वह जीवन के मोहों को बढ़ाताहै और 'मैं तथा मेरा ' के रूप में सोचता है।
यदा मनोहृदयग्रन्थिरस्यकर्मानुबद्धो हह आश्लथेत ।
तदा जन: सम्परिवर्ततेउस्माद्मुक्त: परं यात्यतिहाय हेतुम्ू ॥
९॥
यदा--जब; मन:--मन; हृदय-ग्रन्थि:-- हृदय की गाँठ; अस्य--इस व्यक्ति का; कर्म-अनुबद्धः--पूर्व कर्मों के फलों सेआबद्ध; दृढः--अत्यन्त प्रबल; आश्लथेत--ढीली पड़ती है; तदा--उस समय; जन:--बद्धजीव; सम्परिवर्तते--विमुख हो जाताहै; अस्मात्--विषयी जीवन के प्रति आसक्ति से; मुक्त:--मुक्त; परम्--दिव्य लोक को; याति--जाता है; अतिहाय--त्यागकर; हेतुमू--मूल कारण |
जब पूर्व कर्म-फलों के कारण भौतिक जीवन में फँसे हुए व्यक्ति के हृदय की मजबूत गाँठढीली पड़ जाती है, तो वह घर, स्त्री तथा सन््तान के प्रति अपनी आसक्ति से विमुख होने लगताहै।
इस तरह उसका मोह ( मैं तथा मेरा ) टूट जाता है, वह मुक्त हो जाता है और उसे दिव्य लोककी प्राप्ति होती है।
हंसे गुरौ मयि भक्त्यानुवृत्यावितृष्णया द्वन्द्दतितिक्षया च ।
सर्वत्र जन्तोर्व्यसनावगत्याजिज्ञासया तपसेहानिवृत्त्या ॥
१०॥
मत्कर्मभिर्मत्कथया च नित्यमद्देवसड्रादगुणकीर्तनान्मे ।
निर्वेरसाम्योपशमेन पुत्राजिहासया देहगेहात्मबुद्धे: ॥
११॥
अध्यात्मयोगेन विविक्तसेवयाप्राणेन्द्रियात्माभिजयेन सध्य्रक् ।
सच्छुद्धया ब्रह्मचर्येण शश्वद्असम्प्रमादेन यमेन वाचाम् ॥
१२॥
सर्वत्र मद्भावविचक्षणेनज्ञानेन विज्ञानविराजितेन ।
योगेन धृत्युद्यमसत्त्वयुक्तोलिड़ं व्यपोहेत्कुशलोहमाख्यम् ॥
१३॥
हंसे--परमहंस अथवा अध्यात्म में उन्नत; गुरौ--गुरु में; मयि--मुझ भगवान् में; भक्त्या--भक्ति के द्वारा; अनुवृत्या--पालनकरके; वितृष्णया--इन्द्रियतृप्ति से विरक्ति द्वारा; द्न्द्द--संसार की द्वैतता का; तितिक्षया--सहिष्णुता से; च-- भी ; सर्वत्र --सभी जगह; जन्तो: --जीवात्मा का; व्यसन--जीव्न की क्लेशमय दशा; अवगत्या--समझ कर; जिज्ञासया--सत्य के सम्बन्धमें पूछताछ द्वारा; तपसा--तपस्या से; ईहा-निवृत्त्या--इन्द्रियतृप्ति के प्रयास को त्यागने से; मत्-कर्मभि:--मेरे लिए कार्य करनेसे; मत्ू-कथया--मेरी कथा सुनकर; च-- भी; नित्यमू--सदैव; मत्-देव-सड्भात्--मेरे भक्तों की संगति से; गुण-कीर्तनात् मे--मेरे दिव्य गुणों के कीर्तन तथा महिमागान से; निर्वर--शत्रुतारहित; साम्य--आत्मज्ञान के कारण सबों को समान देखते हुए;उपशमेन--क्रोध, शोक इत्यादि को जीत कर; पुत्रा:--हे पुत्रो; जिहासया--त्याग करने की इच्छा से; देह--देह से साथ; गेह--घर के साथ; आत्म-बुद्धेः--आत्मबो ध; अध्यात्म-योगेन--शास्त्रों के अध्ययन से; विविक्त-सेवया--एकान्त वास द्वारा; प्राण--श्वास; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; आत्म--मन; अभिजयेन--नियंत्रण द्वारा; सध्य्रक् -- पूर्णतया; सत््-श्रद्धया-- धार्मिक ग्रन्थों में श्रद्धाउत्पन्न करके; ब्रह्मचर्येण--ब्रह्मचर्य पालन द्वारा; शश्वत्ू--सदैव; असम्प्रमादेन--किंकर्तव्यमूढ़ न होकर; यमेन--संयम से;वाचाम्--शब्दों का; सर्वत्र--सभी जगह; मत्-भाव--मेरा है, यह भाव; विचक्षणेन-- अवलोकन द्वारा; ज्ञानेन--ज्ञान बढ़ाकर; विज्ञान--ज्ञान के सम्प्रयोग द्वारा; विराजितेन-- प्रकाशित; योगेन-- भक्तियोग के अभ्यास से; धृति--धैर्य; उद्यम --उत्साह;सत्त्व--विवेक; युक्त: --युक्त; लिड्रमू-- भौतिक बन्धन का कारण; व्यपोहेत्-त्यागा जा सकता है; कुशलः--पूर्ण कुशलतामें; अहम्-आख्यम्--झूठा अहंकार, भौतिक संसार के साथ झूठी पहचान ।
हे पुत्रो, तुम्हें सिद्ध गुरु अर्थात् परमहंस को ग्रहण करना चाहिए।
इस प्रकार तुम मुझ पूर्णपुरुषोत्तम भगवान् पर अपनी श्रद्धा तथा प्रेम रखो।
तुम्हें इन्द्रियतृप्ति से घृणा करनी चाहिए तथाग्रीष्म एवं शीत ऋतु के समान आनन्द तथा पीड़ा की द्वैतता को सहना चाहिए।
उन जीवात्माओंकी कष्टमय दशा को समझने का प्रयास करो, जो स्वर्ग में भी दुखी रहती हैं।
सत्य का दार्शनिकतौर पर अन्वेषण करो।
फिर भक्ति के निमित्त समस्त प्रकार की तपस्या करो।
इन्द्रिय-सुख केलिए प्रयत्नों का परित्याग करके ईश्वर की सेवा में लगो।
भगवान् की कथा का श्रवण करो औरसदैव भक्तों की संगति करो।
ईश्वर का कीर्तन और गुणगान करो और सबों को आध्यात्मिक स्तरपर समभाव से देखो।
शत्रुता त्याग कर क्रोध तथा शोक का दमन करो।
स्वयं को देह तथा घरके साथ न जोड़ते हुए शास्त्रों का अध्ययन करो।
एकान्त वास करो और प्राणवायु ( श्वास ), मनतथा इन्द्रियों को पूर्णतया वश में करने का अभ्यास करो।
वैदिक साहित्य अर्थात् शास्त्रों पर पूर्णश्रद्धा रखो और सदैव ब्रह्मचर्य ब्रत का पालन करो।
अपने कर्तव्यों को करते हुए व्यर्थ की बातेंकरने से बचो।
सदैव भगवान् का चिन्तन करते हुए सही स्त्रोत से ज्ञान प्राप्त करो।
इस प्रकारउत्साह एवं धैर्यपूर्वक भक्तियोग का अभ्यास करते रहने से तुम्हारा ज्ञान बढ़ेगा और अहंकारजाता रहेगा।
कर्माशयं हृदयग्रन्थिबन्ध-मविद्ययासादितमप्रमत्त: ।
अनेन योगेन यथोपदेशंसम्यग्व्यपोह्योपरमेत योगात् ॥
१४॥
कर्म-आशयम्--कर्म की आकांक्षा; हृदय-ग्रन्थि--हृदय में स्थित गाँठ; बन्धम्--बन्धन; अविद्यया--अविद्या के कारण;आसादितमू्--लाई गई; अप्रमत्त:--अत्यन्त सावधान, जो मोहग्रस्त न हो; अनेन--इस; योगेन--योग-अभ्यास से; यथा-उपदेशम्--जैसा उपदेश दिया गया; सम्यक्--पूर्णतया; व्यपोह्म-- मुक्त होकर; उपरमेत--विरत होना चाहिए; योगात्--मुक्तिके साधन योगाभ्यास से |
हे पुत्रो, तुम्हें मेरे उपदेश के अनुसार आचरण करना चाहिए।
अत्यन्त सावधान रहना।
इनविधियों से तुम लोग सकर्म-अभिलाषा की अविद्या से छूट सकोगे और तुम्हारे हृदय में स्थितबन्धनरूपी ग्रंथि पूर्णतया कट जाएगी।
तदनन्तर और अधिक उन्नति के लिए तुम्हें साधनों कापरित्याग कर देना चाहिए, अर्थात् तुम्हें मुक्ति-क्रिया में ही आसक्त नहीं हो जाना चाहिए।
पुत्रांश्व शिष्यांश्व नृपो गुरु्वामल्लोककामो मदनुग्रहार्थ: ।
इत्थं विमन्युरनुशिष्यादतज्ज्ञान्न योजसयेत्कर्मसु कर्ममूढान् ।
कं योजयन्मनुजो<र्थ लभेतनिपातयन्रष्टदशं हि गर्ते ॥
१५॥
पुत्रानू--पुत्रों को; च--तथा; शिष्यान्--शिष्यों को; च--तथा; नृप:--राजा; गुरु:--गुरु; बा--अथवा; मत्-लोक-काम:--मेरे धाम के इच्छुक; मतू-अनुग्रह-अर्थ: --मेरे अनुग्रह को जीवन लक्ष्य मानने वाले; इत्थम्--इस प्रकार से; विमन्यु:--क्रोधरहित; अनुशिष्यात्--शिक्षा देनी चाहिए; अ-तत्-ज्ञानू--आत्मज्ञान से विहीन; न--नहीं; योजयेत्--लगाना चाहिए;कर्मसु--कर्म में; कर्म-मूढान्--केवल पुण्य या पाप कर्म में रत रहने वालों को; कम्--क्या; योजयनू-प्रवृत्त करते हुए; मनु-जः--मनुष्य; अर्थम्--लाभ; लभेत--प्राप्त कर सकता है; निपातयन्ू-- धकेल कर; नष्ट-हशम्--दिव्य ज्योति से विहीन; हि--निस्संदेह; गर्ते-गड़े में |
यदि किसी मनुष्य को घर लौटने अर्थात् ईश्वर के धाम वापस जाने की अभिलाषा हो, तोउसे चाहिए कि वह भगवान् के अनुग्रह को जीवन का परम लक्ष्य माने।
यदि वह पिता है, तोअपने पुत्रों को, यदि गुरु है, तो अपने शिष्यों को और यदि राजा है, तो अपनी प्रजा को, इसीप्रकार शिक्षा दे जैसा कि मैंने उपदेश दिया है।
उसे चाहिए कि क्रोधरहित होकर इन्हें शिक्षा देतेरहें, भले ही शिष्य, पुत्र अथवा प्रजा उनकी आज्ञा का पालन करने में कभी-कभी असमर्थ क्योंन रहें।
कर्म-मूढों को जो पाप एवं पुण्य कर्मो में लगे रहते हैं, चाहिए कि वे सभी प्रकार से भक्तिमें लगें।
उन्हें सकाम कर्म से सदैव बचना चाहिए।
यदि शिष्य, पुत्र या प्रजा, जो दिव्य दृष्टि सेरहित हो, उसे कर्म के बन्धन में डाला जाये तो भला वह कैसे लाभान्वित होगा? यह अंधे मनुष्यको अंधेरे कुएं तक ले जाने और उसे गिरने देने जैसा है।
लोक: स्वयं श्रेयसि नष्टदृष्टि-योडर्थान्समीहेत निकामकामः ।
अन्योन्यवैर: सुखलेशहेतो-रनन्तदु:खं च न वेद मूढ: ॥
१६॥
लोक:ः--लोग; स्वयम्--स्वयं; श्रेयसि--कल्याण-मार्ग का; नष्ट-दृष्टिः--जिनकी दृष्टि नष्ट हो चुकी है; यः--जो; अर्थानू--विषय-भोग की वस्तुएँ; समीहेत--आकांक्षा करते हैं; निकाम-काम:--इन्द्रियसुख के लिए अनेक कामेच्छाओं वाला, कामी;अन्योन्य-वैर:-- परस्पर ईर्ष्यालु होकर; सुख-लेश-हेतोः--केवल क्षणिक सुख के लिए; अनन्त-दुःखम्--अपार कष्ट; च-- भी;न--नहीं; वेद--जानते हैं; मूढः--मूढ़ लोग ?
मूर्ख अज्ञानवश भौतिकतावादी व्यक्ति अपना सच्चा हित नहीं समझ पाता जो जीवन काकल्याणकारी मार्ग है।
वह भौतिक सुख की कामेच्छाओं से बँधा रहता है और उसकी सारीयोजनाएँ इसी एक कार्य के लिए तैयार की जाती हैं।
ऐसा व्यक्ति क्षणक सुख के लिए वैरपूर्णसमाज की सृष्टि करता है और अपनी मानसिकता के कारण वह दुख के सागर में कूद पड़ता है।
ऐसे मूर्ख व्यक्ति को इसका ज्ञान भी नहीं होता।
कस्तं स्वयं तदभिज्ञो विपश्चिद्अविद्यायामन्तरे वर्तमानम् ।
इष्ठा पुनस्तं सघृण: कुबुद्द्धिप्रयोजयेदुत्पथगं यथान्धम् ॥
१७॥
कः--ऐसा कौन व्यक्ति है; तमू--उसको; स्वयम्--स्वयं; तत्-अभिज्ञ: --तत्त्व-ज्ञान जानते हुए; विपश्चित्--विद्वान;अविद्यायाम् अन्तरे--अज्ञानवश; वर्तमानम्--वर्तमान रहते हुए; दृष्टा--देख कर; पुन:--फिर; तमू--उसको; स-घृण: --अत्यन्त दयालु; कु-बुद्धिम्--संसार मार्ग में लिप्त; प्रयोजयेत्--लगायेगा; उत्पथ-गम्--उल्टे मार्ग पर अग्रसर होने वाला;यथा--सहश; अन्धम्--अंधा पुरुष?
यदि कोई अज्ञानी है और संसार-पथ में लिप्त है, तो भला उसे कोई विद्वान, दयालु तथाआत्मज्ञानी पुरुष सकाम कर्म करने तथा भौतिक संसार में और अधिक फँसने के लिए क्योंकरप्रवृत्त करेगा ? यदि कोई अन्धा व्यक्ति उल्टी राह पर जा रहा हो, तो ऐसा कौन-सा सज्जन पुरुषहोगा, जो उसे संकट के पथ पर और आगे जाने देगा ? वह इस विधि को क्यों सही मानने लगा ?कोई भी बुद्धिमान अथवा दयालु व्यक्ति ऐसा नहीं होने देगा।
गुरुर्न स स्यात्स्वजनो न स स्यात्पिता न स स्याज्जननी न सा स्यात् ।
दैवं न तत्स्यान्न पतिश्च स स्था-न्न मोचयेद्य: समुपेतमृत्युम् ॥
१८॥
गुरुः--गुरु; न--नहीं; सः--वह; स्यात्--हो; स्व-जन: --कुट॒ुम्बी; न--नहीं; सः--ऐसा व्यक्ति; स्थात्ू--हो; पिता--पिता;न--नहीं; सः--वह; स्थात्ू--हो; जननी--माता; न--नहीं; सा--वह; स्थातू--होवे; दैवमू-- अर्चाविग्रह; न--नहीं; तत्ू--वह; स्थात्--हो; न--नहीं; पति:--पति; च-- भी; सः--वह; स्थात्ू--होय; न--नहीं; मोचयेत्--उबार सकता है; यः--जो;समुपेत-मृत्युम्ू--बारम्बार जन्म-मृत्यु के मार्ग पर अग्रसर होनेवाले को।
जो अपने आश्रित को बारम्बार के जन्म-मृत्यु के पथ से न उबार सके उसे कभी भी गुरु,पिता, पति, माँ या आराध्य देव नहीं बनना चाहिए।
इदं शरीरं मम दुर्विभाव्य॑सत्त्वं हि मे हृदयं यत्र धर्म: ।
पृष्ठे कृतो मे यदधर्म आराद्अतो हि मामृषभ प्राहुराया: ॥
१९॥
इदम्--यह; शरीरम्--दिव्य देह अथवा सच्चिदानन्द विग्रह; मम--मेरा; दुर्विभाव्यम्ू-- अकल्पनीय; सत्त्वमू-- भौतिकगुणरहित; हि--निस्संदेह; मे--मेरा; हदयम्--हृदय; यत्र--जहाँ पर; धर्म:--धर्म का वास्तविक पद अथवा भक्तियोग; पृष्ठे--पीठ पर; कृत:--बनाया हुआ; मे--मेरे द्वारा; यत्ू--क्योंकि; अधर्म:--अधर्म; आरात्ू--अत्यन्त दूर; अत:--इसलिए; हि--निस्संदेह; माम्--मुझको; ऋषभम्--जीवों में श्रेष्ठ; प्राहु:--पुकारते हैं; आर्या:-- श्रेष्ठ जन, सत्पुरुष |
मेरा दिव्य शरीर ( सच्चिदाननन्द विग्रह) मानव सहृश दिखता है, किन्तु यह भौतिक मनुष्य-शरीर नहीं है।
यह अकल्पनीय है।
मुझे प्रकृति द्वारा बाध्य होकर किसी विशेष प्रकार का शरीरनहीं धारण करना पड़ता, मैं अपनी इच्छानुकूल शरीर धारण करता हूँ।
मेरा हृदय भी दिव्य हैऔर मैं सदैव अपने भक्तों का कल्याण चाहता रहता हूँ।
इसलिए मेरे हृदय में भक्ति पूरित है, जोभक्तों के लिए है।
मैंने अधर्म को हृदय से बहुत दूर भगा दिया है।
मुझे अभक्ति के कार्य बिल्कुलअच्छे नहीं लगते।
इन दिव्य गुणों के कारण सामान्य रूप से लोग मेरी उपासना भगवान्ऋषभदेव के रूप में करते हैं, जो भी जीवात्माओं में श्रेष्ठ है।
तस्माद्धवन्तो हृदयेन जाता:सर्वे महीयांसममुं सनाभम् ।
अक्लष्टबुद्धया भरतं भजध्वंशुश्रूषणं तद्धरणं प्रजानाम्ू ॥
२०॥
तस्मात्ू--अतः ( क्योंकि मैं ही सर्वश्रेष्ठ हूँ ); भवन्त:ः--तुम लोग; हृदयेन--मेरे हृदय से; जाता:--उत्पन्न; सर्वे--सभी;महीयांसम्--सर्व श्रेष्ठ; अमुमू--वह; स-नाभम्- भ्राता; अक्लिष्ट-बुद्धया-- भौतिक कलुषहीन आपकी बुद्धि से; भरतम्ू-- भरतकी; भजध्वमू--सेवा करने का यत्न मात्र करो; शुश्रूषणम्--सेवा; तत्--वह; भरणम् प्रजानाम्--नागरिकों ( प्रजा ) परशासन।
मेरे प्रिय पुत्रो, तुम सभी मेरे हृदय से उत्पन्न हो जो समस्त दिव्य गुणों का केन्द्र है।
अतः तुम्हेंसंसारी तथा ईर्ष्यालु मनुष्यों के समान नहीं होना है।
तुम अपने सबसे बड़े भाई भरत को मानो,क्योंकि वह भक्ति में श्रेष्ठ है।
यदि तुम लोग भरत की सेवा करोगे तो उसकी सेवा में मेरी सेवासम्मिलित होगी और तुम स्वयमेव प्रजा पर शासन करोगे।
भूतेषु वीरुदभ्य उदुत्तमा येसरीसृपास्तेषु सबोधनिष्ठा: ।
ततो मनुष्या: प्रमथास्ततोपिगन्धर्वसिद्धा विबुधानुगा ये ॥
२१॥
देवासुरे भ्यो मघवत्प्रधानादक्षादयो ब्रह्मसुतास्तु तेषाम् ।
भव: पर: सोथ विरिज्जवीर्य:स मत्परोहं द्विजदेवदेवः ॥
२२॥
भूतेषु--समस्त उत्पन्न जीवों में ( चाहे चर हों या अचर ); वीरुद्भ्य:--पौधों से; उदुत्तमा:--कहीं अधिक श्रेष्ठ; ये--जो;सरीसूपा:--रेंगने वाले प्राणी, यथा सर्प; तेषु--उनमें से; स-बोध-निष्ठा:--वे, जिन्होंने बुद्धि विकसित कर ली है; ततः--उनमेंसे; मनुष्या: --मनुष्य; प्रमथा: -- भूत; ततः अपि--उनसे भी श्रेष्ठ; गन्धर्व--गंधर्वलोक के वासी ( देव लोक में गायक के रूप मेंनियुक्त ); सिद्धा:--सिद्ध लोक के वासी, जिनमें योग शक्ति रहती है; विबुध-अनुगा:--किन्नरगण; ये--जो; देव--देवता;असुरेभ्य:--असुरों की अपेक्षा; मघवत्-प्रधाना: --इन्द्र आदि; दक्ष-आदय:--दक्ष आदि; ब्रह्म-सुता:--ब्रह्मा के पुत्र; तु--तब;तेषाम्--उनमें से; भव: -- भगवान् शिव; परः-- श्रेष्ठ; सः--वह ( शिव ); अथ--आगे, और; विरिज्ञ-वीर्य: --भगवान् ब्रह्मा सेउत्पन्न होने से; सः--वह ( ब्रह्मा ); मत्-परः--मेरा भक्त; अहमू--मैं; द्विज-देव-देव:--ब्राह्मणों का उपासक अथवा ब्राह्मणोंका भगवान्?
दो प्रकार की प्रकट शक्तियों ( आत्मा तथा जड़ पदार्थ ) में से जीव-शक्ति ( वनस्पति, घास,वृक्ष तथा पौधे ) जड़ पदार्थ ( पत्थर, पृथ्वी इत्यादि ) से श्रेष्ठ है।
इन अचर पौधों तथा वनस्पतियोंकी तुलना में रेंगने वाले कीट तथा सरीसूप श्रेष्ठ हैं।
कीटों तथा सरीसूपों से पशु श्रेष्ठ हैं क्योंकिउनमें बुद्धि है।
पशुओं से मनुष्य श्रेष्ठ हैं और मनुष्यों से भूत-प्रेत क्योंकि उनके कोई भौतिकशरीर नहीं होता।
भूत-प्रेतों से गंधर्व और गंधर्वों से सिद्ध श्रेष्ठ होते हैं।
सिद्धों से किन्नर औरकिकन्नरों से असुर श्रेष्ठ हैं।
असुरों से देवता और देवताओं में स्वर्ग का राजा इन्द्र श्रेष्ठ है।
इन्द्र से भीश्रेष्ठ ब्रह्मा के पुत्र, जैसे कि राजा दक्ष और ब्रह्मा के इन पुत्रों में भगवान् शिव सर्वश्रेष्ठ हैं।
शिवब्रह्मा के पुत्र हैं इसलिए ब्रह्मा श्रेष्ठ माने जाते हैं किन्तु वे मुझ भगवान् के अधीन हैं।
चूँकि मैंब्राह्मणों को पूज्य मानता हूँ इसलिए ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ हैं।
न ब्राह्मणैस्तुलये भूतमन्यत्पश्यामि विप्रा: किमतः परं तु ।
यस्मिन्रृभिः प्रहुतं श्रद्धयाह-मश्नामि काम न तथाग्निहोत्रे ॥
२३॥
न--नहीं; ब्राह्मणैः--ब्राह्मणों के; तुलये-- मैं समान मानता हूँ; भूतम्--जीव; अन्यत्-- अन्य; पश्यामि--मैं देखता हूँ; विप्रा: --हे समागत ब्राह्मणो; किमू--कुछ भी; अतः--ब्राह्मणों से; परम्-- श्रेष्ठ; तु--निश्चय ही; यस्मिन्--जिनमें से; नृभि: --मनुष्यों केद्वारा; प्रहुतम्--यज्ञों के विधिवत् सम्पन्न होने पर दान किया गया भोजन; श्रद्धया--श्रद्धा तथा प्रेमपूर्वक; अहम्--मैं;अश्नामि--खाता हूँ; कामम्--परम प्रसन्नतापूर्वक; न--नहीं; तथा--उस प्रकार; अग्नि-होत्रे--अग्नियज्ञ में |
हे पूज्य ब्राह्मणो, जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, इस संसार में ब्राह्मणों के तुल्य या उनसे श्रेष्ठअन्य कोई नहीं है।
मैं उनके तुलना योग्य किसी को नहीं पाता।
वैदिक नियमों के अनुसार यज्ञकरने के पीछे जो मेरा उद्देश्य है, उसे जब लोग समझ लेते हैं, तो वे मेरे निमित्त अर्पित भोगअत्यन्त श्रद्धा तथा प्रेमपूर्वक ब्राह्मण-मुख के द्वारा मुझे प्रदान करते हैं।
इस प्रकार प्रदत्त भोजनको मैं अत्यन्त प्रसन्न होकर ग्रहण करता हूँ।
निस््संदेह इस प्रकार से प्रदत्त भोजन को मैं अग्निहोत्रमें होम किये भोजन की अपेक्षा अधिक प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करता हूँ।
श़ धृता तनूरुशती मे पुराणीयेनेह सत्त्वं परमं पवित्रम् ।
शमो दमः सत्यमनुग्रहश्नतपस्तितिक्षानुभवश्च यत्र ॥
२४॥
धृता--दिव्य शिक्षा द्वारा धारण किया गया; तनू: --शरीर; उशती--भौतिक कलुष से मुक्त; मे--मेरा; पुराणी --शाश्वत; येन--जिससे; इह--इस संसार में; सत्त्वम्ू--सतोगुण; परमम्--परम, सर्वश्रेष्ठ; पवित्रमू--पवित्र; शम:--मन का नियंत्रण; दम:--इन्द्रियों का नियंत्रण; सत्यम्ू--सत्य; अनुग्रह:--अनुग्रह, कृपा; च--तथा; तप:--तपस्या; तितिक्षा--सहनशीलता; अनुभव:--ईश्वर तथा जीवात्मा का बोध; च--तथा; यत्र--जिसमें |
वेद मेरे शाश्रत दिव्य शब्दावतार हैं, इसलिए वे शब्द-ब्रह्म हैं।
इस जगत में ब्राह्मण समस्तवेदों का सम्यक् अध्ययन करते हैं और उनको आत्मसात् कर लेते हैं, इसलिए उन्हें साक्षात्मूर्तरूप वेद माना जाता है।
ब्राह्मण सतोगुणी होते हैं फलस्वरूप उनमें शम, दम एवं सत्य के गुणपाये जाते हैं।
वे वेदों का मूल अर्थ वर्णन करते हैं और अनुग्रहवश समस्त बद्धजीवों को वेदों केउद्देश्य का उपदेश देते हैं।
वे तपस्या तथा तितिक्षा का अभ्यास करते हैं और जीवात्मा तथा परमईश्वर के पदों का अनुभव करते हैं।
ये ही ब्राह्मणों के आठ गुण ( सत्त्व, शम, दम, सत्य,अनुग्रह, तपस्या, तितिक्षा यथा अनुभव ) हैं।
अत: समस्त जीवों में ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ हैं।
मत्तोप्यनन्तात्परतः परस्मात्स्वर्गापवर्गाधिपतेर्न किल्जित् ।
येषां किमु स्थादितरेण तेषा-मकिदझ्ञनानां मयि भक्तिभाजाम् ॥
२५॥
मत्त:--मुझसे; अपि-- भी; अनन्तात्ू--बल तथा ऐश्वर्य में असीम; परत: परस्मात्--सर्वोच्च से ऊँचा; स्वर्ग-अपवर्ग-अधिपतेः --स्वर्ग में प्राप्प सुख को मुक्ति द्वारा अथवा भौतिक सुखोपभोग द्वारा और फिर मुक्ति द्वारा प्रदान करने में समर्थ; न--नहीं; किल्लित्--कुछ भी; येषामू--जिसका; किम्--क्या प्रयोजन; उ-- ओह; स्थातू--क्या हो सकता है; इतरेण--जिन्हें किसीवस्तु की अन्य किसी से; तेषघामू--उनका; अकिश्जनानाम्ू--आवश्यकता नहीं है अथवा जिन्हें सम्पत्ति की इच्छा नहीं; मयि--मुझमें; भक्ति-भाजाम्-- भक्ति करने वाले |
मैं ब्रह्मा तथा स्वर्ग के राजा इन्द्र से भी अधिक ऐश्वर्यवान, सर्वशक्तिमान तथा श्रेष्ठ हूँ।
मैंस्वर्गलोक में प्राप्त होने वाले समस्त सुखों को तथा मोक्ष को देने वाला हूँ।
तो भी ब्राह्मण मुझसेभौतिक सुख की कामना नहीं करते।
वे अत्यन्त पवित्र तथा निस्पृह हैं।
वे एकमात्र मेरी भक्ति मेंलगे रहते हैं।
भला उन्हें अन्य किसी से भौतिक लाभों के लिए याचना करने की क्याआवश्यकता है ?
सर्वाणि मद्ध्विष्ण्यतया भवद्धि-श्वराणि भूतानि सुता श्रुवाणि ।
सम्भावितव्यानि पदे पदे वोविविक्तरग्भिस्तदु हाईणं मे ॥
२६॥
सर्वाणि--समस्त; मत्-धिष्ण्यतया--मेरा आसन होने के कारण; भवद्धि:ः--तुम्हारे द्वारा; चराणि--चर; भूतानि--जीवात्माएँ;सुता:-हे पुत्रो; ध्ुवाणि--अचर; सम्भावितव्यानि--आदरणीय; पदे पदे--पग पग पर, प्रतिक्षण; वः--तुम लोगों के द्वारा;विविक्त-दग्भि: --स्पष्ट दृष्टि तथा ज्ञान से युक्त ( परमात्मा रूप में भगवान् सर्वव्यापी हैं ); तत् उ--अप्रत्यक्षतः जो; ह--निश्चयही; अर्हणम्--आदर देते हुए; मे--मुझे?
हे पुत्रो, तुम्हें चराचर किसी जीवात्मा से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए।
यह जानते हुए कि मैंउनमें स्थित हूँ, प्रत्येक क्षण उनका समादर करना चाहिए इस प्रकार तुम मेरा आदर करो।
मनोवचोहक्करणेहितस्यसाक्षात्कृतं मे परिबईणं हि ।
विना पुमान्येन महाविमोहात्कृतान्तपाशान्न विमोक्तुमीशेत् ॥
२७॥
मनः--मन; वचः --शब्द; हक्ू--दृष्टि; करण--इन्द्रियों का; ईहितस्थ--समस्त कर्मों ( शरीर, समाज, मैत्री इत्यादि बनाये रखनेके लिए ) का; साक्षात्-कृतम्-- प्रत्यक्षत: प्रदत्त; मे--मुझको; परिबर्हणम्--पूजा; हि-- क्योंकि; विना--बिना; पुमान्--कोईव्यक्ति; येन--जो; महा-विमोहात्--परम मोह से; कृतान्त-पाशात्--यमराज के पाश से; न--नहीं; विमोक्तुम--मुक्त होने केलिए; ईशेत्--समर्थ होता है।
मन, दृष्टि, वचन तथा समस्त ज्ञानेन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रिय इन्द्रियों का वास्तविक कार्य मेरी सेवामें लगे रहना है।
जब तक जीवात्मा की इन्द्रियाँ इस प्रकार सेवारत नहीं रहतीं, तब तक जीवात्माको यमराज के पाश सदृश सांसारिक बन्धन से निकल पाना दुष्कर है।
श्रीशुक उबाचएवमनुशास्यात्मजान्स्वयमनुशिष्टानपि लोकानुशासनार्थ महानुभाव: परमसुहद्धगवानूषभापदेशउपशमशीलानामुपरतकर्मणां महामुनीनां भक्तिज्ञानवैराग्यलक्षणं पारमहंस्यधर्ममुपशिक्षमाण:स्वतनयशतमज्येष्ठं परमभागवतं भगवज्जनपरायणं भरतं धरणिपालनायाभिषिच्य स्वयं भवनएवोर्वरितशरीरमात्रपरिग्रह उन्मत्त इव गगनपरिधान: प्रकीर्णकेश आत्मन्यारोपिताहवनीयोब्रह्मावर्तात्प्रवव्राज ॥
२८॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; अनुशास्य--उपदेश दे चुकने पर; आत्म-जानू--अपनेपुत्रों को; स्वयम्--स्वयं; अनुशिष्टानू--सुशिक्षित; अपि--यद्यपि; लोक-अनुशासन-अर्थम्--लोगों को शिक्षा देने के लिए;महा-अनुभाव:--महान् पुरुष; परम-सुहत्--हर एक का शुभ चिन्तक; भगवान्-- भगवान्; ऋषभ-अपदेश: -- जो ऋषभदेव के नाम से विख्यात हैं; उपशम-शीलानाम्--निस्पृह व्यक्तियों का; उपरत-कर्मणाम्--सकाम कर्मो से विरक्त; महा-मुनीनाम्--संन्यासी; भक्ति-- भक्ति; ज्ञान-- पूर्ण ज्ञान; वैराग्य--विरक्ति; लक्षणम्-- लक्षण; पारमहंस्य-- श्रेष्ठ मनुष्यों का; धर्मम्--कर्तव्य;उपशिक्षमाण: --उपदेश देते हुए; स्व-तनय--अपने पुत्रों का; शत--सौ; ज्येष्ठम्--जेष्ठ; परम-भागवतम्--ईश्वर का परम भक्त;भगवत्-जन-परायणम्--ई श्वर के भक्तों ( ब्राह्मणों तथा वैष्णवों ) का अनुगमन करने वाला; भरतम्-- भरत महाराज को;धरणि-पालनाय--संसार पर राज्य करने की दृष्टि से; अभिषिच्य-- अभिषेक करके, सिंहासन पर बैठाकर; स्वयमू--स्वयं;भवने--घर पर; एबव--यद्यपि; उर्वरित-- रहते हुए; शरीर-मात्र--केवल शरीर; परिग्रह:--स्वीकार करते हुए; उन्मत्त:--पागल;इब--सहश; गगन-परिधान: --आकाश को अपना वस्त्र बनाते हुए, दिगम्बर; प्रकीर्ण-केश:--बिखरे वालों वाला; आत्मनि--अपने में; आरोपित--आरोप करके; आहवनीय: --वैदिक अग्नि, अग्निहोत्र; ब्रह्मावर्तातू--ब्रह्मावर्त देश से; प्रवत्राज--सम्पूर्णसंसार में घूमने लगे।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा--इस प्रकार सबके हितैषी परमेश्वर ऋषभदेव ने अपने पुत्रों कोउपदेश दिया।
यह आदर्श प्रस्तुत करने के लिए कि गृहस्थ जीवन से विरक्त होने के पूर्व पिताअपने पुत्रों को किस प्रकार शिक्षा दे, उन्होंने उन्हें शिक्षा दी, यद्यपि वे सभी पूर्णतया शिक्षिततथा शिष्ट थे।
इन उपदेशों से सकाम कर्मों से न बँधने वाले तथा अपनी भौतिक कामनाओं कोनष्ट करने के बाद भक्ति में लीन रहने वाले संन्यासी भी लाभ उठाते हैं।
ऋषभदेव ने अपने एकसौ पुत्रों को शिक्षा दी जिनमें से सबसे बड़ा भरत था, जो परम भक्त तथा वैष्णवों का अनुयायीथा।
भगवान् ऋषभदेव ने अपने ज्येष्ठ पुत्र को सिंहासन पर इसलिए बिठाया कि वह सारे संसारपर शासन करे।
इसके पश्चात् घर में रहते हुए भी भगवान् ऋषभदेव पागल के सहृश नंगे तथाबाल बिखेरे रहने लगे।
तब यज्ञ-अग्नि को अपने में लीन करके विश्व का भ्रमण करने के लिएउन्होंने ब्रह्मावर्त को छोड़ दिया।
जडान्धमूकबधिरपिशाचोन्मादकवदवधूतवेषो उभिभाष्यमाणोपि जनानां गृहीतमौनब्रतस्तूष्णीं बभूव ॥
२९॥
जड--अचर, स्थिर; अन्ध--अंधा; मूक--गूँगा; बधिर--बहरा; पिशाच-- भूत; उन््मादक--पागल; वत्--सहृश; अवधूत-बेष: --अवधूत के समान रहते हुए ( संसार से विमुख ); अभिभाष्यमाण:--इस प्रकार ( बहरा, गूँगा तथा अंधा ) संबोधितहोकर; अपि--यद्यपि; जनानाम्--लोगों द्वारा; गृहीत--ग्रहण कर लिया; मौन--न बोलने का; ब्रत:--ब्रत, संकल्प; तृष्णीम्बभूव--चुप रहने लगा।
अवधूत रूप धारण करके भगवान् ऋषभदेव अंधे, बहरे तथा गूँगे, जड़, भूत अथवा पागलके समान मनुष्य-समाज में घूमने लगे।
यद्यपि लोग उन्हें इन नामों से पुकारते, किन्तु वे मूक बनेरहते और किसी से कुछ नहीं बोलते थे।
तत्र तत्र पुरग्रामाकरखेटवाटखर्वटशिबिरब्रजघोषसार्थगिरिवना श्रमादिष्वनुपथमवनिचरापसदै:'परिभूयमानो मक्षिकाभिरिववनगजस्तर्जनताडनावमेहनष्ठीवनग्रावशकृद्रज: प्रक्षेपपूतिवातदुरुक्तैस्तदविगणयज्नेवासत्संस्थानएतस्मिन्देहोपलक्षणे सदपदेश उभयानुभवस्वरूपेणस्वमहिमावस्थानेनासमारोपिताहंममाभिमानत्वादविखण्डितमना: पृथिवीमेकचर: परिबभ्राम ॥
३०॥
तत्र तत्र--यहाँ वहाँ; पुर--नगरों; ग्राम--गाँवों; आकर--खानों; खेट--खेतों; वाट--बगीचों; खर्वट--घाटी में स्थित गाँवों( पहाड़ी गाँवों ); शिबिर--सेना की छावनियों; ब्रज--गोशालाओं ; घोष--अहीरों की बस्तियों; सार्थ--यात्रियों केविश्रामालयों; गिरि--पर्वतों; बन--जंगलों; आश्रम--मुनियों के वासस्थानों; आदिषु--इत्यादि में; अनुपथम्--मार्ग से जातेहुए; अवनिचर-अपसदैः--अवांछित तत्त्वों द्वारा, दुष्ट पुरुषों के द्वारा; परिभूयमान:--घिरकर; मक्षिकाभि:--मक्खियों से;इब--सहश्य; वन-गज:--जंगली हाथी; तर्जन--चिंग्घाड़ से; ताडन-- प्रताड़ित होकर; अवमेहन--शरीर पर पेशाब करते हुए;पष्टीवन--शरीर पर थूकते हुए; ग्राव-शकृत्--पत्थर और मल; रज:--धूलि; प्रक्षेप--फेंकते हुए; पूति-बात--शरीर पर अधोवायुछोड़ते हुए; दुरुक्तै:--( तथा ) गालियों से; तत्ू--वह; अविगणयनू--बिना परवाह किये; एव--इस प्रकार; असत्ू-संस्थाने--भद्र पुरुष के अयोग्य स्थान; एतस्मिन्ू--इसमें; देह-उपलक्षणे--देह के रूप में; सत्-अपदेशे--सत्य कहलाने वाला; उभय-अनुभव-स्वरूपेण--देह तथा आत्मा की वास्तविक स्थिति समझने से; स्व-महिम--अपनी महिमा में; अवस्थानेन--स्थिर होकरके; असमारोपित-अहमू-मम-अभिमानत्वात्---' मैं तथा मेरी ' ममता को अस्वीकार करने से; अविखण्डित-मना:--अविचलित मन से; पृथिवीम्--सारे संसार में; एक-चर:--अकेले; परिबध्राम--घूमता था |
ऋषभदेव नगरों, गाँवों, खानों, किसानों की बस्तियों, घाटियों, बागों, सैनिक छावनियों,गोशालाओं, अहीरों की बस्तियों, यात्रियों के विश्रामालयों, पर्वतों, जंगलों तथा आश्रमों केबीच घूमने लगे।
जहाँ भी वे जाते, उन्हें दुष्ट जन उसी प्रकार घेर लेते जिस प्रकार जंगली हाथीको मक्खियाँ घेर लेती हैं।
उन्हें डराया धमकाया और मारा जाता, उन पर पेशाब किया जाताऔर थूका जाता।
यहाँ तक कि कभी-कभी उन पर पत्थर, विष्ठा और धूल फेंकी जाती और कभी-कभी तो लोग उनके समक्ष अपानवायु निकालते।
इस प्रकार लोग उन्हें भला-बुरा कहतेऔर अत्यधिक यातना देते, किन्तु उन्होंने कभी भी इसकी परवाह नहीं की, क्योंकि वे यहसमझते थे कि इस शरीर का यही अन्त है।
वे आत्म-पद पर स्थित थे और सिद्ध होने से ऐसेभौतिक तिरस्कारों की तनिक भी परवाह नहीं करते थे।
अर्थात् उन्हें इसका पूर्ण ज्ञान हो चुकाथा कि पदार्थ ( देह ) तथा आत्मा पृथक्-पृथक् हैं।
उनमें देहात्म-बुद्धि न थी।
अत: वे किसी परक्रुद्ध हुए बिना सारे संसार में अकेले ही घूमने लगे।
अतिसुकुमारकरचरणोर:स्थलविपुलबाह्डंसगलवदनाद्यवयवविन्यास: प्रकृतिसुन्दरस्वभावहाससुमुखोनवनलिनदलायमानशिशिरतारारुणायतनयनरुचिर: सहशसुभगकपोलकर्णकण्ठनासोविगूढस्मितवदनमहोत्सवेन पुरवनितानां मनसि कुसुमशरासनमुपदधान:'परागवलम्बमानकुटिलजटिलकपिशकेश भूरिभारोवधूतमलिननिजशरीरेण ग्रहगृहीत इवाहश्यत ॥
३१॥
अति-सु-कुमार--अत्यन्त कोमल; कर--हाथ; चरण--पाँव; उर:-स्थल--वक्षस्थल, छाती; विपुल--दीर्घ, लम्बे; बाहु--भुजाएँ; अंस--कंधे; गल--गला; वदन--मुख; आदि--इत्यादि; अवयव--अंग; विन्यास:--सुगठित; प्रकृति--स्वभाव से;सुन्दर--आकर्षक; स्व-भाव--स्वाभाविक; हास--मन्द मुस्कान; सु-मुख:--सुन्दर मुख; नव-नलिन-दलायमान--नवविकसित कमल पुष्प की पंखड़ियों के समान दिखने वाला; शिशिर--सब दुखों को हरने वाले; तार--नेत्र गोलक; अरुण--लाली लिए हुए; आयत--फैले हुए, विशाल; नयन--नेत्रों से; रूचिर:ः --मोहक; सहश--समान; सुभग--सुन्दर; कपोल--गाल; कर्ण--कान; कण्ठ-गर्दन; नास:--नासिका, नाक; विगूढ-स्मित--अस्फुट हास; वदन--मुख से; महा-उत्सवेन--उत्सव सहश लगने वाला; पुर-वनितानाम्ू--पुर-नारियों के; मनसि--मन में ; कुसुम-शरासनम्--कामदेव; उपदधान: --जागरितकरते हुए; पराकु--चारों ओर; अवलम्बमान--खुली,फैली; कुटिल-- घुँघराले; जटिल--जटायुक्त; कपिश-- भूरे; केश--बालों की; भूरि-भार:-- अधिकता; अवधूत--उपेक्षित; मलिन--गंदा, धूल-धूसरित; निज-शरीरेण---अपने शरीर से; ग्रह-गृहीतः--भूतग्रस्त; इब--मानो; अहृश्यत--दिखाई पड़ता था।
भगवान् ऋषभदेव के हाथ, पाँव तथा वक्षस्थल अत्यन्त दीर्घ थे।
उनके कंधे, मुख तथाअंग-प्रत्यंग अत्यन्त सुगठित तथा सुकोमल थे।
उनका मुख उनकी सहज मुस्कान से मंडित थाऔर उनके खुले हुए लाल-लाल नेत्र ऐसे प्रतीत होते थे मानो प्रातःकालीन ओस कणों से युक्तनव विकसितकमल पुष्प की पंखड़ियाँ हों।
इस कारण वे और भी अधिक सुन्दर दिखते थेउनकी पुतलियाँ इतनी मनोहर थीं कि देखने वालों का सारा सन्ताप हर लेती थीं।
उनके कपोल,कान, गर्दन, नाक तथा अन्य अंग अतीव सुन्दर थे।
उनके मन्द हास से उनका मुख इतनाआकर्षक प्रतीत होता था कि विवाहित नारियों का भी मन रिंबच जाता था।
ऐसा प्रतीत होता थामानो कामदेव ने अपने बाणों से उन्हें बींध दिया हो।
उनके सिर के चारों ओर घुँघराली भूरीजटाएँ थीं।
उनके सिर के बाल छितरे थे क्योंकि उनका शरीर गंदा और उपेक्षित था।
ऐसा प्रतीतहोता था मानो उन्हें किसी भूत ने सता रखा हो।
यहिं वाव स भगवान्लोकमिमं योगस्याद्धा प्रतीपमिवाचक्षाणस्तत्प्रतिक्रियाकर्म बीभत्सितमितिब्रतमाजगरमास्थित: शयान एवाश्नाति पिबति खादत्यवमेहति हदति सम चेष्टमान उच्चरितआदिग्धोद्देश: ॥
३२॥
यहिं वाव--जब; सः--उस; भगवान्-- भगवान् ने; लोकम्--जनता को; इममू--इस; योगस्य--योग का; अद्धा- प्रत्यक्ष;प्रतीपम्--विरुद्ध; इब--सहृश्य; आचक्षाण: --देखते हुए; तत्--उसकी; प्रतिक्रिया--विरोध में; कर्म--क्रिया; बीभत्सितम्--बीभत्स, घृणित; इति--इस प्रकार; ब्रतमू--आचरण, वृत्ति; आजगरम्--अजगर का ( एक स्थान पर पड़े रहने का );आस्थित:--स्वीकार करके; शयान:ः --लेटे रहना; एव--निस्सन्देह; अश्नाति-- भोजन करता है; पिबति--पीता है; खादति--खाता ( चबाता ) है; अवमेहति--पेशाब करता है; हदति--मल-त्याग करता है; स्म--इस प्रकार; चेष्टमान:--लुढ़कते हुए;उच्चरिते--मल तथा मूत्र में; आदिग्ध-उद्देश: --इस प्रकार उसका शरीर लथपथ हो गया |
जब भगवान् ऋषभदेव ने देखा कि जनता उनकी योग-साथधना में विघ्न रूप है, तो उन्होंनेइसकी प्रतिक्रिया में अजगर का सा आचरण ( वृत्ति ) ग्रहण कर लिया।
वे एक ही स्थान पर लेटेरहने लगे।
वे लेटे ही लेटे खाते, पीते, पेशाब तथा मल त्याग करते और उसी पर लोट-पोटकरते।
यहाँ तक कि वे अपने सारे शरीर को अपने ही मल-मूत्र से सान लेते जिससे उनकेविरोधी उन्हें विच्चत्नित न करें।
तस्य ह यः पुरीषसुरभिसौगन्ध्यवायुस्तं देशं दशयोजनं समन्तात्सुरभि चकार ॥
३३॥
तस्यथ--उसकी; ह--निस्संदेह; यः--जो; पुरीष--मल की; सुरभि--सुगन्धि से; सौगन्ध्य--सुरभित होकर; वायु:--वायु;तम्--उस; देशम्--देश को; दश योजनम्--दस योजन तक ( एक योजन आठ मील के तुल्य ); समन्तात्--चारों ओर;सुरभिम्--सुगन्धित; चकार--कर दिया।
इस अवस्था में रहने के कारण जनता ने ऋषभदेव को परेशान नहीं किया।
परंतु उनके मल-मूत्र से दुर्गन्धि नहीं निकली।
उल्टे, उनका मल-मूत्र इतना सुगन्धित था कि अस्सी मील तक काप्रदेश इसकी सगन्ध से भर गया।
एवं गोमृगकाकचर्यया ब्रजंस्तिष्ठन्नासीन: शयान: काकमृगगोचरितः पिबति खादत्यवमेहति सम ॥
३४॥
एवम्--इस प्रकार; गो--गायों; मृग--हिरन; काक--कौबवे की; चर्यया--चर्या ( क्रिया ) द्वारा; ब्रजन्--घूमते हुए; तिष्ठन्--खड़े-खड़े; आसीन:--बैठे हुए; शयान:--लेटे हुए; काक-मृग-गो-चरितः--कौबों, हिरणों तथा गायों की भाँति आचरणकरते हुए; पिबति--पीता है; खादति--खाता है; अवमेहति--पेशाब करता है; स्म--उसने ऐसा किया।
इस प्रकार ऋषभदेव ने गायों, हिरणों तथा कौवों की वृत्ति का अनुगमन किया।
कभी वेइधर-इधर चलते तो कभी एक स्थान पर बैठे रहते।
कभी वे लेट जाते।
इस प्रकार वे गाय,हिरण तथा कौवे के समान ही आचरण करते।
उन्हीं के समान वे खाते-पीते तथा मल-मूत्र कात्याग करते।
इस प्रकार वे लोगों को धोखे में रखे रहे।
इति नानायोगचर्याचरणो भगवान्कैवल्यपतिरृषभो विरतपरममहानन्दानु भव आत्मनिसर्वेषांभूतानामात्मभूते भगवति वासुदेव आत्मनोव्यवधानानन्तरोदरभावेन सिद्धसमस्तार्थपरिपूर्णो योगै श्वर्याणिवैहायसमनोजवान्तर्धानपरकायप्रवेशदूरग्रहणादीनि यहच्छयोपगतानि नाञजसा नृप हृदयेना भ्यनन्दत्, ॥
३५॥
इति--इस प्रकार; नाना--अनेक; योग--योग की; चर्या--क्रियाएँ; आचरण: --अभ्यास करते हुए; भगवान्-- भगवान्;कैवल्य-पति:--कैवल्य के स्वामी अथवा सायुज्य मुक्ति के दाता; ऋषभ:ः--ऋषभदेव; अविरत--निरन्तर; परम--परम; महा--अत्यधिक; आनन्द-अनुभव:-- आनन्द के अनुभव द्वारा; आत्मनि--परम-आत्मा में; सर्वेषाम्--सब; भूतानाम्--जीवात्माओंके; आत्म-भूते--हृदय में स्थित होकर; भगवति-- भगवान्; वासुदेवे --वसुदेव के पुत्र, श्रीकृष्ण में; आत्मन:--स्वयं का;अव्यवधान--विधान में अन्तर न आने से; अनन्त-- असीम; रोदर--यथा रोदन, हास तथा सिहरन; भावेन--प्रेम के लक्षणों से;सिद्ध--सिद्ध, पूर्ण; समस्त--सब; अर्थ--वांछित धन; परिपूर्ण: --पूरित; योग-ऐश्वर्याणि---योग-शक्तियाँ; वैहायस-- आकाशमें उड़ना; मनः-जब--मन की गति से दौड़ना; अन्तर्धान--अहृश्य होने की शक्ति; परकाय-प्रवेश --दूसरे के शरीर में प्रवेशकरने की क्षमता; दूर-ग्रहण--दूर की वस्तुओं को देखने की शक्ति, दूर-दृष्टि; आदीनि--इत्यादि; यहच्छया--स्वतः, बिनाकिसी बाधा के; उपगतानि-- प्राप्त किया; न--नहीं; अद्जसा- प्रत्यक्षत: ; नृप--हे राजा परीक्षित; हृदयेन--हृदय से;अभ्यनन्दत्ू--स्वीकार कर लिया।
हे राजा परीक्षित, श्रीकृष्ण के अंश भगवान् ऋषभदेव ने समस्त योगियों को योगसाधनाप्रदर्शित करने के उद्देश्य से अनेक विचित्र कार्य किये।
वे मुक्ति के स्वामी थे और दिव्य आनन्दमें सतत लीन रहते थे।
जो हजारों गुणा बढ़ गया था।
वसुदेव के पुत्ररुप वासुदेव कृष्ण उनकेआदि कारण हैं।
उनके स्वरूप में कोई अन्तर नहीं; फलतः भगवान् ऋषभदेव रोने, हँसने तथाथरथराने के प्रिय लक्षण प्रकट करने लगे।
वे दिव्य प्रेम में सदैव निमग्न रहते।
फलस्वरूप सभीयोग शक्तियाँ अपने आप उनके पास पहुँचती--यथा मन की गति से आकाश-गमन, प्रकट औरअदृश्य होना, अन्यों के शरीर में प्रवेश कर जाना तथा दूरस्थ वस्तुओं को देख पाना।
यद्यपि वेइन सबको कर सकने में समर्थ थे, किन्तु उन्होंने इन शक्तियों का प्रयोग नहीं किया।
