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अध्याय पच्चीसवाँ: भगवान अनंत की महिमा

5.25श्रीशुक उबाचतस्य मूलदेशे त्रिंशद्योजनसहस्त्रान्तर आस्ते या वै कला भगवतस्तामसीसमाख्यातानन्त इति सात्वतीयाद्रष्टटश्ययो: सड्डर्षणमहमित्यभिमानलक्षणं य॑ सड्डूर्षणमित्याचक्षते, ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी बोले; तस्थ--पाताललोक के; मूल-देशे --मूलभाग में; त्रिंशत्‌--तीस; योजन--आठमील की दूरी की इकाई; सहस्त्र-अन्तरे--एक हजार ( योजन ) की दूरी पर; आस्ते--स्थित है; या--जो; वै--निश्चय ही;कला--अंश का अंश; भगवत: -- श्री भगवान्‌ का; तामसी--अंधकार से सम्बन्धित; समाख्याता--कहलाने वाला; अनन्त:--अनन्त; इति--इस प्रकार; सात्वतीया:--भक्तगण; द्रष्ट-दहश्ययो:--पदार्थ तथा आत्मा का; सड्डूर्षणम्‌--परस्पर आकर्षित करनेवाला; अहम्‌--मैं; इति--इस प्रकार; अभिमान--आत्म-सम्मान; लक्षणम्‌--लक्षण; यम्‌--जिसको; सड्डूर्षणम्‌--संकर्षण;इति--इस प्रकार; आचक्षते--विद्वान कहते हैं।

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित से कहा--हे राजन्‌ू, पाताल लोक से २,४०,०००मील नीचे श्रीभगवान्‌ के एक अन्य अवतार निवास करते हैं।

वे भगवान्‌ अनन्त अथवा भगवान्‌संकर्षण कहलाते हैं और भगवान्‌ विष्णु के अंश हैं।

वे सदैव दिव्य पद पर आसीन हैं, किन्तुतमोगुणी देवता भगवान्‌ शिव के आराध्य होने के कारण कभी-कभी तामसी कहलाते हैं।

भगवान्‌ अनन्त सभी बद्धजीवों के अहं तथा तमोगुण के प्रमुख देवता हैं।

जब बद्धजीव यहसोचता है कि यह संसार भोग्य है और मैं उसका भोक्ता हूँ तो यह जीवन-दृष्टि संकर्षण द्वाराप्रेरित होती है।

इस प्रकार संसारी बद्धजीव स्वयं को ही परमेश्वर मानने लगता है।

यस्येदं क्षितिमण्डलं भगवतोनन्तमूर्तें: सहस््रशिरस एकस्मिन्नेव शीर्षणि प्नियमाणं सिद्धार्थ इबलक्ष्यते ॥

२॥

यस्य--जिसका; इदम्‌--यह; क्षिति-मण्डलम्‌--ब्रह्माण्ड; भगवत:-- श्रीभगवान्‌ का; अनन्त-मूर्ते: --अनन्त देव के रूप में;सहस्त्र-शिरसः--एक हजार फणों वाले; एकस्मिनू--एक; एव--केवल; शीर्षणि --फण में; प्रवियमाणम्‌--रखा हुआ;सिद्धार्थ: इब--( तथा ) श्वेत सरसों के दाने के तुल्य; लक्ष्यते--दिखाई पड़ता है |

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा-- भगवान्‌ अनन्त के सहस्त्र फणों में से एक फण के ऊपररखा हुआ यह विशाल ब्रह्माण्ड श्रेत सरसों के दाने के समान प्रतीत होता है।

भगवान्‌ अनन्त के फण की तुलना में यह नगण्य है।

यस्य ह वा इदं कालेनोपसझ्िहीर्षतो मर्षविरचितरुचिर भ्रमद्भ्रुवोरन्तरेण साड्डूर्षणो नाम रुद्रएकादश्व्यूहस्त्र्यक्षस्त्रशिखं शूलमुत्तम्भयन्नुदतिष्ठत्‌: ॥

३॥

यस्य--जिसका; ह वा--निस्सन्देह; इदम्‌ू--यह ( जगत ); कालेन--कालक्रम से; उपसझ्िहीर्षत:--संहार करने की कामनाकरते हुए; अमर्ष--क्रोध से; विरचित--निर्मित; रुचिर-- अत्यन्त सुन्दर; भ्रमत्‌-घूमते हुए; भ्रुवो:--भूकुटियाँ के; अन्तरेण--भीतर से; साड्डूर्षण: नाम--सांकर्षण नामक; रुद्र:ः--भगवान्‌ शिव के अवतार, रुद्र; एकादश-दव्यूह:--ग्यारह विस्तारों वाला;ब्रि-अक्ष: --तीन नेत्र; त्रि-शिखम्‌--तीन नोकों वाले; शूलम्‌--त्रिशूल; उत्तम्भवन्‌--उठाते हुए; उदतिष्ठत्‌--उठा |

प्रलयकाल उपस्थित होने पर जब भगवान्‌ अनन्तदेव सम्पूर्ण सृष्टि का संहार करना चाहते हैं,तो वे कुछ क्रुद्ध हो जाते हैं।

तब उनकी दोनों भूकुटियों के बीच से त्रिशूल धारण किये हुएत्रिनेत्र रुद्र प्रकट होते हैं।

यह रुद्र, जो संकर्षण कहलाते हैं, ग्यारह रुद्रों, अर्थात्‌ भगवान्‌ शिवके अवतारों का व्यूह होता है।

वे सम्पूर्ण सृष्टि के संहार हेतु प्रकट होते हैं।

यस्याड्प्रिकमलयुगलारुणविशदनखमणिषण्डमण्डलेष्वहिपतय: सहसात्वतर्षभेरेकान्तभक्तियोगेनावनमन्तः स्ववदनानिपरिस्फुरत्कुण्डलप्रभामण्डितगण्डस्थलान्यतिमनोहराणि प्रमुदितमनस: खलु विलोकयन्ति ॥

४॥

यस्य--जिसके; अड्प्रि-कमल--चरणकमल; युगल--दोनों; अरुण-विशद--चटक गुलाबी; नख--नाखूनों का; मणि-घण्ड--मणियों के समान; मण्डलेषु--गोलाकार पूृष्ठों पर; अहि-पतय:--सर्पों के स्वामी; सह--साथ; सात्वत-ऋषभे: -- श्रेष्ठभक्तों के; एकान्त-भक्ति-योगेन--शुद्ध भक्ति के साथ; अवनमन्तः--नमस्कार करते हुए; स्व-वदनानि--अपने-अपने मुखों;परिस्फुरत्‌ू--चमकते हुए; कुण्डल--कान की बालियों की; प्रभा--ज्योति से; मण्डित--अलंकृत; गण्ड-स्थलानि--जिनकेगाल; अति-मनोहराणि-- अत्यन्त मनोहर; प्रमुदित-मनसः--प्रसन्न मन से; खलु--निस्संन्देह; विलोकयन्ति--देखते हैं।

भगवान्‌ संकर्षण के चरणकमलों के गुलाबी तथा पारदर्शी नाखून मानो दर्पण जैसेचमकाये गये बहुमूल्य मणि हैं।

जब शुद्ध भक्त तथा नागों के अधिपति अत्यन्त भक्तिभाव से उन्हेंनमस्कार करते हैं, तो उनके चरण-नखों में अपने सुन्दर मुखों की छाया देखकर अत्यन्त प्रमुदितहो उठते हैं।

उनके गालों पर कान की देदीप्यमान्‌ बालियाँ दमकती हैं और उनकी मुख-कान्तिअत्यन्त मोहक होती है।

यस्यैव हि नागराजकुमार्य आशिषआशासानाश्चार्वड्बलयविलसितविशद्‌विपुलधवलसुभगरुचिरभुजरजतस्तम्भेष्वगुरुचन्दन कुड्डू मपड्ढानुलेपेनावलिम्पमानास्तदभिमर्शनोन्मथितहदयमकरध्वजावेशरूचिरललितस्मितास्तदनुरागमदमुदितमदविधूर्'णतारुणकरुणावलोकनयनवदनारविन्दं सब्रीडं किल विलोकयन्ति ॥

५॥

यस्य--जिसकी; एव--ही; हि--निस्सन्देह; नाग-राज-कुमार्य:--नागराज की कुमारियाँ; आशिष:--आशीर्वाद;आशासाना:--आशावान होकर; चारु--सुन्दर; अड्र-बलय--शरीर मंडल पर; विलसित--शोभित; विशद्‌--निष्कलंक;विपुल--दीर्घ; धवल-- श्वेत; सुभपग--सौभाग्यसूचक; रुचिर--सुन्दर; भुज-- भुजाओं पर; रजत-स्तम्भेषु--चाँदी के ख भों केसमान; अगुरु--सुगन्धित पदार्थ का; चन्दन--चन्दन का; कुड्डू म--केशर का; प्छू--चंदन से; अनुलेपेन--लेप से;अवलिम्पमाना: --लेपन करके; तत्‌-अभिमर्शन--अपने अंगों में स्पर्श द्वारा; उन्मधित--मथा हुआ; हृदय--हृदयों में; मकर-ध्वज--कामदेव का; आवेश--प्रवेश के कारण; रुचिर--अत्यन्त सुन्दर; ललित--नम्न; स्मिता:--मन्द-हास्य करती हुई;तत्‌--उसका; अनुराग--अनुराग; मद--गर्व से; मुदित--प्रसन्न; मद--दया के गर्व से; विघूर्णित--घूमती हुईं; अरूण--गुलाबी; करूण-अवलोक--करुणा की दृष्टि से; नयन--नेत्र; वदन--( तथा ) मुख; अरविन्दम्‌--कमलपुष्प के सहश; स-ब्रीडमू--सलज; किल--निस्सन्देह; विलोकयन्ति--देखते हैं|

भगवान्‌ अनन्त की आकर्षक दीर्घ भुजाएँ कंगनों से आकर्षक ढंग से अलंकृत हैं औरपूर्णतया आध्यात्मिक हैं।

श्वेत होने के कारण वे चाँदी के ख भों सी प्रतीत होती हैं।

जब भगवान्‌के शुभाशीर्वाद की इच्छुक नागराजों की कुमारियाँ उनकी बाहों में अगुरु, चन्दन तथा कुमकुमका लेप लगाती हैं, तो उनके स्पर्श से उनके भीतर कामेच्छा जाग्रत हो उठती है।

उनके मनोभावोंको समझ कर भगवान्‌ जब इन राजकुमारियों को कृपापूर्ण मुस्कान से देखते हैं, तो वे यहसोचकर लजा जाती हैं कि वे उनके मनोभावों को जानते हैं।

तब वे मनोहर मुसकान सहित भगवान्‌ के मुखकमल को देखतीं हैं, जो उनके भक्तों के प्यार से प्रमुदित तथा मद-विह्लल घूमतीहुई लाल-लाल आँखों से सुशोभित रहता है।

स एवं भगवाननन्तोनन्तगुणार्णव आदिदेव उपसंहतामर्षरोषवेगो लोकानां स्वस्तय आस्ते ॥

६॥

सः--वह; एव--निश्चय ही; भगवान्‌-- श्रीभगवान्‌; अनन्त:--अनन्तदेव; अनन्त-गुण-अर्णव:--असीम दिव्य गुणों के सागर;आदि-देवः--आदि ईश्वर अथवा आधद्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ से अभिन्न रूप; उपसंहत--जिसने इन्द्रियनिग्रह किया है;अमर्ष--उसकी असहनशीलता का; रोष--( तथा ) क्रोध; वेग: --वेग, शक्ति; लोकानामू--सभी लोकों के मनुष्यों के;स्वस्तये--कल्याण हेतु; आस्ते--रहते हैं |

भगवान्‌ संकर्षण अनन्त दिव्य गुणों के सागर हैं जिससे वे अनन्तदेव कहलाते हैं।

बे पूर्णपुरुषोत्तम भगवान्‌ से अभिन्न हैं।

इस जगत के समस्त जीवों के कल्याण हेतु वे अपने क्रोध तथा अपनी असहनशीलता को रोके हुए अपने धाम में निवास करते हैं।

ध्यायमान: सुरासुरोरगसिद्धगन्धर्वविद्याधरमुनिगणैरनवरतमदमुदितिविकृतविह्ललोचन:सुललितमुखरिकामृतेनाप्यायमान: स्वपार्षदविबुधयूथपतीनपरिम्लानरागनवतुलसिकामोदमध्वासवेनमाह्न्मधुकरब्रातमधुरगीतभ्रियं वैजयन्तीं स्वां वममालां नीलवासा एककुण्डलो हलककुदिकृतसुभगसुन्दरभुजो भगवान्महेन्द्रो वारणेन्द्र इव काञ्जनीं कक्षामुदारलीलो बिभर्ति ॥

७॥

ध्यायमान:--ध्यान किये जाते हुए; सुर--देवताओं को; असुर--असुर; उरग--सर्प; सिद्ध--सिद्धलोक के वासी; गन्धर्व--गंधर्वलोक के वासी; विद्याधर--विद्याधर; मुनि--मुनि; गणैः--समूहों द्वारा; अनवरत--लगातार; मद-मुदित--मद से प्रसन्न;विकृत--चञ्जल; विहल--इधर-उधर घूमते हुए; लोचन:--जिनके नेत्र; सु-ललित--सुललित; मुखरिक--वाणी के;अमृतेन--अमृत से; आप्यायमान:--अच्छे लगने वाले; स्व-पार्षद--अपने सहयोगी; विबुध-यूथ-पतीन्‌--देवताओं के विभिन्नसमूहों के प्रमुख; अपरिम्लान--कभी न म्लान होने वाले; राग--जिसकी कांति; नव--नवीन; तुलसिका--तुलसी की मंजरियोंकी; आमोद--सुगंधि से; मधु-आसवेन--तथा मधु ( शहद ) से; माद्यनू--मद से युक्त होकर; मधुकर-ब्रात--मधुमक्खियों का;मधुर-गीत--मीठे गानों से; श्रीयम्‌--अधिक सुन्दर बनकर; बैजयन्तीम्‌--वैजयन्ती नामक माला; स्वाम्‌--अपना; वनमालाम्‌--माला; नील-बासा:--नीले अम्बर से आवृत; एक-कुण्डल:--केवल एक कुण्डल धारण किये हुए; हल-ककुदि--हल की मुठिया पर; कृत--रखा हुआ; सुभग--शुभ; सुन्दर--सुन्दर; भुज:--हाथ; भगवानू-- श्री भगवान्‌; महा-इन्द्र:--स्वर्ग के राजा;वारण-इन्द्र:--हाथी; इब--सहश; काझ्जनीम्‌ू--स्वर्णिम; कक्षाम्‌--मेखला; उदार-लील:--दिव्य लीलाओं में संलग्न;बिभर्ति--पहनते हैं |

शुकदेव गोस्वामी आगे बोले--देवता, असुर, उरग ( सर्पदेव ), सिद्ध, गंधर्व, विद्याधर तथाअनेक सिद्ध सन्‍्तजन भगवान्‌ की निरन्तर प्रार्थना करते रहते हैं।

मद के कारण भगवान्‌ विहलप्रतीत होते हैं और उनके नेत्रपूर्ण पुष्पित फूलों की भाँति इधर-उधर गति करते हैं।

वे अपने मुखसे निकली मधुर वाणी से अपने पार्षदों, देवताओं के प्रमुखों को प्रसन्न करते हैं।

नीलाम्बर औरकान में एक कुण्डल धारण किये हुए वे अपनी पीठ पर हल को अपने दो सुघड़ हाथों से पकड़ेहुए हैं।

वे इन्द्र के समान श्वेत लगते हैं, वे अपनी कटि में स्वर्णिम मेखला और गले में चिर नवीनतुलसी दलों की वैजयन्तीमाला धारण किये हैं।

तुलसी दलों की मधु जैसी गन्ध से आकर्षितहोकर मधुमक्खियाँ माला के चारों ओर मँडराती रहती हैं, जिससे माला और भी सुन्दर लगनेलगती है।

इस प्रकार भगवान्‌ दिव्य लीलाओं में संलग्न रहते हैं।

य एष एवमनुश्रुतो ध्यायमानो मुमुक्षूणामनादिकालकर्मवासनाग्रथितमविद्यामयं हृदयग्रन्थिसत्त्वरजस्तमोमयमन्तईदयं गत आशु निर्भिनत्ति तस्यानुभावान्भगवान्स्वायम्भुवो नारदः सह तुम्बुरुणासभायां ब्रह्मण: संश्लोकयामास ॥

८॥

यः--जो; एष: --यही; एवम्‌--इस प्रकार; अनुश्रुत:-- प्रामाणिक गुरु से सुना जाकर; ध्यायमान:--ध्यान किया गया;मुमुक्षूणाम्‌ू-बद्ध जीवन से मुक्ति के आकांक्षी मनुष्यों का; अनादि--अनन्त; काल--काल; कर्म-बासना--कर्मो की कामनाद्वारा; ग्रधितम्‌--हढ़ता से बँधा हुआ; अविद्या-मयम्‌--माया शक्ति से युक्त; हृदय-ग्रन्थिमू--हृदय के भीतर की गाँठ; सत्त्व-रज:-तमः-मयम्‌--प्रकृति के तीनों गुणों से युक्त; अन्त:-हदयम्‌--हृदय के भीतर; गत:--स्थित; आशु--शीघ्र ही;निर्भिनत्ति--काटता है; तस्थ--संकर्षण का; अनुभावान्‌--यश; भगवान्‌-- अत्यन्त शक्तिमान; स्वायम्भुव: --ब्रह्मा के पुत्र;नारद:--नारद मुनि; सह--साथ ; तुम्बुरुणा --तारयुक्त वाद्य यंत्र, तँबूरा के; सभायाम्‌--सभा में; ब्रह्मण:-- भगवान्‌ ब्रह्मा का;संश्लोकयाम्‌ आस--श्लोकों में वर्णित

यदि भौतिक जीवन से मुक्ति पाने के इच्छुक पुरुष शिष्य परम्परा से प्राप्त गुरु के मुख सेअनन्तदेव के यश को सुनते हैं और यदि वे संकर्षण का निरन्तर ध्यान धरते हैं, तो भगवान्‌ उनकेअन्तःकरण में प्रवेश करते हुए प्रकृति के तीनों गुणों के सारे कल्मष को दूर कर देते हैं औरहृदय की उस कठोर ग्रंथि को काट देते हैं, जो सकाम कर्मों के द्वारा प्रकृति पर प्रभुत्व पाने कीअभिलाषा के कारण अनन्त काल से हढ़ता से बँधी हुई है।

भगवान्‌ ब्रह्मा के पुत्र नारद मुनिअपने पिता की सभा में अनन्तदेव के यश का सदैव गान करते हैं।

वहाँ वे अपने द्वारा रचित शुभ अलोकों का गान अपने तम्बूरे के साथ करते हैं।

उत्पत्तिस्थितिलयहेतवोस्य कल्पाःसत्त्वाद्या: प्रकृतिगुणा यदीक्षयासन्‌ ।

यद्वूपं श्रुवमकृतं यदेकमात्मन्‌नानाधात्कथमु ह वेद तस्य वर्त्म ॥

९॥

उत्पत्ति--सृजन का; स्थिति-- धारण या पालन; लय--( तथा ) संहार या प्रलय; हेतवः --मूल कारण; अस्य--इस जगत के;'कल्पाः --समर्थ होते हैं; सत्त्त-आद्या:--सत्त्वगुण इत्यादि; प्रकृति-गुणा:--भौतिक प्रकृति के गुण; यत्‌--जिसकी; ईक्षया--इृष्टि मात्र से; आसन्‌--हो गया; यत्‌-रूपम्‌--जिसका स्वरूप; श्रुवम्‌ू--अपरिमित; अकृतम्‌--बिना उत्पत्ति हुए; यत्‌--जो;एकम्‌--एक; आत्मन्‌--स्वयं में; नाना-- अनेक; अधात्‌-- प्रकट हुआ; कथम्‌--कैसे; उ ह--निश्चय ही; वेद--जान सकता है;तस्य--उसका; वर्त्म--पथ, मार्गपूर्ण

पुरुषोत्तम भगवान्‌ की दृष्टि फेरने से ही जगत की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय केकारणस्वरूप भौतिक प्रकृति के गुणों को अपने-अपने कार्य में समर्थ कर देते हैं।

परमात्मा अनन्त तथा अनादि हैं और एक होते हुए भी अपने को नाना रूपों में प्रकट करते हैं।

भला ऐसेपरमेश्वर के कार्यों को मानव समाज कैसे जान सकता है ?

मूर्ति न: पुरुकृपया बभार सत्त्वंसंशुद्धं सदसदिदं विभाति तत्र ।

यल्लीलां मृगपतिराददेडनवद्या-मादातुं स्वजनमनांस्युदारवीर्य: ॥

१०॥

मूर्तिमू-- श्रीभगवान्‌ के विविध रूपों को; न:--हमको; पुरु-कृपया--अत्यन्त कृपाकरके; बभार-- प्रदर्शित किया; सच्त्वम्‌--अस्तित्त्व; संशुद्धमू--नितान्त दिव्य; सत्‌-असत्‌ इदम्‌--कार्य-कारण स्वरूप यह भौतिक जगत; विभाति--प्रकाशित होता है;तत्र--जिसमें; यत्‌-लीलामू--जिनकी लीलाएँ; मृग-पतिः--सिंह के समान समस्त जीवों का स्वामी; आददे--शिक्षा दी;अनवद्यामू--कल्मषहीन; आदातुम्‌--जीतने के लिए; स्व-जन-मनांसि--अपने भक्तों के मन में; उदार-वीर्य: --जो अत्यन्त उदार

एवं शक्तिमान हैपूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ के भीतर स्थूल व सूक्ष्म जगत का अस्तित्व विद्यमान है।

अपने भक्तोंपर अहैतुकी कृपावश बे विभिन्न दिव्य रूपों को प्रदर्शित करते हैं।

परमेश्वर अत्यन्त उदार हैं एवंउनमें समस्त योग शक्तियाँ हैं।

अपने भक्तों के मन को जीतने तथा उनके हृदय को आनन्दितकरने के लिए वे नानाविध अवतारों में प्रकट होते हैं और अनेक लीलाएँ करते हैं।

यन्नाम श्रुतमनुकीर्तयेदकस्मा-दार्तो वा यदि पतितः प्रलम्भनाद्वा ।

हन्त्यंहः सपदि नृणामशेषमन्यंक॑ शेषाद्धगवत आश्रयेन्मुमुक्षु; ॥

११॥

यत्‌--जिनका; नाम--पवित्र नाम; श्रुतम्‌--सुना हुआ; अनुकीर्तयेतू--जप सकता है; अकस्मात्‌--दैवयोग से; आर्त:--विपदाग्रस्त व्यक्ति; वा--अथवा; यदि--यदि; पतित:--पतित व्यक्ति; प्रलम्भनात्‌ू--हँसी से; वा--अथवा; हन्ति--नष्ट करताहै; अंहः--पापी; सपदि--उस क्षण; नृणाम्‌ू--मानव समाज का; अशेषम्‌-- अपरिमित; अन्यम्‌--दूसरे को; कम्‌--क्या;शेषात्‌-- भगवान्‌ शेष की अपेक्षा; भगवत:--श्रीभगवान्‌ की; आश्रयेत्‌--शरण में जावे; मुमुक्षु:--मुक्तिकामी व्यक्ति |

यदि कोई आर्त अथवा पतित व्यक्ति भी प्रामाणिक गुरु से भगवान्‌ का पवित्र नाम सुनकरउसका जप करता है, तो वह तुरन्त पवित्र हो जाता है।

यदि वह हँसी में, अथवा अकस्मात्‌ भीभगवन्नाम का जप करता है, तो वह तथा जो उसे सुनता है समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं।

अतःभौतिक बन्धनों से छुटकारा चाहने वाला व्यक्ति भगवान्‌ शेष के नाम-जप से कैसे कतरा सकताहै? भला वह और किसकी शरण ग्रहण करे ?

मूर्धन्यर्पितमणुवत्सहस्त्रमूथ्नोभूगोल सगिरिसरित्समुद्रसत्त्वम्‌ ।

आननन्‍्त्यादनिमितविक्रमस्य भूम्नःको वीर्याण्यधि गणयेत्सहस्त्रजिहः ॥

१२॥

मूर्थनि--शिर अथवा फण पर; अर्पितम्‌--स्थिर; अणु-बत्‌--अणु के समान; सहस्त्र-मूर्ध्न: --सहस्त्र फणों वाले अनन्त का; भू-गोलम्‌--यह ब्रह्माण्ड; स-गिरि-सरित्‌-समुद्र-सत्त्वम्‌-- अनेक पर्वतों, वृक्षों, समुद्रों तथा जीवात्माओं सहित; आनन्त्यात्‌ू--अनन्तहोने से; अनिमित-विक्रमस्थ-- अपरिमेय शक्ति; भूम्न:--परमे श्वर; क:ः--कौन; वीर्याणि--शक्तियाँ; अधि--निस्सन्देह;गणयेत्‌--गिन सकता है; सहस्त्र-जिहः-- भले ही सहस्त्र जीभें क्‍यों न हों |

अपरिमित होने के कारण ईश्वर की शक्ति का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

अनेकविशाल पर्वतों, नदियों, सागरों, वृक्षों तथा जीवात्माओं से पूर्ण यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उनके सहस्त्रों'फणों में से एक के ऊपर अणु के समान टिका हुआ है।

भला, सहस्त्र जिह्वाओं से भी क्या कोई उनकी महिमा का वर्णन कर सकता है?

एवम्प्रभावो भगवाननन्तोदुरन्तवीर्योरुगुणानु भाव: ।

मूले रसाया: स्थित आत्मतन्त्रोयो लीलया क्ष्मां स्थितये बिभर्ति ॥

१३॥

एवमू-प्रभाव: --इतना शक्तिशाली; भगवान्‌ -- श्रीभगवान्‌; अनन्त:---अनन्त; दुरन्त-वीर्य --अपार शौर्य; उरू--महान्‌; गुण-अनुभाव:--दिव्य गुणों तथा यशों से युक्त; मूले--पादभाग में; रसाया:--निम्नतर लोकों के; स्थित:--स्थित; आत्म-तन्त्र: --पूर्णतया आत्मनिर्भर; यः--जो; लीलया--सरलतापूर्वक; क्ष्मामू--ब्रह्माण्ड को; स्थितये--पालन हेतु; बिभर्ति-- धारण करताहै

उन शक्तिमान भगवान्‌ अनन्तदेव के महान्‌ एवं यशस्वी गुणों का कोई पारावार नहीं है।

वास्तव में उनका शौर्य अनन्त है।

स्वयं आत्मनिर्भर होते हुए भी बे प्रत्येक वस्तु के आधार हैं।

वेपाताललोक में वास करते हैं और इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को धारण किये रहते हैं।

एता होवेह नृभिरुपगन्तव्या गतयो यथाकर्मविनिर्मिता यथोपदेशमनुवर्णिता: कामान्कामयमानै: ॥

१४॥

एता:--ये सब; हि--निस्सन्देह; एव--ही; इह--इस ब्रह्माण्ड में; नृभिः--समस्त जीवों द्वारा; उपगन्तव्या:-- उपलब्ध करनेयोग्य; गतयः--गन्तव्य; यथा-कर्म--अपने-अपने पूर्व कर्मों के अनुसार; विनिर्मिता:--उत्पन्न किये गये; यथा-उपदेशम्‌--जैसाउपदेश दिया गया; अनुवर्णिता:--तदनुसार वर्णित; कामान्‌-- भौतिक सुख; कामयमानैः--कामना करने वालों के द्वारा

हे राजनमैंने अपने गुरु से जैसा सुना था, उसी रूप में मैंने बद्धजीवों के सकाम कर्मों एवंकामनाओं के अनुसार इस जगत की सृष्टि का पूर्ण वर्णन आपसे किया है।

भौतिक कामनाओं सेपूर्ण बद्धजीवों को विभिन्न लोकों में अनेक स्थान प्राप्त होते रहते हैं और इस प्रकार वे इसीभौतिक सृष्टि के भीतर रहते चले आते हैं।

एतावतीर्हि राजन्पुंस: प्रवृत्तिलक्षणस्य धर्मस्य विपाकगतय उच्चावचा विसद्ृशा यथाप्रश्नं व्याचख्येकिमन्यत्कथयाम इति ॥

१५॥

एतावती:--इतने प्रकार की; हि--ही; राजन्‌--हे राजन; पुंसः:--मानव प्राणियों की; प्रवृत्ति-लक्षणस्य-- प्रवृत्तियों द्वारालक्षणी भूत; धर्मस्य--कार्य सम्पादन का; विपाक-गतय:--परिणामी गन्तव्य; उच्च-अवचा: --उच्च तथा निम्न; विसहृशा: --विभिन्न; यथा-प्रश्नम्‌-- आपके प्रश्न के अनुसार; व्याचख्ये--मैंने वर्णन किया है; किम्‌ अन्यत्‌--और क्या; कथयाम--कहूँ;इति--इस प्रकार।

हे राजन, इस प्रकार मैंने आपको बताया है कि प्रायः मनुष्य किस प्रकार अपनी-अपनीइच्छाओं के अनुसार कार्य करते हैं और उसी के अनुसार उच्च या निम्न लोकों में भिन्न-भिन्नशरीर धारण करते हैं।

आपने ये बातें मुझसे पूछीं थी और मैंने जो अधिकारियों से सुना है उसेआपसे बता दिया।

अब आगे क्या सुनाऊँ ?

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