← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 5 की सूची
अध्याय चौबीस: भूमिगत स्वर्गीय ग्रह
5.24श्रीशुक उबाच अधस्तात्सवितुर्योजनायुते स्वर्भानुर्नक्षत्रवच्चरतीत्येकेयोउसावमरत्वं ग्रहत्वं चालभत भगवदनुकम्पयास्वयमसुरापसद: सैंहिकेयो ह्तदर्हस्तस्य तात जन्म कर्माणि चोपरिष्टाद्ृक्ष्याम:. ॥
१॥
श्री-शुक: उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी बोले; अधस्तात्--नीचे; सवितु:--सूर्य गोलक; योजन--आठ मील के बराबर कीदूरी; अयुते--दस हजार; स्वर्भानु:--राहु नामक ग्रह; नक्षत्र-वत्--नक्षत्र के समान; चरति--घूमता है; इति--इस प्रकार;एके--कुछ पुराणवेत्ता; य:--जो; असौ--वह; अमरत्वम्--देवताओं के सहश जीवन; ग्रहत्वम्--किसी प्रमुख ग्रह की सीस्थिति; च--और; अलभत-प्राप्त की गई; भगवत्-अनुकम्पया-- श्रीभगवान् की दया से; स्वयम्--स्वयं, साक्षात्; असुर-अपसद: --असुरों में निम्नतम; सैंहिकेय:--सिंहिका का पुत्र होने से; हि--निस्सन्देह; अ-तत्-अर्ह:--उस पद के लिए सुयोग्य;'तस्य--उसका; तात--हे राजन्; जन्म--जन्म; कर्माणि--क्रियाएँ; च-- भी ; उपरिष्टात्-बाद में ; वक्ष्याम:-- मैं कहूँगा |
\fश्रीशुकदेव गोस्वामी बोले--हे राजन, कुछ पुराण-वाचकों का कथन है कि सूर्य से१०,००० (८०,००० मील ) योजन नीचे राहु नामक ग्रह है जो नक्षत्रों की भाँति घूमता है।
इसग्रह का अधिष्ठाता देवता, जो सिंहिका का पुत्र है समस्त असुरों में घृणास्पद है और इस पद केलिए सर्वथा अयोग्य होने पर भी श्रीभगवान् की कृपा से उसे प्राप्त कर सका है।
मैं उसके विषयमें आगे कहूँगा।
यददस्तरणेममण्डलं प्रतपतस्तद्विस्तरतो योजनायुतमाचक्षते द्वादशसहस्त्रं सोमस्य त्रयोदशसहस्त्रं राहोर्य:'पर्वणि तद्व्यवधानकृद्वैरानुबन्ध: सूर्याचन्द्रमसमावभिधावति ॥
२॥
यत्--जो; अदः--वह; तरणे:--सूर्य का; मण्डलम्ू--गोलक; प्रतपत:ः--जो सदैव उष्मा प्रदान करता है; तत्--वह;विस्तरत:--विस्तार में; योजन--आठ मील की दूरी; अयुतम्--दस हजार; आचक्षते--उनका अनुमान है; द्वादश-सहस्त्रमू--बीस हजार योजन; सोमस्थ--चन्द्रमा का; त्रयोदश--तीस; सहस्त्रमू--हजार; राहो: --राहु नामक ग्रह का; यः--जो; पर्वणि--अवसर पर; ततू-व्यवधान-कृत्ू--जिसने अमृत वितरण के समय सूर्य तथा चन्द्रमा के लिए अवरोध उत्पन्न किया; बैर-अनुबन्ध: --वैर भाव; सूर्या--सूर्य; चन्द्रमसौ--तथा चन्द्रमा; अभिधावति--पूर्णिमा तथा अमावस्या के समय उनका पीछाकरता हैऊष्पा के स्त्रोत सूर्य गोलक का विस्तार १०,००० योजन ( ८०,००० मील ) है।
चन्द्रमा का २०,००० योजन ( १६०,००० मील ) और राहु का ३०,००० योजन ( २४०,००० मील ) तकफैला हुआ है।
अमृत वितरण के समय राहु ने सूर्य तथा चन्द्रमा के मध्य आसीन होकर उनकेबीच विद्वेष उत्पन्न करना चाहा।
राहु, सूर्य तथा चन्द्रमा दोनों के प्रति शत्रुभाव रखता है।
इसलिए वह सदा अमावस्या तथा पूर्णिमा के दिन उनको ढकने का प्रयल करता रहता है।
तन्निशम्योभयत्रापि भगवता रक्षणाय प्रयुक्त सुदर्शन नाम भागवतं दयितमस्त्रं तत्तेजसा दुर्विषहं मुहुःपरिवर्तमानमभ्यवस्थितो मुहूर्तमुद्बिजमानश्वकितहृदय आरादेव निवर्तते तदुपरागमिति वदन्ति लोकाः ॥
३॥
तत्--वह स्थिति; निशम्य--सुनकर; उभयत्र--सूर्य तथा चन्द्र दोनों के चारों ओर; अपि--निस्सन्देह; भगवता-- श्री भगवान्द्वारा; रक्षणाय--उनकी रक्षा हेतु; प्रयुक्तमू--संलग्न; सुदर्शनम्ू-- श्रीकृष्ण का चक्र; नाम--नामक; भागवतम्-- अत्यन्तविश्वासपात्र भक्त; दयितम्--अत्यन्त प्रिय; अस्त्रमू--आयुध; तत्--वह; तेजसा-- अपने तेज से; दुर्विषहम्--असह् गर्मी;मुहुः--बारम्बार; परिवर्तमानम्--सूर्य तथा चन्द्र की परिक्रमा करता हुआ; अभ्यवस्थित:--स्थित; मुहूर्तम्--एक मुहूर्त( ४८मिनट ) के लिए; उद्विजमान:--जिसका मन चिन्ताओं से पूर्ण है; चकित--चकित, डरा हुआ; हृदय:--हृदय; आरातू--सुदूर स्थान तक; एब--ही; निवर्तते-- भागता है; तत्ू--वह स्थिति; उपरागम्--ग्रहण; इति--इस प्रकार; वदन्ति--कहते हैं;लोकाः--लोग।
सूर्य तथा चन्द्र देवताओं से राहु के आक्रमण को सुन कर उनकी रक्षा हेतु भगवान् विष्णुअपना सुदर्शन चक्र चलाते हैं।
यह चक्र भगवान् का अत्यन्त प्रिय भक्त और प्रिय पात्र है।
अवैष्णवों के वध हेतु इसका प्रचण्ड तेज राहु के लिए असह्ाय है, अतः वह डर कर भाग जाताहै।
जब राहु चन्द्र या सूर्य को सताता है, तो ग्रहण लगता है।
ततोथधस्तात्सिद्धचारणविद्याधराणां सदनानि तावन्मात्र एव ॥
४॥
ततः--राहु ग्रह से; अधस्तात्--नीचे; सिद्ध-चारण--सिद्धलोक तथा चारण लोक का; विद्याधराणाम्--तथा विद्याधरों के ग्रहोंके; सदनानि-- आवास; तावत् मात्र--केवल उतनी ही दूरी ८०,००० मील; एब--निस्सन्देह |
राहु से १०,००० योजन (८०,००० मील) नीचे सिद्धलोक, चारणलोक तथा विद्याधरलोक हैं।
ततोथस्ताद्यक्षरक्ष:पिशाचप्रेतभूतगणानां विहाराजिरमन्तरिक्षं यावद्वायु: प्रवाति यावन्मेघा उपलभ्यन्ते ॥
५॥
ततः अधस्तात्ू--सिद्ध, चारण तथा विद्याधर लोकों से नीचे; यक्ष-रक्ष:-पिशाच-प्रेत-भूत-गणानाम्--यक्ष, राक्षस, पिशाच भूतइत्यादि के; विहार-अजिरम्-- भोग-विलास का स्थान; अन्तरिक्षम्--अन्तरिक्ष या आकाश में; यावत्--जहाँ तक; वायु: --वायु; प्रवाति-- बहती है; यावत्--जहाँ तक; मेघा: --मेघ; उपलभ्यन्ते--देखे जाते हैं ।
अन्तरिक्ष में विद्याधणलोक, चारणलोक तथा सिद्धलोक के नीचे यक्षों, राक्षसों, पिशाचों,भूतों इत्यादि के भोगविलास के स्थान हैं।
जहाँ तक वायु प्रवाहित होती है और आकाश मेंबादल तैरते हैं, वहाँ तक अन्तरिक्ष का विस्तार है।
इसके ऊपर वायु नहीं है।
ततोधस्ताच्छतयोजनान्तर इयं पृथिवी यावद्धंसभासएयेनसुपर्णादय: पतलत्रिप्रवरा उत्पतन्तीति ॥
६॥
ततः अधस्तात्--इससे भी नीचे; शत-योजन--एक सौ योजन; अन्तरे--दूरी पर; इयम्--यह; पृथिवी--पृथ्वी; यावत्--जितनाऊँचा; हंस--हंस पक्षी; भास--गिद्ध; श्येन--बाज; सुपर्ण-आदय: --तथा अन्य पक्षीगण; पतत्त्रि-प्रवरा: पक्षियों में श्रेष्ठ;उत्पतन्ति--उड़ सकते हैं; इति--इस प्रकार
यक्षों तथा राक्षसों के आवासों के नीचे १०० ( ८०० मील ) योजन की दूरी पर पृथ्वी ग्रह है।
इसकी ऊपरी सीमा उतनी ऊँचाई तक है जहाँ तक हंस, गिद्ध, बाज तथा अन्य बड़े पक्षी उड़सकते हैं।
उपवर्णितं भूमेर्यथासन्निवेशावस्थानमवनेरप्यधस्तात्सप्त भूविवरा एकैकशोयोजनायुतान्तरेणायामविस्तारेणोपक्रिप्ता अतलं वितलं सुतलं तलातलं महातलं रसातलं पातालमिति ॥
७॥
उपवर्णितम्--पूर्वकधित; भूमेः--पृथ्वी का; यथा-सन्निवेश-अवस्थानम्--विभिन्न स्थानों की योजना के अनुसार; अबने:--पृथ्वी के; अपि--निश्चय ही; अधस्तात्--नीचे; सप्त--सात; भू-विवरा:--अन्य लोक; एक-एकश: --क्रम से, ब्रह्माण्ड कीऊपरी सीमा तक; योजन-अयुत-अन्तरेण--दस हजार योजन के अन्तर पर; आयाम-विस्तारेण--चौड़ाई तथा लम्बाई में;उपक्रिप्ता:--स्थित; अतलम्ू--अतल; वितलम्--वितल; सुतलम्--सुतल; तलातलम्--तलातल; महातलम्--महातल;रसातलम्--रसातल; पातालम्--पाताल; इति--इस प्रकार।
हे राजन, इस पृथ्वी के नीचे सात अन्य लोक हैं, जो अतल, वितल, सुतल, तलातल,महातल, रसातल तथा पाताल कहलाते हैं।
मैं पृथ्वीलोक की स्थिति पहले ही बता चुका हूँ।
इनसात निम्नलोकों की चौड़ाई तथा लम्बाई पृथ्वी के बराबर ही परिगणित की गई है।
एतेषु हि बिलस्वर्गेषु स्वर्गादप्यधिककामभोगै श्चर्यानन्दभूतिविभूतिभि: सुसमृद्धभवनोद्यानाक्रीडविहारेषुदैत्यदानवकाद्रवेया नित्यप्रमुदितानुरक्तकलत्रापत्यबन्धुसुहदनुचरा गृहपतय ई श्वरादप्यप्रतिहतकामामायाविनोदा निवसन्ति ॥
८॥
एतेषु--इसमें से; हि--निश्चय ही; बिल-स्वर्गेषु--अध:-स्वर्ग लोकों में; स्वर्गात्--स्वर्गलोकों की अपेक्षा; अपि-- भी;अधिक--बढ़कर; काम-भोग--इन्द्रियभोग का सुख; ऐश्वर्य-आनन्द--ऐश्वर्यजन्य आनन्द; भूति--प्रभाव; विभूतिभि: --वस्तुओं तथा सम्पत्ति से; सु-समृद्ध--उन्नत; भवन--घर; उद्यान--उपवन, बगीचे; आक्रीड-विहारेषु--इन्द्रियतृप्ति के लिए नानाप्रकार के क्रीड़ा स्थलों में; दैत्य--दैत्य, असुर; दानव-- भूत-प्रेत; काद्रवेया:--सर्प; नित्य--शाश्वत; प्रमुदित-- अत्यधिकप्रसन्न; अनुरक्त--लगाव के कारण; कलत्र--पत्नी को; अपत्य--बच्चे; बन्धु--सगे सम्बन्धी; सुहत्--मित्र; अनुचरा: --अनुचर; गृह-पतय:--गृहस्वामी, घर का मुखिया; ईश्वरातू--देवताओं के तुल्य अधिक सक्षम जनों की अपेक्षा; अपि--भी;अप्रतिहत-कामा:--जिनकी कामेच्छा रोके नहीं रूकती; माया--मायामय; विनोदा:--जो सुख का अनुभव करते हैं;निवसन्ति--निवास करते हैं ।
बिल स्वर्ग ( नीचे के स्वर्ग ) कहलाने वाले इन सातों लोकों में अत्यन्त सुन्दर घर, उद्यानतथा क्रीड़ास्थलियाँ हैं, जो स्वर्गलोक से भी अधिक ऐश्वर्यशाली हैं, क्योंकि असुरों के विषय-भोग, सम्पत्ति तथा प्रभाव के मानक बहुत ऊँचे हैं।
इन लोकों के वासी दैत्य, दानव तथा नागकहलाते हैं और उनमें से बहुत से गृहस्थों की भाँति रहते हैं।
उनकी पत्लियाँ, सन्तानें, मित्र तथाउनका समाज मायामय भौतिक सुख में पूरी तरह मग्न रहता है।
भले ही देवताओं के ऐन्द्रिय-सुख में कभी-कभी बाधा आए, किन्तु इन लोकों के वासी अबाध जीवन व्यतीत करते हैं।
इसप्रकार उन्हें मायामय सुख में अत्यधिक लिप्त माना जाता है।
येषु महाराज मयेन मायाविना विनिर्मिता: पुरोनानामणिप्रवरप्रवेकविरचितविचित्रभवनप्राकारगोपुरसभाचैत्यचत्वरायतनादिभिर्नागासुरमिथुनपारावतशुकसारिकाकीर्णकृत्रिमभूमिभिर्विवरेश्वरगृहोत्तमै: समलड्डू ताश्चकासति ॥
९॥
येषु--उन अधोलोकों में ; महा-राज--हे राजन्; मयेन--मय दानव के द्वारा; माया-विना--वास्तुकला में दक्ष; विनिर्मिता: --निर्मित किया हुआ; पुरः--पुरियाँ; नाना-मणि-प्रवर--बहुमूल्य मणियों का; प्रवेक-- श्रेष्ठठटम; विरचित--निर्मित; विचित्र--आश्चर्यजनक; भवन--घर; प्राकार--भित्तियाँ; गोपुर--द्वार; सभा--सभागार; चैत्य--मन्दिर; चत्वर--पाठशालाएँ; आयतन-आदिभि:--होटलों या मनोरंजन-शालाओं आदि से युक्त; नाग--सर्प के सहश शरीर वाले जीवों का; असुर--असुरों याअनीश्चरवादी व्यक्तियों का; मिथुन--युग्मों द्वारा; पारावत--कबूतर; शुक--तोता; सारिका--मैना; आकीर्ण--समूहित;कृत्रिम--बनावटी; भूमिभि:-- भूमि से; विवर-ईश्वर--लोकों के अधिपतियों के; गृह-उत्तमैः--उत्तम घरों से; समलड्डू ता: --अलंकृत; चकासति--चमचमाते रहते हैं।
हे राजन, कृत्रिम स्वर्ग में, जिन्हें बिल-स्वर्ग कहते हैं, मय नामक एक महादानव है जोअत्यन्त कुशल वास्तुशिल्पी है।
उसने अनेक अलंकृत पुरियों का निर्माण किया है जहाँ अनेकविचित्र भवन, प्राचीर, द्वार, सभाभवन, मन्दिर, आँगन तथा मन्दिर-प्राचार एवं विदेशियों केरहने के होटल तथा आवास हैं।
इन ग्रहों के अधिपतियों के भवनों को अत्यन्त मूल्यवान रत्नों सेनिर्मित किया गया है।
ये भवन नागों तथा असुरों के अतिरिक्त अनेक कबूतरों, तोतों तथा अन्यपक्षियों से परिपूर्ण हैं।
कुल मिलाकर ये कृत्रिम स्वर्गिक पुरियाँ अत्यन्त आकर्षक ढंग सेअलंकृत की गई हैं।
उद्यानानि चातितरां मनइन्द्रियानन्दिभि: कुसुमफलस्तबकसुभगकिसलयावनतरूचिरविटपविटपिनांलताझलिड्डितानां श्रीभिः समिथुनविविधविहड़्मजलाशयानाममलजलपूर्णानांझषकुलोल्लड्डनक्षुभितनीरनीरजकुमुदकुवलयकह्ाारनीलोत्पललोहितशतपत्रादिवनेषुकृतनिकेतनानामेकविहाराकुलमधुरविविधस्वनादिभिरिन्द्रियोत्सवैरमरलोकश्रियमतिशयितानि ॥
१०॥
उद्यानानि--बाग तथा पार्क; च-- भी; अतितराम्--अत्यधिक; मन: --मन को; इन्द्रिय--तथा इन्द्रियों को; आनन्दिभि:--आनन्द प्रदान करने वाले; कुसुम--फूलों से; फल--फलों के; स्तबक-गुच्छे; सुभग --अत्यन्त सुन्दर; किसलय--नईटहनियाँ; अवनत--नीचे झुकी; रुचिर--आकर्षक; विटप--शाखाओं वाले; विटपिनामू--वृज्षों के; लता-अड्ड-आलिड्रितानामू-लताओं के अंगों द्वारा आलिंगित; श्रीभि: --सुन्दरता से; स-मिथुन--जोड़ों में; विविध--अनेक प्रकार के;विहड्डम-पक्षियों द्वारा; जल-आशयानाम्--जलागारों के; अमल-जल-पूर्णानाम्--निर्मल जल से पूर्ण; झष-कुल-उल्लड्डन--विविध प्रकार की मछलियों के कूदने से; क्षुभित--विश्लुब्ध; नीर--जल में; नीरज--कमलपुष्पों के; कुमुद--कुमुदिनी;कुवलय--कुबलय नामक पुष्प; कहार--कह्ार नामक पुष्प; नील-उत्पल--नीले कमल; लोहित--लाल; शत-पत्र-आदि--सौ पंखुड़ियों वाले कमलपुष्प इत्यादि; वनेषु--वनों में; कृत-निकेतनानाम्--उन पक्षियों का जिन्होंने अपने घोंसले बना लिए हैं;एक-विहार-आकुल--बेरोक सुख से पूर्ण; मधुर--अत्यधिक मीठा; विविध--नाना प्रकार के; स्वन-आदिभि:--क म्पनों से;इन्द्रिय-उत्सवै: --इन्द्रिय सुख मनाने वाले; अमर-लोक-श्रियम्ू--देवताओं के लोकों की सुन्दरता; अतिशयितानि--मात करनेवाले
कृत्रिम स्वर्गों के बाग-बगीचे स्वर्गलोक के उद्यानों की शोभा को मात करने वाले हैं।
उन उद्यानों के वृक्ष लताओं से लिपटे जाकर फलों तथा फूलों से लदी शाखाओं के भार से झुकेरहते हैं, जिसके कारण वे अतीव सुन्दर लगते हैं।
यह सुन्दरता किसी को भी आकृष्ट करनेवालीऔर मन को भोगेच्छा से प्रफुल्लित कर देने वाली है।
वहाँ अनेक जलाशय एवं झीलें हैं जिनकाजल निर्मल, पारदर्शी है तथा मछलियों के कूदने से उद्देलित होता रहता है और कुमुदिनी,कुवलय, कह्ार तथा नील एवं लाल कमल के पुष्पों से सुसज्जित रहता है।
झीलों में चक्रवाकके जोड़े तथा अन्य अनेक जलपक्षी विहार करते हैं और प्रसन्न होकर कलरव करते हैं जिसेसुनकर मन और इन्द्रियों को अत्यन्त आह्वाद होता है।
यत्र ह वाव न भयमहोरात्रादिभि: कालविभागैरुपलक्ष्यते ॥
११॥
यत्र--जहाँ; ह वाव--निश्चय ही; न--नहीं; भयम्-- भय, डर; अहः-रात्र-आदिभि:--दिन और रात के कारण; काल-विभागै:ः--काल के विभाग; उपलक्ष्यते--अनुभव किया जाता है।
चूँकि उन अध:लोकों में सूर्य का प्रकाश नहीं जाता, अतः काल दिन तथा रात में विभाजितनहीं है, जिसके फलस्वरूप काल से उत्पन्न भय नहीं रहता।
यत्र हि महाहिप्रवरशिरोमणय: सर्व तमः प्रबाधन्ते ॥
१२॥
यत्र--जहाँ; हि--निस्सन्देह; महा-अहि--बड़े-बड़े सर्पो के; प्रवर--सर्व श्रेष्ठ; शिर:-मणय:--फनों पर स्थित मणियाँ; सर्वम्--सभी; तम:ः--अंधकार; प्रबाधन्ते--दूर भगाती हैं|
वहाँ अनेक बड़े-बड़े सर्प वास करते हैं जिनके फनों की मणियों के प्रकाश से अंधकार दूरभाग जाता है।
न वा एतेषु वसतां दिव्यौषधिरसरसायनातन्नपानस्नानादिभिराधयो व्याधयो वलीपलितजरादयश्चदेहवैवर्ण्यदौर्गन्ध्यस्वेदक्लमग्लानिरिति वयोवस्थाश्व भवन्ति ॥
१३॥
न--नहीं; वा--या; एतेषु--इन लोकों में; वबसताम्--बसने वालों का; दिव्य--विस्मयकारी; औषधि--जड़ी बूटियों का;रस--रस; रसायन--तथा अमृत; अन्न--खाने से; पान--पीने से; स्नान-आदिभि: --स्नान आदि करने से; आधय:--मानसिकक्लेश; व्याधय: --रोग, व्याधियाँ; वली--झुर्रियाँ; पलित--पके केश; जरा--वृद्धावस्था; आदय:-- आदि; च--तथा; देह-वैवर्ण्य--शारीरिक कान्ति का म्लान पड़ना; दौर्गन्ध्य--दुर्गन््ध; स्वेद--पसीना; क्लम-- थकान; ग्लानि: --शक्ति-क्षय; इति--इस प्रकार; वयः अवस्था:-- आयु के बढ़ने के कारण उत्पन्न शोचनीय दशाएँ; च-- भी; भवन्ति--हैं |
चूँकि इन लोकों के निवासी जड़ी-बूटियों से बने रस तथा रसायन का पान करते हैं औरउनमें स्नान करते हैं, अतः वे सभी प्रकार की चिन्ताओं और व्याधियों से मुक्त रहते हैं।
न तोउनके केश सफेद होते हैं, न झुर्रियाँ पड़ती हैं, न वे अशक्य होते हैं।
उनकी शारीरिक कान्तिकभी मलिन नहीं पड़ती, उनके पसीने से दुर्गन््ध नहीं आती और न तो उन्हें थकान, न ही शक्तिका अथवा वृद्धावस्थाजन्य उत्साह का अभाव सताता है।
न हि तेषां कल्याणानां प्रभवति कुतश्चन मृत्युर्विना भगवत्तेजसश्नक्रापदेशात् ॥
१४॥
न हि--नहीं; तेषामू--उनका; कल्याणानाम्--जो स्वभाव से शुभ होते हैं; प्रभवति--प्रभाव डालने में सक्षम; कुतश्चन--कहींसे भी; मृत्यु:--मृत्यु; विना--के सिवा; भगवतू-तेजसः --श्रीभगवान् की शक्ति का; चक्र-अपदेशात्--सुदर्शन चक्र से |
वे अत्यन्त कुशलपूर्वक रहते हैं और काल रूप श्रीभगवान् के सुदर्शन चक्र के अतिरिक्तअन्य किसी साधन द्वारा मृत्यु से भयभीत नहीं हैं।
ह हल ७ जे ऋे ने कि कल न डेयस्मिन्प्रविष्टेसुरवधूनां प्रायः पुंसवनानि भयादेव स्त्रवन्ति पतन्ति च ॥
१५॥
यस्मिन्ू--जहाँ; प्रविष्ट--प्रवेश करने पर; असुर-वधूनाम्--उन असुर वधुओं का; प्राय:--प्राय:; पुंसवनानि--गर्भ; भयात्--भयवश; एव--ही; स्त्रवन्ति--बाहर सरकते हैं; पतन्ति--गिर पड़ते हैं; च--तथा |
जब सुदर्शन चक्र उन प्रदेशों में पहुँचता है, तो उसके तेज के भय से असुरों की गर्भिणीस्त्रियों का गर्भपात हो जाता है।
अथातले मयपुत्रो सुरो बलो निवसति येन ह वा इह सूष्टा: षणणवतिर्माया: काश्चनाद्यापि मायाविनोधारयन्ति यस्य च जृम्भमाणस्य मुखतस्त्रयः स्त्रीगणा उदपद्यन्त स्वैरिण्य: कामिन्यः पुंश्रल्य इति या वैबिलाय-नं प्रविष्टं पुरुष रसेन हाटकाख्येन साधयित्वास्वविलासावलोकनानुरागस्मितसंलापोपगूहनादिभि: स्वैरं किल रमयन्ति यस्मित्रुपयुक्ते पुरुष ई श्वरो हंसिद्धोहमित्ययुतमहागजबलमात्मानमभिमन्यमानः कत्थते मदान्ध इव ॥
१६॥
अथ--अब; अतले--अतल नामक लोक पर; मय-पुत्र: असुरः--मय का असुर पुत्र; बल:ः--बल; निवसति--वास करता है;येन--जिसके द्वारा; ह वा--निस्सन्देह; इह--इसमें; सृष्टाः--रचना की; षट्-णवति:--छियानबे; माया: --माया के प्रकार;काश्चन--कोई; अद्य अपि--आज भी; माया-विन:--मायावी लोग ( यथा सोना बनाने वाले ); धारयन्ति--उपयोग करते हैं;यस्य--जिसका; च-- भी ; जृम्भभाणस्य--उवासी लेते हुए; मुखतः --मुख मार्ग से; त्रयः--तीन; स्त्री-गणा: --स्त्रियों केप्रकार; उदपद्यन्त--उत्पन्न हुए; स्वैरिण्य:--स्वैरिणी ( जो अपनी ही जाति में ब्याह करती है ); कामिन्य:--कामिनी ( जोकामवश किसी भी जाति के पुरुष से ब्याह कर लेती है ); पुंश्र॒ल्य:--पुंश्वली ( जो एक पति को छोड़कर दूसरा पति बनानाचाहती है ); इति--इस प्रकार; याः:--जो; वै--निश्चय ही; बिल-अयनम्--अधोलोक, बिल-स्वर्ग में; प्रविष्टम्-- प्रवेश करके;पुरुषम्--नर; रसेन--रस द्वारा; हाटक-आख्येन--हाटक नामक मादक जड़ी से बना हुआ; साधयित्वा--विषयभोग के लिएसक्षम बनाकर; स्व-विलास--अपने इन्द्रियभोग के लिए; अवलोकन--चितवन से; अनुराग--कामी; स्मित--मन्द हास से;संलाप--बातचीत से; उपगूहन-आदिभि:--आलिंगन आदि से; स्वैरम्--अपनी इच्छानुसार; किल--निस्सन्देह; रमबन्ति--रमणकरते हैं; यस्मिन्--जो; उपयुक्ते--उपभोग करने पर; पुरुष: --पुरुष; ईश्वर: अहम्--मैं सर्वशक्तिमान पुरुष हूँ; सिद्ध: अहम्-मैंसिद्ध पुरुष हूँ; इति--इस प्रकार; अयुत--दस हजार; महा-गज--बड़े-बड़े हाथियों की; बलम्--शक्ति; आत्मानम्--अपनेआप; अभिमन्यमान:--गर्व से पूर्ण होकर; कत्थते--कहते हैं; मद-अन्ध:--मिथ्या अहंकार से अन्धा; इब--सहश |
हे राजन, अब मैं तुमसे अतललोक से प्रारम्भ करके एक एक करके समस्त अधोलोकों कावर्णन करूँगा।
अतललोक में मय-दानव का पुत्र बल नामक असुर है, जिसने छियानबे प्रकारकी माया रच रखी है।
कुछ तथाकथित योगी तथा स्वामी आज भी लोगों को ठगने के लिए इसमाया का प्रयोग करते हैं।
बल असुर ने उवासी लेने से स्वैरिणी, कामिनी तथा पुंश्चली के नाम सेतीन प्रकार की स्त्रियाँ उत्पन्न हुई हैं।
स्वैरिणियाँ अपने ही समूह के पुरुष से ब्याह करना पसन्दकरती हैं, कामिनियाँ किसी भी वर्ग के पुरुष से ब्याह कर लेती हैं और पुंश्चलियाँ अपना पतिबदलती रहती हैं।
यदि कोई पुरुष अतललोक में प्रवेश करता है, तो ये स्त्रियाँ तुरन्त ही उसे बन्दीबना कर हाटक नामक जड़ी से बनाये गये मादक पेय को पीने के लिए बाध्य कर देती हैं।
इसपेय से मनुष्य में प्रचुर काम-शक्ति जाग्रत होती है, जिसका उपयोग वे स्त्रियाँ अपने सम्भोग हेतुकरती हैं।
स्त्रियाँ उसे अपनी मोहक चितवन, प्रेमालाप, मन्द मुस्कान तथा आलिंगन इत्यादि के द्वारा मोह लेती हैं।
इस प्रकार वे उन्हें अपने साथ संभोग के लिए फुसलाकर जी भर करकामतृप्ति करती हैं।
कामशक्ति बढ़ने के कारण मनुष्य अपने को दस हजार हाथियों से भीअधिक बलवान और सक्षम न मानने लगता है।
दरअसल मदहोशी के कारण मोहग्रस्त होकरवह सर पर खड़ी मृत्यु की अनदेखी करके अपने आपको ईश्वर समझने लगता है।
ततोथस्ताद्वितले हरो भगवान्हाटके श्वरः स्वपार्षदभूतगणावृत: प्रजापतिसर्गोपबृंहणाय भवो भवान्या सहमिथुनीभूत आस्ते यतः प्रवृत्ता सरित्प्रवरा हाटकी नाम भवयोर्वीर्येण यत्र चित्रभानुर्मातरिश्वनासमिध्यमान ओजसा पिबति ततन्निष्ठयूतं हाटकाख्यं सुवर्ण भूषणेनासुरेन्द्रावरोधेषु पुरुषा: सहपुरुषीभिर्धारयन्ति ॥
१७॥
ततः--अतललोक के; अधस्तात्--नीचे; वितले--वितललोक में; हर:-- भगवान् शिव; भगवान्--सर्वशक्तिमान;हाटकेश्वरः--स्वर्ण का स्वामी; स्व-पार्षद-- अपने पार्षदों से; भूत-गण--जो भूत जैसे प्राणी हैं; आवृत:--घिर कर; प्रजापति-सर्ग--भगवान् ब्रह्म की सृष्टि; उपबृंहणाय--जनसंख्या बढ़ाने के उद्देश्य से; भवः--भगवान् शिव; भवान्या सह--अपनी पलीभवानी सहित; मिथुनी-भूतः--कामक्रीड़ा में रत; आस्ते--रहते हैं; यतः--उस लोक ( वितल ) से; प्रवृत्ता--निकल कर;सरित्-प्रवरा--बड़ी नदी; हाटकी--हाटकी; नाम--नाम की; भवयो: वीर्येणग-- भगवान् शिव तथा भवानी के वीर्य एवं रज से;यत्र--जहाँ; चित्र-भानु:--अग्निदेवता; मातरिश्रना--वायु द्वारा; समिध्यमान:--तेजी से प्रज्वलित किये जाने पर; ओजसा--अत्यधिक शक्ति के साथ; पिबति--पीता है; तत्--वह; निष्ठयूतम्--फूत्कार करते हुए थूकना; हाटक-आख्यम्--हाटक नामका; सुवर्णम्--सोना; भूषणेन-- अनेक प्रकार के आभूषणों द्वारा; असुर-इन्द्र--महान् असुरों के; अवरोधेषु --घरों में;पुरुषा:--नर; सह--के साथ; पुरुषीभि:--अपनी पत्नियों तथा स्त्रियों के; धारयन्ति-- धारण करते हैं।
अतललोक के नीचे अगला ग्रह वितल है जहाँ स्वर्ण खानों के स्वामी भगवान् शिव अपनेगणों, भूतों तथा ऐसे ही अन्य जीवों के साथ रहते हैं।
पिता-रूप शिव माता-रूप भवानी केसाथ विहार करते हैं और इनके वीर्य-रज के मिश्रण से हाटकी नामक नदी निकलती है।
जबवायु द्वारा अग्नि प्रज्वलित हो उठती है, तो वह नदी को पी जाती है और बाहर थूक देने परहाटक नामक स्वर्ण उत्पन्न होता है।
इस लोक के वासी असुर अपनी पत्नियों सहित उस स्वर्ण केबने आभूषणों से अपने को अलंकृत करते हैं और इस प्रकार से वे अत्यन्त सुखपूर्वक रहते हैं।
ततो थस्तात्सुतले उदारश्रवा: पुण्यश्लोको विरोचनात्मजो बलिभर्भगवता महेन्द्रस्य प्रियंचिकीर्षमाणेनादितेरल॑ब्धकायो भूत्वा वटुवामनरूपेण पराक्षिप्तलोकत्रयो भगवदनुकम्पयैव पुनः प्रवेशितइन्द्रादिष्वविद्यमानया सुसमृद्धया थरियाभिजुष्ट: स्वधमेंणाराधयंस्तमेव भगवन्तमाराधनीयमपगतसाध्वसआस्तेधुनापि ॥
१८॥
ततः अधस्तात्ू--वितल लोक के नीचे; सुतले--सुतल लोक में; उदार-श्रवा: --अत्यन्त प्रसिद्ध; पुण्य-शलोक:--अत्यन्त पवित्रएवं चिन्मय भावना में अग्रसर; विरोचन-आत्मज: --विरोचन का पुत्र; बलि:--बलि महाराज; भगवता-- श्रीभगवान् के द्वारा;महा-इन्द्रस्य--स्वर्ग के राजा इन्द्र का; प्रियमू--कुशलता; चिकीर्षमाणेन--करने की कामना रखने वाला; आदिते:--अदितिसे; लब्ध-काय:--अपना शरीर प्राप्त करके; भूत्वा--प्रकट होकर; वटु--ब्रह्मचारी; वामन-रूपेण--वामन के रूप में;पराक्षिप्त--ऐंठ लिया; लोक-त्रयः--तीनों लोक; भगवत्-अनुकम्पया-- श्रीभगवान् की कृपा से; एब--ही; पुनः --फिर;प्रवेशित:--प्रवेश करने के लिए बाध्य किया; इन्द्र-आदिषु--स्वर्ग के राजा जैसे देवताओं के मध्य में; अविद्यमानया--अनुपस्थित रहकर; सुसमृद्धया--ऐसे ऐश्वर्य से अत्यन्त धनी बनकर; थ्रिया--सौभाग्य से; अभिजुष्ट: --आशीष प्राप्त करके;स्व-धर्मेण-- भक्ति करके; आराधयन्-- आराधना करके ; तम्--उसे; एव--निश्चय ही; भगवन्तम्-- श्रीभगवान् को;आराधनीयम्-- अत्यन्त आराध्य; अपगत-साध्वस:-- भयरहित; आस्ते--रहता है; अधुना अपि--आज भी।
वितल के नीचे सुतल नामक एक अन्य लोक है जहाँ महाराज विरोचन के पुत्र बलि महाराजरहते हैं, जो अत्यन्त पवित्र राजा के रूप में विख्यात हैं और वहाँ आज भी निवास करते हैं।
स्वर्ग के राजा इन्द्र के कल्याण हेतु भगवान् विष्णु अदिति के पुत्र वामन ब्रह्मचारी के रूप मेंप्रकट हुएऔर केवल तीन पग पृथ्वी माँग कर महाराज बलि को छल कर तीनों लोक प्राप्त कर लिए।
सर्वस्व दान ले लेने पर बलि से प्रसन्न होकर भगवान् ने उन्हें उनका राज्य लौटा दिया और इन्द्र सेभी ऐश्वर्यवान् बना दिया।
आज भी सुतललोक में श्रीभगवान् की आराधना करते हुए बलिमहाराज भक्ति करते हैं।
नो एवैतत्साक्षात्कारो भूमिदानस्य यत्तद्धगवत्यशेषजीवनिकायानां जीवभूतात्मभूते परमात्मनि वासुदेवेतीर्थतमे पात्र उपपन्ने परया श्रद्धया परमादरसमाहितमनसा सम्प्रतिपादितस्य साक्षादपवर्गद्वारस्ययद्विलनिलयैश्वर्यम, ॥
१९॥
नो--न; एव--निश्चित ही; एतत्--यह; साक्षात्कार:--प्रत्यक्ष फल; भूमि-दानस्य-- भूमि दान का; यत्--जो; तत्--वह;भगवति--श्रीभगवान् के प्रति; अशेष-जीव-निकायानाम्--असंख्य जीवात्माओं का; जीव-भूत-आत्म-भूते--जो जीवन एवं'परम-आत्मा है; परम-आत्मनि--परम नियन्ता; वासुदेवे-- भगवान् वासुदेव ( श्रीकृष्ण ) में; तीर्थ-तमे--ती थों में श्रेष्ठ; पात्रे--सबसे योग्य ग्राहक; उपपन्ने-- पहुँचने के बाद; परया--परमश्रेष्ठ के द्वारा; श्रद्धया-- श्रद्धा द्वारा; परम-आदर--अतीव सम्मानसहित; समाहित-मनसा--अत्यन्त मनोयोग से; सम्प्रतिपादितस्य--प्रदान किया गया; साक्षात्-- प्रत्यक्षत:; अपवर्ग-द्वारस्थ--मुक्ति का द्वार; यतू--जो; बिल-निलय--बिल स्वर्ग का, कृत्रिम स्वर्गलोकों का; ऐश्वर्यम्--ऐश्वर्य |
है राजनू, बलि महाराज ने श्रीभगवान् वामनदेव को अपना सर्वस्व दान कर दिया, किन्तुइसका यह अर्थ नहीं है कि अपने दान के कारण उन्हें बिल-स्वर्ग में इतना भौतिक ऐश्वर्य प्राप्तहुआ।
समस्त जीवात्माओं के जीवनमूल श्रीभगवानू् प्रत्येक व्यक्ति के अन्तस्थल में मित्र परमात्माके रूप में निवास करते हैं और उन्हीं के आदेश से इस भौतिक संसार में आनंद उठाते हैं या कष्टभोगते हैं।
भगवान् के दिव्य गुणों पर रीझ कर बलि महाराज ने अपना सर्वस्व उनकेचरणकमलों में अर्पित कर दिया।
किन्तु उनका लक्ष्य भौतिक लाभ प्राप्त करना नहीं था, वे तोशुद्ध भक्त बनना चाहते थे।
शुद्ध भक्त के लिए मुक्ति के द्वार स्वतः खुले जाते हैं।
किसी को यहनहीं सोचना चाहिए कि केवल अपने दान के कारण बलि महाराज को इतना ऐश्वर्य प्राप्त होसका।
जब कोई प्रेमवश शुद्ध भक्त बन जाता है, तो उसे भी भगवदिच्छा से अच्छा भौतिकस्थान प्राप्त होता है।
किन्तु कभी गलती से यह नहीं समझना चाहिए कि भक्ति केपरिणामस्वरूप किसी भक्त को सांसारिक ऐश्वर्य प्राप्त होता है।
भक्ति का असली फल तोश्रीभगवान् के प्रति शुद्ध प्रेम जागृत होना है जो समस्त परिस्थितियों में बना रहता है।
यस्य ह वाव क्षुतपतनप्रस्खलनादिषु विवश: सकृन्नामाभिगृणन्पुरुष: कर्मबन्धनमझ्जसा विधुनोति यस्यहैव प्रतिबाधन मुमुक्षवोउनन््यथैवोपलभन्ते ॥
२०॥
यस्य--जिसका; ह वाव--निस्सन्देह; क्षुत-- भूखे होने पर; पतन--गिरना; प्रस्खलन-आदिषु--लड़खड़ाना आदि; विवश: --असहाय होकर; सकृत्--एक बार; नाम अभिगृणन्-- भगवान् के पवित्र नाम का जप करते हुए; पुरुष:--व्यक्ति; कर्म-बन्धनम्ू--कर्मो का बन्धन; अज्ञसा-- पूर्णतया; विधुनोति-- धो देते हैं; यस्थ--जिसका; ह--निश्चय ही; एब--इस प्रकार;प्रतिबाधनम्--विकर्षण; मुमुक्षव:--मुक्ति के इच्छुक प्राणी; अन्यथा--अन्यथा; एब--निश्चय ही; उपलभन्ते--अनुभव करनेका प्रयत्न करते हैं।
यदि भूख से व्याकुल होने, गिरने अथवा ठोकर खाने पर कोई इच्छा अथवा अनिच्छा सेएक बार भी भगवान् का पवित्र नाम लेता है, तो वह सहसा अपने पूर्वकर्मो के प्रभावों से मुक्तहो जाता है।
कर्मी लोग भौतिक कार्यों में फँस कर योग-साधना में अनेक कष्ट उठाते हैं औरअन्य लोग भी वैसी ही स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।
तद्धक्तानामात्मवतां सर्वेषामात्मन्यात्मद आत्मतयैव ॥
२१॥
तत्--वह; भक्तानामू-- भक्तों का; आत्म-वताम्--सनक तथा सनातन जैसे आत्मज्ञानी पुरुषों का; सर्वेषामू--सबों का;आत्मनि--आत्मा रूप श्रीभगवान् तक; आत्म-दे--जो बिना हिचक के अपने आप को दे देता है; आत्मतया--जो परम आत्माहै, परमात्मा; एव--निस्सन्देह +प्रत्येक प्राणी के हृदय में परमात्मा के रूप में स्थित श्रीभगवान् नारदमुनि जैसे भक्तों केहाथों बिक जाते हैं।
दूसरे शब्दों में, परमेश्वर ऐसे ही भक्तों को प्यार करते हैं और जो उन्हें शुद्धभाव से प्यार करते हैं।
वे उनके हाथों अपने आप को सौंप देते हैं।
यहाँ तक कि महान् आत्म-साक्षात्कार करने वाले योगी, यथा चारों कुमार भी अपने अन्तर में परमात्मा का साक्षात्कारकरके दिव्य आनन्द प्राप्त करते हैं।
न वै भगवान्नूनममुष्यानुजग्राह यदुत पुनरात्मानुस्मृतिमोषणं मायामयभोगैश्वर्यमेवातनुतेति ॥
२२॥
न--नहीं; बै--निस्सन्देह; भगवान्-- श्री भगवान् ने; नूनम्--निश्चय ही; अमुष्य--बलि महाराज को; अनुजग्राह--अपना अनुग्रहदिखाया; यत्-- क्योंकि; उत--निश्चय ही; पुनः: --फिर; आत्म-अनुस्मृति-- श्रीभगवान् के स्मरण का; मोषणम्--लूटने वाला;माया-मय--माया का एक गुण; भोग-ऐश्वर्यम्ू-- भौतिक ऐश्वर्य; एब--निश्चय ही; आतनुत--विस्मृत; इति--इस प्रकार।
श्रीभगवान् ने बलि महाराज को भौतिक सुख तथा ऐश्वर्य प्रदान करके अपना अनुग्रहप्रदर्शित नहीं किया क्योंकि इनसे ईश्वर की प्रेमाभक्ति भूल जाती है।
भौतिक ऐश्वर्य का परिणामयह होता है कि फिर भगवान् में मन नहीं लगता।
यत्तद्धगवतानधिगतान्योपायेन याच्ञाच्छलेनापहतस्वशरीरावशेषितलोकत्रयो वरुणपश्गै श्व सम्प्रतिमुक्तोगिरिदर्या चापविद्ध इति होवाच ॥
२३॥
यत्--जो; तत्--वह; भगवता-- श्री भगवान् द्वारा; अनधिगत-अन्य-उपायेन--जिसे अन्य साधनों से नहीं देखा जा सकता;याच्जा-छलेन--याचना ( भिक्षा ) के बहाने; अपहत--ठगा गया; स्व-शरीर-अवशेषित--केवल अपना शरीर शेष रह जाने पर;लोक-त्रयः--तीनों लोक; वरुण-पाशै:--वरुण के पाश द्वारा; च--तथा; सम्प्रतिमुक्त:--पूर्णतया बँधा हुआ; गिरि-दर्यामू--पर्वत की गुफा में; च--तथा; अपविद्ध:--रोका जाकर; इति--इस प्रकार; ह--निस्सन्देह; उबाच--कहा |
जब श्रीभगवान् को बलि महाराज का सर्वस्व ले लेने की कोई युक्ति न सूझी तो उन्होंनेभिक्षा माँगने के बहाने तीनों लोक माँग लिए।
इस प्रकार उनका शरीरमात्र शेष बच रहा, किन्तुतो भी भगवान् सन्तुष्ट नहीं हुए।
उन्होंने बलि महाराज को वरुण पाश से बन्दी बना लिया औरएक पर्वत की गुफा में ले जाकर फेंक दिया।
यद्यपि बलि महाराज का सर्वस्व ले लिया गया थाऔर उन्हें बन्दी बना कर गुफा में डाल दिया गया था, तो भी महान् भक्त होने के कारण वे इसप्रकार बोले।
नूनं बताय॑ भगवानर्थेषु न निष्णातो योसाविन्द्रो यस्य सचिवो मन्त्राय वृत एकान्ततो बृहस्पतिस्तमतिहायस्वयमुपेन्द्रेणात्मानमयाचतात्मनश्राशिषो नो एवं तद्दास्यमतिगम्भीरवयस: कालस्य मन्वन्तरपरिवृत्तंकियल्लोकत्रयमिदम्, ॥
२४॥
नूनम्--निश्चय ही; बत--धिक्; अयम्--यह; भगवान्--अत्यन्त विद्वान; अर्थेषु-- आत्महित के लिए; न--नहीं; निष्णात: --परम अनुभवी; यः--जो; असौ--स्वर्ग का राजा; इन्द्र: --इन्द्र; यस्थ--जिसका; सचिव:--प्रधान मंत्री; मन्त्राय--मंत्रणा के लिए, सलाह के लिए; वृतः--चुना हुआ; एकान्तत:--अकेला; बृहस्पति:--बृहस्पति; तम्--उसको; अतिहाय--उपेक्षा करके;स्वयम्--स्वयं; उपेन्द्रेण--उपेन्द्र ( भगवान् वामनदेव ) की सहायता से; आत्मानम्--मुझसे; अयाचत--प्रार्थना की; आत्मन:--स्वयं; च--तथा; आशिष: -- आशीर्वाद ( तीनों लोक ); नो--नहीं; एव--ही; तत्-दास्यम्-- भगवान् की सप्रेम सेवा; अति--अत्यधिक; गम्भीर-वयसः--अपार अवधि वाला; कालस्य--काल का; मन्वन्तर-परिवृत्तमू--मनु के जीवन के अन्त होने परपरिवर्तित; कियत्ू--क्या लाभ; लोक-त्रयम्--तीनों लोक; इृदम्--इन |
धिक्! स्वर्ग का राजा इन्द्र कितना दयनीय है कि अत्यन्त विद्वान और शक्तिमान होकर तथाबृहस्पति को परामर्श हेतु अपना प्रधान बना लेने पर भी आध्यात्मिक उन्नति के विषय में सर्वथाअज्ञानी है।
बृहस्पति भी बुद्धिमान नहीं है, क्योंकि उसने अपने शिष्य इन्द्र को उचित शिक्षा नहींदी।
भगवान् वामनदेव इन्द्र के द्वार पर खड़े हुए थे, किन्तु उनसे इन्द्र ने दिव्य सेवा के लिएअवसर का वरदान न माँग कर उन्हें मेरे द्वार पर अपने इन्द्रिय-भोग के लिए तीन लोकों कीप्राप्ति के लिए भिक्षा हेतु भेज दिया।
तीनों लोकों की प्रभुता अत्यन्त महत्त्वहीन है, क्योंकिमनुष्य के पास चाहे कितना भी ऐश्वर्य क्यों न रहे वह एक मन्वन्तर तक ही चलता है, जो अनन्तकाल का एक क्षुद्रांश मात्र है।
यस्यानुदास्यमेवास्मत्पितामह: किल वत्रे न तु स्वपित्र्यं यदुताकुतोभयं पदं दीयमानं भगवतः परमितिभगवतोपरते खलु स्वपितरि, ॥
२५॥
यस्य--जिसका ( श्रीभगवान् का ); अनुदास्यम्--सेवा; एव--निश्चय ही; अस्मत्--हमारा; पिता-मह:--पितामह, बाबा;किल--निस्सन्देह; वद्रे--स्वीकृत; न--नहीं; तु--लेकिन; स्व--अपना; पित्रयम्--पैतृकसम्पत्ति; यत्ू--जो; उत--निश्चय ही;अकुतः-भयम्--निर्भीकता; पदम्--पद, स्थान; दीयमानम्-- प्रदान किये जाने पर; भगवतः-- भगवान् की अपेक्षा; परमू--अन्य; इति--इस प्रकार; भगवता-- श्रीभगवान् द्वारा; उपरते--बध किये जाने पर; खलु--निस्संदेह; स्व-पितरि--अपना पिता
बलि महाराज ने कहा--मेरे पितामह प्रह्मद महाराज ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने आत्महित पहचाना।
उनके पिता हिरण्यकशिपु की मृत्यु के पश्चात् भगवान् नृसिंहदेव ने प्रह्मदको उनके पिता का साम्राज्य प्रदान करने के साथ ही भौतिक बन्धनों से मुक्ति प्रदान करनीचाही, किन्तु प्रहाद ने इनमें से किसी को भी स्वीकार नहीं किया।
उन्होंने सोचा कि मुक्ति तथाभौतिक ऐश्वर्य भक्ति में बाधक हैं, अतः श्रीभगवान् से ऐसे वरदान प्राप्त कर लेना भगवान् कावास्तविक अनुग्रह नहीं है।
फलस्वरूप कर्म तथा ज्ञान के फलों को न स्वीकार करते हुए प्रह्मदमहाराज ने भगवान् से केवल उनके दास की भक्ति में अनुरक्त रहने का वर माँगा।
तस्य महानुभावस्यानुपथममृजितकषाय: को वास्मद्विध: परिहीणभगवदनुग्रह उपजिगमिषतीति ॥
२६॥
तस्य-प्रह्नाद महाराज का; महा-अनुभावस्य--जो सिद्ध भक्त थे; अनुपथम्--पथ; अमृजित-कषाय:--भौतिकता से दूषितपुरुष; क:ः--क्या; वा--अथवा; अस्मत्-विध: --हमारे तुल्य; परिहीण-भगवत्-अनुग्रह:-- श्रीभगवान् के अनुग्रह बिना;उपजिगमिषति--अनुसरण करना चाहता है; इति--इस प्रकार
बलि महाराज ने कहा--हमारे जैसे पुरुष जो अब भी भौतिक सुखों में लिप्त हैं, जोभौतिक प्रकृति के तीनों गुणों से दूषित हैं और जिन पर श्रीभगवान् के अनुग्रह का अभाव है, वेभला ईश्वर के सिद्ध भक्त प्रह्नद महाराज के सर्वोत्कृष्ट मार्ग का अनुसरण कैसे कर सकते हैं ?
तस्यानुचरितमुपरिष्ठाद्विस्तरिष्यते यस्थ भगवान्स्वयमखिलजगदगुरु्नारायणो द्वारि गदापाणिरवतिष्ठतेनिजजनानुकम्पितहदयो येनाडुप्ठेन पदा दशकन्धरो योजनायुतायुतं दिग्विजय उच्चाटित: ॥
२७॥
तस्य--बलि महाराज का; अनुचरितम्--चरित्र, वर्णन; उपरिष्टात्--बाद के, परवर्ती ( आठवें स्कंध में ); विस्तरिष्यते--विस्तारसे वर्णन किया जायेगा; यस्य--जिसका; भगवान्-- श्रीभगवान्; स्वयम्--स्वयं; अखिल-जगतू-गुरु:--तीनों लोकों के गुरु;नारायण:--साक्षात् नारायण; द्वारि--द्वार पर; गदा-पाणि:--हाथ में गदा लिये हुए; अवतिष्ठते--खड़े रहते हैं; निज-जन-अनुकम्पित-हदयः--जिनका हृदय अपने भक्तों के लिए सदैव दया से पूरित रहता है; येन--जिसके द्वारा; अ्डृष्ठेन-बड़े अँगूठेसे; पदा--अपने पाँव का; दश-कन्धरः --दश सिरों वाला, रावण; योजन-अयुत-अयुतम्-- अस्सी हजार मील की दूरी; दिक्-विजये--बलि महाराज पर विजय प्राप्त करने हेतु; उच्चाटित:--फेंक दिया।
शुकदेव गोस्वामी बोले--हे राजन्, भला मैं बलि महाराज के चरित्र का कैसे गुणगान करसकता हूँ? तीनों लोकों के स्वामी श्रीभगवान्, जो अपने भक्त पर अत्यन्त दयालु हैं, महाराजबलि के द्वार पर गदा धारण किये खड़े रहते हैं।
जब पराक्रमी असुर रावण बलि महाराज परविजय पाने के लिए आया तो वामनदेव ने उसे अपने पैर के अँगूठे से अस्सी हजार मील दूरी परफेंक दिया।
मैं बलि महाराज के चरित्र तथा कार्यकलापों का विस्तृत वर्णन आगे ( आठवें स्कंधमें ) करूँगा।
ततोथस्तात्तलातले मयो नाम दानवेन्द्रस्त्रिपुरधिपतिर्भगवता पुरारिणा त्रिलोकीशं चिकीर्षुणानिर्दग्धस्वपुरत्रयस्तत्प्रसादाललब्धपदो मायाविनामाचार्यो महादेवेन परिरक्षितो विगतसुदर्शनभयोमहीयते ॥
२८॥
ततः--सुतल नामक लोक के; अधस्तात्--नीचे; तलातले--तलातल नामक लोक में; मय:--मय; नाम--नाम का; दानव-इन्द्र:--दानव, दानवों का राजा; त्रि-पुर-अधिपति:ः --तीनों पुरियों का ईश्वर; भगवता--सर्वशक्तिमान द्वारा; पुरारिणा-- भगवान्शिव द्वारा, जिन्हें त्रिपुरारी कहा जाता है; त्रि-लोकी--तीनों लोकों का; शम्--सौभाग्य; चिकीर्षुणा--कामना करने वाला;निर्दग्ध--जला दिया; स्व-पुर-त्रय:ः--जिसकी तीनों पुरियाँ; तत्-प्रसादातू-- भगवान् शिव के अनुग्रह से; लब्ध--प्राप्त कियागया; पदः--राज्य; माया-विनाम् आचार्य: --समस्त मायावियों के स्वामी; महा-देवेन-- भगवान् शिव के द्वारा; परिरक्षित:--सुरक्षित; विगत-सुदर्शन-भय:ः--जो श्रीभगवान् तथा उनके सुदर्शन चक्र से भयभीत नहीं है; महीयते--आराधित है।
सुतल लोक के नीचे तलातल नामक एक और लोक है जो मय दानव द्वारा शासित है।
मयइन्द्रजाल की शक्तियों से पूर्ण, समस्त मायावियों के आचार्य ( स्वामी ) रूप में विख्यात है।
एकबार भगवान् शिव ने, जिन्हें त्रिपुरारी कहा जाता है, तीनों लोकों के लाभ के लिए मय के तीनोंराज्यों को जला दिया, किन्तु बाद में उससे प्रसन्न होकर उसका राज्य लौटा दिया।
तब से शिवजीमय दानव की रक्षा करते हैं, इसलिए वह गलती से सोचता है कि उसे श्रीभगवान् के सुदर्शनचक्र का भय नहीं करना चाहिए।
ततोथस्तान्महातले काद्रवेयाणां सर्पाणां नैकशिरसां क्रोधवशो नाम गण:कुहकतक्षककालियसुषेणादिप्रधाना महाभोगवन्तः पतत्त्रिराजाधिपते: पुरुषवाहादनवरतमुद्दिजमाना:स्वकलत्रापत्यसुहत्कुटुम्बसड़ेन क्वचित्प्रमत्ता विहरन्ति ॥
२९॥
ततः--तलातल लोक से; अधस्तात्--नीचे; महातले--महातल नामक लोक में; काद्रवेयाणाम्--कद्ू की सन््तानों का;सर्पाणाम्--जो सर्प है; न एक-शिरसाम्ू--जो अनेक फनों वाले हैं; क्रोध-वशः--सदैव क्रोध के वशीभूत; नाम--नामक;गण: --गण, समूह; कुहक--कुहक; तक्षक--तक्षक; कालिय--कालिय; सुषेण--सुषेण; आदि--इ त्यादि; प्रधाना: --प्रमुख; महा-भोगवन्त:--समस्त प्रकार के भोगों में लिप्त; पतत्तनरि-राज-अधिपते: --समस्त पक्षियों के अधिपति, गरुड़ से;पुरुष-वाहात्-- श्री भगवान् को ले जाने वाला; अनवरतम्--निरन्तर; उद्विजमाना: -- भयभीत; स्व--अपने आप; कलत्र-अपत्य--स्त्रियों तथा सन्तानों; सुहृत्-मित्र; कुटुम्ब--कुटुम्बीजन; सड्रेन--साथ में; क्वचित्--कभी-कभी; प्रमत्ता:--क्रुद्ध;विहरन्ति--विहार करते हैं, खेलते हैं।
तलातल के नीचे का लोक महातल कहलाता है।
यह सदैव क्रुद्ध रहने वाले अनेक फनोंवाले कद्ू की सर्प-सन्तानों का आवास है।
इन सर्पो में कुहक, तक्षक, कालिय तथा सुषेणप्रमुख हैं।
महातल के सारे सर्प भगवान् विष्णु के वाहन गरुड़ के भय से सदैव आतंकित रहतेहैं, किन्तु चिन्तातुर होते हुए भी उनमें से कुछ अपनी पत्नियों, सन््तानों, मित्रों तथा कुटुम्बियों केसाथ-साथ क्रीड़ाएँ करते रहते हैं।
ततोथस्ताद्रसातले दैतेया दानवा: पणयो नाम निवातकवचा: कालेया हिरण्यपुरवासिन इतिविबुधप्रत्यनीका उत्पत्त्या महौजसो महासाहसिनो भगवत: सकललोकानुभावस्य हरेरेव तेजसाप्रतिहतबलावलेपा बिलेशया इव वसन्ति ये वै सरमयेन्द्रदूत्या वाग्भिमन्त्रवर्णाभिरिन्द्राद्वि भ्यति ॥
३०॥
ततः अधस्तात्ू--महातल के भी नीचे; रसातले--रसातल में; दैतेया:--दिति के पुत्र; दानवा:--दनु के पुत्र; पणयः नाम--पणिनामक; निवात-कवचा:--निवात कवच; कालेया: --कालेय; हिरण्य-पुरवासिन:--हिरण्य-पुरवासी; इति--इस प्रकार;विबुध-प्रत्यनीका: --देवताओं के शत्रु; उत्पत्त्या:--जन्म के; महा-ओजस: --अत्यन्त ओजस्वी; महा-साहसिन: --अत्यन्त क्रूर;भगवतः--भगवान् का; सकल-लोक-अनुभावस्य--जो समस्त लोकों के लिए मंगलकारी है; हरेः -- श्रीभगवान् का; एव--निश्चय ही; तेजसा--सुदर्शन चक्र से; प्रतिहत-- पराजित; बल--शक्ति; अवलेपा:--तथा गर्व ( शारीरिक बल के कारण );बिल-ईशया:--सर्प; इब--सहृश; वसन्ति--रहते हैं; ये--जो; बै--निस्सन्देह; सरमया--सरमा द्वारा; इन्द्र-दूत्या--इन्द्र कीदूती; वाग्भि:ः--शब्दों से; मन्त्र-वर्णाभि:--मंत्रों के रूप में; इन्द्रात्--राजा इन्द्र से; बिभ्यति-- डरते हैं|
महातल के नीचे रसातल नामक लोक है जो दिति तथा दनु के आसुरी पुत्रों का निवास है।
ये पणि, निवात-कवच, कालेय तथा हिरण्य-पुरवासी कहलाते हैं।
ये देवताओं के शत्रु हैं औरसर्पों की भाँति बिलों में रहते हैं।
ये जन्म से ही अत्यन्त शक्तिशाली एवं क्रूर हैं और अपनी शक्तिका गर्व होने पर भी वे समस्त लोकों के अधिपति श्रीभगवान् के सुदर्शन चक्र द्वारा सदैवपराजित होते हैं।
जब इन्द्र की नारी रूप दूत सरमा विशेष एक विशिष्ट शाप देती है, तो महातलके असुर सर्प इन्द्र से अत्यन्त भयभीत हो उठते हैं।
ततोथस्तात्पाताले नागलोकपतयो वासुकिप्रमुखा:शद्भुकुलिकमहाशड्डुश्वेतधनञ्ञयधृतराष्ट्रशड्डुचूडकम्बला श्वतरदेवदत्तादयो महाभोगिनो महामर्षा निवसन्तियेषामु ह वै पञ्ञसप्तदशशतसहस्त्रशीर्षाणां फणासु विरचिता महामणयो रोचिष्णव:'पातालविवरतिमिरनिकरं स्वरोचिषा विधमन्ति ॥
३१॥
ततः अधस्तात्ू--रसातल के नीचे; पाताले--पाताल लोक में; नाग-लोक-पतय: --नागलोकों के स्वामी; वासुकि--वासुकि;प्रमुखा:--प्रमुख; शद्ड--शंख; कुलिक--कुलिक; महा-शद्गु--महाशंख; श्वेत-- श्वेत; धनज्ञय-- धनज्ञय; धृतराष्ट्र-- धृतराष्ट्र;शट्भु-चूड--शंखचूड़; कम्बल--कम्बल; अश्वतर--अश्वतर; देव-दत्त--देवदत्त; आदय:--इत्यादि; महा-भोगिन: --अत्यन्तभोगी; महा-अमर्षा: -- प्रकृति से अत्यन्त ईर्षालु; निवसन्ति--रहते हैं; येषामू--जिनका; उ ह--निश्चय ही; बै--निस्सन्देह;पश्ञ-पाँच; सप्त--सात; दश--दस; शत--एक सौ; सहस्त्र--एक हजार; शीर्षाणाम्--फणों वालों का; फणासु--उन फणोंपर; विरचिता:-- जड़ित; महा-मणय:--अत्यन्त मूल्यवान मणि; रोचिष्णव: --तेज से पूर्ण; पाताल-विवर--पाताल लोक कीगुफाएँ; तिमिर-निकरम्-- अंधकार-राशि; स्व-रोचिषा--उनके फणों के तेज से; विधमन्ति-- भागते हैं।
रसातल के नीचे पाताल अथवा नागलोक नामक एक अन्य लोक है जहाँ अनेक आसुरी सर्पतथा नागलोक के स्वामी रहते हैं, यथा शंख, कुलिक, महाशंख, श्वेत, धनञ्जय, धृतराष्ट्र,शंखचूड़, कम्बल, अश्वतर तथा देवदत्त।
इसमें से वासुकि प्रमुख है।
वे अत्यन्त क्रुद्ध रहते हैं औरउनमें से कुछ के पाँच, कुछ के सात, कुछ के दस, कुछ के सौ और अन्यों के हजार फण होतेहैं।
इन फणों में बहुमूल्य मणियां सुशोभित हैं और इन मणियों से निकला प्रकाश बिल-स्वर्ग केसम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करता है।
